कथा · 37
राजा वासुदेव: शून्य के दर्शन
राजा का ध्यान इतना गहरा गया कि उन्होंने पूरा अस्तित्व पार कर लिया। आख़िर में जो मिला, वो शून्य था। मगर शून्य के नीचे कुछ और भी था।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, अगर मैं सब छोड़ दूँ, तो क्या बचेगा?”
वसिष्ठ बोले – “राम, वासुदेव नाम के एक राजा थे। उन्होंने यही प्रश्न पूछा, और फिर एक-एक करके अपनी हर पहचान छोड़ी। आख़िर में जो बचा, वो उनके लिए सबसे बड़ा अनुभव था।”
राजा
वासुदेव एक राजा थे, उम्र पचपन बरस। उनकी कलाई पर चाँदी की एक पतली कड़ी थी, जो उनकी माँ ने उन्हें बचपन में पहनाई थी, और जिसे वो कभी नहीं उतारते थे।
उनके पास सब कुछ था।
बड़ा राज्य था, बड़ी सेना थी, बड़ी प्रजा थी। प्रिय पत्नी थीं, और होनहार बच्चे।
उनकी पत्नी का नाम सुनयना था। तीस बरस का विवाह था उनका। सुनयना का चेहरा गोल था, और ठोड़ी पर एक निशान, बचपन में किसी पत्थर से लगी चोट का। उनकी हँसी हलकी थी, एक हलकी हाँफ के साथ आती थी।

वासुदेव की एक आदत थी। हर शाम जब वो अपने राज-सिंहासन से लौटते, तो सबसे पहले अपनी पत्नी के पास जाते, और एक पल के लिए उनकी कलाई पर अपनी कलाई रख देते। दोनों की चाँदी की कड़ियाँ एक-दूसरे से छू जातीं। यह उन दोनों की एक चुप भाषा थी।
सुनयना ने एक बार पूछा था – “महाराज, यह आदत आपने कब शुरू की?”
वासुदेव बोले – “प्रिय, जब हम विवाह के पाँचवें बरस पर थे। उन दिनों आप बीमार थीं, और मुझे डर लगा था। उस रात मैंने पहली बार आपकी कलाई पर अपनी कलाई रखी, बस यह जानने के लिए कि आप अभी हैं।”
सुनयना ने आँखें नीची कर लीं – “महाराज, मुझे यह बात तो पहले कभी पता ही नहीं थी।”
वासुदेव बोले – “क्योंकि मैंने कभी कहा ही नहीं।”
उनके तीन बच्चे थे। सबसे बड़ा बेटा सत्यजित, बड़ी बेटी पद्मा, और छोटा बेटा हरि।
सत्यजित अब पच्चीस बरस का था, शान्त स्वभाव का, और उसकी आँखों में पिता की झलक थी। पद्मा बीस बरस की थी, और उसे अपनी माँ की हँसी मिली थी। हरि सोलह बरस का था, और बिना किसी कारण के हर बात पर हँसता रहता था।
वो एक अच्छे राजा थे। बहुत बरस उन्होंने न्याय किया, बहुत बरस प्रजा की सेवा की, और प्रजा उनसे प्रेम करती थी।
पर एक दिन वासुदेव के भीतर एक प्रश्न उठा।
उस शाम वो अपने महल के एक छज्जे पर बैठे थे, और सूरज ढल रहा था। दूर नदी बह रही थी, जिसका रंग सोने जैसा था, और आसमान में हलके बादल तैर रहे थे।
एक चिड़िया उड़कर एक पेड़ पर बैठी, फिर उड़ी, फिर बैठी। वासुदेव उसे देखते रहे।

उन्होंने सोचा – “यह चिड़िया कितनी हलकी है। बैठती है, उड़ती है, और इस पर कोई बँधन नहीं। और मैं? मेरे पास सब कुछ है, फिर भी भीतर एक भारीपन है। ऐसा क्यों है?”
उन्होंने आगे सोचा – “मैं वासुदेव हूँ। राजा हूँ, पति हूँ, पिता हूँ। यह सब मेरी पहचान है। पर अगर यह सब ख़त्म हो जाए, तो क्या बचेगा?”
यह प्रश्न उन्हें छोड़ता ही नहीं था। उस रात वो सो नहीं पाए।
पत्नी ने पूछा – “महाराज, क्या हुआ?”
वासुदेव बोले – “कुछ नहीं, प्रिय।”
“फिर भी कुछ तो है।”
वासुदेव कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “एक प्रश्न उठा है। अगर मेरी हर पहचान चली जाए, तो क्या बचेगा?”
पत्नी बोलीं – “महाराज, यह तो ऋषियों का प्रश्न है।”
वासुदेव बोले – “शायद। पर अब यह मेरा भी है।”
पत्नी को यह बात पूरी तरह समझ नहीं आई, पर उन्होंने वासुदेव को रोका नहीं। अगले दिन वासुदेव अपने पुरोहित के पास गए।
ऋषि

वो एक बूढ़े ऋषि के पास पहुँचे। ऋषि उनके राज-पुरोहित थे, बहुत पुराने और बहुत ज्ञानी।
वासुदेव बोले – “महाराज ऋषि, मुझे एक बात समझनी है।”
ऋषि बोले – “बोलिए, महाराज।”
वासुदेव ने अपना प्रश्न उनके सामने रखा। ऋषि ने सुना, और फिर बोले – “महाराज, यह बात बताने की नहीं है, ख़ुद देखने की है।”
वासुदेव बोले – “कैसे देखूँ?”
ऋषि बोले – “एक-एक करके सब कुछ मन में छोड़ते जाओ, और फिर देखो कि क्या बचता है।”
वासुदेव बोले – “पर ऋषि, मुझे राज्य तो नहीं छोड़ना। बस मन में छोड़ूँ?”

ऋषि बोले – “हाँ, मन में। बाहर सब वैसा ही रहेगा। पर भीतर तुम एक-एक करके अपनी पहचान को देखो, और हर एक से कहो, तू मेरी नहीं।”
“और फिर?”
“फिर देखो कि क्या बचता है।”
इतना कहकर ऋषि चले गए।
और प्रश्न
कुछ दिन बाद वासुदेव ने ऋषि से और पूछा – “ऋषि, अगर मैं अपनी हर पहचान छोड़ दूँ, तो लोग मुझे क्या समझेंगे?”
ऋषि बोले – “महाराज, यह प्रश्न ही पहचान का है। आप अब भी अपनी पहचान को छोड़ नहीं रहे, सिर्फ़ छोड़ने के बारे में सोच रहे हैं।”
वासुदेव बोले – “पर ऋषि, अगर मैं छोड़ूँ, तो मेरी पत्नी?”
“वो भी आपकी पहचान है।”
“मेरे बच्चे?”
“वो भी।”
“और मेरी प्रजा?”
“वो भी।”
वासुदेव ठिठक गए – “ऋषि, मेरी सब पहचानें मेरी हैं?”
“हाँ।”
“तो अगर मैं इन्हें छोड़ूँ, तो…”
ऋषि बोले – “महाराज, बाहर मत छोड़िए, बस भीतर छोड़िए।”
“भीतर छोड़ने का मतलब?”
ऋषि बोले – “बाहर आप वही रहें। पत्नी आपकी, बच्चे आपके, प्रजा आपकी। पर भीतर आप उनसे बँधे न हों। मतलब, अगर वो कल न रहें, तो आप टूटें नहीं। यही छोड़ना है।”
वासुदेव बोले – “समझा। पर यह कठिन है।”
ऋषि बोले – “हाँ, कठिन है।” और इतना कहकर वो चले गए।
पहले दिन
ऋषि की बात सुनने के बाद भी वासुदेव बहुत दिन तक कोशिश नहीं कर पाए। दिन में राज-काज रहता, शाम को सभा, और रात को थकान। वो हर रोज़ सोचते – “आज नहीं, कल करूँगा।” पर कल आता, और फिर वही बात दोहरा जाती।
एक दिन उन्होंने ख़ुद से कहा – “वासुदेव, तुम टाल रहे हो। क्यों?”
और उन्हें ख़ुद से ही जवाब मिला – “क्योंकि डर है।”
“डर किसका?”
“जो भीतर दिखे, उसका।”
वासुदेव के होंठों पर एक हलकी हँसी आई – “डर भी तो एक पहचान है। डर भी मेरा नहीं।” उस रात उन्होंने तय किया कि अब आज ही करेंगे।
अकेले

उस रात वासुदेव अपने कक्ष में अकेले थे। उन्होंने आँखें बन्द कीं।
पहली चीज़ जो भीतर आई, वो धन था। उनका खज़ाना, हीरे, सोना, राज्य की कर। वासुदेव ने उसे देखा और कहा – “धन, तू मेरा नहीं।” धन एक पल को उनके मन में रुका, फिर हलका हो गया।
दूसरी चीज़ राज्य था। उनका राज्य, उनकी सीमाएँ, उनकी प्रजा। वासुदेव ने उसे देखा और कहा – “राज्य, तू मेरा नहीं।” राज्य भी हलका हो गया।
तीसरी थी पत्नी, सुनयना।

वासुदेव की आँखें भीतर से बन्द थीं, पर सुनयना का चेहरा साफ़ उभर आया। उनकी हँसी, उस हलकी हाँफ के साथ, ठोड़ी पर का वो निशान, और उनकी कलाई की चाँदी की कड़ी, जो रोज़ शाम वासुदेव की कड़ी से छूती थी।
यहाँ आकर वासुदेव ठहर गए। उन्होंने सोचा – “सुनयना मेरी पत्नी हैं, तीस बरस से। उन्होंने मुझे राजा बना दिया, हर सुख-दुख में मेरा साथ दिया, मेरी बीमारी में मेरी देखभाल की, और वो मेरे बच्चों की माँ हैं। उन्हें कैसे छोड़ूँ?”
भीतर एक भारीपन उतर आया। वासुदेव की आँखों में हलकी नमी आई, पर वो रोए नहीं।
तभी उन्हें ऋषि की बात याद आई – “मन में छोड़ो, बाहर सब वैसा ही रहेगा।” वासुदेव ने एक लम्बी साँस ली, फिर भीतर सुनयना के चेहरे की ओर देखा।
भीतर ही भीतर उनके मन ने कहा – “प्रिय, आप मेरी नहीं। आप अपनी हैं।”
एक पल को वासुदेव को लगा जैसे कुछ छूट गया, बहुत बरस का कुछ, और साथ ही एक हलकापन भी उतरा। दोनों एक साथ आए।
वासुदेव ने अपने भीतर सुनयना से कहा – “प्रिय, यह आपसे दूर जाना नहीं है। यह आपको आपका अपना होना देना है। मैंने आपको बहुत बरस तक अपना समझा, शायद यह अधूरा था। अब आप अपनी हैं। मेरा साथ रहेगा, पर आप ख़ुद अपनी।”
भीतर एक हलकी मुस्कुराहट तैर गई, वासुदेव की या सुनयना की, उन्हें ख़ुद पता नहीं चला। वासुदेव की कलाई की कड़ी अभी वहीं थी, पर अब उसका वज़न कुछ कम था।
चौथी थी संतान, सत्यजित, पद्मा और हरि।
तीनों भीतर एक साथ आए, बचपन से लेकर बड़े होने तक और फिर अभी तक। सत्यजित जब घोड़े से पहली बार गिरा था, पद्मा जब छह बरस की उम्र में बीमार पड़ी थी, हरि की पहली हँसी, सब आँखों के सामने घूम गया।
वासुदेव की आँखों के पीछे एक भारीपन उमड़ आया।
उन्होंने इतना ही कहा – “बच्चे…” और इस बार पूरा वाक्य पूरा न कर पाए। बच्चों को छोड़ना सबसे मुश्किल था, क्योंकि एक पिता अपने बच्चों से ही सबसे ज़्यादा बँधा होता है, और यह बात वासुदेव अभी समझ रहे थे।
कुछ देर ठहरने के बाद उन्होंने ख़ुद को सँभाला, और भीतर ही भीतर बच्चों से कहा – “बच्चे, तुम मेरे नहीं, तुम अपने हो। मैंने तुम्हें जन्म दिया, पर तुम्हें अपना होने को मजबूर नहीं कर सकता। तुम्हारी अपनी कथा है, तुम्हारा अपना रास्ता। मुझे माफ़ करो कि मैंने इतने बरस तुम्हें अपना समझा।”
उसी पल वासुदेव को लगा कि बहुत दूर, सत्यजित के कमरे में, बेटा नींद में हलका-सा मुस्कुरा दिया।
पाँचवीं थी देह, वासुदेव का अपना देह, उनके हाथ, उनके पैर, उनकी आँखें। उन्होंने कहा – “देह, तू मेरा नहीं।”
छठा था मन। उन्होंने कहा – “मन, तू मेरा नहीं।”
सातवीं थी पहचान। उन्होंने कहा – “पहचान, तू मेरी नहीं।”
आठवीं थी सोच। उन्होंने कहा – “सोच, तू मेरी नहीं।”
और भी न जाने कितनी चीज़ें भीतर से उठती गईं।
एक-एक करके वासुदेव ने सब छोड़ दीं। बाहर सब कुछ वैसा ही था, पर भीतर सब हलका होता जा रहा था।
शून्य

आख़िर में वासुदेव एक ऐसे स्थान पर पहुँचे, जहाँ कुछ नहीं था।
मतलब, उनकी हर पहचान चली गई थी, और उनका हर लगाव गिर चुका था।
बस एक खालीपन रह गया।
वासुदेव ने उस खालीपन को देखा, और पहले उन्हें डर लगा कि यह क्या है, क्या सचमुच कुछ नहीं?
पर एक पल बाद उन्हें समझ आया कि कुछ नहीं था, फिर भी कोई था जो यह देख रहा था कि कुछ नहीं है।
वो देखने वाला ही वासुदेव था, पर अब वो किसी का नहीं था।
वो वासुदेव बस था, बिना पहचान, बिना पकड़, बिना किसी सीमा के।
वासुदेव के भीतर एक हलकी हँसी उठी – “यह वो है।”
लौटना
वासुदेव ने आँखें खोलीं। बाहर रात थी, दिया जल रहा था, और पत्नी पास ही सो रही थीं।
वासुदेव ने अपनी पत्नी को देखा, और अब वो पहले से कुछ अलग दिखीं। पहले वो उनकी पत्नी थीं, सिर्फ़ उनकी ही, अब वो उनकी पत्नी थीं, पर अपनी भी। यह अन्तर देखने में छोटा था, पर भीतर बहुत बड़ा था।
इतना सोचकर वासुदेव सो गए।
अगले दिन उन्होंने हमेशा की तरह राज-काज किया, पर भीतर कुछ अलग था।
एक मन्त्री ने इस पर ध्यान दिया और बोला – “महाराज, आप कुछ बदले हुए लगते हैं।”
वासुदेव बोले – “मन्त्री, बदला नहीं हूँ। बस अब मैं हूँ। पहले मेरी पहचान थी।” मन्त्री यह बात समझ न सका।
परीक्षा
पहली परीक्षा कुछ ही दिन बाद आई।
उनके एक पुराने मित्र की, बचपन के साथी की, मृत्यु हो गई। समाचार आया, और वासुदेव ने सुना।
पहले उनके भीतर एक झटका लगा, फिर एक हलकी-सी समझ उतर आई।
उन्होंने भीतर ही कहा – “मित्र, तू मेरा नहीं था, तू अपना था। अब तू अपनी यात्रा पर है।”
उन्होंने पूरा शोक किया, श्राद्ध किया, दान दिया। पर भीतर वो शोक एक अलग किस्म का था, उसमें दुख था, पर बँधन का दुख नहीं था। मन्त्रियों ने इस ओर ध्यान दिया, पर कुछ कहा नहीं।
दूसरी परीक्षा कुछ महीने बाद आई। राज्य के एक हिस्से में बाढ़ आ गई, बहुत प्रजा डूबी, और बहुत खेत नष्ट हो गए। समाचार आया, और वासुदेव ने सुना।
पहले उनके भीतर एक दुख उठा, फिर एक हलकी-सी समझ आई।
उन्होंने तुरन्त अन्न-भण्डार खुलवा दिए, सेना भेजी, और राहत का प्रबन्ध किया। पर ख़ुद वो टूटे नहीं।
एक मन्त्री ने पूछा – “महाराज, आप दुखी नहीं हैं?”

वासुदेव बोले – “दुखी हूँ, पर टूटा नहीं।”
“दोनों में अन्तर क्या है?”
“दुख होना मनुष्य की चीज़ है, और टूटना अहंकार की।” मन्त्री यह बात समझ न सका।
तीसरी परीक्षा भी आई। एक मन्त्री ने वासुदेव के विरुद्ध षड्यन्त्र रचा, उन्हें सिंहासन से उतारने की कोशिश की। पर षड्यन्त्र पकड़ा गया, और मन्त्री को सामने लाया गया।
वासुदेव ने उसे देर तक देखा। मन्त्री काँप रहा था।
वासुदेव बोले – “मन्त्री, तूने मुझे क्यों मारना चाहा?”
मन्त्री बोला – “महाराज… लोभ के कारण।”
वासुदेव बोले – “लोभ। हाँ, लोभ बहुत बड़ी चीज़ है।”
मन्त्री बोला – “महाराज, मुझे दण्ड दीजिए।”
वासुदेव बोले – “दण्ड? तेरा दण्ड तो पहले से तेरे भीतर है। तू डर रहा है, यही तेरा दण्ड है।”
“पर महाराज…”
वासुदेव बोले – “पर बाहर का दण्ड भी ज़रूरी है। तू देश छोड़कर चला जा, दस बरस के लिए। फिर लौटना, तब हम देखेंगे।”
मन्त्री सिर झुकाकर चला गया।
लोग बोले – “महाराज, यह तो बहुत हलका दण्ड हुआ।”
वासुदेव बोले – “असली दण्ड तो उसके भीतर है। मैं उसे और क्या दूँ?” यह सुनकर लोग चुप रह गए।
जीवन
इसके बाद बहुत बरस बीते।
वासुदेव ने राज्य चलाया, पर अब एक अलग ढंग से।
पहले उन्हें राज्य चलाने में थकान होती थी, अब नहीं होती थी। पहले वो हर निर्णय अपने अहम् से लेते थे, अब अपनी चेतना से लेते थे।
पहले वो हर सफलता पर ख़ुश होते थे और हर असफलता पर दुखी, अब उनके लिए दोनों समान थे। पहले उन्हें प्रशंसा अच्छी लगती थी और निन्दा बुरी, अब दोनों उनके लिए हवा जैसी थीं।
पहले वो कई बार सोचते थे – “लोग क्या कहेंगे?”, अब वो सोचते थे – “इसमें सच क्या है?”
पहले उनके पास एक गोपन था, बहुत सी बातें थीं जो वो किसी को नहीं बताते थे, अब कोई गोपन नहीं था, क्योंकि छुपाने का अहंकार ही चला गया था।
पहले वो थोड़े क्रोधी थे, यह बहुत साल पुरानी आदत थी, अब क्रोध आता तो था, पर रुकता नहीं था।
एक बार एक दूत ने एक काम बिगाड़ दिया। पुराने वासुदेव होते तो उसे डाँट देते, पर नए वासुदेव बोले – “दूत, अगली बार ध्यान रखना।” दूत हैरानी से उन्हें देखता रह गया।
मन्त्रियों ने आपस में बात की – “महाराज को यह क्या हो गया है?”
कोई कहता – “शायद आयु का असर है।” तो कोई कहता – “नहीं, आयु से नहीं, यह कुछ और है।” पर असली बात किसी को समझ न आई।
लोगों ने ध्यान दिया कि वो वासुदेव अब अलग ही थे।
प्रजा ने उन्हें “मुक्त-जीवित” राजा कहना शुरू कर दिया।
एक छोटा प्रसंग
एक दिन एक बात हुई।
वासुदेव के एक बेटे को बहुत तेज़ ज्वर चढ़ गया, और कई दिनों तक उतरा नहीं। वैद्य आए, दवाएँ हुईं, मन्त्र हुए, पर ज्वर नहीं उतरा। पत्नी रोती रहीं।

वासुदेव अपने बेटे के पास उसका हाथ पकड़े देर तक बैठे रहे।
बेटे ने आँखें खोलीं और बोला – “पिता, क्या मैं मर जाऊँगा?”
वासुदेव कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “बेटा, हम सब को एक दिन मरना है, तू पहले, मैं बाद में, तेरी माँ बाद में, यह तय है। पर मरना डराने वाली बात नहीं है। मरना तो बस एक बदलाव है, एक रूप से दूसरे रूप में जाना। तू डर मत।”
बेटा बोला – “पिता, आप मेरे साथ रहेंगे?”
वासुदेव बोले – “रहूँगा।”
वासुदेव देर तक उसके पास बैठे रहे।
रात को बेटे का ज्वर थोड़ा कम हुआ, और सुबह तक काफ़ी कम हो गया।
तीसरे दिन वो उठ खड़ा हुआ।
पत्नी ने वासुदेव से पूछा – “महाराज, आपने कोई मन्त्र पढ़ा था?”
वासुदेव बोले – “नहीं प्रिय, बस उसका हाथ पकड़ा था।”
“फिर भी वो ठीक हो गया?”
वासुदेव बोले – “प्रिय, मेरे भीतर डर का न होना उसे सँभाल गया। अगर मेरे भीतर डर होता, तो वो उसे और तोड़ देता।”
पत्नी ने यह बात भीतर सँजो ली। यह बात उन्हें छोटी लगी थी, पर उन्होंने इसे सँभालकर रखा। बहुत बरस बाद, जब उन्होंने ख़ुद यह राह शुरू की, तब उन्हें यह बात फिर याद आई।
पत्नी
एक दिन वासुदेव की पत्नी ने भी यह बात भाँप ली।
रात को उन्होंने वासुदेव से पूछा – “महाराज, आप कुछ अलग हैं। ऐसा क्यों है?”
वासुदेव कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “प्रिय, मैंने एक दिन सब कुछ मन में छोड़ दिया, और फिर देखा कि क्या बचता है। जो बचा, वो मैं हूँ।”
पत्नी बोलीं – “क्या मैं भी ऐसा कर सकती हूँ?”
वासुदेव बोले – “हाँ।”
“पर कैसे?”
वासुदेव ने उन्हें बताया कि एक-एक करके हर पहचान को देखो, और हर एक से कहो, तू मेरी नहीं। पत्नी ने उसी रात कोशिश शुरू कर दी।
कई दिन तक वो यही करती रहीं।
एक रात वो अपनी एक चीज़ पर आकर रुक गईं और बोलीं – “महाराज, मुझे अपनी एक चीज़ छोड़ने में डर लग रहा है।”
वासुदेव बोले – “कौन सी चीज़?”
“आप।”
वासुदेव बोले – “प्रिय, मुझे मन में छोड़िए। बाहर मैं वैसा ही रहूँगा।”
“पर मुझे डर है।”
“डर किस बात का?”
“अगर मैंने आपको मन में छोड़ दिया, तो शायद हमारा रिश्ता बदल जाए।”
वासुदेव कुछ देर सोचकर बोले – “प्रिय, रिश्ता बदलेगा, पर अच्छे की ओर। अभी मैं आपका हूँ और आप मेरी, यह एक बँधन है। अगर आप मुझे मन में छोड़ दें, तो हम दोनों एक-दूसरे के तो होंगे, पर बिना बँधन के। यही प्रेम का असली रूप होगा।”
पत्नी ने यह बात मानी, और फिर कई दिन तक कोशिश करती रहीं।
एक दिन उन्हें भी वही मिल गया।
अब दोनों एक स्तर पर अलग रहते थे, एक ही कक्ष में रहते हुए भी एक-दूसरे को बाँधते नहीं थे। और इसी से उनका प्रेम और गहरा होता गया।
आगे
इस तरह बहुत बरस और बीत गए।
वासुदेव बूढ़े हुए, और उनकी पत्नी भी। बच्चे बड़े हुए, और उन्होंने अपने-अपने राज्य चलाए।
एक दिन वासुदेव ने अपने सबसे बड़े बेटे को सिंहासन पर बिठाया और बोले – “बेटे, राज्य अब तुम्हारा है।”
बेटा बोला – “पर पिता…”
वासुदेव बोले – “बेटे, मैं रहूँगा, पर अब सिंहासन पर तुम बैठोगे।”
बेटे ने सिर झुका दिया।
इसके बाद वासुदेव और उनकी पत्नी राज-प्रासाद के एक कोने में, एक छोटे से कक्ष में रहने लगे।
वो दोनों दिन भर साथ बैठते, बहुत बात नहीं करते, बस साथ रहते।
कमरे में बहुत कम सामान था, एक चटाई, एक छोटा दीपक, और पानी का एक मटका, बस इतना ही।
खिड़की से वही नदी दिखती थी, जिसे वासुदेव बहुत पहले अपने छज्जे से देखते थे।
कभी-कभी वासुदेव खिड़की के पास बैठते और पत्नी उनके पीछे, और वो देर तक यूँ ही बैठे रहते।
बेटा कभी-कभी आता और कहता – “पिता, माँ, राज्य में एक प्रश्न है।”
वासुदेव कहते – “बोल बेटा।”
बेटा अपना प्रश्न बताता। वासुदेव सुनते, फिर एक छोटा-सा सुझाव देकर कहते – “पर बेटा, यह तेरा निर्णय है। मैंने अपना काम कर लिया।” और बेटा सिर हिलाकर चला जाता।
पत्नी कभी-कभी कहतीं – “महाराज, मुझे डर लगता है।”
वासुदेव पूछते – “किस बात का?”
“मरने का।”
वासुदेव हलकी हँसी के साथ कहते – “प्रिय, मरने में डर की कोई बात नहीं, वो तो बस एक बदलाव है।”
पत्नी कहतीं – “पर अगर हम अलग हो गए?”
वासुदेव कुछ देर सोचकर कहते – “प्रिय, हम तो पहले से ही हर पल अलग हैं। बस इस समय हम साथ बैठे हैं, और यह साथ बैठना भी एक रूप है। मरने के बाद वो रूप बदलेगा, पर हम जो असली हैं, वो नहीं बदलेगा।” पत्नी यह सुनकर सन्तुष्ट हो जातीं।
एक दिन उन्होंने कहा – “पर एक बात है। मैं चाहती हूँ कि हम दोनों साथ ही जाएँ।”
वासुदेव बोले – “प्रिय, हम कोशिश करेंगे।” यह सुनकर पत्नी हँस पड़ीं।
यूँ ही बहुत महीने बीत गए।
कभी-कभी पत्नी पूछतीं – “महाराज, क्या हम मुक्त हैं?”
वासुदेव कहते – “हाँ।”
“फिर हम अब भी यहाँ क्यों हैं?”
“क्योंकि हम मुक्त हैं, और मुक्त लोग कहीं भी रह सकते हैं।” यह सुनकर पत्नी फिर हँस पड़तीं।
एक रात बहुत तेज़ बारिश आई, आकाश में बिजली कौंधने लगी, और कक्ष की खिड़की से पानी अन्दर आने लगा। वासुदेव और पत्नी दोनों जागे हुए थे।
पत्नी बोलीं – “देखिए, कितनी बारिश हो रही है।”
वासुदेव बोले – “हाँ।”
“पुराने दिनों में मैं बारिश से डरती थी।”
“और अब?”
“अब अच्छी लगती है।”
वासुदेव बोले – “प्रिय, यही तो अन्तर है। पहले हम छाते से अपने को बचाते थे, अब हम बारिश को बारिश रहने देते हैं।” पत्नी मुस्कुरा दीं।
बारिश देर तक होती रही। दोनों खिड़की के पास बैठे रहे, कोई बात नहीं की, बस उसे देखते रहे।

एक रात दोनों एक साथ सोए। सुबह सेवक उन्हें जगाने आया। दोनों एक-दूसरे के पास सो रहे थे, आँखें बन्द, चेहरे शान्त, पर उनकी साँस नहीं चल रही थी।
सेवक ने सिर झुकाया और जाकर बेटे को यह समाचार दिया। बेटे की आँखों में आँसू आ गए, पर होंठों पर एक हलकी हँसी भी थी।
वो बोला – “पिता और माँ हमेशा साथ रहना चाहते थे, और साथ ही गए।”
राज्य में लोग रोए। पर कुछ बूढ़े लोग, जो वासुदेव को बहुत बरस से जानते थे, हलके से मुस्कुरा दिए।
वो कहते – “राजा अब भी हैं, बस उनका देह नहीं रहा।”
राम ने यह सुनकर पूछा – “गुरुदेव, वासुदेव की पत्नी का यह उत्तरार्ध बहुत सुन्दर है, दोनों एक साथ गए। पर मुझे एक बात समझनी है। क्या यह सम्भव है कि एक मुक्त हो और दूसरा नहीं, और फिर भी दोनों साथ रह पाएँ?”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह सम्भव है, और बहुत बार होता है। पर तब मुक्त को धीरज चाहिए, और बँधे को विश्वास। मुक्त बँधे को अपनी ओर खींचे नहीं, बस अपने जीवन में दिखाए। बँधा देखे, और फिर एक दिन वो भी पूछे, यह क्या है? तब मुक्त उसे बताए।”
राम ने फिर पूछा – “और गुरुदेव, शून्य क्या वही है जो रहता है, जब सब चला जाए?”
वसिष्ठ बोले – “राम, शून्य कोई कमी नहीं है, शून्य तो पूर्णता है। पर ऐसी पूर्णता जिसमें कोई आकार नहीं। जब यह समझ आता है, तो शून्य डराता नहीं, बल्कि खुल जाता है।”
राम ने नदी के पानी की ओर देखा और पूछा – “गुरुदेव, क्या मैं भी कभी ऐसा कर सकता हूँ?”
वसिष्ठ बोले – “राम, ज़रूर कर सकोगे, पर अभी नहीं। तुम्हें पहले बहुत कुछ अनुभव करना है। राज्य चलाना है, प्रिय जन खोने हैं, पुत्र पालने हैं। फिर एक दिन, बहुत बरस बाद, तुम भी अपने भीतर देखोगे, और एक-एक करके सब छोड़ोगे। और जो बचेगा, वो तुम हो।”
राम ने फिर पूछा – “गुरुदेव, एक और बात। वासुदेव और उनकी पत्नी का एक साथ जाना, क्या यह बस संयोग था?”
वसिष्ठ कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “राम, इसे संयोग कहना ग़लत होगा, और इसे कोई नियम कहना भी ग़लत। यह उन दोनों की चाह थी, और चाह जब असली होती है, तो उसे ब्रह्माण्ड कभी-कभी सुन लेता है। वासुदेव और उनकी पत्नी इतने बरस एक साथ, इतनी गहराई में रहे थे, कि उनके देह को छोड़ने का ढंग भी एक हो गया था। पर यह दुर्लभ है, यह हर किसी के साथ नहीं होता।”
राम ने नदी की ओर देखा और देर तक चुप रहे।
फिर हलकी आवाज़ में बोले – “गुरुदेव, मैं भी एक दिन ऐसा हो पाऊँ।”
वसिष्ठ बोले – “राम, होगा। बस अभी जल्दी मत करो, तुम्हारा रास्ता अभी और भी है।”
राम ने हलकी आवाज़ में एक आख़िरी प्रश्न पूछा – “गुरुदेव, वासुदेव ने पहली रात आँखें बन्द कीं, पर अगर उस पहली रात उन्हें वो शून्य नहीं मिलता, तो?”
वसिष्ठ बोले – “राम, तो वो दूसरी रात कोशिश करते, फिर तीसरी, और न जाने कितनी रातें। मिलना समय से नहीं, तैयारी से होता है। वासुदेव बहुत बरस से तैयार थे, बस उन्हें ख़ुद इसका पता नहीं था। जब ऋषि ने रास्ता बताया, तब उनकी तैयारी और रास्ता आपस में मिल गए। पर अगर तैयारी न होती, तो रास्ता भी न मिलता।”
यह सुनकर राम बहुत देर तक चुप रहे।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के विभिन्न संदर्भों पर आधारित है। शून्य की धारणा शास्त्र में बौद्ध शून्यता से भिन्न है। यहाँ शून्य आकार-रहित पूर्णता है। वासुदेव का अपनी पत्नी के साथ इस अभ्यास को बाँटना, और दोनों का साथ मुक्त होना, यह कथा का सुन्दर पक्ष है।
दर्शन-दृष्टि
वासुदेव एक अच्छे राजा हैं। पत्नी सुनयना, तीन बच्चे, बड़ा राज्य, प्रजा का प्रेम। पर एक शाम वो छज्जे पर बैठे हैं, और एक प्रश्न उठता है। अगर मैं यह राजा-पन छोड़ दूँ, क्या बचेगा। फिर पति-पन। फिर पिता-पन। फिर देह। फिर मन। एक-एक करके वो हर पहचान छोड़ते जाते हैं, और जो आख़िर में बचता है उसके लिए उनके पास कोई नाम नहीं रहता। कथा यह कहती है कि “मैं कौन हूँ” का उत्तर किसी नई पहचान में नहीं, सब पहचानों के पीछे की उस ख़ाली जगह में है जो किसी भी पहचान की कमी से छोटी नहीं होती।
रमण महर्षि (1879-1950) ने अपनी Who Am I? (Nan Yar?, 1923) में ठीक यही प्रक्रिया रखी। मैं देह नहीं, मन नहीं, इन्द्रिय नहीं, बुद्धि नहीं, अहंकार नहीं। एक-एक “नहीं” के बाद जो बचता है वो “मैं हूँ” है, बिना किसी विशेषण के। वासुदेव का अनुभव इसी का राजसी रूप है। हर पहचान छूटने के बाद उन्हें घबराहट नहीं, राहत मिलती है, क्योंकि उन्हें यह दिखता है कि जो छूट रहा है वो वैसे भी कभी असली “मैं” नहीं था, बस उसके ऊपर एक ओढ़ा हुआ कपड़ा था।