कुंददंत के सौ प्रश्न

कथा · 35

कुंददंत के सौ प्रश्न

ऋषि कुन्ददन्त बहुत बरस से अपने सौ प्रश्न लिए घूम रहे थे। वसिष्ठ से उन्होंने एक-एक करके पूछे, और हर उत्तर छोटा और सीधा निकला। जब सौवें पर पहुँचे, तो उन्होंने ख़ुद ही कह दिया कि अब कोई प्रश्न नहीं बचा।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या प्रश्न ही उत्तर हो सकते हैं?”

Painterly classical Indian color illustration: the sage Vasishtha seated on a low platform outside a riverside hut, gently teaching the young princes Rama and Lakshmana who kneel before him; warm dawn light, oil lamp glowing, river behind; dignified, no text, no watermark

वसिष्ठ बोले – “राम, एक ऋषि कुन्ददन्त ने वसिष्ठ से सौ प्रश्न पूछे थे, और हर प्रश्न का जवाब बाद की भारतीय परम्परा में काम आया। सौ प्रश्न तो बहुत हैं, पर मैं तुम्हें उस पुरानी बातचीत में से कुछ बताऊँगा।”

मिलन

कुन्ददन्त एक बूढ़े ऋषि थे, जिनके पीछे बहुत बरस का तप था।

उनकी कुटिया एक नदी के किनारे थी, बहुत साधारण सी।


उन्होंने अपने जीवन में बहुत प्रश्न पूछे थे, पर उनमें से बहुतों के उत्तर अब तक नहीं मिले थे।


Painterly classical Indian color illustration: an aged white-bearded sage Kundadanta with a small bundle, kamandalu and staff arriving at the threshold of Vasishtha's humble riverside hut at golden morning; Vasishtha seated cross-legged on a mat welcoming him; dignified, no text, no watermark

एक दिन उन्होंने मेरे बारे में सुना, कि एक ऐसा ऋषि है जो प्रश्नों के जवाब देता है।


तो कुन्ददन्त अपनी कुटिया छोड़कर मेरे पास आए।


“वसिष्ठ।”

“कुन्ददन्त।”

“मैं आपसे कुछ प्रश्न पूछने आया हूँ। पर एक बात पहले कह दूँ – मेरे पास बहुत प्रश्न हैं, शायद सौ।”

मैंने कहा – “बैठिए। सौ हों या हज़ार, पूछिए।”

कुन्ददन्त बैठ गए।


कुन्ददन्त के देह को मैंने ध्यान से देखा। वह बहुत बूढ़ा था, उम्र अस्सी या शायद उससे भी ज़्यादा। उनके बायें हाथ में हलकी सी कम्पन थी, जो उनकी थकान का चिन्ह थी, या किसी पुरानी बीमारी का, मुझे ठीक से पता नहीं था।


उनके बाल पीछे की ओर एक गाँठ में बँधे थे, और उनकी दाढ़ी मध्यम लम्बी और सफ़ेद थी। माथे पर भस्म का तिलक लगा था।


उन्होंने अपनी पोटली एक तरफ़ रख दी। मुझे लगा कि उसमें कुछ खाने का सामान था, और शायद एक कमंडल भी।


उनकी आँखें मुझ पर टिकी थीं, पर वे आँखें थकी हुई नहीं थीं। बहुत बरस के तप ने उन्हें कमज़ोर नहीं किया था, बल्कि उनकी आँखों को एक अलग ही तरह की चमक दे दी थी।


कुछ देर तक दोनों चुप रहे, मैं भी कुछ नहीं बोला।


फिर पहला प्रश्न आया।


पहले प्रश्न

“वसिष्ठ, चेतना क्या है?”

“कुन्ददन्त, चेतना वो है जो हर अनुभव का साक्षी है।”

“और वो ख़ुद को कैसे देखती है?”

“वो ख़ुद को नहीं देखती। वो ख़ुद है।”


कुन्ददन्त ने पूछा – “दूसरा प्रश्न। मन और चेतना में क्या फ़र्क़?”

“मन चेतना का एक रूप है। जब चेतना अपनी इच्छाओं में बहती है, उसे मन कहते हैं।”

“तो मन को कैसे शान्त करें?”

“मन को शान्त नहीं करते। उसके पीछे जाते हैं।”


“तीसरा। संसार सच है या झूठ?”

“दोनों।”

“कैसे?”

“संसार चेतना का एक रूप है। चेतना सच है, तो संसार भी सच। पर संसार स्थिर नहीं, इसलिए वो अंतिम सच नहीं।”


“चौथा। मुक्ति क्या है?”

“वो अवस्था जिसमें तुम्हें कुछ चाहिए नहीं।”

“पर अगर मुझे मुक्ति चाहिए, तो?”

“तो वो भी इच्छा है। पहले उसे भी जाने दो।”


“पाँचवाँ। मृत्यु क्या है?”

“देह का बदलना। चेतना का नहीं।”

“तो मरने से क्यों डरें?”

“देह डरता है, क्योंकि उसकी कथा यहीं समाप्त है। चेतना नहीं डरती।”


ध्यान

कुन्ददन्त बोले – “वसिष्ठ, आपके उत्तर छोटे हैं।”

“हाँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि सच को बड़े उत्तर की ज़रूरत नहीं। सच छोटा है। बड़ा वो होता है जिसे साबित करना हो।”

कुन्ददन्त ने पूछा – “छठा। ध्यान कैसे करें?”

Painterly classical Indian color illustration: Vasishtha and elderly Kundadanta seated facing each other in meditation on a small mat inside the hut, eyes softly closed, breath calm; soft inner glow at the heart, a still oil lamp between them; serene, dignified, no text, no watermark

“बैठो। आँखें बन्द करो। साँस को देखो। विचार को देखो। कुछ करो मत। बस देखो।”

“पर मेरा मन भागता है।”

“भागे। उसे रोको मत। बस देखते रहो।”


“सातवाँ। क्या ध्यान में मुझे कुछ दिखेगा?”

“शायद। शायद नहीं।”

“अगर दिखे?”

“तो उसे देखो। पर उससे चिपको मत।”

“अगर न दिखे?”

“तो भी ठीक। ध्यान का मक़सद दिखना नहीं। ध्यान का मक़सद देखना है।”


“वो दोनों क्या अलग हैं?”

“हाँ। दिखना बाहर है। देखना भीतर।”


गुरु

“आठवाँ। क्या एक गुरु ज़रूरी है?”

“शायद। शायद नहीं। हर एक के लिए अलग।”

“मेरा गुरु कौन है?”

“जो भी तुम्हें सच की दिशा दिखाए। वो आदमी हो सकता है। एक पुस्तक हो सकती है। एक नदी हो सकती है। एक पल का चुप हो सकता है।”


“नवाँ। एक अच्छे गुरु की पहचान?”

“जो अपनी पहचान बेचता नहीं। जो अपने शिष्य को अपने से बड़ा होने देता है। जो अपने शिष्य के प्रश्न से डरता नहीं।”


“दसवाँ। एक ख़राब गुरु की पहचान?”

“जो अपनी पहचान बेचता है। जो अपने शिष्य को अपने से छोटा रखता है। जो अपने शिष्य के प्रश्न से डरता है।”


विश्राम

कुन्ददन्त ने अपनी पोटली से एक फल निकाला।

“वसिष्ठ, आप खाएँगे?”

“नहीं। आप खाइए।”


कुन्ददन्त ने फल को धीरे से तोड़ा, आधा रखा और आधा खाया।


उनके हाथ थोड़े काँप रहे थे, और फल पकड़ना उनके लिए मुश्किल था।


मैंने यह सब देखा, पर कुछ नहीं कहा।


कुन्ददन्त ने फल खाते-खाते कहा – “वसिष्ठ, यह फल मेरे आश्रम के पास एक पेड़ का है। मैंने इसे बीस बरस पहले लगाया था, और अब हर बरस फल देता है।”

“बहुत अच्छा।”


“पर पेड़ अब मुझ से लम्बा हो गया है, और फल तोड़ने में मुझे अपना सबसे बड़ा शिष्य चाहिए।”

“बूढ़ापन।”

“हाँ।”


कुन्ददन्त बोले – “वसिष्ठ, अगला प्रश्न।”


जन्म

“ग्यारहवाँ। क्या मैं अपने पिछले जन्म याद कर सकता हूँ?”

“कर सकते हो। पर ज़रूरी नहीं।”

“क्यों ज़रूरी नहीं?”

“क्योंकि पिछले जन्म भी इसी कथा में हैं। उन्हें याद करने से कुछ नहीं बदलता। बस इस जन्म में स्थिर होना है।”

“बारहवाँ। तो पिछले जन्म याद करने का क्या लाभ?”

“कुछ नहीं। पर कोई हानि भी नहीं।”


“तेरहवाँ। क्या मैं अपने पिछले जन्म में कोई और था?”

“हाँ।”

“क्या मैं उसी आत्मा का?”

“हाँ।”

“फिर पिछले देह की कथा मेरी कथा है?”

“हाँ और नहीं।”

“क्यों दोनों?”

“क्योंकि चेतना के लिए दोनों एक हैं। पर देह के लिए अलग।”


इच्छा

“चौदहवाँ। क्या मैं अपनी इच्छाओं को मार सकता हूँ?”

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि इच्छाएँ चेतना का स्वभाव हैं। उन्हें मारने से चेतना का एक हिस्सा मारा जाता है।”

“फिर?”

“उन्हें बस देखो। वो ख़ुद कम होंगी।”


“पन्द्रहवाँ। क्या कुछ इच्छाएँ अच्छी होती हैं?”

“नहीं। पर कुछ बँधती कम हैं।”

“कौन सी?”

“वो जो दूसरों के लिए हो। जैसे, मैं प्रजा को सुख दूँ। यह इच्छा बँधती है, पर कम।”


“सोलहवाँ। क्या मेरे पास कोई इच्छा होनी ही नहीं चाहिए?”

“होनी चाहिए, पर देखी हुई। बिना देखी इच्छा बँधती है।”


जीवन

“सत्रहवाँ। मैं अपना जीवन कैसे जीऊँ?”

“साधारण। पर ध्यान से।”

“मतलब?”

“मतलब, साधारण काम करो। पर हर काम में अपने भीतर भी देखो।”


“अट्ठारहवाँ। क्या मुझे विवाह करना चाहिए?”

“अगर मन हो, तो हाँ।”

“विवाह से बँधन नहीं?”

“बँधन हो सकता है। पर अगर तुम और तुम्हारा साथी दोनों अपने भीतर देखते रहो, तो विवाह तपस्या बन सकती है।”

“उन्नीसवाँ। क्या मुझे बच्चे होने चाहिए?”

“अगर मन हो, तो हाँ।”

“बच्चे से बँधन नहीं?”

“बँधन है। पर बच्चे एक अलग पाठ हैं। उनसे तुम वो सीखते हो जो किसी और से नहीं सीख सकते।”


कर्म

“बीसवाँ। कर्म क्या है?”

“हर वो कुछ जो तुम करते हो।”

“और उसका फल?”

“हर कर्म का एक फल होता है। यह नियम है।”


“इक्कीसवाँ। क्या मैं कर्म से बच सकता हूँ?”

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि देह के साथ कर्म आता है। देह छोड़ने पर भी, चेतना अपनी कर्म-धारा को ले जाती है।”


“बाईसवाँ। फिर मुक्ति कैसे?”

“कर्म से बचकर नहीं। कर्म को बिना अहम् के करके।”

“मतलब?”

“मतलब, यह सोचना छोड़ो कि तुम कर रहे हो। बस कर्म होने दो। तुम बस साक्षी रहो।”


“तेईसवाँ। क्या यह कठिन है?”

“बहुत।”

“और सम्भव?”

“हाँ। अभ्यास से।”


संसार

“चौबीसवाँ। संसार क्यों है?”

“क्योंकि चेतना अपनी कथा रचती है।”

“क्यों रचती है?”

“यह उसका स्वभाव है।”

“क्या वो कथा छोड़ सकती है?”

“हाँ।”

“फिर हम क्यों फँसे हैं?”

“क्योंकि हम चेतना नहीं, अपनी कथा को मानते हैं।”


“पच्चीसवाँ। क्या हम कभी कथा से अलग हो सकते हैं?”

“हाँ। ज्ञान से।”

“ज्ञान कैसे?”

“अपने भीतर देखकर।”

“पर देखना भी कथा का हिस्सा है।”

“हाँ। पर देखने वाला नहीं।”

नदी

बीच-बीच में कुन्ददन्त अपनी आँखें नदी की ओर मोड़ लेते।


मेरी कुटिया के सामने वो छोटी सी नदी थी जिसे मैं रोज़ देखता था। पर कुन्ददन्त के देखने का तरीक़ा अलग था।


वो नदी को एक पल देखते, फिर अपनी आँख वापस मेरी ओर मोड़ लेते। पर उस देखने में कुछ था।


मैंने एक बार पूछा – “कुन्ददन्त, नदी क्या है?”


कुन्ददन्त बोले – “वसिष्ठ, नदी मेरे एक प्रश्न का उत्तर देती है।”

“कौन से प्रश्न?”


“जब मैं थकता हूँ, तो नदी देखता हूँ। नदी मुझ से कहती है, चलते रहो, बहते रहो, रुको मत।”


मैंने कहा – “तो आप अपने प्रश्न नदी से भी पूछते हैं।”

“हाँ। पर नदी छोटे उत्तर देती है, शब्दों में नहीं।”


मैंने कहा – “फिर अगला प्रश्न।”

मन

“छब्बीसवाँ। मन को कैसे शान्त करें?”

“मन को शान्त करने की कोशिश छोड़ो। बस उसे देखो।”

“पर वो भागता है।”

“भागे। देखते रहो, बहुत बरस तक।”


“सत्ताईसवाँ। क्या मन ही चेतना है?”

“नहीं। मन एक रूप है।”

“फिर?”

“चेतना मन के पीछे है।”


“अट्ठाईसवाँ। मन के बिना क्या होगा?”

“मन के बिना भी तुम होगे। पर मन नहीं रहेगा। यह सीधी बात है।”

“पर हम जब सोचते हैं, तो मन से ही सोचते हैं।”

“हाँ। पर सोचना ही सब नहीं। बिना सोचे भी जाना जा सकता है।”


“उन्तीसवाँ। बिना सोचे जानना क्या है?”

“प्रत्यक्ष ज्ञान।”

“उदाहरण?”

“जब तुम एक फल खाते हो, तो उसका स्वाद बिना सोचे जानते हो। यह प्रत्यक्ष ज्ञान है।”

“और दर्शन का प्रत्यक्ष ज्ञान?”

“उसी तरह। बिना सोचे, चेतना अपने आप को जानती है।”


“तीसवाँ। यह कब होता है?”

“जब मन शान्त हो। जब विचार रुकें। उस क्षण में चेतना अपने आप को देखती है।”


स्वयं

“इकत्तीसवाँ। मेरा स्वयं क्या है?”

“वो जो हर अनुभव के पीछे है।”

“उसे मैं कैसे जानूँ?”

“बस होकर। न सोचकर, न खोजकर। बस होकर।”


“बत्तीसवाँ। यह कठिन है।”

“हाँ। पर बहुत सरल भी।”

“दोनों कैसे?”

“बहुत सरल, क्योंकि कुछ करना नहीं। बहुत कठिन, क्योंकि मन करना चाहता है।”

“तैंतीसवाँ। मन को कैसे रोकें?”

“मत रोको। मन रुक नहीं सकता। बस उसे देखो। वो ख़ुद कम होगा।”


लम्बी दोपहर

ये प्रश्न बहुत बरस से कुन्ददन्त के भीतर थे, और अब वो एक-एक करके बाहर आ रहे थे।


दोपहर हो चुकी थी और बाहर सूरज तेज़ था।


मेरी कुटिया में हम दोनों एक छोटी सी चटाई पर बैठे थे, और बीच में पानी का एक मटका रखा था।


कुन्ददन्त ने एक बार पानी पिया। उनके हाथ अभी भी काँप रहे थे।


मैंने पूछा – “कुन्ददन्त, थक रहे हैं?”


कुन्ददन्त एक पल रुके, फिर बोले – “वसिष्ठ, सच कहूँ?”

“हाँ।”

“बहुत थक रहा हूँ।”

मैंने पूछा – “रुकेंगे?”


कुन्ददन्त ने एक पल सोचा, फिर कहा – “नहीं। मैंने इतने बरस से ये प्रश्न रखे हैं। आज पूरा करूँगा।”

“पर?”

“पर शायद थोड़ी देर का विश्राम।”


Painterly classical Indian color illustration: the frail aged sage Kundadanta lying down to rest in a corner of the hut at hot midday, his cloth bundle as a pillow, eyes closed and chest gently rising; Vasishtha watching quietly nearby beside a clay water pot; tender, dignified, no text, no watermark

कुन्ददन्त मेरी कुटिया के एक कोने में लेट गए, और उनकी पोटली सिरहाने रही।


बहुत देर तक उन्होंने अपनी आँखें बन्द रखीं।


मैंने उन्हें देखा, उनकी छाती हलकी सी ऊपर-नीचे हो रही थी। मैंने सोचा कि एक बूढ़े आदमी के देह में कितनी कथा होती है।


कुछ देर बाद कुन्ददन्त उठे और बोले – “वसिष्ठ, और प्रश्न।”

“बोलिए।”

आगे

मैंने उन्हें बहुत प्रश्नों के उत्तर दिए, बीस, तीस, पचास, सत्तर तक। हर प्रश्न का छोटा सा उत्तर।


सौवें प्रश्न पर कुन्ददन्त रुक गए।

“वसिष्ठ।”

“बोलिए।”

“मुझे अब और प्रश्न नहीं आ रहे।”

“क्यों?”

“क्योंकि मुझे लगता है कि मैंने पा लिया।”


मैंने कहा – “कुन्ददन्त, यह बात ख़ुद ही प्रश्नों का अन्त है।”


कुन्ददन्त बोले – “वसिष्ठ, एक आख़िरी प्रश्न।”

“अगर मैंने पा लिया, तो मेरे आगे क्या?”


मैंने सोचा, फिर कहा – “कुन्ददन्त, आगे जीवन है। पर अब आपका जीवन अलग होगा। पहले आप प्रश्न पूछते थे, अब आप उत्तर हैं।”

“मतलब?”

“मतलब, अब लोग आपके पास आएँगे। आपके पास उत्तर हैं, आप उन्हें दें।”


Painterly classical Indian color illustration: the old sage Kundadanta bowing his head humbly before Vasishtha who stands at the hut doorway offering reassurance; the hundredth question answered, soft afternoon light on the river; reverent, dignified, no text, no watermark

कुन्ददन्त ने सिर झुकाया और बोले – “वसिष्ठ, मैं तैयार नहीं।”

“कुन्ददन्त, कोई कभी पूरी तरह तैयार नहीं होता। बस शुरुआत करो। बाक़ी काम सीखेंगे।”

कुन्ददन्त उठे।

मैंने उन्हें प्रणाम किया।


लौटना

कुन्ददन्त अपनी कुटिया लौट गए।


बहुत बरस तक वो वहीं रहे।


लोग आते और उनके पास भी अपने प्रश्न होते। कुन्ददन्त सुनते, फिर उत्तर देते।


उनके उत्तर मेरे जैसे नहीं थे। मेरे उत्तर छोटे थे, कुन्ददन्त के उत्तर थोड़े लम्बे। पर मूल बात एक ही थी।


एक दिन एक युवक उनके पास आया।

“महाराज।”

“बोलो।”

“मुझे एक प्रश्न है।”

“पूछो।”

“मैं कौन हूँ?”


कुन्ददन्त बोले – “बेटा, यह सबसे बड़ा प्रश्न है। और इसका जवाब तुम्हें कोई दे नहीं सकता।”

“फिर?”

“फिर तुम बैठो। आँखें बन्द करो। अपने भीतर देखो, बहुत देर तक। हो सकता है महीने लगें, हो सकता है साल लगें। पर एक दिन तुम्हें मिलेगा।”


युवक ने पूछा – “महाराज, और एक बात। क्या आप मुझे और कुछ प्रश्नों के उत्तर देंगे?”


कुन्ददन्त बोले – “बेटा, मेरे पास सौ प्रश्नों के उत्तर हैं। तुम पूछो, मैं दूँगा।”

युवक बैठ गया और प्रश्न पूछना शुरू किया।


बहुत देर तक वह यही करता रहा।


बहुत बरस वो ऐसे ही रहे।

Painterly classical Indian color illustration: a very old Kundadanta now a revered teacher seated under a great tree at his riverside ashram, surrounded by a circle of attentive young disciples receiving his answers; peaceful evening light, lineage passing on; dignified, no text, no watermark

कुन्ददन्त बूढ़े होते गए, और अब उनके पास बहुत शिष्य थे।


एक दिन वो शान्ति से चले गए।


उनके सबसे बड़े शिष्य ने उनकी कुटिया सम्हाल ली। अब लोग उसके पास आते और प्रश्न पूछते।


बहुत पीढ़ियों तक प्रश्न पूछे जाते और उत्तर दिए जाते रहे।

प्रश्न और उत्तर का यह क्रम चलता रहा।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या मैं भी सौ प्रश्न पूछ सकता हूँ?”

वसिष्ठ बोले – “राम, तुम पूछ रहे हो, मैं जवाब दे रहा हूँ। एक दिन तुम भी रुक जाओगे।”


राम ने फिर पूछा – “गुरुदेव, एक छोटा सा प्रश्न। क्या आप कभी थकते हैं, इतने प्रश्न सुनकर?”


वसिष्ठ बोले – “राम, नहीं। हर प्रश्न मेरे लिए एक मौक़ा है, अपनी समझ को देखने का। हर बार जब मैं कोई उत्तर देता हूँ, मैं भी कुछ नया जानता हूँ।

“प्रश्न और उत्तर एक खेल है। दो खिलाड़ी। दोनों जीतते हैं।”


ऊपर तारे थे, बहुत स्थिर।


साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा योग वासिष्ठ के विभिन्न संदर्भों पर आधारित है। कुन्ददन्त का सौ प्रश्न-उत्तर शास्त्र की दार्शनिक रचना का एक संक्षिप्त रूप है। प्रश्न-उत्तर का यह रूप उपनिषदीय परम्परा के निकट है। कुन्ददन्त की बाद की भूमिका, उत्तर देने वाले की, यह कथा का सूक्ष्म पक्ष है।

दर्शन-दृष्टि

कुन्ददन्त बूढ़े ऋषि हैं। बहुत बरस का तप, बहुत पुस्तकें, फिर भी बहुत प्रश्न। वसिष्ठ के पास आते हैं और सौ प्रश्न पूछते हैं। हर उत्तर एक नया प्रश्न खोलता है, और हर प्रश्न पिछले उत्तर को थोड़ा और साफ़ करता है। आख़िर में, सौ के बाद, कुन्ददन्त चुप होते हैं, और चुप्पी ही उनका उत्तर बनती है। कथा यह कहती है कि प्रश्न का अन्त उत्तर में नहीं, ऐसी चुप्पी में होता है जिसमें न प्रश्न उठता है न उत्तर माँगा जाता है।

ऑस्ट्रियाई दार्शनिक लुडविग विट्गन्श्टाइन (Ludwig Wittgenstein, 1889-1951) ने अपनी Tractatus Logico-Philosophicus (1921) के अन्त में लिखा कि जिसके बारे में कहा नहीं जा सकता, उसके बारे में चुप रहना चाहिए। उनकी पूरी पुस्तक उसी एक चुप्पी की ओर ले जाती है। कुन्ददन्त के सौ प्रश्न भी एक ही चुप्पी की ओर खुलते हैं। सौ उत्तर मिलने के बाद उन्हें यह दिखता है कि असली उत्तर सब उत्तरों के पीछे की वो जगह है जहाँ प्रश्न पैदा होता है, और वो जगह बोली नहीं जा सकती।