दशूर: वृक्ष पर तपस्वी

कथा · 18

दशूर: वृक्ष पर तपस्वी

तपस्वी दशूर एक कदम्ब वृक्ष पर रहते थे। एक देवी ने पुत्र माँगा। दशूर ने उन्हें एक राजा खोत्थ की कथा सुनाई, जिसका नगर हवा से बना था। और कथा ही उत्तर बन गई।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, मन क्या है?”

वसिष्ठ बोले – “राम, एक तपस्वी थे, दशूर। वो एक कदम्ब के पेड़ पर बैठते थे। उन्होंने एक कथा सुनाई थी जो आज भी मेरे भीतर है। मन एक राजा है, पर उसका कोई नगर नहीं। उनकी कथा सुनो।”

तपस्वी

दशूर एक तपस्वी थे, और उनकी ख़ास बात यह थी कि वो कभी ज़मीन पर नहीं बैठते थे।

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वो एक कदम्ब के पेड़ की डाली पर बैठते थे। आसन, तप और ध्यान, सब वहीं ऊपर ही होता था।


पेड़ बहुत बड़ा था। उसकी डालियाँ चारों ओर फैली थीं और नीचे बहुत घनी छाया रहती थी।

दशूर ने जिस डाली को चुना, वो ज़मीन से कुछ ऊँची थी, पर बहुत ऊँची नहीं।


बहुत बरस वो वहीं बैठे रहे। लोग नीचे से देखते – ऊपर एक तपस्वी, पैर एक डाली पर, पीठ पेड़ के तने से सटी हुई।

कुछ लोग नीचे आते और उन्हें खाने को कुछ देते, कोई फल, थोड़ा पानी। दशूर ले लेते, धन्यवाद देते, और फिर ध्यान में लौट जाते।


इसी तरह बहुत बरस बीत गए।


देवी

एक दिन एक देवी प्रकट हुईं।


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देवी पेड़ के पास खड़ी थीं। उन्होंने ऊपर देखा और पुकारा – “तपस्वी।”


दशूर ने आँख खोली – “देवी, बोलिए।”

“मुझे एक बेटा चाहिए। आप मुझे वर दीजिए।”

दशूर बोले – “देवी, मैं तपस्वी हूँ, पर वर दे सकता हूँ।” उन्होंने हाथ बढ़ाया। “आपको बेटा मिलेगा।”


देवी ने सिर झुकाकर कहा – “धन्यवाद, तपस्वी।”


फिर देवी ने पूछा – “तपस्वी, मैं एक और बात पूछूँ?”

“पूछिए।”


“मेरे बेटे को मैं क्या सिखाऊँ?”

दशूर बोले – “देवी, मैं एक कथा सुनाता हूँ, इसे अपने बेटे को सुनाना। यह कथा एक राजा की है। उसका नाम खोत्थ था। उसका नगर बहुत बड़ा था, पर वो नगर कहीं नहीं था।”

देवी बोलीं – “सुनाइए।”


खोत्थ

और दशूर ने कथा सुनाई।


“खोत्थ हवा से पैदा हुआ था।

“यह एक विचित्र बात है। हवा कैसे किसी को पैदा कर सकती है? पर ऐसा हुआ था। खोत्थ हवा का बेटा था।

Color painterly classical-Indian illustration: the wind-born king Khottha as a translucent crowned figure made of swirling air and faint mist, his royal form half-dissolving into drifting clouds against an open sky, a ghostly outline of a body holding a vague kingly shape; ethereal blues and pale gold, dreamlike; dignified, no text, no watermark

“उसके माता-पिता दोनों हवा थे, और उसका देह भी हवा से बना था। बस उसका एक आकार था, जो उसे एक रूप देता था।


“खोत्थ बड़ा हुआ और उसने एक राज्य बनाया। पर वो राज्य भी हवा से था। उसका सिंहासन हवा से, उसके मन्त्री हवा से।

“और उसकी प्रजा भी हवा से ही बनी थी।


“खोत्थ के दिन ऐसे बीतते थे जैसे किसी और राजा के बीतते हैं।

“वो दरबार करता, न्याय करता, प्रजा से बात करता। पर सब कुछ हवा का था। और हवा से बना देखने वाला हवा से बना संसार देखता है, तो उसे लगता है कि सब असली है।

“एक दिन एक ऋषि वहाँ आए। ऋषि असली थे, मतलब हवा से नहीं, बल्कि एक देह के। उन्होंने खोत्थ का राज्य देखा, पर उनकी आँख से वहाँ कुछ नहीं था, बस हवा थी।


“ऋषि ने हँसकर खोत्थ से पूछा – ‘राजा, यह क्या है?’

“खोत्थ ने जवाब दिया – ‘मेरा राज्य।’


Color painterly classical-Indian illustration: a real flesh-and-blood rishi with white beard and staff standing in a pillared open court gesturing at the surroundings, while the crowned wind-king Khottha and his entire palace, throne, ministers and courtiers shimmer and dissolve into transparent mist around them; the rishi solid and grounded, the kingdom airy and fading; dignified, no text, no watermark

“ऋषि बोले – ‘राजा, तुम्हारा राज्य कहाँ है? मुझे तो कुछ नहीं दिखता, बस हवा है।’

“खोत्थ हैरान रह गया – ‘आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? यह सब तो है।’


“ऋषि बोले – ‘राजा, तुम्हारी आँख देखती है, पर तुम्हारी आँख ख़ुद हवा से है। हवा से बना देखने वाला हवा से बना संसार देखता है, तो उसे लगता है कि सब असली है। पर मेरी आँख अलग है। मुझे यह सब हवा दिखती है।’”


देवी की समझ

देवी ने यह सुना और कुछ देर सोचती रहीं।

फिर बोलीं – “दशूर, इस कथा का अर्थ क्या है?”


दशूर बोले – “देवी, मन एक राजा है। उसका नगर मन की रचना है। मन के विचार, मन की भावनाएँ, मन के सपने, सब उसकी प्रजा है। पर यह सब कहीं नहीं है, यह बस मन के भीतर है।

“जब हम मन से अलग होते हैं, तो हम एक ऋषि की तरह आते हैं। हम मन के नगर को देखते हैं और कहते हैं, यह क्या है? यह तो कुछ नहीं है।

“पर मन कहता है, यह सब है।

“और दोनों सही हैं। मन के लिए मन का नगर असली है। पर मन से ऊपर वाले के लिए मन का नगर हवा से बना है।”


देवी बोलीं – “मुझे समझ आया।”


फिर उन्होंने एक और प्रश्न किया – “दशूर, और एक बात। क्या यह सिर्फ़ मन के लिए है, या यह संसार भी ऐसा ही है?”


दशूर बोले – “देवी, यह संसार भी।”

“मतलब?”

“मतलब, जिसे हम संसार कहते हैं, वो भी एक तरह की हवा से बना है। चेतना से। चेतना अपनी एक रचना बनाती है, हम उसमें रहते हैं और उसे असली समझते हैं।

“पर अगर कोई बाहर से आकर देखे, तो वो कहेगा, यह सब हवा है।”

देवी ने यह सुना और कुछ देर मौन रहीं।


फिर बोलीं – “दशूर, तो फिर असली क्या है?”

“देवी, असली वो है जो देखने वाला है, जो हर रचना के पीछे है।”


देवी ने उन्हें प्रणाम किया – “धन्यवाद।” और फिर वो चली गईं।


बेटा

समय बीता और देवी के बेटा हुआ। उस बेटे को उन्होंने बहुत बरस तक यह कथा सुनाई।


“बेटा, मन एक राजा है। उसका नगर कहीं नहीं है। तुम मन की प्रजा मत बनो, तुम देखने वाले बनो।”

बेटा बड़ा हुआ और उसने यह बात अपने भीतर रख ली।


आगे चलकर वो बेटा भी एक तपस्वी बना। उसने यह कथा बहुत लोगों को सुनाई, और हर एक के भीतर एक प्रकाश जग गया।


खोत्थ का अन्त

एक दिन देवी के बेटे ने पूछा – “माँ, खोत्थ का आगे क्या हुआ?”


देवी बोलीं – “बेटा, यह कथा का दूसरा भाग है। दशूर ने मुझे यह बाद में बताया था। सुनो।

“जब ऋषि ने खोत्थ से कहा कि उसका राज्य हवा से है, तो खोत्थ पहले माना नहीं। पर ऋषि ने एक प्रयोग किया।”

“क्या प्रयोग?”

“ऋषि ने खोत्थ से कहा, ‘राजा, अपनी आँख बन्द कर।’ खोत्थ ने आँख बन्द की। फिर ऋषि ने कहा, ‘अब अपने राज्य की कल्पना मत कर।’

“खोत्थ ने कोशिश की, पर वो नहीं कर पाया। जैसे ही उसने अपने राज्य की कल्पना छोड़ी, राज्य अदृश्य हो गया।

“खोत्थ ने आँख खोली, तो राज्य वहाँ था। उसने फिर आँख बन्द की और कल्पना छोड़ी, तो राज्य चला गया।”


“माँ, यह तो बहुत विचित्र है।”

“हाँ, बेटा, पर यह असली है। खोत्थ ने जाना कि उसका राज्य उसकी अपनी कल्पना से है। उसने अपने आप को रचा, अपने राज्य को रचा, अपनी प्रजा को रचा। और जब उसने यह जाना, तो वो हलका हो गया।”


“फिर?”

“फिर खोत्थ ने अपनी कल्पना धीरे-धीरे हटाई। राज्य धीरे-धीरे हलका होता गया, और आख़िर में बस हवा रह गई।”

“पर खोत्थ?”

“खोत्थ भी हवा था। पर खोत्थ की एक बात बची रही।”

“क्या?”

“उसकी चेतना, जो यह सब कल्पना कर रही थी।”


“वो चेतना कहाँ गई?”

“वो रही, हमेशा रहती है। चेतना का कोई अन्त नहीं।”


बच्चे ने पूछा – “माँ, तो हमारी कल्पना के पीछे भी एक चेतना है?”

“हाँ।”

“और वो चेतना?”

“वो हम हैं।”

यह सुनकर बच्चे के चेहरे पर एक हलकी हँसी आ गई।


वसिष्ठ

बहुत बरस बाद, राम, मैं भी उस कदम्ब के पेड़ पर गया।


यह बात तुम्हें बताऊँ, मैं ख़ुद दशूर से मिला।

उनका देह अब बहुत बूढ़ा हो चुका था, पर वो अभी भी उसी पेड़ पर थे।


मैंने उन्हें प्रणाम किया और कहा – “दशूर।”

“वसिष्ठ।”

“आप मुझे जानते हैं?”

“हाँ।”


मैं उनके नीचे बैठ गया।

मैंने कहा – “दशूर, मैंने आपकी खोत्थ की कथा सुनी है, पर मैंने उसे पूरी तरह नहीं समझा।”

“क्या नहीं समझा?”


“दशूर, अगर सब कुछ हवा से है, तो हम कोई काम क्यों करें? कोई न्याय क्यों करें?”


दशूर बोले – “वसिष्ठ, यह प्रश्न अच्छा है, पर इसका जवाब भी सीधा है।

“हवा से बना संसार भी संसार है। उसमें रहने वाले लोग, चाहे हवा के हों, उनके अनुभव असली हैं। उनका दुख असली है, उनका सुख असली है।

“इसलिए हम न्याय करते हैं, काम करते हैं, प्रजा को सुख देते हैं। बस हम यह नहीं भूलते कि सब हवा से है।

“मतलब, हम कर्म करते हैं, पर बँधते नहीं।”


मैंने कहा – “दशूर, यह बात मुझे बहुत बरस से सोचनी थी।”

“वसिष्ठ, अब तुम जान गए।”


मैंने दशूर को फिर प्रणाम किया – “दशूर, एक और प्रश्न। आप पेड़ पर क्यों बैठते हैं? ज़मीन पर क्यों नहीं?”

दशूर बोले – “वसिष्ठ, यह छोटी बात है, पर बताऊँगा।

“पेड़ पर बैठने से एक बात होती है। मैं ज़मीन से थोड़ा अलग रहता हूँ। मैं ज़मीन को देखता हूँ, पर मेरा देखना ऊपर से है।

“यह मेरे लिए ज़रूरी है, क्योंकि यह मेरी पहचान को ज़मीन से बँधने नहीं देता।

“पर यह बस मेरा तरीक़ा है, हर एक का अपना तरीक़ा होता है। आप अगर ज़मीन पर रहते हो, तो भी ठीक है। बस अपनी पहचान को ज़मीन से मत बाँधो। यही काफ़ी है।”


यह सुनकर मेरे भीतर बात उतर गई।


बहुत बरस बाद दशूर भी चले गए।

पर उनका पेड़ अभी भी वहीं है। कोई नया तपस्वी उस पेड़ पर बैठा है, शायद उनके वंश से।

जो लोग वहाँ आते हैं, वो उन्हें खोत्थ की कथा सुनाते हैं।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, मन भी हवा से है?”


“राम, मन एक राजा है। उसके पास नगर है, उसके पास प्रजा है। पर वो सब उसी की चेतना से बना है। जब चेतना मन से ऊपर उठती है, तो वो देखती है कि मन का नगर बस उसी के भीतर है।

“मन को मारना ज़रूरी नहीं। बस उसके पीछे जाकर देखना है।”


राम ने पानी की ओर देखकर पूछा – “गुरुदेव, क्या मैं भी एक दिन कदम्ब के पेड़ पर बैठूँगा?”


Color painterly classical-Indian illustration: sage Vasishtha, elderly and serene, speaking gently to young prince Rama at dusk by a riverbank; in a soft glowing vision above, Rama is shown later seated calm and centred upon a royal throne that subtly echoes the shape of a kadamba tree; twilight purples and warm lamplight; dignified, no text, no watermark

वसिष्ठ बोले – “राम, तुम्हें पेड़ पर बैठने की ज़रूरत नहीं। तुम्हारा सिंहासन ही तुम्हारा पेड़ होगा। तुम वहीं बैठोगे, और देखोगे, और भीतर एक स्थिरता रखोगे।

“दशूर का पेड़ बाहर था। तुम्हारा पेड़ भीतर होगा।”


राम ने यह बात मन में बिठा ली।


बाहर रात उतर आई थी। राम ने एक जम्हाई ली और पूछा – “गुरुदेव, मैं चलूँ?”

“चलो।”


दोनों उठ खड़े हुए।


रास्ते में राम ने एक कदम्ब का पेड़ देखा, बहुत बड़ा।


राम एक पल को रुककर देखने लगे और पूछा – “गुरुदेव, क्या यह दशूर का पेड़ है?”


वसिष्ठ बोले – “राम, यह उनका पेड़ नहीं। पर हर कदम्ब अब उनके पेड़ की एक छाया है।”

राम ने पेड़ को प्रणाम किया।


और दोनों आगे चल पड़े।


साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा योग वासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 4.48-55 पर आधारित है। दशूर का कदम्ब-वृक्ष पर तप, और खोत्थ का हवा से बना राज्य, यह मन की रचना-शक्ति का एक विचित्र पर शक्तिशाली रूपक है। दशूर का बाद में वसिष्ठ से सम्वाद इस कथा का दार्शनिक विस्तार करता है।

दर्शन-दृष्टि

दशूर एक कदम्ब के पेड़ पर तप में बैठे हैं। एक देवी पुत्र माँगने आती है, वो वर देते हैं। फिर उस पुत्र को एक कथा सुनाते हैं, खोत्थ नाम के एक हवा-जन्मे राजा की, जिसने एक नगर बसाया, और जिसका वो नगर वस्तुतः मन का एक रूपक है। कथा यह कहती है कि मन एक राजा है जो अपना ही नगर बसाता है, उसमें ख़ुद रहता है, और भूल जाता है कि उसने बसाया था।

आधुनिक दर्शन में गिल्बर्ट राइल (Gilbert Ryle, 1900-1976) ने अपनी The Concept of Mind (1949) में “ghost in the machine” की आलोचना की, कि मन को हम एक अलग वस्तु मान बैठते हैं जो शरीर के भीतर बैठी है, और यही हमारी सबसे बड़ी श्रेणी-भूल है। दशूर का खोत्थ इसी श्रेणी-भूल का पुराण-रूप है, एक हवा-जन्मा राजा जिसने अपना नगर रचा और अपनी ही रचना को असली मानकर उसमें खो गया।