कथा · 14
राजा बलि का बोध
वामन-कथा के बाद बलि पाताल में अकेले अँधेरे में बैठे रहे, और एक दिन उनके भीतर से ऐसी खुली हँसी फूटी कि उसकी गूँज सुनकर विष्णु स्वयं उन्हें अपना द्वारपाल बनाने चले आए।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, अगर एक राजा सब कुछ खो दे, तो भी क्या वो स्वतंत्र रह सकता है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, राजा बलि की कथा सुनो। उन्होंने तीनों लोक जीते थे, फिर सब हार दिया, और हारकर भी वो वैसे ही रहे जैसे जीतकर थे। यह बात कैसे हुई, सुनो।”
तीनों लोक
बलि दैत्य-राज थे। उनके पिता थे विरोचन और दादा थे प्रह्लाद। प्रह्लाद की कथा हम सुन चुके हैं। उन्हीं प्रह्लाद के बेटे विरोचन, और विरोचन के बेटे बलि।
बलि बहुत वीर थे।

बहुत बरस उन्होंने युद्ध किए और हर युद्ध जीते। उन्होंने इन्द्र से स्वर्ग छीना, पृथ्वी पर अपना राज्य फैलाया, और पाताल तक अपनी पकड़ बना ली।
तीनों लोक अब उन्हीं के थे।
बलि के पास सब कुछ था – राज्य, धन, सेना, प्रजा, पत्नी, बच्चे।
उनके राज-कक्ष की दीवारों पर हीरे जड़े थे, और उनके सिंहासन के सामने हर रोज़ राज-शोभा होती थी।
पर एक दिन बलि के भीतर एक ऊब उठी।
ऊब

वो एक शाम की बात थी। बलि अपने महल के एक छज्जे पर बैठे थे और आसमान की ओर देख रहे थे। सूरज ढल रहा था और आकाश में हलका लाल रंग फैला हुआ था।
नीचे नगर में जीवन चल रहा था – बाज़ार, दुकानें, आते-जाते लोग। बलि ने यह सब देखा, पर भीतर एक ख़ालीपन बना रहा।
उन्होंने सोचा – मैंने सब कुछ पा लिया, फिर भी मैं ऊबा क्यों हूँ? मेरे पास तीनों लोक हैं और मेरी हर इच्छा पूरी होती है, पर भीतर एक खाली रह जाता है। यह क्या है?
तभी उन्हें अपने पिता की एक बात याद आई। बहुत बरस पहले, जब बलि छोटे थे, उन्होंने पिता से पूछा था – “पिता, अगर मुझे हमेशा ख़ुश रहना हो, तो क्या करूँ?”
विरोचन बोले – “बेटा, मन को सम्हालो।”
“कैसे?”
“बेटा, यह जीवन भर का काम है, पर एक बात कह दूँ। मन एक मन्त्री की तरह है। अगर तुम मन्त्री को सम्हाल लेते हो, तो पूरा राज्य सम्हल जाता है, और अगर मन्त्री बेलगाम है, तो राजा भी बेलगाम हो जाता है। मन को मन्त्री समझो।”
बलि ने यह बात याद की और सोचा – मेरा राज्य बड़ा है, मेरी सेना बड़ी, मेरा खज़ाना बड़ा, पर मेरा भीतरी राज्य, मेरा मन? मन अभी भी एक चीज़ माँगता है, फिर दूसरी, फिर तीसरी। जब एक मिलती है, मन दूसरी की ओर बढ़ता है, और जब दूसरी मिलती है, तीसरी की ओर। मन कभी नहीं रुकता। मैंने मन को कभी नहीं सम्हाला।
शुक्राचार्य
बलि ने अपने गुरु शुक्राचार्य को बुलाया। वो दैत्यों के गुरु थे, बहुत बूढ़े और बहुत ज्ञानी।
बलि ने पूछा – “गुरुदेव, मेरे पिता ने कहा था कि मन को सम्हालो। पर मन क्या है?”

शुक्राचार्य बोले – “बलि, मन तुम्हारी चेतना का एक रूप है। चेतना जब अपनी विभिन्न इच्छाओं में बहती है, उसे मन कहते हैं। मन को सम्हालना मतलब इच्छाओं को सम्हालना।”
“कैसे सम्हालूँ?”
“बलि, सब एक ही चेतना है। तुम जो हो, वही हर चीज़ है, हर रूप एक ही चेतना का बाहरी रूप है। यह जब तुम्हारे भीतर बैठ जाएगा, तब मन अपने आप सम्हल जाएगा।”
बलि ने यह सुना, पर वो पूरी तरह नहीं समझे।
“गुरुदेव, इसके लिए मैं क्या करूँ?”
शुक्राचार्य बोले – “बलि, तप करो।”
“पर मैं तो राजा हूँ। मुझे राज्य चलाना है।”
“बलि, राज्य चलाने वाला राजा कुछ देर के लिए तप पर बैठ सकता है। अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाओ और तुम तप पर जाओ।”
बलि ने यह सलाह मान ली।
तप
बलि ने राज्य त्याग दिया।
उन्होंने अपने बेटे बाण को सिंहासन पर बिठाया।
बलि बोले – “बाण, राज्य अब तुम्हारा।”
“पर पिता, मैं तैयार नहीं।”
“बेटे, तुम्हें तैयार होना होगा। मैं तप पर जा रहा हूँ।”
“कितने बरस के लिए?”
बलि बोले – “पता नहीं। शायद बहुत बरस, शायद कम।”

बलि चले गए। वो एक नदी के किनारे जा बैठे और आँखें बन्द कर लीं।
पहले बरस उनका मन भागता रहा – राज्य की यादें, पत्नी की यादें, बेटे की चिन्ता, पुरानी जीतें। पर शुक्राचार्य ने उन्हें एक राह सिखाई थी।
बलि ने मन को बस देखा, उसे रोका नहीं।
दूसरे बरस मन कुछ शान्त हुआ, तीसरे में और अधिक, और चौथे में बहुत।
इसी तरह बहुत बरस बीत गए, पूरे एक हज़ार।
बलि बैठे ही रहे। उनके बाल लम्बे हो गए, पर तप से वो जवान भी बने रह सकते थे, क्योंकि एक तपस्वी का देह उम्र के नियम के बाहर होता है।
विष्णु
स्वर्ग में इन्द्र ने यह सुना और सोचने लगे – बलि ने स्वर्ग छीना था, और अब वो तप कर रहे हैं। अगर वो उठ गए, तो फिर से सब ले लेंगे। मुझे कुछ करना होगा।
इन्द्र विष्णु के पास गए और बोले – “भगवन्, बलि तप कर रहे हैं। अगर वो उठ गए, तो फिर से सब ले लेंगे।”
विष्णु बोले – “मैं कुछ करूँगा।”
विष्णु ने एक छोटे ब्राह्मण का, एक बौने का रूप लिया। उसका देह छोटा था, बच्चे जैसा। हाथ में एक छोटा कमंडल, पैर नंगे, और एक पतली छड़ी। विष्णु ने उसे वामन कहा।
वामन बलि के पास गए। बलि ने आँख खोली और बोले – “छोटे ब्राह्मण, बोलिए।”
“महाराज, मैं थोड़ी-सी भिक्षा माँगने आया हूँ।”
बलि बोले – “क्या चाहिए?”
“महाराज, मुझे बस तीन क़दम की भूमि चाहिए।”
बलि बोले – “बस इतनी?”
“महाराज, हाँ।”
बलि ने दान देने के लिए हाथ बढ़ाया और बोले – “दिया।”
शुक्राचार्य पास खड़े थे। उन्होंने तुरन्त कहा – “बलि, रुको।”
“क्या, गुरुदेव?”
“बलि, यह बौना साधारण नहीं है, यह विष्णु हैं। इन्होंने जो तीन क़दम माँगे हैं, उनमें यह तीनों लोक माँग रहे हैं।”
बलि कुछ पल चुप रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, मैं दान दे चुका हूँ।”
“पर बलि…”
“गुरुदेव, अगर ये विष्णु हैं, तो भी। मैंने दान दे दिया, अब मैं वापस नहीं ले सकता।”
शुक्राचार्य बोले – “बलि, तुम जानते हो क्या होगा?”
“हाँ, फिर भी मैं यही करूँगा।”
शुक्राचार्य बोले – “बलि, तुम मेरे शिष्य हो, पर आज तुम मुझसे आगे निकल गए हो।”
बलि ने सिर झुकाकर यह बात स्वीकार की।
तीन क़दम
विष्णु ने अपना रूप बदला। वो बौना नहीं रह गए, बल्कि इतने विशाल हुए कि उनका सिर बादलों से भी ऊपर पहुँच गया।
विष्णु ने एक क़दम रखा।

पहले क़दम में पूरी पृथ्वी आ गई।
विष्णु ने दूसरा क़दम रखा।
दूसरे क़दम में पूरा स्वर्ग आ गया।
विष्णु ने तीसरा क़दम रखने को हाथ उठाया और पूछा – “बलि, तीसरा क़दम कहाँ रखूँ?”
बलि कुछ पल चुप रहे, फिर हल्के से मुस्कुराकर बोले – “भगवन्, मेरे सिर पर।”
विष्णु ने तीसरा क़दम बलि के सिर पर रखा, और बलि नीचे, ज़मीन के भीतर, पाताल लोक में चले गए।
पाताल
पाताल अँधेरा था, बहुत अँधेरा, पर वो डरावना नहीं था, बल्कि शान्त था। बलि एक गुफा में थे, चारों ओर बस अँधेरा। ऊपर पृथ्वी, उससे ऊपर आकाश, और उससे ऊपर स्वर्ग। बलि के पास अब कुछ नहीं था – न सिंहासन, न मन्त्री, न प्रजा।
पहले कुछ दिन बलि ने उस अँधेरे को देखा। वो बहुत गहरा था – न कोई दीप, न सूरज, न चाँद। पर बलि की आँखें उस अँधेरे के लिए तैयार थीं, क्योंकि उन्होंने तप किया था और अँधेरे से डरना वो बहुत पहले ही छोड़ चुके थे।
बलि ने ज़मीन छुई, जो ठंडी और पथरीली थी। उन्होंने हवा सूँघी, जिसमें बहुत बरस पुरानी मिट्टी की गंध बसी थी। फिर उन्हें एक हलकी आवाज़ सुनाई दी – बहुत दूर कहीं पानी का टपकना, शायद पाताल के भीतर कहीं कोई छोटा झरना।
बलि ने मन ही मन कहा – “यह जगह अच्छी है।”
बहुत बरस बीत गए। बलि की आँखों में पाताल का अँधेरा अब अलग नहीं रह गया था, क्योंकि उन्होंने अँधेरे में देखना सीख लिया था।
पर बलि शान्त थे।
ऊपर पृथ्वी पर इन्द्र ने राज्य ले लिया और स्वर्ग में देव-गण ख़ुश थे। बाण ने अपने पिता के बारे में सुना तो वो रोए, पर उन्हें भी पता था कि उनके पिता ने यह जान-बूझकर किया है।
पाताल में बलि बहुत दिन, बहुत बरस यूँ ही बैठे रहे। पर एक बात हुई।
बलि के भीतर एक हँसी जागने लगी।

एक रात वो ज़ोर से हँसे, और उनकी हँसी पाताल की गुफा में गूँज उठी। विष्णु ने यह सुना।
विष्णु
विष्णु बलि के पास आए और बोले – “बलि, तुम हँस क्यों रहे हो?”
बलि बोले – “भगवन्, क्योंकि आपने मुझे जीत लिया, यह सोचकर इन्द्र ख़ुश हैं। पर असल में आपने मुझे जीता नहीं, आपने मुझे मुक्त किया।”
“कैसे?”
बलि कुछ पल चुप रहे, फिर बोले – “भगवन्, अगर मैं स्वर्ग में होता, तो मुझे स्वर्ग की चिन्ता होती। अगर मैं पृथ्वी पर होता, तो मुझे पृथ्वी की चिन्ता होती। पर अब मैं पाताल में हूँ, और अब मुझे किसी की चिन्ता नहीं, मेरा कोई बँधन नहीं।
“और जो असली बात है, वो यह है कि मेरे पास अब भी वो है जो मेरा है – मेरी चेतना। आपने तीन क़दम में पृथ्वी, आकाश और मेरी पहचान ले ली, पर मेरी चेतना नहीं ली। उसे आप ले ही नहीं सकते। वो मेरी थी, है, और रहेगी।”
विष्णु बोले – “बलि, तुमने मुझे हरा दिया।”
बलि बोले – “भगवन्, मैंने नहीं। यह तो आपने ही मुझे सिखाया है। मैं बस अपनी पुरानी सीख दोहरा रहा हूँ।”
विष्णु कुछ पल चुप रहे, फिर बोले – “बलि।”
“बोलिए।”
“मैं तुम्हें एक वर देता हूँ।”
“भगवन्, मुझे कोई वर नहीं चाहिए।”
विष्णु बोले – “बलि, यह वर तुम्हारे लिए नहीं, तुम्हारे आगे आने वाले के लिए है। मेरा अगला अवतार जब आएगा, तब मैं तुम्हें द्वारपाल बनाऊँगा। तुम मेरे लोक के द्वार पर रहोगे।”
बलि बोले – “धन्यवाद, भगवन्।”
लौटना
विष्णु ने बलि के सिर पर हाथ रखा और बोले – “बलि, अब तुम अपने राज्य लौटो। पर अब वो राज्य तुम्हें नहीं बाँधेगा, क्योंकि तुम जीवन-मुक्त हो। राज्य में रहो, पर राज्य के मत बनो।”
बलि लौटे। उन्होंने पाताल छोड़ा, पृथ्वी पर आए, और फिर अपने राज्य लौटे।
बाण ने अपने पिता को देखा और बोले – “पिता, आप वापस आ गए।”
“हाँ, बेटा।”
बाण कुछ पल चुप रहे, फिर बोले – “पिता, राज्य आपका।”
बलि बोले – “नहीं, बेटा। राज्य अब तुम्हारा है। मैं बस तुम्हारे पास रहूँगा और तुम्हें सहारा दूँगा, पर सिंहासन पर तुम ही बैठोगे।”
बाण ने सिर झुकाया और बोले – “पिता, मैं समझता हूँ।”

बहुत बरस वो दोनों एक साथ रहे। बाण ने राज्य चलाया और बलि ने सहारा दिया। पर अब बलि वही बलि नहीं थे जो पहले थे। अब वो दोनों एक साथ थे – राजा भी, और साक्षी भी।
अन्त
बहुत बरस बीत गए। बाण बूढ़े हो गए, पर बलि अब भी जवान बने रहे, क्योंकि उनका देह तप से जवान रहता था। एक दिन बाण मर गए, और बलि ने अपने पोते को सिंहासन पर बिठाया।
फिर एक दिन बलि के लिए भी वह समय आ गया। वो अपने उसी पुराने कक्ष में बैठे थे, और उन्होंने आँखें बन्द कर लीं।
विष्णु प्रकट हुए और बोले – “बलि, समय आ गया।”
“मुझे पता है, भगवन्।”
“तुम कहाँ जाना चाहते हो? स्वर्ग या पाताल?”
बलि बोले – “भगवन्, मुझे अब कहीं नहीं जाना। मैं जहाँ हूँ, वहीं रहूँगा।”
“बलि, तुम्हें द्वारपाल बनना है।”
बलि बोले – “फिर ठीक है।”
बलि का देह छूट गया, और उनकी चेतना विष्णु के लोक के द्वार पर जा पहुँची। वो वहीं खड़े हो गए, और बहुत बरस तक, शायद हमेशा के लिए, वहीं रहेंगे।
जो आते, उन्हें वो देखते, और जिन्हें जाने देना होता, उन्हें जाने देते। उनके चेहरे पर हमेशा एक हलकी हँसी रहती, क्योंकि उन्हें यह पता था कि जीतना और हारना दोनों भ्रम हैं, और जो भीतर मुक्त है वो हर अवस्था में मुक्त है।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, तो असली स्वतंत्रता बाहर की चीज़ों से नहीं मिलती?”
वसिष्ठ बोले – “नहीं, राम। बाहर सब कुछ ले लिया जाए, तो भी जो भीतर है, वो अपनी जगह रहता है। और जो भीतर मुक्त है, वो बाहर के सब कुछ में रह सकता है।”
राम ने पूछा – “गुरुदेव, बलि की पाताल में जो हँसी थी, वो असली थी?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हाँ। और वो हँसी अब भी कहीं गूँज रही है। जो लोग बहुत हार चुके हैं, अगर वो ठीक से सुनें, तो वो हँसी सुन सकते हैं।”
राम ने पूछा – “गुरुदेव, बलि की कथा में एक और बात है। उन्होंने अपना सब कुछ बिना सोचे दे दिया। यह कैसे सम्भव हुआ?”
वसिष्ठ बोले – “राम, क्योंकि बलि के भीतर कोई पकड़ नहीं रह गई थी। बहुत राजा अपने राज्य को पकड़ते हैं, उनकी पहचान वहाँ होती है, उनका अहम् वहाँ होता है। पर बलि ने तप के द्वारा पहले ही अपनी पहचान छोड़ दी थी। तो जब विष्णु ने माँगा, बलि के लिए देना आसान था।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, मेरे राज्य में तो मेरी पकड़ रहेगी ही। और जब वो छिनेगी?”
वसिष्ठ कुछ पल चुप रहे, फिर बोले – “राम, यह बहुत बड़ी बात है। तुम्हारा राज्य एक दिन तुमसे छिनेगा, पर तब तक तुम तैयार हो चुके होगे।”
राम ने पूछा – “कैसे तैयार?”
वसिष्ठ बोले – “राम, क्योंकि तब तक तुम बहुत कुछ खो चुके होगे और बहुत कुछ सीख चुके होगे। तुम्हारी पहचान धीरे-धीरे हलकी हो चुकी होगी। तो जब अन्तिम चीज़ छिनेगी, तब बलि की तरह तुम भी हँस सकोगे।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, यह बात मुझे आज भारी लगती है।”
“हाँ, अभी भारी है। बाद में हलकी हो जाएगी।”
राम ने पूछा – “गुरुदेव, एक और प्रश्न है। बलि का बेटा बाण, उसके बारे में कुछ बताइए?”
वसिष्ठ बोले – “राम, बाण भी राजा बने, पर वो अपने पिता जैसे नहीं थे।”
“क्यों?”
“क्योंकि बाण ने तप नहीं किया था। उन्होंने अपने पिता की कथा तो सुनी थी, पर अपना अनुभव नहीं किया था। तो उनकी पहचान कड़ी रही, और जब उनके राज्य पर संकट आया, तो वो टूट गए।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, यह बात मुझे सोचने पर मजबूर करती है – अपने पिता की कथा सुनने से ज्ञान नहीं आता, अपना अनुभव चाहिए।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह सच है। बहुत राजकुमार अपने पिता की कथाओं से सीखने की कोशिश करते हैं, पर वो काफ़ी नहीं होता। उन्हें अपनी कथा स्वयं बनानी होती है।”
राम बहुत देर तक पानी की ओर देखते रहे।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, बलि अब विष्णु के लोक के द्वारपाल हैं। क्या वो कभी ऊब जाते हैं?”
वसिष्ठ बोले – “राम, ऊब उन्हीं को होती है जिनके पास कुछ करने की इच्छा हो। बलि के पास अब कुछ नहीं। वो बस होते हैं, उन्हें ऊब नहीं होती।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, यह बात बहुत विचित्र है। मैंने तो सोचा था कि कुछ न करना ऊबा देता है।”
“राम, यह आम सोच है। पर असल में, ऊब इच्छा से जन्म लेती है। जहाँ इच्छा नहीं, वहाँ ऊब भी नहीं।”
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या मेरे जीवन में भी एक दिन ऐसा होगा कि मुझे कुछ करने की इच्छा न रहे?”
वसिष्ठ कुछ पल चुप रहे, फिर बोले – “राम, शायद। पर वो दिन बहुत बरस बाद आएगा। अभी तुम्हें बहुत कुछ करना है, बहुत जिओगे, बहुत करोगे। पर एक दिन तुम भी बिना कुछ किए बैठोगे, और वो दिन तुम्हारा सबसे बड़ा दिन होगा।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, मैं उस दिन की प्रतीक्षा करूँगा।”
वसिष्ठ बोले – “राम, प्रतीक्षा भी एक इच्छा है। पर ठीक है, यह अच्छी इच्छा है।”
राम के चेहरे पर हलकी हँसी आई, और फिर वो दोनों बहुत देर तक चुप रहे।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, बलि की पाताल में रहने की कथा बहुत बड़ी है। मुझे एक बार और सुना दीजिए, कैसे वो हँसे?”
वसिष्ठ बोले – “राम, बलि अँधेरे में अकेले बैठे थे, बहुत बरस तक। पर एक रात उन्हें एक हलकी-सी समझ आई – मुझे यह सब चाहिए ही नहीं। और वो ज़ोर से हँसे, और उनकी हँसी पाताल की गुफ़ा में गूँज उठी। विष्णु ने यह सुना, और फिर वो आए।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, मुझे यह बात याद रहेगी कि जब मेरे पास सब कुछ न हो, तब भी मैं हँस सकता हूँ।”
“बिल्कुल।”
राम के चेहरे पर एक हलकी हँसी तैर गई।
बाहर एक हलकी हवा बह रही थी और रात घनी हो चली थी।
राम ने कहा – “गुरुदेव, धन्यवाद।”
“राम, यह कथा तो तुम्हारी ही है।”
दोनों कुछ देर चुप रहे, फिर उठे और घर की ओर चल पड़े।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5.22-29 पर आधारित है। बलि की पारम्परिक कथा में जो वामन-अवतार की चालाकी है, उसे योग वासिष्ठ एक अलग दृष्टिकोण देता है। यहाँ विष्णु बलि को हरा नहीं रहे, बलि के ज्ञान को परीक्षित कर रहे हैं। बलि की पाताल में हँसी इस कथा का सबसे बड़ा क्षण है। बलि का द्वारपाल बनना, और शुक्राचार्य का अपने ही शिष्य को सलाह देने के बावजूद उनकी निर्णय की स्वतंत्रता को मान देना, इस कथा के सूक्ष्म क्षण हैं।
दर्शन-दृष्टि
बलि एक हज़ार बरस का तप करते हैं। फिर विष्णु वामन-रूप में आते हैं, तीन पैर माँगते हैं, और बलि का सब कुछ ले लेते हैं। बलि को पाताल भेजा जाता है। पर पाताल में वो उतने ही शान्त हैं जितने सिंहासन पर थे। बाहर सब छिना, भीतर कुछ नहीं छिना। कथा यह कहती है कि असली मुक्ति परिस्थिति की नहीं, चेतना की होती है, और जो भीतर मुक्त है उसे बाहर का कारागार छू नहीं पाता।
आदि शङ्कराचार्य (788-820) ने अपनी विवेकचूड़ामणि में जीवन्मुक्त के लक्षण बताए कि वो प्रिय-अप्रिय में एक-सा रहे, मान-अपमान में अडिग रहे, और अपनी अवस्था को परिस्थिति पर निर्भर न रखे। बलि की पाताल-शान्ति इसी जीवन्मुक्ति का दृश्य रूप है। विष्णु ने उनसे राज्य लिया, स्वर्ग लिया, गौरव लिया, पर उनकी समता नहीं ले पाए, क्योंकि वो किसी के देने या लेने की वस्तु नहीं थी।