राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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हरि प्रभु वेपरवाहु है कितु खाधै तिपताइ ॥ सतिगुर कै भाणै जो चलै तिपतासै हरि गुण गाइ ॥ धनु धनु कलजुगि नानका जि चले सतिगुर भाइ ॥१२॥ सतिगुरू न सेविओ सबदु न रखिओ उर धारि ॥ धिगु तिना का जीविआ कितु आए संसारि ॥ गुरमती भउ मनि पवै तां हरि रसि लगै पिआरि ॥ नाउ मिलै धुरि लिखिआ जन नानक पारि उतारि ॥१३॥ माइआ मोहि जगु भरमिआ घरु मुसै खबरि न होइ ॥ काम क्रोधि मनु हिरि लइआ मनमुख अंधा लोइ ॥ गिआन खड़ग पंच दूत संघारे गुरमति जागै सोइ ॥ नाम रतनु परगासिआ मनु तनु निरमलु होइ ॥ नामहीन नकटे फिरहि बिनु नावै बहि रोइ ॥ नानक जो धुरि करतै लिखिआ सु मेटि न सकै कोइ ॥१४॥ गुरमुखा हरि धनु खटिआ गुर कै सबदि वीचारि ॥ नामु पदारथु पाइआ अतुट भरे भंडार ॥ हरि गुण बाणी उचरहि अंतु न पारावारु ॥ नानक सभ कारण करता करै वेखै सिरजनहारु ॥१५॥ गुरमुखि अंतरि सहजु है मनु चड़िआ दसवै आकासि ॥ तिथै ऊंघ न भुख है हरि अंम्रित नामु सुख वासु ॥ नानक दुखु सुखु विआपत नही जिथै आतम राम प्रगासु ॥१६॥ काम क्रोध का चोलड़ा सभ गलि आए पाइ ॥ इकि उपजहि इकि बिनसि जांहि हुकमे आवै जाइ ॥ जंमणु मरणु न चुकई रंगु लगा दूजै भाइ ॥ बंधनि बंधि भवाईअनु करणा कछू न जाइ ॥१७॥ जिन कउ किरपा धारीअनु तिना सतिगुरु मिलिआ आइ ॥ सतिगुरि मिले उलटी भई मरि जीविआ सहजि सुभाइ ॥ नानक भगती रतिआ हरि हरि नामि समाइ ॥१८॥ मनमुख चंचल मति है अंतरि बहुतु चतुराई ॥ कीता करतिआ बिरथा गइआ इकु तिलु थाइ न पाई ॥ पुंन दानु जो बीजदे सभ धरम राइ कै जाई ॥ बिनु सतिगुरू जमकालु न छोडई दूजै भाइ खुआई ॥ जोबनु जांदा नदरि न आवई जरु पहुचै मरि जाई ॥ पुतु कलतु मोहु हेतु है अंति बेली को न सखाई ॥ सतिगुरु सेवे सो सुखु पाए नाउ वसै मनि आई ॥ नानक से वडे वडभागी जि गुरमुखि नामि समाई ॥१९॥ मनमुख नामु न चेतनी बिनु नावै दुख रोइ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा को तो किसी चीज़ की कोई मुथाजी की आवश्यक्ता नही है। फिर वह कौन सी चीज़ खाने से खुश होता है। जो मनुष्य गुरू की रजा में जीवन-चाल चलता है और परमात्मा के गुण गाता रहता है। (उस पर परमात्मा) प्रसन्न होता है। हे नानक ! इस विकारों-भरे संसार में वह मनुष्य शोभा कमाते हैं जो गुरू की मर्जी अनुसार जीवन-राह पर चलते हैं। 12। हे भाई ! (जिन मनुष्यों ने कभी) गुरू का आसरा नहीं लिया। जिन्होंने गुरू का शबद (कभी अपने) हृदय में टिका के नहीं रखा। वे किस लिए जगत में आए। उनका जीवन-समय धिक्कार-योग्य ही रहता है (वह सारी उम्र वैसे ही काम करते रहते हैं। जिनसे जगत में उनको धिक्कारें ही पड़ती रहती हैं)। हे भाई ! जब गुरू की मति पर चल के (मनुष्य के) मन में (परमात्मा का) डर-अदब टिकता है। तब वह परमात्मा के प्यार में परमात्मा के मेल-आनंद में जुड़ता है। पर। हे नानक ! हरी-नाम धुर दरगाह से किए कर्मों के संस्कारों के लेख अनुसार ही मिलता है। और। यह नाम (मनुष्य को संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 13। हे भाई ! माया के मोह के कारण जगत भटकता फिरता है। (जीव का हृदय-) घर (आत्मिक सरमाया) लूटा जाता है (पर जीव को) यह पता ही नहीं लगता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य जगत में (आत्मिक जीवन की सूझ के प्रति) अंधा हुआ रहता है। काम ने क्रोध ने (उसके) मन को चुरा लिया होता है। हे भाई ! (जो मनुष्य) आत्मिक जीवन की सूझ की तलवार (पकड़ के कामादिक) पाँच वैरियों को मार लेता है। वह ही गुरू की मति की बरकति से (माया के हमलों से) सचेत रहता है। (उसके अंदर) परमात्मा के नाम का रतन चमक पड़ता है। उसका मन उसका तन पवित्र हो जाता है। पर। हे भाई ! नाम से वंचित मनुष्य बे-शर्मों की तरह चले-फिरते हैं। नाम से टूटा हुआ मनुष्य बैठ के रोता रहता है (सदा दुखी रहता है)। हे नानक ! (करतार की रज़ा यूँ ही होती है कि नाम-हीन प्राणी दुखी रहे। सो) करतार ने जो कुछ धुर दरगाह से यह लेख लिख दिया है। इसको कोई मिटा नहीं सकता (उल्टा नहीं सकता)। 14। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों ने गुरू के शबद से (हरी-नाम को) अपने मन में बसा के परमात्मा का नाम-धन कमा लिया है। गुरमुखों ने कीमती नाम-धन ढूँढ लिया है (उनके अंदर हरी-नाम-धन के) ना-खत्म होने वाले खजाने भरे रहते हैं। जिस परमात्मा (के गुणों) का अंत नहीं पड़ सकता। जिस परमात्मा (की हस्ती) का उरला-परला किनारा नहीं मिल सकता। उस परमात्मा के गुणों को (गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य गुरू की) बाणी के द्वारा उचारते रहते हैं। पर हे नानक ! ये सारे सबब करतार (खुद ही) बनाता है। (इस खेल को) सृजनहार (स्वयं) देख रहा है। 15 हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के अंदर आत्मिक अडोलता बनी रहती है। उसका मन (उस) दसवें द्वार में टिका रहता है (जिस शरीर पर नौ-गौलकों का प्रभाव नहीं पड़ सकता)। उस अवस्था में (गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को माया के मोह की नींद नहीं आती। माया की भूख नहीं सताती)। (उस अवस्था में गुरू के अंदर) आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम टिका रहता है। आत्मिक आनंद बना रहता है। हे नानक ! जिस हृदय में सर्व-व्यापक परमात्मा का प्रकाश हो जाता है। वहाँ ना दुख ना सुख (कोई भी अपना) जोर नहीं डाल सकता। 16। हे भाई ! सारे जीव काम-क्रोध (आदि विकारों) के रंगे जा सकने वाला शरीर-चोला पहने के (जगत में) आते हैं; कई पैदा होते हैं कई मरते हैं। (सारी दुनिया परमात्मा के) हुकम में ही जनम-मरण के चक्कर में पड़ी हुई है। (जब तक जीव की) माया के मोह में प्रीत लगी हुई है (तब तक उसका) जनम-मरण का चक्कर खत्म नहीं होता। हे भाई ! परमात्मा ने (खुद ही मोह की) रस्सी बाँध के (सारी लोकाई जनम-मरण के चक्कर में) डाली हुई है। (इसमें से निकलने के लिए उसकी मेहर के बिना और) कोई उपाय किया नहीं जा सकता। 17। हे भाई ! जिन (मनुष्यों) पर उस (परमात्मा) ने मेहर कर दी। उनको गुरू मिल गया। हे भाई ! गुरू के मिलने से (जिस मनुष्य की सुरति काम-क्रोध आदि विकारों से) पलट गई। वह मनुष्य (विकारों से) मर के आत्मिक अडोलता में प्रभू-प्रेम में जी उठा (आत्मिक जीवन जीने लग गया)। हे नानक ! (परमात्मा की) भगती के रंग में रंगा हुआ मनुष्य सदा परमात्मा के नाम में लीन रहता है। 18। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों की मति हर वक्त भटकती रहती है। उनके अंदर (अपनी मति की) चतुराई (का) बहुत (घमण्ड) होता है। (अपनी अकल के आसरे पुन्य-दान आदि का) किया हुआ (उनका) सारा उद्यम व्यर्थ जाता है (उनका ये सारा उद्यम परमात्मा की हजूरी में) परवान नहीं होता। पुन्य-दान (आदि) जो भी (कर्म-बीज वे अपनी शरीर-धरती में) बीजते हैं। (उनकी यह) सारी मेहनत धर्मराज के हवाले हो जाती है (भाव। इस सारी मेहनत से तो मनुष्य धर्मराज के ही अधीन रहता है)। हे भाई !गुरू की शरण पड़े बिना (जनम) मरण का चक्कर (मनुष्य को) नहीं छोड़ता। माया के मोह के कारण (मनुष्य) दुखी ही होता है। (मनुष्य की) जवानी के गुजरते देर नहीं लगती। बुढ़ापा आ पहुँचता है। (और आखिर प्राणी) मर जाता है। पुत्र। स्त्री। माया का मोह-प्यार- (इनमें से) अंत में कोई यार नहीं बनता। कोई साथ नहीं बनता। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह आत्मिक आनंद पाता है। परमात्मा का नाम (उसके) मन में बसता है। हे नानक ! जो जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के परमात्मा के नाम में लीन रहता है। वह सारे ऊँचे जीवन वाले होते है। बड़े भाग्यों वाले होते हैं। 19। हे भाई ! परमात्मा के नाम से टूटा हुआ मनुष्य (सदा अपने) दुख फरोलता रहता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “हे भाई ! परमात्मा को तो किसी चीज़ की कोई मुथाजी की आवश्यक्ता नही है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।