अंग 1412

अंग
1412
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सभनी घटी सहु वसै सह बिनु घटु न कोइ ॥
नानक ते सोहागणी जिन॑ा गुरमुखि परगटु होइ ॥१९॥
जउ तउ प्रेम खेलण का चाउ ॥
सिरु धरि तली गली मेरी आउ ॥
इतु मारगि पैरु धरीजै ॥
सिरु दीजै काणि न कीजै ॥२०॥
नालि किराड़ा दोसती कूड़ै कूड़ी पाइ ॥
मरणु न जापै मूलिआ आवै कितै थाइ ॥२१॥
गिआन हीणं अगिआन पूजा ॥
अंध वरतावा भाउ दूजा ॥२२॥
गुर बिनु गिआनु धरम बिनु धिआनु ॥
सच बिनु साखी मूलो न बाकी ॥२३॥
माणू घलै उठी चलै ॥
सादु नाही इवेही गलै ॥२४॥
रामु झुरै दल मेलवै अंतरि बलु अधिकार ॥
बंतर की सैना सेवीऐ मनि तनि जुझु अपारु ॥
सीता लै गइआ दहसिरो लछमणु मूओ सरापि ॥
नानक करता करणहारु करि वेखै थापि उथापि ॥२५॥
मन महि झूरै रामचंदु सीता लछमण जोगु ॥
हणवंतरु आराधिआ आइआ करि संजोगु ॥
भूला दैतु न समझई तिनि प्रभ कीए काम ॥
नानक वेपरवाहु सो किरतु न मिटई राम ॥२६॥
लाहौर सहरु जहरु कहरु सवा पहरु ॥२७॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! प्रभू-पति सारे शरीरों में बसता है। कोई भी शरीर (ऐसा) नहीं है जो पति-प्रभू के बिना हो (जिसमें पति-प्रभू ना बसता हैं। पर बसता है गुप्त)। हे नानक ! वह जीव-सि्त्रयां भाग्यशाली हैं जिनके अंदर (वह पति’-प्रभू) गुरू के माध्यम से प्रकट हो जाता है। 19। हे भाई ! अगर आपको (प्रभू-प्रेम की) खेल-खलने का शौक है। तो (अपना) सिर तली पर रख के मेरी गली में आ (लोक-लाज छोड़ के अहंकार दूर कर के आ)। (प्रभू-प्रीति के) इस रास्ते पर (तब ही) पैर धरा जा सकता है (जब) सिर भेटा किया जाए। पर कोई झिझक ना की जाए (अर्थात। जब बिना किसी झिझक के लोक-लाज और अहंकार छोड़ा जाए)। 20। हे भाई ! अगर हर वक्त माया की गिनती गिनने वाले मनुष्य के साथ दोस्ती बनाई जाए। (तो उस किराड़ के अंदरूनी) माया के मोह के कारण (उसकी दोस्ती की) पायां भी ऐतबार-योग्य नहीं होती। हे मूलिया ! (माया के मोह में फसा हुआ मनुष्य सदा मौत से बचे रहने के उपाय करता रहता है। पर उसको ये बात) सूझती ही नहीं कि मौत किसी भी जगह पर (किसी भी वक्त) आ सकती है। 21। हे भाई ! जो मनुष्य आत्मिक जीवन की सूझ से वंचित होते हैं। वह आत्मिक जीवन से बेसमझी को ही सदा पसंद करते हैं। हे भाई ! (जिन मनुष्यों के अंदर) माया का मोह (टिका रहता है। उनका) वर्तण-व्यवहार (आत्मिक जीवन के पक्ष से) अंधा (बनाए रखने वाला होता) है। 22। हे भाई ! गुरू (की शरण पड़े) बिना परमात्मा के साथ गहरी सांझ नहीं बनती। (इस गहरी सांझ को मनुष्य जीवन का आवश्यक) फर्ज बनाए बिना (हरी-नाम सिमरन की) लगन नहीं बनती। सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन के बिना (और-और मायावी उद्यमों की जीवन-) राहदारी के कारण (आत्मिक जीवन का वह) सरमाया भी पल्ले नहीं रह जाता (जिसने मनुष्य-जन्म ले के दिया था)। 23। हे भाई ! (परमात्मा) मनुष्य को (जगत में कोई आत्मिक लाभ कमाने के लिए) भेजता है। (पर अगर आत्मिक जीवन की कमाई कमाए बिना ही मनुष्य जगत से) उठ चलता है। (तो) इस तरह का जीवन जीने में मनुष्य (को काई) आत्मिक आनंद हासिल नहीं होता। 24। (श्री रामचंद्र उस करतार की बराबरी नहीं कर सकता। देखो। रावण के साथ लड़ने के लिए) श्री रामचंद्र फौजें इकट्ठी करता है। (उसके) अंदर (फौजें इकट्ठी करने के) अधिकार की ताकत भी है। बाँदरों की (उस) फौज से (उसकी) सेवा भी हो रही है (जिस सेना के) मन में तन में युद्ध करने का बेअंत चाव है। (फिर भी श्री) रामचंद्र (तब) दुखी होता है (दुखी हुआ। जब) सीता (जी) को रावण ले गया था। (और। फिर जब श्री रामचंद्र जी का भाई) लक्ष्मण श्राप से मर गया था। हे नानक ! करतार सब कुछ कर सकने की समर्थता वाला है (उसको कभी झुरने की दुखी होने की आवश्यक्ता नहीं)। वह तो पैदा करके नाश करके (सब कुछ करके खुद ही) देखता है। 25। श्री) रामचंद्र (अपने) मन में सीता (जी) के लिए दुखी हुआ (जब सीता जी को रावण चुरा के ले गया। फिर) दुखी हुआ लक्ष्मण की खातिर (जब रणभूमि में लक्ष्मण बरछी से मूर्छित हुआ)। (तब श्री रामचंद्र ने) हनूमान को याद किया जो (परमात्मा से बने) संजोग के कारण (श्री रामचंद्र जी की शरण) आया था। मूर्ख रावण (भी) यह बात नहीं समझा कि ये सारे काम परमात्मा ने (खुद ही) किए हैं। हे भाई ! वह परमात्मा (तो) बेमुथाज है (श्री रामचंद्र उस परमात्मा की बराबरी नहीं कर सकता)। (श्री) रामचंद्र (जी) से (भी) भावी नहीं मिट सकी। 26। हे भाई ! लोहौर का शहर (शहर निवासियों के लिए आत्मिक मौत लाए रखने के कारण) जहर (बना हुआ है। क्योंकि यहाँ नित्य सवेरे ईयवरीय सिफत-सालाह की बजाए) सवा पहर (दिन चढ़ने तक मास की खातिर पशुओं पर) कहर (होता रहता है। मास आदि खाना और विषौ भोगना ही लाहौर-निवासियों का जीवन-उद्देश्य बन रहा है)। 27।
महला ३ ॥
लाहौर सहरु अंम्रित सरु सिफती दा घरु ॥२८॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला ३। हे भाई ! (अब) लाहौर शहर अमृत का चश्मा बन गया है। परमात्मा की सिफत-सालाह का श्रोत बन गया है (क्योंकि गुरू रामदास जी का जन्म हुआ है)। 28।
महला १ ॥
उदोसाहै किआ नीसानी तोटि न आवै अंनी ॥
उदोसीअ घरे ही वुठी कुड़िइंी रंनी धंमी ॥
सती रंनी घरे सिआपा रोवनि कूड़ी कंमी ॥
जो लेवै सो देवै नाही खटे दंम सहंमी ॥२९॥
पबर तूं हरीआवला कवला कंचन वंनि ॥
कै दोखड़ै सड़िओहि काली होईआ देहुरी नानक मै तनि भंगु ॥
जाणा पाणी ना लहां जै सेती मेरा संगु ॥
जितु डिठै तनु परफुड़ै चड़ै चवगणि वंनु ॥३०॥
रजि न कोई जीविआ पहुचि न चलिआ कोइ ॥
गिआनी जीवै सदा सदा सुरती ही पति होइ ॥
सरफै सरफै सदा सदा एवै गई विहाइ ॥
नानक किस नो आखीऐ विणु पुछिआ ही लै जाइ ॥३१॥
दोसु न देअहु राइ नो मति चलै जां बुढा होवै ॥
गलां करे घणेरीआ तां अंन॑े पवणा खाती टोवै ॥३२॥
पूरे का कीआ सभ किछु पूरा घटि वधि किछु नाही ॥
नानक गुरमुखि ऐसा जाणै पूरे मांहि समांही ॥३३॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: महला १। हे भाई ! सिर्फ माया की खातिर की हुई दौड़-भाग की क्या पहचान है। (पहचान ये है कि इस दौड़-भाग करने वाले को) अन्न-धन की कमी नहीं होती। (पर सिर्फ माया की खातिर दौड़-भाग करने के कारण हरी-नाम के प्रति) लापरवाही भी सदा हृदय-घर में बनी रहती है। माया के मोह में फसा इन्द्रियों के शोर में पड़ा रहता है। (दो आँखें। दो कान। एक नाक। एक मुँह और एक काम इन्द्री। इन) सातों ही इन्द्रियों का झगड़ा शरीर-घर में बना रहता है। ये इन्द्रियां (विकारों वाले) झूठे कामों के लिए शोर मचाती रहती हैं। (जो मनुष्य निरी माया की खातिर ही दौड़-भाग करता रहता है। वह) पैसे तो कमाता है। पर सहम में टिका रहता है। जो कुछ कमाता है वह औरों को हाथों से देता नहीं। 29। हे सरोवर ! आप (कभी) चार-चुफेरों से हरा-भरा था। (आपके अंदर) सोने के रंग जैसे (चमकते) कमल-फूल (खिले हुए थे)। अब आप किस नुक्स के कारण जल गया है। आपका सुंदर शरीर क्यों काला हैं गया है। हे नानक ! (इस कालिख का कारण यह है कि) मेरे शरीर में (पानी की) कमी आ गई है। मुझे ये समझ आ रही है कि जिस (पानी) से मेरा (सदा) साथ (रहता था) जिस (पानी) के दर्शन करके शरीर खिला रहता है। चार-गुना रंग चढ़ा रहता है (वह) पानी अब मुझे नहीं मिलता। 30। हे भाई ! (लंबी) उम्र भोग-भोग के किसी मनुष्य की कभी तसल्ली नहीं हुई। ना कोई मनुष्य दुनिया वाले सारे धंधे खत्म करके (यहाँ से) चलता है (ना ही कोई यह कहता है कि अब मेरे काम-धंधे खत्म हो गए हैं)। हे भाई ! आत्मिक जीवन की सूझ वाला मनुष्य सदा ही आत्मिक जीवन जीता है (सदा अपनी सुरति परमात्मा की याद में जोड़ी रखता है) (परमात्मा में) सुरति जोड़े रखने वाले मनुष्य की ही (लोक-परलोक में) इज्जत होती है। पर। हे नानक ! (माया में ग्रसित मनुष्य की उम्र) सदा ही कंजूसी करते-करते इन बचतों में ही बीतती जाती है (बचत-मारे मनुष्य को भी मौत) उसकी सलाह लिए बगैर ही यहाँ से ले चलती है। किसी की भी पेश नहीं जा सकती। 31। हे भाई ! मायाधारी मनुष्य के सिर पर दोष ना थोपो (माया का मोह उसको सदा माया में ही जकड़े रखता है)। जब (माया-ग्रसित मनुष्य) बुढा (बड़ी उम्र का) हो जाता है (तब तो परमार्थ की तरफ काम करने की उसकी) बुद्धि (बिल्कुल ही) खत्म होती जाती है। (वह हर वक्त माया की ही) बहुत सारी बातें करता रहता है। हे भाई ! अंधे मनुष्य ने तो टोए-टिॅबों-गढों में ही गिरना हुआ (जिस मनुष्य को आत्मिक जीवन का रास्ता दिखे ही ना। उसने तो मोह के ठेढे खा-खा के दुखों में ही पड़े रहना हुआ)। 32। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य ये निश्चय रखता है कि सर्व गुण सम्पन्न परमात्मा की रची हुई जगत-मर्यादा अभुल है। इसमें कहीं कोई नुक्स नहीं। हे नानक ! (गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य इस निश्चय की बरकति से) सारे गुणों के मालिक परमात्मा (की याद) में लीन रहते हैं। 33।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! प्रभू-पति सारे शरीरों में बसता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।