छत्र न पत्र न चउर न चावर बहती जात रिदै न बिचारहु ॥
रथ न अस्व न गज सिंघासन छिन महि तिआगत नांग सिधारहु ॥
सूर न बीर न मीर न खानम संगि न कोऊ द्रिसटि निहारहु ॥
कोट न ओट न कोस न छोटा करत बिकार दोऊ कर झारहु ॥
मित्र न पुत्र कलत्र साजन सख उलटत जात बिरख की छांरहु ॥
दीन दयाल पुरख प्रभ पूरन छिन छिन सिमरहु अगम अपारहु ॥
स्रीपति नाथ सरणि नानक जन हे भगवंत क्रिपा करि तारहु ॥५॥
साजन सैन मीत सुत भाई ताहू ते ले रखी निरारी ॥
धावन पावन कूर कमावन इह बिधि करत अउध तन जारी ॥
करम धरम संजम सुच नेमा चंचल संगि सगल बिधि हारी ॥
पसु पंखी बिरख असथावर बहु बिधि जोनि भ्रमिओ अति भारी ॥
खिनु पलु चसा नामु नही सिमरिओ दीना नाथ प्रानपति सारी ॥
खान पान मीठ रस भोजन अंत की बार होत कत खारी ॥
नानक संत चरन संगि उधरे होरि माइआ मगन चले सभि डारी ॥६॥
इंद्र मुनिंद्र खोजते गोरख धरणि गगन आवत फुनि धावत ॥
सिध मनुख्य देव अरु दानव इकु तिलु ता को मरमु न पावत ॥
प्रिअ प्रभ प्रीति प्रेम रस भगती हरि जन ता कै दरसि समावत ॥
तिसहि तिआगि आन कउ जाचहि मुख दंत रसन सगल घसि जावत ॥
रे मन मूड़ सिमरि सुखदाता नानक दास तुझहि समझावत ॥७॥
एता गबु अकासि न मावत बिसटा अस्त क्रिमि उदरु भरिओ है ॥
दह दिस धाइ महा बिखिआ कउ पर धन छीनि अगिआन हरिओ है ॥
जोबन बीति जरा रोगि ग्रसिओ जमदूतन डंनु मिरतु मरिओ है ॥
अनिक जोनि संकट नरक भुंचत सासन दूख गरति गरिओ है ॥
प्रेम भगति उधरहि से नानक करि किरपा संतु आपि करिओ है ॥८॥
अउखध मंत्र तंत्र पर दुख हर सरब रोग खंडण गुणकारी ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे माया में मते हुए (जीव !) यह शरीर।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।