अंग 1388

अंग
1388
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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देह न गेह न नेह न नीता माइआ मत कहा लउ गारहु ॥
छत्र न पत्र न चउर न चावर बहती जात रिदै न बिचारहु ॥
रथ न अस्व न गज सिंघासन छिन महि तिआगत नांग सिधारहु ॥
सूर न बीर न मीर न खानम संगि न कोऊ द्रिसटि निहारहु ॥
कोट न ओट न कोस न छोटा करत बिकार दोऊ कर झारहु ॥
मित्र न पुत्र कलत्र साजन सख उलटत जात बिरख की छांरहु ॥
दीन दयाल पुरख प्रभ पूरन छिन छिन सिमरहु अगम अपारहु ॥
स्रीपति नाथ सरणि नानक जन हे भगवंत क्रिपा करि तारहु ॥५॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे माया में मते हुए (जीव !) यह शरीर। यह घर। (माया के) यह मोह-प्यार। कोई सदा रहने वाले नहीं हैं; कब तक (आप इनका) अहंकार करेगा। यह (राजसी) छत्र। यह हुकमनामे। यह चवर और यह चवर बरदार। सब नाश हो जाएंगे। पर हृदय में आप विचारता ही नहीं। रथ। घोड़े। हाथी। तख्त। (इनमें से कोई भी साथ) नहीं (निभना)। इनको एक छिन में छोड़ के नंगा (ही यहाँ से) चला जाऐगा। आँखों से देख। ना सूरमे। ना योद्धे। ना मीर। ना सिरदार। कोई भी साथी नहीं (बनने वाला)। इन किलों। (माया के) आसरों और खजानों से (आखिरी वक्त पर) छुटकारा नहीं (हो सकेगा)। (आप) पाप कर-कर के दोनों हाथ झाड़ता है (भाव। बेपरवाह हैं के पाप करता है)। यह मित्र। पुत्र। स्त्री। सज्जन और साथी (आखिरी वक्त पर) साथ छोड़ देंगे। जैसे (अंधेरे में) वृक्ष की छाया (उसका साथ छोड़ देती है)। (हे मन !) दीनों पर दया करने वाले। सब जगह व्यापक। बेअंत और अपार हरी को हर वक्त याद कर। (और कह) – हे माया के पति ! हे नाथ ! हे भगवंत ! नानक दास को कृपा करके पार लगा लो। जो आपकी शरण आया है। 5।
प्रान मान दान मग जोहन हीतु चीतु दे ले ले पारी ॥
साजन सैन मीत सुत भाई ताहू ते ले रखी निरारी ॥
धावन पावन कूर कमावन इह बिधि करत अउध तन जारी ॥
करम धरम संजम सुच नेमा चंचल संगि सगल बिधि हारी ॥
पसु पंखी बिरख असथावर बहु बिधि जोनि भ्रमिओ अति भारी ॥
खिनु पलु चसा नामु नही सिमरिओ दीना नाथ प्रानपति सारी ॥
खान पान मीठ रस भोजन अंत की बार होत कत खारी ॥
नानक संत चरन संगि उधरे होरि माइआ मगन चले सभि डारी ॥६॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (लोग) जान लगा के। इज्जत भी दे के। दान ले-ले के। डाके मार-मार के। (माया में) प्रेम जोड़ के। (पूर्ण) ध्यान दे-दे (माया को) ले-ले के इकट्ठा करते हैं; सज्जन। साथी। मित्र। पुत्र। भाई- इन सबसे छुपा-छुपा के रखते हैं। (लोग माया के पीछे) दौड़ना-भागना। ठॅगी के काम करने -सारी उम्र यह कुछ करते हुए ही गवा देते हैं; पुण्य कर्म। जुगती में रहना। आत्मिक सुचि और नियम -ये सारे ही काम चंचल माया की संगति में छोड़ बैठते हैं। (जीव) पशू। पंछी। वृक्ष। पर्वत आदिक- इन रंग-बिरंगी जूनियों में बहुत भटकते फिरते हैं; छिन मात्र। पल मात्र या रक्ती भर भी दीनों के नाथ। प्राणों के मालिक। खाने-पीने। मीठे रसों वाले पदार्थ- (ये सब) आखिरी वक्त सदा कड़वे (लगते हैं)। हे नानक ! जो संत-जनों के चरणों में आ लगते हैं वह तैर जाते हैं। बाकी लोग। जो माया में मस्त हैं। सब कुछ छोड़ के (खाली हाथ ही) जाते हैं। 6।
ब्रहमादिक सिव छंद मुनीसुर रसकि रसकि ठाकुर गुन गावत ॥
इंद्र मुनिंद्र खोजते गोरख धरणि गगन आवत फुनि धावत ॥
सिध मनुख्य देव अरु दानव इकु तिलु ता को मरमु न पावत ॥
प्रिअ प्रभ प्रीति प्रेम रस भगती हरि जन ता कै दरसि समावत ॥
तिसहि तिआगि आन कउ जाचहि मुख दंत रसन सगल घसि जावत ॥
रे मन मूड़ सिमरि सुखदाता नानक दास तुझहि समझावत ॥७॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: ब्रहमा जैसे। शिव जी और बड़े-बड़े मुनि वेदों द्वारा परमात्मा के गुण प्रेम से गाते हैं। इन्द्र। बड़े-बड़े मुनिजन और गोरख (आदिक) कभी धरती पर आते हैं और कभी आकाश की तरफ दौड़ते फिरते हैं। (और परमात्मा को हर जगह) खोज रहे हैं। सिद्ध। मनुष्य। देवते और दैत्य। किसी ने भी उस (प्रभू) का तिल-मात्र भी भेद नहीं पाया। पर। हरी के दास प्यारे प्रभू की प्रीति द्वारा और प्रेम-रस वाली भगती के द्वारा उसके दर्शन में लीन हो जाते हैं। (जो मनुष्य) उस प्रभू को छोड़ के औरों से माँगते हैं (माँगते-माँगते उनके) मुँह। दाँत और जीभ -ये सारे ही घिस जाते हैं। हे मूर्ख मन ! सुखों को देने वाले (प्रभू) को याद कर। आपको (प्रभू का) दास नानक समझा रहा है। 7।
माइआ रंग बिरंग करत भ्रम मोह कै कूपि गुबारि परिओ है ॥
एता गबु अकासि न मावत बिसटा अस्त क्रिमि उदरु भरिओ है ॥
दह दिस धाइ महा बिखिआ कउ पर धन छीनि अगिआन हरिओ है ॥
जोबन बीति जरा रोगि ग्रसिओ जमदूतन डंनु मिरतु मरिओ है ॥
अनिक जोनि संकट नरक भुंचत सासन दूख गरति गरिओ है ॥
प्रेम भगति उधरहि से नानक करि किरपा संतु आपि करिओ है ॥८॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) भुलेखे और मोह के कारण (जिस माया के) अंधेरे कूँए में आप पड़ा हुआ है। (वह) माया कई रंगों के करिश्मे करती है। (आपको) इतना अहंकार है कि आसमान तक नहीं (आप) समाता। (पर आपकी हस्ती तो यही कुछ है ना कि आपका) पेट विष्टा। हड्डियां और कीड़ों से भरा हुआ है। आप माया की खातिर दसों दिशाओं में दौड़ता है। पराया धन छीनता है। आपको अज्ञान ने ठॅग लिया है। (आपकी) जवानी बीत गई है; बुढ़ापा-रूपी रोग ने (आपको) आ घेरा है; (आप ऐसी) मौत मरा है (जहाँ) आपको जमदूतों का दण्ड भरना पड़ेगा। आप अनेकों जूनों के कष्ट और नर्क भोगता है। जमों की ताड़ना के दुखों के टोए में गल रहा है। हे नानक ! वह मनुष्य प्रेम-भगती की बरकति से पार लंघ गए हैं। जिन को (हरी ने) मेहर कर के खुद संत बना लिया है। 8।
गुण समूह फल सगल मनोरथ पूरन होई आस हमारी ॥
अउखध मंत्र तंत्र पर दुख हर सरब रोग खंडण गुणकारी ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (हरी के नाम को सिमरन से) हमारी आशा पूरी हो गई है। सारे गुण और सारे मनोरथों के फल प्राप्त हो गए हैं। पराए दुख दूर करने के लिए (यह नाम) औषधि-रूप है। मंत्र-रूप है। नाम सारे रोगों के नाश करने वाला है और गुण पैदा करने वाला है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे माया में मते हुए (जीव !) यह शरीर।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।