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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1388 · सवैये

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अंग
1388
सवैये
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  1. देह न गेह न नेह न नीता माइआ मत कहा लउ गारहु ॥
  2. प्रान मान दान मग जोहन हीतु चीतु दे ले ले पारी ॥
  3. ब्रहमादिक सिव छंद मुनीसुर रसकि रसकि ठाकुर गुन गावत ॥
  4. माइआ रंग बिरंग करत भ्रम मोह कै कूपि गुबारि परिओ है ॥
  5. गुण समूह फल सगल मनोरथ पूरन होई आस हमारी ॥

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

देह न गेह न नेह न नीता माइआ मत कहा लउ गारहु ॥

देह न गेह न नेह न नीता माइआ मत कहा लउ गारहु ॥
छत्र न पत्र न चउर न चावर बहती जात रिदै न बिचारहु ॥
रथ न अस्व न गज सिंघासन छिन महि तिआगत नांग सिधारहु ॥
सूर न बीर न मीर न खानम संगि न कोऊ द्रिसटि निहारहु ॥
कोट न ओट न कोस न छोटा करत बिकार दोऊ कर झारहु ॥
मित्र न पुत्र कलत्र साजन सख उलटत जात बिरख की छांरहु ॥
दीन दयाल पुरख प्रभ पूरन छिन छिन सिमरहु अगम अपारहु ॥
स्रीपति नाथ सरणि नानक जन हे भगवंत क्रिपा करि तारहु ॥5॥

हिन्दी अर्थ: हे माया में मते हुए (जीव!) यह शरीर, यह घर। (माया के) यह मोह-प्यार। कोई सदा रहने वाले नहीं हैं; कब तक (आप इनका) अहंकार करेंगे? यह (राजसी) छत्र, यह हुकमनामे। यह चवर और यह चवर बरदार। सब नाश हो जाएंगे। पर हृदय में आप विचारते ही नहीं। रथ, घोड़े, हाथी, तख्त। (इनमें से कोई भी साथ) नहीं (निभना)। इनको एक छिन में छोड़ के नंगे (ही यहाँ से) चले जाएँगे। आँखों से देखिए। ना सूरमे, ना योद्धे, ना मीर, ना सिरदार। कोई भी साथी नहीं (बनने वाला)। इन किलों। (माया के) आसरों और खजानों से (आखिरी वक्त पर) छुटकारा नहीं (हो सकेगा)। (आप) पाप कर-कर के दोनों हाथ झाड़ते हैं (भाव, बेपरवाह हो के पाप करते हैं)। यह मित्र, पुत्र, स्त्री, सज्जन और साथी (आखिरी वक्त पर) साथ छोड़ देंगे। जैसे (अंधेरे में) वृक्ष की छाया (उसका साथ छोड़ देती है)। (हे मन!) दीनों पर दया करने वाले। सब जगह व्यापक। बेअंत और अपार हरी को हर वक्त याद करें। (और कहें): हे माया के पति! हे नाथ! हे भगवंत! नानक दास को कृपा करके पार लगा लें। जो आपकी शरण आया है। 5।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

प्रान मान दान मग जोहन हीतु चीतु दे ले ले पारी ॥

प्रान मान दान मग जोहन हीतु चीतु दे ले ले पारी ॥
साजन सैन मीत सुत भाई ताहू ते ले रखी निरारी ॥
धावन पावन कूर कमावन इह बिधि करत अउध तन जारी ॥
करम धरम संजम सुच नेमा चंचल संगि सगल बिधि हारी ॥
पसु पंखी बिरख असथावर बहु बिधि जोनि भ्रमिओ अति भारी ॥
खिनु पलु चसा नामु नही सिमरिओ दीना नाथ प्रानपति सारी ॥
खान पान मीठ रस भोजन अंत की बार होत कत खारी ॥
नानक संत चरन संगि उधरे होरि माइआ मगन चले सभि डारी ॥6॥

हिन्दी अर्थ: (लोग) जान लगा के, अपनी इज्जत भी देकर, दान ले-ले के, डाके मार-मार के, माया में प्रेम जोड़ के और पूरा ध्यान देकर धन इकट्ठा करते हैं। सज्जन, साथी, मित्र, पुत्र और भाई, इन सबसे छिपाकर रखते हैं। माया के पीछे दौड़ते-भागते और ठगी के काम करते हुए सारी उम्र गँवा देते हैं। पुण्य कर्म, संयम, आत्मिक शुचिता और नियम, ये सभी चंचल माया की संगति में छोड़ बैठते हैं। (जीव) पशु, पक्षी, वृक्ष और पर्वत आदि अनेक प्रकार की योनियों में बहुत भटकते फिरते हैं। क्षण भर, पल भर या उससे भी थोड़े समय के लिए दीनों के नाथ, प्राणों के मालिक और सृष्टि के रचयिता का नाम नहीं जपते। खाने-पीने के मीठे, रसपूर्ण पदार्थ भी अंत समय कड़वे लगते हैं। हे नानक! जो संत-जनों के चरणों में लगते हैं, वे पार उतर जाते हैं। बाकी लोग, जो माया में मस्त हैं, सब कुछ छोड़कर खाली हाथ चले जाते हैं। 6।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

ब्रहमादिक सिव छंद मुनीसुर रसकि रसकि ठाकुर गुन गावत ॥

ब्रहमादिक सिव छंद मुनीसुर रसकि रसकि ठाकुर गुन गावत ॥
इंद्र मुनिंद्र खोजते गोरख धरणि गगन आवत फुनि धावत ॥
सिध मनुख्य देव अरु दानव इकु तिलु ता को मरमु न पावत ॥
प्रिअ प्रभ प्रीति प्रेम रस भगती हरि जन ता कै दरसि समावत ॥
तिसहि तिआगि आन कउ जाचहि मुख दंत रसन सगल घसि जावत ॥
रे मन मूड़ सिमरि सुखदाता नानक दास तुझहि समझावत ॥7॥

हिन्दी अर्थ: ब्रहमा जैसे। शिव जी और बड़े-बड़े मुनि वेदों द्वारा परमात्मा के गुण प्रेम से गाते हैं। इन्द्र, बड़े-बड़े मुनिजन और गोरख (आदिक) कभी धरती पर आते हैं और कभी आकाश की तरफ दौड़ते फिरते हैं। (और परमात्मा को हर जगह) खोज रहे हैं। सिद्ध, मनुष्य, देवते और दैत्य। किसी ने भी उस (प्रभू) का तिल-मात्र भी भेद नहीं पाया। पर, हरी के दास प्यारे प्रभू की प्रीति द्वारा और प्रेम-रस वाली भगती के द्वारा उसके दर्शन में लीन हो जाते हैं। (जो मनुष्य) उस प्रभू को छोड़ के औरों से माँगते हैं (माँगते-माँगते उनके) मुँह, दाँत और जीभ, ये सारे ही घिस जाते हैं। हे मूर्ख मन! सुखों को देने वाले (प्रभू) को याद करें। आपको (प्रभू का) दास नानक समझा रहा है। 7।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

माइआ रंग बिरंग करत भ्रम मोह कै कूपि गुबारि परिओ है ॥

माइआ रंग बिरंग करत भ्रम मोह कै कूपि गुबारि परिओ है ॥
एता गबु अकासि न मावत बिसटा अस्त क्रिमि उदरु भरिओ है ॥
दह दिस धाइ महा बिखिआ कउ पर धन छीनि अगिआन हरिओ है ॥
जोबन बीति जरा रोगि ग्रसिओ जमदूतन डंनु मिरतु मरिओ है ॥
अनिक जोनि संकट नरक भुंचत सासन दूख गरति गरिओ है ॥
प्रेम भगति उधरहि से नानक करि किरपा संतु आपि करिओ है ॥8॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई!) भुलेखे और मोह के कारण (जिस माया के) अंधेरे कूँए में आप पड़े हुए हैं। (वह) माया कई रंगों के करिश्मे करती है। (आपको) इतना अहंकार है कि आसमान तक नहीं (आप) समाते। (पर आपकी हस्ती तो यही कुछ है ना कि आपका) पेट विष्टा, हड्डियां और कीड़ों से भरा हुआ है। आप माया की खातिर दसों दिशाओं में दौड़ते हैं। पराया धन छीनते हैं। आपको अज्ञान ने ठॅग लिया है। (आपकी) जवानी बीत गई है; बुढ़ापा-रूपी रोग ने (आपको) आ घेरा है; (आप ऐसी) मौत मरे हैं (जहाँ) आपको जमदूतों का दण्ड भरना पड़ेगा। आप अनेकों जूनों के कष्ट और नर्क भोगते हैं। जमों की ताड़ना के दुखों के टोए में गल रहे हैं। हे नानक! वह मनुष्य प्रेम-भगती की बरकति से पार लंघ गए हैं। जिन को (हरी ने) मेहर कर के खुद संत बना लिया है। 8।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

गुण समूह फल सगल मनोरथ पूरन होई आस हमारी ॥

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गुण समूह फल सगल मनोरथ पूरन होई आस हमारी ॥
अउखध मंत्र तंत्र पर दुख हर सरब रोग खंडण गुणकारी ॥

हिन्दी अर्थ: (हरी के नाम को सिमरन से) हमारी आशा पूरी हो गई है। सारे गुण और सारे मनोरथों के फल प्राप्त हो गए हैं। पराए दुख दूर करने के लिए (यह नाम) औषधि-रूप है, मंत्र-रूप है। नाम सारे रोगों के नाश करने वाला है और गुण पैदा करने वाला है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1388 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।