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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1387 · सवैये

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अंग
1387
सवैये
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  1. देहु दरसु मनि चाउ भगति इहु मनु ठहरावै ॥
  2. काची देह मोह फुनि बांधी सठ कठोर कुचील कुगिआनी ॥
  3. कीरति करन सरन मनमोहन जोहन पाप बिदारन कउ ॥
  4. रंचक रेत खेत तनि निरमित दुरलभ देह सवारि धरी ॥
  5. रे मन मूस बिला महि गरबत करतब करत महां मुघनां ॥

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

देहु दरसु मनि चाउ भगति इहु मनु ठहरावै ॥

अंग 1386 से चला आ रहा अंश

देहु दरसु मनि चाउ भगति इहु मनु ठहरावै ॥
बलिओ चरागु अंध्यार महि सभ कलि उधरी इक नाम धरम ॥
प्रगटु सगल हरि भवन महि जनु नानकु गुरु पारब्रहम ॥9॥

हिन्दी अर्थ: (मुझे) दीदार दें; मेरे मन में यह तमन्ना है। (मेहर करें) मेरा यह मन आपकी भगती में टिक जाए। (गुरू नानक) अंधेरे में दीया जग उठा है। (उसके बताए हुए) नाम की बरकति से सारी सृष्टि पार लांघ रही है। हे भाई! आपका सेवक। हे पारब्रहम! आपका रूप गुरू नानक सारे जगत में प्रकट हुआ है।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

काची देह मोह फुनि बांधी सठ कठोर कुचील कुगिआनी ॥

सवये स्री मुखबाक्य महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काची देह मोह फुनि बांधी सठ कठोर कुचील कुगिआनी ॥
धावत भ्रमत रहनु नही पावत पारब्रहम की गति नही जानी ॥
जोबन रूप माइआ मद माता बिचरत बिकल बडौ अभिमानी ॥
पर धन पर अपवाद नारि निंदा यह मीठी जीअ माहि हितानी ॥
बलबंच छपि करत उपावा पेखत सुनत प्रभ अंतरजामी ॥
सील धरम दया सुच नास्ति आइओ सरनि जीअ के दानी ॥
कारण करण समरथ सिरीधर राखि लेहु नानक के सुआमी ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सवये स्री मुखबाक्य महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। मैं दुर्जन हूँ। कठोर-दिल हूँ। बुरे कामों में लगा रहता हूँ और मूर्ख हूँ। (एक तो पहले ही मेरा) शरीर सदा-स्थिर रहने वाला नहीं। ऊपर से बल्कि ये मोह में जकड़ा हुआ है। (इस मोह के कारण) भटकता फिरता हूँ। (मन) टिकता नहीं। और ना ही मैंने यह जाना है कि परमात्मा कैसा है। मैं जवानी, सुंदर शक्ल-सूरत और माया के माण में मस्त होया हुआ हूँ। अपने आप को भुला के भटक रहा हूँ और बड़ा अहंकारी हूँ। पराया धन, पराई बखीली। पराई स्त्री पर कु-दृष्टि से देखना और पराई निंदा, मेरे दिल को ये बातें मीठी और प्यारी लगती हैं। हे अंतजामी प्रभू! मैं छुप-छुप के ठॅगी (करने की) साजिशें रचता हूँ। (पर) आप देखते और सुनते हैं। हे जीवन दान देने वाले! मेरे में ना शील है ना धर्म; ना दया है ना सॅुच। मैं आपकी शरण आया हूँ। हे सृष्टी के समर्थ करतार! हे माया के मालिक! हे नानक के स्वामी! (मुझे इनसे) बचा लें। 1।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

कीरति करन सरन मनमोहन जोहन पाप बिदारन कउ ॥

कीरति करन सरन मनमोहन जोहन पाप बिदारन कउ ॥
हरि तारन तरन समरथ सभै बिधि कुलह समूह उधारन सउ ॥
चित चेति अचेत जानि सतसंगति भरम अंधेर मोहिओ कत धंउ ॥
मूरत घरी चसा पलु सिमरन राम नामु रसना संगि लउ ॥
होछउ काजु अलप सुख बंधन कोटि जनंम कहा दुख भंउ ॥
सिख्या संत नामु भजु नानक राम रंगि आतम सिउ रंउ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: मन को मोह लेने वाली हरी की सिफत-सालाह करनी और उसकी शरण पड़ना, (जीवों के) पापों के नाश करने के लिए ये समर्थ हैं (भाव, हरी की शरण पड़ कर उसका यश करें तो पाप दूर हो जाते हैं)। हरी (जीवों को संसार-सागर से) तैराने के लिए जहाज़ है और (भगत-जनों की अनेकों कुलों को पार उतारने के लिए पूरन तौर पर समर्थ है। हे (मेरे) गाफल मन! (राम को) सिमरें। साध-संगत के साथ सांझ डालें। भरम रूप अंधेरे के मोहित हुए (आप) किधर भटकते फिरते हैं। महूरत मात्र, घरी भर, रक्ती भर या पल भर ही राम का सिमरन करें। जीभ से राम का नाम सिमरें। (इस दुनिया का) धंधा सदा साथ निभने वाला नहीं। (माया के यह) थोड़े से सुख (जीव को) फसाने का कारण हैं; (इनकी खातिर) कहाँ करोड़ों जन्मों तक (आप) दुखों में भटकते फिरेंगे। इसलिए। हे नानक! संतों का उपदेश लेकर नाम सिमरें। और राम के रंग में (मगन हो के) अपने अंदर ही आनंद लें। 2।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

रंचक रेत खेत तनि निरमित दुरलभ देह सवारि धरी ॥

रंचक रेत खेत तनि निरमित दुरलभ देह सवारि धरी ॥
खान पान सोधे सुख भुंचत संकट काटि बिपति हरी ॥
मात पिता भाई अरु बंधप बूझन की सभ सूझ परी ॥
बरधमान होवत दिन प्रति नित आवत निकटि बिखंम जरी ॥
रे गुन हीन दीन माइआ क्रिम सिमरि सुआमी एक घरी ॥
करु गहि लेहु क्रिपाल क्रिपा निधि नानक काटि भरंम भरी ॥3॥

हिन्दी अर्थ: (हे जीव! परमात्मा ने पिता का) थोड़ा सा वीर्य माँ के पेट-रूप खेत में निर्मित किया और (आपका) अमोलक (मनुष्य) शरीर सजा के रख दिया। (उसने आपको) खाने-पीने के पदार्थ। महल-माढ़ियों को माणने के सुख बख्शे। संकट काट के आपकी बिपता दूर की। (हे जीव! परमात्मा की मेहर से) तब माता। पिता, भाई। साक-संबन्धी की आपके अंदर सूझ पड़ गई। दिनो-दिन सदा (आपका शरीर) बढ़-फूल रहा है और डरावना बुढ़ापा नजदीक आ रहा है। हे गुणों से रहित। कंगले। माया के कीड़े! एक घड़ी (तो) उस मालिक को याद करें (जिसने आपके ऊपर इतनी बख्शिशें की हैं)। हे दयालु! हे दया के समुंद्र! नानक का हाथ पकड़ लें और भरमों की पोटली उतार दें। 3।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

रे मन मूस बिला महि गरबत करतब करत महां मुघनां ॥

रे मन मूस बिला महि गरबत करतब करत महां मुघनां ॥
संपत दोल झोल संगि झूलत माइआ मगन भ्रमत घुघना ॥
सुत बनिता साजन सुख बंधप ता सिउ मोहु बढिओ सु घना ॥
बोइओ बीजु अहं मम अंकुरु बीतत अउध करत अघनां ॥
मिरतु मंजार पसारि मुखु निरखत भुंचत भुगति भूख भुखना ॥
सिमरि गुपाल दइआल सतसंगति नानक जगु जानत सुपना ॥4॥

हिन्दी अर्थ: हे मन! (आप इस शरीर में मान करते हैं जैसे) चूहा खुड (बिल) में रह के अहंकार करता है। और आप बड़े मूर्खों वाले काम करते हैं। (आप) माया के पंगूड़े में हुलारे ले के झूल रहे हैं। और माया में मस्त हो के उल्लू की तरह भटक रहे हैं। पुत्र, स्त्री, मित्र। (संसार के) सुख और संबन्धी, इनसे (आपका) बहुत मोह बढ़ रहा है। आपने (अपने अंदर) अहंकार का बीज बीजा हुआ है (जिससे) ममता का अंकुर (उग रहा है)। आपकी उम्र पाप करते हुए बीत रही है। मौत रूप बिल्ला मुँह खोल के (आपको) ताक रहा है। (पर) आप भोगों को भोग रहे हैं। फिर भी तृष्णा-अधीन (आप) भूखे ही हैं। हे नानक (के मन!) संसार को सपना जान के सत्संगति में (टिक के) गोपाल दयाल हरी को सिमरें। 4।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1387 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।