बलिओ चरागु अंध्यार महि सभ कलि उधरी इक नाम धरम ॥
प्रगटु सगल हरि भवन महि जनु नानकु गुरु पारब्रहम ॥९॥
सतिगुर प्रसादि ॥
काची देह मोह फुनि बांधी सठ कठोर कुचील कुगिआनी ॥
धावत भ्रमत रहनु नही पावत पारब्रहम की गति नही जानी ॥
जोबन रूप माइआ मद माता बिचरत बिकल बडौ अभिमानी ॥
पर धन पर अपवाद नारि निंदा यह मीठी जीअ माहि हितानी ॥
बलबंच छपि करत उपावा पेखत सुनत प्रभ अंतरजामी ॥
सील धरम दया सुच नास्ति आइओ सरनि जीअ के दानी ॥
कारण करण समरथ सिरीधर राखि लेहु नानक के सुआमी ॥१॥
हरि तारन तरन समरथ सभै बिधि कुलह समूह उधारन सउ ॥
चित चेति अचेत जानि सतसंगति भरम अंधेर मोहिओ कत धंउ ॥
मूरत घरी चसा पलु सिमरन राम नामु रसना संगि लउ ॥
होछउ काजु अलप सुख बंधन कोटि जनंम कहा दुख भंउ ॥
सिख्या संत नामु भजु नानक राम रंगि आतम सिउ रंउ ॥२॥
खान पान सोधे सुख भुंचत संकट काटि बिपति हरी ॥
मात पिता भाई अरु बंधप बूझन की सभ सूझ परी ॥
बरधमान होवत दिन प्रति नित आवत निकटि बिखंम जरी ॥
रे गुन हीन दीन माइआ क्रिम सिमरि सुआमी एक घरी ॥
करु गहि लेहु क्रिपाल क्रिपा निधि नानक काटि भरंम भरी ॥३॥
संपत दोल झोल संगि झूलत माइआ मगन भ्रमत घुघना ॥
सुत बनिता साजन सुख बंधप ता सिउ मोहु बढिओ सु घना ॥
बोइओ बीजु अहं मम अंकुरु बीतत अउध करत अघनां ॥
मिरतु मंजार पसारि मुखु निरखत भुंचत भुगति भूख भुखना ॥
सिमरि गुपाल दइआल सतसंगति नानक जगु जानत सुपना ॥४॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(मुझे) दीदार दे; मेरे मन में यह तमन्ना है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।