अंग 1387

अंग
1387
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
देहु दरसु मनि चाउ भगति इहु मनु ठहरावै ॥
बलिओ चरागु अंध्यार महि सभ कलि उधरी इक नाम धरम ॥
प्रगटु सगल हरि भवन महि जनु नानकु गुरु पारब्रहम ॥९॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (मुझे) दीदार दे; मेरे मन में यह तमन्ना है। (मेहर कर) मेरा यह मन आपकी भगती में टिक जाए। (गुरू नानक) अंधेरे में दीया जग उठा है। (उसके बताए हुए) नाम की बरकति से सारी सृष्टि पार लांघ रही है। हे भाई ! आपका सेवक। हे पारब्रहम ! आपका रूप गुरू नानक सारे जगत में प्रकट हुआ है।
सवये स्री मुखबाक्य महला ५
सतिगुर प्रसादि ॥
काची देह मोह फुनि बांधी सठ कठोर कुचील कुगिआनी ॥
धावत भ्रमत रहनु नही पावत पारब्रहम की गति नही जानी ॥
जोबन रूप माइआ मद माता बिचरत बिकल बडौ अभिमानी ॥
पर धन पर अपवाद नारि निंदा यह मीठी जीअ माहि हितानी ॥
बलबंच छपि करत उपावा पेखत सुनत प्रभ अंतरजामी ॥
सील धरम दया सुच नास्ति आइओ सरनि जीअ के दानी ॥
कारण करण समरथ सिरीधर राखि लेहु नानक के सुआमी ॥१॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सवये स्री मुखबाक्य महला ५ सतिगुर प्रसादि ॥ मैं दुर्जन हूँ। कठोर-दिल हूँ। बुरे कामों में लगा रहता हूँ और मूर्ख हूँ। (एक तो पहले ही मेरा) शरीर सदा-स्थिर रहने वाला नहीं। ऊपर से बल्कि ये मोह में जकड़ा हुआ है। (इस मोह के कारण) भटकता फिरता हूँ। (मन) टिकता नहीं। और ना ही मैंने यह जाना है कि परमात्मा कैसा है। मैं जवानी। सुंदर शक्ल-सूरत और माया के माण में मस्त होया हुआ हूँ। अपने आप को भुला के भटक रहा हूँ और बड़ा अहंकारी हूँ। पराया धन। पराई बखीली। पराई स्त्री पर कु-दृष्टि से देखना और पराई निंदा- मेरे दिल को ये बातें मीठी और प्यारी लगती हैं। हे अंतजामी प्रभू ! मैं छुप-छुप के ठॅगी (करने की) साजिशें रचता हूँ। (पर) आप देखता और सुनता है। हे जीवन दान देने वाले ! मेरे में ना शील है ना धर्म; ना दया है ना सॅुच। मैं आपकी शरण आया हूँ। हे सृष्टी के समर्थ करतार ! हे माया के मालिक ! हे नानक के स्वामी ! (मुझे इनसे) बचा ले। 1।
कीरति करन सरन मनमोहन जोहन पाप बिदारन कउ ॥
हरि तारन तरन समरथ सभै बिधि कुलह समूह उधारन सउ ॥
चित चेति अचेत जानि सतसंगति भरम अंधेर मोहिओ कत धंउ ॥
मूरत घरी चसा पलु सिमरन राम नामु रसना संगि लउ ॥
होछउ काजु अलप सुख बंधन कोटि जनंम कहा दुख भंउ ॥
सिख्या संत नामु भजु नानक राम रंगि आतम सिउ रंउ ॥२॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: मन को मोह लेने वाली हरी की सिफत-सालाह करनी और उसकी शरण पड़ना- (जीवों के) पापों के नाश करने के लिए ये समर्थ हैं (भाव। हरी की शरण पड़ कर उसका यश करें तो पाप दूर हो जाते हैं)। हरी (जीवों को संसार-सागर से) तैराने के लिए जहाज़ है और (भगत-जनों की अनेकों कुलों को पार उतारने के लिए पूरन तौर पर समर्थ है। हे (मेरे) गाफल मन ! (राम को) सिमर। साध-संगत के साथ सांझ डाल। भरम रूप अंधेरे का मोहित हुआ (आप) किधर भटकता फिरता है। महूरत मात्र। घरी भर। रक्ती भर या पल भर ही राम का सिमरन कर। जीभ से राम का नाम सिमर। (इस दुनिया का) धंधा सदा साथ निभने वाला नहीं। (माया के यह) थोड़े से सुख (जीव को) फसाने का कारण हैं; (इनकी खातिर) कहाँ करोड़ों जन्मों तक (आप) दुखों में भटकता फिरेगा। इसलिए। हे नानक ! संतों का उपदेश लेकर नाम सिमर। और राम के रंग में (मगन हो के) अपने अंदर ही आनंद ले। 2।
रंचक रेत खेत तनि निरमित दुरलभ देह सवारि धरी ॥
खान पान सोधे सुख भुंचत संकट काटि बिपति हरी ॥
मात पिता भाई अरु बंधप बूझन की सभ सूझ परी ॥
बरधमान होवत दिन प्रति नित आवत निकटि बिखंम जरी ॥
रे गुन हीन दीन माइआ क्रिम सिमरि सुआमी एक घरी ॥
करु गहि लेहु क्रिपाल क्रिपा निधि नानक काटि भरंम भरी ॥३॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (हे जीव ! परमात्मा ने पिता का) थोड़ा सा वीर्य माँ के पेट-रूप खेत में निर्मित किया और (आपका) अमोलक (मनुष्य) शरीर सजा के रख दिया। (उसने आपको) खाने-पीने के पदार्थ। महल-माढ़ियों को माणने के सुख बख्शे। संकट काट के आपकी बिपता दूर की। (हे जीव ! परमात्मा की मेहर से) तब माता। पिता। भाई। साक-संबन्धी की आपके अंदर सूझ पड़ गई। दिनो-दिन सदा (आपका शरीर) बढ़-फूल रहा है और डरावना बुढ़ापा नजदीक । हे गुणों से रहित। कंगले। माया के कीड़े ! एक घड़ी (तो) उस मालिक को याद कर (जिसने आपके ऊपर इतनी बख्शिशें की हैं)। हे दयालु ! हे दया के समुंद्र ! नानक का हाथ पकड़ ले और भरमों की पोटली उतार दे। 3।
रे मन मूस बिला महि गरबत करतब करत महां मुघनां ॥
संपत दोल झोल संगि झूलत माइआ मगन भ्रमत घुघना ॥
सुत बनिता साजन सुख बंधप ता सिउ मोहु बढिओ सु घना ॥
बोइओ बीजु अहं मम अंकुरु बीतत अउध करत अघनां ॥
मिरतु मंजार पसारि मुखु निरखत भुंचत भुगति भूख भुखना ॥
सिमरि गुपाल दइआल सतसंगति नानक जगु जानत सुपना ॥४॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे मन ! (आप इस शरीर में माण करता है जैसे) चूहा खुड (बिल) में र हके हंकार करता है। और आप बड़े मूर्खों वाले काम करता है। (आप) माया के पंगूड़े में हुलारे ले के झूल रहा है। और माया में मस्त हैं के उल्लू की तरह भटक रहा है। पुत्र। स्त्री। मित्र। (संसार के) सुख और संबन्धी -इनसे (आपका) बहुत मोह बढ़ रहा है। तूने (अपने अंदर) अहंकार का बीज बीजा हुआ है (जिससे) ममता का अंगूर (उग रहा है)। आपकी उम्र पाप करते हुए बीत रही है। मौत रूप बिल्ला मुँह खोल के (आपको) ताक रहा है। (पर) आप भोगों को भोग रहा है। फिर भी तृष्णा-अधीन (आप) भूखा ही है। हे नानक (के मन !) संसार को सपना जान के सत्संगति में (टिक के) गोपाल दयाल हरी को सिमर। 4।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(मुझे) दीदार दे; मेरे मन में यह तमन्ना है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।