लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1386 · सवैये

इस पृष्ठ पर
अंग
1386
सवैये
अंग बदलें या अंश चुनें · 7 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. आप ही धारन धारे कुदरति है देखारे बरनु चिहनु नाही मुख न मसारे ॥
  2. सरब गुण निधानं कीमति न ग्यानं ध्यानं ऊचे ते ऊचौ जानीजै प्रभ तेरो थानं ॥
  3. निरंकारु आकार अछल पूरन अबिनासी ॥
  4. सति सति हरि सति सति सते सति भणीऐ ॥
  5. सचु सभा दीबाणु सचु सचे पहि धरिओ ॥
  6. कवनु जोगु कउनु ग्यानु ध्यानु कवन बिधि उस्तति करीऐ ॥
  7. प्रभ दातउ दातार पर्यिउ जाचकु इकु सरना ॥

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

आप ही धारन धारे कुदरति है देखारे बरनु चिहनु नाही मुख न मसारे ॥

अंग 1385 से चला आ रहा अंश

आप ही धारन धारे कुदरति है देखारे बरनु चिहनु नाही मुख न मसारे ॥
जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥
हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥3॥

हिन्दी अर्थ: (हरी) स्वयं ही सारे जगत को आसरा दे रहा है। अपनी कुदरति दिखा रहा है। ना (उसका कोई) रंग है ना (कोई) निशान, ना मुँह। और ना दाढ़ी। हरी का भगत दास (गुरू) नानक (हरी के) दर पर प्रवान (हुआ है) और हरी जैसा है। (मेरी) एक जीभ (उस गुरू नानक के) क्या (गुण) कह सकती है। मैं (गुरू नानक से) सदके हूँ, सदके हूँ। सदा सदके हूँ। 3।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

सरब गुण निधानं कीमति न ग्यानं ध्यानं ऊचे ते ऊचौ जानीजै प्रभ तेरो थानं ॥

सरब गुण निधानं कीमति न ग्यानं ध्यानं ऊचे ते ऊचौ जानीजै प्रभ तेरो थानं ॥
मनु धनु तेरो प्रानं एकै सूति है जहानं कवन उपमा देउ बडे ते बडानं ॥
जानै कउनु तेरो भेउ अलख अपार देउ अकल कला है प्रभ सरब को धानं ॥
जनु नानकु भगतु दरि तुलि ब्रहम समसरि एक जीह किआ बखानै ॥
हां कि बलि बलि बलि बलि सद बलिहारि ॥4॥

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू! आप सारे गुणों का खजाना हैं। आपके ज्ञान का और (आपके में) ध्यान (जोड़ने) का मूल्य नहीं (पड़ सकता)। आपका ठिकाना ऊँचे से ऊँचा सुना जाता है। (हे प्रभू!) मेरा मन, मेरा धन और मेरे प्राण, ये सब आपके ही दिए हुए हैं। सारा संसार आपकी एक ही सक्ता में है (भाव, सक्ता के आसरे है)। मैं किस का नाम बताऊँ जो आपके बराबर का हैं। आप बड़ों से भी बड़े हैं। हे प्रभू! आपका भेद कौन जान सकता है। हे अलख! हे अपार! हे प्रकाश-रूप! आपकी सक्ता (सब जगह) एक-रस है। आप सारे जीवों का आसरा हैं। हे प्रभू! (आपका भगत सेवक (गुरू) नानक (आपके) दर पर प्रवान (हुआ है) और (हे प्रभू! आपके) ब्रहम जैसा है। (मेरी) एक जीभ (उस गुरू नानक के) क्या (गुण) कह सकती है। मैं (गुरू नानक से) सदके हूँ, सदके हूँ। सदा सदके हूँ। 4।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

निरंकारु आकार अछल पूरन अबिनासी ॥

निरंकारु आकार अछल पूरन अबिनासी ॥
हरखवंत आनंत रूप निरमल बिगासी ॥
गुण गावहि बेअंत अंतु इकु तिलु नही पासी ॥
जा कउ होंहि क्रिपाल सु जनु प्रभ तुमहि मिलासी ॥
धंनि धंनि ते धंनि जन जिह क्रिपालु हरि हरि भयउ ॥
हरि गुरु नानकु जिन परसिअउ सि जनम मरण दुह थे रहिओ ॥5॥

हिन्दी अर्थ: आप वर्णों-चिन्हों से बाहर के हैं। और स्वरूप वाले भी हैं; आपको कोई छल नहीं सकता। आप सब जगह व्यापक हैं। और कभी नाश होने वाले नहीं। आपके बेअंत स्वरूप हैं। आप शुद्ध-स्वरूप हैं और जाहरा-जहूर हैं। बेअंत जीव आपके गुण गाते हैं। पर आपका अंत थोड़ा सा भी नहीं पड़ता (जाना जा सकता)। हे प्रभू! जिस पर आप दयावान होते हैं। वह मनुष्य आपको मिल जाता है। भाग्यशाली हैं वे मनुष्य। जिन पर हरी दयावान हुआ है। जिन मनुष्यों ने (उपरोक्त गुणों वाले) हरी के रूप गुरू नानक को परसा है। वे जनम-मरण दोनों से बच रहे हैं। 5।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

सति सति हरि सति सति सते सति भणीऐ ॥

सति सति हरि सति सति सते सति भणीऐ ॥
दूसर आन न अवरु पुरखु पऊरातनु सुणीऐ ॥
अंम्रितु हरि को नामु लैत मनि सभ सुख पाए ॥
जेह रसन चाखिओ तेह जन त्रिपति अघाए ॥
जिह ठाकुरु सुप्रसंनु भयोु सतसंगति तिह पिआरु ॥
हरि गुरु नानकु जिन॑ परसिओ तिन॑ सभ कुल कीओ उधारु ॥6॥

हिन्दी अर्थ: महात्मा लोग सदा कहते आए हैं कि हरी सदा अटल है। सदा कायम रहने वाला है; वह पुरातन पुरख सुना जाता है (भाव, सबका आदि है) कोई और दूसरा उसके जैसा नहीं। हे मन! जिन्होंने हरी का आत्मिक जीवन देने वाला नाम लिया है। उनको सारे सुख मिल गए हैं। जिन्होंने (नाम-अमृत) जीभ से चखा है। वे मनुष्य तृप्त हो गए हैं (भाव, और रसों की उनको तमन्ना नहीं रही)। जिन मनुष्यों पर मालिक-प्रभू दयावान हुआ है। उनका साध-संगति में प्रेम (पड़ गया है)। (इस तरह के) हरी-रूप गुरू नानक (के चरणों) को जिन्होंने परसा है। उन मनुष्यों ने अपनी सारी कुल का उद्धार कर लिया है। 6।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

सचु सभा दीबाणु सचु सचे पहि धरिओ ॥

सचु सभा दीबाणु सचु सचे पहि धरिओ ॥
सचै तखति निवासु सचु तपावसु करिओ ॥
सचि सिरज्यिउ संसारु आपि आभुलु न भुलउ ॥
रतन नामु अपारु कीम नहु पवै अमुलउ ॥
जिह क्रिपालु होयउ गोुबिंदु सरब सुख तिनहू पाए ॥
हरि गुरु नानकु जिन॑ परसिओ ते बहुड़ि फिरि जोनि न आए ॥7॥

हिन्दी अर्थ: (अकाल पुरख की) सभा सदा अटल रहने वाली है। (उसकी) कचहरी सदा-स्थिर है; (अकाल-पुरख ने अपना आप) अपने सदा-स्थिर-रूप गुरू के पास रखा हुआ है; (भाव, हरी गुरू के माध्यम से मिलता है)। (अकाल-पुरख का) ठिकाना सदा कायम रहने वाला है और वह सदा (सच्चा) न्याय करता है। सदा स्थिर सच्चे (अकाल-पुरख) ने जगत को रचा है। वह स्वयं कभी गलती नहीं करता। कभी भूल नहीं करता। (अकाल-पुरख का) श्रेष्ठ नाम (भी) बेअंत है, अमूल्य है। (उसके नाम का) मूल्य नहीं पाया जा सकता। जिन मनुष्यों पर अकाल-पुरख दयावान हुआ है। उनको ही सारे सुख मिले हैं। (ऐसे गुणों वाले) अकाल-पुरख के रूप नानक (के चरनों) को जिन्होंने परसा है। वे फिर पलट के जनम (-मरण) में नहीं आते। 7।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

कवनु जोगु कउनु ग्यानु ध्यानु कवन बिधि उस्तति करीऐ ॥

कवनु जोगु कउनु ग्यानु ध्यानु कवन बिधि उस्तति करीऐ ॥
सिध साधिक तेतीस कोरि तिरु कीम न परीऐ ॥
ब्रहमादिक सनकादि सेख गुण अंतु न पाए ॥
अगहु गहिओ नही जाइ पूरि स्रब रहिओ समाए ॥
जिह काटी सिलक दयाल प्रभि सेइ जन लगे भगते ॥
हरि गुरु नानकु जिन॑ परसिओ ते इत उत सदा मुकते ॥8॥

हिन्दी अर्थ: कौन से योग (का साधन) करें। कौन सा ज्ञान (विचारें)। कौन सा ध्यान (धरें)। वह कौन सी जुगति बरतें जिससे अकाल-पुरख के गुण गा सकें। सिद्ध, साधिक और तैतिस करोड़ देवताओं से भी अकाल-पुरख की थोड़ी सी भी कीमत नहीं पड़ सकी। ब्रहमा व अन्य देवतागण (ब्रहमा के पुत्र) सनक आदिक और शेशनाग। अकाल-पुरख के गुणों का अंत ना पा सके। (अकाल-पुरख मनुष्यों की) समझ से ऊँचा है। उसकी गति नहीं पाई जा सकती। सब जगह व्यापक है और सबमें रमा हुआ है। दयालु प्रभू ने जिन मनुष्यों के (माया के मोह का) फंदा काट दिया है। वे मनुष्य उसकी भगती में जुड़ गए हैं। (इस तरह के उपरोक्त गुणों वाले) हरी के रूप गुरू नानक जिन्होंने पसरा है। वह जीव लोक-परलोक में माया के बँधनों से बचे हुए हैं।

गुरु अर्जन देव जी · सवैया

प्रभ दातउ दातार पर्यिउ जाचकु इकु सरना ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

प्रभ दातउ दातार पर्यिउ जाचकु इकु सरना ॥
मिलै दानु संत रेन जेह लगि भउजलु तरना ॥
बिनति करउ अरदासि सुनहु जे ठाकुर भावै ॥

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू! हे दाते! हे दातार! मैं एक जाचिक आपकी शरण आया हूँ। (मुझ मंगते को) सत्संगियों के चरणों की धूड़ की ख़ैर मिल जाए। ता कि इस धूड़ की ओट ले के मैं (संसार के) भवजल से पार लांघ सकूँ। हे ठाकुर! यदि आपको अच्छा लगे तो (मेहर करके मेरी) अरजोई सुनें। मैं एक विनती करता हूं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1386 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।