भद्रायु

वसन्त के दिन थे। वन की डालियाँ बौर से लदी थीं, हवा में फूलों की गंध घुली थी, और उसी गहन वन में उस दिन एक राजसी सवारी उतरी। राजा भद्रायु अपनी धर्मपत्नी कीर्तिमालिनी के साथ वन-विहार के लिये पधारे थे। यह वही भद्रायु थे जिनका परिचय इस कथा से पहले दिया जा चुका था, जिन पर भगवान् शिव ने ऋषभ रूप धारण करके अनुग्रह किया था। उसी ऋषभ के प्रभाव से रणभूमि में शत्रुओं को जीतकर वह शक्तिशाली राजकुमार राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ था, और राजा चन्द्राङ्गद तथा रानी सीमन्तिनी की बेटी, सती-साध्वी कीर्तिमालिनी के साथ उसका विवाह हुआ था।

यह प्रसंग नन्दीश्वर जी ने छेड़ा था। सनत्कुमार जी को शिव के अवतारों की कथाएँ सुनाते हुए जब वैद्यनाथ अवतार का वर्णन पूरा हुआ, तब वे बोले, तात, अब सुनिए कि उन्हीं नरेश के धर्म की परीक्षा लेने के लिये भगवान् फिर द्विजेश्वर रूप से, यानी ब्राह्मण के वेश में, प्रकट हुए।

बात यह थी कि रानी कीर्तिमालिनी शरणागत जनों का पालन करने वाली थीं, और राजा का भी ऐसा ही नियम था। इस राजदम्पति की धर्म में कितनी दृढ़ता है, इसे परखने के लिये पार्वती सहित भगवान् शिव ने एक लीला रची। शिव और शिवा उस वन में ब्राह्मण और ब्राह्मणी के रूप में प्रकट हुए, और दोनों ने लीला ही लीला में एक मायामय व्याघ्र गढ़ लिया।

व्याघ्र, चीख और खाली बाण

अब दृश्य देखिए। वन के रास्ते पर एक ब्राह्मण-दम्पति रोता-चिल्लाता थोड़ी ही दूर आगे आगे भागा चला आ रहा है, और पीछे पीछे वह व्याघ्र। भय से विह्वल दोनों महाराज की शरण में पहुँचे और गिड़गिड़ाकर बोले, महाराज, रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। वह व्याघ्र हम दोनों को खाने के लिये चला आ रहा है। समस्त प्राणियों को काल के गाल में पहुँचा देने वाला यह हिंसक जीव हमें अपना ग्रास बनाये, उसके पहले ही आप हम दोनों को बचा लीजिये।

उन दोनों का करुण क्रन्दन सुनकर महाराज ने ज्यों ही धनुष उठाया, त्यों ही व्याघ्र निकट आ पहुँचा और उसने ब्राह्मणी को पकड़ लिया। वह बेचारी हा नाथ, हा प्राणवल्लभ, हा शम्भो, कहकर रोने और विलाप करने लगी। भद्रायु ने तीखे बाणों से उसके मर्म पर आघात किया, पर अचरज देखिए, उन बाणों से उस महाबली व्याघ्र को खरोंच तक नहीं आयी। वह ब्राह्मणी को बलपूर्वक घसीटता हुआ दूर निकल गया।

अपनी पत्नी को व्याघ्र के मुख में गयी देख ब्राह्मण को बड़ा दुःख हुआ और वह बारंबार रोने लगा। देर तक रोकर उसने राजा भद्रायु से कहा, राजन्, आपके वे बड़े बड़े अस्त्र कहाँ हैं? दुखियों की रक्षा करने वाला आपका विशाल धनुष कहाँ है? सुना था कि आपमें बारह हजार बड़े बड़े हाथियों का बल है। वह बल क्या हुआ? आपके शंख, खड्ग और मन्त्र-अस्त्र की विद्या से क्या लाभ हुआ? दूसरों को संकट से बचाना क्षत्रिय का परम धर्म है। धर्मात्मा राजा अपना धन और प्राण देकर भी शरण में आये दीन-दुखियों की रक्षा करते हैं। जो पीड़ितों के प्राण नहीं बचा सकते, ऐसे लोगों के लिये तो जीने की अपेक्षा मर जाना ही अच्छा है।

ब्राह्मण का विलाप और उसके मुख से अपने पराक्रम की निन्दा सुनकर राजा शोक में डूब गये। मन ही मन सोचने लगे, अहो, आज भाग्य के उलट-फेर से हमारा पराक्रम नष्ट हो गया, हमारे धर्म का भी नाश हो गया। अब सम्पदा, राज्य और आयु का भी निश्चय ही नाश हो जायगा। यों विचारकर राजा भद्रायु ब्राह्मण के चरणों में गिर पड़े और उसे धीरज बँधाते हुए बोले, ब्रह्मन्, हमारा पराक्रम नष्ट हो गया है। महामते, कृपा करके शोक छोड़ दीजिये। हम आपको मुँहमाँगा पदार्थ देंगे। यह राज्य, यह रानी और हमारा यह शरीर, सब कुछ आपके अधीन है। बोलिये, आप क्या चाहते हैं?

ब्राह्मण की अनोखी माँग

ब्राह्मण बोला, राजन्, अंधे को दर्पण से क्या काम? जो भिक्षा माँगकर जीवन-निर्वाह करता हो, वह बहुत से घर लेकर क्या करेगा? जो मूर्ख है, उसे पुस्तक से क्या काम? और जिसके पास स्त्री ही नहीं है, वह धन लेकर क्या करेगा? मेरी पत्नी चली गयी, और मैंने कभी काम-सुख का उपभोग नहीं किया। अतः काम-भोग के लिये आप अपनी यह बड़ी रानी मुझे दे दीजिये।

सुनकर राजा सन्न रह गये। बोले, ब्रह्मन्, क्या यही आपका धर्म है? क्या आपको यही उपदेश मिला है? क्या आप नहीं जानते कि परायी स्त्री का स्पर्श स्वर्ग और यश दोनों की हानि करने वाला है? परस्त्री के उपभोग से जो पाप कमाया जाता है, वह प्रायश्चित्तों के द्वारा भी धोया नहीं जा सकता।

पर ब्राह्मण टस से मस न हुआ। बोला, राजन्, मैं अपनी तपस्या से मदिरापान जैसे भयंकर पापों का भी नाश कर डालूँगा, फिर परस्त्री-संगम किस गिनती में है? अतः आप अपनी यह भार्या मुझे अवश्य दे दीजिये, अन्यथा आप निश्चय ही नरक में पड़ेंगे।

अब राजा के भीतर धर्म की तराजू काँपने लगी। उन्होंने मन ही मन विचार किया कि ब्राह्मण के प्राणों की रक्षा न करने से महापाप होगा, अतः उससे बचने के लिये पत्नी को दे देना ही श्रेष्ठ है। इस श्रेष्ठ ब्राह्मण को अपनी पत्नी देकर हम पाप से मुक्त होंगे और शीघ्र ही अग्नि में प्रवेश कर जायँगे। ऐसा निश्चय करके राजा ने आग जलायी और ब्राह्मण को बुलाकर उसे अपनी पत्नी दे दी। फिर स्नान करके पवित्र हुए, देवताओं को प्रणाम किया, अग्नि की दो बार परिक्रमा की, और एकाग्रचित्त होकर भगवान् शिव का ध्यान करने लगे।

अग्नि के किनारे विश्वनाथ

राजा को अग्नि में गिरने के लिये उद्यत देख जगत्पति भगवान् विश्वनाथ सहसा वहीं प्रकट हो गये। पाँच मुख थे। मस्तक पर चन्द्रकला आभूषण का काम दे रही थी। कुछ कुछ पीले रंग की जटाएँ लटक रही थीं। तेज ऐसा, मानो कोटि-कोटि सूर्य एक साथ उगे हों। हाथों में त्रिशूल, खट्वाङ्ग, कुठार, ढाल, मृग, अभय, वरद और पिनाक। बैल की पीठ पर बैठे भगवान् नीलकण्ठ को राजा ने अपने सामने प्रत्यक्ष देखा, और दर्शन के आनन्द में डूबे भद्रायु हाथ जोड़कर स्तवन करने लगे।

राजा की स्तुति से पार्वती के साथ प्रसन्न हुए महेश्वर बोले, राजन्, आपने किसी और का चिन्तन न करके सदा-सर्वदा हमारा पूजन किया है। आपकी इस भक्ति के कारण और आपकी की हुई यह पवित्र स्तुति सुनकर हम बहुत प्रसन्न हुए हैं। आपके भक्तिभाव की परीक्षा के लिये हम स्वयं ब्राह्मण बनकर आये थे। जिसे व्याघ्र उठा ले गया था, वह ब्राह्मणी और कोई नहीं, स्वयं गिरिराजनन्दिनी उमादेवी थीं। और जिस व्याघ्र के शरीर पर आपके बाणों की चोट नहीं लगी, वह माया का बना था। आपका धैर्य देखने के लिये ही हमने आपकी पत्नी माँगी थी। इस कीर्तिमालिनी की और आपकी भक्ति से हम संतुष्ट हैं। कोई दुर्लभ वर माँगिये, हम देंगे।

राजा बोले, देव, आप साक्षात् परमेश्वर हैं। संसार के तापों में घिरे हुए मुझको आपने प्रत्यक्ष दर्शन दिया, यही मेरे लिये महान् वर है। आप वर देने वालों में श्रेष्ठ हैं, पर आगे मैं और कोई वर नहीं माँगता। मेरी बस यही इच्छा है कि मैं, मेरी रानी, मेरे माता-पिता, पद्माकर वैश्य और उसका पुत्र सुनय, इन सबको आप अपना पार्श्ववर्ती सेवक बना लीजिये।

तत्पश्चात् रानी कीर्तिमालिनी ने प्रणाम करके अपनी भक्ति से भगवान् शंकर को प्रसन्न किया और यह उत्तम वर माँगा कि महादेव, मेरे पिता चन्द्राङ्गद और माता सीमन्तिनी, इन दोनों को भी आपके समीप निवास प्राप्त हो। भक्तवत्सल गौरीपति ने प्रसन्न होकर एवमस्तु कहा, और उन दोनों पति-पत्नी को इच्छा के अनुसार वर देकर वे क्षण भर में अन्तर्धान हो गये।

इधर राजा ने भगवान् शंकर का प्रसाद पाकर रानी कीर्तिमालिनी के साथ प्रिय भोगों का सुख लिया और दस हजार वर्षों तक राज्य करने के बाद अपने पुत्र को राज्य सौंपकर शिवजी के परमपद को प्राप्त किया। राजा और रानी दोनों ही भक्तिपूर्वक महादेव जी की पूजा करके भगवान् शिव के धाम को पहुँचे।

और अन्त में इस कथा का फल भी सुन लीजिये, जैसा ग्रन्थ स्वयं कहता है। भगवान् शिव का यह परम पवित्र और गोपनीय चरित जो विद्वानों को सुनाता है, अथवा स्वयं शुद्ध चित्त होकर सुनता है, वह इस लोक में भोग और ऐश्वर्य पाकर अन्त में भगवान् शिव को प्राप्त होता है।

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), शतरुद्रसंहिता