हनुमान: शिव के अवतार

कैलास की उस कथा-सभा का दृश्य आँखों के आगे लाइए। ग्यारह रुद्रों का आख्यान अभी पूरा ही हुआ था, सनत्कुमार जी आगे की जिज्ञासा लिये बैठे थे, और शिव के प्रिय पार्षद नन्दीश्वर जी ने कथा का नया सूत्र उठाया। बोले, महामुने, अब आप शम्भु का एक और चरित प्रेमपूर्वक सुनिए, जिसमें शंकर जी धर्म के लिये दुर्वासा होकर प्रकट हुए। और उसी के आगे वह कथा भी, जिसमें महेश्वर ने वानर-देह धारण करके भगवान श्रीराम का परम हित किया।

अत्रि के आश्रम में तीन वरदान

पूर्वकाल की बात है। अनसूया के पति, ब्रह्मवेत्ता तपस्वी अत्रि मुनि ब्रह्मा जी के निर्देश के अनुसार पत्नीसहित ऋक्षकुल पर्वत पर गये और पुत्र की कामना से घोर तप करने लगे। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर, तीनों उनके आश्रम पर पधारे और बोले, हम तीनों संसार के ईश्वर हैं। हमारे अंश से आपके यहाँ तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोकी में विख्यात होंगे और माता-पिता का यश बढ़ानेवाले होंगे। इतना कहकर तीनों देव चले गये।

वरदान समय पाकर फला। ब्रह्मा जी के अंश से चन्द्रमा हुए, वही चन्द्रमा जो देवताओं के द्वारा समुद्र में डाले जाने पर समुद्र से प्रकट हुए थे। विष्णु के अंश से दत्त उत्पन्न हुए, जिन्होंने श्रेष्ठ संन्यास-पद्धति को प्रचलित किया। और रुद्र के अंश से मुनिवर दुर्वासा ने जन्म लिया। यही शिव का दुर्वासावतार है।

दुर्वासा की कसौटियाँ

अब इन मुनिवर के चरित देखिए। इन्होंने महाराज अम्बरीष की परीक्षा की। जब सुदर्शन चक्र ने इनका पीछा किया, तब शिव जी के आदेश से, अम्बरीष के प्रार्थना करने पर वह चक्र शान्त हुआ।

इन्होंने भगवान श्रीराम की भी परीक्षा की। हुआ यों कि काल ने मुनि का वेष धारण करके श्रीराम से यह शर्त ठहरायी थी कि हमारे साथ बात होते समय श्रीराम के पास कोई न आये; जो आयेगा, उसका निर्वासन कर दिया जायेगा। ठीक उसी घड़ी दुर्वासा जी आ पहुँचे और हठ करके लक्ष्मण को भीतर भेज दिया। वचन के पक्के श्रीराम ने उसी क्षण लक्ष्मण का त्याग कर दिया।

इन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की परीक्षा ली और उन्हें रुक्मिणीसहित रथ में जोत दिया। इस प्रकार दुर्वासा मुनि ने अनेक विचित्र चरित किये। सोचिए, जिन कठिन परीक्षाओं से बड़े-बड़े धर्मात्मा गुजरे, उनके पीछे स्वयं रुद्र का अंश खड़ा था।

मोहिनी-रूप और राम-कार्य का बीज

नन्दीश्वर जी ने कहा, मुने, अब इसके बाद आप हनुमान जी का चरित्र सुनिए। हनुमद्रूप से शिव जी ने बड़ी उत्तम लीलाएँ की हैं, और इसी रूप से महेश्वर ने भगवान श्रीराम का परम हित किया। वह सारा चरित सब प्रकार के सुखों का दाता है, इसलिये इसे प्रेमपूर्वक सुनिए।

एक समय की बात है। अद्भुत लीलाएँ करनेवाले गुणशाली भगवान शम्भु को विष्णु के मोहिनी-रूप का दर्शन हुआ, और वे कामदेव के बाणों से बिंधे हुए की भाँति क्षुब्ध हो उठे। उस समय उन परमेश्वर ने राम-कार्य की सिद्धि के लिये अपना वीर्यपात किया। पुराण यहाँ बार-बार यही दोहराता है कि यह सब राम-कार्य के लिये हुआ; लीला में भी प्रयोजन था।

सप्तर्षियों ने उस तेज को पत्तों के दोने में सँभालकर रख लिया, क्योंकि शिव जी ने ही राम-कार्य के लिये आदरपूर्वक उनके मन में प्रेरणा कर दी थी। फिर उन महर्षियों ने वह तेज गौतम-कन्या अंजनी के भीतर कान के मार्ग से स्थापित कर दिया, राम-कार्य की सिद्धि के लिये ही।

समय आने पर उसी गर्भ से स्वयं शम्भु महान बल-पराक्रम से सम्पन्न वानर-शरीर धारण करके प्रकट हुए। उनका नाम हनुमान रखा गया। लोक में इनके जन्म की और भी धाराएँ चलती हैं, पर शिवपुराण का वर्णन यही है; यहाँ हनुमान साक्षात रुद्र के अंशभूत, शिव के अवतार हैं।

सूर्य को फल समझनेवाला शिशु

अब उस शिशु का पहला पराक्रम सुनिए। महाबली कपीश्वर हनुमान अभी शिशु ही थे कि उगते हुए सूर्यबिम्ब पर दृष्टि पड़ी, तो उसे छोटा-सा फल समझकर तुरन्त निगल गये। देवताओं ने प्रार्थना की, तब उन्होंने उसे महाबली सूर्य जानकर उगल दिया। यह देखकर देवर्षियों ने इन्हें शिव का अवतार माना और बहुत-से वरदान दिये।

वरदानों से हर्षित हनुमान अपनी माता के पास गये और सारा वृत्तान्त आदरपूर्वक कह सुनाया। फिर माता की आज्ञा लेकर सूर्य के निकट पहुँचे और उन्हीं से सारी विद्याएँ पढ़ लीं। जिस सूर्य को कभी फल समझकर निगल गये थे, उसी को गुरु बना लिया, यह भी इस चरित की अपनी छटा है। तदनन्तर रुद्र के अंशभूत कपिश्रेष्ठ हनुमान सूर्य की आज्ञा से, सूर्य के ही अंश से उत्पन्न सुग्रीव के पास चले गये। इसके लिये उन्हें अपनी माता की भी अनुज्ञा मिल चुकी थी।

रामदूत

तदनन्तर नन्दीश्वर जी ने भगवान श्रीराम का सम्पूर्ण चरित संक्षेप से कह सुनाया और बोले, मुने, इस प्रकार कपिश्रेष्ठ हनुमान ने सब तरह से श्रीराम का कार्य पूरा किया। नाना प्रकार की लीलाएँ कीं, असुरों का मान-मर्दन किया, भूतल पर रामभक्ति की स्थापना की, और स्वयं भक्तों में अग्रगण्य होकर सीता-राम को सुख दिया।

वे रुद्रावतार ऐश्वर्यशाली हनुमान लक्ष्मण के प्राणदाता हैं और भक्तों का उद्धार करनेवाले हैं। महावीर हनुमान सदा राम-कार्य में तत्पर रहनेवाले हैं, लोक में रामदूत नाम से विख्यात हैं, दैत्यों के संहारक हैं और भक्तवत्सल हैं।

अन्त में नन्दीश्वर जी ने इस आख्यान का फल कहा। तात, यह श्रेष्ठ चरित धन, कीर्ति और आयु का वर्धक है तथा सम्पूर्ण अभीष्ट फलों का देनेवाला है। जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक सुनता है, अथवा एकाग्र चित्त से दूसरों को सुनाता है, वह इस लोक में सम्पूर्ण भोगों को भोगकर अन्त में परम मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

सो देखिए, एक ही रुद्र के दो रूप। दुर्वासा होकर उन्होंने धर्म को कसौटी पर कसा, और हनुमान होकर उसी धर्म को अपना कंधा दिया। परीक्षा भी शिव की, पार लगाना भी शिव का।

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), शतरुद्रसंहिता