स्वर्ग की सीढ़ियों पर अब देवताओं के पाँव नहीं पड़ते थे। जहाँ कभी इन्द्र का सिंहासन था, वहीं एक दैत्य विराजता था, और तीनों लोक उसकी एक भौंह के इशारे पर काँपते थे। जब नारदजी ने पितामह ब्रह्मा से पूछा कि पार्वती का विवाह किस कारण इतना आवश्यक हो उठा, तब ब्रह्माजी ने वह कथा आरम्भ की जो तारकासुर के जन्म से चलती है। उन्होंने बताया कि उस असुर ने कैसा उग्र तप किया, कैसे अपना मनचाहा वरदान पा लिया, और फिर देवता और असुर, सबको जीतकर वह स्वयं इन्द्र के पद पर जा बैठा।
तीनों लोक एक मुट्ठी में
ब्रह्माजी कहते हैं, तारकासुर जब तीनों लोकों को अपने वश में करके स्वयं इन्द्र बन बैठा, तब उसके समान दूसरा कोई शासक कहीं न बचा। वह जितेन्द्रिय असुर त्रिभुवन का अकेला स्वामी होकर बड़े विचित्र ढंग से राज चलाने लगा। उसने समस्त देवताओं को उनके पदों से हटा दिया और उनकी जगह दैत्यों को बैठा दिया। विद्याधर आदि जितनी भी दिव्य योनियाँ थीं, सबको उसने पकड़कर अपने ही कामों में जोत लिया। जो कभी लोकों के स्वामी कहलाते थे, वे अब एक दैत्य के आगे हाथ बाँधे खड़े रहते थे।
देवताओं की पुकार
ऐसे समय में इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता, तारकासुर के सताए हुए, अत्यन्त व्याकुल और अनाथ होकर हमारी शरण में आए। उन सबने मुझ प्रजापति को प्रणाम किया, बड़ी भक्ति से हमारी स्तुति की, और अपने दारुण दुख की बातें कह सुनाईं। वे बोले, प्रभो, आप ही हमारी गति हैं, आप ही हमें कर्तव्य का उपदेश देते हैं, आप ही हमारे धाता और उद्धारक हैं। हम सब देवता तारकासुर नाम की उस आग में जल रहे हैं, जो बुझने का नाम नहीं लेती।
जैसे सन्निपात के रोग में बड़ी से बड़ी औषधि भी हारकर निर्बल पड़ जाती है, वैसे ही उस असुर ने हमारे सारे कठोर उपायों को व्यर्थ कर दिया है। हमारी विजय की एक ही आशा बची थी, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र। पर वह चक्र भी उसके कण्ठ पर जाकर कुण्ठित हो गया। उसके गले में पड़कर वह ऐसा जान पड़ा, मानो उस दैत्य को किसी ने फूलों की माला पहना दी हो। यह कहते हुए देवताओं की आँखें झुकी थीं और स्वर काँप रहा था।
एक ही उपाय
देवताओं का यह कथन सुनकर हमने उन्हें समय के योग्य बात कही। हमने कहा, देवताओ, यह दैत्य तारकासुर हमारे ही वरदान से इतना बढ़ा है। इसलिए हमारे अपने हाथों उसका वध करना उचित नहीं। जिस विष के वृक्ष को किसी ने स्वयं सींचकर बड़ा किया हो, उसे अपने ही हाथ से काट डालना योग्य कार्य नहीं माना गया। आप सबका सारा कार्य करने के योग्य भगवान शंकर ही हैं, किन्तु वे आपके कहने पर भी स्वयं उस असुर का सामना नहीं कर सकते। तारक दैत्य स्वयं अपने पाप से नष्ट होगा। हम जैसा उपदेश करते हैं, आप वैसा ही कीजिए। हमारे वर के प्रभाव से न हम उसे मार सकते हैं, न भगवान विष्णु, और न भगवान शंकर ही उसका वध कर सकते हैं। दूसरा कोई वीर, अथवा सारे देवता मिलकर भी, उसे नहीं मार सकते, यह हम सत्य कहते हैं।
फिर हमने वह भेद खोला जिस पर सारा उपाय टिका था। हमने कहा, यदि भगवान शिव के वीर्य से कोई पुत्र उत्पन्न हो, तो वही तारक का वध कर सकता है, दूसरा कोई नहीं। सुरश्रेष्ठगण, अब जो उपाय हम बताते हैं, वही कीजिए, और महादेव की कृपा से वह अवश्य सिद्ध होगा।
हमने उन्हें स्मरण कराया, पूर्वकाल में दक्ष की जो कन्या सती दक्ष के यज्ञ में अपना शरीर त्याग गई थीं, वही इस समय हिमालय की पत्नी मेना के गर्भ से पार्वती के रूप में जन्म ले चुकी हैं। यह बात आप सब को विदित ही है। महादेव उस कन्या का पाणिग्रहण अवश्य करेंगे। तो भी, देवताओ, आप भी इसके लिए यत्न कीजिए। ऐसा उद्योग कीजिए, जिससे मेना की उस पुत्री पार्वती में भगवान शंकर अपने वीर्य का आधान कर सकें।
हमने उन्हें शिव का स्वरूप समझाया। भगवान शंकर ऊर्ध्वरेता हैं, उनका तेज सदा ऊपर की ओर उठा रहता है। उस तेज को नीचे की ओर प्रवृत्त करने में केवल पार्वती ही समर्थ हैं, दूसरी कोई नारी अपनी शक्ति से यह नहीं कर सकती। गिरिराज की वह पुत्री अब युवावस्था में प्रवेश कर चुकी हैं और हिमालय पर तपस्या में लगे महादेव की प्रतिदिन सेवा करती हैं। अपने पिता हिमवान के कहने से काली अपनी दो सखियों के साथ ध्यानमग्न शिव की सेवा में हठपूर्वक लगी रहती हैं। तीनों लोकों में सबसे सुन्दर वे पार्वती शिव के सामने रहकर नित्य उनकी पूजा करती हैं, फिर भी वे ध्यानमय महेश्वर मन से भी अपने ध्यान से नहीं डिगते, पार्वती की ओर देखने का विचार तक उनके मन में नहीं आता।
इसीलिए, हमने कहा, देवताओ, आप शीघ्र ही ऐसा प्रयत्न कीजिए जिससे चन्द्रशेखर शिव के मन में काली को अपनी भार्या बनाने की इच्छा जागे। रही उस दैत्य की बात, तो उस ओर हम स्वयं जाएँगे और तारकासुर को उसके हठ से हटाने का प्रयत्न करेंगे। अब आप सब अपने अपने स्थान को लौट जाइए।
तारक को समझाना
देवताओं को इतना कहकर हम शीघ्र ही तारकासुर के पास गए और बड़े प्रेम से उसे पास बुलाकर बोले। हमने कहा, तारक, यह स्वर्ग हमारे तेज का सार है, और इस समय आप यहाँ का राज चला रहे हैं। जिस वस्तु के लिए आपने उत्तम तप किया था, अब आप उससे कहीं अधिक की चाह करने लगे हैं। हमने तो आपको इससे छोटा ही वर दिया था, स्वर्ग का राज्य कभी नहीं दिया था। इसलिए, असुरश्रेष्ठ, आप स्वर्ग को छोड़कर पृथ्वी पर राज कीजिए। देवताओं के योग्य जितने भी भोग और कार्य हैं, वे सब आपको वहीं सहज ही सुलभ होंगे। इसमें अन्यथा सोचने की आवश्यकता नहीं।
उस असुर को इस प्रकार समझाकर, शिवा और शिव का स्मरण करते हुए, हम वहाँ से अन्तर्धान हो गए। तारकासुर भी स्वर्ग छोड़कर पृथ्वी पर आ गया और शोणितपुर में रहकर अपना राज करने लगा। उधर सब देवता भी हमारी बात मानकर, हमें प्रणाम कर, इन्द्र के साथ बड़ी सावधानी से प्रसन्न मन इन्द्रलोक को लौट गए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने आपस में विचार किया और देवराज इन्द्र से प्रेमपूर्वक कहा, भगवन, जिस भी उपाय से शिव के मन में पार्वती के प्रति अनुराग जागे, ब्रह्माजी का कहा वह सारा प्रयत्न अब आपको करना चाहिए।
इस प्रकार देवराज इन्द्र से सारा वृत्तान्त कहकर देवता प्रसन्न मन से अपने अपने स्थान को चले गए, और उस दिन से एक ही लक्ष्य की सिद्धि में जुट गए, कि किसी तरह शिव और पार्वती का विवाह हो, और वह पुत्र जन्म ले जिसके हाथों तारक का अन्त लिखा था।
आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता, तृतीय (पार्वती) खण्ड