प्रजापति दक्ष के भवन में उस दिन मंगल-वाद्य बज रहे थे। उन्होंने अश्विनी से आरम्भ करके अपनी सत्ताईस कन्याओं का हाथ, एक-एक करके, चन्द्रमा को सौंप दिया था। स्वामी के रूप में चन्द्रमा को पाकर वे सब कन्याएँ आकाश के नक्षत्रों-सी दमकने लगीं, और उन जैसी पत्नियों को पाकर चन्द्रदेव भी निरन्तर शोभा पाने लगे। देखनेवाले को लगता था मानो सत्ताईस नक्षत्र एक ही नायक के गिर्द माला बनकर घूम रहे हों, और सारी रात एक ही चाँदनी में बँध गई हो।
परन्तु इन सत्ताईस में एक रोहिणी थीं। चन्द्रमा को जितनी प्रिय रोहिणी थीं, उतनी दूसरी कोई पत्नी कभी न हुई। उनका सारा मन, सारा समय और सारी दृष्टि रोहिणी ही की ओर ढली रहती। शेष कन्याओं को इससे बड़ा दुःख हुआ। जिनका एक ही स्वामी हो और उसका स्नेह किसी एक पर ही सिमट जाए, उन बहनों के हृदय में वही टीस उठी। वे सब उठकर अपने पिता की शरण में गईं और जो कुछ बीत रहा था, सब उन्होंने दक्ष के सामने कह सुनाया।
पुत्रियों का दुःख सुनकर प्रजापति दक्ष भी उदास हो गए। वे चन्द्रमा के पास आए और बड़े शान्त स्वर में बोले, कलानिधे! आप निर्मल कुल में उत्पन्न हुए हैं। आपके आश्रय में जितनी स्त्रियाँ रहती हैं, उन सबके प्रति आपके मन में यह घट-बढ़ का भाव क्यों है? किसी को अधिक और किसी को कम स्नेह देना आपको शोभा नहीं देता। जिस भाव से आपने एक को अपनाया, उसी भाव से सबको अपनाइए। अब तक जो हुआ, सो हुआ; आगे फिर कभी ऐसा भेदभरा बर्ताव न कीजिए, क्योंकि ऐसा आचरण नरक तक ले जानेवाला कहा गया है।
यह प्रार्थना करके दक्ष अपने घर लौटे तो उन्हें पूरा विश्वास था कि अब यह विषमता मिट जाएगी। पर होनहार बलवान थी। चन्द्रमा प्रबल भावी के वश में ऐसे बँधे कि रोहिणी में और भी डूब गए, और दूसरी पत्नियों का आदर पहले जैसा ही छूटा रहा। यह समाचार पाकर दक्ष फिर दुखी हुए। वे दुबारा स्वयं आए और उत्तम नीति तथा न्याय की बातें कहकर चन्द्रमा से समान बर्ताव की प्रार्थना करने लगे।
दक्ष का शाप
दक्ष ने कहा, चन्द्रदेव! सुनिए, हम पहले भी अनेक बार आपसे यही प्रार्थना कर चुके हैं। फिर भी आपने हमारी बात नहीं मानी। इसलिए आज हम आपको शाप देते हैं कि आपको क्षय का रोग लग जाए।
इतना कहते ही चन्द्रमा क्षयरोग से ग्रस्त हो गए। उनकी कलाएँ दिन-दिन घटने लगीं और रात्रि का उजाला मलिन पड़ता चला गया। जैसे-जैसे चाँद क्षीण होता गया, वैसे-वैसे सारे संसार में हाहाकार मच गया। देवता और ऋषि व्याकुल होकर कहने लगे, हाय! अब क्या हो, चन्द्रमा फिर कैसे भले-चंगे होंगे? इसी दुःख में पड़कर सब लोग विह्वल हो उठे। चन्द्रमा ने भी इन्द्र आदि देवताओं और ऋषियों को अपनी दशा कह सुनाई। कोई मार्ग न सूझा तो इन्द्र आदि देवता और वसिष्ठ आदि ऋषि सब मिलकर ब्रह्माजी की शरण में गए।
ब्रह्मा का उपाय
सबकी बात सुनकर ब्रह्माजी ने कहा, देवताओ! जो हो चुका, वह अब पलट नहीं सकता; शाप को मिटाया नहीं जा सकता। पर उसका निवारण हो सकता है। एक उत्तम उपाय हम आपको बताते हैं, उसे आदर से सुनिए। चन्द्रमा देवताओं के साथ प्रभास नामक पवित्र क्षेत्र में जाएँ। वहाँ मृत्युंजय मन्त्र का विधिपूर्वक अनुष्ठान करते हुए भगवान शिव की आराधना करें। अपने सामने शिवलिंग की स्थापना करके नित्य तपस्या करें। इससे प्रसन्न होकर भगवान शंकर उन्हें क्षयरहित कर देंगे।
प्रभास में आराधना
देवताओं और ऋषियों के कहने से, ब्रह्माजी की आज्ञा मानकर चन्द्रमा प्रभास क्षेत्र में गए। वहाँ उन्होंने अपने सामने शिवलिंग की स्थापना की और छह महीने तक निरन्तर तपस्या की। मृत्युंजय मन्त्र से उन्होंने भगवान मृत्युंजय का पूजन किया, दस करोड़ मन्त्रों का जप किया, और मृत्युंजय का ध्यान करते हुए स्थिर चित्त से लगातार खड़े रहे। इस प्रकार तपस्या में लगे अपने भक्त को देखकर भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रसन्न हो गए और उनके सामने प्रकट होकर बोले।
शंकरजी ने कहा, चन्द्रदेव! आपका कल्याण हो। आपके मन में जो अभीष्ट हो, वही वर माँगिए। हम प्रसन्न हैं और आपको सब उत्तम वर देंगे।
चन्द्रमा बोले, देवेश्वर! जब आप प्रसन्न हैं तो मेरे लिए भला क्या असाध्य रह जाएगा। तो भी, प्रभो! आप मेरे शरीर के इस क्षयरोग को दूर कीजिए, और मुझसे जो अपराध बन पड़ा हो, उसे क्षमा कीजिए।
शिवजी ने कहा, चन्द्रदेव! एक पक्ष में प्रतिदिन आपकी एक-एक कला क्षीण होती जाए, और दूसरे पक्ष में वही कला फिर निरन्तर बढ़ती रहे। यही कारण है कि चन्द्रमा कभी घटते और कभी बढ़ते हुए दिखाई देते हैं।
तदनन्तर चन्द्रमा ने भक्तिभाव से भगवान शंकर की स्तुति की। जो शिव निराकार थे, वे अपने भक्त के लिए फिर साकार हो गए। देवताओं पर प्रसन्न होकर, उस क्षेत्र का माहात्म्य बढ़ाने और चन्द्रमा का यश तीनों लोकों में फैलाने के लिए भगवान शंकर वहीं चन्द्रमा ही के नाम पर सोमेश्वर कहलाए, और सोमनाथ के नाम से तीनों लोकों में विख्यात हुए। ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहला नाम इन्हीं का आता है।
सोमनाथ की महिमा
सोमनाथ का पूजन करने से भगवान शंकर उपासक के क्षय, कोढ़ आदि रोगों का नाश कर देते हैं। धन्य हैं वे चन्द्रमा, कृतकृत्य हैं, जिनके नाम से तीनों लोकों के स्वामी साक्षात भगवान शंकर भूतल को पवित्र करते हुए प्रभास क्षेत्र में सदा विराजमान हैं।
वहीं सम्पूर्ण देवताओं ने सोमकुण्ड की भी स्थापना की, जिसमें शिव और ब्रह्मा का सदा निवास माना जाता है। यह चन्द्रकुण्ड इस भूतल पर पापनाशक तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है। जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। क्षय आदि जो असाध्य रोग हैं, वे उस कुण्ड में छह महीने तक स्नान करने से नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य जिस भी कामना को लेकर इस उत्तम तीर्थ का सेवन करता है, वह कामना उसे अवश्य प्राप्त होती है, इसमें कोई सन्देह नहीं।
इस वरदान और इस तीर्थ के प्रताप से चन्द्रमा नीरोग हो गए और फिर पहले की भाँति अपना कार्य करने लगे। यही प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ के प्रादुर्भाव की कथा है। जो मनुष्य इसे भक्ति से सुनता है अथवा दूसरों को सुनाता है, वह सदा सब पापों से छूट जाता है।
आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), कोटिरुद्रसंहिता