महाकाल और मल्लिकार्जुन

क्रौंच पर्वत पर रूठे कुमार

कैलास पर उस दिन घर लौटने की घड़ी थी। महाबली कुमार कार्तिकेय, तारकासुर के संहारक, सारी पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटे थे, और आते ही सुना कि पीछे गणेश का विवाह हो चुका है। मन ऐसा उखड़ा कि वे कैलास छोड़ कर क्रौंच पर्वत पर चले गये।

पार्वती और शिव दोनों वहाँ पहुँचे, बहुत अनुरोध किया, पर कुमार लौटे नहीं, उलटे बारह कोस और दूर चले गये। तब माता-पिता ने वही किया जो माता-पिता ही कर सकते हैं। रूठा बेटा पास नहीं आया, तो वे ज्योतिर्मय स्वरूप धारण करके वहीं प्रतिष्ठित हो गये। पुत्रस्नेह से आतुर वे पर्व के दिन कुमार को देखने जाते हैं, अमावस्या को भगवान् शंकर स्वयं, पूर्णिमा को निश्चय ही पार्वतीजी।

उसी दिन से भगवान् शिव का मल्लिकार्जुन नामक लिंग तीनों लोकों में प्रसिद्ध हुआ। मल्लिका कहिए तो पार्वती, और अर्जुन शब्द शिव का वाचक है, उस एक लिंग में दोनों की ज्योतियाँ प्रतिष्ठित हैं। जो उसका दर्शन करता है, वह समस्त पापों से छूट कर अपने सम्पूर्ण अभीष्ट पा लेता है। यही द्वितीय ज्योतिर्लिंग है, दर्शनमात्र से हर प्रकार का सुख देनेवाला।

अवन्ती के महाकाल

अब तीसरे ज्योतिर्लिंग की कथा सुनिए, जिसमें काल स्वयं भक्तों का पहरेदार बनता है। अवन्ती नाम की रमणीय नगरी है, देहधारियों को मोक्ष देनेवाली, शिव को अत्यन्त प्रिय। वहाँ वेदप्रिय नाम के श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, वेदों का स्वाध्याय, नित्य अग्निहोत्र, और प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बना कर पूजा, यही उनका जीवन था। इस साधना से उन्होंने वह सद्गति पायी जो संतों को ही सुलभ है। उनके चार तेजस्वी पुत्र थे, देवप्रिय, प्रियमेधा, सुकृत और सुव्रत, गुणों में पिता-माता से कम नहीं। उनके कारण अवन्ती ब्रह्मतेज से भर गयी थी।

उसी समय रत्नमाल पर्वत पर दूषण नामक एक धर्मद्वेषी असुर ने ब्रह्माजी से वर पाकर वेद, धर्म और धर्मात्माओं पर आक्रमण छेड़ दिया, और अन्त में सेना लेकर अवन्ती के ब्राह्मणों पर भी चढ़ आया। उसकी आज्ञा से चार भयानक दैत्य चारों दिशाओं में प्रलय की अग्नि के समान प्रकट हो गये। नगर के ब्राह्मण घबरा उठे, पर वेदप्रिय के वे शिवविश्वासी बेटे तनिक नहीं डरे। सबको धीरज बँधाया कि आप लोग भक्तवत्सल शंकर पर भरोसा रखें, और स्वयं शिवलिंग का पूजन करके ध्यान में बैठ गये।

इतने में सेनासहित दूषण आ धमका और आज्ञा दी कि इन सबको मार डाला जाये, बाँध लिया जाये। पुत्रों ने वह बात सुनी तक नहीं, वे शम्भु के ध्यान-मार्ग में स्थित थे। पर ज्यों ही उस दुष्टात्मा ने उन्हें मारने की इच्छा की, त्यों ही पूजे हुए पार्थिव शिवलिंग के स्थान पर बड़ी भारी आवाज़ के साथ एक गड्ढा फट पड़ा, और उससे तत्काल विकट रूपधारी भगवान् शिव प्रकट हो गये, जो महाकाल नाम से विख्यात हुए, दुष्टों के विनाशक, सत्पुरुषों के आश्रयदाता। उन्होंने गरज कर कहा कि हम ऐसे ही दुष्टों के लिये महाकाल बन कर प्रकट हुए हैं, और आज्ञा दी कि दैत्य इन ब्राह्मणों से दूर भाग जायें। फिर हुंकारमात्र से सेनासहित दूषण भस्म हो गया। कुछ सेना मारी गयी, कुछ भागी, और जैसे सूर्य के आगे अन्धकार, वैसे शेष सेना अदृश्य हो गयी। दुन्दुभियाँ बज उठीं, आकाश से फूल बरसे।

प्रसन्न हुए महाकाल महेश्वर ने कहा, वर माँगिए। ब्राह्मण हाथ जोड़ कर बोले, महाकाल! महादेव! हमें संसार-सागर से मोक्ष दें, जन-साधारण की रक्षा के लिये सदा यहीं रहें, दर्शन करनेवालों का उद्धार करें। शिव ने उन्हें सद्गति दी और भक्तों की रक्षा के लिये उसी परम सुन्दर गड्ढे में स्थित हो गये। चारों ओर की एक-एक कोस भूमि लिंगरूपी शिव का स्थल बन गयी, और वे भूतल पर महाकालेश्वर कहलाये। उनके दर्शन से स्वप्न में भी दुःख नहीं होता, मनोरथ मिलता है, परलोक में मोक्ष भी।

चिन्तामणि, ग्वालिन का बेटा और श्रीकर

उज्जयिनी में चन्द्रसेन नाम के महान् राजा थे, शास्त्रों के तत्त्वज्ञ, जितेन्द्रिय, शिवभक्त। शिव के पार्षदों में प्रधान मणिभद्रजी उनके सखा थे, और उन्होंने प्रसन्न होकर राजा को चिन्तामणि नाम की महामणि दी, कौस्तुभ और सूर्य-सी देदीप्यमान, जिसके देखने, सुनने या ध्यान भर से मनुष्य का मंगल निश्चित था। वह मणि कण्ठ में धारण कर चन्द्रसेन जब सिंहासन पर बैठते, तब देवताओं में सूर्य और नारायण जैसी उनकी शोभा होती।

यह सुन कर देश-देश के राजाओं के मन में मणि का लोभ बढ़ चला। वे आपस में मिल गये और चतुरंगिणी सेनाएँ लेकर उज्जयिनी के चारों द्वार घेर बैठे। लोक-कथाएँ इस घेरे को प्रायः रिपुदमन नामक राजा से जोड़ती हैं, पर शिवपुराण किसी घेरनेवाले का नाम नहीं लेता, उसकी दृष्टि में वे बस मणि के लोभी राजा हैं। पुरी को घिरी देख चन्द्रसेन ने शस्त्र नहीं उठाया, वे महाकालेश्वर की शरण गये और संदेहरहित मन से, उपवासपूर्वक, दिन-रात अनन्य आराधना करने लगे।

उन्हीं दिनों नगर में एक विधवा ग्वालिन रहती थी, जिसका एकमात्र पुत्र था। वह पाँच बरस के बालक को लिये महाकाल के मन्दिर गयी और राजा चन्द्रसेन की महाकाल-पूजा का आदर से दर्शन करके डेरे लौट आयी। बालक ने भी वह पूजा देखी थी। घर आकर कौतूहलवश उसने स्वयं शिवपूजा की ठान ली। एक सुन्दर पत्थर लाकर डेरे से थोड़ी दूर एकान्त में रखा, उसी को शिवलिंग मान लिया, और खेल-जैसे बनाये गन्ध, अलंकार, वस्त्र, धूप, दीप, अक्षत जुटा कर भक्तिपूर्वक पूजन किया। मन से गढ़ा दिव्य नैवेद्य अर्पित किया, पत्तों-फूलों से बारंबार पूजा की, नृत्य किया, बार-बार चरणों में मस्तक झुकाया।

ग्वालिन ने पुत्र को प्यार से भोजन के लिये बुलाया, पर उसका मन तो पूजा में लगा था। बार-बार बुलाने पर भी वह नहीं आया, तब माँ स्वयं गयी और उसे आँखें मूँदे ध्यान में बैठा देख हाथ पकड़ कर खींचने लगी। वह नहीं उठा तो क्रोध में उसे खूब पीटा। फिर भी बेटा नहीं आया, तब उसने शिवलिंग उठा कर दूर फेंक दिया और सारी पूजा-सामग्री नष्ट कर दी। बालक हाय-हाय करके रो उठा, और माँ डाँट-फटकार कर घर चली गयी। पूजा नष्ट हुई देख वह बालक, देव! देव! महादेव! पुकारता मूर्च्छित हो गिर पड़ा, आँसुओं की धारा बहती रही। दो घड़ी बाद चेत आया, तब आँखें खोलीं।

और आँख खुलने पर उस शिशु ने जो देखा, उसे सुन कर रोम खड़े हो जाते हैं। उसका वही डेरा शिव के अनुग्रह से महाकाल का सुन्दर मन्दिर बन गया था, मणियों के चमकीले खंभे, स्फटिक-जड़ी भूमि, तपाये सोने के कलश, सुवर्णमय विशाल द्वार, नीलमणि और हीरों के चबूतरे। मध्य में दयानिधान शंकर का रत्नमय लिंग था, और उस पर वही पूजा-सामग्री सजी थी जो बालक ने अपने हाथों चढ़ायी थी। परमानन्द में निमग्न होकर उसने स्तुति की, बारंबार मस्तक झुकाया, और सूर्यास्त के बाद बाहर निकला, तो डेरा इन्द्रभवन-सा दमक रहा था, भीतर सर्वत्र मणि, रत्न और सोना जड़ा था। प्रदोष की बेला में उसने देखा कि माँ दिव्य लक्षणों से युक्त हो सुन्दर पलंग पर सो रही है, अंग-अंग रत्न-अलंकारों से दीप्त, साक्षात् देवांगना जैसी।

सुख से विह्वल बालक ने माँ को वेग से उठाया। ग्वालिन ने देखा, सब कुछ अपूर्व हो गया था। आनन्द में उसने बेटे को छाती से लगा लिया और उसके मुख से गिरिजापति के कृपा-प्रसाद का वृत्तान्त सुन कर राजा को सूचना दी। चन्द्रसेन अपना नियम पूरा करके रात में ही आ पहुँचे और मंत्रियों तथा पुरोहितों सहित वह सब देख परमानन्द में डूब गये। प्रेम के आँसू बहाते, शिवनाम का कीर्तन करते हुए उन्होंने बालक को हृदय से लगा लिया। उस रात बड़ा उत्सव हुआ, पुरवासी महेश्वर का यश गाते रहे, और सारी रात एक क्षण-सी बीत गयी।

भोर हुई तो घेरा डाले राजाओं ने गुप्तचरों से वह अद्भुत चरित्र सुना और चकित होकर कहने लगे कि जिस पुरी के बालक तक ऐसे शिवभक्त हैं, उसके राजा चन्द्रसेन तो महान् शिवभक्त हैं ही, उन पर विजय कठिन है। विरोध करेंगे तो शिव के क्रोध से हम सब नष्ट हो जायेंगे, अतः मेल-मिलाप ही ठीक है, तभी महेश्वर कृपा करेंगे। उन भूपालों ने हथियार डाल दिये, मन से वैर निकल गया। वे चन्द्रसेन की अनुमति लेकर नगरी में गये, महाकाल का पूजन किया, और ग्वालिन के सौभाग्य की प्रशंसा करते हुए उसके घर पहुँचे, जहाँ चन्द्रसेन ने आगे बढ़ कर सबका सत्कार किया। स्वतः प्रकट हुए शिवालय का दर्शन कर उन्होंने अपनी बुद्धि शिव के चिन्तन में लगायी, गोपशिशु को बहुत सी भेंटें दीं, और सम्पूर्ण जनपदों के गोपों का राजा उसी बालक को बना दिया।

इसी समय समस्त देवताओं से पूजित वानरराज हनुमानजी वहाँ प्रकट हुए। सब राजा उठ खड़े हुए, नतमस्तक हो गये। हनुमानजी उनके बीच बैठे और गोपबालक को हृदय से लगा कर बोले, राजाओ! आप सब, और जितने देहधारी हैं वे भी, हमारी बात सुनें, इसमें सबका भला है। शिव के सिवा देहधारियों की कोई गति नहीं। सौभाग्य देखिए, इस बालक ने पूजा का दर्शन भर करके प्रेरणा ली और बिना मन्त्र के भी शिव का पूजन करके उन्हें पा लिया। गोपवंश की कीर्ति बढ़ानेवाला यह बालक शंकर का श्रेष्ठ भक्त है, इस लोक में सम्पूर्ण भोग भोग कर अन्त में मोक्ष पायेगा। इसकी आठवीं पीढ़ी में महायशस्वी नन्द उत्पन्न होंगे, जिनके यहाँ साक्षात् भगवान् नारायण पुत्ररूप से प्रकट होकर श्रीकृष्ण नाम से प्रसिद्ध होंगे। और आज से यह गोपकुमार जगत् में श्रीकर के नाम से ख्याति पायेगा।

इतना कह कर अंजनीनन्दन शिवस्वरूप हनुमानजी ने राजाओं और चन्द्रसेन को कृपादृष्टि से देखा, श्रीकर को शिव-उपासना के उस आचार का उपदेश दिया जो शिव को अति प्रिय है, और सबके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये। राजा सम्मानित होकर जैसे आये थे वैसे लौट गये। श्रीकर धर्मज्ञ ब्राह्मणों के साथ उपासना करने लगा, और महाराज चन्द्रसेन तथा श्रीकर, दोनों महाकाल की सेवा करते हुए उन्हीं की आराधना से परम पद पा गये। महाकाल नामक शिवलिंग सत्पुरुषों का आश्रय है, भक्तवत्सल शंकर दुष्टों का सर्वथा हनन करनेवाले हैं, और यह परम पवित्र आख्यान हर प्रकार का सुख देनेवाला, शिवभक्ति बढ़ानेवाला, स्वर्ग दिलानेवाला कहा गया है।

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), कोटिरुद्रसंहिता