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भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

गजासुर-वध

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महिषासुर के वध की गूँज अभी थमी भी न थी कि उसके पुत्र गजासुर के भीतर प्रतिशोध की आग सुलग उठी। जब उसने सुना कि देवताओं की प्रेरणा से देवी ने उसके पिता को मार डाला है, तब उसने न आँसू बहाए, न किसी से कुछ कहा। बदला लेने की भावना से उसने ऐसा घोर तप आरम्भ किया कि उसकी तपस्या की ज्वाला से चारों ओर सब कुछ जलने लगा।

जिस दिशा में दृष्टि उठती, वहीं उस ताप की लपटें फैली दिखतीं। न धरती को चैन था, न आकाश को। जब यह आँच सहनी असह्य हो गई, तब देवता व्याकुल होकर ब्रह्माजी के पास पहुँचे और अपना दुख कह सुनाया।

ब्रह्मा का वरदान

ब्रह्माजी उस तपस्वी दानव के सामने प्रकट हुए और उसकी प्रार्थना के अनुसार वर दे दिया: वह किसी भी ऐसे स्त्री या पुरुष के हाथों नहीं मरेगा जो काम के वश में हो; वह महाबली होगा और सारे संसार के लिए अजेय रहेगा। इसी वरदान की छाया में गजासुर का अभिमान बढ़ता चला गया।

गजमुख असुर गजासुर मुकुट पहने पर्वत-शिखर पर पद्मासन में समाधिस्थ है; उसकी घोर तपस्या की लपटें चारों ओर आकाश तक फैली आग बनकर धधक रही हैं।

वर पाते ही वह गर्व से भर उठा। एक-एक करके उसने सब दिशाओं पर और लोकपालों के स्थानों पर अधिकार जमा लिया। कोई ऐसा कोना न बचा जहाँ उसका आतंक न पहुँचा हो।

कमल पर विराजे त्रिमुख ब्रह्मा हंस के साथ प्रकट होकर घुटनों के बल हाथ जोड़े बैठे गजमुख गजासुर को वरदान दे रहे हैं; चारों ओर लावा-सी दहकती चट्टानें हैं।

आनन्दवन काशी पर संकट

अन्त में वह भगवान शंकर की राजधानी आनन्दवन काशी में जा पहुँचा। जिस नगरी को मुक्ति की भूमि कहा जाता था, उसी के जन-जन को यह दानव सताने लगा। जहाँ भोलेनाथ का निवास हो, वहीं अब उसके अत्याचार का बोलबाला था। हार कर देवता एक बार फिर हाथ जोड़े खड़े हुए, इस बार स्वयं भगवान शंकर के समक्ष।

यहीं आकर वह वरदान अपने ही भीतर से खुल गया। गजासुर उसी के हाथों मारा जा सकता था जो काम से परे हो, और शंकर तो कामविजयी हैं ही। जिस देवता ने काम को जीत लिया हो, उसके सामने ऐसा वरदान टिक नहीं सकता था।

विशालकाय गजासुर मुकुट पहने, हाथ में जलती गदा लिए काशी की नगरी को रौंद रहा है; मन्दिर धधक रहे हैं, नर-नारी भयभीत होकर भाग रहे हैं और ऊपर बादलों में ऐरावत सहित देवता यह संकट देख रहे हैं।

त्रिशूल की नोक पर

घोर युद्ध छिड़ा। जो दानव सब लोकों पर छा गया था, वह महादेव के आगे अधिक देर न ठहर सका। भगवान शंकर ने गजासुर को परास्त कर अपने त्रिशूल में पिरो लिया। शूल की नोक पर बिंधा हुआ वह अब न भाग सकता था, न लड़ सकता था। पर उसी क्षण, मृत्यु की गोद में, उसके भीतर कुछ बदल गया।

बिंधे हुए ही उसने भगवान शंकर का स्तवन आरम्भ कर दिया। उसके कठोर हृदय में भक्ति का स्रोत फूट पड़ा। शंकर उस पर प्रसन्न हुए और उससे इच्छित वर माँगने को कहा।

काशी के घाट पर त्रिशूलधारी शिव, गले में सर्प और चरणों में नन्दी लिए खड़े हैं; सामने मुकुटधारी इन्द्र आदि देवता और देवियाँ, पीछे ऐरावत, हाथ जोड़े गजासुर के अत्याचार से रक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।

कृत्तिवास का नाम

गजासुर ने हाथ जोड़कर कहा: “हे दिगम्बरस्वरूप महेशान! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो अपने त्रिशूल की अग्नि से पवित्र हुए मेरे इस चर्म को आप सदा धारण किए रहिए। विभो! मैं पुण्यगन्धों की निधि हूँ; इसी से मेरा यह चर्म तप की अग्नि की ज्वाला में इतने काल पड़ा रहकर भी नहीं जला। दिगम्बर! यदि यह चर्म पुण्यवान न होता, तो इसे आपके अंगों का संग कैसे मिलता? और एक वर और दीजिए: आज से आपका नाम कृत्तिवासा विख्यात हो।”

भक्तवत्सल शंकर ने बड़ी प्रसन्नता से तथास्तु कहा। महिषासुर के उस पुत्र का मन भक्ति के कारण अब निर्मल हो चुका था, इसलिए ईश्वर फिर बोले।

शिव चट्टान पर खड़े त्रिशूल थामे हैं और उसकी नोक पर बिंधा गजमुख गजासुर आकाश में हाथ जोड़े शिव की स्तुति कर रहा है; नीचे दाहिनी ओर देवता, देवियाँ और ऐरावत यह दृश्य देख रहे हैं।

“हे दानवराज! आपका यह चर्म मेरी मुक्ति देनेवाली काशी में मेरे लिंग के साथ सदा रहेगा। उस लिंग का नाम कृत्तिवासेश्वर होगा। यह मुक्ति देनेवाला, बड़े से बड़े पापों का नाश करनेवाला, समस्त लिंगों में शिरोमणि और मोक्ष देनेवाला होगा।” यों कहकर देवेश्वर शिव ने गजासुर के उस विशाल चर्म को लेकर अपने अंगों पर धारण कर लिया।

शिव त्रिशूल थामे खड़े हैं और गजासुर का हाथी-चर्म अपने अंगों पर ओढ़े हुए हैं; पास ही पुष्पों से सजा शिवलिंग (कृत्तिवासेश्वर) है जिसे भक्त हाथ जोड़े पूज रहे हैं, ऊपर ब्रह्मा, ऐरावत सहित देवता और पुष्प बरसाती अप्सराएँ हैं।

उस दिन काशी में बहुत बड़ा उत्सव मनाया गया। नगर के सारे निवासी और प्रमथगण हर्ष में डूब गए, ब्रह्मा आदि देवताओं का मन आनन्द से भर उठा, और सबने हाथ जोड़कर महेश्वर को नमस्कार करके उनकी स्तुति की। जो दानव प्रतिशोध की आग से जन्मा था, वही अपने अन्त में शिव के एक प्रिय नाम का कारण बन गया, और उसका चर्म भोलेनाथ के अंग की शोभा।

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता, पञ्चम (युद्ध) खण्ड

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