प्रयाग के निकट प्रतिष्ठानपुर में एक शिवालय था, जहाँ बहुत-से साधु और महात्मा जुटे रहते और एक ब्राह्मण नित्य शिवपुराण की कथा बाँचते थे। उसी शिवालय में एक दिन देवराज नाम का ब्राह्मण आ ठहरा। किरातों के नगर का यह देवराज ज्ञान में अत्यन्त दुर्बल, दरिद्र और वैदिक धर्म से विमुख था। सन्ध्या आदि कर्म वह कभी का छोड़ चुका था, रस बेचता और जो उस पर विश्वास करता उसी को ठग लेता। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, किसी को भी बहाने से लूटकर उसने बहुत धन बटोरा था, पर एक कौड़ी कभी धर्म के काम न लगायी थी।
शिवालय में ठहरते ही देवराज को ज्वर चढ़ आया। पीड़ा से वह तड़पता रहा, किन्तु पास ही ब्राह्मण के मुख से निकलती शिवपुराण की कथा उसके कानों में पड़ती रही और वह पूरे एक महीने उसे सुनता रहा। फिर वह चल बसा। यमराज के दूत आये और उसे पाशों में बाँधकर बलपूर्वक यमपुरी ले चले। इतने में शिवलोक से भगवान शंकर के पार्षद आ पहुँचे। उनके अंग कपूर-से उज्ज्वल थे, हाथों में त्रिशूल, सारे शरीर पर भस्म और गले में रुद्राक्ष की मालाएँ। उन्होंने यमदूतों को खदेड़कर देवराज को पाशों से छुड़ाया और एक दिव्य विमान पर बिठा लिया। स्वयं धर्मराज बाहर निकल आये, पर उन शिव-दूतों को पहचानकर उन्होंने विधिपूर्वक उनका पूजन किया और कुछ न कहा। पार्षद देवराज को कैलास ले जाकर दयासागर साम्ब शिव के हाथों में सौंप आये।
सूतजी ने शौनक से कहा कि जो मनुष्य पापी, दुराचारी और काम-क्रोध में डूबे रहनेवाले हैं, वे भी इस पुराण के श्रवण-मात्र से शुद्ध हो जाते हैं। इसी विषय का एक और प्राचीन इतिहास सुनिए।
वाष्कल गाँव का विन्दुग
समुद्र के निकट वाष्कल नाम का एक गाँव था, जहाँ वेद-धर्म से विमुख और विषयभोग में डूबे ब्राह्मण बसते थे; वहाँ की स्त्रियाँ भी स्वेच्छाचारिणी और सदाचार से शून्य थीं। उसी गाँव में विन्दुग नाम का एक ब्राह्मण रहता था, बड़ा अधम, दुरात्मा और महापापी। उसकी पत्नी चञ्चुला बड़ी सुन्दरी थी और सदा उत्तम धर्म के पालन में लगी रहती थी, फिर भी उसे छोड़कर विन्दुग वेश्यागामी हो गया। बहुत वर्ष इसी कुकर्म में बीत गये। चञ्चुला दीर्घकाल तक धर्म से नहीं डिगी, पर अन्त में पति के आचरण से प्रभावित होकर वह भी दुराचारिणी हो गयी।
इस तरह दोनों का बहुत-सा समय व्यर्थ बीता। फिर वह दूषित बुद्धिवाला विन्दुग समय आने पर मरा और नरक में जा पड़ा। बहुत दिनों तक नरक के दुःख भोगकर वह विन्ध्य पर्वत पर एक भयंकर पिशाच हुआ। इधर पति के मर जाने पर चञ्चुला बहुत समय तक अपने पुत्रों के साथ घर में ही रही।
गोकर्ण में वैराग्य
एक दिन किसी पुण्य पर्व पर चञ्चुला अपने बन्धुओं के साथ गोकर्ण-क्षेत्र गयी। तीर्थ के जल में स्नान करके वह मेला देखती हुई इधर-उधर घूमने लगी। घूमते-घूमते वह एक देवमन्दिर में जा पहुँची, जहाँ एक ब्राह्मण भगवान शिव की परम पवित्र पौराणिक कथा सुना रहे थे। कथावाचक कह रहे थे कि जो स्त्रियाँ परपुरुषों के साथ व्यभिचार करती हैं, वे मरने के बाद यमलोक में जाती हैं और यमराज के दूत उन्हें तपे हुए लोहे के खम्भों से लिपटा देते हैं।
यह सुनते ही चञ्चुला भय से काँप उठी। कथा समाप्त हुई और सब श्रोता चले गये, तब वह भयभीत नारी एकान्त में उन कथावाचक ब्राह्मण से बोली, “ब्रह्मन्! मैंने अपने धर्म को नहीं जाना, इसलिए मुझसे बड़ा दुराचार हुआ है। आज आपके वैराग्य-रस से भरे इस प्रवचन को सुनकर मुझे बड़ा भय लग रहा है; मैं काँप उठी हूँ और इस संसार से मेरा मन उचट गया है। हाय! न जाने किन-किन घोर दुर्गतियों में मुझे पड़ना पड़ेगा और मृत्यु के समय उन भयंकर यमदूतों को मैं कैसे देखूँगी। आप ही मेरे गुरु हैं, आप ही माता और आप ही पिता। आपकी शरण में आयी हूँ; इस दीन का उद्धार कीजिए, उद्धार कीजिए।” इतना कहकर वह ब्राह्मण के दोनों चरणों पर गिर पड़ी।
ब्राह्मण का उपदेश और शिवलोक
बुद्धिमान ब्राह्मण ने उसे कृपापूर्वक उठाया और कहा, “नारी! सौभाग्य की बात है कि भगवान शंकर की कृपा से इस वैराग्ययुक्त कथा को सुनकर आपको समय पर चेत हो गया। डरिए मत, शिव की शरण में जाइए; उनकी कृपा से सारा पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। पश्चात्ताप ही पापियों के लिए सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है; जिसे अपने कुकृत्य पर सच्चा पश्चात्ताप होता है, वह अवश्य उत्तम गति का भागी होता है। जैसे दर्पण साफ करने पर निर्मल हो जाता है, वैसे ही इस शिवपुराण की कथा से चित्त शुद्ध हो जाता है, और शुद्ध चित्त में जगदम्बा पार्वती सहित भगवान शिव विराजते हैं। अतः विषयों से मन हटाकर भक्तिपूर्वक शंकर की इस परम पावन कथा को सुनिए, इससे आपको मोक्ष की प्राप्ति होगी। जो निर्मल चित्त से भगवान शिव के चरणों का चिन्तन करता है, उसकी एक ही जन्म में मुक्ति हो जाती है।”
इतना कहकर वे शिवभक्त ब्राह्मण शिव के ध्यान में मग्न हो गये। चञ्चुला के नेत्रों में आनन्द के आँसू छलक आये; वह उनके चरणों में गिरकर बोली, “मैं कृतार्थ हो गयी। साधो! मैं नरक के समुद्र में गिर रही हूँ; उस सुन्दर कथा को सुनकर मेरे मन में सम्पूर्ण विषयों से वैराग्य उत्पन्न हो गया, अब उसी शिवपुराण को सुनने की मुझे बड़ी श्रद्धा है।” तब उन्हीं ब्राह्मण ने उसी गोकर्ण-क्षेत्र में उसे सम्पूर्ण शिवपुराण की कथा सुनायी, जो भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को बढ़ानेवाली तथा मुक्ति देनेवाली है।
कथा सुनकर चञ्चुला का चित्त शीघ्र ही शुद्ध हो गया और वह भगवान शिव के सच्चिदानन्दमय स्वरूप का बारंबार चिन्तन करने लगी। समय पूरा होने पर उसने बिना किसी कष्ट के अपना शरीर छोड़ दिया। उसी क्षण भगवान शिव का भेजा दिव्य विमान वहाँ आ पहुँचा। गणों से युक्त उस विमान पर चढ़कर चञ्चुला शिवपुरी पहुँचा दी गयी; उसके सारे मल धुल गये और वह दिव्यरूप धारण किये गौरांगी देवी बन गयी। वहाँ उसने त्रिनेत्रधारी महादेव को देखा, जिनकी सेवा में गणेश, भृंगी, नन्दीश्वर और वीरभद्र आदि खड़े थे और जिनके वाम भाग में गौरी देवी विराजती थीं। बारंबार प्रणाम करती हुई चञ्चुला को भगवती पार्वती ने सौम्य दृष्टि से अपने पास बुलाया और अपनी सखी बना लिया। उस परमानन्दमय सनातन धाम में अविचल निवास पाकर वह अक्षय सुख का अनुभव करने लगी।
विन्ध्य का पिशाच और तुम्बुरु
एक दिन चञ्चुला ने उमादेवी के पास जाकर उनकी स्तुति की और हाथ जोड़कर पूछा, “गिरिराजकुमारी! मेरे पति विन्दुग इस समय कहाँ हैं और उनकी कैसी गति हुई, यह मैं नहीं जानती। कृपा कीजिए और मेरे उस पति का भी उद्धार कीजिए।” पार्वती ने कहा, “आपके पति विन्दुग बड़े पापी थे। वेश्या का उपभोग करनेवाला वह मूढ़ मरकर नरक में पड़ा, और अब अपने शेष पाप को भोगने के लिए विन्ध्य पर्वत पर पिशाच बना हुआ है; वहीं वायु पीकर रहता और नाना प्रकार के क्लेश सहता है।” यह सुनकर चञ्चुला अपने पति के महान दुःख से बहुत दुखी हुई और मन को स्थिर करके फिर से प्रार्थना करने लगी।
पार्वती ने कहा, “यदि आपके पति शिवपुराण की पुण्यमयी कथा एक बार भी सुन लें, तो सारी दुर्गतियों को पार करके वे उत्तम गति के भागी हो सकते हैं।” फिर उस भक्तवत्सला गिरिराजकुमारी ने भगवान शिव की कीर्ति गानेवाले गन्धर्वराज तुम्बुरु को बुलाकर प्रसन्नतापूर्वक कहा, “तुम्बुरो! आपका भगवान शिव में प्रेम है और आप मेरे मन की बात जानते हैं। मेरी इस सखी के साथ शीघ्र विन्ध्य पर्वत पर जाइए। वहाँ एक महाघोर पिशाच रहता है, जो पूर्वजन्म में इसी चञ्चुला का पति विन्दुग नामक ब्राह्मण था और सन्ध्या आदि कर्म छोड़कर अपवित्र आचरण में डूब गया था। आप वहाँ शिवपुराण की दिव्य कथा का आदरपूर्वक प्रवचन कीजिए; श्रवण ही सबसे उत्कृष्ट पुण्यकर्म है। उससे उसका हृदय शुद्ध हो जायगा और वह प्रेतयोनि को छोड़ देगा। तब उसे विमान पर बिठाकर भगवान शिव के समीप ले आइए।”
आज्ञा पाकर तुम्बुरु मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और सती-साध्वी चञ्चुला को साथ लेकर विमान पर बैठकर विन्ध्याचल पर जा पहुँचे। वहाँ विशाल शरीरवाला वह पिशाच कभी हँसता, कभी रोता और कभी उछलता था; उसकी आकृति बड़ी विकराल थी। तुम्बुरु ने उसे पाशों से बाँधकर कथा का मण्डप सजाया। यह प्रचार होते ही कि देवी पार्वती की आज्ञा से एक पिशाच के उद्धार के लिए तुम्बुरु कथा सुनाने आये हैं, बहुत-से देवर्षि भी वहाँ आ जुटे। तुम्बुरु ने हाथ में वीणा लेकर गौरीपति की कथा आरम्भ की और विद्येश्वरसंहिता से लेकर वायवीयसंहिता तक, सातों संहिताओं के माहात्म्य सहित सम्पूर्ण शिवपुराण कह सुनाया।
उस परम पुण्यमय कथा को सुनते ही पिशाच के सारे पाप धुल गये और उसने अपना पैशाचिक शरीर त्याग दिया। उसका रूप दिव्य हो गया। शरीर पर श्वेत वस्त्र सुशोभित हुआ, अंगों पर आभूषण दमक उठे और वह त्रिनेत्रधारी चन्द्रशेखर के समान कान्तिवाला हो गया। इस प्रकार दिव्यदेहधारी होकर श्रीमान विन्दुग अपनी प्रियतमा चञ्चुला के साथ भगवान शिव का गुणगान करने लगा। सब देवर्षि विस्मित हुए और उस अद्भुत चरित्र को सुनकर प्रेमपूर्वक अपने-अपने धाम को लौट गये। फिर विन्दुग अपनी प्रियतमा और तुम्बुरु के साथ शीघ्र ही शिवधाम पहुँच गया, जहाँ भगवान महेश्वर और पार्वती ने उसका बड़ा सत्कार किया और उसे अपना पार्षद बना लिया। उसकी पत्नी चञ्चुला पार्वती की सखी हो गयी, और वे दोनों दम्पति उस सनातन धाम में परम सुखी हो गये।
आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), शिवपुराण-माहात्म्य