कैलास की कथा-सभा में नन्दीश्वर जी ने कहा, महामुने, अब शम्भु के किरात नामक अवतार की कथा सुनिए, जिसमें उन्होंने मूक दैत्य का वध किया और प्रसन्न होकर अर्जुन को वर दिया। कथा उठती है द्वैतवन से। जुए में छले गये पाण्डव द्रौपदी के साथ वन में दिन काट रहे थे, सूर्य की दी हुई बटलोई का आसरा था, उसी से अतिथि जीमते थे।
द्वैतवन की परीक्षा
उधर दुर्योधन से यह संतोष भी देखा नहीं गया। उसने छल के प्रयोजन से मुनिवर दुर्वासा को उकसाया कि वे पाण्डवों के पास पधारें। महर्षि अपने दस हजार शिष्यों समेत द्वैतवन पहुँचे और मनचाहे भोजन की याचना की। पाण्डवों ने प्रार्थना स्वीकार करके सब मुनियों को स्नान के लिये भेज दिया, और भीतर ही भीतर काँप उठे, अन्न था ही नहीं। संकट ऐसा कि मन ही मन प्राण त्यागने की बात उठने लगी। तब द्रौपदी ने श्रीकृष्ण का स्मरण किया। वे तत्काल आ पहुँचे और शाक के एक पत्ते का भोग लगाकर सब तपस्वियों को तृप्त कर दिया। दुर्वासा ने जान लिया कि शिष्य अघा चुके हैं, और वहीं से चलते बने।
फिर श्रीकृष्ण ने सम्मति दी कि अब शिव जी की आराधना कीजिए। पीछे व्यास जी भी पधारे, बोले, शिव जी सम्पूर्ण दुःखों के विनाशक हैं, भक्ति से थोड़े ही समय में प्रसन्न होकर इस लोक में भोग और परलोक में मोक्ष तक दे डालते हैं। अभी अर्जुन पहले दृढ़तापूर्वक शक्रविद्या का जप करें। इन्द्र पहले परीक्षा लेंगे, पीछे संतुष्ट होकर विघ्न हरेंगे और शिव जी का श्रेष्ठ मन्त्र दिलायेंगे। यों कहकर व्यास जी ने अर्जुन को वह विद्या दी, जिसे उन्होंने स्नान करके, पूर्व की ओर मुख करके ग्रहण किया। फिर पार्थिव शिवलिंग के पूजन का विधान समझाकर मुनिवर बोले, पार्थ, अब इन्द्रकील पर्वत पर जाइए और जाह्नवी के तट पर तपस्या कीजिए, यह विद्या अदृश्य रहकर सदा आपका हित करेगी। पाण्डवों को धर्म पर दृढ़ रहने का आशीर्वाद देकर व्यास जी अन्तर्धान हो गये। शिव-मन्त्र धारण करते ही अर्जुन में ऐसा अनुपम तेज व्यापा कि भाइयों को विजय का निश्चय हो गया। अर्जुन ने चारों भाइयों और द्रौपदी से अनुमति माँगी, बिछोह का दुःख सबको हुआ, पर कार्य की महत्ता देखकर सबने अनुमति दे दी।
इन्द्रकील पर तप
इन्द्रकील पर गंगा जी के समीप अर्जुन को स्वर्ग से भी बढ़कर मनोरम स्थान मिला। स्नान करके, गुरु को नमस्कार करके, मिले उपदेश के अनुसार वेष बनाकर, इन्द्रियों को समेटकर वे आसन जमाकर बैठ गये। समसूत्र सुन्दर पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसके आगे तेजोराशि शंकर का ध्यान करने लगे। तीनों समय स्नान, बारंबार पूजा, और उपासना ऐसी एकाग्र कि उनके शिरोभाग से तेज की ज्वाला निकलने लगी।
इन्द्र के गुप्तचर सहमकर देवराज से बोले, देवेश, वन में कोई पुरुष तप कर रहा है, पता नहीं वह देवता है, ऋषि है, सूर्य है या अग्नि। इन्द्र ताड़ गये कि यह तो हमारे पुत्र अर्जुन का मनोरथ है। वे परीक्षा के लिये ब्रह्मचारी ब्राह्मण के वेष में पहुँचे। अर्जुन ने अतिथि की पूजा और स्तुति करके शुभागमन का कारण पूछा। इन्द्र ने ऐसी बातें कहीं जिनसे तप डिग जाये, पर अर्जुन का निश्चय अटल निकला। तब वे असली रूप में प्रकट हुए, अर्जुन को भगवान शंकर का मन्त्र बताया, जप की आज्ञा दी, अनुचरों को रक्षा का आदेश दिया, और बोले, भद्र, राज्य कभी प्रमादपूर्वक मत कीजिएगा। साधक धैर्य रखे, रक्षक तो शिव हैं ही, वे सम्पत्ति और मोक्ष दोनों समान भाव से देंगे। इतना कहकर देवराज अपने भवन लौट गये।
सूअर, शिकारी और दो बाण
अब अर्जुन पंचाक्षर मन्त्र जपते हुए घोर तप करने लगे। उस तेज से घबराकर देवगण शिव जी से बोले, सर्वेश, वह जो चाहता है, आप दे क्यों नहीं देते। महाप्रभु हँस पड़े, बोले, देवताओ, लौट जाइए, हम सब तरह से आपका कार्य सिद्ध करेंगे।
इसी समय मूक नामक दैत्य सूअर का रूप धरकर वहाँ आया। सुनिए, उसे मायावी दुरात्मा दुर्योधन ने अर्जुन के पास भेजा था। वह पर्वत-शिखर उखाड़ता, वृक्ष तोड़ता, भाँति भाँति के शब्द करता उसी मार्ग से बढ़ा आ रहा था। अर्जुन ने शिव जी के पादपद्मों का स्मरण करके विचारा, यह क्रूरकर्मा निश्चय हमारा अनिष्ट करने आया है। जिसके दर्शन से मन प्रसन्न हो, वह हितैषी, जिसके दीखते ही मन व्याकुल हो उठे, वह शत्रु। नेत्र भी चार प्रकार के कहे गये हैं, उज्ज्वल, सरस, तिरछे और लाल। इसे देखते ही हमारी इन्द्रियाँ कलुषित हो उठीं, अतः यह वध के योग्य है, और शिव-गुरु की आज्ञा भी यही कि जो मारने पर उतारू हो, उसे बिना विचारे मार डालिए। अर्जुन बाण का संधान करके खड़े हो गये।
इसी बीच भक्तवत्सल शंकर भक्ति की परीक्षा लेने और दैत्य का नाश करने स्वयं आ पहुँचे। शिव भिल्लराज बने थे, काछ कसी हुई, वस्त्रखण्डों की ध्वजा बाँधे, अंगों पर श्वेत धारियाँ, पीठ पर भरा तरकश, हाथ में धनुष-बाण, और वैसे ही शिकारी-भेस में गणों का दल साथ। इतने में सूअर की गुर्राहट दसों दिशाओं में गूँजी, पर्वत तक झनझना उठे। चौंककर अर्जुन सोचने लगे, कहीं ये भगवान शिव तो नहीं, जो शुभ करने पधारे हैं। श्रीकृष्ण और व्यास जी ने कहा ही है कि शिव जी कल्याणकर्ता हैं। जो सर्वभाव से उन्हें भजते हैं, उन्हें स्वप्न में भी दुःख नहीं दीखता, और परीक्षा का कष्ट भी भक्त को वैसे ही निर्मल कर जाता है जैसे आग सोने को। वे विष को अमृत और अमृत को विष बना देते हैं। हम शिव को भजकर उसी से उत्तम सुख पाएँगे।
अर्जुन यों विचार ही रहे थे कि वह सूअर बाण की सीध में आ गया, और उसके पीछे लगे शिव जी भी दीख पड़े। दोनों के बीच वह शूकर अद्भुत शिखर सा जान पड़ता था। उसी क्षण दोनों ने उसपर बाण छोड़ा। शिव जी का लक्ष्य पुच्छभाग था, अर्जुन का निशाना मुख। शिव जी का बाण पूँछ से घुसकर मुख से निकला और भूमि में विलीन हो गया, अर्जुन का बाण पिछले भाग से निकलकर बगल में गिरा। दैत्य उसी क्षण मरकर ढह गया और उसका क्रूर रूप खुल गया। देवताओं ने जय-जयकार करके फूल बरसाये, शिव जी का मन संतुष्ट हुआ और अर्जुन को महान सुख मिला। वे मन ही मन बोले, यह हमें मारने आया था, पर शिव जी ने ही रक्षा की। अर्जुन ने शिव-नाम का संकीर्तन किया और बारंबार प्रणाम करके स्तुति की।
पहचान और पाशुपत
तभी किरातराज का एक अनुचर उस शिकार पर दावा लेकर आ खड़ा हुआ, यह सूअर हमारे स्वामी का है, इसे छोड़ दीजिए। अर्जुन और उस शिवदूत की कहा-सुनी बढ़ते बढ़ते युद्ध तक जा पहुँची, और किरातवेषधारी शंकर स्वयं अपने भक्त से भिड़ गये। अर्जुन के प्रहार उस शिकारी की देह पर पड़ते रहे, वही प्रहार जो आगे चलकर महादेव की पूजा गिने गये। फिर वह घड़ी आयी जब अर्जुन ने पहचान लिया कि भीलों के यह राजा साक्षात शंकर हैं। वे भक्तिपूर्वक बोले, शम्भो, आप बड़े उत्तम स्वामी हैं, हम आपकी करुणा का क्या वर्णन करें। और उन्होंने स्तुति आरम्भ की। देवाधिदेव, कैलासवासी, पंचमुख परमेश्वर, सदाशिव, आपके आगे हम सिर झुकाते हैं। जटाधारी, त्रिनेत्र, नीलकण्ठ, वामांग में गिरिजा को धारण करनेवाले वृषध्वज, आपको बारंबार प्रणाम। हाथों में डमरू, कपाल, त्रिशूल और पिनाक, श्रीविग्रह कर्पूर सा गौर, देह पर व्याघ्रचर्म, गंगाधर, गणों से सेवित गणनायक, आपको प्रणाम है। और उन आपको भी, जिन्होंने हमपर अनुग्रह करके यह किरातवेष धारण किया। जगत में जो कुछ दीखता है, सब आपका ही तेज है। वर्षा की बूँदें जैसे गिनी नहीं जातीं, वैसे ही आपके गुण अनगिनत हैं, उन्हें गिनने में वेद भी समर्थ नहीं, फिर हम किस गिनती में। आप स्वामी हैं, हम दास हैं, हमपर कृपा कीजिए।
स्तुति सुनकर शंकर जी हँसकर बोले, वत्स, हम परम प्रसन्न हैं, अब वर माँगिए। आपने हमपर जो प्रहार और आघात किये, उन्हें हमने अपनी पूजा मान लिया है। यह सब हमारी ही इच्छा से हुआ, इसमें आपका अपराध ही क्या। जो हुआ, वह शत्रुओं के बीच आपके यश और राज्य की स्थापना के लिये अच्छा ही हुआ, घबराहट छोड़िए और जो लालसा हो, माँग लीजिए, हमारे पास कुछ भी आपके लिये अदेय नहीं। अर्जुन ने हाथ जोड़, गद्गद वाणी में कहा, विभो, आप अन्तर्यामी हैं, हम क्या कहें। शत्रुओं से मिला कष्ट तो आपके दर्शन से ही नष्ट हो गया, अब वैसी कृपा कीजिए जिससे हमें इस लोक की परासिद्धि मिले।
शिव जी ने जान लिया कि अर्जुन हमारे अनन्य भक्त हैं, और उन महेश्वर ने अपना पाशुपत नामक अस्त्र, जो समस्त प्राणियों के लिये सर्वदा दुर्जय है, अर्जुन को दे दिया। बोले, वत्स, इसे धारण करने से आप समस्त शत्रुओं के लिये अजेय हो जायँगे, जाइए, विजय-लाभ कीजिए। हम कृष्ण से भी कहेंगे, वे सहायता करेंगे, क्योंकि कृष्ण हमारे आत्मस्वरूप हैं, हमारे भक्त और हमारा ही कार्य करनेवाले। भारत, हमारे प्रभाव से निष्कण्टक राज्य भोगिए और भाई युधिष्ठिर से सर्वदा धर्मकार्य कराते रहिए। यों कहकर शंकर जी ने अर्जुन के मस्तक पर कर-कमल रखा और अन्तर्धान हो गये।
वरदान और अस्त्र पाकर अर्जुन गुरु शिव का स्मरण करते हुए आश्रम लौटे। भाइयों को ऐसा आनन्द हुआ मानो मृतक शरीर में प्राण लौट आये हों, व्रतशीला द्रौपदी को भी अत्यन्त सुख मिला, और वृत्तान्त सुनते सुनते किसी की तृप्ति नहीं होती थी। उसी घड़ी आश्रम पर चन्दनमिश्रित फूलों की वर्षा होने लगी। पाण्डवों ने कल्याणकर्ता शिव को नमस्कार किया और तेरह वर्ष की अवधि पूरी होने को जानकर विजय का निश्चय कर लिया। समाचार पाकर श्रीकृष्ण भी मिलने पधारे और बोले, इसीलिये तो हमने कहा था कि शंकर जी सम्पूर्ण कष्टों के विनाशक हैं। हम नित्य उनकी सेवा करते हैं, आप लोग भी कीजिए।
नन्दीश्वर जी ने कथा समेटी, मुने, जो इस किरात-चरित को सुनता या सुनाता है, उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। एक बात साफ कह दें, महाभारत की प्रचलित कथा में शिकार की तकरार सीधे अर्जुन और किरात के बीच छिड़ती है, पर शिवपुराण का कथन यही है कि मूक को दुर्योधन ने भेजा था और पहली कहा-सुनी शिव के दूत से हुई।
आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), शतरुद्रसंहिता