नारद का अभिमान

मलय पर्वत की एक शोभासम्पन्न गुफा में, पास बहती देवनदी गंगा के किनारे, मुनिश्रेष्ठ नारद आसन बाँधकर, प्राणायाम साधकर समाधि में बैठ गए। उनका अन्तःकरण निर्मल था, और उस समाधि में वही बोध प्रकट हुआ जिसमें ब्रह्म का साक्षात्कार होता है।

यह समाचार पाकर देवराज इन्द्र काँप उठे कि कहीं यह मुनि उनका राज्य लेने को तप न कर रहे हों। उन्होंने कामदेव को स्मरण किया, और वसन्त को साथ लेकर कामदेव उस गुफा पर जा पहुँचे। दोनों ने अपनी सारी कलाएँ बिखेर दीं, पर नारद के चित्त में विकार का एक अंकुर तक न फूटा, और हारकर वे लौट गए। बात यह थी कि उसी आश्रम में पहले स्वयं भगवान शंकर ने तप किया था और वहीं कामदेव को भस्म किया था। उसी भूमि का प्रताप था कि काम का बाण वहाँ चल न सका। किन्तु नारद यह मर्म न जान सके, और काम पर मेरी विजय हुई, यह मानकर उनके मन में व्यर्थ ही गर्व उग आया।

तीन लोकों में गर्व की चर्चा

उस मद में उन्मत्त होकर मुनि सीधे कैलास पहुँचे और रुद्रदेव को अपनी विजय का सारा वृत्तान्त कह सुनाया, मानो यह सिद्धि उन्हीं के बल की हो। भगवान शंकर ने स्नेह से कहा, आप बड़े विद्वान् हैं। पर हमारी एक बात ध्यान देकर सुनिए। अब से यह चर्चा कहीं न कीजिए, और विशेष रूप से भगवान विष्णु के सामने तो इसका नाम भी न लीजिए। यह वृत्तान्त गुप्त रखने योग्य है।

पर नारद उसी माया से मोहित थे जिसने काम को जीतने का श्रेय उन्हीं को दिखा रखा था, इसलिए शिव की दी सीख उन्हें अपने हित की न जान पड़ी। वहाँ से वे ब्रह्मलोक गए और पिता ब्रह्मा से बोले, पिताजी, मैंने अपने तपोबल से कामदेव को जीत लिया। ब्रह्माजी सारा कारण जानते थे, इसलिए उन्होंने भी पुत्र को यही कहने से मना किया। किन्तु जिसकी बुद्धि माया ने हर ली हो, वह किसकी सुने। नारद वही वृत्तान्त विष्णु के सामने कहने को शीघ्र ही वैकुण्ठ जा पहुँचे।

नारद को आते देख भगवान विष्णु बड़े आदर से उठे, उन्हें हृदय से लगा लिया, और पूछा, मुनिश्रेष्ठ, कहाँ से आना हुआ। गर्व से भरे नारद ने बड़े अभिमान के साथ अपनी काम-विजय की सारी कथा कह सुनाई। विष्णु उसका यथार्थ कारण जानते थे, फिर भी बोले, मुने, आप धन्य हैं, जन्म से ही निर्विकार और नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं, आप में काम का विकार आए भी तो कैसे। यह प्रशंसा सुनकर नारद और जोर से हँस पड़े, और प्रणाम करके बोले, स्वामिन्, जब आप की कृपा मुझ पर है, तब बेचारा कामदेव क्या प्रभाव दिखा सकता है। इतना कहकर मुनि प्रसन्न होकर चल दिए।

माया की नगरी

मुनि के जाते ही शिव की इच्छा से भगवान श्रीहरि ने अपनी माया प्रकट की। नारद के मार्ग में उन्होंने सौ योजन विस्तार का एक विशाल नगर रच डाला, जो वैकुण्ठ से भी अधिक रमणीय था। वहाँ शीलनिधि नामक ऐश्वर्यशाली राजा राज्य करते थे, जिन्होंने अपनी कन्या का स्वयंवर रचा था, और उसमें चारों दिशाओं से राजकुमार पधारे थे।

ऐसे नगर को देख नारद मोहित हो गए और राजा शीलनिधि के द्वार पर जा पहुँचे। राजा ने मुनि का पूजन किया, फिर अपनी सुन्दरी कन्या श्रीमती को बुलवाकर उस से मुनि के चरणों का स्पर्श करवाया। उस देवकन्या-सी कन्या को देखकर नारद चकित रह गए और बोले, राजन्, यह कौन है। राजा ने कहा, मुने, यह मेरी पुत्री श्रीमती है, तीनों लोकों में विश्वमोहिनी नाम से विख्यात। अब इसके विवाह का समय है, यह स्वयंवर में वर चुनने जा रही है। आप इसका भाग्य बताइए।

काम से विह्वल मुनि ने कन्या की बड़ी प्रशंसा की और कहा, इसका भावी पति निश्चय ही भगवान शंकर के समान वैभवशाली होगा, किसी से पराजित न होने वाला, वीर और कामविजयी। इतना कहकर वे चल तो दिए, पर मन-ही-मन यही सोचते रहे कि इतने राजाओं को छोड़कर यह केवल मेरा ही वरण करे, यह कैसे सम्भव है। और तब उन्हें एक ही उपाय सूझा। काम से व्याकुल मुनि तुरन्त वैकुण्ठ जा पहुँचे और एकान्त में विष्णु से सारा वृत्तान्त कहकर हाथ जोड़कर बोले, भगवन्, मैं आप का दास हूँ, आप मुझे अपना रूप दे दीजिए, जिससे राजकुमारी श्रीमती निश्चय ही मुझे वर ले।

वानर का मुख

नारद की यह बात सुनकर भगवान मुसकरा दिए। उन्होंने कहा, मुने, आप उस स्थान को जाइए। जैसे श्रेष्ठ वैद्य अत्यन्त पीड़ित रोगी का हित करता है, वैसे ही मैं आप का हित करूँगा, क्योंकि आप मुझे विशेष प्रिय हैं। ऐसा कहकर विष्णु ने मुनि को मुख तो वानर का दे दिया, और शेष सारे अंगों में अपने ही समान रूप, फिर वहीं अन्तर्धान हो गए। नारद ने समझा कि उन्हें विष्णु का मनोहर रूप मिल गया है, और वे अपने को कृतकृत्य मानने लगे। भगवान ने क्या कर दिया, इसका उन्हें भान तक न हुआ।

मुनि शीघ्र ही स्वयंवर-सभा में जा पहुँचे। वहाँ बैठकर वे सोचते रहे कि मैं विष्णु के समान रूप धारण किए हूँ, अतः यह कन्या मेरा ही वरण करेगी। उन्हें पता ही न था कि उनका मुख कितना कुरूप हो चुका है। सभा में और सब लोग उन्हें उनके पुराने रूप में ही देख रहे थे, इस भेद को कोई न जान सका। केवल दो पार्षद, जो ब्राह्मण का रूप धरकर वहाँ बैठे थे, यह रहस्य जानते थे। वे भगवान शंकर के गण थे और मुनि की रक्षा के लिए आए थे। मुनि को इस दशा में देख वे आपस में हँसने लगे, पर काम से विह्वल नारद ने उनकी सच्ची बात अनसुनी कर दी।

इतने में वह सुन्दरी राजकन्या हाथ में सोने की माला लिए, स्त्रियों से घिरी सभा में आयी और अपने मन के अनुरूप वर खोजती हुई घूमने लगी। जब उसकी दृष्टि विष्णु-जैसे शरीर पर वानर-जैसा मुख धरे नारद पर पड़ी, तब वह रुष्ट होकर आगे बढ़ गयी। अपने योग्य वर को न देखकर वह चुपचाप खड़ी रह गयी, किसी के गले में जयमाला न डाली। तभी राजा का रूप धारण किए स्वयं भगवान विष्णु वहाँ आ पहुँचे, जिन्हें और किसी ने नहीं देखा, केवल उसी कन्या की दृष्टि उन पर पड़ी। भगवान को देखते ही राजकुमारी का मुख खिल उठा, और उसने तुरन्त उनके कण्ठ में माला पहना दी। राजा-रूपधारी विष्णु उस कन्या को साथ लेकर वहीं से अन्तर्धान हो गए।

इधर सब राजकुमार निराश हो गए, और नारद काम की वेदना से अत्यन्त विह्वल हो उठे। तब वे दोनों ब्राह्मण-रूपधारी शिवगण बोले, हे नारद, आप व्यर्थ ही काम से मोहित हो रहे हैं और सौन्दर्य के बल से राजकुमारी को पाना चाहते हैं। जरा दर्पण में अपना वानर-सा घृणित मुख तो देख लीजिए। यह सुनकर नारद को बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने दर्पण में अपना वानर-सा मुख देखा और क्रोध से जल उठे। माया से मोहित होकर उन्होंने उन्हीं दोनों शिवगणों को शाप दे दिया, अरे, आप दोनों ने मुझ ब्राह्मण का उपहास किया है, इसलिए ब्राह्मण के वीर्य से उत्पन्न राक्षस हो जाइए, ब्राह्मण की सन्तान होकर भी आप के आकार राक्षस के समान होंगे। यह सुनकर भी वे दोनों गण, मुनि को मोहित जानकर कुछ न बोले, और सब कुछ शिव की इच्छा मानकर उदासीन भाव से वहाँ से चले गए।

विष्णु को शाप

माया से मोहित नारद उन गणों को शाप देकर भी शिव की इच्छा से इस मोह-निद्रा से जाग न सके। विष्णु के किए कपट को याद कर, प्रज्वलित अग्नि की भाँति जलते हुए वे वैकुण्ठ जा पहुँचे और दुर्वचन कहने लगे। हे हरि, आप बड़े कपटी हैं, सारे संसार को मोह में डाले रखते हैं, और दूसरों का उत्कर्ष आप से सहा नहीं जाता। पहले भी आप ही ने मोहिनी का रूप धरकर असुरों को वारुणी पिला दी थी, अमृत नहीं पीने दिया। यदि महेश्वर रुद्र दया करके विष न पी लेते, तो आप की सारी माया उसी दिन समाप्त हो जाती। छल आप को अधिक प्रिय है। आज मैं आप को ऐसी सीख दूँगा कि फिर कभी ऐसा कर्म न करेंगे।

फिर अपना ब्रह्मतेज दिखाते हुए क्रोध से खिन्न नारद ने शाप देते हुए कहा, हे विष्णो, आप ने एक स्त्री के लिए मुझे व्याकुल किया है, इसलिए जिस रूप से आप ने मुझे वानर-मुख बनाया, उसी रूप में आप मनुष्य होकर वियोग का दुःख भोगिए। जिन वानरों के समान आप ने मुझे बनाया, वे ही उस समय आप के सहायक हों। आप ने मुझे स्त्री-विरह का दुःख दिया, अतः स्वयं भी आप को वियोग का दुःख मिले, और अज्ञान से मोहित मनुष्यों के समान आप की स्थिति हो।

माया हटी, गर्व गला

नारद ने जब अज्ञान से मोहित होकर यह शाप दे दिया, तब भगवान विष्णु ने शम्भु की महिमा का स्मरण करते हुए उसे स्वीकार कर लिया। और महालीला करने वाले शम्भु ने अपनी वह विश्वमोहिनी माया समेट ली, जिसके कारण ज्ञानी नारद तक मोहित हो गए थे। माया के हटते ही नारद को शुद्ध बुद्धि और पहले-सा ज्ञान लौट आया, और सारी व्याकुलता जाती रही। अब उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हुआ, वे बार-बार अपनी ही निन्दा करने लगे। यह जानकर कि यह सब उनका माया-जनित भ्रम ही था, नारद भगवान श्रीहरि के चरणों में गिर पड़े।

भगवान ने उन्हें उठाकर छाती से लगाया, तब मुनि बोले, नाथ, माया से मोहित होने के कारण मेरी बुद्धि बिगड़ गयी थी, इसीलिए मैंने आप के प्रति कटु वचन कहे, यहाँ तक कि शाप तक दे डाला। प्रभो, उस शाप को आप मिथ्या कर दीजिए। मैंने बहुत बड़ा अपराध किया, अब तो निश्चय ही नरक में पड़ूँगा। मुझे कोई प्रायश्चित्त बताइए, जिससे मेरा पाप नष्ट हो जाय।

विष्णु ने मधुर वाणी में कहा, तात, खेद न कीजिए, आप मेरे श्रेष्ठ भक्त हैं। यह शाप तो भगवान शिव की ही इच्छा से फलीभूत होगा। आप मद से मोहित होकर मेरी बात नहीं मानी, उसी अपराध से शिव ने आप को यह फल दिया, क्योंकि कर्म के फल के दाता वही हैं। अपने मन में यह निश्चय कर लीजिए कि यह सब भगवान शिव की इच्छा से ही हुआ है। सबके स्वामी परमेश्वर शंकर ही गर्व को दूर करने वाले हैं, वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं, जो अपनी माया लेकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में प्रकट होते हैं।

फिर उन्होंने एक सुन्दर उपाय बताया, अपने सारे संशय त्यागकर आप भगवान शंकर की महिमा का गान कीजिए, अनन्य भाव से उनके शतनाम स्तोत्र का पाठ कीजिए और नित्य उन्हीं की उपासना कीजिए। शिव का नाम उस दावानल के समान है, जिससे पापों के बड़े-बड़े पर्वत सहज ही भस्म हो जाते हैं। जो उनके नाम-रूपी नौका का आश्रय लेता है, वह संसार-सागर से पार हो जाता है। पहले आप आनन्दवन काशी जाकर विश्वनाथ का पूजन कीजिए, फिर मेरी आज्ञा से ब्रह्मलोक जाकर ब्रह्माजी से शिव का माहात्म्य और उनका शतनाम स्तोत्र सुनिए। इतना प्रेमपूर्ण उपदेश देकर भगवान विष्णु श्रीशिव का स्मरण करते हुए अन्तर्धान हो गए।

जिस तप ने नारद को तीनों लोकों में अजेय बना दिया था, उसी का मद उन्हें वानर के मुख तक ले आया। और जो शाप उन्होंने कुपित होकर दिया, वह मिटा नहीं, शिव की इच्छा से आगे विष्णु के मनुष्य-रूप में उतरने का बीज बन गया। इस संहिता में सारा प्रसंग शिव की महिमा की ओर मुड़ता है, यहाँ तक कि विष्णु स्वयं नारद को शिव के भजन की राह दिखाते हैं।

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता (प्रथम सृष्टि खण्ड)