काल भैरव

काशीके घाटोंपर चिताओंका धुआँ आकाशकी ओर उठ रहा था, और उसी नगरीके किसी कोनेमें कालभैरवका ध्यान लगाये भक्त सारी रात जागते रहते थे। नन्दीश्वरने सनत्कुमारके सामने पहले भगवान् शंकरके भैरव-अवतारका वर्णन किया, फिर कहने लगे।

कालभैरवकी महिमा

मार्गशीर्ष मासके कृष्णपक्षकी अष्टमीको भगवान् शंकरने भैरवका रूप धारण किया था। इसीलिये जो मनुष्य उस तिथिको कालभैरवके समीप उपवास करके रातमें जागरण करता है, वह समस्त पापोंसे छूट जाता है। जो भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करता है, वह बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त होकर सद्गतिको पाता है, और लाखों जन्मोंमें किये हुए पाप भी कालभैरवके दर्शनमात्रसे जड़से मिट जाते हैं। किन्तु जो कालभैरवके भक्तका अनिष्ट करता है, वह इसी जन्ममें दुःख भोगकर फिर दुर्गतिमें जा गिरता है।

काशीमें तो इस उपासनाका विशेष प्रभाव है। जो वहाँ रहकर भी कालभैरवका भजन नहीं करता, उसके पाप शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति बढ़ते जाते हैं, और जो प्रत्येक भौमवारको, कृष्णाष्टमीके दिन, इस कालराजकी पूजा नहीं करता, उसका पुण्य कृष्णपक्षके चन्द्रमाकी तरह घटता चला जाता है। इस कथामें कालभैरवका प्रसंग उनके द्वारा ब्रह्माका शीश काटनेवाली और कपाल-व्रतवाली प्रसिद्ध कथाके रूपमें नहीं, बल्कि उनकी महिमा और काशीमें उनकी उपासनाके फलके रूपमें कहा गया है।

नर्मदाके तटपर एक साध

पुरानी बात है। नर्मदाके रमणीय तटपर नर्मपुर नामका एक नगर था। वहीं विश्वानर नामके एक मुनि रहते थे। वे शाण्डिल्यके वंशमें उत्पन्न, परम पवित्र, पुण्यात्मा, शिवभक्त और जितेन्द्रिय थे, और सदा ब्रह्मयज्ञमें लगे रहते थे। उन्होंने शुचिष्मती नामकी एक सद्गुणवती कन्यासे विवाह किया और ब्राह्मणोचित कर्म करते हुए देवता तथा पितरोंको प्रिय लगनेवाला जीवन बिताने लगे।

बहुत समय बीत जानेपर एक दिन उत्तम व्रतका पालन करनेवाली शुचिष्मती अपने पतिसे बोलीं, ‘प्राणनाथ! स्त्रीके योग्य जितने सुख हैं, वे सब हमने आपकी कृपासे आपके साथ रहकर भोग लिये। पर हमारे मनमें एक लालसा बहुत दिनोंसे बैठी है, और वह गृहस्थके लिये उचित भी है। स्वामी! यदि हम वर पानेके योग्य हैं और आप देना चाहते हैं, तो हमें महेश्वर-जैसा पुत्र दीजिए। इसके सिवा हम और कुछ नहीं चाहतीं।’

पत्नीकी यह बात सुनकर विश्वानर पल-भर मौन हो गये। वे मनमें सोचने लगे कि इस सूक्ष्माङ्गी स्त्रीने कैसा दुर्लभ वर माँग लिया, जो उनके अपने मनोरथोंसे भी बहुत दूर है। फिर उन्हें भरोसा हुआ कि शिव तो सब कुछ करनेमें समर्थ हैं, ऐसा जान पड़ता है कि उन्हीं शम्भुने इसके मुखमें बैठकर यह बात कहलाई है, नहीं तो दूसरा कौन ऐसा वर सुझा सकता था।

वीरेश-लिंगमें बालक

पत्नीको आश्वासन देकर वह एकपत्नीव्रती मुनि वाराणसी चले गये और घोर तपके द्वारा भगवान् शिवके वीरेश-लिंगकी आराधना करने लगे। पूरे एक वर्ष तक उन्होंने भक्तिपूर्वक तीनों समय उस लिंगकी अर्चना की। तेरहवाँ महीना आनेपर एक दिन वे प्रातःकाल त्रिपथगामिनी गंगामें स्नान करके ज्यों ही वीरेशके पास पहुँचे, त्यों ही उन्हें उस लिंगके बीचमें विभूति लगाये एक आठ वर्षका बालक दिखाई दिया। उस नन्हे शिशुके नेत्र कानोंतक फैले थे, होठोंपर गहरी लालिमा थी, मस्तकपर पीले रंगकी सुन्दर जटा शोभा दे रही थी और मुखपर हँसी खेल रही थी। वह बालोचित आभूषण और चिता-भस्म धारण किये अपनी लीलासे हँसता हुआ श्रुतिके सूक्तोंका पाठ कर रहा था।

उस बालकको देखते ही विश्वानर कृतार्थ हो गये, आनन्दसे उनका शरीर रोमांचित हो उठा और बार-बार ‘नमस्कार है, नमस्कार है’ कहते हुए उनका हृदय भर आया। फिर वे हाथ जोड़कर उस बालरूपधारी शम्भुकी स्तुति करने लगे, ‘भगवन्! आप ही एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म हैं, यह सारा जगत् आपका ही रूप है, यहाँ दूसरा कुछ भी नहीं। रुद्रके सिवा किसीकी सत्ता नहीं, इसलिये हम आपकी ही शरण लेते हैं। आप एक होकर भी अनेक रूपोंमें व्याप्त हैं, फिर भी रूपसे परे हैं। जलमें शीतलता, अग्निमें ताप, चन्द्रमें आह्लाद और पुष्पमें गन्ध, सब आपका ही रूप है। आप गौरीके प्राणनाथ, दिगम्बर और परम शान्त हैं, तथा बाल, युवा और वृद्ध, सब रूपोंमें आप ही हैं। ऐसी कौन-सी वस्तु है जिसमें आप न हों? हम आपके चरणोंमें सिर झुकाते हैं।’

इन्हीं आठ पदोंसे स्तुति करके विश्वानर भूमिपर गिरना ही चाहते थे कि वृद्धोंके भी वृद्ध वह बालरूपधारी शिव परम प्रसन्न होकर बोले, ‘मुनिश्रेष्ठ! आज आपने हमें संतुष्ट कर दिया। कोई उत्तम वर माँग लीजिए।’ विश्वानरने हाथ जोड़कर कहा कि सर्वज्ञसे कोई बात छिपी नहीं, इसलिये वे ही जो उचित समझें, वही दें। तब बालरूपधारी महादेव बोले, ‘आपके हृदयमें अपनी पत्नी शुचिष्मतीके लिये जो लालसा है, वह थोड़े ही दिनोंमें पूरी होगी। हम स्वयं शुचिष्मतीके गर्भसे आपके पुत्र होकर प्रकट होंगे और हमारा नाम गृहपति होगा। जो मनुष्य एक वर्ष तक तीनों समय आपके कहे इस पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करेगा, उसकी सारी कामनाएँ पूरी होंगी, यह स्तोत्र पुत्र, पौत्र और धन देनेवाला तथा सारी विपत्तियोंका नाश करनेवाला है।’ इतना कहकर वह बालक अन्तर्धान हो गया, और विश्वानर प्रसन्न मनसे अपने घर लौट आये।

गृहपतिका जन्म और नारदकी चेतावनी

घर आकर विश्वानरने सारा वृत्तान्त पत्नीको सुनाया, और शुचिष्मती अपने भाग्यकी सराहना करने लगीं। समय आनेपर वे गर्भवती हुईं, और आठवाँ महीना आनेपर मुनिने विधिपूर्वक उनका सीमन्त-संस्कार कराया। फिर शुभ लग्नमें भगवान् शंकर शुचिष्मतीके गर्भसे पुत्ररूपमें प्रकट हुए। उस समय दिशाएँ निर्मल हो गईं, बादल फूलोंकी वर्षा करने लगे, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और नदियोंका जल स्वच्छ हो गया। ऋषि, मुनि, देवता, यक्ष, किन्नर और विद्याधर मंगल-द्रव्य लेकर आये। स्वयं ब्रह्माजीने बालकका जातकर्म किया और उसके रूप तथा वेदपर विचार करके ग्यारहवें दिन उसका नाम गृहपति रखा। फिर सब देवता आशीर्वाद देकर अपने-अपने लोकको लौट गये।

विश्वानरने समयपर बालकके सब संस्कार किये और उसे वेद पढ़ाया। नवें वर्षमें, जब गृहपति माता-पिताकी सेवामें लगा था, नारद वहाँ पधारे। बालकने माता-पितासहित उन्हें प्रणाम किया। नारदने उसकी हस्तरेखा, जिह्वा और तालु आदि लक्षण देखकर कहा, ‘मुनि विश्वानर! आपका पुत्र बड़ा भाग्यवान् है, इसके सब अंग शुभ लक्षणोंसे भरे हैं। पर एक बात है, इसकी रक्षा स्वयं विधाताको भी करनी होगी। इसके बारहवें वर्षमें इसपर बिजली या अग्निका भारी संकट आयेगा।’ इतना कहकर नारद देवलोकको चले गये।

यह सुनते ही विश्वानर छाती पीटने लगे और पुत्र-शोकसे मूर्च्छित हो गये। शुचिष्मती भी ऊँचे स्वरसे रो पड़ीं। माता-पिताको इस तरह शोकमें डूबा देखकर शंकरके अंशसे उत्पन्न वह बालक मुसकराकर बोला, ‘माताजी, पिताजी! आप रोते क्यों हैं? यदि हम आपकी चरण-रज लगाकर अपने शरीरकी रक्षा कर लें, तो हमपर काल भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकता, फिर इस तुच्छ मृत्युकी क्या बात? हमारी प्रतिज्ञा सुनिए। यदि हम आपके पुत्र हैं तो ऐसा यत्न करेंगे कि मृत्यु स्वयं डर जाये, हम मृत्युंजयकी आराधना करके महाकालको भी जीत लेंगे।’ बालकके ये वचन असमयकी अमृत-वर्षा जैसे थे, उन्हें सुनकर दोनों दम्पतिका शोक जाता रहा, और वे बोले, ‘बेटा! आप उन शिवकी शरणमें जाइए, जो ब्रह्मा आदिके भी रचयिता और विश्वकी रक्षामणि हैं।’

इन्द्रका छल और अग्नीश्वरका वर

माता-पिताकी आज्ञा पाकर गृहपतिने उन्हें प्रणाम किया, प्रदक्षिणा की, और आश्वासन देकर उस वाराणसीपुरीकी ओर चल पड़ा जो ब्रह्मा और नारायण जैसे देवोंके लिये भी दुर्लभ है और विश्वनाथसे सुरक्षित है। वहाँ पहुँचकर वह पहले मणिकर्णिकापर गया, विधिपूर्वक स्नान करके विश्वनाथका दर्शन किया, और परमानन्दमें डूबकर तीनों लोकोंके रक्षक शिवको प्रणाम किया। फिर शुभ दिनमें उसने एक शिवलिंगकी स्थापना की और पवित्र गंगाजलसे भरे एक सौ आठ कलशोंसे शिवका अभिषेक करके ऐसे कठोर नियम धारण किये जो साधारण जनके लिये दुष्कर थे। एक वर्ष इसी तरह शिवमें मन लगाकर तप करते बीत गया।

जन्मसे बारहवाँ वर्ष आनेपर, नारदके वचनको सच करते हुए, वज्रधारी इन्द्र गृहपतिके पास आये और बोले, ‘विप्रवर! हम इन्द्र हैं और आपके व्रतसे प्रसन्न होकर आये हैं। वर माँगिए, हम आपकी मनचाही पूरी कर देंगे।’ गृहपतिने कहा, ‘मघवन्! हम जानते हैं आप वज्रधारी इन्द्र हैं, पर हम आपसे वर नहीं माँगना चाहते, हमारे वरदाता तो शंकर ही होंगे।’ इन्द्रने कहा कि शंकर उनसे भिन्न नहीं, वे देवराज हैं, अतः मूर्खता छोड़कर वर माँग लीजिए। तब गृहपतिने दृढ़ होकर उत्तर दिया, ‘पाकशासन! आप तो वही हैं न, जिन्होंने अहल्याका सतीत्व नष्ट किया और पर्वतोंके वैरी बने? हम पशुपतिको छोड़कर किसी और देवके सामने याचना नहीं करेंगे।’

यह सुनकर इन्द्रके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। वे अपना भयंकर वज्र उठाकर बालकको डराने-धमकाने लगे। बिजलीकी लपटोंसे भरे उस वज्रको देखकर गृहपतिको नारदके वचन याद आ गये और वह भयसे मूर्च्छित हो गया। तभी अनाथोंके रक्षक गौरीपति शम्भु वहाँ प्रकट हो गये और उसे जीवन देते हुए बोले, ‘वत्स! उठिए, उठिए, आपका कल्याण हो।’ रातमें बन्द हुए कमलकी तरह गृहपतिके नेत्र खुल गये, और उसने अपने सामने सैकड़ों सूर्योंसे अधिक तेजस्वी शम्भुको खड़ा देखा। ललाटपर तीसरा नेत्र, कण्ठमें नीला चिह्न, वाम भागमें गिरिजा, मस्तकपर चन्द्रमा, बड़ी-बड़ी जटाएँ, हाथोंमें त्रिशूल और आजगव धनुष, कर्पूर-जैसा गौर शरीर और गजचर्मका परिधान। शास्त्रके लक्षणों और गुरुके वचनोंसे जब उसने पहचाना कि ये साक्षात् महादेव हैं, तो हर्षके आँसू छलक आये, गला रुँध गया और वह पर्वतकी तरह निश्चल खड़ा रह गया। जब वह स्तुति या प्रणाम, कुछ भी न कर सका, तब शिव मुसकराकर बोले।

‘गृहपते! जान पड़ता है आप वज्रधारी इन्द्रसे डर गये। वत्स! डरिए मत। हमारे भक्तपर इन्द्र और वज्रकी तो बात ही क्या, यमराज भी प्रभाव नहीं डाल सकते। यह तो हमने आपकी परीक्षा ली थी, इन्द्रका रूप धरकर हमने ही आपको डराया था। अब हम आपको वर देते हैं। आजसे आप अग्निपदके अधिकारी होंगे और समस्त देवताओंके वरदाता बनेंगे। आप सब प्राणियोंके भीतर जठराग्नि-रूपसे विचरण करेंगे और दिक्पालके रूपमें धर्मराज तथा इन्द्रके बीच राज्य पायेंगे। आपकी स्थापित यह शिवलिंग आपके नामपर अग्नीश्वर नामसे प्रसिद्ध होगी। जो इसका भक्त होगा, उसे बिजली और अग्निका भय नहीं रहेगा, न मन्दाग्निका रोग होगा और न अकाल-मृत्यु, और जो काशीमें अग्नीश्वरकी अर्चना करेगा, वह प्रारब्धवश कहीं भी मरे, अन्तमें वह्निलोकमें प्रतिष्ठित होगा।’

यों कहकर शिवने गृहपतिके बन्धुओंको बुलाकर, माता-पिताके सामने, उसे दिक्पतिके पदपर अभिषिक्त कर दिया और स्वयं उसी लिंगमें समा गये। यही अग्नि शम्भुकी प्रत्यक्ष तेजोमयी मूर्ति है, जो सृष्टि रचती, पालती और संहारती है, इसीके द्वारा ग्रहण किया हुआ धूप, दीप और नैवेद्य देवता स्वर्गमें भोगते हैं। जो अपवित्र है, वह अग्निका स्पर्श पाते ही पवित्र हो जाता है, इसीलिये अग्निको पावक कहा जाता है।

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), शतरुद्रसंहिता