अष्टावक्र गीता · प्रकरण 17: तत्त्वस्वरूप

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 17

तत्त्वस्वरूप

The Nature of the Wise · 20 श्लोक

अष्टावक्र अब portrait मोड में हैं। बीस श्लोकों में ज्ञानी (जीवन्मुक्त) की characteristics। हर श्लोक एक sketch है। पढ़ कर लगता है, “क्या ऐसा सम्भव है?”

श्लोक 1
अष्टावक्र उवाच
तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा।
तृप्तः स्वच्छेन्द्रियो नित्यमेकाकी रमते तु यः॥
tena jñāna-phalaṁ prāptaṁ yogābhyāsa-phalaṁ tathā
tṛptaḥ svacchendriyo nityam ekākī ramate tu yaḥ

अर्थ“उसने ज्ञान का फल पा लिया, और योगाभ्यास का फल भी। जो तृप्त, स्वच्छ-इन्द्रिय, नित्य अकेला रमण करता है।”

सन्दर्भ“एकाकी रमते”। अकेले रमण करना। बाहर अकेला हो या भीड़ में, अन्दर एक। यह loneliness नहीं, aloneness है, completeness का sign।

पाठक के लिएaloneness का feel कैसे आए? company की चाह कम होने पर। आज एक घंटा अकेले बिताओ, बिना phone, बिना podcast। पहले बेचैनी, फिर कुछ और।

श्लोक 2
अष्टावक्र उवाच
न कदाचिज्जगत्यस्मिन्तत्त्वज्ञो हन्त खिद्यति।
यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम्॥
na kadācij jagaty asmin tattva-jño hanta khidyati
yata ekena tenedaṁ pūrṇaṁ brahmāṇḍa-maṇḍalam

अर्थ“इस जगत में तत्त्व-ज्ञानी कभी खेद नहीं करता। क्योंकि उसी एक से यह पूरा ब्रह्माण्ड मण्डल भरा है।”

सन्दर्भ“ब्रह्माण्ड मण्डल” से “एक” का व्याप्त होना। जब “अकेले” से सब भरा है, तो “अकेलापन” का concept ख़त्म।

पाठक के लिएखेद का root है, “मैं और सब”। अगर “सब मैं”, तो खेद किस से? आज खेद हुआ? यह श्लोक recall करें।

श्लोक 3
अष्टावक्र उवाच
न जातु विषयाः केऽपि स्वारामं हर्षयन्त्यमी।
सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभं निम्बपल्लवाः॥
na jātu viṣayāḥ ke’pi svārāmaṁ harṣayanty amī
sallakī-pallava-prītam iva-ibhaṁ nimba-pallavāḥ

अर्थ“विषय कभी भी स्व-आराम वाले को हर्षित नहीं कर सकते। जैसे सल्लकी के पत्ते खा कर खुश हाथी को नीम के पत्ते।”

सन्दर्भहाथी का metaphor। हाथी को सल्लकी (एक sweet leaf) का स्वाद है। नीम के कड़वे पत्ते उसे excite नहीं करते। ज्ञानी का “स्व-आराम” का स्वाद है। बाहर के sense-objects उसको excite नहीं करते।

पाठक के लिएएक बार जब “अन्दर का सुख” का स्वाद आ जाए, बाहर का सुख कम attractive लगने लगता है। यह repression नहीं, comparison है।

श्लोक 4
अष्टावक्र उवाच
यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासितः।
अभुक्तेषु निराकाङ्क्षी तादृशो भवदुर्लभः॥
yas tu bhogeṣu bhukteṣu na bhavaty adhivāsitaḥ
abhukteṣu nirākāṅkṣī tādṛśo bhava-durlabhaḥ

अर्थ“जो भोगे हुए भोगों में लिप्त नहीं, और न-भोगे हुए में आकांक्षा-रहित, ऐसा संसार में दुर्लभ है।”

सन्दर्भदो ट्रैप: भोगा हुआ memory (“कितना अच्छा था”), नहीं भोगा हुआ desire (“होगा तो कितना अच्छा”)। दोनों से free। ज्ञानी सिर्फ़ present में।

पाठक के लिएआज की 24 घंटे में कितना समय past के memories या future की imaginations में बीता? Probably ज़्यादातर। Present moment में कितना? कम।

श्लोक 5
अष्टावक्र उवाच
बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते।
भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी विरलो हि महाशयः॥
bubhukṣur iha saṁsāre mumukṣur api dṛśyate
bhoga-mokṣa-nirākāṅkṣī viralo hi mahāśayaḥ

अर्थ“संसार में भोगने वाले बहुत हैं, मोक्ष चाहने वाले भी दिखते हैं। मगर भोग-मोक्ष दोनों से निराकांक्षी, ऐसा महाशय दुर्लभ है।”

सन्दर्भतीन तरह के लोग: भोगी (विषय चाहते), मुमुक्षु (मोक्ष चाहते), और ज्ञानी (कुछ नहीं चाहता)। तीसरी category सबसे rare।

पाठक के लिए“मोक्ष चाहना” “भोग चाहना” से बेहतर है, मगर ultimate नहीं। दोनों चाह हैं। चाह drop होगी तब असली बात।

श्लोक 6
अष्टावक्र उवाच
धर्मार्थकाममोक्षेषु जीविते मरणे तथा।
कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता न हि॥
dharmārtha-kāma-mokṣeṣu jīvite maraṇe tathā
kasyāpy udāra-cittasya heyopādeyatā na hi

अर्थ“धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष में, जीवन-मरण में, किसी उदार-चित्त वाले के लिए हेय-उपादेय नहीं।”

सन्दर्भछह categories list: धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, जीवन, मरण। मनुष्य की पूरी कोशिश इन छह से डील करने में है। ज्ञानी छह से free।

पाठक के लिए“उदार-चित्त”। यह वो mind है जो किसी एक goal में locked नहीं। जीवन को goal-driven नहीं, flow-driven चलाता है।

श्लोक 7
अष्टावक्र उवाच
वाञ्छा न विश्वविलये न द्वेषस्तस्य च स्थितौ।
यथा जीविकया तस्माद् धन्य आस्ते यथासुखम्॥
vāñchā na viśva-vilaye na dveṣas tasya ca sthitau
yathā jīvikayā tasmād dhanya āste yathā-sukham

अर्थ“न विश्व के विलय की इच्छा, न उसके बने रहने से द्वेष। जो जीविका मिले उसी से, धन्य पुरुष सुख से रहता है।”

सन्दर्भ“यथा जीविकया”। जो जीविका मिले, उसी से। न ज़्यादा की चाह, न कम का गुस्सा। यह व्यवहारिक statement है।

पाठक के लिए“मैं और कमा सकता था” यह thought बहुत common है। ज्ञानी इस thought से free है। जो मिल रहा है, उसी में संतुष्ट।

श्लोक 8
अष्टावक्र उवाच
कृतार्थोऽनेन ज्ञानेनेत्येवं गलितधीः कृती।
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्नस्ते यथासुखम्॥
kṛtārtho’nena jñānenety evaṁ galita-dhīḥ kṛtī
paśyan śṛṇvan spṛśan jighrann aśnann āste yathā-sukham

अर्थ“‘इस ज्ञान से मैं कृतार्थ हो गया’, इस गली हुई बुद्धि वाला कृती, देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, सुख से रहता है।”

सन्दर्भ“गलित-धी”। जिसकी बुद्धि गल गयी। यानी अब “सोच” rigid नहीं। और activities सब हो रही हैं, मगर “I am doing” का sense नहीं।

पाठक के लिएपाँचों इन्द्रियों की लिस्ट। दिन भर हर एक काम पर हो। मगर “मैं देख रहा हूँ” से “देखना हो रहा है” में shift।

श्लोक 9
अष्टावक्र उवाच
शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च।
न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे॥
śūnyā dṛṣṭir vṛthā ceṣṭā vikalānīndriyāṇi ca
na spṛhā na viraktir vā kṣīṇa-saṁsāra-sāgare

अर्थ“दृष्टि शून्य, चेष्टा व्यर्थ, इन्द्रियाँ शिथिल। न स्पृहा, न विरक्ति, उस ज्ञानी की जिसके लिए संसार-सागर क्षीण हो गया।”

सन्दर्भ“शून्या दृष्टि”। आँख देख रही है, मगर “देखना” का engagement नहीं। यह withdrawal नहीं, transcendence है।

पाठक के लिएज्ञानी की आँख में “ख़ालीपन” दिखता है। यह depression नहीं। यह “deeply present, no agenda” का look है।

श्लोक 10
अष्टावक्र उवाच
न जागर्ति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति।
अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः॥
na jāgarti na nidrāti nonmīlati na mīlati
aho para-daśā kvāpi vartate mukta-cetasaḥ

अर्थ“न जागता, न सोता, न आँख खोलता, न बन्द करता। अहो! मुक्त-चेता की वो पर-दशा कहीं वर्तित होती है।”

सन्दर्भ“पर-दशा”। transcendent state। जिसमें waking-sleeping का distinction collapse हो गया। हमेशा “जागृत” awareness, इसलिए “जागना” significant नहीं। हमेशा calm, इसलिए “सोना” भी।

पाठक के लिए“मैं सोता हूँ” यह एक belief है। यह कौन सो रहा है? शरीर। mind। mगर “मैं”, awareness, क्या सोती है? सपने भी आप ही देखते हो। तो “मैं” तो हमेशा जागृत।

श्लोक 11
अष्टावक्र उवाच
सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः सर्वत्र विमलाशयः।
समस्तवासनामुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते॥
sarvatra dṛśyate svasthaḥ sarvatra vimalāśayaḥ
samasta-vāsanā-mukto muktaḥ sarvatra rājate

अर्थ“सब जगह स्वस्थ, सब जगह निर्मल-आशय। सब वासनाओं से मुक्त, मुक्त पुरुष सब जगह राजमान होता है।”

सन्दर्भ“सर्वत्र राजते”। हर जगह royal लगता है। यह बाहरी posture नहीं। जब अन्दर वासना-मुक्त है, तो भौतिक situation किसी भी प्रकार की हो, presence में majesty है।

पाठक के लिएtrue royalty material नहीं, inner है। राजा भी अन्दर बेचैन हो सकता है। ज्ञानी कुर्सी पर बैठा भी, “राजमान”।

श्लोक 12
अष्टावक्र उवाच
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन् गृह्णन् वदन् व्रजन्।
ईहितानीहितैर्मुक्तो मुक्त एव महाशयः॥
paśyan śṛṇvan spṛśan jighrann aśnan gṛhṇan vadan vrajan
īhitānīhitair mukto mukta eva mahāśayaḥ

अर्थ“देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, पकड़ते, बोलते, चलते, इच्छा-अनिच्छा से मुक्त, महाशय मुक्त ही है।”

सन्दर्भआठ activities की list। सब normal human activities। मगर ज्ञानी की activities में “इच्छा-अनिच्छा” का drive नहीं। बस होती हैं।

पाठक के लिएहर activity के पीछे एक micro-motivation है। उसे detect करो। अगर motivation absent है, तो activity natural। अगर present है, तो activity load।

श्लोक 13
अष्टावक्र उवाच
न निन्दति न च स्तौति न हृष्यति न कुप्यति।
न ददाति न गृह्णाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः॥
na nindati na ca stauti na hṛṣyati na kupyati
na dadāti na gṛhṇāti muktaḥ sarvatra nīrasaḥ

अर्थ“न निन्दा करता, न स्तुति। न हर्षित होता, न क्रुद्ध। न देता, न लेता। मुक्त सब जगह नीरस (rasaless) है।”

सन्दर्भ“नीरस”। “without taste” का literal अर्थ। यह “boring” नहीं, यह “no preference” है। न ज़्यादा मिर्च चाहिए, न ज़्यादा मीठा। बस।

पाठक के लिएआज छह actions list की: निन्दा-स्तुति-हर्ष-क्रोध-दान-स्वीकार। हर एक check करो। कितनी बार किया? यह gauge है।

श्लोक 14
अष्टावक्र उवाच
सानुरागां स्त्रियं दृष्ट्वा मृत्युं वा समुपस्थितम्।
अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एव महाशयः॥
sānurāgāṁ striyaṁ dṛṣṭvā mṛtyuṁ vā samupasthitam
avihvala-manāḥ svastho mukta eva mahāśayaḥ

अर्थ“राग वाली स्त्री देख कर, या मृत्यु को सामने आते देख कर, जिसका मन अविचलित और स्वस्थ है, वो महाशय मुक्त है।”

सन्दर्भदो extreme situations: सबसे tempting (अनुरागी स्त्री) और सबसे scary (मृत्यु)। दोनों में same equanimity। यह test है।

पाठक के लिए“विचलित” यानी shaken। ज़्यादातर लोग इन दो situations में shake हो जाते हैं। ज्ञानी नहीं। यह discipline से नहीं आता, recognition से।

श्लोक 15
अष्टावक्र उवाच
सुखे दुःखे नरे नार्यां सम्पत्सु च विपत्सु च।
विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः॥
sukhe duḥkhe nare nāryāṁ sampatsu ca vipatsu ca
viśeṣo naiva dhīrasya sarvatra sama-darśinaḥ

अर्थ“सुख-दुःख में, पुरुष-स्त्री में, सम्पत्ति-विपत्ति में, धीर का कोई फ़र्क़ नहीं। वो हर जगह सम-दर्शी।”

सन्दर्भ“पुरुष-स्त्री”। gender beyond। ज्ञानी का body gendered है, मगर पहचान gender-free। हर इन्सान वही चेतना।

पाठक के लिएहम सब के अन्दर gender-bias है, conscious or unconscious। ज्ञान का एक sign यह bias का drop है।

श्लोक 16
अष्टावक्र उवाच
न हिंसा नैव कारुण्यं नौद्धत्यं न च दीनता।
नाश्चर्यं विकृतिर्नैव क्षीणसंसरणे नरे॥
na hiṁsā naiva kāruṇyaṁ nauddhatyaṁ na ca dīnatā
nāścaryaṁ vikṛtir naiva kṣīṇa-saṁsaraṇe nare

अर्थ“न हिंसा, न करुणा, न उद्धत्य, न दीनता। न आश्चर्य, न विकृति। यह सब उस पुरुष में नहीं जिसका संसरण क्षीण हो गया।”

सन्दर्भ“करुणा भी नहीं?” यह तो awakening का sign कहा गया है। मगर अष्टावक्र की position से, “करुणा” भी एक emotion है। ज्ञानी emotions से परे। उसकी “करुणा” different texture की है, identification नहीं।

पाठक के लिए“मुझे दूसरों के लिए दुःख होता है, मैं spiritual हूँ”। यह belief है। ज्ञानी help करता है, बिना “दुःख” के। action वही, internal state different।

श्लोक 17
अष्टावक्र उवाच
न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुपः।
असंसक्तमना नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते॥
na mukto viṣaya-dveṣṭā na vā viṣaya-lolupaḥ
asaṁsakta-manā nityaṁ prāptāprāptam upāśnute

अर्थ“मुक्त न तो विषयों का द्वेषी, न लोलुप। असंसक्त-मन वाला, नित्य, प्राप्त-अप्राप्त को भोगता है।”

सन्दर्भ“प्राप्त-अप्राप्त”। जो मिला, और जो नहीं मिला, दोनों को “भोगता”। यानी दोनों में equal engagement। मिला तो enjoy, नहीं मिला तो भी कुछ enjoy (lack का acceptance)।

पाठक के लिए“अप्राप्त को भी भोगना” interesting concept है। अभाव में भी एक तरह का सुख। यह perspective shift है।

श्लोक 18
अष्टावक्र उवाच
समाधानासमाधानहिताहितविकल्पनाः।
शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः॥
samādhānāsamādhāna-hitāhita-vikalpanāḥ
śūnya-citto na jānāti kaivalyam iva saṁsthitaḥ

अर्थ“समाधान-असमाधान, हित-अहित, इन विकल्पनाओं को शून्य-चित्त नहीं जानता। मानो कैवल्य में स्थित।”

सन्दर्भ“शून्य-चित्त” का अर्थ “खाली mind” नहीं। यह concept-free mind है। categories नहीं। judgements नहीं।

पाठक के लिएदिन भर हम चीज़ों को categorize करते हैं, “हित-अहित”। यह categorization ख़ुद obstacle है। पहले अनुभव होने दो, फिर शायद judge करो।

श्लोक 19
अष्टावक्र उवाच
निर्ममो निरहंकारो न किञ्चिदिति निश्चितः।
अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि करोति न॥
nirmamo nirahaṅkāro na kiñcid iti niścitaḥ
antar-galita-sarvāśaḥ kurvann api karoti na

अर्थ“निर्मम, निरहंकार, ‘कुछ भी नहीं है’ यह निश्चय वाला, अन्दर सब आशाएँ गली हुई, करते हुए भी नहीं करता।”

सन्दर्भ“कुर्वन्न् अपि करोति न”। अष्टावक्र का signature paradox। काम तो हो रहा है, मगर doer नहीं। यह कोरा बहाना नहीं, recognition है।

पाठक के लिएहर doing के पीछे “मैं doing हूँ” का thought है। उस thought को drop। doing continue, मगर doer absent।

श्लोक 20
अष्टावक्र उवाच
मनःप्रकाशसम्मोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः।
दशां कामपि सम्प्राप्तो भवेद् गलितमानसः॥
manaḥ-prakāśa-sammoha-svapna-jāḍya-vivarjitaḥ
daśāṁ kām api samprāpto bhaved galita-mānasaḥ

अर्थ“मन की प्रकाश-सम्मोह-स्वप्न-जाड्य से रहित, किसी (अनिर्वचनीय) दशा को प्राप्त, वो गलित-मानस हो जाता है।”

सन्दर्भ“गलित-मानस”। mind dissolved। यह deep state है। mind reduce नहीं हुई, dissolved हो गयी। यह अष्टावक्र की highest description है।

पाठक के लिएप्रकरण 17 ख़त्म। बीस portraits। यह ज्ञानी के अनेक angles। पढ़ कर एक एक सब incorporate करने की कोशिश नहीं। सिर्फ़ recognize करो, यह state possible है।

॥ तत्त्वस्वरूप ॥