तत्त्वस्वरूप
The Nature of the Wise · 20 श्लोक
अष्टावक्र अब portrait मोड में हैं। बीस श्लोकों में ज्ञानी (जीवन्मुक्त) की characteristics। हर श्लोक एक sketch है। पढ़ कर लगता है, “क्या ऐसा सम्भव है?”
तृप्तः स्वच्छेन्द्रियो नित्यमेकाकी रमते तु यः॥
tṛptaḥ svacchendriyo nityam ekākī ramate tu yaḥ
अर्थ“उसने ज्ञान का फल पा लिया, और योगाभ्यास का फल भी। जो तृप्त, स्वच्छ-इन्द्रिय, नित्य अकेला रमण करता है।”
पाठक के लिएaloneness का feel कैसे आए? company की चाह कम होने पर। आज एक घंटा अकेले बिताओ, बिना phone, बिना podcast। पहले बेचैनी, फिर कुछ और।
यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम्॥
yata ekena tenedaṁ pūrṇaṁ brahmāṇḍa-maṇḍalam
अर्थ“इस जगत में तत्त्व-ज्ञानी कभी खेद नहीं करता। क्योंकि उसी एक से यह पूरा ब्रह्माण्ड मण्डल भरा है।”
पाठक के लिएखेद का root है, “मैं और सब”। अगर “सब मैं”, तो खेद किस से? आज खेद हुआ? यह श्लोक recall करें।
सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभं निम्बपल्लवाः॥
sallakī-pallava-prītam iva-ibhaṁ nimba-pallavāḥ
अर्थ“विषय कभी भी स्व-आराम वाले को हर्षित नहीं कर सकते। जैसे सल्लकी के पत्ते खा कर खुश हाथी को नीम के पत्ते।”
पाठक के लिएएक बार जब “अन्दर का सुख” का स्वाद आ जाए, बाहर का सुख कम attractive लगने लगता है। यह repression नहीं, comparison है।
अभुक्तेषु निराकाङ्क्षी तादृशो भवदुर्लभः॥
abhukteṣu nirākāṅkṣī tādṛśo bhava-durlabhaḥ
अर्थ“जो भोगे हुए भोगों में लिप्त नहीं, और न-भोगे हुए में आकांक्षा-रहित, ऐसा संसार में दुर्लभ है।”
पाठक के लिएआज की 24 घंटे में कितना समय past के memories या future की imaginations में बीता? Probably ज़्यादातर। Present moment में कितना? कम।
भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी विरलो हि महाशयः॥
bhoga-mokṣa-nirākāṅkṣī viralo hi mahāśayaḥ
अर्थ“संसार में भोगने वाले बहुत हैं, मोक्ष चाहने वाले भी दिखते हैं। मगर भोग-मोक्ष दोनों से निराकांक्षी, ऐसा महाशय दुर्लभ है।”
पाठक के लिए“मोक्ष चाहना” “भोग चाहना” से बेहतर है, मगर ultimate नहीं। दोनों चाह हैं। चाह drop होगी तब असली बात।
कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता न हि॥
kasyāpy udāra-cittasya heyopādeyatā na hi
अर्थ“धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष में, जीवन-मरण में, किसी उदार-चित्त वाले के लिए हेय-उपादेय नहीं।”
पाठक के लिए“उदार-चित्त”। यह वो mind है जो किसी एक goal में locked नहीं। जीवन को goal-driven नहीं, flow-driven चलाता है।
यथा जीविकया तस्माद् धन्य आस्ते यथासुखम्॥
yathā jīvikayā tasmād dhanya āste yathā-sukham
अर्थ“न विश्व के विलय की इच्छा, न उसके बने रहने से द्वेष। जो जीविका मिले उसी से, धन्य पुरुष सुख से रहता है।”
पाठक के लिए“मैं और कमा सकता था” यह thought बहुत common है। ज्ञानी इस thought से free है। जो मिल रहा है, उसी में संतुष्ट।
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्नस्ते यथासुखम्॥
paśyan śṛṇvan spṛśan jighrann aśnann āste yathā-sukham
अर्थ“‘इस ज्ञान से मैं कृतार्थ हो गया’, इस गली हुई बुद्धि वाला कृती, देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, सुख से रहता है।”
पाठक के लिएपाँचों इन्द्रियों की लिस्ट। दिन भर हर एक काम पर हो। मगर “मैं देख रहा हूँ” से “देखना हो रहा है” में shift।
न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे॥
na spṛhā na viraktir vā kṣīṇa-saṁsāra-sāgare
अर्थ“दृष्टि शून्य, चेष्टा व्यर्थ, इन्द्रियाँ शिथिल। न स्पृहा, न विरक्ति, उस ज्ञानी की जिसके लिए संसार-सागर क्षीण हो गया।”
पाठक के लिएज्ञानी की आँख में “ख़ालीपन” दिखता है। यह depression नहीं। यह “deeply present, no agenda” का look है।
अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः॥
aho para-daśā kvāpi vartate mukta-cetasaḥ
अर्थ“न जागता, न सोता, न आँख खोलता, न बन्द करता। अहो! मुक्त-चेता की वो पर-दशा कहीं वर्तित होती है।”
पाठक के लिए“मैं सोता हूँ” यह एक belief है। यह कौन सो रहा है? शरीर। mind। mगर “मैं”, awareness, क्या सोती है? सपने भी आप ही देखते हो। तो “मैं” तो हमेशा जागृत।
समस्तवासनामुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते॥
samasta-vāsanā-mukto muktaḥ sarvatra rājate
अर्थ“सब जगह स्वस्थ, सब जगह निर्मल-आशय। सब वासनाओं से मुक्त, मुक्त पुरुष सब जगह राजमान होता है।”
पाठक के लिएtrue royalty material नहीं, inner है। राजा भी अन्दर बेचैन हो सकता है। ज्ञानी कुर्सी पर बैठा भी, “राजमान”।
ईहितानीहितैर्मुक्तो मुक्त एव महाशयः॥
īhitānīhitair mukto mukta eva mahāśayaḥ
अर्थ“देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, पकड़ते, बोलते, चलते, इच्छा-अनिच्छा से मुक्त, महाशय मुक्त ही है।”
पाठक के लिएहर activity के पीछे एक micro-motivation है। उसे detect करो। अगर motivation absent है, तो activity natural। अगर present है, तो activity load।
न ददाति न गृह्णाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः॥
na dadāti na gṛhṇāti muktaḥ sarvatra nīrasaḥ
अर्थ“न निन्दा करता, न स्तुति। न हर्षित होता, न क्रुद्ध। न देता, न लेता। मुक्त सब जगह नीरस (rasaless) है।”
पाठक के लिएआज छह actions list की: निन्दा-स्तुति-हर्ष-क्रोध-दान-स्वीकार। हर एक check करो। कितनी बार किया? यह gauge है।
अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एव महाशयः॥
avihvala-manāḥ svastho mukta eva mahāśayaḥ
अर्थ“राग वाली स्त्री देख कर, या मृत्यु को सामने आते देख कर, जिसका मन अविचलित और स्वस्थ है, वो महाशय मुक्त है।”
पाठक के लिए“विचलित” यानी shaken। ज़्यादातर लोग इन दो situations में shake हो जाते हैं। ज्ञानी नहीं। यह discipline से नहीं आता, recognition से।
विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः॥
viśeṣo naiva dhīrasya sarvatra sama-darśinaḥ
अर्थ“सुख-दुःख में, पुरुष-स्त्री में, सम्पत्ति-विपत्ति में, धीर का कोई फ़र्क़ नहीं। वो हर जगह सम-दर्शी।”
पाठक के लिएहम सब के अन्दर gender-bias है, conscious or unconscious। ज्ञान का एक sign यह bias का drop है।
नाश्चर्यं विकृतिर्नैव क्षीणसंसरणे नरे॥
nāścaryaṁ vikṛtir naiva kṣīṇa-saṁsaraṇe nare
अर्थ“न हिंसा, न करुणा, न उद्धत्य, न दीनता। न आश्चर्य, न विकृति। यह सब उस पुरुष में नहीं जिसका संसरण क्षीण हो गया।”
पाठक के लिए“मुझे दूसरों के लिए दुःख होता है, मैं spiritual हूँ”। यह belief है। ज्ञानी help करता है, बिना “दुःख” के। action वही, internal state different।
असंसक्तमना नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते॥
asaṁsakta-manā nityaṁ prāptāprāptam upāśnute
अर्थ“मुक्त न तो विषयों का द्वेषी, न लोलुप। असंसक्त-मन वाला, नित्य, प्राप्त-अप्राप्त को भोगता है।”
पाठक के लिए“अप्राप्त को भी भोगना” interesting concept है। अभाव में भी एक तरह का सुख। यह perspective shift है।
शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः॥
śūnya-citto na jānāti kaivalyam iva saṁsthitaḥ
अर्थ“समाधान-असमाधान, हित-अहित, इन विकल्पनाओं को शून्य-चित्त नहीं जानता। मानो कैवल्य में स्थित।”
पाठक के लिएदिन भर हम चीज़ों को categorize करते हैं, “हित-अहित”। यह categorization ख़ुद obstacle है। पहले अनुभव होने दो, फिर शायद judge करो।
अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि करोति न॥
antar-galita-sarvāśaḥ kurvann api karoti na
अर्थ“निर्मम, निरहंकार, ‘कुछ भी नहीं है’ यह निश्चय वाला, अन्दर सब आशाएँ गली हुई, करते हुए भी नहीं करता।”
पाठक के लिएहर doing के पीछे “मैं doing हूँ” का thought है। उस thought को drop। doing continue, मगर doer absent।
दशां कामपि सम्प्राप्तो भवेद् गलितमानसः॥
daśāṁ kām api samprāpto bhaved galita-mānasaḥ
अर्थ“मन की प्रकाश-सम्मोह-स्वप्न-जाड्य से रहित, किसी (अनिर्वचनीय) दशा को प्राप्त, वो गलित-मानस हो जाता है।”
पाठक के लिएप्रकरण 17 ख़त्म। बीस portraits। यह ज्ञानी के अनेक angles। पढ़ कर एक एक सब incorporate करने की कोशिश नहीं। सिर्फ़ recognize करो, यह state possible है।