‘अकैवल्य’ बीसवाँ और अन्तिम प्रकरण है। कैवल्य का अर्थ है ‘पूर्ण एकाकीपन’ (पतंजलि योग-सूत्र 4.34 में)। अकैवल्य उसका अद्वैत रूपान्तरण है। कैवल्य अब भी एक ‘अकेलापन’ है, अकैवल्य उसे भी पार कर देता है। कोई ‘अलग होना’ नहीं, क्योंकि कुछ दूसरा है ही नहीं। यह भारतीय दर्शन के दो स्कूलों के बीच की रेखा है। सांख्य–योग का दर्शन कैवल्य पर रुकता है, अद्वैत–वेदान्त अकैवल्य तक जाता है। अष्टावक्र इस यात्रा के मानक-गुरु बन गए।पाठ्य-संगति
अकैवल्य
एकाकीपन के भी पार · 14 श्लोक
पूरी पाठ का अन्तिम प्रकरण। जनक के 14 श्लोक। हर एक एक “क्व?” से अगले को बहा ले जाता है, “कहाँ है यह? कहाँ है वह?” यहाँ “कैवल्य” तक छूट जाता है। यानी “मुक्ति” की धारणा के भी पार।
बीसवाँ और अन्तिम प्रकरण “अकैवल्य” शब्द रखता है। अकैवल्य का अर्थ कुछ विरोधाभासी लगता है, “अ-कैवल्य” यानी “एकाकीपन नहीं”। पारम्परिक मोक्ष-दर्शन में, सांख्य-दर्शन में भी, कैवल्य अंतिम स्थिति है। अष्टावक्र कहते हैं, असली स्थिति कैवल्य भी नहीं, सब कुछ से परे।
अब तक
आत्म-विश्रान्ति के बाद, “अकैवल्य।” “कैवल्य भी नहीं” का विचित्र विरोधाभास।

अन्तिम प्रकरण में जनक अब किसी से कुछ पूछ नहीं रहे, और न ही किसी को कुछ समझा रहे हैं। वे बस अपने निरंजन स्वरूप में टिके हुए, एक-एक करके हर उस चीज़ को विदा करते जाते हैं जिसे कभी सच माना था। पहले स्थूल जगत, फिर देह, इन्द्रियाँ और मन। और इसके बाद वह भी, जिसे साधक अपना लक्ष्य कहते हैं, शून्य और नैराश्य तक। हम जिस स्वरूप हैं, उसमें इनमें से किसी के लिए जगह कहाँ। और इसी तरह शास्त्र, आत्म-विज्ञान, विषय-रहित मन, तृप्ति और तृष्णा-रहितता, हम तो सदा द्वन्द्व से परे हैं, इन जोड़ियों का यहाँ ठिकाना ही नहीं।
श्लोक 1 · 2
क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः।
क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने॥
क्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं क्व वा निर्विषयं मनः।
क्व तृप्तिः क्व वितृष्णत्वं गतद्वन्द्वस्य मे सदा॥
विद्या हो या अविद्या, ‘मैं’ हो, ‘यह’ हो या ‘मेरा’, बन्ध हो या मोक्ष, ये सब तो रूप-रेखाएँ हैं, और स्वरूप पर कोई रूप-रेखा खिंचती ही नहीं। यहीं जनक एक और साहसिक बात कह जाते हैं। प्रारब्ध कर्म कहाँ, जीवन्मुक्ति तक कहाँ, और वह विदेह-कैवल्य भी कहाँ, जिसे परम लक्ष्य माना जाता है। जो निर्विशेष है, सदा निर्विशेष ही है, उसके लिए मुक्ति की धारणा भी एक धारणा भर रह जाती है।
श्लोक 3 · 4
क्व विद्या क्व च वाविद्या क्वाहं क्वेदं मम क्व वा।
क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः स्वरूपस्य क्व रूपिता॥
क्व प्रारब्धानि कर्माणि जीवन्मुक्तिरपि क्व वा।
क्व तद्विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा॥
अब वह कर्ता और भोक्ता को विदा करते हैं। निःस्वभाव जो ठहरा, उसके लिए कौन कर्ता, कौन भोक्ता, कैसा निष्क्रिय स्फुरण, और कैसा वह अपरोक्ष फल। फिर पूरी पहचान की व्यवस्था ही ढह जाती है। लोक, मुमुक्षु, योगी, ज्ञानवान्, बद्ध, मुक्त, ये सब तो ओढ़े हुए नाम हैं। जो अपने अद्वय स्वरूप में टिका हो, उसके भीतर इनमें से एक भी नहीं उठता। और इसी तरह सृष्टि और संहार, साध्य और साधन, साधक और सिद्धि, अद्वय स्वरूप में इन जोड़ियों का कोई स्थान ही नहीं।
श्लोक 5 · 6 · 7
क्व कर्ता क्व च वा भोक्ता निष्क्रियं स्फुरणं क्व वा।
क्वापरोक्षं फलं वा क्व निःस्वभावस्य मे सदा॥
क्व लोकं क्व मुमुक्षुर्वा क्व योगी ज्ञानवान्क्व वा।
क्व बद्धः क्व च वा मुक्तः स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥
क्व सृष्टिः क्व च संहारः क्व साध्यं क्व च साधनम्।
क्व साधकः क्व सिद्धिर्वा स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥
अब जानने की पूरी इमारत भी ढह जाती है। प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमा, जानने वाला, जानने का साधन, जो जाना जाए और स्वयं ज्ञान, ये चारों भी विदा हो जाते हैं। जो सदा विमल है, उसके लिए न ‘कुछ’ है, न ‘कुछ नहीं’। फिर मन की हलचलें भी थम जाती हैं। विक्षेप और एकाग्रता, निर्बोध और मूढ़ता, हर्ष और विषाद, जो सदा निष्क्रिय है उसके भीतर इनकी कोई करवट नहीं उठती। और वेदान्त के दोनों स्तर तक, यह व्यवहार और वह परमार्थता, सुख और दुःख, निर्विमर्श स्वरूप में इन सबका कहीं अता-पता नहीं।
श्लोक 8 · 9 · 10
क्व प्रमाता प्रमाणं वा क्व प्रमेयं क्व च प्रमा।
क्व किञ्चित्क्व न किञ्चिद्वा सर्वदा विमलस्य मे॥
क्व विक्षेपः क्व चैकाग्र्यं क्व निर्बोधः क्व मूढता।
क्व हर्षः क्व विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे॥
क्व चैष व्यवहारो वा क्व च सा परमार्थता।
क्व सुखं क्व च वा दुःखं निर्विमर्शस्य मे सदा॥
अब वह जोड़ियाँ भी जातीं, जिन पर सारा दर्शन टिका है। माया और संसार, प्रीति और विरति, जीव और वह ब्रह्म, ये भी पहचान की कोटियाँ हैं, और जो सदा विमल है, उसके लिए जीव और ब्रह्म का भेद तक प्रासंगिक नहीं रह जाता। प्रवृत्ति और निवृत्ति, मुक्ति और बन्धन, जो कूटस्थ है, निर्विभाग है, सदा अपने में स्वस्थ है, उसके लिए ये भी नहीं उठते।
श्लोक 11 · 12
क्व माया क्व च संसारः क्व प्रीतिर्विरतिः क्व वा।
क्व जीवः क्व च तद्ब्रह्म सर्वदा विमलस्य मे॥
क्व प्रवृत्तिर्निवृत्तिर्वा क्व मुक्तिः क्व च बन्धनम्।
कूटस्थनिर्विभागस्य स्वस्थस्य मम सर्वदा॥
और अब वह सम्बन्ध भी विदा हो जाता है जिस पर यह पूरी पाठ खड़ी थी। उपदेश और शास्त्र, शिष्य और गुरु, और कोई पुरुषार्थ, जो निरुपाधि शिव-स्वरूप है, उसके लिए इनमें से एक भी शेष नहीं। समूचा प्रकरण गुरु-शिष्य का संवाद रहा, और अन्त में वह संवाद स्वयं को भी विदा कर देता है। फिर आता है पूरी पाठ का अन्तिम श्लोक, अन्तिम विश्रान्ति। कहाँ ‘है’, कहाँ ‘नहीं’, कहाँ ‘एक’, कहाँ ‘दो’। अब बहुत क्या कहना। जनक कहते हैं, हमारे भीतर अब कुछ उठता ही नहीं। न कोई विचार, न कोई प्रश्न, न कोई अनुभव। बस होना, और वह भी निःशब्द।
श्लोक 13 · 14
क्वोपदेशः क्व वा शास्त्रं क्व शिष्यः क्व च वा गुरुः।
क्व चास्ति पुरुषार्थो वा निरुपाधेः शिवस्य मे॥
क्व चास्ति क्व च वा नास्ति क्वास्ति चैकं क्व च द्वयम्।
बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम॥