अष्टावक्र गीता · प्रकरण 20: अकैवल्य

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 20

अकैवल्य

Beyond Aloneness · 14 श्लोक

पूरी text का अन्तिम प्रकरण। जनक के 14 श्लोक। हर एक एक “क्व?” से दूसरे को dismiss करता है। यहाँ “कैवल्य” भी drop होता है। यानी “मुक्ति” के concept के भी पार।

श्लोक 1
जनक उवाच
क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः।
क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने॥
kva bhūtāni kva deho vā kvendriyāṇi kva vā manaḥ
kva śūnyaṁ kva ca nairāśyaṁ mat-svarūpe nirañjane

अर्थ“कहाँ भूत, कहाँ देह? कहाँ इन्द्रियाँ, कहाँ मन? कहाँ शून्य, कहाँ नैराश्य? मेरे निरंजन स्वरूप में।”

सन्दर्भ“शून्य” भी? “नैराश्य” भी? हाँ। यह तो साधकों के goals हैं। जनक इन्हें भी drop कर देते हैं।
श्लोक 2
जनक उवाच
क्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं क्व वा निर्विषयं मनः।
क्व तृप्तिः क्व वितृष्णत्वं गतद्वन्द्वस्य मे सदा॥
kva śāstraṁ kvātma-vijñānaṁ kva vā nirviṣayaṁ manaḥ
kva tṛptiḥ kva vitṛṣṇatvaṁ gata-dvandvasya me sadā

अर्थ“कहाँ शास्त्र, कहाँ आत्म-विज्ञान? कहाँ विषय-रहित मन? कहाँ तृप्ति, कहाँ तृष्णा-रहितता? मेरे लिए, सदा द्वन्द्व-रहित।”

सन्दर्भ“आत्म-विज्ञान” भी drop। ज्ञान का concept भी एक object। उसके भी पार।
श्लोक 3
जनक उवाच
क्व विद्या क्व च वाविद्या क्वाहं क्वेदं मम क्व वा।
क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः स्वरूपस्य क्व रूपिता॥
kva vidyā kva ca vāvidyā kvāhaṁ kvedaṁ mama kva vā
kva bandhaḥ kva ca vā mokṣaḥ svarūpasya kva rūpitā

अर्थ“कहाँ विद्या, अविद्या? कहाँ ‘मैं’, ‘यह’, ‘मेरा’? कहाँ बन्ध, मोक्ष? स्वरूप की क्या ‘रूपता’?”

सन्दर्भविद्या और अविद्या, “मैं” और “मेरा”, बन्ध और मोक्ष। तीन pairs। सब drop।
श्लोक 4
जनक उवाच
क्व प्रारब्धानि कर्माणि जीवन्मुक्तिरपि क्व वा।
क्व तद्विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा॥
kva prārabdhāni karmāṇi jīvan-muktir api kva vā
kva tad videha-kaivalyaṁ nirviśeṣasya sarvadā

अर्थ“कहाँ प्रारब्ध कर्म? कहाँ जीवन्मुक्ति भी? कहाँ वो विदेह-कैवल्य? निर्विशेष को सर्वदा।”

सन्दर्भ“जीवन्मुक्ति” और “विदेह-कैवल्य” भी drop! यह radical है। यानी “मुक्ति” का concept पूरी तरह transcend।
श्लोक 5
जनक उवाच
क्व कर्ता क्व च वा भोक्ता निष्क्रियं स्फुरणं क्व वा।
क्वापरोक्षं फलं वा क्व निःस्वभावस्य मे सदा॥
kva kartā kva ca vā bhoktā niṣkriyaṁ sphuraṇaṁ kva vā
kvāparokṣaṁ phalaṁ vā kva niḥsvabhāvasya me sadā

अर्थ“कहाँ कर्ता, भोक्ता? कहाँ निष्क्रिय स्फुरण? कहाँ अपरोक्ष फल? निःस्वभाव मुझ को सदा।”

श्लोक 6
जनक उवाच
क्व लोकं क्व मुमुक्षुर्वा क्व योगी ज्ञानवान्क्व वा।
क्व बद्धः क्व च वा मुक्तः स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥
kva lokaṁ kva mumukṣur vā kva yogī jñānavān kva vā
kva baddhaḥ kva ca vā muktaḥ sva-svarūpe’ham advaye

अर्थ“कहाँ लोक, मुमुक्षु? कहाँ योगी, ज्ञानवान्? कहाँ बद्ध, मुक्त? मैं अपने अद्वय स्वरूप में।”

सन्दर्भcategory-system पूरा collapse। “ज्ञानी” भी identity है, “योगी” भी, “मुमुक्षु” भी। सब drop।
श्लोक 7
जनक उवाच
क्व सृष्टिः क्व च संहारः क्व साध्यं क्व च साधनम्।
क्व साधकः क्व सिद्धिर्वा स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥
kva sṛṣṭiḥ kva ca saṁhāraḥ kva sādhyaṁ kva ca sādhanam
kva sādhakaḥ kva siddhir vā sva-svarūpe’ham advaye

अर्थ“कहाँ सृष्टि, संहार? कहाँ साध्य, साधन? कहाँ साधक, सिद्धि? मैं अपने अद्वय स्वरूप में।”

श्लोक 8
जनक उवाच
क्व प्रमाता प्रमाणं वा क्व प्रमेयं क्व च प्रमा।
क्व किञ्चित्क्व न किञ्चिद्वा सर्वदा विमलस्य मे॥
kva pramātā pramāṇaṁ vā kva prameyaṁ kva ca pramā
kva kiñcit kva na kiñcid vā sarvadā vimalasya me

अर्थ“कहाँ प्रमाता, प्रमाण? कहाँ प्रमेय, प्रमा? कहाँ ‘कुछ’, कहाँ ‘कुछ नहीं’? सर्वदा विमल मुझ को।”

सन्दर्भepistemological framework भी drop। knower, means of knowing, known, knowledge। चारों drop।
श्लोक 9
जनक उवाच
क्व विक्षेपः क्व चैकाग्र्यं क्व निर्बोधः क्व मूढता।
क्व हर्षः क्व विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे॥
kva vikṣepaḥ kva caikāgryaṁ kva nirbodhaḥ kva mūḍhatā
kva harṣaḥ kva viṣādo vā sarvadā niṣkriyasya me

अर्थ“कहाँ विक्षेप, एकाग्रता? कहाँ निर्बोध, मूढता? कहाँ हर्ष, विषाद? सर्वदा निष्क्रिय मुझ को।”

श्लोक 10
जनक उवाच
क्व चैष व्यवहारो वा क्व च सा परमार्थता।
क्व सुखं क्व च वा दुःखं निर्विमर्शस्य मे सदा॥
kva caiṣa vyavahāro vā kva ca sā paramārthatā
kva sukhaṁ kva ca vā duḥkhaṁ nirvimarśasya me sadā

अर्थ“कहाँ यह व्यवहार, कहाँ वो परमार्थता? कहाँ सुख, दुःख? निर्विमर्श मुझ को सदा।”

सन्दर्भ“व्यवहार-परमार्थ” का distinction भी drop। यह वेदान्त की दोनों level (relative + absolute) drop।
श्लोक 11
जनक उवाच
क्व माया क्व च संसारः क्व प्रीतिर्विरतिः क्व वा।
क्व जीवः क्व च तद्ब्रह्म सर्वदा विमलस्य मे॥
kva māyā kva ca saṁsāraḥ kva prītir viratiḥ kva vā
kva jīvaḥ kva ca tad brahma sarvadā vimalasya me

अर्थ“कहाँ माया, संसार? कहाँ प्रीति, विरति? कहाँ जीव, कहाँ वो ब्रह्म? सर्वदा विमल मुझ को।”

सन्दर्भ“जीव-ब्रह्म” भी? हाँ। जनक के लिए यह distinction भी relevant नहीं। दोनों identity-categories हैं।
श्लोक 12
जनक उवाच
क्व प्रवृत्तिर्निवृत्तिर्वा क्व मुक्तिः क्व च बन्धनम्।
कूटस्थनिर्विभागस्य स्वस्थस्य मम सर्वदा॥
kva pravṛttir nivṛttir vā kva muktiḥ kva ca bandhanam
kūṭa-stha-nirvibhāgasya svasthasya mama sarvadā

अर्थ“कहाँ प्रवृत्ति, निवृत्ति? कहाँ मुक्ति, बन्धन? कूटस्थ, निर्विभाग, स्वस्थ मुझ को सर्वदा।”

श्लोक 13
जनक उवाच
क्वोपदेशः क्व वा शास्त्रं क्व शिष्यः क्व च वा गुरुः।
क्व चास्ति पुरुषार्थो वा निरुपाधेः शिवस्य मे॥
kvopadeśaḥ kva vā śāstraṁ kva śiṣyaḥ kva ca vā guruḥ
kva cāsti puruṣārtho vā nirupādheḥ śivasya me

अर्थ“कहाँ उपदेश, शास्त्र? कहाँ शिष्य, गुरु? कहाँ पुरुषार्थ है? निरुपाधि शिव मुझ को।”

सन्दर्भशिष्य-गुरु relationship भी drop। यह powerful है। पूरी text गुरु-शिष्य संवाद थी। आख़िर में दोनों drop।
श्लोक 14
जनक उवाच
क्व चास्ति क्व च वा नास्ति क्वास्ति चैकं क्व च द्वयम्।
बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम॥
kva cāsti kva ca vā nāsti kvāsti caikaṁ kva ca dvayam
bahunātra kim uktena kiñcin nottiṣṭhate mama

अर्थ“कहाँ ‘है’, कहाँ ‘नहीं’? कहाँ ‘एक’, कहाँ ‘दो’? बहुत क्या कहूँ? मेरे लिए कुछ उठता ही नहीं।”

सन्दर्भपूरी text का अन्तिम श्लोक। “किञ्चिन्न् उत्तिष्ठते मम”, “मेरे लिए कुछ उठता ही नहीं”। यह final settlement है। न thought, न question, न experience उठता है। सिर्फ़ being।
॥ शिवमस्तु सर्वजगताम् ॥ अष्टावक्र गीता समाप्त ॥