अकैवल्य
Beyond Aloneness · 14 श्लोक
पूरी text का अन्तिम प्रकरण। जनक के 14 श्लोक। हर एक एक “क्व?” से दूसरे को dismiss करता है। यहाँ “कैवल्य” भी drop होता है। यानी “मुक्ति” के concept के भी पार।
क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने॥
kva śūnyaṁ kva ca nairāśyaṁ mat-svarūpe nirañjane
अर्थ“कहाँ भूत, कहाँ देह? कहाँ इन्द्रियाँ, कहाँ मन? कहाँ शून्य, कहाँ नैराश्य? मेरे निरंजन स्वरूप में।”
क्व तृप्तिः क्व वितृष्णत्वं गतद्वन्द्वस्य मे सदा॥
kva tṛptiḥ kva vitṛṣṇatvaṁ gata-dvandvasya me sadā
अर्थ“कहाँ शास्त्र, कहाँ आत्म-विज्ञान? कहाँ विषय-रहित मन? कहाँ तृप्ति, कहाँ तृष्णा-रहितता? मेरे लिए, सदा द्वन्द्व-रहित।”
क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः स्वरूपस्य क्व रूपिता॥
kva bandhaḥ kva ca vā mokṣaḥ svarūpasya kva rūpitā
अर्थ“कहाँ विद्या, अविद्या? कहाँ ‘मैं’, ‘यह’, ‘मेरा’? कहाँ बन्ध, मोक्ष? स्वरूप की क्या ‘रूपता’?”
क्व तद्विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा॥
kva tad videha-kaivalyaṁ nirviśeṣasya sarvadā
अर्थ“कहाँ प्रारब्ध कर्म? कहाँ जीवन्मुक्ति भी? कहाँ वो विदेह-कैवल्य? निर्विशेष को सर्वदा।”
क्वापरोक्षं फलं वा क्व निःस्वभावस्य मे सदा॥
kvāparokṣaṁ phalaṁ vā kva niḥsvabhāvasya me sadā
अर्थ“कहाँ कर्ता, भोक्ता? कहाँ निष्क्रिय स्फुरण? कहाँ अपरोक्ष फल? निःस्वभाव मुझ को सदा।”
क्व बद्धः क्व च वा मुक्तः स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥
kva baddhaḥ kva ca vā muktaḥ sva-svarūpe’ham advaye
अर्थ“कहाँ लोक, मुमुक्षु? कहाँ योगी, ज्ञानवान्? कहाँ बद्ध, मुक्त? मैं अपने अद्वय स्वरूप में।”
क्व साधकः क्व सिद्धिर्वा स्वस्वरूपेऽहमद्वये॥
kva sādhakaḥ kva siddhir vā sva-svarūpe’ham advaye
अर्थ“कहाँ सृष्टि, संहार? कहाँ साध्य, साधन? कहाँ साधक, सिद्धि? मैं अपने अद्वय स्वरूप में।”
क्व किञ्चित्क्व न किञ्चिद्वा सर्वदा विमलस्य मे॥
kva kiñcit kva na kiñcid vā sarvadā vimalasya me
अर्थ“कहाँ प्रमाता, प्रमाण? कहाँ प्रमेय, प्रमा? कहाँ ‘कुछ’, कहाँ ‘कुछ नहीं’? सर्वदा विमल मुझ को।”
क्व हर्षः क्व विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे॥
kva harṣaḥ kva viṣādo vā sarvadā niṣkriyasya me
अर्थ“कहाँ विक्षेप, एकाग्रता? कहाँ निर्बोध, मूढता? कहाँ हर्ष, विषाद? सर्वदा निष्क्रिय मुझ को।”
क्व सुखं क्व च वा दुःखं निर्विमर्शस्य मे सदा॥
kva sukhaṁ kva ca vā duḥkhaṁ nirvimarśasya me sadā
अर्थ“कहाँ यह व्यवहार, कहाँ वो परमार्थता? कहाँ सुख, दुःख? निर्विमर्श मुझ को सदा।”
क्व जीवः क्व च तद्ब्रह्म सर्वदा विमलस्य मे॥
kva jīvaḥ kva ca tad brahma sarvadā vimalasya me
अर्थ“कहाँ माया, संसार? कहाँ प्रीति, विरति? कहाँ जीव, कहाँ वो ब्रह्म? सर्वदा विमल मुझ को।”
कूटस्थनिर्विभागस्य स्वस्थस्य मम सर्वदा॥
kūṭa-stha-nirvibhāgasya svasthasya mama sarvadā
अर्थ“कहाँ प्रवृत्ति, निवृत्ति? कहाँ मुक्ति, बन्धन? कूटस्थ, निर्विभाग, स्वस्थ मुझ को सर्वदा।”
क्व चास्ति पुरुषार्थो वा निरुपाधेः शिवस्य मे॥
kva cāsti puruṣārtho vā nirupādheḥ śivasya me
अर्थ“कहाँ उपदेश, शास्त्र? कहाँ शिष्य, गुरु? कहाँ पुरुषार्थ है? निरुपाधि शिव मुझ को।”
बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम॥
bahunātra kim uktena kiñcin nottiṣṭhate mama
अर्थ“कहाँ ‘है’, कहाँ ‘नहीं’? कहाँ ‘एक’, कहाँ ‘दो’? बहुत क्या कहूँ? मेरे लिए कुछ उठता ही नहीं।”