तत्त्वज्ञान
Knowledge of Truth · 20 श्लोक
अष्टावक्र की सबसे direct और compact teaching। बीस श्लोकों में पूरा अद्वैत compressed। हर श्लोक एक standalone gem है। यह प्रकरण साधक को बार-बार पढ़ने योग्य है।
आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति॥
ājīvam api jijñāsuḥ paras tatra vimuhyati
अर्थ“सत्त्व-बुद्धि वाला किसी भी उपदेश से कृतार्थ हो जाता है। और दूसरा, जीवन भर जिज्ञासु रह कर भी, उसी (तत्त्व) में मोहित (confused) रहता है।”
पाठक के लिएready-mindedness ज़बरदस्ती नहीं बनती। मगर एक तरीक़ा है, openness। “जो सुनूँ, उसे test किए बिना dismiss न करूँ”। यह attitude सत्त्व-बुद्धि की foundation है।
एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु॥
etāvad eva vijñānaṁ yathecchasi tathā kuru
अर्थ“मोक्ष यानी विषयों में वैरस्य (taste न लगना), बन्धन यानी विषयों में रस। बस इतना ही विज्ञान है। अब जैसी इच्छा हो, वैसे कर।”
पाठक के लिए“यथेच्छसि तथा कुरु”। यह respect है, free will का। आप चाहो तो बन्धन choose करो, चाहो तो मोक्ष। अष्टावक्र किसी को भगाते नहीं।
करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षिभिः॥
karoti tattva-bodho’yam atas tyakto bubhukṣibhiḥ
अर्थ“वक्ता, बुद्धिमान, बड़ा उद्योगी आदमी, इस तत्त्व-बोध से मूक, जड़, आलसी हो जाता है। इसीलिए भोगियों ने इसे छोड़ रखा है।”
पाठक के लिए“मूक, जड़, आलसी” यह judgemental शब्द हैं। मगर ज्ञानी की position से यही qualities are gifts। कम बोलना, कम react करना, कम unnecessary movement। बाहर “जड़” लगता है, अन्दर पूरा alive।
चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर॥
cid-rūpo’si sadā sākṣī nirapekṣaḥ sukhaṁ cara
अर्थ“तू देह नहीं, देह तेरी नहीं। तू भोक्ता-कर्ता भी नहीं। तू चिद्रूप है, सदा साक्षी। निरपेक्ष हो कर सुख से चल।”
पाठक के लिए“निरपेक्षः सुखं चर”। यह life-motto बना लो। कोई expectation न रखो, और जो आ रहा है उसके साथ flow करो। बस।
निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर॥
nirvikalpo’si bodhātmā nirvikāraḥ sukhaṁ cara
अर्थ“राग-द्वेष मन के धर्म हैं, मन कभी तेरा नहीं। तू निर्विकल्प है, बोध-आत्मा है, निर्विकार। सुख से चल।”
पाठक के लिए“मेरा mind ख़राब चल रहा है”। यह वाक्य का examine करो। अगर mind “मेरा” है, तो ख़राब क्यों चल रहा? आप तो ख़राब होना नहीं चाहते। मतलब mind उतना “मेरा” नहीं जितना हम सोचते हैं।
विज्ञाय निरहङ्कारो निर्ममस्त्वं सुखी भव॥
vijñāya nirahaṅkāro nirmamas tvaṁ sukhī bhava
अर्थ“सब प्राणियों में आत्मा को, और सब प्राणियों को आत्मा में जान कर, निरहंकार और निर्मम हो कर, सुखी हो।”
पाठक के लिए“निरहंकार और निर्मम”। यह दोनों एक साथ ज़रूरी हैं। सिर्फ़ निरहंकार बना, ममता बच गयी, तो “मैं नहीं हूँ, मगर मेरी चीज़ें हैं”। यह absurd है। दोनों एक साथ drop।
तत्त्वमेव न सन्देहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव॥
tat tvam eva na sandehaś cin-mūrte vijvaro bhava
अर्थ“जिसमें यह विश्व लहरों की तरह स्फुरित होता है, हे चित्-मूर्ति, वही तू है। कोई सन्देह नहीं। ज्वर-रहित (बेचैनी से मुक्त) हो जा।”
पाठक के लिएआधुनिक भाषा में, “मन का ज्वर” यानी anxiety, restlessness, mental noise। अष्टावक्र कहते हैं, “तू समुद्र है, लहरें तू ही”। यह recognition mind का ज्वर settle करती है।
ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः॥
jñāna-svarūpo bhagavān ātmā tvaṁ prakṛteḥ paraḥ
अर्थ“श्रद्धा कर, बेटा, श्रद्धा कर। इसमें मोह मत कर। तू ज्ञान-स्वरूप, भगवान्, प्रकृति से परे आत्मा है।”
पाठक के लिए“मैं भगवान् हूँ” यह statement अहंकार लगता है। मगर असली अर्थ अलग है। यानी, “मैं चेतना हूँ, और चेतना ही ईश्वर है”। यह arrogance नहीं, recognition है।
आत्मा न गन्ता नागन्ता किमेनमनुशोचसि॥
ātmā na gantā nāgantā kim enam anuśocasi
अर्थ“गुणों से लिपटा हुआ देह स्थित होता, आता-जाता है। आत्मा न जाता है, न आता है। इसकी क्या शोक करता है?”
पाठक के लिएकिसी की मृत्यु का शोक करते समय यह श्लोक काम का है। शरीर गया, चेतना कहीं नहीं गयी। चेतना stationary है, सिर्फ़ “शरीर” नाम का form changes।
क्व वृद्धिः क्व च वा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः॥
kva vṛddhiḥ kva ca vā hānis tava cin-mātra-rūpiṇaḥ
अर्थ“देह कल्प के अन्त तक रहे, या अभी ही चला जाए, चित्-मात्र-स्वरूप तेरी कहाँ वृद्धि, कहाँ हानि?”
पाठक के लिएयह श्लोक मरने वाले के लिए, और मरने वाले के पास बैठे लोगों के लिए, बहुत मूल्यवान है। शरीर के timeline से चेतना का timeline अलग।
उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः॥
udetu vāstam āyātu na te vṛddhir na vā kṣatiḥ
अर्थ“तुझ अनन्त महा-समुद्र में, विश्व रूपी लहर स्वभाव से उठती है, अस्त होती है। तेरी न वृद्धि, न क्षति।”
पाठक के लिएबार-बार यह बात आती है, मगर हर बार थोड़ा deepen होती है। अब यह statement किसी “गुरु से शिष्य” का नहीं, “ज्ञानी से ज्ञानी” का है।
अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना॥
ataḥ kasya kathaṁ kutra heyopādeya-kalpanā
अर्थ“बेटा, तू चित्-मात्र-स्वरूप है, यह जगत तुझसे भिन्न नहीं। तो किसकी, कैसे, कहाँ, हेय-उपादेय की कल्पना?”
पाठक के लिएदुनिया में “क्या रखूँ, क्या छोड़ूँ” का calculation बहुत energy खाता है। यह श्लोक उस calculation को बेकार कह देता है। न रखो, न छोड़ो, बस होने दो।
कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहंकार एव च॥
kuto janma kuto karma kuto’haṅkāra eva ca
अर्थ“तुझ एक, अव्यय, शान्त, निर्मल चिदाकाश में, जन्म कहाँ, कर्म कहाँ, अहंकार कहाँ?”
पाठक के लिएएक meditation: आकाश को देखो। बादल आते-जाते दिख रहे हैं, मगर आकाश same है। अब अन्दर मुड़ो। thoughts आ-जा रहे हैं, मगर awareness same है। same principle।
किं पृथग्भासते स्वर्णात्कटकाङ्गदनूपुरम्॥
kiṁ pṛthag bhāsate svarṇāt kaṭakāṅgada-nūpuram
अर्थ“तू जो भी देखता है, वहाँ अकेला तू ही दिखता है। क्या सोने से कंगन, बाजूबन्द, पायल अलग दिखते हैं?”
पाठक के लिएआप room में हैं। अनेक चीज़ें दिख रही हैं, table, chair, screen, books। हर एक different। मगर “देखने वाला” एक। और “देखने में आने का experience” same texture। यानी substrate same।
सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसङ्कल्पः सुखी भव॥
sarvam ātmeti niścitya niḥsaṅkalpaḥ sukhī bhava
अर्थ“‘यह मैं हूँ, यह मैं नहीं’, इस विभाजन को छोड़। ‘सब आत्मा ही है’ यह निश्चय कर के, निःसङ्कल्प हो कर सुखी हो।”
पाठक के लिए“निःसङ्कल्प”। सङ्कल्प यानी resolve, intention। ज्ञानी की कोई intention नहीं। क्योंकि intention तो कुछ “बनना” चाहता है। जो already सब है, उसे क्या बनना?
त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन॥
tvatto’nyo nāsti saṁsārī nāsaṁsārī ca kaścana
अर्थ“तेरे ही अज्ञान से विश्व है। परमार्थतः तू अकेला है। तुझ से अलग कोई संसारी है ही नहीं, और न कोई असंसारी।”
पाठक के लिए“मुझे संसार से बाहर निकलना है” यह intention भी एक trap है। क्योंकि निकलना तभी possible है जब अन्दर हो। निकलने वाला और जिसमें से निकल रहे हैं, दोनों आपका ही form।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति॥
nirvāsanaḥ sphūrti-mātro na kiñcid iva śāmyati
अर्थ“‘यह विश्व भ्रान्ति-मात्र है, कुछ नहीं है’, यह निश्चय वाला, वासना-रहित, स्फूर्ति-मात्र, मानो कुछ नहीं की तरह शान्त।”
पाठक के लिएदूसरों को आप “व्यस्त” लग सकते हैं, “खाली” लग सकते हैं, “उदासीन” लग सकते हैं। यह उनकी interpretations हैं। आप वैसे ही हैं जैसे हैं।
न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृत्यकृत्यः सुखं चर॥
na te bandho’sti mokṣo vā kṛtya-kṛtyaḥ sukhaṁ cara
अर्थ“संसार-समुद्र में एक ही था, है, और रहेगा। तेरा कोई बन्धन नहीं, मोक्ष नहीं। कृत्य-कृत्य (कर्तव्य पूरे हो गए) हो कर सुख से चल।”
पाठक के लिए“कुछ करना बाक़ी है” वाला feel ज़िंदगी का प्रमुख stress है। ज्ञानी की position से, सब कुछ already “किया हुआ” है। नहीं “करना”, बस “हो रहा” है।
उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे॥
upaśāmya sukhaṁ tiṣṭha svātmany ānanda-vigrahe
अर्थ“हे चिन्मय, सङ्कल्प-विकल्प से चित्त को क्षुब्ध मत कर। उपशान्त हो कर, सुख से, अपने आत्मा रूपी आनन्द-विग्रह में स्थित हो।”
पाठक के लिए“मुझे यह करना चाहिए” (सङ्कल्प) और “क्या मुझे यह करना चाहिए?” (विकल्प) यह दोनों एक ही coin के side। दोनों drop, mind clear।
आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि॥
ātmā tvaṁ mukta evāsi kiṁ vimṛśya kariṣyasi
अर्थ“ध्यान को भी छोड़ दे, हर जगह। हृदय में कुछ धारण मत कर। आत्मा तू मुक्त ही है। विचार कर के क्या करेगा?”
पाठक के लिएप्रकरण 15 ख़त्म। बीस श्लोकों में पूरा अद्वैत compressed। समापन की line, “किं विमृश्य करिष्यसि?”, “विचार कर के क्या करेगा?” यानी अब विचार से आगे जाओ। बस होओ।