अष्टावक्र गीता · प्रकरण 15: तत्त्वज्ञान

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 15

तत्त्वज्ञान

Knowledge of Truth · 20 श्लोक

अष्टावक्र की सबसे direct और compact teaching। बीस श्लोकों में पूरा अद्वैत compressed। हर श्लोक एक standalone gem है। यह प्रकरण साधक को बार-बार पढ़ने योग्य है।

श्लोक 1
अष्टावक्र उवाच
यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान्।
आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति॥
yathā-tathopadeśena kṛtārthaḥ sattva-buddhimān
ājīvam api jijñāsuḥ paras tatra vimuhyati

अर्थ“सत्त्व-बुद्धि वाला किसी भी उपदेश से कृतार्थ हो जाता है। और दूसरा, जीवन भर जिज्ञासु रह कर भी, उसी (तत्त्व) में मोहित (confused) रहता है।”

सन्दर्भदो तरह के साधक। एक “ready”। उसको कोई भी sound सुनाई दे, बात समझ जाता है। दूसरा life-long student, फिर भी uncertainty में। फ़र्क़ “सत्त्व-बुद्धि” का है, ready-mindedness का।

पाठक के लिएready-mindedness ज़बरदस्ती नहीं बनती। मगर एक तरीक़ा है, openness। “जो सुनूँ, उसे test किए बिना dismiss न करूँ”। यह attitude सत्त्व-बुद्धि की foundation है।

श्लोक 2
अष्टावक्र उवाच
मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः।
एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु॥
mokṣo viṣaya-vairasyaṁ bandho vaiṣayiko rasaḥ
etāvad eva vijñānaṁ yathecchasi tathā kuru

अर्थ“मोक्ष यानी विषयों में वैरस्य (taste न लगना), बन्धन यानी विषयों में रस। बस इतना ही विज्ञान है। अब जैसी इच्छा हो, वैसे कर।”

सन्दर्भ“बस इतना ही”। अष्टावक्र का सबसे compact definition। “तुम्हारी choice है”। न advice, न demand। बस सच बता दिया।

पाठक के लिए“यथेच्छसि तथा कुरु”। यह respect है, free will का। आप चाहो तो बन्धन choose करो, चाहो तो मोक्ष। अष्टावक्र किसी को भगाते नहीं।

श्लोक 3
अष्टावक्र उवाच
वाग्मिप्राज्ञमहोद्योगं जनं मूकजडालसम्।
करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षिभिः॥
vāgmi-prājña-mahodyogaṁ janaṁ mūka-jaḍālasam
karoti tattva-bodho’yam atas tyakto bubhukṣibhiḥ

अर्थ“वक्ता, बुद्धिमान, बड़ा उद्योगी आदमी, इस तत्त्व-बोध से मूक, जड़, आलसी हो जाता है। इसीलिए भोगियों ने इसे छोड़ रखा है।”

सन्दर्भएक warning है। यह ज्ञान आ जाए, तो लोगों को आप “useless” लगने लगते हैं। कम बोलते हैं, कम excitement, कम hustle। इसलिए जो दुनिया में “succeed” करना चाहते हैं, इस ज्ञान से दूर रहते हैं।

पाठक के लिए“मूक, जड़, आलसी” यह judgemental शब्द हैं। मगर ज्ञानी की position से यही qualities are gifts। कम बोलना, कम react करना, कम unnecessary movement। बाहर “जड़” लगता है, अन्दर पूरा alive।

श्लोक 4
अष्टावक्र उवाच
न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान्।
चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर॥
na tvaṁ deho na te deho bhoktā kartā na vā bhavān
cid-rūpo’si sadā sākṣī nirapekṣaḥ sukhaṁ cara

अर्थ“तू देह नहीं, देह तेरी नहीं। तू भोक्ता-कर्ता भी नहीं। तू चिद्रूप है, सदा साक्षी। निरपेक्ष हो कर सुख से चल।”

सन्दर्भक्लासिक अष्टावक्र-line। चार बातों का negation, फिर एक positive identity। “सुखं चर”, “सुख से चल”। यानी ज़िंदगी रोकनी नहीं, सुख से चलनी है।

पाठक के लिए“निरपेक्षः सुखं चर”। यह life-motto बना लो। कोई expectation न रखो, और जो आ रहा है उसके साथ flow करो। बस।

श्लोक 5
अष्टावक्र उवाच
रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन।
निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर॥
rāga-dveṣau mano-dharmau na manas te kadācana
nirvikalpo’si bodhātmā nirvikāraḥ sukhaṁ cara

अर्थ“राग-द्वेष मन के धर्म हैं, मन कभी तेरा नहीं। तू निर्विकल्प है, बोध-आत्मा है, निर्विकार। सुख से चल।”

सन्दर्भ“मन कभी तेरा नहीं”। यह powerful claim है। हम सोचते हैं mind हमारा है, “मेरा mind”। अष्टावक्र कहते हैं, mind एक phenomenon है जो appear-disappear होता है। आप उसके owner नहीं, witness।

पाठक के लिए“मेरा mind ख़राब चल रहा है”। यह वाक्य का examine करो। अगर mind “मेरा” है, तो ख़राब क्यों चल रहा? आप तो ख़राब होना नहीं चाहते। मतलब mind उतना “मेरा” नहीं जितना हम सोचते हैं।

श्लोक 6
अष्टावक्र उवाच
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
विज्ञाय निरहङ्कारो निर्ममस्त्वं सुखी भव॥
sarva-bhūteṣu cātmānaṁ sarva-bhūtāni cātmani
vijñāya nirahaṅkāro nirmamas tvaṁ sukhī bhava

अर्थ“सब प्राणियों में आत्मा को, और सब प्राणियों को आत्मा में जान कर, निरहंकार और निर्मम हो कर, सुखी हो।”

सन्दर्भयह श्लोक exactly भगवद् गीता 6.29 के समान है। दोनों texts में same recognition। “अहंकार” और “ममता”, दोनों drop। एक “मैं” का sense, दूसरा “मेरा” का।

पाठक के लिए“निरहंकार और निर्मम”। यह दोनों एक साथ ज़रूरी हैं। सिर्फ़ निरहंकार बना, ममता बच गयी, तो “मैं नहीं हूँ, मगर मेरी चीज़ें हैं”। यह absurd है। दोनों एक साथ drop।

श्लोक 7
अष्टावक्र उवाच
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे।
तत्त्वमेव न सन्देहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव॥
viśvaṁ sphurati yatredaṁ taraṅgā iva sāgare
tat tvam eva na sandehaś cin-mūrte vijvaro bhava

अर्थ“जिसमें यह विश्व लहरों की तरह स्फुरित होता है, हे चित्-मूर्ति, वही तू है। कोई सन्देह नहीं। ज्वर-रहित (बेचैनी से मुक्त) हो जा।”

सन्दर्भ“विज्वर”। ज्वर यानी fever, बेचैनी। ज्ञानी का body fever-free हो या न हो, मन हमेशा। यह metaphor diseased mind को indicate करता है।

पाठक के लिएआधुनिक भाषा में, “मन का ज्वर” यानी anxiety, restlessness, mental noise। अष्टावक्र कहते हैं, “तू समुद्र है, लहरें तू ही”। यह recognition mind का ज्वर settle करती है।

श्लोक 8
अष्टावक्र उवाच
श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः।
ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः॥
śraddhasva tāta śraddhasva nātra mohaṁ kuruṣva bhoḥ
jñāna-svarūpo bhagavān ātmā tvaṁ prakṛteḥ paraḥ

अर्थ“श्रद्धा कर, बेटा, श्रद्धा कर। इसमें मोह मत कर। तू ज्ञान-स्वरूप, भगवान्, प्रकृति से परे आत्मा है।”

सन्दर्भ“श्रद्धस्व”। श्रद्धा का command। यह interesting है, क्योंकि अद्वैत में “logic” पर ज़ोर है। पर ultimate recognition के लिए logic काफ़ी नहीं, श्रद्धा भी चाहिए। यानी “मैं भगवान् हूँ” यह बात पहले मानो, फिर experience होगी।

पाठक के लिए“मैं भगवान् हूँ” यह statement अहंकार लगता है। मगर असली अर्थ अलग है। यानी, “मैं चेतना हूँ, और चेतना ही ईश्वर है”। यह arrogance नहीं, recognition है।

श्लोक 9
अष्टावक्र उवाच
गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च।
आत्मा न गन्ता नागन्ता किमेनमनुशोचसि॥
guṇaiḥ saṁveṣṭito dehas tiṣṭhaty āyāti yāti ca
ātmā na gantā nāgantā kim enam anuśocasi

अर्थ“गुणों से लिपटा हुआ देह स्थित होता, आता-जाता है। आत्मा न जाता है, न आता है। इसकी क्या शोक करता है?”

सन्दर्भ“शोक” का root: देह को आत्मा समझ लेना। देह आता-जाता है, आत्मा नहीं। शोक body के लिए होता है, मगर हम आत्मा के लिए मान लेते हैं।

पाठक के लिएकिसी की मृत्यु का शोक करते समय यह श्लोक काम का है। शरीर गया, चेतना कहीं नहीं गयी। चेतना stationary है, सिर्फ़ “शरीर” नाम का form changes।

श्लोक 10
अष्टावक्र उवाच
देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः।
क्व वृद्धिः क्व च वा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः॥
dehas tiṣṭhatu kalpāntaṁ gacchatv adyaiva vā punaḥ
kva vṛddhiḥ kva ca vā hānis tava cin-mātra-rūpiṇaḥ

अर्थ“देह कल्प के अन्त तक रहे, या अभी ही चला जाए, चित्-मात्र-स्वरूप तेरी कहाँ वृद्धि, कहाँ हानि?”

सन्दर्भlife-span का equanimity। 100 साल हो या 1 दिन, चेतना equally untouched। यह intellectual statement नहीं, lived realization है।

पाठक के लिएयह श्लोक मरने वाले के लिए, और मरने वाले के पास बैठे लोगों के लिए, बहुत मूल्यवान है। शरीर के timeline से चेतना का timeline अलग।

श्लोक 11
अष्टावक्र उवाच
त्वय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः।
उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः॥
tvayy ananta-mahāmbhodhau viśva-vīciḥ svabhāvataḥ
udetu vāstam āyātu na te vṛddhir na vā kṣatiḥ

अर्थ“तुझ अनन्त महा-समुद्र में, विश्व रूपी लहर स्वभाव से उठती है, अस्त होती है। तेरी न वृद्धि, न क्षति।”

सन्दर्भयह श्लोक प्रकरण 7 (शान्ति) के श्लोक 2 का echo है। मगर वहाँ जनक बोल रहे थे, यहाँ अष्टावक्र। यानी अष्टावक्र अब जनक की language में बोल रहे हैं, क्योंकि दोनों same realization में हैं।

पाठक के लिएबार-बार यह बात आती है, मगर हर बार थोड़ा deepen होती है। अब यह statement किसी “गुरु से शिष्य” का नहीं, “ज्ञानी से ज्ञानी” का है।

श्लोक 12
अष्टावक्र उवाच
तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत्।
अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना॥
tāta cin-mātra-rūpo’si na te bhinnam idaṁ jagat
ataḥ kasya kathaṁ kutra heyopādeya-kalpanā

अर्थ“बेटा, तू चित्-मात्र-स्वरूप है, यह जगत तुझसे भिन्न नहीं। तो किसकी, कैसे, कहाँ, हेय-उपादेय की कल्पना?”

सन्दर्भहेय-उपादेय (छोड़ने, पकड़ने योग्य) का division तभी काम करता है जब “मैं” और “बाक़ी” हों। जब “बाक़ी” “मेरा ही form” है, तो छोड़ने-पकड़ने का scope कहाँ?

पाठक के लिएदुनिया में “क्या रखूँ, क्या छोड़ूँ” का calculation बहुत energy खाता है। यह श्लोक उस calculation को बेकार कह देता है। न रखो, न छोड़ो, बस होने दो।

श्लोक 13
अष्टावक्र उवाच
एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि।
कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहंकार एव च॥
ekasminn avyaye śānte cid-ākāśe’male tvayi
kuto janma kuto karma kuto’haṅkāra eva ca

अर्थ“तुझ एक, अव्यय, शान्त, निर्मल चिदाकाश में, जन्म कहाँ, कर्म कहाँ, अहंकार कहाँ?”

सन्दर्भ“चिदाकाश” यानी consciousness-sky। आकाश में बादल आते-जाते हैं, आकाश untouched। चेतना ऐसी ही है। उसमें जन्म-कर्म-अहंकार बादल हैं, चेतना vacant sky।

पाठक के लिएएक meditation: आकाश को देखो। बादल आते-जाते दिख रहे हैं, मगर आकाश same है। अब अन्दर मुड़ो। thoughts आ-जा रहे हैं, मगर awareness same है। same principle।

श्लोक 14
अष्टावक्र उवाच
यत्त्वं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे।
किं पृथग्भासते स्वर्णात्कटकाङ्गदनूपुरम्॥
yat tvaṁ paśyasi tatraikas tvam eva pratibhāsase
kiṁ pṛthag bhāsate svarṇāt kaṭakāṅgada-nūpuram

अर्थ“तू जो भी देखता है, वहाँ अकेला तू ही दिखता है। क्या सोने से कंगन, बाजूबन्द, पायल अलग दिखते हैं?”

सन्दर्भसोना-जेवर का metaphor। कंगन, बाजूबन्द, पायल, सब अलग shapes में, मगर सब सोना। ठीक वैसे ही, हर experience अलग shape में, सब चेतना।

पाठक के लिएआप room में हैं। अनेक चीज़ें दिख रही हैं, table, chair, screen, books। हर एक different। मगर “देखने वाला” एक। और “देखने में आने का experience” same texture। यानी substrate same।

श्लोक 15
अष्टावक्र उवाच
अयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति सन्त्यज।
सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसङ्कल्पः सुखी भव॥
ayaṁ so’ham ayaṁ nāhaṁ vibhāgam iti santyaja
sarvam ātmeti niścitya niḥsaṅkalpaḥ sukhī bhava

अर्थ“‘यह मैं हूँ, यह मैं नहीं’, इस विभाजन को छोड़। ‘सब आत्मा ही है’ यह निश्चय कर के, निःसङ्कल्प हो कर सुखी हो।”

सन्दर्भ“विभाग” का त्याग। पहचान के सब lines मिटा दो। न “यह मैं”, न “यह मैं नहीं”। बस “सब मैं”। यह position अहंकार जैसी लगती है, मगर अहंकार opposite है। अहंकार limit है, यह infinity।

पाठक के लिए“निःसङ्कल्प”। सङ्कल्प यानी resolve, intention। ज्ञानी की कोई intention नहीं। क्योंकि intention तो कुछ “बनना” चाहता है। जो already सब है, उसे क्या बनना?

श्लोक 16
अष्टावक्र उवाच
तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः।
त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन॥
tavaivājñānato viśvaṁ tvam ekaḥ paramārthataḥ
tvatto’nyo nāsti saṁsārī nāsaṁsārī ca kaścana

अर्थ“तेरे ही अज्ञान से विश्व है। परमार्थतः तू अकेला है। तुझ से अलग कोई संसारी है ही नहीं, और न कोई असंसारी।”

सन्दर्भ“असंसारी” शब्द interesting है। साधक “संसारी न होने” को goal बनाते हैं। पर अष्टावक्र कहते हैं, असंसारी भी category है, और उससे भी कोई अलग नहीं। सब परम-आत्मा का एक ही form।

पाठक के लिए“मुझे संसार से बाहर निकलना है” यह intention भी एक trap है। क्योंकि निकलना तभी possible है जब अन्दर हो। निकलने वाला और जिसमें से निकल रहे हैं, दोनों आपका ही form।

श्लोक 17
अष्टावक्र उवाच
भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति॥
bhrānti-mātram idaṁ viśvaṁ na kiñcid iti niścayī
nirvāsanaḥ sphūrti-mātro na kiñcid iva śāmyati

अर्थ“‘यह विश्व भ्रान्ति-मात्र है, कुछ नहीं है’, यह निश्चय वाला, वासना-रहित, स्फूर्ति-मात्र, मानो कुछ नहीं की तरह शान्त।”

सन्दर्भ“न किञ्चिदिव शाम्यति”। “मानो कुछ नहीं की तरह शान्त”। यह कमाल का phrase है। ज्ञानी “void” नहीं है, मगर “void जैसा” appear करता है। बाहर “खाली”, अन्दर पूरा भरा।

पाठक के लिएदूसरों को आप “व्यस्त” लग सकते हैं, “खाली” लग सकते हैं, “उदासीन” लग सकते हैं। यह उनकी interpretations हैं। आप वैसे ही हैं जैसे हैं।

श्लोक 18
अष्टावक्र उवाच
एक एव भवाम्भोधावासीदस्ति भविष्यति।
न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृत्यकृत्यः सुखं चर॥
eka eva bhavāmbhodhāv āsīd asti bhaviṣyati
na te bandho’sti mokṣo vā kṛtya-kṛtyaḥ sukhaṁ cara

अर्थ“संसार-समुद्र में एक ही था, है, और रहेगा। तेरा कोई बन्धन नहीं, मोक्ष नहीं। कृत्य-कृत्य (कर्तव्य पूरे हो गए) हो कर सुख से चल।”

सन्दर्भतीन काल। आसीद् (था), अस्ति (है), भविष्यति (रहेगा)। यानी past, present, future, सब में एक ही चेतना। बदलने वाला कुछ नहीं। और “कृत्य-कृत्य”। जो कुछ करना था, हो गया। बस।

पाठक के लिए“कुछ करना बाक़ी है” वाला feel ज़िंदगी का प्रमुख stress है। ज्ञानी की position से, सब कुछ already “किया हुआ” है। नहीं “करना”, बस “हो रहा” है।

श्लोक 19
अष्टावक्र उवाच
मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय।
उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे॥
mā saṅkalpa-vikalpābhyāṁ cittaṁ kṣobhaya cinmaya
upaśāmya sukhaṁ tiṣṭha svātmany ānanda-vigrahe

अर्थ“हे चिन्मय, सङ्कल्प-विकल्प से चित्त को क्षुब्ध मत कर। उपशान्त हो कर, सुख से, अपने आत्मा रूपी आनन्द-विग्रह में स्थित हो।”

सन्दर्भ“सङ्कल्प-विकल्प” यानी resolve-doubt। ये दोनों mind के काम हैं। और “क्षोभ” यानी agitation। mind इन्हीं से बेचैन होती है। बस इनको drop, mind अपने आप शान्त।

पाठक के लिए“मुझे यह करना चाहिए” (सङ्कल्प) और “क्या मुझे यह करना चाहिए?” (विकल्प) यह दोनों एक ही coin के side। दोनों drop, mind clear।

श्लोक 20
अष्टावक्र उवाच
त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चिद् हृदि धारय।
आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि॥
tyajaiva dhyānaṁ sarvatra mā kiñcid hṛdi dhāraya
ātmā tvaṁ mukta evāsi kiṁ vimṛśya kariṣyasi

अर्थ“ध्यान को भी छोड़ दे, हर जगह। हृदय में कुछ धारण मत कर। आत्मा तू मुक्त ही है। विचार कर के क्या करेगा?”

सन्दर्भ“ध्यान भी छोड़”। अष्टावक्र का सबसे radical statement। meditation को भी “करने” की चीज़ माना। पर वो भी एक “करना” है। और “करना” बन्धन है। तो meditation भी drop।

पाठक के लिएप्रकरण 15 ख़त्म। बीस श्लोकों में पूरा अद्वैत compressed। समापन की line, “किं विमृश्य करिष्यसि?”, “विचार कर के क्या करेगा?” यानी अब विचार से आगे जाओ। बस होओ।

॥ तत्त्वज्ञान ॥