जागरण की एक दृष्टि
हठयोगप्रदीपिका 3.104 से आगे कुण्डलिनी के कई नाम देती है और शक्ति के जागरण का वर्णन करती है। घेरण्डसंहिता का सम्बन्धित प्रकरण भी कुण्डलिनी को आधार पर रखकर जागरण और ऊर्ध्व मार्ग को जोड़ता है। ये सूक्ष्म शक्तियों और मुक्ति की पारम्परिक व्याख्या के अंग हैं।
दूसरे घटकों से बनी विधि
ग्रन्थ इस विषय को आसन, श्वास और शरीर की क्रियाओं से जोड़ते हैं। घेरण्ड शक्तिचालन का अश्विनी और योनिमुद्रा से भी सम्बन्ध रखता है; शिवानन्द अपने मुद्रा-अध्याय में विशेष रूप बताते हैं। यही सम्बन्ध समझाता है कि नामों की सूची पूरी अभ्यास-पुस्तिका की जगह नहीं ले सकती।
इस पुस्तकालय की प्रस्तुति
यह पृष्ठ सम्बन्ध समझाता है; जागरण का नया अभ्यास, बलपूर्वक श्वास का क्रम या विलक्षण अनुभूतियों का वादा नहीं बनाता। झनझनाहट, चक्कर या किसी दूसरी शारीरिक अनुभूति को कुण्डलिनी का प्रमाण नहीं कहा गया है। सूक्ष्म-शरीर की परम्पराओं और शरीर-रचना का भेद पुराने चक्र-परिचय में तथा श्वास-धारण की शब्दावली कुम्भक के पृष्ठ पर पढ़िए।
स्रोत और दायरा
आधार-संस्करण
Hatha Yoga Pradipika, chapter 3
इस प्रस्तुति का पाठ
- Hatha Yoga Pradipika, chapter 3
Sanskrit verses 3.104–120.
Svātmārāma; Sanskrit and Pancham Sinh’s 1914 translation. English paragraph numbering sometimes diverges from the Sanskrit verses.
- Gheranda Samhita, Sanskrit
3.49–60.
SanskritDocuments transcription. Coordinates refer to this transcription; Mallinson’s edition uses different numbering in chapter 3.
- Kundalini Yoga
“Mudras and Bandhas: 11. Shakti Chalana Mudra”.
Swami Sivananda; Divine Life Society, tenth edition 1994, authorized web edition 1999. Traditional teaching, not clinical evidence.
इस प्रस्तुति का दायरा
पारम्परिक वर्णनों की तुलना वाला मौलिक सन्दर्भ-पाठ। यह पूरे मूल अध्याय का अनुवाद नहीं है।
सीमाएँ और पाठ-भेद
ऊपर की चर्चा में महत्त्वपूर्ण भेद स्पष्ट हैं। पारम्परिक व्याख्या और कहे गए फल अपने स्रोतों के कथन हैं, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं। समीक्षा: 11 सितम्बर 2026।