पारम्परिक सन्दर्भ

अश्विनी मुद्रा

बार-बार संकोच और छोड़ना, मूलबन्ध से अलग पहचान के साथ।

पाठ की विशेष क्रिया

घेरण्डसंहिता 3.82 में गुदाद्वार के बार-बार संकोच और छोड़ने का वर्णन है। शिवानन्द के मुद्रा-निर्देशों में भी अश्विनी नाम से संकोच और छोड़ने की पुनरावृत्ति है। यह साझा बात सन्दर्भ का ठोस विषय बताती है; केवल ऊर्जा के सामान्य वादे पर नहीं छोड़ती।

दूसरे पृष्ठों से सम्बन्ध

घेरण्ड शक्तिचालन के प्रकरण में भी अश्विनी का उल्लेख करता है। बन्धों में मूलबन्ध का अलग विवेचन है। साथ पढ़ने पर बार-बार की क्रिया, एक बन्ध और उस घटक को रखने वाले विस्तृत क्रम का भेद समझ आता है। सम्बन्धित शब्द सभी विधियों को अदल-बदल योग्य नहीं बना देते।

इस पृष्ठ की सीमा

यह पारम्परिक शब्दावली का वर्णन है, पेल्विक फ़्लोर का उपचार या व्यायाम का निर्देश नहीं। आवृत्ति, कुम्भक या रोग-विशेष की सलाह नहीं दी गई है। पुराने अंश के फलों से रोग-निवारण या लम्बी आयु का वादा नहीं किया गया है। सहज हस्तमुद्रा की तलाश में आए हों तो सूची का हाथों वाला समूह अधिक उपयुक्त है; मुद्रा शब्द का दायरा समझने में यह भेद भी काम आता है।

स्रोत और दायरा

आधार-संस्करण

Gheranda Samhita, Sanskrit

इस प्रस्तुति का पाठ

  1. Gheranda Samhita, Sanskrit

    3.82–83; relationship at 3.55.

    SanskritDocuments transcription. Coordinates refer to this transcription; Mallinson’s edition uses different numbering in chapter 3.

  2. Kundalini Yoga

    “Instructions On Mudras And Bandhas,” item 6.

    Swami Sivananda; Divine Life Society, tenth edition 1994, authorized web edition 1999. Traditional teaching, not clinical evidence.

इस प्रस्तुति का दायरा

पारम्परिक वर्णनों की तुलना वाला मौलिक सन्दर्भ-पाठ। यह पूरे मूल अध्याय का अनुवाद नहीं है।

सीमाएँ और पाठ-भेद

ऊपर की चर्चा में महत्त्वपूर्ण भेद स्पष्ट हैं। पारम्परिक व्याख्या और कहे गए फल अपने स्रोतों के कथन हैं, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं। समीक्षा: 11 सितम्बर 2026।