पारम्परिक सन्दर्भ

नभो मुद्रा

जीभ से सम्बन्धित मुद्रा, खेचरी के भेद सहित।

छोटा-सा मूल अंश

घेरण्डसंहिता नभो को अलग नाम देती है और ऊपर की ओर जीभ की स्थिति के साथ कुम्भक बताती है। मलिन्सन के संस्करण में यह 3.7 है; संस्कृतडॉक्युमेंट्स के पाठ में वही सम्बन्धित अंश 3.9 पर है। दोनों स्थान देने से केवल गिनती के कारण मतभेद का भ्रम नहीं होता।

बाद का शिक्षण-प्रयोग

शिवानन्द अपने निर्देशों में ऊपर रखी जीभ को नभो कहते हैं, उन साधकों के प्रसंग में जिन्होंने खेचरी की लम्बी तैयारी नहीं की है। उनकी भाषा इस नाम को माण्डुकी से भी जोड़ती है। यह एक विशेष शिक्षण-प्रयोग है; घेरण्डसंहिता की सूची में नभो और माण्डुकी अलग नाम हैं।

वर्णन का आकार समझिए

छोटा वर्णन कई व्यावहारिक प्रश्न खुले छोड़ता है। यहाँ उन रिक्तियों को जीभ की कल्पित क्रिया से नहीं भरा गया, न आरम्भिक श्वास में कुम्भक जोड़ा गया है। पाठ क्या जोड़ता है, दूसरा शिक्षक नाम कैसे प्रयोग करता है और नाम के साथ स्रोत क्यों चाहिए, यही समझाया गया है। खेचरी से तुलना करने पर इस छोटे सन्दर्भ और उस मुद्रा की विस्तृत सामग्री का अन्तर खुलता है।

स्रोत और दायरा

आधार-संस्करण

Gheranda Samhita, James Mallinson (2004)

इस प्रस्तुति का पाठ

  1. Gheranda Samhita, James Mallinson (2004)

    3.7, printed p. 61.

    YogaVidya.com publisher excerpt, introduction and chapter 3, printed pp. 60–71. This is a sample, not the entire book.

  2. Gheranda Samhita, Sanskrit

    3.9 and list 3.1–3; Manduki 3.62–63.

    SanskritDocuments transcription. Coordinates refer to this transcription; Mallinson’s edition uses different numbering in chapter 3.

  3. Kundalini Yoga

    “Instructions On Mudras And Bandhas,” item 7.

    Swami Sivananda; Divine Life Society, tenth edition 1994, authorized web edition 1999. Traditional teaching, not clinical evidence.

इस प्रस्तुति का दायरा

पारम्परिक वर्णनों की तुलना वाला मौलिक सन्दर्भ-पाठ। यह पूरे मूल अध्याय का अनुवाद नहीं है।

सीमाएँ और पाठ-भेद

ऊपर की चर्चा में महत्त्वपूर्ण भेद स्पष्ट हैं। पारम्परिक व्याख्या और कहे गए फल अपने स्रोतों के कथन हैं, चिकित्सकीय प्रमाण नहीं। समीक्षा: 11 सितम्बर 2026।