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रामायणवन, वचन और वापसी

इन्द्रजित्, लक्ष्मण-मूर्च्छा, संजीवनी

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वाल्मीकि रामायण · युद्धकाण्ड
मेघनाद (इन्द्रजित्) का माया-युद्ध, ब्रह्मास्त्र से राम-लक्ष्मण का मूर्च्छित होना, और संजीवनी-औषधि लाने हनुमान का पर्वत उठा लाना।

पढ़ने में लगभग 80 मिनट

कुम्भकर्ण की मृत्यु का समाचार जब रावण तक पहुँचा, तो लंका का यह अंक एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ जहाँ रावण के घर के एक-एक स्तम्भ धराशायी होने लगे। रणभूमि में उपस्थित राक्षसों ने आकर राक्षसेन्द्र रावण से कहा कि श्रीराम ने कुम्भकर्ण को मार गिराया है। जो वीर वानर-सेना को तितर-बितर कर, वानरों को निगलकर, कुछ क्षण अपना पराक्रम दिखाकर यम (मृत्यु का देवता) के समान हो उठा था, वही कुम्भकर्ण अब काल के वश हो गया है। श्रीराम के बाणों से पीड़ित और उनके श्रेष्ठ बल से दबा हुआ वह पर्वत-सरीखा भाई अब बिना सिर और बिना अंगों का धड़ बनकर पड़ा है, मानो दावानल (वन की आग) से झुलसा वृक्ष हो। उसके धड़ का आधा भाग भयंकर दीखते समुद्र में डूबा है और नाक-कान कटे, रक्त बहाते सिर से लंका का मुख्य द्वार रुँधा पड़ा है। यह सुनकर शोक से संतप्त रावण मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।

रावण का विलाप और त्रिशिरा का आश्वासन

चाचा के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण के पुत्र देवान्तक और नरान्तक, तथा त्रिशिरा और अतिकाय भी फूट-फूटकर रोने लगे। रावण के सौतेले भाई महोदर और महापार्श्व भी शोक से अभिभूत हो उठे कि अक्लिष्टकर्मा (बिना थके कर्म करने वाले) श्रीराम ने उनके भाई को मार डाला। बड़ी कठिनाई से होश में आकर रावण विलाप करने लगा, उसकी इन्द्रियाँ व्याकुल थीं।

रावण बोला, “हाय वीर कुम्भकर्ण! आप शत्रुओं के दर्प को चूर करने वाले, असीम बल से युक्त थे। आप हमें छोड़कर दैव के कारण यमलोक चले गए! बन्धुओं के बल को बढ़ाकर, शत्रु-सेना को संताप देकर, हमारे पार्श्व से शल्य (काँटा) निकाले बिना ही, हमें त्यागकर अकेले कहाँ चले गए? जिस दाहिने भुजरूपी बल का आश्रय लेकर हमें किसी देव या असुर का भय नहीं था, वही बाहु अब गिर पड़ी है, तो निश्चय ही अब हम जीवित नहीं रहेंगे। जो कालाग्नि (प्रलयकाल की आग) के समान था, जिसे वज्र का प्रहार भी कभी हानि न पहुँचा सका, वह आज श्रीराम के बाणों से पीड़ित होकर धरती पर शाश्वत निद्रा में कैसे सोया पड़ा है? आकाश में स्थित देवगण और ऋषिगण आपको रण में मरा देखकर हर्ष से जयघोष कर रहे हैं।”

रावण ने आगे कहा, “अवसर पाकर अति-प्रसन्न वानर अब निश्चय ही आज ही लंका के उन दुर्गम द्वारों पर सब ओर से चढ़ आएँगे। कुम्भकर्ण के बिना अब हमें न राज्य से कोई प्रयोजन रहा, न सीता से। आपके बिना हमारी जीवित रहने में भी कोई रुचि नहीं। यदि हम युद्ध में अपने भाई के हन्ता राघव को न मारें, तो हमारे लिए मरण ही श्रेयस्कर है, यह व्यर्थ जीवन नहीं। आज ही हम उसी दिशा में जाएँगे जहाँ हमारा अनुज है; भाइयों को इस प्रकार भेजकर हम क्षण भर भी जीने का साहस नहीं रखते। आपके मारे जाने पर हम इन्द्र को कैसे जीतेंगे? जिन देवों के साथ हमने पूर्व में अपराध किया, वे ही हमें देखकर अब हँसेंगे।”

रावण ने स्वीकार किया, “विभीषण का जो शुभ वचन था, अज्ञानवश हमने उस महात्मा का वह वचन न माना। यही विपत्ति अब हम पर आ पड़ी। जब से कुम्भकर्ण और प्रहस्त का क्रूर अन्त हुआ, विभीषण का परामर्श हमें लज्जित कर रहा है। हमने ही उस धार्मिक और श्रीमान विभीषण को निकाल बाहर किया, उसी कर्म का यह शोकजनक कटु फल हम भोग रहे हैं।” इस प्रकार अनेक प्रकार से अति करुण विलाप करके, अपने अनुज (इन्द्र के शत्रु) कुम्भकर्ण को मारा गया जानकर, व्याकुल अन्तरात्मा वाला दशानन भीषण पीड़ा से गिर पड़ा।

सार: कुम्भकर्ण-वध से टूटा रावण इस अंक में पहली बार अपनी पराजय का आभास पाता है। उसका विलाप केवल भाई का शोक नहीं, अपने अहंकार और विभीषण-तिरस्कार की स्वीकारोक्ति भी है। वाल्मीकि यहाँ रावण को मनुष्य-सरीखी दुर्बलता में दिखाते हैं, जो आगे आने वाले विनाश की भूमिका रचता है।

रावण-पुत्रों का प्रस्थान और अंगद के हाथों नरान्तक की मृत्यु

शोक से अभिभूत रावण का यह विलाप सुनकर त्रिशिरा (उसका एक पुत्र) बोला, “पिताजी, यह सच है कि महावीर्यवान कुम्भकर्ण मारे गए हैं। पर सत्पुरुष आपकी भाँति विलाप नहीं करते। आप तो तीनों लोकों को जीतने में समर्थ हैं, फिर साधारण मनुष्य की तरह अपने को इस प्रकार शोक से क्यों अभिभूत करते हैं? ब्रह्मा की दी हुई शक्ति, कवच, बाण, धनुष, और सहस्र खरों (गधों) से युक्त मेघ-सी गर्जना करने वाला रथ अब भी आपके पास है। आपने एक ही अस्त्र से कई बार देव-दानवों का संहार किया है, अतः समस्त अस्त्रों से सुसज्जित होकर आप राम का दण्ड दे सकते हैं। महाराज, आप चाहें तो लंका में ही ठहरें, हम रण में निकलकर आपके शत्रुओं को वैसे ही उखाड़ फेंकेंगे जैसे गरुड़ सर्पों को उखाड़ता है। आज मेरे हाथ रण में मारा गया राम वैसे ही गिरेगा जैसे इन्द्र के हाथ शम्बर और विष्णु के हाथ नरक (एक दानव) गिरा था।”

एक उप-कथा: यहाँ जिस नरक का उल्लेख है, वह दानव विप्रचित्ति का सिंहिका से उत्पन्न पुत्र था; उसके छह भाई थे: वातापि, नमुचि, इल्वल, सूमर, अन्धक और कालनाभ। यह नरक उस भौमासुर (पृथ्वी-पुत्र नरकासुर) से भिन्न है जो द्वापर युग में श्रीकृष्ण के हाथ मारा गया; वह तो रावण के जीवनकाल में जन्मा ही न था।

त्रिशिरा का यह आश्वासन सुनकर रावण काल से प्रेरित होकर अपने को नवजात-सा मानने लगा। त्रिशिरा का वचन सुनकर देवान्तक, नरान्तक और तेजस्वी अतिकाय, सब युद्ध के लिए हर्षित हो उठे। “मैं आगे! मैं आगे!” इस प्रकार गर्जते हुए शक्र (इन्द्र) के समान पराक्रमी रावण के वीर पुत्र खड़े हो गए। वे सब आकाशगामी थे, माया में निपुण, देवों के दर्प को चूर करने वाले और रण में दुर्धर्ष। रावण उन पुत्रों से वैसे ही सुशोभित हुआ जैसे अमरों से घिरा इन्द्र। पुत्रों को आलिंगन कर, आभूषणों से सज्जित कर और शुभ आशीर्वाद देकर उसने उन्हें रण के लिए भेजा। राजकुमारों की रक्षा के लिए उसने अपने दो भाइयों, युद्धोन्मत्त (महापार्श्व) और मत्त (महोदर) को भी भेजा।

राक्षस योद्धा हाथी, रथ और घोड़े पर सवार होकर लंका के जलते द्वार से युद्ध के लिए निकलते हैं।

महोदर ऐरावत-कुल में उत्पन्न नील-मेघ-सरीखे सुदर्शन नामक हाथी पर सवार हुआ। त्रिशिरा उत्तम घोड़ों से जुते रथ पर चढ़ा। अतिकाय, जो सब धनुर्धरों में श्रेष्ठ था, उत्तम चक्रों, अच्छे अनुकर्ष (धुरों) और सुदृढ़ कूबर (जुए के दण्ड) वाले श्रेष्ठ रथ पर चढ़ा, जो तरकशों, धनुषों, भालों, तलवारों और परिघों से युक्त था। देवान्तक ने स्वर्ण-जड़ित परिघ (लोहे की गदा) उठाया; तीन किरीटों से त्रिशिरा तीन सुवर्ण-शिखरों वाले हिमालय की तरह शोभित हुआ। नरान्तक उच्चैःश्रवा-सरीखे श्वेत, स्वर्ण-भूषित और मन के समान वेग वाले घोड़े पर चढ़ा और उल्का-सी चमकती प्रास (भाला) लेकर मयूर पर बैठे कार्तिकेय-सा शोभित हुआ। महापार्श्व गदा-पाणि होकर कुबेर-सा चमका। ये महात्मा अमरावती से देवों के समान निकले।

नैऋतों (राक्षसों) में ये छह रत्न, दस औषधियों और सुगन्ध-द्रव्यों से अपने अंगों को लेपकर, युद्ध की इच्छा से निकले। शत्रु-सेना ने उन्हें आते देखा, जो हाथी-घोड़े-रथों से भरी, सैकड़ों घण्टियों से शब्दायमान, नील-मेघ-सी और महान अस्त्र उठाए हुई थी। दोनों सेनाओं में घोर युद्ध छिड़ गया: वानर वृक्ष-शिला उठाकर, राक्षस तीक्ष्ण बाण और शूल-मुद्गर-खड्ग चलाते हुए, एक-दूसरे को पटकते रहे; मुहूर्त भर में भूमि रक्त से सिंच गई और पर्वत-सरीखे राक्षसों के टुकड़े बिखर गए।

छत्रधारी राक्षस योद्धा रथ से लंबा भाला चलाकर वानरों को बेधता है, चारों ओर शव बिखरे पड़े हैं।

तभी मारुत-सरीखे वेग वाले घोड़े पर चढ़कर, तीक्ष्ण शक्ति (भाला) लेकर नरान्तक उस भयंकर वानर-सेना में वैसे घुस गया जैसे मछली महासागर में। उस वीर ने अकेले अपने दीप्त भाले से सात सौ वानरों को बेध डाला; क्षण भर में उसने वानर-चूड़ामणियों की सेना का संहार कर डाला। विद्याधर और महर्षि उस घोड़े पर बैठे महात्मा को वानर-दल में विचरते देखते रहे। उसका रास्ता माँस-रक्त के कीचड़ से भरा और पर्वत-सरीखे गिरे वानरों से ढका दीखता था। दीप्त उल्का-सरीखे भाले से वह वर्षाकाल की वायु-सा सब ओर वानरों को कुचलता रहा। वीर वानर न भाग सके, न खड़े रह सके, न भय से हिल सके।

जो श्रेष्ठ वानर पहले कुम्भकर्ण के मारे गिर पड़े थे, वे अब स्वस्थ होकर सुग्रीव के पास पहुँचे। सुग्रीव ने चारों ओर देखा तो वानर-सेना नरान्तक के भय से इधर-उधर भागती दीखी। सेना को भागते और नरान्तक को भाला उठाए घोड़े पर आता देखकर, महातेजस्वी वानराधिप सुग्रीव ने शक्र-तुल्य पराक्रमी कुमार अंगद से कहा, “जाइए, जो वीर राक्षस वानर-बल को आतंकित करता हुआ घोड़े पर सवार है, उसे शीघ्र प्राणों से वियुक्त कर दीजिए।” स्वामी का वचन सुनकर अंगद वैसे ही निकल पड़ा जैसे मेघ-सी सेना से सूर्य निकलता है। स्वर्ण के अंगदों (बाजूबन्दों) से सजा अंगद धातु-शिराओं वाले पर्वत-सा चमका।

अंगद ने नरान्तक के पास जाकर कहा, यद्यपि वह नख-दन्तों के सिवा निरायुध था, “ठहरिए! इन साधारण वानरों से क्या करेंगे? अपना वज्र-सा भाला मेरी इस छाती पर चलाइए।” अंगद का यह वचन सुनकर नरान्तक क्रोध से दाँतों से ओठ चबाता, सर्प-सा फुफकारता उसके सामने आ खड़ा हुआ। उसने दीप्त भाला घुमाकर अंगद पर फेंका, पर वह वज्र-कठोर छाती से टकराकर टूट गया और भूमि पर गिर पड़ा। गरुड़ से कटे सर्प-शरीर सा टूटा वह भाला देखकर वालि-पुत्र अंगद ने हथेली उठाकर नरान्तक के घोड़े के सिर पर ऐसा प्रहार किया कि घोड़े के पैर धरती में धँस गए, आँखें फूट गईं, जीभ बाहर निकल आई और कपाल फटकर वह पर्वत-सा घोड़ा गिर पड़ा। घोड़े को मरा देख क्रुद्ध नरान्तक ने मुष्टि उठाकर अंगद के सिर पर प्रहार किया।

एक वानर वीर जलता भाला थामे घोड़े पर सवार राक्षस की छाती पर मुष्टिका का प्रहार करता है।

मुष्टि-प्रहार से अंगद का कपाल फट गया, उससे अत्यन्त गरम रक्त बहने लगा; उसे दाह हुआ, वह बार-बार मूर्च्छित हुआ और होश में आकर विस्मित हो उठा। फिर गिरि-शिखर-सी मुष्टि बाँधकर महात्मा वालि-पुत्र ने उसे मृत्यु-वेग से नरान्तक की छाती पर मारा। मुष्टि-प्रहार से उसकी छाती फट गई और धँस गई; वह ज्वालामय रक्त वमन करता वज्र से टूटे पर्वत-सा गिर पड़ा। जब अग्र-वीर्यवान नरान्तक वालि-पुत्र के हाथ मारा गया, तो आकाश में देवों और रणभूमि में वानरों का महान हर्ष-निनाद गूँज उठा। अंगद ने यह अति-दुष्कर पराक्रम किया जिसने श्रीराम के मन को भी हर्ष से भर दिया, और वे भी विस्मित हो गए; भीमकर्मा अंगद फिर युद्ध के लिए हर्षित हो उठा।

सार: रावण का पूरा कुल, पुत्र और भाई, एक साथ रण में उतरता है, मानो अन्तिम दाँव लगाया जा रहा हो। नरान्तक का सात सौ वानरों को अकेले मार गिराना और फिर बालि-पुत्र अंगद के एक मुष्टि-प्रहार से ढह जाना दिखाता है कि वाल्मीकि के युद्ध में अहंकार और पराक्रम कितनी जल्दी पलट जाते हैं।

देवान्तक, त्रिशिरा, महोदर और महापार्श्व का वध

नरान्तक को मारा गया देखकर देवान्तक, त्रिशिरा और महोदर, ये तीनों राक्षस-श्रेष्ठ चीख उठे। मेघ-सरीखे हाथी पर चढ़ा वेगवान महोदर महावीर्य अंगद की ओर झपटा। भाई नरान्तक के पतन से संतप्त बलवान देवान्तक घोर परिघ लेकर अंगद की ओर दौड़ा, और सूर्य-सरीखे रथ पर चढ़कर वीर त्रिशिरा भी उसकी ओर बढ़ा। तीनों राक्षसेन्द्रों से एक साथ घिरा अंगद एक महान वृक्ष उखाड़ लाया और देवान्तक पर वैसे फेंका जैसे इन्द्र दीप्त वज्र फेंकता है। त्रिशिरा ने आशीविष-सर्प-सरीखे बाणों से उस वृक्ष को काट डाला; वृक्ष कटा देख अंगद उछल पड़ा।

अंगद ने वृक्ष और शिलाओं की वर्षा की, त्रिशिरा ने तीक्ष्ण बाणों से उन्हें काट दिया, महोदर ने परिघ-अग्र से तोड़ डाला, और त्रिशिरा बाणों से अंगद पर टूट पड़ा। महोदर ने हाथी पर चढ़कर वज्र-सरीखी गदाओं से अंगद की छाती पर प्रहार किया; देवान्तक ने परिघ से मारकर तुरन्त पीछे हट गया। तीनों के एक साथ आक्रमण से भी महातेजस्वी वालि-पुत्र किंचित विचलित न हुआ। उसने महावेग दिखाकर हथेली से महोदर के विशाल हाथी पर प्रहार किया जिससे उस गजराज की आँखें गिर गईं और वह नष्ट हो गया। फिर हाथी का दाँत उखाड़कर अंगद ने देवान्तक पर प्रहार किया; वह वायु-कम्पित वृक्ष-सा डगमगाकर लाक्षारस-वर्ण रक्त बहाने लगा।

कठिनाई से साँस लेकर बलवान देवान्तक ने परिघ घुमाकर अंगद पर प्रहार किया; परिघ-आहत वालि-पुत्र घुटनों के बल गिरकर फिर उठ खड़ा हुआ। उछलते अंगद को त्रिशिरा ने तीन भयंकर सीधे बाणों से ललाट पर बेधा। अंगद को तीन राक्षसों से घिरा देख हनुमान और नील भी सहायता को निकल पड़े। नील ने त्रिशिरा पर शिलाग्र फेंका, पर बुद्धिमान रावण-पुत्र ने उसे तीक्ष्ण बाणों से चूर कर दिया, जिससे वह शिखर अग्नि-कण और ज्वाला छोड़ता गिर पड़ा। त्रिशिरा का यह कौशल देख हर्षित बलवान देवान्तक परिघ लेकर मारुति (हनुमान) की ओर दौड़ा। हनुमान ने उछलकर देवान्तक के सिर पर वज्र-सरीखी मुष्टि का प्रहार किया, फिर दूसरा प्रहार किया और गर्जना से राक्षसों को कँपा दिया। मुष्टि से कुचला कपाल, बाहर निकले दाँत-आँख और लटकती जीभ वाला देवान्तक तुरन्त मरकर भूमि पर गिर पड़ा।

देवशत्रु देवान्तक के मारे जाने पर क्रुद्ध त्रिशिरा ने नील की छाती पर तीक्ष्ण बाणों की भयंकर वर्षा की। उधर क्रुद्ध महोदर फिर मन्दर-सी आरूढ़ता से पर्वत-सरीखे हाथी पर चढ़कर नील पर बाणों की झड़ी लगाने लगा। बाणों से बिंधा, अंग-अंग पीड़ित सेनापति नील महाबली महोदर से शक्तिहीन-सा हो गया। फिर होश में आकर वायु-सूनु नील ने वृक्षखण्ड सहित एक शिखर उखाड़कर उछलकर महोदर के सिर पर प्रहार किया; उस महागज के साथ कुचला हुआ, मूर्च्छित महोदर वज्र से टूटे पर्वत-सा भूमि पर मर गिरा।

चाचा महोदर को मरा देख त्रिशिरा ने धनुष उठाकर हनुमान को तीक्ष्ण बाणों से बेधा। हनुमान ने पहले व्यर्थ शिखर फेंका, फिर वृक्ष-वर्षा की, पर प्रतापी त्रिशिरा ने उन्हें भी काट डाला। तब हनुमान ने उछलकर सिंह-सा त्रिशिरा के घोड़े को नखों से चीर डाला। त्रिशिरा ने कालरात्रि-सी शक्ति (भाला) उठाकर हनुमान पर फेंकी; हरि-शार्दूल हनुमान ने आकाश में उल्का-सी आती उस अबाधित शक्ति को पकड़कर तोड़ डाला और गर्जना की। यह देख वानर-दल मेघ-सा गरज उठे। फिर त्रिशिरा ने खड्ग उठाकर हनुमान की छाती पर मारा; घायल वीर हनुमान ने हथेली से त्रिशिरा की छाती पर प्रहार किया जिससे वह तेजस्वी राक्षस अस्त्र छोड़ता मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।

हनुमान एक हाथ में राक्षस का कटा सिर थामे खड़े हैं, तीन मुकुटधारी सिर रक्त बिखेरते उड़ते हैं।

गिरते त्रिशिरा का खड्ग छीनकर पर्वत-सरीखे हनुमान ने गर्जना कर सब राक्षसों को त्रास दिया। यह सुनकर त्रिशिरा उठ बैठा और मुष्टि से हनुमान को मारा। उस प्रहार से कुपित होकर हनुमान ने किरीटधारी राक्षस-श्रेष्ठ के सिर पकड़ लिए, और जैसे इन्द्र ने त्वष्टा-पुत्र विश्वरूप के तीन सिर काटे थे, वैसे ही तीक्ष्ण खड्ग से कुण्डल-किरीट युक्त त्रिशिरा के तीनों सिर काट डाले। दीप्त-अग्नि-सी आँखों वाले, शिला-सरीखे वे सिर सूर्य-मार्ग से छूटे तारों-से भूमि पर गिर पड़े। शक्र-पराक्रमी हनुमान ने जब उस देवशत्रु को मारा, तो वानर गरज उठे, धरती काँप उठी और राक्षस चारों ओर भाग खड़े हुए।

त्रिशिरा और महोदर को मरा, तथा दुराधर्ष देवान्तक-नरान्तक को नष्ट देखकर परम क्रोधी मत्त (महापार्श्व), राक्षस-श्रेष्ठ, कुपित हो उठा और उसने पूरी लोहे की, स्वर्ण-मढ़ी, दीप्त, माँस-रक्त-फेन से सनी, शत्रु-रक्त से तृप्त, रक्तमालाओं से सजी, ऐरावत-महापद्म-सार्वभौम (दिग्गजों) को भयभीत करने वाली विशाल गदा उठाई और युगान्त-अग्नि-सा जलता हुआ वानरों पर टूट पड़ा। ऋषभ नामक वानर उछलकर रावण के अनुज मत्तानीक (महापार्श्व) के सामने आ खड़ा हुआ। क्रुद्ध राक्षस ने पर्वत-सरीखे उस वानर की छाती पर वज्र-कठोर गदा से प्रहार किया; भिन्न-वक्ष ऋषभ बहुत रक्त बहाने लगा।

हनुमान रणभूमि में गिराए गए राक्षस योद्धा की छाती चीर डालते हैं, पीछे वानर गदाएँ उठाए गरजते हैं।

बहुत देर बाद होश में आकर, कुपित और ओठ फड़काता ऋषभ महापार्श्व की ओर देखने लगा। वेगवान वानर-वीर-मुख्य ने झपटकर मुष्टि बाँधी और राक्षस की छाती (दोनों बाहुओं के बीच) पर प्रहार किया; जड़ से कटे वृक्ष-सा वह राक्षस रक्त में नहाकर गिर पड़ा। ऋषभ ने उसकी यमदण्ड-सी घोर गदा झपटकर गर्जना की। महापार्श्व मुहूर्त भर मृत-सा पड़ा रहा, फिर प्राण लौटने पर सन्ध्या-मेघ-वर्ण वह असुर उछलकर ऋषभ पर प्रहार कर बैठा। ऋषभ मूर्च्छित होकर गिरा, पर मुहूर्त में उठकर उसी पर्वत-शिखर-सी गदा को घुमाकर रण में महापार्श्व पर प्रहार किया। उस घोर गदा ने उसका वक्ष फाड़ डाला, और हिमालय-सा वह बहुत रक्त बहाने लगा।

फिर ऋषभ ने वेग से महापार्श्व की गदा झपटी और उसी भयंकर गदा को बार-बार घुमाकर रण के अग्रभाग में मत्तानीक पर प्रहार किया; अपनी ही गदा से चूर हुआ, दाँत-आँख गिरे हुए मत्त (महापार्श्व) वज्र-हत पर्वत-सा गिर पड़ा। उस राक्षस के मरने पर रावण की समुद्र-सी सेना अस्त्र फेंककर तट तोड़े समुद्र की भाँति प्राण बचाने भागी।

सार: इस सर्ग में रावण के चार योद्धा, दो पुत्र और दो भाई, मारे जाते हैं। यहाँ हनुमान, नील, अंगद और ऋषभ बारी-बारी से अपने पराक्रम का परिचय देते हैं। विश्वरूप के सिर काटने वाले इन्द्र से हनुमान की तुलना वाल्मीकि का संकेत है कि यह केवल बल नहीं, धर्म-स्थापना का देवकार्य है।

अतिकाय का घोर युद्ध और लक्ष्मण के हाथों उसका वध

स्वर्ण आभा से घिरा इंद्रजित उड़ते रथ से बाणों की वर्षा करता है, नीचे वानर सेना व्याकुल होती है।

अपनी सेना को व्यथित और भाइयों को इन्द्र-तुल्य पराक्रमी होते हुए भी मारा गया देखकर, तथा चाचा युद्धोन्मत्त (महोदर) और मत्त (महापार्श्व) को रण में गिरा देखकर, पर्वत-सरीखा अतिकाय, जिसे ब्रह्मा ने अवध्यता का वर दिया था, महाक्रोध में आ गया। सहस्र सूर्यों के समान दीप्त रथ पर चढ़कर वह वानरों की ओर दौड़ा। किरीट और चमकते कुण्डल पहने अतिकाय ने धनुष चढ़ाकर अपना नाम उद्घोषित किया और महान गर्जना की। उस सिंहनाद, नाम-घोष और भयंकर ज्या-शब्द से वानर त्रस्त हो उठे। उसके विशाल शरीर को देखकर सब सोचने लगे कि क्या यह कुम्भकर्ण फिर जी उठा! त्रिविक्रम के समय विष्णु के रूप-सा उसका विशाल रूप देखकर वानर भाग खड़े हुए और शरण-दाता श्रीराम के पास पहुँचे।

तब काकुत्स्थ श्रीराम ने दूर से ही पर्वत-सरीखे, धनुषधारी, मेघ-सी गर्जना करते अतिकाय को देखा। विस्मित होकर वानरों को आश्वस्त करते हुए श्रीराम ने विभीषण से पूछा, “सहस्र घोड़ों से जुते विशाल रथ पर बैठा, सिंह-सा नेत्रों वाला, परिघ-शूल-प्रास-तोमरों के बीच महेश्वर-सा शोभित यह पर्वत-सरीखा धनुर्धर कौन है? जिसके रथ पर राहु का चिह्न है, जो सूर्य-किरण-सी आभा वाले बाणों से दसों दिशाओं को आलोकित कर रहा है, जिसका इन्द्रधनुष-सा स्वर्ण-पृष्ठ धनुष मेघ-गर्जना सी ध्वनि करता है? बीस तरकश, दस धनुष, आठ ज्याएँ उसके रथ पर रखी हैं। हे महाबाहु, इस राक्षस-श्रेष्ठ का परिचय दीजिए, जिसे देखकर सब वानर भयभीत होकर भाग गए।”

अमित-तेजस्वी राजपुत्र राम के पूछने पर महातेजस्वी विभीषण ने उत्तर दिया, “दस सिर वाला, कुबेर का अनुज, विश्रवा का पुत्र, भीमकर्मा राक्षसेश्वर रावण प्रसिद्ध है। उसका एक वीर्यवान पुत्र हुआ, बल में रावण-तुल्य, वृद्ध-सेवी, श्रुति-धर और समस्त अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ। यह अश्व-गज-सवारी, खड्ग-धनुष-संचालन, भेद-साम-दान, नीति और मन्त्र में अति-सम्मानित है। जिसकी भुजा के आश्रय लंका निर्भय रहती है, यह धान्यमालिनी (रावण की अन्य रानी) का पुत्र अतिकाय है। इसने तप से ब्रह्मा को प्रसन्न कर अस्त्र प्राप्त किए और शत्रुओं को जीता; ब्रह्मा ने इसे देव-असुरों से अवध्यता, यह दिव्य कवच और सूर्य-सा दीप्त रथ दिया। इसी ने इन्द्र के वज्र को बाणों से रोका और वरुण के पाश को विफल किया। हे पुरुषश्रेष्ठ, इससे पहले कि यह वानर-सेना का संहार कर डाले, इस पर शीघ्र यत्न कीजिए।”

तब बलवान अतिकाय वानर-सेना में घुसकर बार-बार धनुष टंकारता गरजने लगा। उसे देख कुमुद, द्विविद, मैन्द, नील और शरभ, ये प्रधान वानर एक साथ वृक्ष और शिखर लेकर उस पर टूट पड़े। अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ अतिकाय ने स्वर्ण-भूषित बाणों से उन सब वृक्ष-शिलाओं को काट डाला और सामने आए वानरों को लोहमय बाणों से बेध डाला। बाण-वर्षा से पीड़ित, अंग-भग्न वानर उस महायुद्ध में अतिकाय का सामना न कर सके। वह राक्षस वैसे ही वानर-सेना को त्रस्त करने लगा जैसे यौवन-मद से उन्मत्त सिंह मृग-यूथ को।

चाँदनी रात में लक्ष्मण धनुष पर बाण चढ़ाए अट्टहास करते विशाल राक्षस योद्धा के सम्मुख खड़े हैं।

जो लड़ नहीं रहा था, उस पर राक्षसेन्द्र अतिकाय प्रहार नहीं करता था। श्रीराम की ओर बढ़कर धनुष-तरकश धारी उसने गर्वोक्ति की, “मैं रथ पर बाण-धनुष लिए बैठा हूँ, किसी साधारण योद्धा से नहीं लड़ता। जिसमें शक्ति और उत्साह हो, वही आज मुझसे युद्ध करे।” यह सुनकर शत्रुहन्ता लक्ष्मण (सुमित्रा-पुत्र) क्रोध से उछलकर तरकश से बाण खींच, अतिकाय के सामने अपना विशाल धनुष आकर्ण खींचने लगे। लक्ष्मण की भयंकर ज्या-ध्वनि समस्त पृथ्वी, आकाश, समुद्र और दिशाओं को भरकर रात्रिचरों को त्रास देने लगी।

उग्र ज्या-घोष सुनकर बलवान राक्षसेन्द्र-पुत्र विस्मित हुआ। लक्ष्मण को उद्यत देख तीक्ष्ण बाण लेकर अतिकाय बोला, “हे सौमित्र, आप अभी बालक हैं, पराक्रम में अनिपुण। जाइए! काल-सरीखे मुझसे क्यों युद्ध करना चाहते हैं? मेरी भुजा से छूटे बाणों के वेग को न हिमालय, न आकाश, न पृथ्वी सह सकती है। सुख से सोई कालाग्नि को क्यों जगाना चाहते हैं? धनुष छोड़कर लौट जाइए, मेरे पास आकर प्राण न खोइए।” लक्ष्मण ने कहा, “केवल वचन से आप प्रधान नहीं बनते, न डींग हाँकने से सत्पुरुष होते हैं। मैं धनुष-बाण लिए सामने खड़ा हूँ, हे दुरात्मन, अपना बल दिखाइए। कर्म से अपना परिचय दीजिए, आत्म-प्रशंसा न कीजिए। मैं अपने तीक्ष्ण बाणों से आपका सिर वैसे ही गिराऊँगा जैसे वायु काल-पक्व ताल-फल को वृन्त से गिराती है।”

अतिकाय ने क्रुद्ध होकर एक बाण लक्ष्मण की ओर छोड़ा, मानो आकाश को समेट रहा हो; लक्ष्मण ने अर्धचन्द्र-बाण से उसे काट डाला। फिर अतिकाय ने पाँच बाण छोड़े, लक्ष्मण ने उन्हें मार्ग में ही काट दिया और एक तेजस्वी बाण से अतिकाय के ललाट पर प्रहार किया, जिससे रक्त-रंजित वह बाण पर्वत से चिपके नागराज-सा दीखने लगा। आहत अतिकाय रुद्र-बाण से टकराए त्रिपुर-द्वार-सा काँप उठा। होश सँभालकर उसने कहा, “अच्छा बाण चलाया! आप मेरे प्रशंसनीय शत्रु हैं।” फिर एक, तीन, पाँच और सात बाण छोड़े; पर राघव-अनुज ने उन्हें भी काट दिया।

क्रुद्ध अतिकाय ने एक सर्प-सरीखा बाण छोड़कर लक्ष्मण को छाती में बेधा; मद-झरते हाथी-से वे रक्त बहाने लगे। फिर लक्ष्मण ने स्वयं को निःशल्य कर, बाण को आग्नेय अस्त्र से अभिमन्त्रित किया, जो ज्वाला छोड़ने लगा। अतिकाय ने सूर्यास्त्र से युक्त भयंकर बाण चलाया; दोनों बाण आकाश में टकराकर भस्म हो भूमि पर गिर पड़े। फिर अतिकाय ने त्वाष्ट्र अस्त्र चलाया, लक्ष्मण ने ऐन्द्र अस्त्र से काटा; अतिकाय ने याम्य, लक्ष्मण ने वायव्य से। तब लक्ष्मण ने अतिकाय पर बाण-धाराओं की वर्षा की, पर वज्र-जड़ित कवच से टकराकर बाण गिर पड़े। फिर सहस्र बाण छोड़े, तो भी अवध्य-कवच वाला अतिकाय व्यथित न हुआ।

लक्ष्मण का ज्योतिर्मय बाण राक्षस योद्धा का मुकुटधारी सिर धड़ से अलग करता है, नीचे हनुमान देखते हैं।

तब वायुदेव ने पास आकर कहा, “इसे ब्रह्मा का वर है और यह अवध्य कवच पहने है; इसे ब्राह्म अस्त्र से बेधो, अन्यथा यह नहीं मरेगा; अन्य अस्त्रों से यह कवचधारी बलवान अवध्य है।” वायु का वचन सुनकर इन्द्र-तुल्य पराक्रमी लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित उग्र-वेग बाण धनुष पर चढ़ाया; तब दिशाएँ, चन्द्र-सूर्य, महाग्रह और आकाश काँप उठे, पृथ्वी कराह उठी। यमदूत-सरीखा वह बाण लक्ष्मण ने राक्षस पर छोड़ा। अतिकाय ने उसे आते देख शक्ति-ऋष्टि-गदा-कुठार-शूल-बाणों से रोकना चाहा, पर वे सब अद्भुत आयुध व्यर्थ कर देता हुआ वह अग्नि-दीप्त बाण किरीट-युक्त अतिकाय का सिर ले उड़ा। किरीट सहित वह सिर हिमालय-शिखर-सा भूमि पर गिर पड़ा।

राजकुमार को गिरा देख शेष बचे रात्रिचर व्यथित और विषण्ण हो उठे, ऊँचे स्वर से विकट चीत्कार करने लगे। नायक के मारे जाने पर निरपेक्ष राक्षस भयभीत होकर लंका की ओर भाग चले। प्रफुल्ल-कमल-सरीखे मुख वाले अनेक वानरों ने विजय दिलाने वाले लक्ष्मण की पूजा की; अति-बलवान, मेघ-सरीखे, दुरासद अतिकाय को मारकर हर्षित लक्ष्मण शीघ्र श्रीराम के पास लौट आए।

समझने की कुंजी, अवध्यता और ब्रह्मास्त्र: अतिकाय को ब्रह्मा का अवध्य-कवच प्राप्त था, इसलिए साधारण अस्त्र, यहाँ तक कि सहस्र बाण भी निष्फल रहे। वाल्मीकि में बार-बार यही सिद्धान्त आता है: विशिष्ट वर का तोड़ केवल विशिष्ट दिव्यास्त्र है। ब्रह्मा-प्रदत्त कवच को ब्रह्मास्त्र ही भेद सकता था, और वायुदेव का संकेत ही लक्ष्मण को यह रहस्य बताता है।

सार: अतिकाय रावण का वह पुत्र है जिसकी बौद्धिक-शास्त्रीय श्रेष्ठता विभीषण के मुख से ही स्थापित होती है: वह केवल बलवान ही नहीं, वेद-शास्त्र-नीति में निपुण है। उसका वध इस अंक का पहला बड़ा द्वन्द्व-युद्ध है, और लक्ष्मण का ब्रह्मास्त्र-प्रयोग आगे इन्द्रजित-वध की भूमिका रचता है।

रावण की चिन्ता और लंका-रक्षा का आदेश

महात्मा लक्ष्मण के हाथ अतिकाय का वध सुनकर रावण उद्विग्न हो उठा और बोला, “धूम्राक्ष, जो परम असहिष्णु था, और अकम्पन, जो समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ था, तथा प्रहस्त और कुम्भकर्ण, ये महाबली, युद्ध-कांक्षी, शत्रुओं से सदा अपराजित वीर, अपनी सेनाओं सहित, अक्लिष्टकर्मा राम के हाथ मारे गए। और भी अनेक शूर महात्मा गिरा दिए गए। मेरे प्रसिद्ध-बल-वीर्य पुत्र इन्द्रजित ने उन दोनों भाइयों, राम और लक्ष्मण, को घोर वरदान-प्राप्त बाणों से बाँध दिया था, जिस बन्धन को समस्त देव, महाबली असुर, यक्ष-गन्धर्व-नाग भी न खोल सकते थे; फिर भी किसी प्रभाव, माया या मोहन से वे मुक्त हो गए, जो मैं नहीं जानता।”

रावण ने आगे कहा, “मेरे आदेश से निकले सब शूर राक्षस अति-बलवान वानरों के हाथ मारे गए। मुझे ऐसा कोई योद्धा नहीं दीखता जो आज सेना और विभीषण-सुग्रीव-सहित राम-लक्ष्मण का संहार कर सके। अहो! राम का बल और अस्त्र-बल बड़ा महान है, जिसके पराक्रम के सामने आकर राक्षस मारे गए। मैं उस वीर राघव को निरामय नारायण ही मानता हूँ। उसी के भय से लंका के द्वार-तोरण बन्द रहते हैं। अतः जो आप विनाश से बच गए हैं, सदा सतर्क रहकर इस लंका-नगरी की, और विशेषकर उस अशोक-वाटिका की, जहाँ सीता रखी हैं, गुल्मों (चौकियों) सहित रक्षा कीजिए। नगरी और वाटिका में हर निर्गम-प्रवेश सदा हमें ज्ञात रहना चाहिए।”

“जहाँ-जहाँ गुल्म हो, वहाँ-वहाँ बार-बार निर्गम-प्रवेश की जाँच हो; अपनी-अपनी सेनाओं से घिरे सब ओर डटे रहिए। हे रात्रिचरो, प्रदोष, अर्धरात्रि या प्रत्यूष, हर समय वानरों की चाल पर दृष्टि रखिए। वानरों की कभी अवज्ञा न कीजिएगा; निरन्तर देखते रहिएगा कि शत्रु-सेना उद्यत है, आगे बढ़ रही है, या जहाँ-की-तहाँ खड़ी है।” यह आदेश सुनकर महाबली राक्षसों ने उसका तुरन्त पूरा पालन किया। सबको आदेश देकर रावण मन्यु (क्रोध) रूपी शल्य अपने हृदय में लिए, दीन होकर अपने महल में घुस गया, और पुत्र अतिकाय के विनाश का चिन्तन करता बार-बार लम्बी साँसें भरने लगा।

सार: यहाँ रावण के मुख से ही वाल्मीकि एक गूढ़ संकेत देते हैं: रावण राम को “निरामय नारायण” मानने लगता है। यह स्वीकारोक्ति उसके भीतर के भय और राम की दिव्यता दोनों को उजागर करती है। साथ ही वह सीता की रक्षा कड़ी करता है, जो आगे इन्द्रजित की माया-सीता वाली घटना की पृष्ठभूमि बनती है।

इन्द्रजित का अदृश्य माया-युद्ध और राम-लक्ष्मण का बँध जाना

शोकमग्न दस-मुख रावण के दरबार में इंद्रजित मुट्ठी उठाकर प्रतिज्ञा करता है, आगे विशाल योद्धा का शव पड़ा है।

शेष बचे राक्षसों ने रावण को देवान्तक, त्रिशिरा, अतिकाय आदि राक्षस-श्रेष्ठों के वध का समाचार दिया। यह सुनकर राजा की आँखें अश्रुओं से भर गईं। पुत्रों के क्षय और भाइयों के घोर वध का चिन्तन करता वह अत्यन्त विचारमग्न हो गया। शोक-सागर में डूबे दीन राजा को देखकर रथश्रेष्ठ राक्षसराज-पुत्र इन्द्रजित बोला, “पिताजी, जब तक इन्द्रजित जीवित है, आप मोह को न प्राप्त हों; इन्द्र के शत्रु (मेरे) बाणों से आहत होकर कोई रण में प्राण नहीं बचा सकता। आज ही राम-लक्ष्मण को मेरे बाणों से बिंधा, छिन्न-शरीर, गत-प्राण, भूमि पर सोया देखिए।”

“मेरी यह सुनिश्चित, पुरुषार्थ और दैव से युक्त प्रतिज्ञा सुनिए: आज ही मैं राम और लक्ष्मण को अमोघ बाणों से अभिभूत कर दूँगा। आज इन्द्र, यम, विष्णु, रुद्र, साध्यगण, अग्नि, चन्द्र और सूर्य मेरा अप्रमेय पराक्रम वैसे ही देखेंगे जैसे बलि-यज्ञ-वाट में विष्णु का उग्र पराक्रम देखा था।” यह कहकर, राजा से विदा लेकर, अदीन-सत्त्व इन्द्रजित वायु-तुल्य वेग वाले, खरश्रेष्ठों (गधों) से जुते रथ पर चढ़ा। उसके पीछे अनेक महाबली राक्षस, श्रेष्ठ धनुष लिए, हर्षित, चल पड़े। कुछ हाथियों पर, कुछ श्रेष्ठ घोड़ों पर, तो कुछ बाघ-वृश्चिक-बिलाव-गधे-ऊँट, सर्प-वराह-सिंह-शृगाल और काक-हंस-मयूर पर सवार थे; वे प्रास-पट्टिश-शनि-तलवार-परशु-गदा-भुशुण्डि-मुद्गर-शतघ्नी-परिघ आदि लिए हुए थे।

शंख-भेरी की पूर्ण ध्वनि से इन्द्रजित शंख-चन्द्र-वर्ण छत्र से, पूर्ण चन्द्र-युक्त आकाश-सा शोभित होकर रणभूमि में पहुँचा। स्वर्ण-चामरों से वींजित वह सब धनुर्धरों में मुख्य रथ के चारों ओर राक्षसों को खड़ा कर, अग्नि-तुल्य तेजस्वी होकर विधिवत श्रेष्ठ मन्त्रों से अग्नि की पूजा करने लगा। उसने पुष्प-चन्दन-पूर्वक लाजा (खीलों) से अग्नि का सत्कार कर आहुति दी। उस यज्ञ में शस्त्र ही कुश-स्थान पर बिछाए गए, बिभीतक की समिधाएँ, लाल वस्त्र और लोहे का स्रुव प्रयुक्त हुए। शूल-तोमरों से अग्नि को आस्तीर्ण कर उसने एक जीवित काले बकरे का गला पकड़कर आहुति दी। उस एक ही आहुति से प्रज्वलित, धूमरहित, महाज्वाला वाली अग्नि में वे चिह्न प्रकट हुए जो विजय के सूचक थे; तप्त-स्वर्ण-सी, दक्षिणावर्त-शिखा वाली अग्नि प्रत्यक्ष प्रकट होकर वह हवि स्वयं ग्रहण कर गई। ब्रह्मास्त्र-विशारद इन्द्रजित ने ब्राह्म अस्त्र का आवाहन कर धनुष और रथ को अभिमन्त्रित किया। अस्त्र-आवाहन और अग्नि-तर्पण के समय सूर्य-चन्द्र-ग्रह-नक्षत्र सहित नभस्थल भय से काँप उठा।

एक उप-कथा: इन्द्रजित का यह यज्ञ केवल अनुष्ठान नहीं, उसके युद्ध-कौशल का मूल था। निकुम्भिला नामक स्थान पर इसी होम को पूरा करने पर वह अदृश्य और अजेय हो जाता था। आगे विभीषण इसी रहस्य को खोलकर बताएँगे कि इन्द्रजित को रोकने का एकमात्र उपाय है: होम पूरा होने से पहले उस पर आक्रमण।

अग्नि को तृप्त कर, अग्नि-सा दीप्त, महेन्द्र-तुल्य प्रभाव वाला अचिन्त्य-वीर्य इन्द्रजित धनुष-बाण-तलवार-रथ-घोड़े-सारथि सहित आकाश में स्वयं को अन्तर्धान कर गया। फिर पताका-ध्वज से सजी राक्षस-सेना युद्ध की इच्छा से गरजती निकल पड़ी। उन्होंने तोमर-अंकुश और चित्र-विचित्र तीक्ष्ण बाणों से वानरों पर प्रहार किया। क्रुद्ध रावण-पुत्र ने “हर्षित होकर वानरों को मारने की इच्छा से लड़िए”, ऐसा कहा। तब जय-कांक्षी राक्षस गरजते हुए वानरों पर बाण-वर्षा करने लगे। राक्षसों से छिपा इन्द्रजित नालीक (चौड़े-मुख बाण), नाराच, गदा और मूसलों से वानरों को मारने लगा।

क्रुद्ध, महातेजस्वी, महाबली रावण-पुत्र वानरों के शरीर छेदने लगा; एक-एक बाण से नौ, पाँच और सात वानरों को बेधकर राक्षसों को हर्षित करने लगा। बाणों से पीड़ित, अंग-भग्न, संकल्प-भग्न वानर देवों से मारे महासुरों-से गिरने लगे। तब कुछ वानर आकाश में, कुछ धरती पर रहकर इन्द्रजित की ओर दौड़े, पर वह माया से छिपा रहा। राम के लिए प्राण निछावर कर वानर शिला-आयुध लेकर गरजते रहे और रावण-पुत्र पर वृक्ष-शिखर-शिला बरसाते रहे, पर सदा विजयी इन्द्रजित ने वह प्राणहारी वर्षा बिखेर दी। फिर अग्नि-सरीखे आशीविष-तुल्य बाणों से उसने वानर-सेना को बेधा।

अठारह तीक्ष्ण बाणों से गन्धमादन को, नौ से दूर खड़े नल को बेधा। सात मर्म-विदारी बाणों से मैन्द को, पाँच से गज को बेधा। दस बाणों से जाम्बवान, तीस से नील को, तथा घोर वरदान-प्राप्त बाणों से सुग्रीव, ऋषभ, अंगद और द्विविद को निष्प्राण-सा कर दिया। अन्य प्रमुख वानरों को भी अनेक बाणों से पीड़ित किया। सूर्य-सरीखे शीघ्रगामी बाणों से उसने सेना मथ डाली। प्रसन्न इन्द्रजित ने रक्त में नहाई, व्याकुल वानर-सेना देखी। फिर अपनी सेना से घिरकर, अदृश्य रहते हुए, नील-मेघ-सा वह वानर-सेना पर बाण-जाल बरसाने लगा; इन्द्र-वज्र से टूटे नगेन्द्रों-से वानर विस्वर चीखते गिरने लगे। वे केवल तीक्ष्ण बाण आते देखते थे, पर माया से छिपे उस सुरेन्द्र-शत्रु को नहीं देख पाते थे।

फिर उस महात्मा राक्षसाधिप ने सब दिशाओं को सूर्य-सी आभा वाले तीक्ष्ण बाणों से ढककर वानरेन्द्रों को विदीर्ण किया, और वानर-सेना पर शूल-तलवार-परशु की दीप्त-अग्नि-सी, विस्फुलिंग छोड़ती तीव्र वर्षा की। इन्द्रजित के स्वर्ण-वर्ण बाणों से ताड़ित वानर-मुखिया फूले किंशुक-से दीखने लगे; अन्योन्य से सटते, विस्वर चीखते, बाण-बिंधे वानर गिरने लगे। फिर माया-छिपे सुरेन्द्र-शत्रु ने हनुमान, सुग्रीव, अंगद, गन्धमादन, जाम्बवान, सुषेण, वेगदर्शी, मैन्द, द्विविद, नील, गवाक्ष, गवय, केसरी, हरिलोमा, विद्युद्दंष्ट्र, सूर्यानन, ज्योतिर्मुख, दधिमुख, पावकाक्ष, नल और कुमुद, इन सब प्रसिद्ध वानर-शार्दूलों को प्रास-शूल-तीक्ष्ण मन्त्रित बाणों से बेधा। स्वर्ण-वर्ण बाण-गदाओं से वानर-मुखियाओं को बींधकर उसने सूर्य-किरण-सी बाण-वर्षा से राम-लक्ष्मण को भी ढक दिया।

वर्षा-धाराओं-सी उन बाण-वृष्टियों की चिन्ता न करते हुए, परम अद्भुत श्री से दीप्त श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा, “हे लक्ष्मण, यह राक्षसेन्द्र, सुरेन्द्र-शत्रु, ब्रह्मास्त्र का आश्रय लेकर हमारी सेना गिराकर अब तीक्ष्ण बाणों से हमें पीड़ित कर रहा है। स्वयम्भू ब्रह्मा से वर-प्राप्त यह महात्मा अदृश्य भीमकाय इन्द्रजित, जिसका शरीर नहीं दीखता और जो अस्त्र-उद्यत है, आज रण में कैसे मारा जा सकता है? मैं जानता हूँ कि स्वयम्भू भगवान ब्रह्मा अचिन्त्य हैं और यह अस्त्र उन्हीं का है। अतः हे बुद्धिमान, अव्यग्र मन से आप मेरे साथ आज यह बाण-वर्षा सहिए। यह राक्षसेन्द्र सब दिशाओं को बाण-जाल से ढक रहा है, और अग्र-वीर गिरने से वानरराज की सेना अब शोभा नहीं पाती। हमें मूर्च्छित, हर्ष-रोष-रहित, युद्ध-विरत गिरा देखकर यह रणाग्र-लक्ष्मी पाकर निश्चय ही लंका लौट जाएगा।”

नागपाश से बंधे राम और लक्ष्मण रणभूमि में अचेत पड़े हैं, चमकते बंधन गिरे वानरों को भी जकड़े हैं।

तब वे दोनों राजकुमार इन्द्रजित के अस्त्र-जालों से वहीं घायल हो गए, और उन्हें इस संग्राम में पीड़ित कर राक्षसेन्द्र हर्ष से गरज उठा। इस प्रकार वानर-सेना और राम-लक्ष्मण को रण में प्रणत कर इन्द्रजित सहसा दशग्रीव की भुजाओं से सुरक्षित नगरी में लौट गया, और राक्षसों से प्रशंसित होता हुआ, हर्षित होकर उसने पिता से सब कुछ विस्तार से कह सुनाया।

सार: इन्द्रजित का माया-युद्ध इस अंक का केन्द्रबिन्दु है: वह अदृश्य रहकर ब्रह्मास्त्र से पूरी वानर-सेना और स्वयं राम-लक्ष्मण को भी बाँध देता है। श्रीराम का लक्ष्मण को ब्रह्मास्त्र के प्रति सहनशीलता का उपदेश दिखाता है कि वाल्मीकि के नायक दिव्य अस्त्र का प्रतिरोध नहीं, सम्मान करते हैं।

जाम्बवान का निर्देश और हनुमान का संजीवनी-पर्वत लाना

रणाग्र में आहत उन दोनों राजकुमारों को देखकर वानर-यूथपतियों की सेना मोह में पड़ गई; सुग्रीव, नील, अंगद और जाम्बवान कुछ न कर सके। सबको विषण्ण देख बुद्धिमानों में श्रेष्ठ विभीषण ने अनुपम वचनों से सुग्रीव के वीरों को आश्वस्त करते हुए कहा, “मत डरो, यहाँ विषाद का समय नहीं। ये दशरथ-पुत्र इसलिए असहाय और पीड़ित हैं क्योंकि उन्होंने स्वयम्भू के उस अस्त्र का सम्मान किया जिससे इन्द्रजित ने इन्हें अभिभूत किया। यह अमोघ-वीर्य परम ब्रह्मास्त्र स्वयं स्वयम्भू ने इन्द्रजित को दिया है, और दोनों राजकुमार उसका मान रखकर रण में गिरे हैं; इसमें विषाद किस बात का?”

ब्रह्मास्त्र का मान कर बुद्धिमान मारुति (हनुमान) ने कहा, “इस अस्त्र-हत वानर-सेना में जो-जो प्राण धारण किए हो, उन्हें हम दोनों आश्वस्त करें।” तब हनुमान और विभीषण उल्का (मशाल) हाथ में लिए रात्रि में रणभूमि में घूमने लगे। उन्होंने धरती को पर्वत-सरीखे गिरे वानरों से ढकी देखी, जिनकी पूँछ-हाथ-जाँघ-पैर-अँगुली-गर्दन कटी थीं और जो रक्त बहा रहे थे। उन्होंने सुग्रीव, अंगद, नील, शरभ, गन्धमादन, जाम्बवान, सुषेण, वेगदर्शी, मैन्द, नल, ज्योतिर्मुख और द्विविद को रण में आहत देखा। दिन के पाँचवें-अन्तिम पहर (सायाह्न) तक स्वयम्भू के प्रिय अस्त्र से सड़सठ करोड़ बलवान वानर गिरा दिए गए थे।

समझने की कुंजी, दिन के पाँच पहर: वाल्मीकि-काल में दिन के बारह घण्टे पाँच भागों में बँटे थे, प्रत्येक छह घटिका (लगभग दो घण्टे चौबीस मिनट) का: प्रातः, संगव (पूर्वाह्न), मध्याह्न, अपराह्न और सायाह्न (संध्या)। “पाँचवें-अन्तिम पहर” का अर्थ है संध्या के समय, अर्थात पूरे दिन का युद्ध इन्द्रजित के एक ही माया-आक्रमण में समाप्त हो गया।

बाणों से बिंधे वृद्ध जांबवान भूमि पर लेटे हैं, मशाल लिए एक वानर और एक राजकुमार चिंतित झुके हैं।

समुद्र-सी आहत सेना देखकर हनुमान विभीषण-सहित जाम्बवान को खोजने लगे। स्वभाव-जरा से युक्त, वृद्ध, सैकड़ों बाणों से बिंधे, बुझती अग्नि-से प्रजापति-पुत्र वीर जाम्बवान के पास जाकर विभीषण ने कहा, “हे आर्य, आशा है इन्द्रजित के तीक्ष्ण बाणों ने आपके प्राण नहीं हरे।” जाम्बवान कठिनाई से बोले, “हे महावीर्य नैऋतेन्द्र, मैं स्वर से ही आपको पहचानता हूँ; तीक्ष्ण बाणों से बिंधे होने के कारण नेत्रों से नहीं देखता। क्या वानरश्रेष्ठ हनुमान, जिनके कारण अंजना और वायुदेव सुप्रजा-पिता कहलाते हैं, कहीं जीवित हैं, हे सुव्रत?”

विभीषण ने कहा, “आप राजकुमारों को छोड़कर केवल हनुमान का समाचार क्यों पूछते हैं? जैसा स्नेह आपने वायु-सुत के लिए दिखाया, वैसा न राजा सुग्रीव के लिए, न अंगद के लिए, न राघव के लिए।” जाम्बवान बोले, “सुनिए, हे नैऋत-शार्दूल, मैं केवल हनुमान का समाचार क्यों पूछता हूँ: यदि यह वीर हनुमान जीवित है, तो मारी गई सेना भी अमारी-सी है; और यदि हनुमान ने प्राण त्याग दिए, तो हम जीवित होकर भी मृत हैं। यदि वायु-तुल्य, वैश्वानर-तुल्य वीर्य वाले मारुति जीवित हैं, तो हमारे जीवन की आशा है।”

तब वृद्ध के पास जाकर विनयपूर्वक हनुमान ने उनके चरण छूकर अभिवादन किया। हनुमान का वचन सुनकर ऋक्ष-श्रेष्ठ जाम्बवान, यद्यपि घावों की पीड़ा से इन्द्रियाँ व्यथित थीं, स्वयं को नवजात-सा मानने लगे। महातेजस्वी जाम्बवान ने कहा, “आइए, हे हरि-शार्दूल! आप ही वानरों की रक्षा कर सकते हैं। पराक्रम में आपसे बढ़कर कोई नहीं, आप इनके परम सखा हैं। यह आपके पराक्रम का समय है; और कोई नहीं दीखता। ऋक्ष-वानर-वीरों की सेना को हर्षित कीजिए, और इन आहत राम-लक्ष्मण को निःशल्य कीजिए।”

समुद्रतट पर जांबवान संजीवनी हेतु हनुमान को दूर चमकते औषधि-पर्वत की ओर संकेत करते हैं, लक्ष्मण अचेत पड़े हैं।

“हे हनुमान, समुद्र के ऊपर परम लम्बा मार्ग तय कर आप नगश्रेष्ठ हिमालय जाइए। वहाँ से आप स्वर्ण-सरीखे अति-उच्च ऋषभ नामक पर्वत और कैलास-शिखर देख सकेंगे, हे शत्रुसूदन! उन दोनों शिखरों के बीच, हे वीर, अतुल-प्रभ, समस्त औषधियों से युक्त, दीप्त ओषधि-पर्वत देखेंगे। उस पर्वत की चोटी पर चार दीप्त ओषधियाँ: मृतसंजीवनी (मरे को जिलाने वाली), विशल्यकरणी (शस्त्र-शल्य निकालकर घाव भरने वाली), सुवर्णकरणी (शरीर का वर्ण लौटाने वाली) और महौषधि संधानी (कटे अंग-अस्थि जोड़ने वाली), दसों दिशाओं को आलोकित करती दीखेंगी। हे गन्धवह-आत्मज, उन सबको लेकर शीघ्र लौट आइए और प्राणों से जोड़कर वानरों को आश्वस्त कीजिए।”

जाम्बवान का वचन सुनकर हनुमान वायु-वेग से बल-उत्साह से भर उठे, मानो वायु-वेग से समुद्र। त्रिकूट-शिखर पर खड़े होकर, उस पर्वत-श्रेष्ठ को पैरों से दबाते हनुमान दूसरे पर्वत-से दीखने लगे। हनुमान के चरणों से दबकर वह पर्वत धँस गया; अत्यन्त पीड़ित होकर वह अपना भार न सँभाल सका। पर्वत पर खड़े वृक्ष गिरे, कुछ हनुमान के वेग से जल उठे और शिखर चूर हो गए। लंका के मुख्य द्वार हिल उठे, घर-गोपुर टूट गए, और त्रास से आकुल लंका रात्रि में नाचती-सी प्रतीत हुई। हनुमान ने समुद्र सहित पृथ्वी को क्षुब्ध कर डाला; उनका महानाद सुनकर लंका के राक्षस-व्याघ्र भी हिल न सके।

विशाल हनुमान एक हाथ में वृक्ष और दूसरे में शिला थामे गरजते हुए आकाश में उड़ान भरते हैं।

फिर हनुमान त्रिकूट से मलय-पर्वत पर कूद पड़े, जो मेरु-मन्दर-सा, अनेक झरनों-वृक्ष-लताओं से युक्त, विकसित कमल-उत्पलों वाला, देव-गन्धर्वों से सेवित, साठ योजन ऊँचा और विद्याधर-अप्सरा-मुनिगणों से सेवित था। मलय को पैरों से पूरी तरह दबाकर, बड़वा-मुख-सी अग्नि-सरीखे मुख को खोलकर हनुमान ने रात्रिचरों को त्रास देने को घोर गर्जना की। समुद्र को नमस्कार कर, भीम-पराक्रमी मारुति ने राघव के लिए परम कार्य का संकल्प कर लिया। सर्प-सी पूँछ उठाकर, पीठ झुकाकर, कान सिकोड़कर, बड़वा-मुख-सी अग्नि-तुल्य मुख खोलकर वे प्रचण्ड-वेग से आकाश में कूद पड़े। उनके बाहु-ऊरु के वेग से उखड़े वृक्ष-शिला और साधारण वानर वेग क्षीण होने पर जल में गिर पड़े।

सर्प-कुण्डली-सी भुजाएँ फैलाकर, गरुड़-तुल्य वीर्य वाले हनुमान दिशाओं को खींचते-से नगराज हिमालय की ओर चले। पर्वत-पक्षी-सरोवर-नदी-तालाब-नगर देखते, पिता-तुल्य वेग से वे आगे बढ़े। आदित्य-मार्ग का आश्रय ले श्रमरहित हनुमान वायु-वेग से दिशाओं को शब्दायमान करते बढ़ते रहे, और सहसा हिमालय दीख पड़ा: श्वेत-मेघ-राशि-से सुन्दर शिखरों और नाना वृक्षों से शोभित। उन्होंने उस महानगेन्द्र पर ब्रह्मकोश, रजताभ (ब्रह्मा का एक रूप), इन्द्रालय, रुद्र-शर-मोक्ष-स्थान, हयग्रीव-आलय, दीप्त ब्रह्मास्त्र-आलय, यम के किंकर, अग्नि-आलय, सूर्य-प्रभ कुबेर-आलय, सूर्य-निबन्धन-स्थल, ब्रह्मा-आलय, शंकर-कार्मुक और पृथ्वी की नाभि, ये दिव्य स्थान देखे। उसी पर्वत-राज पर, समस्त ओषधियों से दीप्त, अग्नि-राशि-सा प्रदीप्त ओषधि-शिखर भी देखा।

हिमालय की चोटियों के बीच हनुमान औषधियों की खोज में पर्वत पर झुके हैं, देवगण बादलों से देखते हैं।

उस अग्नि-राशि-सी दीप्त पर्वत को देख वासव-दूत-सुत हनुमान विस्मित हुए, और उस ओषधि-पर्वतेन्द्र पर कूदकर ओषधियों की खोज करने लगे। सहस्रों योजन पार कर पहुँचे महाकपि मारुति उस दिव्य-ओषधि-धारी शैल पर विचरने लगे। पर एक खोजी को आता जान सब महौषधियाँ अदृश्य हो गईं। उन्हें पहचान न पाने पर महात्मा हनुमान क्रोध से गरज उठे और अग्नि-सी आँखों से उस महीधर से बोले, “हे नगेन्द्र, आपने राघव पर भी अनुकम्पा न की, यह आपकी कठोरता निन्दनीय है। मेरी भुजबल से अभिभूत होकर आप अभी अपने को बिखरा हुआ देखिए!”

फिर हनुमान ने उस पर्वत का वृक्ष-हाथी-स्वर्ण-सहस्रधातु-युक्त शिखर वेग से उखाड़ लिया, जिससे उसके कूट चूर हो गए और चोटी जल उठी। यह देख वानर गरज उठे, हनुमान भी हर्ष से गरजे, और उनका कोलाहल सुनकर लंकावासी और भी भयंकर चीख उठे। लोकों को, सुर-असुरेन्द्रों सहित, त्रास देकर हनुमान उस शिखर को उखाड़कर आकाश में उछले और गरुड़-सी उग्र गति से, अनेक खेचरों से प्रशंसित होते उड़ चले। सूर्य-सरीखे दीप्त शिखर को लिए, आदित्य-मार्ग पर पहुँचे हनुमान सूर्य-बिम्ब के पास उसकी ही प्रतिमा-से दीखने लगे; सहस्रधार-दीप्त चक्र लिए विष्णु-से शोभित हुए।

हनुमान चमकती औषधियों वाला पर्वत उठाए खड़े हैं, उसकी आभा से लक्ष्मण और गिरे वानर पुनः जी उठते हैं।

फिर महात्मा हनुमान वानर-सेना के बीच त्रिकूट पर उतरे और वानर-श्रेष्ठों को सिर झुकाकर अभिवादन कर वहीं खड़े विभीषण से लिपट गए। उन महौषधियों की गन्ध सूँघते ही दोनों राजपुत्र वहीं निःशल्य हो गए, और रण में मूर्च्छित अन्य वानर-प्रवीर भी उठ खड़े हुए। जो वानर-प्रवीर मारे गए थे, वे भी उन श्रेष्ठ ओषधियों की गन्ध से क्षण भर में निःशल्य और निःशोक हो गए, मानो रात्रि-अन्त में सोए जन जाग उठे हों। (जब से लंका में वानर-राक्षस लड़ रहे थे, रावण के आदेश से मान-रक्षा हेतु मारे गए राक्षस तुरन्त समुद्र में फेंक दिए जाते थे, ताकि वानरों को उनकी संख्या ज्ञात न हो।) फिर उग्र-वेग हनुमान उस ओषधि-शैल को वेग से हिमालय लौटा आए और श्रीराम से पुनः जा मिले।

समझने की कुंजी, चार दिव्य ओषधियाँ: मृतसंजीवनी मृत को जिलाती है; विशल्यकरणी शरीर में धँसे शस्त्र निकालकर घाव भरती है; सुवर्णकरणी शरीर का खोया वर्ण-कान्ति लौटाती है; और संधानी कटे अंग-अस्थि जोड़ती है। हनुमान का पूरा पर्वत उठा लाना, क्योंकि ओषधियाँ छिप गई थीं, वाल्मीकि के अद्भुत-रस का चरम है, और रामायण की परम प्रसिद्ध छवियों में एक।

सार: इन्द्रजित के माया-अस्त्र से उपजे संकट का समाधान हनुमान के अद्वितीय पराक्रम से होता है। वाल्मीकि में हनुमान औषधि-पर्वत दो बार लाते हैं: यहाँ जाम्बवान के कहने पर, और आगे सर्ग 101 में सुषेण के कहने पर, जब रावण की शक्ति से लक्ष्मण गिरते हैं।

वानरों का लंका-दहन और घोर रात्रि-युद्ध

तब महातेजस्वी वानरेश्वर सुग्रीव ने अगला कर्तव्य बताते हुए हनुमान से कहा, “जब से कुम्भकर्ण मारा गया और कुमार नष्ट हुए, रावण अब कोई बचाव नहीं कर सकता। अतः जो-जो महाबली और फुर्तीले वानर हैं, वे उल्काएँ (मशालें) लेकर शीघ्र लंका पर चढ़ जाएँ।” रौद्र संध्या के उस निशामुख में सूर्यास्त के बाद वानर-श्रेष्ठ उल्का लिए लंका की ओर चल पड़े। उल्का-हस्त वानरों से सब ओर से घिरे, द्वारों पर तैनात विरूपाक्ष आदि रक्षक सहसा भाग खड़े हुए। रक्षकों के भागते ही हर्षित वानरों ने गोपुर-अट्टालिका-गलियों, विविध मार्गों और प्रासादों में आग लगा दी। अग्नि ने उनके सहस्रों घर भस्म कर दिए; पर्वत-सरीखे प्रासाद धरती पर गिरने लगे।

वहाँ अगुरु, उत्तम चन्दन, मोती, चिकने मणि, वज्र और प्रवाल जलने लगे। क्षौम (अलसी का कपड़ा), सुन्दर कौशेय (रेशम), विविध आविक-और्ण (ऊनी) वस्त्र, स्वर्ण-पात्र और आयुध भी जल उठे। घोड़ों के विचित्र साज, हाथियों की कक्षाएँ-ग्रैवेयक, रथों के संस्कृत साज, योद्धाओं के कवच, हाथी-घोड़ों के वर्म, खड्ग-धनुष-ज्या-बाण-तोमर-अंकुश-शक्ति, रोम-वाल के चर्म, व्याघ्र-चर्म, अण्डज (कस्तूरी), मुक्ता-मणि-जड़े प्रासाद और नाना अस्त्र-संघात, सब अग्नि ने भस्म किए, और बार-बार प्रज्वलित हुई।

घर-प्रिय, स्वर्ण-कवचधारी, माला-आभूषण-वस्त्रधारी राक्षसों के, जो सीधु (मद्य) पीकर आँखें घुमाते, मद से डगमगाते, प्रियाओं के हाथ का सहारा लिए, शत्रु पर क्रुद्ध, गदा-शूल-असि हाथ में लिए, खाते-पीते, या प्रियाओं के साथ बहुमूल्य शय्याओं पर सोए, या त्रस्त होकर पुत्रों को लेकर भागते, लाखों घर अग्नि ने जला दिए। बहुमूल्य, गम्भीर-गुण वाले, स्वर्ण-चन्द्र-अर्धचन्द्राकार, चन्द्रशालाओं से ऊँचे, चित्र-गवाक्ष-आसन-शय्या वाले, मणि-प्रवाल-चित्रित, सूर्य को छूते-से, क्रौंच-मयूर-वीणा-आभूषण-ध्वनि से शब्दायमान, पर्वत-सरीखे घर अग्नि ने भस्म किए। ज्वाला-वेष्टित तोरण ग्रीष्म-अन्त के विद्युत-घिरे मेघ-से चमके; अग्नि-वेष्टित घर दावाग्नि-दीप्त महागिरि-शिखर-से शोभित हुए। सात-मंजिले विमानों में सोई सुन्दरियाँ जलते हुए आभूषण-संयोग त्यागकर “हा! हाय!” कह ऊँचे स्वर से चीखने लगीं; अग्नि-वेष्टित भवन वज्र-हत पर्वत-शिखर-से गिर पड़े। दूर से जलते वे हिमालय-शिखर-से दीखे, और रात्रि में फूले किंशुकों से सजी-सी लंका दीखी; पीलवानों द्वारा छोड़े हाथियों और छूटे घोड़ों से लंका प्रलयकाल के भ्रान्त-ग्राह-समुद्र-सी हो गई।

मशालें थामे वानर लंका के द्वार और महलों में आग लगाते हैं, स्त्रियाँ, हाथी और घोड़े व्याकुल भागते हैं।

कहीं छूटा घोड़ा देख हाथी भयभीत होकर हट जाता, कहीं भयभीत हाथी देख घोड़ा त्रस्त होकर लौट जाता। लंका के जलने पर समुद्र भी, अर्ध-जले घरों के प्रतिबिम्ब से जल लाल होकर, लोहित-जल-सा शोभित हुआ। मुहूर्त भर में वानरों से जलाई वह नगरी इस लोक के घोर प्रलय में जलती धरती-सी हो गई। धूम-व्याप्त, ऊँचे चीखती, अग्नि-तप्त नारियों का कोलाहल सौ योजन तक सुना गया।

फिर से सचेत हुए राम अपना महाधनुष उठाकर क्रुद्ध शिव की तरह टंकार करते हैं, और राक्षस भयभीत हो उठते हैं

तब प्रदग्ध-शरीर बाहर निकले राक्षसों पर युद्ध-इच्छुक वानर सहसा टूट पड़े। वानरों के जयघोष और राक्षसों के विलाप ने दिशाओं, समुद्र और पृथ्वी को गुँजा दिया। निःशल्य महात्मा राम-लक्ष्मण ने अविचलित होकर अपने श्रेष्ठ धनुष उठाए। राम ने उत्तम धनुष टंकारा तो राक्षसों को भयभीत करने वाला तुमुल शब्द उठा; महाधनुष खींचते राम संहारकाल में वेदमय धनुष चढ़ाते क्रुद्ध शिव-से शोभित हुए। वानरों के जयघोष, राक्षसों के निःस्वन, और राम की ज्या-ध्वनि, तीनों दसों दिशाओं में व्याप्त हो गए। राम के धनुष से छूटे बाणों से लंका का कैलास-शिखर-सा मुख्य गोपुर भूमि पर बिखर गया। विमानों-घरों पर राम-बाण गिरते देख राक्षसेन्द्रों का संनाह (युद्ध-उद्यम) तुमुल हो उठा; सिंहनाद करते राक्षसों के लिए वह रात्रि रुद्र-प्रेरित प्रलय-रात्रि-सी हो गई।

महात्मा सुग्रीव ने वानरेन्द्रों को आदेश दिया, “निकट द्वार पर पहुँचकर युद्ध कीजिए, हे वानरो! रणक्षेत्र में उपस्थित रहकर भी जो बिना लड़े भाग निकले, उस राज-शासन-दूषक को पकड़कर मार डालिए।” जब दीप्त-उल्का-हस्त वानर-मुख्य द्वार पर डट गए, तो रावण को क्रोध ने घेर लिया। उसके जँभाई-क्षेप से दसों दिशाएँ व्यामिश्र हो गईं और वह रुद्र के मूर्तिमान क्रोध-सा दीखा। क्रुद्ध रावण ने कुम्भकर्ण-पुत्र कुम्भ-निकुम्भ को अनेक राक्षसों सहित भेजा; यूपाक्ष, शोणिताक्ष, प्रजंघ और कम्पन भी रावण-आदेश से उन दोनों के साथ निकले। सिंह-सा गरजकर रावण ने आदेश दिया, “राक्षसो, आज ही जाइए।”

राक्षस दीप्त आयुध लिए बार-बार गरजते लंका से निकले। राक्षसों ने आभूषण-स्थित और अपनी आभा से आकाश को प्रभामय कर दिया, वानरों ने उल्काओं से। चन्द्र-तारों की आभा और दोनों सेनाओं के आभूषण-तेज ने आकाश को आलोकित किया; अर्ध-जले घरों के प्रतिबिम्ब से समुद्र और भी शोभित हुआ। पताका-ध्वज-तलवार-परशु-हाथी-घोड़े-रथ-पदाति से युक्त, दीप्त शूल-गदा-खड्ग-प्रास-तोमर-धनुष से सुसज्जित वह भयंकर, घोर-पराक्रमी राक्षस-सेना दीखी। उसे आता देख वानर-सेना उससे टकराने आगे बढ़ी और उच्च-स्वर से चीखी; पतंगे आग की ओर वैसे दौड़ते हैं वैसे राक्षस-सेना शत्रु-सेना पर टूट पड़ी।

उन्मत्त-से वानर वृक्ष-शिला-मुष्टि से राक्षसों को मारते आगे झपटे, राक्षस तीक्ष्ण बाणों से वानरों के सिर काटते रहे; वानरों के दाँतों से कान कटे, मुष्टि से कपाल फटे, शिला-प्रहार से अंग-भग्न राक्षस लंका की गलियों में घूमते रहे। “मुझसे लड़िए”, एक कहता; “मैं इससे लड़ता हूँ, ठहरिए, व्यर्थ क्यों कष्ट उठाते हैं”, दूसरा कहता। दोनों सेनाओं के योद्धा गलियों में परस्पर यह कहते रहे। शस्त्र-छल, कवच-भेद, उद्यत प्रास, मुष्टि-शूल-असि-कुन्त से वह महारौद्र युद्ध छिड़ गया। राक्षसों ने दस-से-सात वानरों को, वानरों ने दस-से-सात राक्षसों को एक साथ मारा। कवच-ध्वज छोड़कर भागती राक्षस-सेना को वानरों ने सब ओर से घेर लिया।

सार: संजीवनी से उठे वानर अब आक्रामक हो उठते हैं और लंका को आग के हवाले कर देते हैं। वाल्मीकि का यह दहन-वर्णन वैभव और विनाश का तीव्र विरोधाभास रचता है: स्वर्ण-मणि-रेशम से भरी नगरी क्षण भर में प्रलय-सी जल उठती है। रावण कुम्भकर्ण के पुत्रों कुम्भ-निकुम्भ को अन्तिम रक्षा-पंक्ति के रूप में भेजता है।

कम्पन, प्रजंघ, शोणिताक्ष, यूपाक्ष और कुम्भ का वध

उस घोर, संकुल, वीर-क्षयकारी युद्ध में रण-उत्सुक अंगद वीर कम्पन से जा भिड़ा। कम्पन ने अंगद को ललकारकर वेग से गदा का प्रहार किया, जिससे अंगद डगमगा उठा। होश में आकर तेजस्वी अंगद ने गिरि-शिखर फेंका, जिससे आहत कम्पन भूमि पर मरकर गिर पड़ा। कम्पन को मरा देख शोणिताक्ष वीरों-सा निर्भय होकर रथ से अंगद की ओर दौड़ा और काल-अग्नि-सी, शरीर-विदारी तीक्ष्ण बाणों से उसे बेधा। क्षुर, क्षुरप्र, नाराच, वत्सदन्त, शिलीमुख, कर्णि, शल्य और विपाठ, इन अनेक तीक्ष्ण बाणों से अंग-बिंधा बलवान अंगद उसके धनुष, रथ और बाणों को बल से मसल गया।

एक उप-कथा: वाल्मीकि बाणों के नाम उनकी फलक-आकृति से रखते हैं: क्षुर का सिर उस्तरे-सा, क्षुरप्र का अर्धचन्द्र-सा, नाराच पूरा लोहे का, वत्सदन्त का सिर बछड़े के दाँत-सा, शिलीमुख का बाज के पंख-सा, कर्णि के दोनों ओर कान-सी उभार, शल्य का सिर लम्बा, और विपाठ का सिर करवीर-पत्र-सा। यह सूक्ष्म वर्गीकरण दिखाता है कि प्राचीन युद्ध में बाण कितने विविध और विशिष्ट थे।

शोणिताक्ष ने तुरन्त असि-चर्म उठाए और क्रुद्ध होकर रथ से कूदा। और भी फुर्ती से उछलकर अंगद ने उसका खड्ग छीनकर गर्जना की, फिर उसी खड्ग से उसके कन्धे-फलक पर यज्ञोपवीत-सा तिरछा प्रहार किया। उस महाखड्ग को सँभालकर बार-बार गरजता अंगद रण में अन्य शत्रुओं की ओर दौड़ा। तब बलवान यूपाक्ष प्रजंघ-सहित क्रुद्ध होकर रथ से अंगद की ओर बढ़ा, और प्रजंघ गदा लेकर। शोणिताक्ष और प्रजंघ के बीच अंगद विशाखा-नक्षत्रों के बीच पूर्ण-चन्द्र-सा शोभित हुआ। मैन्द और द्विविद उसकी रक्षा करते उसके पास खड़े हो गए। तीन वानरेन्द्रों और तीन राक्षस-श्रेष्ठों का रोमहर्षण युद्ध छिड़ गया।

वानरों ने वृक्ष फेंके, प्रजंघ ने खड्ग से काट दिए; रथ-घोड़े-वृक्ष-शिला फेंके, यूपाक्ष ने बाणों से काट दिए। द्विविद-मैन्द के उखाड़कर फेंके वृक्षों को शोणिताक्ष ने गदा से बीच में तोड़ डाला। फिर परम-मर्म-विदारी विशाल खड्ग उठाकर वेगवान प्रजंघ अंगद पर झपटा। पास आते प्रजंघ को देख अति-बलवान अंगद ने अश्वकर्ण वृक्ष से प्रहार किया, और मुष्टि से उसकी खड्ग-धारी भुजा पर वार किया जिससे खड्ग गिर पड़ा। अपना मूसल-सरीखा खड्ग गिरा देख प्रजंघ ने वज्र-कठोर मुष्टि बाँधकर अंगद के ललाट पर प्रहार किया, जिससे अंगद मुहूर्त भर डगमगाया। फिर होश में आकर अंगद ने मुष्टि से प्रजंघ का सिर धड़ से गिरा दिया।

चाचा प्रजंघ को मरा देख, बाण चुक जाने पर अश्रु-पूर्ण नेत्रों वाला यूपाक्ष रथ से उतरकर खड्ग ले आया। उसे आता देख बलवान द्विविद ने उसकी छाती पर प्रहार कर बल से पकड़ लिया। भाई को पकड़ा देख शोणिताक्ष ने गदा से द्विविद की छाती पर मारा; द्विविद डगमगाया, पर उसने शोणिताक्ष की उद्यत गदा छीन ली। इसी बीच मैन्द आया और हथेली से यूपाक्ष की छाती पर प्रहार किया। शोणिताक्ष और यूपाक्ष वानरों के साथ तीव्र आकर्षण-उत्पाटन का युद्ध करने लगे। द्विविद ने शोणिताक्ष का मुख नखों से चीर, बल से धरती पर पटककर कुचल डाला। क्रुद्ध मैन्द ने बाहुओं से यूपाक्ष को दबाया, जिससे वह मरकर गिर पड़ा।

कुम्भकर्ण का पुत्र कुम्भ दूसरे इन्द्रधनुष-से दमकते धनुष से बाणों की झड़ी लगाता है, और वानर-सेना तितर-बितर हो जाती है

प्रवीर-वध से व्यथित राक्षस-सेना उस ओर मुड़ी जहाँ कुम्भ (कुम्भकर्ण-पुत्र) लड़ रहा था। वेग से आती सेना को कुम्भ ने सान्त्वना दी। प्रवीर मारे जाने पर महावीर्य वानरों से दबी सेना देख तेजस्वी कुम्भ ने रण में अति-दुष्कर कर्म किया। धनुर्धरों में श्रेष्ठ कुम्भ ने सुसमाहित होकर आशीविष-सरीखे, शरीर-विदारी बाण छोड़े; ऐरावत-विद्युत-सी आभा वाला उसका धनुष दूसरे इन्द्रधनुष-सा चमका। आकर्ण खींचे स्वर्ण-पुंख बाण से उसने द्विविद को बेधा; पद-विप्रमुक्त द्विविद त्रिकूट-सा डगमगाकर पैर फैलाए गिर पड़ा।

भाई को गिरा देख मैन्द विशाल शिला लेकर कुम्भ पर झपटा। कुम्भ ने पाँच बाणों से शिला तोड़ डाली, फिर सुन्दर-मुख आशीविष-सरीखे बाण से द्विविद के अग्रज मैन्द की छाती पर मर्म में प्रहार किया, जिससे मैन्द मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। दोनों मामाओं को आहत देख अंगद उद्यत-धनुष कुम्भ पर वेग से झपटा। आते अंगद को कुम्भ ने पाँच लोहमय और तीन तीक्ष्ण बाणों से, अंकुश-सी पीड़ा देते हुए, अनेक बाणों से बेधा। स्वर्ण-भूषित तीक्ष्ण बाणों से अंग-बिंधा अंगद विचलित न हुआ। उसने शिला-वृक्ष की वर्षा कुम्भ के सिर पर की, पर श्रीमान कुम्भ ने सब काट डाले, और दो बाणों से अंगद की दोनों भौंहें वैसे बेध दीं जैसे उल्काओं से हाथी; रक्त बहने से अंगद की आँखें ढक गईं।

एक हाथ से रक्त-रंजित नेत्र ढककर अंगद ने पास खड़े साल-वृक्ष को दूसरे हाथ से पकड़ा, छाती से सटाकर, टहनियाँ मोड़कर उसे उखाड़ लिया, और इन्द्र-ध्वज-सा, मन्दर-सरीखा वह वृक्ष सब राक्षसों के देखते कुम्भ पर वेग से फेंका। कुम्भ ने उसे सात शरीर-भेदी तीक्ष्ण बाणों से काट दिया; अंगद व्यथित होकर मूर्च्छित गिर पड़ा। समुद्र में डूबते-से अंगद को गिरा देख वानरों ने राघव को बताया। आहत अंगद का समाचार सुन श्रीराम ने जाम्बवान आदि वानर-श्रेष्ठों को सहायता को भेजा।

राम का आदेश सुन वानर-शार्दूल क्रुद्ध होकर उद्यत-धनुष कुम्भ की ओर दौड़े। वृक्ष-शिला हाथ में लिए, क्रोध से नेत्र लाल किए, अंगद की रक्षा को वानर-श्रेष्ठ झपटे। जाम्बवान, सुषेण और वेगदर्शी एक साथ वीर कुम्भ पर टूट पड़े। उन्हें आता देख कुम्भ ने बाण-समूह से वैसे रोका जैसे पर्वत जलाशय को रोकता है। उसके बाण-मार्ग में पहुँचकर महात्मा वानरेन्द्र उसकी ओर देख तक न सके, बढ़ना तो दूर, मानो समुद्र अपनी मर्यादा न लाँघे।

बाण-वृष्टि से पीड़ित वानरों को देख, अंगद को पीछे कर वानरेश्वर सुग्रीव वेगवान सिंह-सा कुम्भकर्ण-पुत्र पर झपटा। अश्वकर्ण आदि अनेक वृक्ष उखाड़कर महाकपि ने फेंके, पर श्रीमान कुम्भ ने तीक्ष्ण बाणों से वह आकाश ढकती वृक्ष-वर्षा काट डाली। तीक्ष्ण बाणों से बिंधे वे वृक्ष घोर शतघ्नियों-से चमके। बाणों से बिंधते हुए भी महासत्त्व सुग्रीव विचलित न हुआ; बाण सहते हुए उसने इन्द्रधनुष-प्रभ कुम्भ का धनुष छीनकर तोड़ डाला। अति-दुष्कर कर्म कर रथ से कूदकर सुग्रीव कुपित होकर भग्न-दन्त हाथी-से कुम्भ से बोला:

“हे निकुम्भ के अग्रज! आपका वीर्य, बाण-वेग, विनय और प्रभाव अद्भुत है: आप प्रह्लाद, बलि, वृत्र-हन्ता इन्द्र, कुबेर और वरुण के तुल्य हैं! आप अकेले अपने अति-बलवान पिता कुम्भकर्ण के अनुरूप हुए हैं। शूल-हस्त, अरिन्दम, महाबाहु आपको देव वैसे ही नहीं लाँघ सकते जैसे जितेन्द्रिय को मानसिक व्यथाएँ। हे महाबुद्धि, अब अपना पराक्रम दिखाइए और मेरे कर्म देखिए। वर-दान से आपके चाचा रावण देव-दानवों को सह सकते हैं, वीर्य से आपके पिता कुम्भकर्ण सुर-असुरों को सहते थे; आपमें दोनों हैं, इसमें आप चाचा-पिता से बढ़कर हैं। धनुष में आप इन्द्रजित-तुल्य, प्रताप में रावण-तुल्य हैं; आज आप बल-वीर्य में राक्षस-लोक में श्रेष्ठ हैं।”

“प्राणी आज मेरे साथ आपका अद्भुत महायुद्ध वैसे ही देखें जैसे इन्द्र-शम्बर का। आपने अनुपम कर्म किया, अस्त्र-कौशल दिखाया, और भीम-पराक्रमी वानर-वीर गिराए। हे वीर, मैंने आपको केवल इसलिए नहीं मारा कि निन्दा का भय था, क्योंकि आप कर्म से थके खड़े हैं। अब विश्राम पाकर मेरा बल देखिए।” सुग्रीव के इस अवमान-मिश्रित प्रशंसा से सम्मानित कुम्भ का तेज घी-सिक्त अग्नि-सा बढ़ गया। तब कुम्भ ने सुग्रीव को बाहुओं में पकड़ लिया; मद-रहित दो हाथियों-से वे बार-बार साँस भरते, एक-दूसरे से सटे, श्रम से धूम-मिश्रित ज्वाला मुख से छोड़ते रहे। उनके पाद-प्रहार से धरती धँस गई और लहरें उछलती हुई वरुणालय (समुद्र) क्षुब्ध हो उठा।

सुग्रीव कुम्भ को सिर के ऊपर उठाकर समुद्र में फेंकते हैं, और खारा जल पहाड़ जैसी फुहार बनकर उछल पड़ता है

फिर सुग्रीव ने कुम्भ को उठाकर समुद्र-तल दिखाते हुए वेग से लवण-जल में पटक दिया। कुम्भ के गिरने से विन्ध्य-मन्दर-सी जल-राशि उठकर सब ओर फैल गई। कुम्भ उछलकर सुग्रीव को पटककर वज्र-सी मुष्टि से छाती पर प्रहार कर बैठा; सुग्रीव का कवच फट गया, रक्त बहने लगा, और कुम्भ की मुष्टि उसकी अस्थि-मण्डल से टकराई। उस वेग से मेरु-पर्वत पर वज्र-निर्घात-सी महाज्वाला उठी। आहत महाबली सुग्रीव ने वज्र-सी मुष्टि बाँधी और सहस्र-किरण-सूर्य-मण्डल-सी आभा वाली उस मुष्टि को कुम्भ की छाती पर मारा। उस प्रहार से विह्वल, अति-पीड़ित कुम्भ गत-अर्चि (बुझी) अग्नि-सा गिर पड़ा, और दैव-इच्छा से आकाश से गिरते दीप्त-किरण मंगल-से धरती पर मर गिरा। उस वीर के मारे जाने पर पर्वत-वन सहित धरती काँप उठी और राक्षसों में और भी भय समा गया।

सार: कुम्भकर्ण-पुत्र कुम्भ इस अंक का अन्तिम महान योद्धा है, और सुग्रीव के साथ उसका मल्ल-युद्ध वाल्मीकि की परम जीवन्त द्वन्द्व-छवियों में एक है। ध्यान देने योग्य है कि शत्रु कुम्भ की वीरता की सुग्रीव खुली प्रशंसा करता है: वाल्मीकि के युद्ध में पराक्रम का आदर शत्रु में भी होता है।

हनुमान के हाथों निकुम्भ का वध

भाई कुम्भ को सुग्रीव के हाथ मारा देख निकुम्भ ने वानरेन्द्र की ओर ऐसे देखा मानो क्रोध से जला देगा। धीर निकुम्भ ने मालाओं से सजा, पाँच अंगुल चौड़ी लोह-पट्टियों वाला, महेन्द्र-शिखर-सा, स्वर्ण-मढ़ा, वज्र-प्रवाल-भूषित, यमदण्ड-सा भयंकर, राक्षसों का भय-नाशक परिघ उठाया। इन्द्र-ध्वज-तुल्य ओजस्वी उस परिघ को घुमाकर, मुख फाड़कर भीम-पराक्रमी निकुम्भ गरजा। उरःस्थ निष्क, बाहुओं के अंगद, चित्र-कुण्डल, चित्र-माला और उस परिघ से निकुम्भ वैसे शोभित हुआ जैसे विद्युत-गर्जना-इन्द्रधनुष-युक्त मेघ।

क्रोध-ईंधन वाली, परिघ-आभूषण-ज्वाला वाली निकुम्भ-रूपी अग्नि युगान्त-अग्नि-सी उठकर दुरासद हो गई। भय से न राक्षस, न वानर हिल सके; पर बलवान हनुमान छाती खोलकर उसके सामने खड़े हो गए। परिघ-सी कठोर भुजाओं वाले बलवान निकुम्भ ने सूर्य-प्रभ परिघ हनुमान की छाती पर मारा, पर उनकी दृढ़-विशाल छाती से टकराकर वह परिघ सौ टुकड़े होकर सौ उल्काओं-सा बिखर गया। उस प्रहार से महाकपि भूकम्प में अचल पर्वत-से ज़रा भी न हिले।

आहत होकर अति-महाबली हनुमान ने मुष्टि बाँधी और महातेजस्वी हनुमान ने उसे निकुम्भ की छाती पर मारा; वहाँ कवच फट गया और रक्त बहने लगा, मानो मेघ से विद्युत निकली हो। उस प्रहार से निकुम्भ डगमगाया, पर सँभलकर उसने महाबली हनुमान को पकड़ लिया। हनुमान ने पकड़े जाने पर भी वज्र-सी मुष्टि से उसे मारा, फिर छूटकर भूमि पर कूद पड़े और शीघ्र निकुम्भ को गिरा दिया। निकुम्भ को पटककर कुचलते हुए हनुमान उछलकर उसकी छाती पर कूद पड़े, और उसकी गर्दन पकड़कर मोड़कर, भीषण चीत्कार करते हुए उसका विशाल सिर उखाड़ डाला। निकुम्भ के मारे जाने पर वानरों ने हर्ष-निनाद किया, दिशाएँ गूँज उठीं, धरती काँपी-सी, आकाश गिरता-सा हुआ, और राक्षस-सेना भय से भर गई।

सार: निकुम्भ का परिघ हनुमान की छाती से टकराकर चूर हो जाना: यह छवि हनुमान के अपराजेय बल की पुनः पुष्टि करती है। कुम्भकर्ण की समूची सन्तान का अन्त हो जाने से रावण की रक्षा-पंक्ति टूट जाती है, और अब वह खर के पुत्र मकराक्ष को रण में भेजता है।

मकराक्ष का प्रस्थान

निकुम्भ और कुम्भ के मारे जाने का समाचार सुन परम क्रोधी रावण अग्नि-सा भभक उठा। क्रोध-शोक दोनों से अभिभूत होकर उसने खर के विशालाक्ष पुत्र मकराक्ष को आदेश दिया, “हे पुत्र, मेरी आज्ञा से सेना सहित जाइए, और राघव-लक्ष्मण दोनों को वानरों सहित मार डालिए।” रावण का वचन सुनकर अपने को शूर माननेवाला खर-पुत्र मकराक्ष हर्षित होकर “ऐसा ही हो” कहकर रावण को अभिवादन और प्रदक्षिणा कर, बलवान वह योद्धा रावण के शुभ्र महल से आदेशानुसार निकल पड़ा।

पास खड़े सेनापति से खर-पुत्र ने कहा, “मेरा रथ तुरन्त लाइए और सेना शीघ्र जुटाइए।” सेनापति ने रथ और सेना उसके पास रखी। रथ की प्रदक्षिणा कर, उस पर चढ़कर रात्रिचर ने सारथि से कहा, “शीघ्र रथ रणभूमि में ले चलो।” फिर मकराक्ष ने सब राक्षसों से कहा, “आप सब मेरे आगे रहकर खूब लड़ें, हे राक्षसो! महात्मा रावण ने मुझे राम-लक्ष्मण दोनों को रण में मारने का आदेश दिया है। आज मैं श्रेष्ठ बाणों से राम, लक्ष्मण, वानर सुग्रीव और अन्य वानरों का संहार कर दूँगा; शूल-प्रहारों से वानरों की महासेना को वैसे ही जलाऊँगा जैसे आग सूखी लकड़ी को।”

उसकी डींग सुन हर्षित होकर बड़े-बड़े, क्रूर, उभरे दाँतों, पिंगल नेत्रों, बिखरे केशों वाले भयानक राक्षसों ने उस महाकाय खर-पुत्र को घेर लिया और हाथियों-से गरजते, धरती हिलाते आगे बढ़े। सहस्रों शंख-भेरी, सिंहनाद और भुजताल की महाध्वनि सब ओर उठी। तभी सहसा मकराक्ष के सारथि के हाथ से चाबुक छूट पड़ा और उस राक्षस का ध्वज भी दैव से गिर गया। उसके रथ के घोड़े पराक्रम-रहित होकर, गतियाँ भूलकर, दीन और सजल-नेत्र होकर हिचकते पैरों से चलने लगे। उस रौद्र, दुर्मति मकराक्ष के निर्गमन-काल में धूल-भरी, खर-दारुण वायु बहने लगी। इन अपशकुनों को देखकर भी अनदेखा कर, अत्यन्त पराक्रमी राक्षस उस ओर निकल पड़े जहाँ राम-लक्ष्मण थे। मेघ-गज-महिष-वर्ण, युद्ध-कुशल वे रात्रिचर, जो रण-मुखों में अनेक बार गदा-तलवार से बिंधे थे, “मैं आगे! मैं आगे!” कहते बार-बार रणभूमि में घूमने लगे।

सार: मकराक्ष खर का पुत्र है: वही खर जिसे श्रीराम ने दण्डक-वन में मारा था। उसका प्रस्थान अपशकुनों से भरा है: चाबुक गिरना, ध्वज गिरना, घोड़ों का हिचकना, खर-वायु। वाल्मीकि इन निमित्तों से पहले ही उसकी पराजय की सूचना दे देते हैं, और मकराक्ष का अपशकुन-अवज्ञा उसके अहंकार का प्रतीक है।

श्रीराम के हाथों मकराक्ष का वध

मकराक्ष को निकला देख सब वानर-पुंगव युद्ध की इच्छा से उछलकर डट गए। देव-दानव-से वानरों और रात्रिचरों का रोमहर्षण घोर युद्ध छिड़ गया। वानर वृक्ष-शूल-गदा-परिघ से, राक्षस शक्ति-खड्ग-गदा-कुन्त-तोमर-पट्टिश-भिन्दिपाल-पाश-मुद्गर-दण्ड-निर्घात आदि से एक-दूसरे को मसलने लगे। रात्रिचरों ने वानर-सिंहों का संहार किया। खर-पुत्र के बाण-समूह से पीड़ित, भय-व्याकुल वानर सब भागने लगे। उन्हें भागते देख दर्पित, विजय-कांक्षी राक्षस सिंह-से गरज उठे।

वानरों को सब ओर भागते देख श्रीराम ने बाण-वर्षा से राक्षसों को रोका। राक्षसों को रुका देख क्रोधाग्नि से भरा मकराक्ष बोला, “हे राम, ठहरिए! मेरे साथ आपका द्वन्द्व-युद्ध होगा। धनुष से छूटे तीक्ष्ण बाणों से मैं आपके प्राण छुड़ाऊँगा। दण्डक-वन में आपने मेरे पिता को मारा, तब से आपको अपने कुकर्म में लीन याद कर मेरा रोष बढ़ता है। हे दुरात्मन राघव, उस महावन में आप मुझे न मिले, इससे मेरे अंग जलते रहे। बहुत कहने से क्या? सुनिए: सब लोक आपको और मुझे रणभूमि में देखें। अस्त्र से, गदा से, बाहुओं से, या जिस आयुध का अभ्यास हो, उसी से युद्ध हो।”

मकराक्ष का यह वचन सुन दशरथ-पुत्र राम ने हँसते हुए, बार-बार बोलते उस राक्षस से कहा, “हे राक्षस, व्यर्थ आत्म-प्रशंसा क्यों करते हैं? आपने अपने अयोग्य बहुत-सी बातें कहीं। युद्ध के बिना केवल वाणी-बल से रण में विजय नहीं होती। दण्डक में मैंने चौदह सहस्र राक्षस, तथा आपके पिता खर, त्रिशिरा और दूषण को मारा। गीध-शृगाल-काक उनके माँस से तृप्त हुए थे; हे पापी, आज वे तीक्ष्ण-चोंच-नख वाले आपके माँस से तृप्त होंगे।” यह सुनकर महाबली मकराक्ष ने राघव पर बाण-समूह बरसाए। राम ने उन्हें बाण-वर्षा से अनेक प्रकार से काट डाला; स्वर्ण-पुंख बाण सहस्रों की संख्या में कटकर भूमि पर गिर पड़े।

खर-पुत्र और दशरथ-पुत्र का परस्पर ओजस्वी द्वन्द्व छिड़ गया। दोनों के धनुष-ज्या-ताल की ध्वनि आकाश में मेघ-गर्जना-सी सुनी गई। देव-दानव-गन्धर्व-किन्नर-महोरग आकाश में वह अद्भुत युद्ध देखने आए। अंग-अंग बिंधने पर भी दोनों का बल दूना बढ़ता गया; दोनों रण में परस्पर प्रहार-प्रतिप्रहार करते रहे। राम के बाण-समूह राक्षस ने काटे, राक्षस के बाण राम ने काटे। बाण-समूह से सब दिशाएँ और भूमि ढक गईं, कुछ न दीखता था। तब क्रुद्ध महाबाहु राम ने मकराक्ष का धनुष काट डाला और आठ नाराचों से सारथि को बेधा। फिर रथ काटकर, घोड़े मारकर गिरा दिए; रथहीन मकराक्ष भूमि पर खड़ा हो गया।

धरती पर खड़े राक्षस ने सर्व-भूत-त्रासक, युगान्त-अग्नि-सा दीप्त शूल हाथ में लिया: दुष्प्राप्य, रुद्र-दत्त, भयंकर, आकाश में जाज्वल्यमान, दूसरे संहार-अस्त्र-सा शूल, जिसे देख देव भय से भाग जाते थे। उस प्रज्वलित महाशूल को घुमाकर रात्रिचर ने महायुद्ध में क्रोध से राघव पर फेंका। आते उस ज्वलित शूल को राघव ने हँसते हुए चार बाणों से आकाश में काट डाला; दिव्य-स्वर्ण-मण्डित वह शूल अनेक टुकड़े होकर महोल्का-सा भूमि पर बिखर गया। शूल नष्ट देख आकाश-स्थित भूत “साधु! साधु!” कह उठे।

राम का आग्नेय बाण मकराक्ष का हृदय चीर देता है, और खर का वह डींग मारने वाला पुत्र लपटों में घिरकर मरा हुआ गिरता है

शूल नष्ट देख मकराक्ष ने मुष्टि उठाकर काकुत्स्थ राम को “ठहरिए, ठहरिए” कहा। उसे आता और हँसते देख रघुनन्दन राम ने धनुष पर पावक-अस्त्र चढ़ाया। उस अस्त्र से रण में आहत वह राक्षस, छिन्न-हृदय होकर, वहीं गिरकर मर गया। मकराक्ष का पतन देख राम-बाण के भय से पीड़ित सब राक्षस सीधे लंका की ओर भागे। राम के बाण-वेग से मारे, वज्र-हत बिखरे पर्वत-से उस खर-पुत्र को देख आकाश-स्थित देव हर्षित हो उठे।

सार: मकराक्ष का वध रामायण के एक पुराने ऋण का पटाक्षेप है: दण्डक-वन में राम ने उसके पिता खर का संहार किया था। श्रीराम पहले उसकी डींग का खण्डन करते हैं (वाणी-बल से विजय नहीं होती), फिर रुद्र-दत्त शूल को भी काटकर पावक-अस्त्र से उसका अन्त कर देते हैं। यह राम के संयत वीर-रूप का सुन्दर चित्र है।

इन्द्रजित का पुनः अभियान और राम-लक्ष्मण की मन्त्रणा

मकराक्ष को मारा गया सुन सदा-विजयी रावण महाक्रोध से भर, दाँत पीसता, यह सोचता कि अब क्या किया जाए, क्रुद्ध होकर अपने पुत्र इन्द्रजित को रण के लिए भेजने लगा। “हे वीर, अदृश्य रहकर या दृश्य होकर, महावीर्य राम-लक्ष्मण दोनों को मार डालिए; आप सब प्रकार से उनसे बल में बढ़कर हैं। आपने अप्रतिम-कर्मा इन्द्र को भी रण में जीता है; फिर दो मनुष्यों को देखकर रण में क्यों न मारेंगे?” पिता का वचन शिरोधार्य कर इन्द्रजित ने यज्ञभूमि में विधिवत अग्नि में आहुति दी। आहुति देते समय लाल पगड़ी पहने सेविका-राक्षसियाँ घबराकर वहाँ आ पहुँचीं।

इंद्रजित काला छाग थामे यज्ञकुंड में रक्त की आहुति देता है, धुएँ में मायावी रथ और अश्व उभरते हैं।

उस यज्ञ में शूल-शस्त्र ही कुश-स्थान पर बिछे, बिभीतक की समिधाएँ, लाल वस्त्र और लोह-स्रुव प्रयुक्त हुए। शूल-तोमरों से अग्नि को आस्तीर्ण कर इन्द्रजित ने एक जीवित सर्व-कृष्ण बकरे का गला पकड़कर आहुति दी। एक ही आहुति से प्रज्वलित, धूमरहित, महाज्वाला वाली अग्नि में विजय-सूचक चिह्न प्रकट हुए; दक्षिणावर्त-शिखा, तप्त-स्वर्ण-सी अग्नि प्रत्यक्ष प्रकट होकर हवि ग्रहण कर गई। अग्नि को तृप्त कर, देव-दानव-राक्षसों को तर्पित कर, इन्द्रजित अन्तर्धान-योग्य श्रेष्ठ रथ पर चढ़ा। चार घोड़ों से जुता, तीक्ष्ण बाणों और महाधनुष से युक्त वह रथ शोभित हुआ; स्वर्ण-साज से दीप्त, मृग-इन्द्र-अर्धचन्द्र-अंकित। जाम्बूनद-स्वर्ण के महाकम्बु (कड़े) और वैदूर्य-जड़ित केतु से इन्द्रजित दीप्त-अग्नि-सा शोभित हुआ। ब्रह्मास्त्र से रक्षित वह सुमहाबली रावण-पुत्र दुराधर्ष हो गया।

राक्षसेन्द्र इन्द्रजित नगर से निकलकर, राक्षस-मन्त्रों से अग्नि में होम कर, अन्तर्धान-गत होकर बोला, “आज रण में उन दोनों को, जो व्यर्थ ही वन में आए हैं, मारकर मैं रावण को रण में अधिक विजय दिलाऊँगा। आज पृथ्वी को निर्वानर कर, राम-लक्ष्मण को मारकर पिता को परम प्रीति दूँगा।” यह कहकर वह अदृश्य हो गया। दशग्रीव से प्रेरित, तीक्ष्ण धनुष-नाराच लिए तीक्ष्ण इन्द्र-शत्रु क्रुद्ध होकर रण में झपटा। उसने वानरों के बीच त्रिशिरा-सर्प-से (तीन-सिर वाले-से) महावीर्य राम-लक्ष्मण को बाण-जाल छोड़ते देखा।

एक उप-कथा: राम-लक्ष्मण की तुलना यहाँ “तीन-सिर वाले सर्पों” से क्यों? क्योंकि उनके धनुष के सिरे दाहिने कन्धे के ऊपर और तरकश के सिरे बाएँ कन्धे के ऊपर दो और सिरों-से उठे थे; इस प्रकार सिर सहित तीन शीर्ष-से दीखते थे। वाल्मीकि का यह उपमान युद्ध-सज्जित वीर की दिव्य-भयंकर छवि गढ़ता है।

“ये ही वे दो हैं”, ऐसा सोचकर इन्द्रजित ने धनुष चढ़ाकर, पर्जन्य-सी बाण-धाराओं से दिशाएँ ढक दीं। आकाश-रथ पर अदृश्य रहकर उसने नीचे खड़े राम-लक्ष्मण को तीक्ष्ण बाणों से बेधा। बाण-वेग से घिरे राम-लक्ष्मण ने धनुष पर बाण चढ़ाकर दिव्य अस्त्र प्रकट किए। आकाश को बाण-जाल से ढकते हुए भी वे सूर्य-सी आभा वाले अस्त्रों से इन्द्रजित को छू तक न सके। उसने माया से धूम-अन्धकार रचकर आकाश ढक दिया और नीहार-तम से दिशाएँ अदृश्य कर दीं। न ज्या-ताल की ध्वनि, न रथ-चक्र या खुर का शब्द सुना जाता, न उसका रूप दीखता था। घने अन्धकार में महाबाहु इन्द्रजित अद्भुत शिला-वर्षा-सी नाराच-वर्षा करता रहा।

क्रुद्ध रावण-पुत्र ने सूर्य-सी आभा वाले वरदान-प्राप्त बाणों से रण में राम के सब अंगों को बेध डाला। धाराओं से बिंधे दो पर्वतों-से वे दोनों नर-व्याघ्र स्वर्ण-पुंख तीक्ष्ण बाण छोड़ते रहे। कंक-पंख वाले वे बाण आकाश में इन्द्रजित को बेधकर रक्त में सने भूमि पर गिर पड़े। बाण-समूह से दीप्त नर-श्रेष्ठ गिरते बाणों को भल्ल-बाणों से काटते रहे, और जहाँ-से बाण गिरते देखते, उसी दिशा में उत्तम अस्त्र छोड़ते। अतिरथ इन्द्रजित रथ से सब दिशाओं में घूमता, शीघ्र-अस्त्री होकर दोनों को बेधता रहा; स्वर्ण-पुंख सुसंहत बाणों से बिंधे वे राजपुत्र फूले किंशुक-से दीखने लगे। मेघ-ढके सूर्य-सा उसका वेग, रूप, धनुष-बाण कुछ ज्ञात न होता था; उसके बाणों से बिंधे सैकड़ों वानर मरकर गिरे।

तब क्रुद्ध लक्ष्मण ने भाई से कहा, “मैं समस्त राक्षसों के वध हेतु ब्रह्मास्त्र चलाऊँगा।” राम ने शुभ-लक्षण लक्ष्मण से कहा, “एक व्यक्ति का बदला लेने को पृथ्वी के सब राक्षसों का संहार उचित नहीं। जो लड़ नहीं रहा, छिपा है, हाथ जोड़े शरणागत है, भाग रहा है या उन्मत्त है, उसे आपको नहीं मारना चाहिए। मैं केवल इस इन्द्रजित के वध का यत्न करूँगा, हे महाबाहु। हम दोनों महावेग आशीविष-सरीखे अस्त्र चलाएँगे। माया से छिपे, क्षुद्र, अदृश्य-रथ इस राक्षस को देखकर वानर-यूथपति बल से मार डालेंगे। यह भूमि, स्वर्ग, रसातल या आकाश में जाकर पूर्णतः छिप जाए, तो भी मेरे अस्त्र से जलकर भूमि पर मरकर गिरेगा।” यह गूढ़ार्थ वचन कहकर वानर-श्रेष्ठों से घिरे महात्मा राम उस क्रूर-कर्मा रौद्र राक्षस के शीघ्र वध-उपाय पर विचार करने लगे।

सार: इन्द्रजित दूसरी बार माया-युद्ध करता है, इस बार धूम-अन्धकार रचकर अदृश्य रहता है। यहाँ श्रीराम का धर्म-विवेक प्रकट होता है: वे लक्ष्मण को सब राक्षसों के संहार से रोकते हैं और केवल इन्द्रजित-वध का संकल्प करते हैं। साथ ही अदृश्य शत्रु को मारने की समस्या ही आगे विभीषण के रहस्योद्घाटन की भूमिका बनती है।

इन्द्रजित द्वारा माया-सीता का वध

महात्मा राघव के मन का अभिप्राय जानकर इन्द्रजित उस युद्ध से लौटकर नगर में प्रवेश कर गया। उन मारे गए महाबली राक्षसों के वध को स्मरण कर, क्रोध से ताम्र-नेत्र वीर रावण-पुत्र फिर निकल पड़ा। राक्षसों से घिरा वह महावीर्य पौलस्त्य, देव-कण्टक इन्द्रजित पश्चिमी द्वार से निकला। राम-लक्ष्मण को सब प्रकार युद्ध-उद्यत देख इन्द्रजित ने अपनी माया-निपुणता प्रकट की। उसने एक माया-मयी सीता रथ पर बिठाई और महासेना से घेरकर उसका वध करने का विचार किया। सबको मोहित करने को दुर्मति इन्द्रजित ‘सीता’ को मारने का निश्चय कर वानरों की ओर बढ़ा।

उसे निकला देख सब वनवासी क्रुद्ध होकर शिला-हाथ युद्ध की इच्छा से उछल पड़े। हनुमान, महाकपि, दुरासद विशाल पर्वत-शिखर लेकर उनके आगे चले। हनुमान ने इन्द्रजित के रथ में हत-आनन्द ‘सीता’ को देखा: एक वेणी धारण किए, दीन, उपवास से कृश-मुख, मलिन एक वस्त्र में, बिना आभूषण, धूल-मल से लिपटे अंगों वाली वर-स्त्री। चारु-सर्वांगी, राम की प्रिया उस जनक-पुत्री को थोड़ी देर देखकर हनुमान विषण्ण हो उठे; मिथिला-राजकुमारी को उन्होंने तुरन्त पहचान लिया, क्योंकि वह उनसे पूर्व-दृष्ट थी।

आकाशचारी रथ पर इंद्रजित रोती हुई मायावी सीता के केश खींचता है, नीचे पर्वत थामे हनुमान व्यथित देखते हैं।

शोकार्त, निरानन्द, तपस्विनी, रथस्थ, दीन, राक्षसेन्द्र-पुत्र के वश ‘सीता’ को देखकर, और यह सोचकर कि इसका क्या अभिप्राय है, महाकपि हनुमान वानर-श्रेष्ठों के साथ रावण-पुत्र की ओर दौड़े। वानर-सेना को आती देख इन्द्रजित क्रोध-मूर्च्छित होकर तलवार खींच, ‘सीता’ को सिर के बाल पकड़कर खींचने लगा। ‘राम! राम!’ पुकारती, माया से रथ में बिठाई उस स्त्री को राक्षस वानरों के देखते-देखते मारने लगा। उसे केश पकड़ा देख हनुमान दीन हो गए और नेत्रों से दुःख के आँसू बहाने लगे।

राम की प्रिय महिषी को देख हनुमान ने उसे सीता ही समझा और क्रोध से राक्षसेन्द्र-पुत्र से कठोर वचन कहे, “हे दुरात्मन, अपने ही नाश को आपने इसके केश पकड़े हैं! ब्रह्मर्षि-कुल में जन्म लेकर भी आप राक्षसी योनि में आश्रित हैं। हे पाप-आचारी, धिक्कार है आपको, जिसकी ऐसी मति है! हे नृशंस, अनार्य, दुर्वृत्त, क्षुद्र, पाप-पराक्रमी, ऐसा कर्म तो अनार्य का ही है; हे निर्घृण, आपमें दया ही नहीं। घर, राज्य और राम के हाथ से छूटी इस मिथिला-राजकुमारी ने आपका क्या अपराध किया, जो आप इसे मारते हैं, हे निर्दय? सीता को मारकर आप किसी प्रकार चिर-जीवी न रहेंगे; इस वध-योग्य कर्म से आप मेरे हाथ आ गए हैं। जिस सीता के लिए सुग्रीव, आप और राम यहाँ आए, उसे मारने वाला स्त्री-घातकों के निन्द्य लोक में जाएगा।”

यह कहकर, शस्त्रधारी वानरों से घिरे हनुमान अति-क्रुद्ध होकर इन्द्रजित की ओर दौड़े। महावीर्य वानर-सेना को आता देख इन्द्रजित ने भीम-क्रोधी राक्षस-सेना से उसे रोका। फिर वह राघव-प्रिया चारु-सर्वांगी को देख इन्द्रजित ने हनुमान से कहा, “जिसके लिए सुग्रीव, आप और राम यहाँ आए, उस वैदेही को आज ही आपके देखते-देखते मैं मार डालूँगा। इसे मारकर फिर राम, लक्ष्मण, आपको, सुग्रीव और उस अनार्य विभीषण को मारूँगा। आपने जो कहा कि स्त्रियाँ न मारी जाएँ, हे वानर, ठीक है; पर जो शत्रुओं को पीड़ा दे, वह तो करना ही चाहिए।” यह कहकर रोती हुई उस माया-मयी सीता को इन्द्रजित ने तीक्ष्ण-धार खड्ग से स्वयं मार डाला।

रथ पर खड़ा इंद्रजित तलवार से मायावी सीता का वध करता है, हनुमान हाथ फैलाए विलाप करते हैं।

यज्ञोपवीत-मार्ग (तिरछे) से कटी वह तपस्विनी, पृथु-श्रोणी, प्रिय-दर्शना भूमि पर गिर पड़ी। उस स्त्री को मारकर इन्द्रजित ने हनुमान से कहा, “देखिए, मैंने राम की प्रिया शस्त्र से मार डाली; यह वैदेही मारी गई, आपका परिश्रम निष्फल हुआ।” फिर बड़े खड्ग से उसे मारकर इन्द्रजित हर्षित होकर रथ पर चढ़कर महाध्वनि से गरजा। दुर्गम उस आकाश-रथ में बैठे, मुख फाड़कर गरजते इन्द्रजित का शब्द पास खड़े वानरों ने सुना। सीता को मारकर दुर्मति रावण-पुत्र हृष्ट-चित्त हो उठा; उसे प्रसन्न-रूप देख विषण्ण-मुख वानर भाग खड़े हुए।

सार: इन्द्रजित की यह माया रामायण की परम चालाक रणनीति है: असली सीता नहीं, उसकी माया-छवि को मारकर वह वानर-सेना का मनोबल तोड़ देता है। हनुमान का दीन होना और इन्द्रजित को धर्म का उपदेश देना दिखाता है कि यह छल कितना गहरा आघात है। पर ध्यातव्य है: मारी गई सीता माया-मयी है, असली नहीं, जो आगे विभीषण स्पष्ट करेंगे।

हनुमान का लौटना और निकुम्भिला में इन्द्रजित का होम

इन्द्र-अशनि-सी भयंकर इन्द्रजित की गर्जना सुनकर वानर सब दिशाओं को देखते अत्यन्त वेग से भागे। तब मारुति हनुमान ने उन विषण्ण-मुख, दीन, त्रस्त, अलग-अलग भागते वानरों से कहा, “हे वानरो, युद्ध-उत्साह त्यागकर विषण्ण-मुख क्यों भागते हैं? आपकी शूरता कहाँ गई? मेरे पीछे लौटिए, मैं आगे चलता हूँ; अभिजात-कुल के शूरों का रण से पीछे हटना अयोग्य है।” बुद्धिमान वायु-पुत्र के इस वचन से हर्षित हो वानर अति-क्रुद्ध होकर शिखर-वृक्ष उठा लाए और गरजते हुए राक्षसों पर टूट पड़े; हनुमान को घेरकर वे महायुद्ध में उसके पीछे चले।

वानर-मुख्यों से घिरे हनुमान अर्चिष्मान अग्नि-से शत्रु-सेना को जलाने लगे। काल-अन्तक-यम-सा वह महाकपि वानर-सेना से घिरकर राक्षसों का संहार करने लगा। शोक और महाक्रोध से आविष्ट हनुमान ने इन्द्रजित के रथ पर एक महाशिला फेंकी; शिला आती देख सारथि ने विधेय घोड़ों वाला रथ दूर हटा लिया। इन्द्रजित को न पाकर वह उद्यत शिला व्यर्थ ही धरती फोड़कर भीतर समा गई। शिला गिरते ही राक्षस-सेना व्यथित हुई और गिरती शिला से अनेक राक्षस अत्यन्त कुचले गए।

सैकड़ों वानर गरजते इन्द्रजित की ओर दौड़े, और वृक्ष-शिखर लेकर महाकाय वानर सक्रिय हो उठे। भीम-पराक्रमी वानर इन्द्रजित को रण में फटकारते और वृक्ष-शिला की महावर्षा करते रहे। उन भीम वानरों के वृक्ष-प्रहार से घोर-रूप राक्षस रण में लोटने लगे। वानरों से पीड़ित सेना देख इन्द्रजित क्रुद्ध होकर आयुध उठाकर शत्रुओं की ओर बढ़ा, और अपनी सेना से घिरकर बाण-धाराएँ छोड़ता शूल-अशनि-खड्ग-पट्टिश-कूटमुद्गर से अनेक वानर-शार्दूलों को मारने लगा। वानरों ने भी उसके अनुचरों को मारा।

महाबली हनुमान ने सुस्कन्ध साल-वृक्षों और शिलाओं से भीम-कर्मा राक्षसों का संहार किया, और शत्रु-सेना को रोककर वानरों से कहा, “हे वानरो, लौट चलिए! अब यह सेना हमारे जीतने योग्य नहीं रही। राम के प्रिय की कामना से, प्राण देकर हम जिस जनक-पुत्री के लिए लड़े, वही मारी गई। यह समाचार राम और सुग्रीव को बताकर, वे जो आदेश देंगे, वही करेंगे।” यह कहकर वानर-श्रेष्ठ हनुमान सब वानरों को रोकते, अभय होकर, धीरे-धीरे सेना सहित लौट पड़े। हनुमान को राघव के पास जाते देख दुष्टात्मा इन्द्रजित होम करने की इच्छा से निकुम्भिला नामक चैत्य (पवित्र स्थान) पहुँचा और वहाँ अग्नि में आहुति देने लगा।

यज्ञभूमि में पहुँचकर उस राक्षस से आहुति पाकर होम-रक्त-भोजी अग्नि प्रज्वलित हो उठी। होम-रक्त से तृप्त, ज्वालाओं में लिपटी वह अति-तीव्र अग्नि सन्ध्या के सूर्य-सी प्रकट हुई। राक्षसों की समृद्धि हेतु, यज्ञ-विधान का ज्ञाता इन्द्रजित शास्त्रोक्त विधि से हवि देने लगा; यह देख नीति-अनीति के ज्ञाता राक्षस उसके पास डटे रहे।

सार: हनुमान वानरों को फिर एकत्र कर शत्रु को रोकते हैं, पर माया-सीता के वध का समाचार उन्हें श्रीराम तक पहुँचाने को विवश करता है। इन्द्रजित इसी अवसर का लाभ उठाकर निकुम्भिला में अपना होम पूरा करने चला जाता है: वही होम जो उसे अजेय बनाता है। निकुम्भिला का यह उल्लेख आगे की निर्णायक घटना का बीज है।

सीता-वध सुनकर श्रीराम की मूर्च्छा और लक्ष्मण का सान्त्वन

राक्षसों और वानरों के युद्ध का वह महान कोलाहल सुनकर राघव ने जाम्बवान से कहा, “हे सौम्य, जिस प्रकार भयंकर और अति-उच्च आयुध-ध्वनि सुनाई दे रही है, उससे लगता है हनुमान ने अवश्य कोई अति-दुष्कर कर्म किया है। अतः अपनी सेना सहित जाकर उस युद्धरत कपिश्रेष्ठ को शीघ्र सहायता दीजिए, हे ऋक्षपते।” “ऐसा ही हो” कहकर ऋक्षराज जाम्बवान अपनी सेना सहित पश्चिमी द्वार की ओर चले जहाँ हनुमान थे। वहाँ ऋक्षपति ने हनुमान को लौटते देखा, जो युद्ध कर चुके वानरों से घिरे, शोक से साँसें भरते आ रहे थे। नील-मेघ-सी, उद्यत ऋक्ष-सेना को मार्ग में युद्ध-उद्यत देख हनुमान उसे भली-भाँति रोककर लौट पड़े।

उस सेना के साथ महायशस्वी हनुमान शीघ्र राम के पास पहुँचकर दुःखी होकर बोले, “जब हम रण में लड़ रहे थे और देखते रह गए, तभी रावण-पुत्र इन्द्रजित ने रोती हुई सीता को मार डाला। हे अरिन्दम, उसे देखकर मैं उद्भ्रान्त-चित्त और विषण्ण हो उठा; अतः यह वृत्तान्त आपको सुनाने आया हूँ।” हनुमान का यह वचन सुनकर राघव शोक से मूर्च्छित होकर कटे-मूल वृक्ष-से भूमि पर गिर पड़े। देव-सरीखे राघव को गिरा देख कपि-श्रेष्ठ सब ओर से उछलकर उनके पास आए और कमल-उत्पल की सुगन्ध वाले जल से उन्हें वैसे सींचने लगे जैसे सहसा भभकती असह्य अग्नि को सींचा जाता है।

तब अत्यन्त दुःखी लक्ष्मण ने राम को बाहुओं में भरकर, अस्वस्थ राम से हेतु और अर्थ से युक्त यह वचन कहा, “हे आर्य, आप शुभ मार्ग पर स्थित और जितेन्द्रिय हैं, फिर भी धर्म आपको अनर्थों से नहीं बचा सका, अतः वह निरर्थक प्रतीत होता है। जैसे स्थावर-जंगम प्राणियों का अस्तित्व प्रत्यक्ष है, वैसे धर्म प्रत्यक्ष सुख-हेतु नहीं दीखता; अतः धर्म ही सुख का कारण नहीं, ऐसा मेरा मत है। यदि अधर्म फलदायी होता तो रावण नरक में जाता और आप धर्मयुक्त होकर कभी व्यसन न पाते। रावण व्यसन-रहित है और आप पर विपत्ति आई, मानो धर्म-अधर्म ने आपस में भूमिका बदल ली।”

एक उप-कथा: लक्ष्मण का यह धर्म-निषेधक भाषण वस्तुतः निराशा-जन्य है: माया-सीता के ‘वध’ से व्याकुल श्रीराम को देखकर उपजा। जैसे दिव्य राम का अपनी प्रिया की माया-छवि के नाश पर शोकग्रस्त होना प्रेम की लीला-मात्र है, वैसे ही राम को व्यथित देखकर लक्ष्मण का यह असंगत-सा प्रलाप भी प्रेम-जनित उद्वेग है। आगे (इसी सर्ग के अन्त में) लक्ष्मण स्वयं कहते हैं कि उन्होंने यह सब केवल राम के शोक को मिटाने और उन्हें कर्म के लिए प्रेरित करने को कहा था।

लक्ष्मण ने आगे तर्क रखे, “यदि धर्म से ही सुख और अधर्म से ही दुःख मिलता, तो अधर्मियों को केवल दुःख और धर्मियों को केवल सुख मिलता। पर जिनमें अधर्म प्रतिष्ठित है, उनकी सम्पत्ति बढ़ती है और धर्मशील क्लेश पाते हैं, अतः ये दोनों निरर्थक-से जान पड़ते हैं। यदि पापकर्मी अपने अधर्म से नष्ट होते हैं, तो वह वध-कर्मरूप अधर्म स्वयं क्षणिक होने से नष्ट हो जाता है: जो स्वयं तीन क्षण में नष्ट हो, वह किसे मारेगा? यदि धर्म दुर्बल होकर बल का सहारा माँगता है, तो वह शक्तिहीन धर्म त्याज्य ही है। यदि धर्म बल के पराक्रमों का गुण-भूत है, तो धर्म छोड़कर बल का आश्रय लीजिए जैसे अब तक धर्म का लिया।”

“यदि कहें कि पिता के सत्य-वचन की रक्षा-रूप धर्म का पालन किया, तो पिता ने आपको युवराज बनाने की घोषणा करके भी न निभाकर असत्य से आपको अलग कर दिया, क्या आप उस घोषणा से बँधे न थे? हे संताप-धारी, यदि धर्म-अधर्म प्रत्यक्ष होते तो वज्री इन्द्र मुनि (त्वष्टा-पुत्र विश्वरूप) को मारकर अश्वमेध न करते। हे राघव, धर्म तभी शत्रुओं को नष्ट करता है जब बल से युक्त हो; अतः बुद्धिमान दोनों, धर्म और बल, का यथेच्छ आश्रय लेता है। राज्य त्यागकर तब आपने धर्म के मूल, अर्थ, को ही काट डाला।”

एक उप-कथा, विश्वरूप-वध और इन्द्र का अश्वमेध: लक्ष्मण ने इन्द्र का उदाहरण दिया कि उसने त्वष्टा-पुत्र विश्वरूप-मुनि को मारा और ब्रह्म-हत्या के प्रायश्चित में अश्वमेध किया। यह कथा श्रीमद्भागवत में विस्तार से आती है: विश्वरूप तीन सिरों वाला तपस्वी था जो गुप्त रूप से असुरों को भी आहुति देता था, और इसी से इन्द्र ने उसके तीन सिर काट दिए।

“बढ़े और संचित अर्थों से ही सब क्रियाएँ वैसे प्रवृत्त होती हैं जैसे पर्वतों से नदियाँ। निर्धन, अल्प-बुद्धि की सब क्रियाएँ ग्रीष्म की छोटी नदियों-सी सूख जाती हैं। जो सुख-कामी, सुख में पला अर्थ त्यागकर पाप करने जाता है, तो दोष उपजता है। जिसके पास अर्थ है, उसके मित्र, बन्धु; वही पुरुष, वही पण्डित, वही पराक्रमी, वही बुद्धिमान, वही महाभाग, वही गुणाधिक है। अर्थ-त्याग के ये दोष मैंने इनके विपरीत रूप में बताए। हे धीर, राज्य त्यागकर सर्वस्व-त्याग का जो आपने संकल्प किया, उसका कारण मुझे ज्ञात नहीं।”

“जिसके पास अर्थ है, उसके धर्म-काम-अर्थ सब सहज सिद्ध होते हैं; पर निर्धन को यत्न के बिना अर्थ नहीं मिलता। हर्ष, काम, दर्प, धर्म, क्रोध, शम, दम, ये सब अर्थ से ही प्रवृत्त होते हैं, हे नराधिप। जिनके त्याग से धर्मशील-तपस्वियों का लोक नष्ट होता है, वे अर्थ आपमें वैसे नहीं दीखते जैसे मेघ-दिन में ग्रह नहीं दीखते। हे वीर, आपके वनवास और गुरु-वचन-पालन के बीच ही प्राणों से प्रिय आपकी भार्या रावण ने हर ली। हे वीर, इन्द्रजित ने जो विपुल दुःख दिया है, उसे मैं आज कर्म से दूर करूँगा; अतः उठिए, हे राघव!”

“उठिए, हे नर-शार्दूल, दीर्घबाहु, धृतव्रत! आप महान बुद्धिवाले परमात्मा-स्वरूप अपने को क्यों नहीं पहचानते? हे अनघ, यह सब मैंने आपकी प्रसन्नता के लिए कहा; जनक-पुत्री के विनाश को जानकर रुष्ट होकर मैं रथ-हाथी-घोड़े और राक्षसेन्द्र रावण सहित लंका को अपने बाणों से ध्वस्त कर दूँगा।”

सार: माया-सीता का वध सुनकर श्रीराम का मूर्च्छित होना उनकी मानवीय लीला है। लक्ष्मण का लम्बा धर्म-निषेधक भाषण निराशा से उपजा है, पर अन्त में वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि यह सब राम को कर्म के लिए जगाने को कहा गया। यह सर्ग रामायण के गहनतम दार्शनिक प्रसंगों में एक है: धर्म और बल के सम्बन्ध पर।

विभीषण का रहस्योद्घाटन, सीता जीवित है

भ्रातृ-वत्सल लक्ष्मण जब राम को आश्वस्त कर रहे थे, तभी गुल्मों (सेना-चौकियों) को यथास्थान बिठाकर विभीषण वहाँ आ पहुँचे: नाना आयुधधारी, काजल-राशि-से नील-अंजन-वर्ण हाथी-यूथपति-सरीखे चार वीरों से घिरे। शोक में लीन महात्मा राघव और अश्रु-पूर्ण नेत्रों वाले वानरों को देखकर विभीषण ने राघव, इक्ष्वाकु-कुल-नन्दन, को मूर्च्छित और लक्ष्मण की गोद में पड़ा पाया। राम को लज्जित और शोक-संतप्त देखकर विभीषण अन्तर्दुःख से दीन होकर बोले, “यह क्या?”

विभीषण का मुख देखकर, सुग्रीव और वानरों की ओर देखकर अश्रु-पूर्ण लक्ष्मण ने संक्षेप में कहा, “हे सौम्य, ‘इन्द्रजित ने सीता को मार डाला’, हनुमान के मुख से यह सुनकर राघव मूर्च्छित हो गए।” बोलते लक्ष्मण को रोककर विभीषण ने मूर्च्छित राम से पुष्कल-अर्थ वाला यह वचन कहा, “हे नरेन्द्र, हनुमान ने आर्त-रूप होकर जो कहा, उसे मैं समुद्र के सूख जाने-सा असम्भव मानता हूँ। हे महाबाहु, मैं दुरात्मा रावण का सीता के प्रति अभिप्राय जानता हूँ: वह सीता का वध कभी न कराएगा।”

“मैंने हित-इच्छा से बार-बार उससे याचना की कि ‘वैदेही को छोड़ दीजिए’, पर उसने वह वचन कभी न माना। सीता को तो कोई और न साम से, न दान से, न भेद से, और युद्ध से तो कहना ही क्या, देख तक नहीं सकता; मारना तो दूर की बात है। वह राक्षस वानरों को मोहित कर लौट गया है; हे महाबाहु, जनक-पुत्री को उसने जो मारा, उसे माया-मयी जानिए। दुष्ट इन्द्रजित आज निकुम्भिला नामक चैत्य पर पहुँचकर होम करेगा। यदि वह होम पूरा कर लौट आया, तो इन्द्र सहित देव भी उसे रण में दुर्जय पाएँगे। निश्चय ही यह माया उसने हमें भ्रमित करने को रची, क्योंकि वानरों का पराक्रम रण में अबाधित रहता तो वे उसके यज्ञ में विघ्न डालते। अतः जब तक यज्ञ समाप्त न हो, हम सेना सहित वहाँ चलें।”

“हे नर-शार्दूल, इस मिथ्या आए संताप को त्यागिए; आपको शोक-कृश देखकर सारी सेना सीदती है। हे महाबाहु, आप उच्च-सत्त्व होकर स्वस्थ-हृदय यहाँ ठहरिए और सेना-सहित हमारे साथ लक्ष्मण को भेजिए। यह नर-शार्दूल तीक्ष्ण बाणों से उस रावण-पुत्र को उस कर्म (होम) से रोकेगा, तब वह वध्य हो जाएगा। पक्षी-पंख वाले लक्ष्मण के ये तीक्ष्ण बाण क्रूर पक्षियों-से इन्द्रजित का रक्त पिएँगे। अतः हे महाबाहु, राक्षस के विनाश हेतु शुभ-लक्षण लक्ष्मण को वैसे ही भेजिए जैसे वज्रधर इन्द्र शत्रु-नाश हेतु वज्र चलाता है।”

“हे मनुजश्रेष्ठ, शत्रु-वध में अब काल का विलम्ब उचित नहीं; आप शत्रु-वध हेतु लक्ष्मण को वैसे ही छोड़िए जैसे महेन्द्र दिविज-शत्रु के मन्थन हेतु वज्र छोड़ता है। यदि वह राक्षस-श्रेष्ठ कर्म समाप्त कर लेगा, तो रण में सुर-असुरों से भी अदृश्य हो जाएगा; कर्म पूरा करने पर युद्ध-इच्छुक उससे लड़ने में देवों को भी महान संशय होगा।”

समझने की कुंजी, निकुम्भिला का होम: इन्द्रजित का बल उसके निकुम्भिला-चैत्य में सम्पन्न होम पर टिका था: होम पूरा होने पर वह अदृश्य और देवों के लिए भी अजेय हो जाता। विभीषण का यह रहस्य ही इन्द्रजित-वध का एकमात्र मार्ग खोलता है: होम पूरा होने से पहले उस पर आक्रमण करना। यही कारण है कि लक्ष्मण को तुरन्त भेजने का परामर्श दिया जाता है।

सार: विभीषण का यह उद्घाटन इस अंक का निर्णायक मोड़ है: वे दो रहस्य खोलते हैं: मारी गई सीता असली नहीं, माया थी; और इन्द्रजित का बल निकुम्भिला-होम पर निर्भर है। शोक से उठाकर वे श्रीराम को कर्म की ओर मोड़ते हैं और लक्ष्मण को होम-विघ्न हेतु भेजने का परामर्श देते हैं, जो आगे इन्द्रजित-वध की भूमिका रचता है।

मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, युद्धकाण्ड, सर्ग 68-101; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।

आधार: वाल्मीकि रामायण (गीता प्रेस, गोरखपुर)