अध्याय 27 · इन्द्रजित्, लक्ष्मण-मूर्च्छा, संजीवनी

वाल्मीकि रामायण · युद्धकाण्ड
मेघनाद (इन्द्रजित्) का माया-युद्ध, नागपाश और ब्रह्मास्त्र से राम-लक्ष्मण का मूर्च्छित होना, गरुड़ का आना, और संजीवनी-औषधि लाने हनुमान का पर्वत उठा लाना।

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कुम्भकर्ण की मृत्यु का समाचार जब रावण तक पहुँचा, तो लंका का यह अंक एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ जहाँ रावण के घर के एक-एक स्तम्भ धराशायी होने लगे। रणभूमि में उपस्थित राक्षसों ने आकर राक्षसेन्द्र रावण से कहा कि श्रीराम ने कुम्भकर्ण को मार गिराया है। जो वीर वानर-सेना को तितर-बितर कर, वानरों को निगलकर, कुछ क्षण अपना पराक्रम दिखाकर यम (मृत्यु का देवता) के समान हो उठा था, वही कुम्भकर्ण अब काल के वश हो गया है। श्रीराम के बाणों से पीड़ित और उनके श्रेष्ठ बल से दबा हुआ वह पर्वत-सरीखा भाई अब बिना सिर और बिना अंगों का धड़ बनकर पड़ा है, मानो दावानल (वन की आग) से झुलसा वृक्ष हो। उसके धड़ का आधा भाग भयंकर दीखते समुद्र में डूबा है और नाक-कान कटे, रक्त बहाते सिर से लंका का मुख्य द्वार रुँधा पड़ा है। यह सुनकर शोक से संतप्त रावण मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।

रावण का विलाप और त्रिशिरा का आश्वासन

चाचा के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण के पुत्र देवान्तक और नरान्तक, तथा त्रिशिरा और अतिकाय भी फूट-फूटकर रोने लगे। रावण के सौतेले भाई महोदर और महापार्श्व भी शोक से अभिभूत हो उठे कि अक्लिष्टकर्मा (बिना थके कर्म करने वाले) श्रीराम ने उनके भाई को मार डाला। बड़ी कठिनाई से होश में आकर रावण विलाप करने लगा, उसकी इन्द्रियाँ व्याकुल थीं।

रावण बोला, “हाय वीर कुम्भकर्ण! आप शत्रुओं के दर्प को चूर करने वाले, असीम बल से युक्त थे। आप हमें छोड़कर दैव के कारण यमलोक चले गए! बन्धुओं के बल को बढ़ाकर, शत्रु-सेना को संताप देकर, हमारे पार्श्व से शल्य (काँटा) निकाले बिना ही, हमें त्यागकर अकेले कहाँ चले गए? जिस दाहिने भुजरूपी बल का आश्रय लेकर हमें किसी देव या असुर का भय नहीं था, वही बाहु अब गिर पड़ी है, तो निश्चय ही अब हम जीवित नहीं रहेंगे। जो कालाग्नि (प्रलयकाल की आग) के समान था, जिसे वज्र का प्रहार भी कभी हानि न पहुँचा सका, वह आज श्रीराम के बाणों से पीड़ित होकर धरती पर शाश्वत निद्रा में कैसे सोया पड़ा है? आकाश में स्थित देवगण और ऋषिगण आपको रण में मरा देखकर हर्ष से जयघोष कर रहे हैं।”

रावण ने आगे कहा, “अवसर पाकर अति-प्रसन्न वानर अब निश्चय ही आज ही लंका के उन दुर्गम द्वारों पर सब ओर से चढ़ आएँगे। कुम्भकर्ण के बिना अब हमें न राज्य से कोई प्रयोजन रहा, न सीता से। आपके बिना हमारी जीवित रहने में भी कोई रुचि नहीं। यदि हम युद्ध में अपने भाई के हन्ता राघव को न मारें, तो हमारे लिए मरण ही श्रेयस्कर है, यह व्यर्थ जीवन नहीं। आज ही हम उसी दिशा में जाएँगे जहाँ हमारा अनुज है; भाइयों को इस प्रकार भेजकर हम क्षण भर भी जीने का साहस नहीं रखते। आपके मारे जाने पर हम इन्द्र को कैसे जीतेंगे? जिन देवों के साथ हमने पूर्व में अपराध किया, वे ही हमें देखकर अब हँसेंगे।”

रावण ने स्वीकार किया, “विभीषण का जो शुभ वचन था, अज्ञानवश हमने उस महात्मा का वह वचन न माना। यही विपत्ति अब हम पर आ पड़ी। जब से कुम्भकर्ण और प्रहस्त का क्रूर अन्त हुआ, विभीषण का परामर्श हमें लज्जित कर रहा है। हमने ही उस धार्मिक और श्रीमान विभीषण को निकाल बाहर किया, उसी कर्म का यह शोकजनक कटु फल हम भोग रहे हैं।” इस प्रकार अनेक प्रकार से अति करुण विलाप करके, अपने अनुज (इन्द्र के शत्रु) कुम्भकर्ण को मारा गया जानकर, व्याकुल अन्तरात्मा वाला दशानन भीषण पीड़ा से गिर पड़ा।

सार: कुम्भकर्ण-वध से टूटा रावण इस अंक में पहली बार अपनी पराजय का आभास पाता है। उसका विलाप केवल भाई का शोक नहीं, अपने अहंकार और विभीषण-तिरस्कार की स्वीकारोक्ति भी है। वाल्मीकि यहाँ रावण को मनुष्य-सरीखी दुर्बलता में दिखाते हैं, जो आगे आने वाले विनाश की भूमिका रचता है।

रावण-पुत्रों का प्रस्थान और अंगद के हाथों नरान्तक की मृत्यु

शोक से अभिभूत रावण का यह विलाप सुनकर त्रिशिरा (उसका एक पुत्र) बोला, “पिताजी, यह सच है कि महावीर्यवान कुम्भकर्ण मारे गए हैं। पर सत्पुरुष आपकी भाँति विलाप नहीं करते। आप तो तीनों लोकों को जीतने में समर्थ हैं, फिर साधारण मनुष्य की तरह अपने को इस प्रकार शोक से क्यों अभिभूत करते हैं? ब्रह्मा की दी हुई शक्ति, कवच, बाण, धनुष, और सहस्र खरों (गधों) से युक्त मेघ-सी गर्जना करने वाला रथ अब भी आपके पास है। आपने एक ही अस्त्र से कई बार देव-दानवों का संहार किया है, अतः समस्त अस्त्रों से सुसज्जित होकर आप राम का दण्ड दे सकते हैं। महाराज, आप चाहें तो लंका में ही ठहरें, हम रण में निकलकर आपके शत्रुओं को वैसे ही उखाड़ फेंकेंगे जैसे गरुड़ सर्पों को उखाड़ता है। आज मेरे हाथ रण में मारा गया राम वैसे ही गिरेगा जैसे इन्द्र के हाथ शम्बर और विष्णु के हाथ नरक (एक दानव) गिरा था।”

एक उप-कथा: यहाँ जिस नरक का उल्लेख है, वह दानव विप्रचित्ति का सिंहिका से उत्पन्न पुत्र था; उसके छह भाई थे: वातापि, नमुचि, इल्वल, सूमर, अन्धक और कालनाभ। यह नरक उस भौमासुर (पृथ्वी-पुत्र नरकासुर) से भिन्न है जो द्वापर युग में श्रीकृष्ण के हाथ मारा गया; वह तो रावण के जीवनकाल में जन्मा ही न था।

त्रिशिरा का यह आश्वासन सुनकर रावण काल से प्रेरित होकर अपने को नवजात-सा मानने लगा। त्रिशिरा का वचन सुनकर देवान्तक, नरान्तक और तेजस्वी अतिकाय, सब युद्ध के लिए हर्षित हो उठे। “मैं आगे! मैं आगे!” इस प्रकार गर्जते हुए शक्र (इन्द्र) के समान पराक्रमी रावण के वीर पुत्र खड़े हो गए। वे सब आकाशगामी थे, माया में निपुण, देवों के दर्प को चूर करने वाले और रण में दुर्धर्ष। रावण उन पुत्रों से वैसे ही सुशोभित हुआ जैसे अमरों से घिरा इन्द्र। पुत्रों को आलिंगन कर, आभूषणों से सज्जित कर और शुभ आशीर्वाद देकर उसने उन्हें रण के लिए भेजा। राजकुमारों की रक्षा के लिए उसने अपने दो भाइयों, युद्धोन्मत्त (महापार्श्व) और मत्त (महोदर) को भी भेजा।

राक्षस योद्धा हाथी, रथ और घोड़े पर सवार होकर लंका के जलते द्वार से युद्ध के लिए निकलते हैं।

महोदर ऐरावत-कुल में उत्पन्न नील-मेघ-सरीखे सुदर्शन नामक हाथी पर सवार हुआ। त्रिशिरा उत्तम घोड़ों से जुते रथ पर चढ़ा। अतिकाय, जो सब धनुर्धरों में श्रेष्ठ था, उत्तम चक्रों, अच्छे अनुकर्ष (धुरों) और सुदृढ़ कूबर (जुए के दण्ड) वाले श्रेष्ठ रथ पर चढ़ा, जो तरकशों, धनुषों, भालों, तलवारों और परिघों से युक्त था। देवान्तक ने स्वर्ण-जड़ित परिघ (लोहे की गदा) उठाया; तीन किरीटों से त्रिशिरा तीन सुवर्ण-शिखरों वाले हिमालय की तरह शोभित हुआ। नरान्तक उच्चैःश्रवा-सरीखे श्वेत, स्वर्ण-भूषित और मन के समान वेग वाले घोड़े पर चढ़ा और उल्का-सी चमकती प्रास (भाला) लेकर मयूर पर बैठे कार्तिकेय-सा शोभित हुआ। महापार्श्व गदा-पाणि होकर कुबेर-सा चमका। ये महात्मा अमरावती से देवों के समान निकले।

नैऋतों (राक्षसों) में ये छह रत्न, दस औषधियों और सुगन्ध-द्रव्यों से अपने अंगों को लेपकर, युद्ध की इच्छा से निकले। शत्रु-सेना ने उन्हें आते देखा, जो हाथी-घोड़े-रथों से भरी, सैकड़ों घण्टियों से शब्दायमान, नील-मेघ-सी और महान अस्त्र उठाए हुई थी। दोनों सेनाओं में घोर युद्ध छिड़ गया: वानर वृक्ष-शिला उठाकर, राक्षस तीक्ष्ण बाण और शूल-मुद्गरखड्ग चलाते हुए, एक-दूसरे को पटकते रहे; मुहूर्त भर में भूमि रक्त से सिंच गई और पर्वत-सरीखे राक्षसों के टुकड़े बिखर गए।

छत्रधारी राक्षस योद्धा रथ से लंबा भाला चलाकर वानरों को बेधता है, चारों ओर शव बिखरे पड़े हैं।

तभी मारुत-सरीखे वेग वाले घोड़े पर चढ़कर, तीक्ष्ण शक्ति (भाला) लेकर नरान्तक उस भयंकर वानर-सेना में वैसे घुस गया जैसे मछली महासागर में। उस वीर ने अकेले अपने दीप्त भाले से सात सौ वानरों को बेध डाला; क्षण भर में उसने वानर-चूड़ामणियों की सेना का संहार कर डाला। विद्याधर और महर्षि उस घोड़े पर बैठे महात्मा को वानर-दल में विचरते देखते रहे। उसका रास्ता माँस-रक्त के कीचड़ से भरा और पर्वत-सरीखे गिरे वानरों से ढका दीखता था। दीप्त उल्का-सरीखे भाले से वह वर्षाकाल की वायु-सा सब ओर वानरों को कुचलता रहा। वीर वानर न भाग सके, न खड़े रह सके, न भय से हिल सके।

जो श्रेष्ठ वानर पहले कुम्भकर्ण के मारे गिर पड़े थे, वे अब स्वस्थ होकर सुग्रीव के पास पहुँचे। सुग्रीव ने चारों ओर देखा तो वानर-सेना नरान्तक के भय से इधर-उधर भागती दीखी। सेना को भागते और नरान्तक को भाला उठाए घोड़े पर आता देखकर, महातेजस्वी वानराधिप सुग्रीव ने शक्र-तुल्य पराक्रमी कुमार अंगद से कहा, “जाओ, जो वीर राक्षस वानर-बल को आतंकित करता हुआ घोड़े पर सवार है, उसे शीघ्र प्राणों से वियुक्त कर दो।” स्वामी का वचन सुनकर अंगद वैसे ही निकल पड़ा जैसे मेघ-सी सेना से सूर्य निकलता है। स्वर्ण के अंगदों (बाजूबन्दों) से सजा अंगद धातु-शिराओं वाले पर्वत-सा चमका।

अंगद ने नरान्तक के पास जाकर कहा, यद्यपि वह नख-दन्तों के सिवा निरायुध था, “ठहरिए! इन साधारण वानरों से क्या करेंगे? अपना वज्र-सा भाला मेरी इस छाती पर चलाइए।” अंगद का यह वचन सुनकर नरान्तक क्रोध से दाँतों से ओठ चबाता, सर्प-सा फुफकारता उसके सामने आ खड़ा हुआ। उसने दीप्त भाला घुमाकर अंगद पर फेंका, पर वह वज्र-कठोर छाती से टकराकर टूट गया और भूमि पर गिर पड़ा। गरुड़ से कटे सर्प-शरीर सा टूटा वह भाला देखकर वालि-पुत्र अंगद ने हथेली उठाकर नरान्तक के घोड़े के सिर पर ऐसा प्रहार किया कि घोड़े के पैर धरती में धँस गए, आँखें फूट गईं, जीभ बाहर निकल आई और कपाल फटकर वह पर्वत-सा घोड़ा गिर पड़ा। घोड़े को मरा देख क्रुद्ध नरान्तक ने मुष्टि उठाकर अंगद के सिर पर प्रहार किया।

एक वानर वीर जलता भाला थामे घोड़े पर सवार राक्षस की छाती पर मुष्टिका का प्रहार करता है।

मुष्टि-प्रहार से अंगद का कपाल फट गया, उससे अत्यन्त गरम रक्त बहने लगा; उसे दाह हुआ, वह बार-बार मूर्च्छित हुआ और होश में आकर विस्मित हो उठा। फिर गिरि-शिखर-सी मुष्टि बाँधकर महात्मा वालि-पुत्र ने उसे मृत्यु-वेग से नरान्तक की छाती पर मारा। मुष्टि-प्रहार से उसकी छाती फट गई और धँस गई; वह ज्वालामय रक्त वमन करता वज्र से टूटे पर्वत-सा गिर पड़ा। जब अग्र-वीर्यवान नरान्तक वालि-पुत्र के हाथ मारा गया, तो आकाश में देवों और रणभूमि में वानरों का महान हर्ष-निनाद गूँज उठा। अंगद ने यह अति-दुष्कर पराक्रम किया जिसने श्रीराम के मन को भी हर्ष से भर दिया, और वे भी विस्मित हो गए; भीमकर्मा अंगद फिर युद्ध के लिए हर्षित हो उठा।

सार: रावण का पूरा कुल, पुत्र और भाई, एक साथ रण में उतरता है, मानो अन्तिम दाँव लगाया जा रहा हो। नरान्तक का सात सौ वानरों को अकेले मार गिराना और फिर बालि-पुत्र अंगद के एक मुष्टि-प्रहार से ढह जाना दिखाता है कि वाल्मीकि के युद्ध में अहंकार और पराक्रम कितनी जल्दी पलट जाते हैं।

देवान्तक, त्रिशिरा, महोदर और महापार्श्व का वध

नरान्तक को मारा गया देखकर देवान्तक, त्रिशिरा और महोदर, ये तीनों राक्षस-श्रेष्ठ चीख उठे। मेघ-सरीखे हाथी पर चढ़ा वेगवान महोदर महावीर्य अंगद की ओर झपटा। भाई नरान्तक के पतन से संतप्त बलवान देवान्तक घोर परिघ लेकर अंगद की ओर दौड़ा, और सूर्य-सरीखे रथ पर चढ़कर वीर त्रिशिरा भी उसकी ओर बढ़ा। तीनों राक्षसेन्द्रों से एक साथ घिरा अंगद एक महान वृक्ष उखाड़ लाया और देवान्तक पर वैसे फेंका जैसे इन्द्र दीप्त वज्र फेंकता है। त्रिशिरा ने आशीविष-सर्प-सरीखे बाणों से उस वृक्ष को काट डाला; वृक्ष कटा देख अंगद उछल पड़ा।

अंगद ने वृक्ष और शिलाओं की वर्षा की, त्रिशिरा ने तीक्ष्ण बाणों से उन्हें काट दिया, महोदर ने परिघ-अग्र से तोड़ डाला, और त्रिशिरा बाणों से अंगद पर टूट पड़ा। महोदर ने हाथी पर चढ़कर वज्र-सरीखी गदाओं से अंगद की छाती पर प्रहार किया; देवान्तक ने परिघ से मारकर तुरन्त पीछे हट गया। तीनों के एक साथ आक्रमण से भी महातेजस्वी वालि-पुत्र किंचित विचलित न हुआ। उसने महावेग दिखाकर हथेली से महोदर के विशाल हाथी पर प्रहार किया जिससे उस गजराज की आँखें गिर गईं और वह नष्ट हो गया। फिर हाथी का दाँत उखाड़कर अंगद ने देवान्तक पर प्रहार किया; वह वायु-कम्पित वृक्ष-सा डगमगाकर लाक्षारस-वर्ण रक्त बहाने लगा।

कठिनाई से साँस लेकर बलवान देवान्तक ने परिघ घुमाकर अंगद पर प्रहार किया; परिघ-आहत वालि-पुत्र घुटनों के बल गिरकर फिर उठ खड़ा हुआ। उछलते अंगद को त्रिशिरा ने तीन भयंकर सीधे बाणों से ललाट पर बेधा। अंगद को तीन राक्षसों से घिरा देख हनुमान और नील भी सहायता को निकल पड़े। नील ने त्रिशिरा पर शिलाग्र फेंका, पर बुद्धिमान रावण-पुत्र ने उसे तीक्ष्ण बाणों से चूर कर दिया, जिससे वह शिखर अग्नि-कण और ज्वाला छोड़ता गिर पड़ा। त्रिशिरा का यह कौशल देख हर्षित बलवान देवान्तक परिघ लेकर मारुति (हनुमान) की ओर दौड़ा। हनुमान ने उछलकर देवान्तक के सिर पर वज्र-सरीखी मुष्टि का प्रहार किया, फिर दूसरा प्रहार किया और गर्जना से राक्षसों को कँपा दिया। मुष्टि से कुचला कपाल, बाहर निकले दाँत-आँख और लटकती जीभ वाला देवान्तक तुरन्त मरकर भूमि पर गिर पड़ा।

देवशत्रु देवान्तक के मारे जाने पर क्रुद्ध त्रिशिरा ने नील की छाती पर तीक्ष्ण बाणों की भयंकर वर्षा की। उधर क्रुद्ध महोदर फिर मन्दर-सी आरूढ़ता से पर्वत-सरीखे हाथी पर चढ़कर नील पर बाणों की झड़ी लगाने लगा। बाणों से बिंधा, अंग-अंग पीड़ित सेनापति नील महाबली महोदर से शक्तिहीन-सा हो गया। फिर होश में आकर वायु-सूनु नील ने वृक्षखण्ड सहित एक शिखर उखाड़कर उछलकर महोदर के सिर पर प्रहार किया; उस महागज के साथ कुचला हुआ, मूर्च्छित महोदर वज्र से टूटे पर्वत-सा भूमि पर मर गिरा।

चाचा महोदर को मरा देख त्रिशिरा ने धनुष उठाकर हनुमान को तीक्ष्ण बाणों से बेधा। हनुमान ने पहले व्यर्थ शिखर फेंका, फिर वृक्ष-वर्षा की, पर प्रतापी त्रिशिरा ने उन्हें भी काट डाला। तब हनुमान ने उछलकर सिंह-सा त्रिशिरा के घोड़े को नखों से चीर डाला। त्रिशिरा ने कालरात्रि-सी शक्ति (भाला) उठाकर हनुमान पर फेंकी; हरि-शार्दूल हनुमान ने आकाश में उल्का-सी आती उस अबाधित शक्ति को पकड़कर तोड़ डाला और गर्जना की। यह देख वानर-दल मेघ-सा गरज उठे। फिर त्रिशिरा ने खड्ग उठाकर हनुमान की छाती पर मारा; घायल वीर हनुमान ने हथेली से त्रिशिरा की छाती पर प्रहार किया जिससे वह तेजस्वी राक्षस अस्त्र छोड़ता मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।

हनुमान एक हाथ में राक्षस का कटा सिर थामे खड़े हैं, तीन मुकुटधारी सिर रक्त बिखेरते उड़ते हैं।

गिरते त्रिशिरा का खड्ग छीनकर पर्वत-सरीखे हनुमान ने गर्जना कर सब राक्षसों को त्रास दिया। यह सुनकर त्रिशिरा उठ बैठा और मुष्टि से हनुमान को मारा। उस प्रहार से कुपित होकर हनुमान ने किरीटधारी राक्षस-श्रेष्ठ के सिर पकड़ लिए, और जैसे इन्द्र ने त्वष्टा-पुत्र विश्वरूप के तीन सिर काटे थे, वैसे ही तीक्ष्ण खड्ग से कुण्डल-किरीट युक्त त्रिशिरा के तीनों सिर काट डाले। दीप्त-अग्नि-सी आँखों वाले, शिला-सरीखे वे सिर सूर्य-मार्ग से छूटे तारों-से भूमि पर गिर पड़े। शक्र-पराक्रमी हनुमान ने जब उस देवशत्रु को मारा, तो वानर गरज उठे, धरती काँप उठी और राक्षस चारों ओर भाग खड़े हुए।

त्रिशिरा और महोदर को मरा, तथा दुराधर्ष देवान्तक-नरान्तक को नष्ट देखकर परम क्रोधी मत्त (महापार्श्व), राक्षस-श्रेष्ठ, कुपित हो उठा और उसने पूरी लोहे की, स्वर्ण-मढ़ी, दीप्त, माँस-रक्त-फेन से सनी, शत्रु-रक्त से तृप्त, रक्तमालाओं से सजी, ऐरावत-महापद्म-सार्वभौम (दिग्गजों) को भयभीत करने वाली विशाल गदा उठाई और युगान्त-अग्नि-सा जलता हुआ वानरों पर टूट पड़ा। ऋषभ नामक वानर उछलकर रावण के अनुज मत्तानीक (महापार्श्व) के सामने आ खड़ा हुआ। क्रुद्ध राक्षस ने पर्वत-सरीखे उस वानर की छाती पर वज्र-कठोर गदा से प्रहार किया; भिन्न-वक्ष ऋषभ बहुत रक्त बहाने लगा।

हनुमान रणभूमि में गिराए गए राक्षस योद्धा की छाती चीर डालते हैं, पीछे वानर गदाएँ उठाए गरजते हैं।

बहुत देर बाद होश में आकर, कुपित और ओठ फड़काता ऋषभ महापार्श्व की ओर देखने लगा। वेगवान वानर-वीर-मुख्य ने झपटकर मुष्टि बाँधी और राक्षस की छाती (दोनों बाहुओं के बीच) पर प्रहार किया; जड़ से कटे वृक्ष-सा वह राक्षस रक्त में नहाकर गिर पड़ा। ऋषभ ने उसकी यमदण्ड-सी घोर गदा झपटकर गर्जना की। महापार्श्व मुहूर्त भर मृत-सा पड़ा रहा, फिर प्राण लौटने पर सन्ध्या-मेघ-वर्ण वह असुर उछलकर ऋषभ पर प्रहार कर बैठा। ऋषभ मूर्च्छित होकर गिरा, पर मुहूर्त में उठकर उसी पर्वत-शिखर-सी गदा को घुमाकर रण में महापार्श्व पर प्रहार किया। उस घोर गदा ने उसका वक्ष फाड़ डाला, और हिमालय-सा वह बहुत रक्त बहाने लगा।

फिर ऋषभ ने वेग से महापार्श्व की गदा झपटी और उसी भयंकर गदा को बार-बार घुमाकर रण के अग्रभाग में मत्तानीक पर प्रहार किया; अपनी ही गदा से चूर हुआ, दाँत-आँख गिरे हुए मत्त (महापार्श्व) वज्र-हत पर्वत-सा गिर पड़ा। उस राक्षस के मरने पर रावण की समुद्र-सी सेना अस्त्र फेंककर तट तोड़े समुद्र की भाँति प्राण बचाने भागी।

सार: एक ही सर्ग में रावण के छह योद्धा, चार पुत्र-भतीजे और दो भाई, काल के गाल में समा जाते हैं। यहाँ हनुमान, नील, अंगद और ऋषभ बारी-बारी से अपने पराक्रम का परिचय देते हैं। विश्वरूप के सिर काटने वाले इन्द्र से हनुमान की तुलना वाल्मीकि का संकेत है कि यह केवल बल नहीं, धर्म-स्थापना का देवकार्य है।

अतिकाय का घोर युद्ध और लक्ष्मण के हाथों उसका वध

स्वर्ण आभा से घिरा इंद्रजित उड़ते रथ से बाणों की वर्षा करता है, नीचे वानर सेना व्याकुल होती है।

अपनी सेना को व्यथित और भाइयों को इन्द्र-तुल्य पराक्रमी होते हुए भी मारा गया देखकर, तथा चाचा युद्धोन्मत्त (महोदर) और मत्त (महापार्श्व) को रण में गिरा देखकर, पर्वत-सरीखा अतिकाय, जिसे ब्रह्मा ने अवध्यता का वर दिया था, महाक्रोध में आ गया। सहस्र सूर्यों के समान दीप्त रथ पर चढ़कर वह वानरों की ओर दौड़ा। किरीट और चमकते कुण्डल पहने अतिकाय ने धनुष चढ़ाकर अपना नाम उद्घोषित किया और महान गर्जना की। उस सिंहनाद, नाम-घोष और भयंकर ज्या-शब्द से वानर त्रस्त हो उठे। उसके विशाल शरीर को देखकर सब सोचने लगे कि क्या यह कुम्भकर्ण फिर जी उठा! त्रिविक्रम के समय विष्णु के रूप-सा उसका विशाल रूप देखकर वानर भाग खड़े हुए और शरण-दाता श्रीराम के पास पहुँचे।

तब काकुत्स्थ श्रीराम ने दूर से ही पर्वत-सरीखे, धनुषधारी, मेघ-सी गर्जना करते अतिकाय को देखा। विस्मित होकर वानरों को आश्वस्त करते हुए श्रीराम ने विभीषण से पूछा, “सहस्र घोड़ों से जुते विशाल रथ पर बैठा, सिंह-सा नेत्रों वाला, परिघ-शूल-प्रास-तोमरों के बीच महेश्वर-सा शोभित यह पर्वत-सरीखा धनुर्धर कौन है? जिसके रथ पर राहु का चिह्न है, जो सूर्य-किरण-सी आभा वाले बाणों से दसों दिशाओं को आलोकित कर रहा है, जिसका इन्द्रधनुष-सा स्वर्ण-पृष्ठ धनुष मेघ-गर्जना सी ध्वनि करता है? बीस तरकश, दस धनुष, आठ ज्याएँ उसके रथ पर रखी हैं। हे महाबाहु, इस राक्षस-श्रेष्ठ का परिचय दीजिए, जिसे देखकर सब वानर भयभीत होकर भाग गए।”

अमित-तेजस्वी राजपुत्र राम के पूछने पर महातेजस्वी विभीषण ने उत्तर दिया, “दस सिर वाला, कुबेर का अनुज, विश्रवा का पुत्र, भीमकर्मा राक्षसेश्वर रावण प्रसिद्ध है। उसका एक वीर्यवान पुत्र हुआ, बल में रावण-तुल्य, वृद्ध-सेवी, श्रुति-धर और समस्त अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ। यह अश्व-गज-सवारी, खड्ग-धनुष-संचालन, भेद-साम-दान, नीति और मन्त्र में अति-सम्मानित है। जिसकी भुजा के आश्रय लंका निर्भय रहती है, यह धान्यमालिनी (रावण की अन्य रानी) का पुत्र अतिकाय है। इसने तप से ब्रह्मा को प्रसन्न कर अस्त्र प्राप्त किए और शत्रुओं को जीता; ब्रह्मा ने इसे देव-असुरों से अवध्यता, यह दिव्य कवच और सूर्य-सा दीप्त रथ दिया। इसी ने इन्द्र के वज्र को बाणों से रोका और वरुण के पाश को विफल किया। हे पुरुषश्रेष्ठ, इससे पहले कि यह वानर-सेना का संहार कर डाले, इस पर शीघ्र यत्न कीजिए।”

तब बलवान अतिकाय वानर-सेना में घुसकर बार-बार धनुष टंकारता गरजने लगा। उसे देख कुमुद, द्विविद, मैन्द, नील और शरभ, ये प्रधान वानर एक साथ वृक्ष और शिखर लेकर उस पर टूट पड़े। अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ अतिकाय ने स्वर्ण-भूषित बाणों से उन सब वृक्ष-शिलाओं को काट डाला और सामने आए वानरों को लोहमय बाणों से बेध डाला। बाण-वर्षा से पीड़ित, अंग-भग्न वानर उस महायुद्ध में अतिकाय का सामना न कर सके। वह राक्षस वैसे ही वानर-सेना को त्रस्त करने लगा जैसे यौवन-मद से उन्मत्त सिंह मृग-यूथ को।

चाँदनी रात में लक्ष्मण धनुष पर बाण चढ़ाए अट्टहास करते विशाल राक्षस योद्धा के सम्मुख खड़े हैं।

जो लड़ नहीं रहा था, उस पर राक्षसेन्द्र अतिकाय प्रहार नहीं करता था। श्रीराम की ओर बढ़कर धनुष-तरकश धारी उसने गर्वोक्ति की, “मैं रथ पर बाण-धनुष लिए बैठा हूँ, किसी साधारण योद्धा से नहीं लड़ता। जिसमें शक्ति और उत्साह हो, वही आज मुझसे युद्ध करे।” यह सुनकर शत्रुहन्ता लक्ष्मण (सुमित्रा-पुत्र) क्रोध से उछलकर तरकश से बाण खींच, अतिकाय के सामने अपना विशाल धनुष आकर्ण खींचने लगे। लक्ष्मण की भयंकर ज्या-ध्वनि समस्त पृथ्वी, आकाश, समुद्र और दिशाओं को भरकर रात्रिचरों को त्रास देने लगी।

उग्र ज्या-घोष सुनकर बलवान राक्षसेन्द्र-पुत्र विस्मित हुआ। लक्ष्मण को उद्यत देख तीक्ष्ण बाण लेकर अतिकाय बोला, “हे सौमित्र, आप अभी बालक हैं, पराक्रम में अनिपुण। जाइए! काल-सरीखे मुझसे क्यों युद्ध करना चाहते हैं? मेरी भुजा से छूटे बाणों के वेग को न हिमालय, न आकाश, न पृथ्वी सह सकती है। सुख से सोई कालाग्नि को क्यों जगाना चाहते हैं? धनुष छोड़कर लौट जाइए, मेरे पास आकर प्राण न खोइए।” लक्ष्मण ने कहा, “केवल वचन से आप प्रधान नहीं बनते, न डींग हाँकने से सत्पुरुष होते हैं। मैं धनुष-बाण लिए सामने खड़ा हूँ, हे दुरात्मन, अपना बल दिखाइए। कर्म से अपना परिचय दीजिए, आत्म-प्रशंसा न कीजिए। मैं अपने तीक्ष्ण बाणों से आपका सिर वैसे ही गिराऊँगा जैसे वायु काल-पक्व ताल-फल को वृन्त से गिराती है।”

अतिकाय ने क्रुद्ध होकर एक बाण लक्ष्मण की ओर छोड़ा, मानो आकाश को समेट रहा हो; लक्ष्मण ने अर्धचन्द्र-बाण से उसे काट डाला। फिर अतिकाय ने पाँच बाण छोड़े, लक्ष्मण ने उन्हें मार्ग में ही काट दिया और एक तेजस्वी बाण से अतिकाय के ललाट पर प्रहार किया, जिससे रक्त-रंजित वह बाण पर्वत से चिपके नागराज-सा दीखने लगा। आहत अतिकाय रुद्र-बाण से टकराए त्रिपुर-द्वार-सा काँप उठा। होश सँभालकर उसने कहा, “अच्छा बाण चलाया! आप मेरे प्रशंसनीय शत्रु हैं।” फिर एक, तीन, पाँच और सात बाण छोड़े; पर राघव-अनुज ने उन्हें भी काट दिया।

क्रुद्ध अतिकाय ने एक सर्प-सरीखा बाण छोड़कर लक्ष्मण को छाती में बेधा; मद-झरते हाथी-से वे रक्त बहाने लगे। फिर लक्ष्मण ने स्वयं को निःशल्य कर, बाण को आग्नेय अस्त्र से अभिमन्त्रित किया, जो ज्वाला छोड़ने लगा। अतिकाय ने रौद्र अस्त्र चलाया; दोनों बाण आकाश में टकराकर भस्म हो भूमि पर गिर पड़े। फिर अतिकाय ने त्वाष्ट्र अस्त्र चलाया, लक्ष्मण ने ऐन्द्र अस्त्र से काटा; अतिकाय ने याम्य, लक्ष्मण ने वायव्य से। तब लक्ष्मण ने अतिकाय पर बाण-धाराओं की वर्षा की, पर वज्र-जड़ित कवच से टकराकर बाण गिर पड़े। फिर सहस्र बाण छोड़े, तो भी अवध्य-कवच वाला अतिकाय व्यथित न हुआ।

लक्ष्मण का ज्योतिर्मय बाण राक्षस योद्धा का मुकुटधारी सिर धड़ से अलग करता है, नीचे हनुमान देखते हैं।

तब वायुदेव ने पास आकर कहा, “इसे ब्रह्मा का वर है और यह अवध्य कवच पहने है; इसे ब्राह्म अस्त्र से बेधो, अन्यथा यह नहीं मरेगा; अन्य अस्त्रों से यह कवचधारी बलवान अवध्य है।” वायु का वचन सुनकर इन्द्र-तुल्य पराक्रमी लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित उग्र-वेग बाण धनुष पर चढ़ाया; तब दिशाएँ, चन्द्र-सूर्य, महाग्रह और आकाश काँप उठे, पृथ्वी कराह उठी। यमदूत-सरीखा वह बाण लक्ष्मण ने राक्षस पर छोड़ा। अतिकाय ने उसे आते देख शक्ति-ऋष्टि-गदा-कुठार-शूल-बाणों से रोकना चाहा, पर वे सब अद्भुत आयुध व्यर्थ कर देता हुआ वह अग्नि-दीप्त बाण किरीट-युक्त अतिकाय का सिर ले उड़ा। किरीट सहित वह सिर हिमालय-शिखर-सा भूमि पर गिर पड़ा।

राजकुमार को गिरा देख शेष बचे रात्रिचर व्यथित और विषण्ण हो उठे, ऊँचे स्वर से विकट चीत्कार करने लगे। नायक के मारे जाने पर निरपेक्ष राक्षस भयभीत होकर लंका की ओर भाग चले। प्रफुल्ल-कमल-सरीखे मुख वाले अनेक वानरों ने विजय दिलाने वाले लक्ष्मण की पूजा की; अति-बलवान, मेघ-सरीखे, दुरासद अतिकाय को मारकर हर्षित लक्ष्मण शीघ्र श्रीराम के पास लौट आए।

समझने की कुंजी, अवध्यता और ब्रह्मास्त्र: अतिकाय को ब्रह्मा का अवध्य-कवच प्राप्त था, इसलिए साधारण अस्त्र, यहाँ तक कि सहस्र बाण भी निष्फल रहे। वाल्मीकि में बार-बार यही सिद्धान्त आता है: विशिष्ट वर का तोड़ केवल विशिष्ट दिव्यास्त्र है। ब्रह्मा-प्रदत्त कवच को ब्रह्मास्त्र ही भेद सकता था, और वायुदेव का संकेत ही लक्ष्मण को यह रहस्य बताता है।

सार: अतिकाय रावण का वह पुत्र है जिसकी बौद्धिक-शास्त्रीय श्रेष्ठता विभीषण के मुख से ही स्थापित होती है: वह केवल बलवान ही नहीं, वेद-शास्त्र-नीति में निपुण है। उसका वध इस अंक का पहला बड़ा द्वन्द्व-युद्ध है, और लक्ष्मण का ब्रह्मास्त्र-प्रयोग आगे इन्द्रजित-वध की भूमिका रचता है।

रावण की चिन्ता और लंका-रक्षा का आदेश

महात्मा लक्ष्मण के हाथ अतिकाय का वध सुनकर रावण उद्विग्न हो उठा और बोला, “धूम्राक्ष, जो परम असहिष्णु था, और अकम्पन, जो समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ था, तथा प्रहस्त और कुम्भकर्ण, ये महाबली, युद्ध-कांक्षी, शत्रुओं से सदा अपराजित वीर, अपनी सेनाओं सहित, अक्लिष्टकर्मा राम के हाथ मारे गए। और भी अनेक शूर महात्मा गिरा दिए गए। मेरे प्रसिद्ध-बल-वीर्य पुत्र इन्द्रजित ने उन दोनों भाइयों, राम और लक्ष्मण, को घोर वरदान-प्राप्त बाणों से बाँध दिया था, जिस बन्धन को समस्त देव, महाबली असुर, यक्षगन्धर्व-नाग भी न खोल सकते थे; फिर भी किसी प्रभाव, माया या मोहन से वे मुक्त हो गए, जो मैं नहीं जानता।”

रावण ने आगे कहा, “मेरे आदेश से निकले सब शूर राक्षस अति-बलवान वानरों के हाथ मारे गए। मुझे ऐसा कोई योद्धा नहीं दीखता जो आज सेना और विभीषण-सुग्रीव-सहित राम-लक्ष्मण का संहार कर सके। अहो! राम का बल और अस्त्र-बल बड़ा महान है, जिसके पराक्रम के सामने आकर राक्षस मारे गए। मैं उस वीर राघव को निरामय नारायण ही मानता हूँ। उसी के भय से लंका के द्वार-तोरण बन्द रहते हैं। अतः जो आप विनाश से बच गए हैं, सदा सतर्क रहकर इस लंका-नगरी की, और विशेषकर उस अशोक-वाटिका की, जहाँ सीता रखी हैं, गुल्मों (चौकियों) सहित रक्षा करो। नगरी और वाटिका में हर निर्गम-प्रवेश सदा हमें ज्ञात रहना चाहिए।”

“जहाँ-जहाँ गुल्म हो, वहाँ-वहाँ बार-बार निर्गम-प्रवेश की जाँच हो; अपनी-अपनी सेनाओं से घिरे सब ओर डटे रहो। हे रात्रिचरो, प्रदोष, अर्धरात्रि या प्रत्यूष, हर समय वानरों की चाल पर दृष्टि रखो। वानरों की कभी अवज्ञा न करना; निरन्तर देखते रहना कि शत्रु-सेना उद्यत है, आगे बढ़ रही है, या जहाँ-की-तहाँ खड़ी है।” यह आदेश सुनकर महाबली राक्षसों ने उसका तुरन्त पूरा पालन किया। सबको आदेश देकर रावण मन्यु (क्रोध) रूपी शल्य अपने हृदय में लिए, दीन होकर अपने महल में घुस गया, और पुत्र अतिकाय के विनाश का चिन्तन करता बार-बार लम्बी साँसें भरने लगा।

सार: यहाँ रावण के मुख से ही वाल्मीकि एक गूढ़ संकेत देते हैं: रावण राम को “निरामय नारायण” मानने लगता है। यह स्वीकारोक्ति उसके भीतर के भय और राम की दिव्यता दोनों को उजागर करती है। साथ ही वह सीता की रक्षा कड़ी करता है, जो आगे इन्द्रजित की माया-सीता वाली घटना की पृष्ठभूमि बनती है।

इन्द्रजित का अदृश्य माया-युद्ध और राम-लक्ष्मण का बँध जाना

शोकमग्न दस-मुख रावण के दरबार में इंद्रजित मुट्ठी उठाकर प्रतिज्ञा करता है, आगे विशाल योद्धा का शव पड़ा है।

शेष बचे राक्षसों ने रावण को देवान्तक, त्रिशिरा, अतिकाय आदि राक्षस-श्रेष्ठों के वध का समाचार दिया। यह सुनकर राजा की आँखें अश्रुओं से भर गईं। पुत्रों के क्षय और भाइयों के घोर वध का चिन्तन करता वह अत्यन्त विचारमग्न हो गया। शोक-सागर में डूबे दीन राजा को देखकर रथश्रेष्ठ राक्षसराज-पुत्र इन्द्रजित बोला, “पिताजी, जब तक इन्द्रजित जीवित है, आप मोह को न प्राप्त हों; इन्द्र के शत्रु (मेरे) बाणों से आहत होकर कोई रण में प्राण नहीं बचा सकता। आज ही राम-लक्ष्मण को मेरे बाणों से बिंधा, छिन्न-शरीर, गत-प्राण, भूमि पर सोया देखिए।”

“मेरी यह सुनिश्चित, पुरुषार्थ और दैव से युक्त प्रतिज्ञा सुनिए: आज ही मैं राम और लक्ष्मण को अमोघ बाणों से अभिभूत कर दूँगा। आज इन्द्र, यम, विष्णु, रुद्र, साध्यगण, अग्नि, चन्द्र और सूर्य मेरा अप्रमेय पराक्रम वैसे ही देखेंगे जैसे बलि-यज्ञ-वाट में विष्णु का उग्र पराक्रम देखा था।” यह कहकर, राजा से विदा लेकर, अदीन-सत्त्व इन्द्रजित वायु-तुल्य वेग वाले, खरश्रेष्ठों (गधों) से जुते रथ पर चढ़ा। उसके पीछे अनेक महाबली राक्षस, श्रेष्ठ धनुष लिए, हर्षित, चल पड़े। कुछ हाथियों पर, कुछ श्रेष्ठ घोड़ों पर, तो कुछ बाघ-वृश्चिक-बिलाव-गधे-ऊँट, सर्प-वराह-सिंह-शृगाल और काक-हंस-मयूर पर सवार थे; वे प्रास-पट्टिश-शनि-तलवार-परशु-गदा-भुशुण्डि-मुद्गर-शतघ्नी-परिघ आदि लिए हुए थे।

शंख-भेरी की पूर्ण ध्वनि से इन्द्रजित शंख-चन्द्र-वर्ण छत्र से, पूर्ण चन्द्र-युक्त आकाश-सा शोभित होकर रणभूमि में पहुँचा। स्वर्ण-चामरों से वींजित वह सब धनुर्धरों में मुख्य रथ के चारों ओर राक्षसों को खड़ा कर, अग्नि-तुल्य तेजस्वी होकर विधिवत श्रेष्ठ मन्त्रों से अग्नि की पूजा करने लगा। उसने पुष्प-चन्दन-पूर्वक लाजा (खीलों) से अग्नि का सत्कार कर आहुति दी। उस यज्ञ में शस्त्र ही कुश-स्थान पर बिछाए गए, बिभीतक की समिधाएँ, लाल वस्त्र और लोहे का स्रुव प्रयुक्त हुए। शूल-तोमरों से अग्नि को आस्तीर्ण कर उसने एक जीवित काले बकरे का गला पकड़कर आहुति दी। उस एक ही आहुति से प्रज्वलित, धूमरहित, महाज्वाला वाली अग्नि में वे चिह्न प्रकट हुए जो विजय के सूचक थे; तप्त-स्वर्ण-सी, दक्षिणावर्त-शिखा वाली अग्नि प्रत्यक्ष प्रकट होकर वह हवि स्वयं ग्रहण कर गई। ब्रह्मास्त्र-विशारद इन्द्रजित ने ब्राह्म अस्त्र का आवाहन कर धनुष और रथ को अभिमन्त्रित किया। अस्त्र-आवाहन और अग्नि-तर्पण के समय सूर्य-चन्द्र-ग्रह-नक्षत्र सहित नभस्थल भय से काँप उठा।

एक उप-कथा: इन्द्रजित का यह यज्ञ केवल अनुष्ठान नहीं, उसके युद्ध-कौशल का मूल था। निकुम्भिला नामक स्थान पर इसी होम को पूरा करने पर वह अदृश्य और अजेय हो जाता था। आगे विभीषण इसी रहस्य को खोलकर बताएँगे कि इन्द्रजित को रोकने का एकमात्र उपाय है: होम पूरा होने से पहले उस पर आक्रमण।

अग्नि को तृप्त कर, अग्नि-सा दीप्त, महेन्द्र-तुल्य प्रभाव वाला अचिन्त्य-वीर्य इन्द्रजित धनुष-बाण-तलवार-रथ-घोड़े-सारथि सहित आकाश में स्वयं को अन्तर्धान कर गया। फिर पताका-ध्वज से सजी राक्षस-सेना युद्ध की इच्छा से गरजती निकल पड़ी। उन्होंने तोमर-अंकुश और चित्र-विचित्र तीक्ष्ण बाणों से वानरों पर प्रहार किया। क्रुद्ध रावण-पुत्र ने “हर्षित होकर वानरों को मारने की इच्छा से लड़ो”, ऐसा कहा। तब जय-कांक्षी राक्षस गरजते हुए वानरों पर बाण-वर्षा करने लगे। राक्षसों से छिपा इन्द्रजित नालीक (चौड़े-मुख बाण), नाराच, गदा और मूसलों से वानरों को मारने लगा।

क्रुद्ध, महातेजस्वी, महाबली रावण-पुत्र वानरों के शरीर छेदने लगा; एक-एक बाण से नौ, पाँच और सात वानरों को बेधकर राक्षसों को हर्षित करने लगा। बाणों से पीड़ित, अंग-भग्न, संकल्प-भग्न वानर देवों से मारे महासुरों-से गिरने लगे। तब कुछ वानर आकाश में, कुछ धरती पर रहकर इन्द्रजित की ओर दौड़े, पर वह माया से छिपा रहा। राम के लिए प्राण निछावर कर वानर शिला-आयुध लेकर गरजते रहे और रावण-पुत्र पर वृक्ष-शिखर-शिला बरसाते रहे, पर सदा विजयी इन्द्रजित ने वह प्राणहारी वर्षा बिखेर दी। फिर अग्नि-सरीखे आशीविष-तुल्य बाणों से उसने वानर-सेना को बेधा।

अठारह तीक्ष्ण बाणों से गन्धमादन को, नौ से दूर खड़े नल को बेधा। सात मर्म-विदारी बाणों से मैन्द को, पाँच से गज को बेधा। दस बाणों से जाम्बवान, तीस से नील को, तथा घोर वरदान-प्राप्त बाणों से सुग्रीव, ऋषभ, अंगद और द्विविद को निष्प्राण-सा कर दिया। अन्य प्रमुख वानरों को भी अनेक बाणों से पीड़ित किया। सूर्य-सरीखे शीघ्रगामी बाणों से उसने सेना मथ डाली। प्रसन्न इन्द्रजित ने रक्त में नहाई, व्याकुल वानर-सेना देखी। फिर अपनी सेना से घिरकर, अदृश्य रहते हुए, नील-मेघ-सा वह वानर-सेना पर बाण-जाल बरसाने लगा; इन्द्र-वज्र से टूटे नगेन्द्रों-से वानर विस्वर चीखते गिरने लगे। वे केवल तीक्ष्ण बाण आते देखते थे, पर माया से छिपे उस सुरेन्द्र-शत्रु को नहीं देख पाते थे।

फिर उस महात्मा राक्षसाधिप ने सब दिशाओं को सूर्य-सी आभा वाले तीक्ष्ण बाणों से ढककर वानरेन्द्रों को विदीर्ण किया, और वानर-सेना पर शूल-तलवार-परशु की दीप्त-अग्नि-सी, विस्फुलिंग छोड़ती तीव्र वर्षा की। इन्द्रजित के स्वर्ण-वर्ण बाणों से ताड़ित वानर-मुखिया फूले किंशुक-से दीखने लगे; अन्योन्य से सटते, विस्वर चीखते, बाण-बिंधे वानर गिरने लगे। फिर माया-छिपे सुरेन्द्र-शत्रु ने हनुमान, सुग्रीव, अंगद, गन्धमादन, जाम्बवान, सुषेण, वेगदर्शी, मैन्द, द्विविद, नील, गवाक्ष, गवय, केसरी, हरिलोमा, विद्युद्दंष्ट्र, सूर्यानन, ज्योतिर्मुख, दधिमुख, पावकाक्ष, नल और कुमुद, इन सब प्रसिद्ध वानर-शार्दूलों को प्रास-शूल-तीक्ष्ण मन्त्रित बाणों से बेधा। स्वर्ण-वर्ण बाण-गदाओं से वानर-मुखियाओं को बींधकर उसने सूर्य-किरण-सी बाण-वर्षा से राम-लक्ष्मण को भी ढक दिया।

वर्षा-धाराओं-सी उन बाण-वृष्टियों की चिन्ता न करते हुए, परम अद्भुत श्री से दीप्त श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा, “हे लक्ष्मण, यह राक्षसेन्द्र, सुरेन्द्र-शत्रु, ब्रह्मास्त्र का आश्रय लेकर हमारी सेना गिराकर अब तीक्ष्ण बाणों से हमें पीड़ित कर रहा है। स्वयम्भू ब्रह्मा से वर-प्राप्त यह महात्मा अदृश्य भीमकाय इन्द्रजित, जिसका शरीर नहीं दीखता और जो अस्त्र-उद्यत है, आज रण में कैसे मारा जा सकता है? मैं जानता हूँ कि स्वयम्भू भगवान ब्रह्मा अचिन्त्य हैं और यह अस्त्र उन्हीं का है। अतः हे बुद्धिमान, अव्यग्र मन से आप मेरे साथ आज यह बाण-वर्षा सहिए। यह राक्षसेन्द्र सब दिशाओं को बाण-जाल से ढक रहा है, और अग्र-वीर गिरने से वानरराज की सेना अब शोभा नहीं पाती। हमें मूर्च्छित, हर्ष-रोष-रहित, युद्ध-विरत गिरा देखकर यह रणाग्र-लक्ष्मी पाकर निश्चय ही लंका लौट जाएगा।”

नागपाश से बंधे राम और लक्ष्मण रणभूमि में अचेत पड़े हैं, चमकते बंधन गिरे वानरों को भी जकड़े हैं।

तब वे दोनों राजकुमार इन्द्रजित के अस्त्र-जालों से वहीं घायल हो गए, और उन्हें इस संग्राम में पीड़ित कर राक्षसेन्द्र हर्ष से गरज उठा। इस प्रकार वानर-सेना और राम-लक्ष्मण को रण में प्रणत कर इन्द्रजित सहसा दशग्रीव की भुजाओं से सुरक्षित नगरी में लौट गया, और राक्षसों से प्रशंसित होता हुआ, हर्षित होकर उसने पिता से सब कुछ विस्तार से कह सुनाया।

सार: इन्द्रजित का माया-युद्ध इस अंक का केन्द्रबिन्दु है: वह अदृश्य रहकर ब्रह्मास्त्र से न केवल पूरी वानर-सेना, अपितु स्वयं राम-लक्ष्मण को भी बाँध देता है। श्रीराम का लक्ष्मण को ब्रह्मास्त्र के प्रति सहनशीलता का उपदेश दिखाता है कि वाल्मीकि के नायक दिव्य अस्त्र का प्रतिरोध नहीं, सम्मान करते हैं।

जाम्बवान का निर्देश और हनुमान का संजीवनी-पर्वत लाना

रणाग्र में आहत उन दोनों राजकुमारों को देखकर वानर-यूथपतियों की सेना मोह में पड़ गई; सुग्रीव, नील, अंगद और जाम्बवान कुछ न कर सके। सबको विषण्ण देख बुद्धिमानों में श्रेष्ठ विभीषण ने अनुपम वचनों से सुग्रीव के वीरों को आश्वस्त करते हुए कहा, “मत डरो, यहाँ विषाद का समय नहीं। ये दशरथ-पुत्र इसलिए असहाय और पीड़ित हैं क्योंकि उन्होंने स्वयम्भू के उस अस्त्र का सम्मान किया जिससे इन्द्रजित ने इन्हें अभिभूत किया। यह अमोघ-वीर्य परम ब्रह्मास्त्र स्वयं स्वयम्भू ने इन्द्रजित को दिया है, और दोनों राजकुमार उसका मान रखकर रण में गिरे हैं; इसमें विषाद किस बात का?”

ब्रह्मास्त्र का मान कर बुद्धिमान मारुति (हनुमान) ने कहा, “इस अस्त्र-हत वानर-सेना में जो-जो प्राण धारण किए हो, उन्हें हम दोनों आश्वस्त करें।” तब हनुमान और विभीषण उल्का (मशाल) हाथ में लिए रात्रि में रणभूमि में घूमने लगे। उन्होंने धरती को पर्वत-सरीखे गिरे वानरों से ढकी देखी, जिनकी पूँछ-हाथ-जाँघ-पैर-अँगुली-गर्दन कटी थीं और जो रक्त बहा रहे थे। उन्होंने सुग्रीव, अंगद, नील, शरभ, गन्धमादन, जाम्बवान, सुषेण, वेगदर्शी, मैन्द, नल, ज्योतिर्मुख और द्विविद को रण में आहत देखा। दिन के पाँचवें-अन्तिम पहर (सायाह्न) तक स्वयम्भू के प्रिय अस्त्र से सड़सठ करोड़ बलवान वानर गिरा दिए गए थे।

समझने की कुंजी, दिन के पाँच पहर: वाल्मीकि-काल में दिन के बारह घण्टे पाँच भागों में बँटे थे, प्रत्येक छह घटिका (लगभग दो घण्टे चौबीस मिनट) का: प्रातः, संगव (पूर्वाह्न), मध्याह्न, अपराह्न और सायाह्न (संध्या)। “पाँचवें-अन्तिम पहर” का अर्थ है संध्या के समय, अर्थात पूरे दिन का युद्ध इन्द्रजित के एक ही माया-आक्रमण में समाप्त हो गया।

बाणों से बिंधे वृद्ध जांबवान भूमि पर लेटे हैं, मशाल लिए एक वानर और एक राजकुमार चिंतित झुके हैं।

समुद्र-सी आहत सेना देखकर हनुमान विभीषण-सहित जाम्बवान को खोजने लगे। स्वभाव-जरा से युक्त, वृद्ध, सैकड़ों बाणों से बिंधे, बुझती अग्नि-से प्रजापति-पुत्र वीर जाम्बवान के पास जाकर विभीषण ने कहा, “हे आर्य, आशा है इन्द्रजित के तीक्ष्ण बाणों ने आपके प्राण नहीं हरे।” जाम्बवान कठिनाई से बोले, “हे महावीर्य नैऋतेन्द्र, मैं स्वर से ही आपको पहचानता हूँ; तीक्ष्ण बाणों से बिंधे होने के कारण नेत्रों से नहीं देखता। क्या वानरश्रेष्ठ हनुमान, जिनके कारण अंजना और वायुदेव सुप्रजा-पिता कहलाते हैं, कहीं जीवित हैं, हे सुव्रत?”

विभीषण ने कहा, “आप राजकुमारों को छोड़कर केवल हनुमान का समाचार क्यों पूछते हैं? जैसा स्नेह आपने वायु-सुत के लिए दिखाया, वैसा न राजा सुग्रीव के लिए, न अंगद के लिए, न राघव के लिए।” जाम्बवान बोले, “सुनिए, हे नैऋत-शार्दूल, मैं केवल हनुमान का समाचार क्यों पूछता हूँ: यदि यह वीर हनुमान जीवित है, तो मारी गई सेना भी अमारी-सी है; और यदि हनुमान ने प्राण त्याग दिए, तो हम जीवित होकर भी मृत हैं। यदि वायु-तुल्य, वैश्वानर-तुल्य वीर्य वाले मारुति जीवित हैं, तो हमारे जीवन की आशा है।”

तब वृद्ध के पास जाकर विनयपूर्वक हनुमान ने उनके चरण छूकर अभिवादन किया। हनुमान का वचन सुनकर ऋक्ष-श्रेष्ठ जाम्बवान, यद्यपि घावों की पीड़ा से इन्द्रियाँ व्यथित थीं, स्वयं को नवजात-सा मानने लगे। महातेजस्वी जाम्बवान ने कहा, “आइए, हे हरि-शार्दूल! आप ही वानरों की रक्षा कर सकते हैं। पराक्रम में आपसे बढ़कर कोई नहीं, आप इनके परम सखा हैं। यह आपके पराक्रम का समय है; और कोई नहीं दीखता। ऋक्ष-वानर-वीरों की सेना को हर्षित कीजिए, और इन आहत राम-लक्ष्मण को निःशल्य कीजिए।”

समुद्रतट पर जांबवान संजीवनी हेतु हनुमान को दूर चमकते औषधि-पर्वत की ओर संकेत करते हैं, लक्ष्मण अचेत पड़े हैं।

“हे हनुमान, समुद्र के ऊपर परम लम्बा मार्ग तय कर आप नगश्रेष्ठ हिमालय जाइए। वहाँ से आप स्वर्ण-सरीखे अति-उच्च ऋषभ नामक पर्वत और कैलास-शिखर देख सकेंगे, हे शत्रुसूदन! उन दोनों शिखरों के बीच, हे वीर, अतुल-प्रभ, समस्त औषधियों से युक्त, दीप्त ओषधि-पर्वत देखेंगे। उस पर्वत की चोटी पर चार दीप्त ओषधियाँ: मृतसंजीवनी (मरे को जिलाने वाली), विशल्यकरणी (शस्त्र-शल्य निकालकर घाव भरने वाली), सुवर्णकरणी (शरीर का वर्ण लौटाने वाली) और महौषधि संधानी (कटे अंग-अस्थि जोड़ने वाली), दसों दिशाओं को आलोकित करती दीखेंगी। हे गन्धवह-आत्मज, उन सबको लेकर शीघ्र लौट आइए और प्राणों से जोड़कर वानरों को आश्वस्त कीजिए।”

जाम्बवान का वचन सुनकर हनुमान वायु-वेग से बल-उत्साह से भर उठे, मानो वायु-वेग से समुद्र। त्रिकूट-शिखर पर खड़े होकर, उस पर्वत-श्रेष्ठ को पैरों से दबाते हनुमान दूसरे पर्वत-से दीखने लगे। हनुमान के चरणों से दबकर वह पर्वत धँस गया; अत्यन्त पीड़ित होकर वह अपना भार न सँभाल सका। पर्वत पर खड़े वृक्ष गिरे, कुछ हनुमान के वेग से जल उठे और शिखर चूर हो गए। लंका के मुख्य द्वार हिल उठे, घर-गोपुर टूट गए, और त्रास से आकुल लंका रात्रि में नाचती-सी प्रतीत हुई। हनुमान ने समुद्र सहित पृथ्वी को क्षुब्ध कर डाला; उनका महानाद सुनकर लंका के राक्षस-व्याघ्र भी हिल न सके।

विशाल हनुमान एक हाथ में वृक्ष और दूसरे में शिला थामे गरजते हुए आकाश में उड़ान भरते हैं।

फिर हनुमान त्रिकूट से मलय-पर्वत पर कूद पड़े, जो मेरु-मन्दर-सा, अनेक झरनों-वृक्ष-लताओं से युक्त, विकसित कमल-उत्पलों वाला, देव-गन्धर्वों से सेवित, साठ योजन ऊँचा और विद्याधर-अप्सरा-मुनिगणों से सेवित था। मलय को पैरों से पूरी तरह दबाकर, बड़वा-मुख-सी अग्नि-सरीखे मुख को खोलकर हनुमान ने रात्रिचरों को त्रास देने को घोर गर्जना की। समुद्र को नमस्कार कर, भीम-पराक्रमी मारुति ने राघव के लिए परम कार्य का संकल्प कर लिया। सर्प-सी पूँछ उठाकर, पीठ झुकाकर, कान सिकोड़कर, बड़वा-मुख-सी अग्नि-तुल्य मुख खोलकर वे प्रचण्ड-वेग से आकाश में कूद पड़े। उनके बाहु-ऊरु के वेग से उखड़े वृक्ष-शिला और साधारण वानर वेग क्षीण होने पर जल में गिर पड़े।

सर्प-कुण्डली-सी भुजाएँ फैलाकर, गरुड़-तुल्य वीर्य वाले हनुमान दिशाओं को खींचते-से नगराज हिमालय की ओर चले। पर्वत-पक्षी-सरोवर-नदी-तालाब-नगर देखते, पिता-तुल्य वेग से वे आगे बढ़े। आदित्य-मार्ग का आश्रय ले श्रमरहित हनुमान वायु-वेग से दिशाओं को शब्दायमान करते बढ़ते रहे, और सहसा हिमालय दीख पड़ा: श्वेत-मेघ-राशि-से सुन्दर शिखरों और नाना वृक्षों से शोभित। उन्होंने उस महानगेन्द्र पर ब्रह्मकोश, रजताभ (ब्रह्मा का एक रूप), इन्द्रालय, रुद्र-शर-मोक्ष-स्थान, हयग्रीव-आलय, दीप्त ब्रह्मास्त्र-आलय, यम के किंकर, अग्नि-आलय, सूर्य-प्रभ कुबेर-आलय, सूर्य-निबन्धन-स्थल, ब्रह्मा-आलय, शंकर-कार्मुक और पृथ्वी की नाभि, ये दिव्य स्थान देखे। उसी पर्वत-राज पर, समस्त ओषधियों से दीप्त, अग्नि-राशि-सा प्रदीप्त ओषधि-शिखर भी देखा।

हिमालय की चोटियों के बीच हनुमान औषधियों की खोज में पर्वत पर झुके हैं, देवगण बादलों से देखते हैं।

उस अग्नि-राशि-सी दीप्त पर्वत को देख वासव-दूत-सुत हनुमान विस्मित हुए, और उस ओषधि-पर्वतेन्द्र पर कूदकर ओषधियों की खोज करने लगे। सहस्र योजन पार कर पहुँचे महाकपि मारुति उस दिव्य-ओषधि-धारी शैल पर विचरने लगे। पर एक खोजी को आता जान सब महौषधियाँ अदृश्य हो गईं। उन्हें पहचान न पाने पर महात्मा हनुमान क्रोध से गरज उठे और अग्नि-सी आँखों से उस महीधर से बोले, “हे नगेन्द्र, आपने राघव पर भी अनुकम्पा न की, यह आपकी कठोरता निन्दनीय है। मेरी भुजबल से अभिभूत होकर आप अभी अपने को बिखरा हुआ देखिए!”

फिर हनुमान ने उस पर्वत का वृक्ष-हाथी-स्वर्ण-सहस्रधातु-युक्त शिखर वेग से उखाड़ लिया, जिससे उसके कूट चूर हो गए और चोटी जल उठी। यह देख वानर गरज उठे, हनुमान भी हर्ष से गरजे, और उनका कोलाहल सुनकर लंकावासी और भी भयंकर चीख उठे। लोकों को, सुर-असुरेन्द्रों सहित, त्रास देकर हनुमान उस शिखर को उखाड़कर आकाश में उछले और गरुड़-सी उग्र गति से, अनेक खेचरों से प्रशंसित होते उड़ चले। सूर्य-सरीखे दीप्त शिखर को लिए, आदित्य-मार्ग पर पहुँचे हनुमान सूर्य-बिम्ब के पास उसकी ही प्रतिमा-से दीखने लगे; सहस्रधार-दीप्त चक्र लिए विष्णु-से शोभित हुए।

हनुमान चमकती औषधियों वाला पर्वत उठाए खड़े हैं, उसकी आभा से लक्ष्मण और गिरे वानर पुनः जी उठते हैं।

फिर महात्मा हनुमान वानर-सेना के बीच त्रिकूट पर उतरे और वानर-श्रेष्ठों को सिर झुकाकर अभिवादन कर वहीं खड़े विभीषण से लिपट गए। उन महौषधियों की गन्ध सूँघते ही दोनों राजपुत्र वहीं निःशल्य हो गए, और रण में मूर्च्छित अन्य वानर-प्रवीर भी उठ खड़े हुए। जो वानर-प्रवीर मारे गए थे, वे भी उन श्रेष्ठ ओषधियों की गन्ध से क्षण भर में निःशल्य और निःशोक हो गए, मानो रात्रि-अन्त में सोए जन जाग उठे हों। (जब से लंका में वानर-राक्षस लड़ रहे थे, रावण के आदेश से मान-रक्षा हेतु मारे गए राक्षस तुरन्त समुद्र में फेंक दिए जाते थे, ताकि वानरों को उनकी संख्या ज्ञात न हो।) फिर उग्र-वेग हनुमान उस ओषधि-शैल को वेग से हिमालय लौटा आए और श्रीराम से पुनः जा मिले।

समझने की कुंजी, चार दिव्य ओषधियाँ: मृतसंजीवनी मृत को जिलाती है; विशल्यकरणी शरीर में धँसे शस्त्र निकालकर घाव भरती है; सुवर्णकरणी शरीर का खोया वर्ण-कान्ति लौटाती है; और संधानी कटे अंग-अस्थि जोड़ती है। हनुमान का पूरा पर्वत उठा लाना, क्योंकि ओषधियाँ छिप गई थीं, वाल्मीकि के अद्भुत-रस का चरम है, और रामायण की परम प्रसिद्ध छवियों में एक।

सार: इन्द्रजित के माया-अस्त्र से उपजे संकट का समाधान हनुमान के अद्वितीय पराक्रम से होता है। यहाँ ध्यातव्य है कि वाल्मीकि के अनुसार हनुमान दो बार नहीं, केवल इसी अवसर पर पर्वत लाते हैं। आगे की भक्ति-परम्परा में इसे और विस्तार मिला, पर मूल यहाँ संयत है: संजीवनी का यह प्रसंग वाल्मीकि-रामायण का।

वानरों का लंका-दहन और घोर रात्रि-युद्ध

तब महातेजस्वी वानरेश्वर सुग्रीव ने अगला कर्तव्य बताते हुए हनुमान से कहा, “जब से कुम्भकर्ण मारा गया और कुमार नष्ट हुए, रावण अब कोई बचाव नहीं कर सकता। अतः जो-जो महाबली और फुर्तीले वानर हैं, वे उल्काएँ (मशालें) लेकर शीघ्र लंका पर चढ़ जाएँ।” रौद्र संध्या के उस निशामुख में सूर्यास्त के बाद वानर-श्रेष्ठ उल्का लिए लंका की ओर चल पड़े। उल्का-हस्त वानरों से सब ओर से घिरे, द्वारों पर तैनात विरूपाक्ष आदि रक्षक सहसा भाग खड़े हुए। रक्षकों के भागते ही हर्षित वानरों ने गोपुर-अट्टालिका-गलियों, विविध मार्गों और प्रासादों में आग लगा दी। अग्नि ने उनके सहस्रों घर भस्म कर दिए; पर्वत-सरीखे प्रासाद धरती पर गिरने लगे।

वहाँ अगुरु, उत्तम चन्दन, मोती, चिकने मणि, वज्र और प्रवाल जलने लगे। क्षौम (अलसी का कपड़ा), सुन्दर कौशेय (रेशम), विविध आविक-और्ण (ऊनी) वस्त्र, स्वर्ण-पात्र और आयुध भी जल उठे। घोड़ों के विचित्र साज, हाथियों की कक्षाएँ-ग्रैवेयक, रथों के संस्कृत साज, योद्धाओं के कवच, हाथी-घोड़ों के वर्म, खड्ग-धनुष-ज्या-बाण-तोमर-अंकुश-शक्ति, रोम-वाल के चर्म, व्याघ्र-चर्म, अण्डज (कस्तूरी), मुक्ता-मणि-जड़े प्रासाद और नाना अस्त्र-संघात, सब अग्नि ने भस्म किए, और बार-बार प्रज्वलित हुई।

घर-प्रिय, स्वर्ण-कवचधारी, माला-आभूषण-वस्त्रधारी राक्षसों के, जो सीधु (मद्य) पीकर आँखें घुमाते, मद से डगमगाते, प्रियाओं के हाथ का सहारा लिए, शत्रु पर क्रुद्ध, गदा-शूल-असि हाथ में लिए, खाते-पीते, या प्रियाओं के साथ बहुमूल्य शय्याओं पर सोए, या त्रस्त होकर पुत्रों को लेकर भागते, लाखों घर अग्नि ने जला दिए। बहुमूल्य, गम्भीर-गुण वाले, स्वर्ण-चन्द्र-अर्धचन्द्राकार, चन्द्रशालाओं से ऊँचे, चित्र-गवाक्ष-आसन-शय्या वाले, मणि-प्रवाल-चित्रित, सूर्य को छूते-से, क्रौंच-मयूर-वीणा-आभूषण-ध्वनि से शब्दायमान, पर्वत-सरीखे घर अग्नि ने भस्म किए। ज्वाला-वेष्टित तोरण ग्रीष्म-अन्त के विद्युत-घिरे मेघ-से चमके; अग्नि-वेष्टित घर दावाग्नि-दीप्त महागिरि-शिखर-से शोभित हुए। सात-मंजिले विमानों में सोई सुन्दरियाँ जलते हुए आभूषण-संयोग त्यागकर “हा! हाय!” कह ऊँचे स्वर से चीखने लगीं; अग्नि-वेष्टित भवन वज्र-हत पर्वत-शिखर-से गिर पड़े। दूर से जलते वे हिमालय-शिखर-से दीखे, और रात्रि में फूले किंशुकों से सजी-सी लंका दीखी; पीलवानों द्वारा छोड़े हाथियों और छूटे घोड़ों से लंका प्रलयकाल के भ्रान्त-ग्राह-समुद्र-सी हो गई।

मशालें थामे वानर लंका के द्वार और महलों में आग लगाते हैं, स्त्रियाँ, हाथी और घोड़े व्याकुल भागते हैं।

कहीं छूटा घोड़ा देख हाथी भयभीत होकर हट जाता, कहीं भयभीत हाथी देख घोड़ा त्रस्त होकर लौट जाता। लंका के जलने पर समुद्र भी, अर्ध-जले घरों के प्रतिबिम्ब से जल लाल होकर, लोहित-जल-सा शोभित हुआ। मुहूर्त भर में वानरों से जलाई वह नगरी इस लोक के घोर प्रलय में जलती धरती-सी हो गई। धूम-व्याप्त, ऊँचे चीखती, अग्नि-तप्त नारियों का कोलाहल सौ योजन तक सुना गया।

The revived Rama raises his great bow and twangs it like a wrathful Shiva, terrifying the rakshasas.

तब प्रदग्ध-शरीर बाहर निकले राक्षसों पर युद्ध-इच्छुक वानर सहसा टूट पड़े। वानरों के जयघोष और राक्षसों के विलाप ने दिशाओं, समुद्र और पृथ्वी को गुँजा दिया। निःशल्य महात्मा राम-लक्ष्मण ने अविचलित होकर अपने श्रेष्ठ धनुष उठाए। राम ने उत्तम धनुष टंकारा तो राक्षसों को भयभीत करने वाला तुमुल शब्द उठा; महाधनुष खींचते राम संहारकाल में वेदमय धनुष चढ़ाते क्रुद्ध शिव-से शोभित हुए। वानरों के जयघोष, राक्षसों के निःस्वन, और राम की ज्या-ध्वनि, तीनों दसों दिशाओं में व्याप्त हो गए। राम के धनुष से छूटे बाणों से लंका का कैलास-शिखर-सा मुख्य गोपुर भूमि पर बिखर गया। विमानों-घरों पर राम-बाण गिरते देख राक्षसेन्द्रों का संनाह (युद्ध-उद्यम) तुमुल हो उठा; सिंहनाद करते राक्षसों के लिए वह रात्रि रुद्र-प्रेरित प्रलय-रात्रि-सी हो गई।

महात्मा सुग्रीव ने वानरेन्द्रों को आदेश दिया, “निकट द्वार पर पहुँचकर युद्ध करो, हे वानरो! रणक्षेत्र में उपस्थित रहकर भी जो बिना लड़े भाग निकले, उस राज-शासन-दूषक को पकड़कर मार डालो।” जब दीप्त-उल्का-हस्त वानर-मुख्य द्वार पर डट गए, तो रावण को क्रोध ने घेर लिया। उसके जँभाई-क्षेप से दसों दिशाएँ व्यामिश्र हो गईं और वह रुद्र के मूर्तिमान क्रोध-सा दीखा। क्रुद्ध रावण ने कुम्भकर्ण-पुत्र कुम्भ-निकुम्भ को अनेक राक्षसों सहित भेजा; यूपाक्ष, शोणिताक्ष, प्रजंघ और कम्पन भी रावण-आदेश से उन दोनों के साथ निकले। सिंह-सा गरजकर रावण ने आदेश दिया, “राक्षसो, आज ही जाओ।”

राक्षस दीप्त आयुध लिए बार-बार गरजते लंका से निकले। राक्षसों ने आभूषण-स्थित और अपनी आभा से आकाश को प्रभामय कर दिया, वानरों ने उल्काओं से। चन्द्र-तारों की आभा और दोनों सेनाओं के आभूषण-तेज ने आकाश को आलोकित किया; अर्ध-जले घरों के प्रतिबिम्ब से समुद्र और भी शोभित हुआ। पताका-ध्वज-तलवार-परशु-हाथी-घोड़े-रथ-पदाति से युक्त, दीप्त शूल-गदा-खड्ग-प्रास-तोमर-धनुष से सुसज्जित वह भयंकर, घोर-पराक्रमी राक्षस-सेना दीखी। उसे आता देख वानर-सेना उससे टकराने आगे बढ़ी और उच्च-स्वर से चीखी; पतंगे आग की ओर वैसे दौड़ते हैं वैसे राक्षस-सेना शत्रु-सेना पर टूट पड़ी।

उन्मत्त-से वानर वृक्ष-शिला-मुष्टि से राक्षसों को मारते आगे झपटे, राक्षस तीक्ष्ण बाणों से वानरों के सिर काटते रहे; वानरों के दाँतों से कान कटे, मुष्टि से कपाल फटे, शिला-प्रहार से अंग-भग्न राक्षस लंका की गलियों में घूमते रहे। “मुझसे लड़ो”, एक कहता; “मैं इससे लड़ता हूँ, ठहरो, व्यर्थ क्यों कष्ट उठाते हो”, दूसरा कहता। दोनों सेनाओं के योद्धा गलियों में परस्पर यह कहते रहे। शस्त्र-छल, कवच-भेद, उद्यत प्रास, मुष्टि-शूल-असि-कुन्त से वह महारौद्र युद्ध छिड़ गया। राक्षसों ने दस-से-सात वानरों को, वानरों ने दस-से-सात राक्षसों को एक साथ मारा। कवच-ध्वज छोड़कर भागती राक्षस-सेना को वानरों ने सब ओर से घेर लिया।

सार: संजीवनी से उठे वानर अब आक्रामक हो उठते हैं और लंका को आग के हवाले कर देते हैं। वाल्मीकि का यह दहन-वर्णन वैभव और विनाश का तीव्र विरोधाभास रचता है: स्वर्ण-मणि-रेशम से भरी नगरी क्षण भर में प्रलय-सी जल उठती है। रावण कुम्भकर्ण के पुत्रों कुम्भ-निकुम्भ को अन्तिम रक्षा-पंक्ति के रूप में भेजता है।

कम्पन, प्रजंघ, शोणिताक्ष, यूपाक्ष और कुम्भ का वध

उस घोर, संकुल, वीर-क्षयकारी युद्ध में रण-उत्सुक अंगद वीर कम्पन से जा भिड़ा। कम्पन ने अंगद को ललकारकर वेग से गदा का प्रहार किया, जिससे अंगद डगमगा उठा। होश में आकर तेजस्वी अंगद ने गिरि-शिखर फेंका, जिससे आहत कम्पन भूमि पर मरकर गिर पड़ा। कम्पन को मरा देख शोणिताक्ष वीरों-सा निर्भय होकर रथ से अंगद की ओर दौड़ा और काल-अग्नि-सी, शरीर-विदारी तीक्ष्ण बाणों से उसे बेधा। क्षुर, क्षुरप्र, नाराच, वत्सदन्त, शिलीमुख, कर्णि, शल्य और विपाठ, इन अनेक तीक्ष्ण बाणों से अंग-बिंधा बलवान अंगद उसके धनुष, रथ और बाणों को बल से मसल गया।

एक उप-कथा: वाल्मीकि बाणों के नाम उनकी फलक-आकृति से रखते हैं: क्षुर का सिर उस्तरे-सा, क्षुरप्र का अर्धचन्द्र-सा, नाराच पूरा लोहे का, वत्सदन्त का सिर बछड़े के दाँत-सा, शिलीमुख का बाज के पंख-सा, कर्णि के दोनों ओर कान-सी उभार, शल्य का सिर लम्बा, और विपाठ का सिर करवीर-पत्र-सा। यह सूक्ष्म वर्गीकरण दिखाता है कि प्राचीन युद्ध में बाण कितने विविध और विशिष्ट थे।

शोणिताक्ष ने तुरन्त असि-चर्म उठाए और क्रुद्ध होकर रथ से कूदा। और भी फुर्ती से उछलकर अंगद ने उसका खड्ग छीनकर गर्जना की, फिर उसी खड्ग से उसके कन्धे-फलक पर यज्ञोपवीत-सा तिरछा प्रहार किया। उस महाखड्ग को सँभालकर बार-बार गरजता अंगद रण में अन्य शत्रुओं की ओर दौड़ा। तब बलवान यूपाक्ष प्रजंघ-सहित क्रुद्ध होकर रथ से अंगद की ओर बढ़ा, और प्रजंघ गदा लेकर। शोणिताक्ष और प्रजंघ के बीच अंगद विशाखा-नक्षत्रों के बीच पूर्ण-चन्द्र-सा शोभित हुआ। मैन्द और द्विविद उसकी रक्षा करते उसके पास खड़े हो गए। तीन वानरेन्द्रों और तीन राक्षस-श्रेष्ठों का रोमहर्षण युद्ध छिड़ गया।

वानरों ने वृक्ष फेंके, प्रजंघ ने खड्ग से काट दिए; रथ-घोड़े-वृक्ष-शिला फेंके, यूपाक्ष ने बाणों से काट दिए। द्विविद-मैन्द के उखाड़कर फेंके वृक्षों को शोणिताक्ष ने गदा से बीच में तोड़ डाला। फिर परम-मर्म-विदारी विशाल खड्ग उठाकर वेगवान प्रजंघ अंगद पर झपटा। पास आते प्रजंघ को देख अति-बलवान अंगद ने अश्वकर्ण वृक्ष से प्रहार किया, और मुष्टि से उसकी खड्ग-धारी भुजा पर वार किया जिससे खड्ग गिर पड़ा। अपना मूसल-सरीखा खड्ग गिरा देख प्रजंघ ने वज्र-कठोर मुष्टि बाँधकर अंगद के ललाट पर प्रहार किया, जिससे अंगद मुहूर्त भर डगमगाया। फिर होश में आकर अंगद ने मुष्टि से प्रजंघ का सिर धड़ से गिरा दिया।

चाचा प्रजंघ को मरा देख, बाण चुक जाने पर अश्रु-पूर्ण नेत्रों वाला यूपाक्ष रथ से उतरकर खड्ग ले आया। उसे आता देख बलवान द्विविद ने उसकी छाती पर प्रहार कर बल से पकड़ लिया। भाई को पकड़ा देख शोणिताक्ष ने गदा से द्विविद की छाती पर मारा; द्विविद डगमगाया, पर उसने शोणिताक्ष की उद्यत गदा छीन ली। इसी बीच मैन्द आया और हथेली से यूपाक्ष की छाती पर प्रहार किया। शोणिताक्ष और यूपाक्ष वानरों के साथ तीव्र आकर्षण-उत्पाटन का युद्ध करने लगे। द्विविद ने शोणिताक्ष का मुख नखों से चीर, बल से धरती पर पटककर कुचल डाला। क्रुद्ध मैन्द ने बाहुओं से यूपाक्ष को दबाया, जिससे वह मरकर गिर पड़ा।

Kumbhakarna's son Kumbha pours arrows from a bow glowing like a second rainbow, scattering the vanara army.

प्रवीर-वध से व्यथित राक्षस-सेना उस ओर मुड़ी जहाँ कुम्भ (कुम्भकर्ण-पुत्र) लड़ रहा था। वेग से आती सेना को कुम्भ ने सान्त्वना दी। प्रवीर मारे जाने पर महावीर्य वानरों से दबी सेना देख तेजस्वी कुम्भ ने रण में अति-दुष्कर कर्म किया। धनुर्धरों में श्रेष्ठ कुम्भ ने सुसमाहित होकर आशीविष-सरीखे, शरीर-विदारी बाण छोड़े; ऐरावत-विद्युत-सी आभा वाला उसका धनुष दूसरे इन्द्रधनुष-सा चमका। आकर्ण खींचे स्वर्ण-पुंख बाण से उसने द्विविद को बेधा; पद-विप्रमुक्त द्विविद त्रिकूट-सा डगमगाकर पैर फैलाए गिर पड़ा।

भाई को गिरा देख मैन्द विशाल शिला लेकर कुम्भ पर झपटा। कुम्भ ने पाँच बाणों से शिला तोड़ डाली, फिर सुन्दर-मुख आशीविष-सरीखे बाण से द्विविद के अग्रज मैन्द की छाती पर मर्म में प्रहार किया, जिससे मैन्द मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। दोनों मामाओं को आहत देख अंगद उद्यत-धनुष कुम्भ पर वेग से झपटा। आते अंगद को कुम्भ ने पाँच लोहमय और तीन तीक्ष्ण बाणों से, अंकुश-सी पीड़ा देते हुए, अनेक बाणों से बेधा। स्वर्ण-भूषित तीक्ष्ण बाणों से अंग-बिंधा अंगद विचलित न हुआ। उसने शिला-वृक्ष की वर्षा कुम्भ के सिर पर की, पर श्रीमान कुम्भ ने सब काट डाले, और दो बाणों से अंगद की दोनों भौंहें वैसे बेध दीं जैसे उल्काओं से हाथी; रक्त बहने से अंगद की आँखें ढक गईं।

एक हाथ से रक्त-रंजित नेत्र ढककर अंगद ने पास खड़े साल-वृक्ष को दूसरे हाथ से पकड़ा, छाती से सटाकर, टहनियाँ मोड़कर उसे उखाड़ लिया, और इन्द्र-ध्वज-सा, मन्दर-सरीखा वह वृक्ष सब राक्षसों के देखते कुम्भ पर वेग से फेंका। कुम्भ ने उसे सात शरीर-भेदी तीक्ष्ण बाणों से काट दिया; अंगद व्यथित होकर मूर्च्छित गिर पड़ा। समुद्र में डूबते-से अंगद को गिरा देख वानरों ने राघव को बताया। आहत अंगद का समाचार सुन श्रीराम ने जाम्बवान आदि वानर-श्रेष्ठों को सहायता को भेजा।

राम का आदेश सुन वानर-शार्दूल क्रुद्ध होकर उद्यत-धनुष कुम्भ की ओर दौड़े। वृक्ष-शिला हाथ में लिए, क्रोध से नेत्र लाल किए, अंगद की रक्षा को वानर-श्रेष्ठ झपटे। जाम्बवान, सुषेण और वेगदर्शी एक साथ वीर कुम्भ पर टूट पड़े। उन्हें आता देख कुम्भ ने बाण-समूह से वैसे रोका जैसे पर्वत जलाशय को रोकता है। उसके बाण-मार्ग में पहुँचकर महात्मा वानरेन्द्र उसकी ओर देख तक न सके, बढ़ना तो दूर, मानो समुद्र अपनी मर्यादा न लाँघे।

बाण-वृष्टि से पीड़ित वानरों को देख, अंगद को पीछे कर वानरेश्वर सुग्रीव वेगवान सिंह-सा कुम्भकर्ण-पुत्र पर झपटा। अश्वकर्ण आदि अनेक वृक्ष उखाड़कर महाकपि ने फेंके, पर श्रीमान कुम्भ ने तीक्ष्ण बाणों से वह आकाश ढकती वृक्ष-वर्षा काट डाली। तीक्ष्ण बाणों से बिंधे वे वृक्ष घोर शतघ्नियों-से चमके। बाणों से बिंधते हुए भी महासत्त्व सुग्रीव विचलित न हुआ; बाण सहते हुए उसने इन्द्रधनुष-प्रभ कुम्भ का धनुष छीनकर तोड़ डाला। अति-दुष्कर कर्म कर रथ से कूदकर सुग्रीव कुपित होकर भग्न-दन्त हाथी-से कुम्भ से बोला:

“हे निकुम्भ के अग्रज! आपका वीर्य, बाण-वेग, विनय और प्रभाव अद्भुत है: आप प्रह्लाद, बलि, वृत्र-हन्ता इन्द्र, कुबेर और वरुण के तुल्य हैं! आप अकेले अपने अति-बलवान पिता कुम्भकर्ण के अनुरूप हुए हैं। शूल-हस्त, अरिन्दम, महाबाहु आपको देव वैसे ही नहीं लाँघ सकते जैसे जितेन्द्रिय को मानसिक व्यथाएँ। हे महाबुद्धि, अब अपना पराक्रम दिखाइए और मेरे कर्म देखिए। वर-दान से आपके चाचा रावण देव-दानवों को सह सकते हैं, वीर्य से आपके पिता कुम्भकर्ण सुर-असुरों को सहते थे; आपमें दोनों हैं, इसमें आप चाचा-पिता से बढ़कर हैं। धनुष में आप इन्द्रजित-तुल्य, प्रताप में रावण-तुल्य हैं; आज आप बल-वीर्य में राक्षस-लोक में श्रेष्ठ हैं।”

“प्राणी आज मेरे साथ आपका अद्भुत महायुद्ध वैसे ही देखें जैसे इन्द्र-शम्बर का। आपने अनुपम कर्म किया, अस्त्र-कौशल दिखाया, और भीम-पराक्रमी वानर-वीर गिराए। हे वीर, मैंने आपको केवल इसलिए नहीं मारा कि निन्दा का भय था, क्योंकि आप कर्म से थके खड़े हैं। अब विश्राम पाकर मेरा बल देखिए।” सुग्रीव के इस अवमान-मिश्रित प्रशंसा से सम्मानित कुम्भ का तेज घी-सिक्त अग्नि-सा बढ़ गया। तब कुम्भ ने सुग्रीव को बाहुओं में पकड़ लिया; मद-रहित दो हाथियों-से वे बार-बार साँस भरते, एक-दूसरे से सटे, श्रम से धूम-मिश्रित ज्वाला मुख से छोड़ते रहे। उनके पाद-प्रहार से धरती धँस गई और लहरें उछलती हुई वरुणालय (समुद्र) क्षुब्ध हो उठा।

Sugriva lifts Kumbha overhead and hurls him into the sea, the brine erupting in a mountain of spray.

फिर सुग्रीव ने कुम्भ को उठाकर समुद्र-तल दिखाते हुए वेग से लवण-जल में पटक दिया। कुम्भ के गिरने से विन्ध्य-मन्दर-सी जल-राशि उठकर सब ओर फैल गई। कुम्भ उछलकर सुग्रीव को पटककर वज्र-सी मुष्टि से छाती पर प्रहार कर बैठा; सुग्रीव का कवच फट गया, रक्त बहने लगा, और कुम्भ की मुष्टि उसकी अस्थि-मण्डल से टकराई। उस वेग से मेरु-पर्वत पर वज्र-निर्घात-सी महाज्वाला उठी। आहत महाबली सुग्रीव ने वज्र-सी मुष्टि बाँधी और सहस्र-किरण-सूर्य-मण्डल-सी आभा वाली उस मुष्टि को कुम्भ की छाती पर मारा। उस प्रहार से विह्वल, अति-पीड़ित कुम्भ गत-अर्चि (बुझी) अग्नि-सा गिर पड़ा, और दैव-इच्छा से आकाश से गिरते दीप्त-किरण मंगल-से धरती पर मर गिरा। उस वीर के मारे जाने पर पर्वत-वन सहित धरती काँप उठी और राक्षसों में और भी भय समा गया।

सार: कुम्भकर्ण-पुत्र कुम्भ इस अंक का अन्तिम महान योद्धा है, और सुग्रीव के साथ उसका मल्ल-युद्ध वाल्मीकि की परम जीवन्त द्वन्द्व-छवियों में एक है। ध्यान देने योग्य है कि शत्रु कुम्भ की वीरता की सुग्रीव खुली प्रशंसा करता है: वाल्मीकि के युद्ध में पराक्रम का आदर शत्रु में भी होता है।

हनुमान के हाथों निकुम्भ का वध

भाई कुम्भ को सुग्रीव के हाथ मारा देख निकुम्भ ने वानरेन्द्र की ओर ऐसे देखा मानो क्रोध से जला देगा। धीर निकुम्भ ने मालाओं से सजा, पाँच अंगुल चौड़ी लोह-पट्टियों वाला, महेन्द्र-शिखर-सा, स्वर्ण-मढ़ा, वज्र-प्रवाल-भूषित, यमदण्ड-सा भयंकर, राक्षसों का भय-नाशक परिघ उठाया। इन्द्र-ध्वज-तुल्य ओजस्वी उस परिघ को घुमाकर, मुख फाड़कर भीम-पराक्रमी निकुम्भ गरजा। उरःस्थ निष्क, बाहुओं के अंगद, चित्र-कुण्डल, चित्र-माला और उस परिघ से निकुम्भ वैसे शोभित हुआ जैसे विद्युत-गर्जना-इन्द्रधनुष-युक्त मेघ।

क्रोध-ईंधन वाली, परिघ-आभूषण-ज्वाला वाली निकुम्भ-रूपी अग्नि युगान्त-अग्नि-सी उठकर दुरासद हो गई। भय से न राक्षस, न वानर हिल सके; पर बलवान हनुमान छाती खोलकर उसके सामने खड़े हो गए। परिघ-सी कठोर भुजाओं वाले बलवान निकुम्भ ने सूर्य-प्रभ परिघ हनुमान की छाती पर मारा, पर उनकी दृढ़-विशाल छाती से टकराकर वह परिघ सौ टुकड़े होकर सौ उल्काओं-सा बिखर गया। उस प्रहार से महाकपि भूकम्प में अचल पर्वत-से ज़रा भी न हिले।

आहत होकर अति-महाबली हनुमान ने मुष्टि बाँधी और महातेजस्वी हनुमान ने उसे निकुम्भ की छाती पर मारा; वहाँ कवच फट गया और रक्त बहने लगा, मानो मेघ से विद्युत निकली हो। उस प्रहार से निकुम्भ डगमगाया, पर सँभलकर उसने महाबली हनुमान को पकड़ लिया। हनुमान ने पकड़े जाने पर भी वज्र-सी मुष्टि से उसे मारा, फिर छूटकर भूमि पर कूद पड़े और शीघ्र निकुम्भ को गिरा दिया। निकुम्भ को पटककर कुचलते हुए हनुमान उछलकर उसकी छाती पर कूद पड़े, और उसकी गर्दन पकड़कर मोड़कर, भीषण चीत्कार करते हुए उसका विशाल सिर उखाड़ डाला। निकुम्भ के मारे जाने पर वानरों ने हर्ष-निनाद किया, दिशाएँ गूँज उठीं, धरती काँपी-सी, आकाश गिरता-सा हुआ, और राक्षस-सेना भय से भर गई।

सार: निकुम्भ का परिघ हनुमान की छाती से टकराकर चूर हो जाना: यह छवि हनुमान के अपराजेय बल की पुनः पुष्टि करती है। कुम्भकर्ण की समूची सन्तान का अन्त हो जाने से रावण की रक्षा-पंक्ति टूट जाती है, और अब केवल इन्द्रजित ही शेष बचता है।

मकराक्ष का प्रस्थान

निकुम्भ और कुम्भ के मारे जाने का समाचार सुन परम क्रोधी रावण अग्नि-सा भभक उठा। क्रोध-शोक दोनों से अभिभूत होकर उसने खर के विशालाक्ष पुत्र मकराक्ष को आदेश दिया, “हे पुत्र, मेरी आज्ञा से सेना सहित जाओ, और राघव-लक्ष्मण दोनों को वानरों सहित मार डालो।” रावण का वचन सुनकर अपने को शूर माननेवाला खर-पुत्र मकराक्ष हर्षित होकर “ऐसा ही हो” कहकर रावण को अभिवादन और प्रदक्षिणा कर, बलवान वह योद्धा रावण के शुभ्र महल से आदेशानुसार निकल पड़ा।

पास खड़े सेनापति से खर-पुत्र ने कहा, “मेरा रथ तुरन्त लाओ और सेना शीघ्र जुटाओ।” सेनापति ने रथ और सेना उसके पास रखी। रथ की प्रदक्षिणा कर, उस पर चढ़कर रात्रिचर ने सारथि से कहा, “शीघ्र रथ रणभूमि में ले चलो।” फिर मकराक्ष ने सब राक्षसों से कहा, “आप सब मेरे आगे रहकर खूब लड़ें, हे राक्षसो! महात्मा रावण ने मुझे राम-लक्ष्मण दोनों को रण में मारने का आदेश दिया है। आज मैं श्रेष्ठ बाणों से राम, लक्ष्मण, वानर सुग्रीव और अन्य वानरों का संहार कर दूँगा; शूल-प्रहारों से वानरों की महासेना को वैसे ही जलाऊँगा जैसे आग सूखी लकड़ी को।”

उसकी डींग सुन हर्षित होकर बड़े-बड़े, क्रूर, उभरे दाँतों, पिंगल नेत्रों, बिखरे केशों वाले भयानक राक्षसों ने उस महाकाय खर-पुत्र को घेर लिया और हाथियों-से गरजते, धरती हिलाते आगे बढ़े। सहस्रों शंख-भेरी, सिंहनाद और भुजताल की महाध्वनि सब ओर उठी। तभी सहसा मकराक्ष के सारथि के हाथ से चाबुक छूट पड़ा और उस राक्षस का ध्वज भी दैव से गिर गया। उसके रथ के घोड़े पराक्रम-रहित होकर, गतियाँ भूलकर, दीन और सजल-नेत्र होकर हिचकते पैरों से चलने लगे। उस रौद्र, दुर्मति मकराक्ष के निर्गमन-काल में धूल-भरी, खर-दारुण वायु बहने लगी। इन अपशकुनों को देखकर भी अनदेखा कर, अत्यन्त पराक्रमी राक्षस उस ओर निकल पड़े जहाँ राम-लक्ष्मण थे। मेघ-गज-महिष-वर्ण, युद्ध-कुशल वे रात्रिचर, जो रण-मुखों में अनेक बार गदा-तलवार से बिंधे थे, “मैं आगे! मैं आगे!” कहते बार-बार रणभूमि में घूमने लगे।

सार: मकराक्ष खर का पुत्र है: वही खर जिसे श्रीराम ने दण्डक-वन में मारा था। उसका प्रस्थान अपशकुनों से भरा है: चाबुक गिरना, ध्वज गिरना, घोड़ों का हिचकना, खर-वायु। वाल्मीकि इन निमित्तों से पहले ही उसकी पराजय की सूचना दे देते हैं, और मकराक्ष का अपशकुन-अवज्ञा उसके अहंकार का प्रतीक है।

श्रीराम के हाथों मकराक्ष का वध

मकराक्ष को निकला देख सब वानर-पुंगव युद्ध की इच्छा से उछलकर डट गए। देव-दानव-से वानरों और रात्रिचरों का रोमहर्षण घोर युद्ध छिड़ गया। वानर वृक्ष-शूल-गदा-परिघ से, राक्षस शक्ति-खड्ग-गदा-कुन्त-तोमर-पट्टिश-भिन्दिपाल-पाश-मुद्गर-दण्ड-निर्घात आदि से एक-दूसरे को मसलने लगे। रात्रिचरों ने वानर-सिंहों का संहार किया। खर-पुत्र के बाण-समूह से पीड़ित, भय-व्याकुल वानर सब भागने लगे। उन्हें भागते देख दर्पित, विजय-कांक्षी राक्षस सिंह-से गरज उठे।

वानरों को सब ओर भागते देख श्रीराम ने बाण-वर्षा से राक्षसों को रोका। राक्षसों को रुका देख क्रोधाग्नि से भरा मकराक्ष बोला, “हे राम, ठहरिए! मेरे साथ आपका द्वन्द्व-युद्ध होगा। धनुष से छूटे तीक्ष्ण बाणों से मैं आपके प्राण छुड़ाऊँगा। दण्डक-वन में आपने मेरे पिता को मारा, तब से आपको अपने कुकर्म में लीन याद कर मेरा रोष बढ़ता है। हे दुरात्मन राघव, उस महावन में आप मुझे न मिले, इससे मेरे अंग जलते रहे। बहुत कहने से क्या? सुनिए: सब लोक आपको और मुझे रणभूमि में देखें। अस्त्र से, गदा से, बाहुओं से, या जिस आयुध का अभ्यास हो, उसी से युद्ध हो।”

मकराक्ष का यह वचन सुन दशरथ-पुत्र राम ने हँसते हुए, बार-बार बोलते उस राक्षस से कहा, “हे राक्षस, व्यर्थ आत्म-प्रशंसा क्यों करते हैं? आपने अपने अयोग्य बहुत-सी बातें कहीं। युद्ध के बिना केवल वाणी-बल से रण में विजय नहीं होती। दण्डक में मैंने चौदह सहस्र राक्षस, तथा आपके पिता खर, त्रिशिरा और दूषण को मारा। गीध-शृगाल-काक उनके माँस से तृप्त हुए थे; हे पापी, आज वे तीक्ष्ण-चोंच-नख वाले आपके माँस से तृप्त होंगे।” यह सुनकर महाबली मकराक्ष ने राघव पर बाण-समूह बरसाए। राम ने उन्हें बाण-वर्षा से अनेक प्रकार से काट डाला; स्वर्ण-पुंख बाण सहस्रों की संख्या में कटकर भूमि पर गिर पड़े।

खर-पुत्र और दशरथ-पुत्र का परस्पर ओजस्वी द्वन्द्व छिड़ गया। दोनों के धनुष-ज्या-ताल की ध्वनि आकाश में मेघ-गर्जना-सी सुनी गई। देव-दानव-गन्धर्व-किन्नर-महोरग आकाश में वह अद्भुत युद्ध देखने आए। अंग-अंग बिंधने पर भी दोनों का बल दूना बढ़ता गया; दोनों रण में परस्पर प्रहार-प्रतिप्रहार करते रहे। राम के बाण-समूह राक्षस ने काटे, राक्षस के बाण राम ने काटे। बाण-समूह से सब दिशाएँ और भूमि ढक गईं, कुछ न दीखता था। तब क्रुद्ध महाबाहु राम ने मकराक्ष का धनुष काट डाला और आठ नाराचों से सारथि को बेधा। फिर रथ काटकर, घोड़े मारकर गिरा दिए; रथहीन मकराक्ष भूमि पर खड़ा हो गया।

धरती पर खड़े राक्षस ने सर्व-भूत-त्रासक, युगान्त-अग्नि-सा दीप्त शूल हाथ में लिया: दुष्प्राप्य, रुद्र-दत्त, भयंकर, आकाश में जाज्वल्यमान, दूसरे संहार-अस्त्र-सा शूल, जिसे देख देव भय से भाग जाते थे। उस प्रज्वलित महाशूल को घुमाकर रात्रिचर ने महायुद्ध में क्रोध से राघव पर फेंका। आते उस ज्वलित शूल को राघव ने हँसते हुए चार बाणों से आकाश में काट डाला; दिव्य-स्वर्ण-मण्डित वह शूल अनेक टुकड़े होकर महोल्का-सा भूमि पर बिखर गया। शूल नष्ट देख आकाश-स्थित भूत “साधु! साधु!” कह उठे।

Rama's Agneya arrow splits Makaraksha's heart and the boasting son of Khara crashes dead in flames.

शूल नष्ट देख मकराक्ष ने मुष्टि उठाकर काकुत्स्थ राम को “ठहरो, ठहरो” कहा। उसे आता और हँसते देख रघुनन्दन राम ने धनुष पर पावक-अस्त्र चढ़ाया। उस अस्त्र से रण में आहत वह राक्षस, छिन्न-हृदय होकर, वहीं गिरकर मर गया। मकराक्ष का पतन देख राम-बाण के भय से पीड़ित सब राक्षस सीधे लंका की ओर भागे। राम के बाण-वेग से मारे, वज्र-हत बिखरे पर्वत-से उस खर-पुत्र को देख आकाश-स्थित देव हर्षित हो उठे।

सार: मकराक्ष का वध रामायण के एक पुराने ऋण का पटाक्षेप है: दण्डक-वन में राम ने उसके पिता खर का संहार किया था। श्रीराम पहले उसकी डींग का खण्डन करते हैं (वाणी-बल से विजय नहीं होती), फिर रुद्र-दत्त शूल को भी काटकर पावक-अस्त्र से उसका अन्त कर देते हैं। यह राम के संयत वीर-रूप का सुन्दर चित्र है।

इन्द्रजित का पुनः अभियान और राम-लक्ष्मण की मन्त्रणा

मकराक्ष को मारा गया सुन सदा-विजयी रावण महाक्रोध से भर, दाँत पीसता, यह सोचता कि अब क्या किया जाए, क्रुद्ध होकर अपने पुत्र इन्द्रजित को रण के लिए भेजने लगा। “हे वीर, अदृश्य रहकर या दृश्य होकर, महावीर्य राम-लक्ष्मण दोनों को मार डालिए; आप सब प्रकार से उनसे बल में बढ़कर हैं। आपने अप्रतिम-कर्मा इन्द्र को भी रण में जीता है; फिर दो मनुष्यों को देखकर रण में क्यों न मारेंगे?” पिता का वचन शिरोधार्य कर इन्द्रजित ने यज्ञभूमि में विधिवत अग्नि में आहुति दी। आहुति देते समय लाल पगड़ी पहने सेविका-राक्षसियाँ घबराकर वहाँ आ पहुँचीं।

इंद्रजित काला छाग थामे यज्ञकुंड में रक्त की आहुति देता है, धुएँ में मायावी रथ और अश्व उभरते हैं।

उस यज्ञ में शूल-शस्त्र ही कुश-स्थान पर बिछे, बिभीतक की समिधाएँ, लाल वस्त्र और लोह-स्रुव प्रयुक्त हुए। शूल-तोमरों से अग्नि को आस्तीर्ण कर इन्द्रजित ने एक जीवित सर्व-कृष्ण बकरे का गला पकड़कर आहुति दी। एक ही आहुति से प्रज्वलित, धूमरहित, महाज्वाला वाली अग्नि में विजय-सूचक चिह्न प्रकट हुए; दक्षिणावर्त-शिखा, तप्त-स्वर्ण-सी अग्नि प्रत्यक्ष प्रकट होकर हवि ग्रहण कर गई। अग्नि को तृप्त कर, देव-दानव-राक्षसों को तर्पित कर, इन्द्रजित अन्तर्धान-योग्य श्रेष्ठ रथ पर चढ़ा। चार घोड़ों से जुता, तीक्ष्ण बाणों और महाधनुष से युक्त वह रथ शोभित हुआ; स्वर्ण-साज से दीप्त, मृग-इन्द्र-अर्धचन्द्र-अंकित। जाम्बूनद-स्वर्ण के महाकम्बु (कड़े) और वैदूर्य-जड़ित केतु से इन्द्रजित दीप्त-अग्नि-सा शोभित हुआ। ब्रह्मास्त्र से रक्षित वह सुमहाबली रावण-पुत्र दुराधर्ष हो गया।

राक्षसेन्द्र इन्द्रजित नगर से निकलकर, राक्षस-मन्त्रों से अग्नि में होम कर, अन्तर्धान-गत होकर बोला, “आज रण में उन दोनों को, जो व्यर्थ ही वन में आए हैं, मारकर मैं रावण को रण में अधिक विजय दिलाऊँगा। आज पृथ्वी को निर्वानर कर, राम-लक्ष्मण को मारकर पिता को परम प्रीति दूँगा।” यह कहकर वह अदृश्य हो गया। दशग्रीव से प्रेरित, तीक्ष्ण धनुष-नाराच लिए तीक्ष्ण इन्द्र-शत्रु क्रुद्ध होकर रण में झपटा। उसने वानरों के बीच त्रिशिरा-सर्प-से (तीन-सिर वाले-से) महावीर्य राम-लक्ष्मण को बाण-जाल छोड़ते देखा।

एक उप-कथा: राम-लक्ष्मण की तुलना यहाँ “तीन-सिर वाले सर्पों” से क्यों? क्योंकि उनके धनुष के सिरे दाहिने कन्धे के ऊपर और तरकश के सिरे बाएँ कन्धे के ऊपर दो और सिरों-से उठे थे; इस प्रकार सिर सहित तीन शीर्ष-से दीखते थे। वाल्मीकि का यह उपमान युद्ध-सज्जित वीर की दिव्य-भयंकर छवि गढ़ता है।

“ये ही वे दो हैं”, ऐसा सोचकर इन्द्रजित ने धनुष चढ़ाकर, पर्जन्य-सी बाण-धाराओं से दिशाएँ ढक दीं। आकाश-रथ पर अदृश्य रहकर उसने नीचे खड़े राम-लक्ष्मण को तीक्ष्ण बाणों से बेधा। बाण-वेग से घिरे राम-लक्ष्मण ने धनुष पर बाण चढ़ाकर दिव्य अस्त्र प्रकट किए। आकाश को बाण-जाल से ढकते हुए भी वे सूर्य-सी आभा वाले अस्त्रों से इन्द्रजित को छू तक न सके। उसने माया से धूम-अन्धकार रचकर आकाश ढक दिया और नीहार-तम से दिशाएँ अदृश्य कर दीं। न ज्या-ताल की ध्वनि, न रथ-चक्र या खुर का शब्द सुना जाता, न उसका रूप दीखता था। घने अन्धकार में महाबाहु इन्द्रजित अद्भुत शिला-वर्षा-सी नाराच-वर्षा करता रहा।

क्रुद्ध रावण-पुत्र ने सूर्य-सी आभा वाले वरदान-प्राप्त बाणों से रण में राम के सब अंगों को बेध डाला। धाराओं से बिंधे दो पर्वतों-से वे दोनों नर-व्याघ्र स्वर्ण-पुंख तीक्ष्ण बाण छोड़ते रहे। कंक-पंख वाले वे बाण आकाश में इन्द्रजित को बेधकर रक्त में सने भूमि पर गिर पड़े। बाण-समूह से दीप्त नर-श्रेष्ठ गिरते बाणों को भल्ल-बाणों से काटते रहे, और जहाँ-से बाण गिरते देखते, उसी दिशा में उत्तम अस्त्र छोड़ते। अतिरथ इन्द्रजित रथ से सब दिशाओं में घूमता, शीघ्र-अस्त्री होकर दोनों को बेधता रहा; स्वर्ण-पुंख सुसंहत बाणों से बिंधे वे राजपुत्र फूले किंशुक-से दीखने लगे। मेघ-ढके सूर्य-सा उसका वेग, रूप, धनुष-बाण कुछ ज्ञात न होता था; उसके बाणों से बिंधे सैकड़ों वानर मरकर गिरे।

तब क्रुद्ध लक्ष्मण ने भाई से कहा, “मैं समस्त राक्षसों के वध हेतु ब्रह्मास्त्र चलाऊँगा।” राम ने शुभ-लक्षण लक्ष्मण से कहा, “एक व्यक्ति का बदला लेने को पृथ्वी के सब राक्षसों का संहार उचित नहीं। जो लड़ नहीं रहा, छिपा है, हाथ जोड़े शरणागत है, भाग रहा है या उन्मत्त है, उसे आपको नहीं मारना चाहिए। मैं केवल इस इन्द्रजित के वध का यत्न करूँगा, हे महाबाहु। हम दोनों महावेग आशीविष-सरीखे अस्त्र चलाएँगे। माया से छिपे, क्षुद्र, अदृश्य-रथ इस राक्षस को देखकर वानर-यूथपति बल से मार डालेंगे। यह भूमि, स्वर्ग, रसातल या आकाश में जाकर पूर्णतः छिप जाए, तो भी मेरे अस्त्र से जलकर भूमि पर मरकर गिरेगा।” यह गूढ़ार्थ वचन कहकर वानर-श्रेष्ठों से घिरे महात्मा राम उस क्रूर-कर्मा रौद्र राक्षस के शीघ्र वध-उपाय पर विचार करने लगे।

सार: इन्द्रजित दूसरी बार माया-युद्ध करता है, इस बार धूम-अन्धकार रचकर अदृश्य रहता है। यहाँ श्रीराम का धर्म-विवेक प्रकट होता है: वे लक्ष्मण को सब राक्षसों के संहार से रोकते हैं और केवल इन्द्रजित-वध का संकल्प करते हैं। साथ ही अदृश्य शत्रु को मारने की समस्या ही आगे विभीषण के रहस्योद्घाटन की भूमिका बनती है।

इन्द्रजित द्वारा माया-सीता का वध

महात्मा राघव के मन का अभिप्राय जानकर इन्द्रजित उस युद्ध से लौटकर नगर में प्रवेश कर गया। उन मारे गए महाबली राक्षसों के वध को स्मरण कर, क्रोध से ताम्र-नेत्र वीर रावण-पुत्र फिर निकल पड़ा। राक्षसों से घिरा वह महावीर्य पौलस्त्य, देव-कण्टक इन्द्रजित पश्चिमी द्वार से निकला। राम-लक्ष्मण को सब प्रकार युद्ध-उद्यत देख इन्द्रजित ने अपनी माया-निपुणता प्रकट की। उसने एक माया-मयी सीता रथ पर बिठाई और महासेना से घेरकर उसका वध करने का विचार किया। सबको मोहित करने को दुर्मति इन्द्रजित ‘सीता’ को मारने का निश्चय कर वानरों की ओर बढ़ा।

उसे निकला देख सब वनवासी क्रुद्ध होकर शिला-हाथ युद्ध की इच्छा से उछल पड़े। हनुमान, महाकपि, दुरासद विशाल पर्वत-शिखर लेकर उनके आगे चले। हनुमान ने इन्द्रजित के रथ में हत-आनन्द ‘सीता’ को देखा: एक वेणी धारण किए, दीन, उपवास से कृश-मुख, मलिन एक वस्त्र में, बिना आभूषण, धूल-मल से लिपटे अंगों वाली वर-स्त्री। चारु-सर्वांगी, राम की प्रिया उस जनक-पुत्री को थोड़ी देर देखकर हनुमान विषण्ण हो उठे; मिथिला-राजकुमारी को उन्होंने तुरन्त पहचान लिया, क्योंकि वह उनसे पूर्व-दृष्ट थी।

आकाशचारी रथ पर इंद्रजित रोती हुई मायावी सीता के केश खींचता है, नीचे पर्वत थामे हनुमान व्यथित देखते हैं।

शोकार्त, निरानन्द, तपस्विनी, रथस्थ, दीन, राक्षसेन्द्र-पुत्र के वश ‘सीता’ को देखकर, और यह सोचकर कि इसका क्या अभिप्राय है, महाकपि हनुमान वानर-श्रेष्ठों के साथ रावण-पुत्र की ओर दौड़े। वानर-सेना को आती देख इन्द्रजित क्रोध-मूर्च्छित होकर तलवार खींच, ‘सीता’ को सिर के बाल पकड़कर खींचने लगा। ‘राम! राम!’ पुकारती, माया से रथ में बिठाई उस स्त्री को राक्षस वानरों के देखते-देखते मारने लगा। उसे केश पकड़ा देख हनुमान दीन हो गए और नेत्रों से दुःख के आँसू बहाने लगे।

राम की प्रिय महिषी को देख हनुमान ने उसे सीता ही समझा और क्रोध से राक्षसेन्द्र-पुत्र से कठोर वचन कहे, “हे दुरात्मन, अपने ही नाश को आपने इसके केश पकड़े हैं! ब्रह्मर्षि-कुल में जन्म लेकर भी आप राक्षसी योनि में आश्रित हैं। हे पाप-आचारी, धिक्कार है आपको, जिसकी ऐसी मति है! हे नृशंस, अनार्य, दुर्वृत्त, क्षुद्र, पाप-पराक्रमी, ऐसा कर्म तो अनार्य का ही है; हे निर्घृण, आपमें दया ही नहीं। घर, राज्य और राम के हाथ से छूटी इस मिथिला-राजकुमारी ने आपका क्या अपराध किया, जो आप इसे मारते हैं, हे निर्दय? सीता को मारकर आप किसी प्रकार चिर-जीवी न रहेंगे; इस वध-योग्य कर्म से आप मेरे हाथ आ गए हैं। जिस सीता के लिए सुग्रीव, आप और राम यहाँ आए, उसे मारने वाला स्त्री-घातकों के निन्द्य लोक में जाएगा।”

यह कहकर, शस्त्रधारी वानरों से घिरे हनुमान अति-क्रुद्ध होकर इन्द्रजित की ओर दौड़े। महावीर्य वानर-सेना को आता देख इन्द्रजित ने भीम-क्रोधी राक्षस-सेना से उसे रोका। फिर वह राघव-प्रिया चारु-सर्वांगी को देख इन्द्रजित ने हनुमान से कहा, “जिसके लिए सुग्रीव, आप और राम यहाँ आए, उस वैदेही को आज ही आपके देखते-देखते मैं मार डालूँगा। इसे मारकर फिर राम, लक्ष्मण, आपको, सुग्रीव और उस अनार्य विभीषण को मारूँगा। आपने जो कहा कि स्त्रियाँ न मारी जाएँ, हे वानर, ठीक है; पर जो शत्रुओं को पीड़ा दे, वह तो करना ही चाहिए।” यह कहकर रोती हुई उस माया-मयी सीता को इन्द्रजित ने तीक्ष्ण-धार खड्ग से स्वयं मार डाला।

रथ पर खड़ा इंद्रजित तलवार से मायावी सीता का वध करता है, हनुमान हाथ फैलाए विलाप करते हैं।

यज्ञोपवीत-मार्ग (तिरछे) से कटी वह तपस्विनी, पृथु-श्रोणी, प्रिय-दर्शना भूमि पर गिर पड़ी। उस स्त्री को मारकर इन्द्रजित ने हनुमान से कहा, “देखिए, मैंने राम की प्रिया शस्त्र से मार डाली; यह वैदेही मारी गई, आपका परिश्रम निष्फल हुआ।” फिर बड़े खड्ग से उसे मारकर इन्द्रजित हर्षित होकर रथ पर चढ़कर महाध्वनि से गरजा। दुर्गम उस आकाश-रथ में बैठे, मुख फाड़कर गरजते इन्द्रजित का शब्द पास खड़े वानरों ने सुना। सीता को मारकर दुर्मति रावण-पुत्र हृष्ट-चित्त हो उठा; उसे प्रसन्न-रूप देख विषण्ण-मुख वानर भाग खड़े हुए।

सार: इन्द्रजित की यह माया रामायण की परम चालाक रणनीति है: असली सीता नहीं, उसकी माया-छवि को मारकर वह वानर-सेना का मनोबल तोड़ देता है। हनुमान का दीन होना और इन्द्रजित को धर्म का उपदेश देना दिखाता है कि यह छल कितना गहरा आघात है। पर ध्यातव्य है: मारी गई सीता माया-मयी है, असली नहीं, जो आगे विभीषण स्पष्ट करेंगे।

हनुमान का लौटना और निकुम्भिला में इन्द्रजित का होम

इन्द्र-अशनि-सी भयंकर इन्द्रजित की गर्जना सुनकर वानर सब दिशाओं को देखते अत्यन्त वेग से भागे। तब मारुति हनुमान ने उन विषण्ण-मुख, दीन, त्रस्त, अलग-अलग भागते वानरों से कहा, “हे वानरो, युद्ध-उत्साह त्यागकर विषण्ण-मुख क्यों भागते हैं? आपकी शूरता कहाँ गई? मेरे पीछे लौटिए, मैं आगे चलता हूँ; अभिजात-कुल के शूरों का रण से पीछे हटना अयोग्य है।” बुद्धिमान वायु-पुत्र के इस वचन से हर्षित हो वानर अति-क्रुद्ध होकर शिखर-वृक्ष उठा लाए और गरजते हुए राक्षसों पर टूट पड़े; हनुमान को घेरकर वे महायुद्ध में उसके पीछे चले।

वानर-मुख्यों से घिरे हनुमान अर्चिष्मान अग्नि-से शत्रु-सेना को जलाने लगे। काल-अन्तक-यम-सा वह महाकपि वानर-सेना से घिरकर राक्षसों का संहार करने लगा। शोक और महाक्रोध से आविष्ट हनुमान ने इन्द्रजित के रथ पर एक महाशिला फेंकी; शिला आती देख सारथि ने विधेय घोड़ों वाला रथ दूर हटा लिया। इन्द्रजित को न पाकर वह उद्यत शिला व्यर्थ ही धरती फोड़कर भीतर समा गई। शिला गिरते ही राक्षस-सेना व्यथित हुई और गिरती शिला से अनेक राक्षस अत्यन्त कुचले गए।

सैकड़ों वानर गरजते इन्द्रजित की ओर दौड़े, और वृक्ष-शिखर लेकर महाकाय वानर सक्रिय हो उठे। भीम-पराक्रमी वानर इन्द्रजित को रण में फटकारते और वृक्ष-शिला की महावर्षा करते रहे। उन भीम वानरों के वृक्ष-प्रहार से घोर-रूप राक्षस रण में लोटने लगे। वानरों से पीड़ित सेना देख इन्द्रजित क्रुद्ध होकर आयुध उठाकर शत्रुओं की ओर बढ़ा, और अपनी सेना से घिरकर बाण-धाराएँ छोड़ता शूल-अशनि-खड्ग-पट्टिश-कूटमुद्गर से अनेक वानर-शार्दूलों को मारने लगा। वानरों ने भी उसके अनुचरों को मारा।

महाबली हनुमान ने सुस्कन्ध साल-वृक्षों और शिलाओं से भीम-कर्मा राक्षसों का संहार किया, और शत्रु-सेना को रोककर वानरों से कहा, “हे वानरो, लौट चलो! अब यह सेना हमारे जीतने योग्य नहीं रही। राम के प्रिय की कामना से, प्राण देकर हम जिस जनक-पुत्री के लिए लड़े, वही मारी गई। यह समाचार राम और सुग्रीव को बताकर, वे जो आदेश देंगे, वही करेंगे।” यह कहकर वानर-श्रेष्ठ हनुमान सब वानरों को रोकते, अभय होकर, धीरे-धीरे सेना सहित लौट पड़े। हनुमान को राघव के पास जाते देख दुष्टात्मा इन्द्रजित होम करने की इच्छा से निकुम्भिला नामक चैत्य (पवित्र स्थान) पहुँचा और वहाँ अग्नि में आहुति देने लगा।

यज्ञभूमि में पहुँचकर उस राक्षस से आहुति पाकर होम-रक्त-भोजी अग्नि प्रज्वलित हो उठी। होम-रक्त से तृप्त, ज्वालाओं में लिपटी वह अति-तीव्र अग्नि सन्ध्या के सूर्य-सी प्रकट हुई। राक्षसों की समृद्धि हेतु, यज्ञ-विधान का ज्ञाता इन्द्रजित शास्त्रोक्त विधि से हवि देने लगा; यह देख नीति-अनीति के ज्ञाता राक्षस उसके पास डटे रहे।

सार: हनुमान वानरों को फिर एकत्र कर शत्रु को रोकते हैं, पर माया-सीता के वध का समाचार उन्हें श्रीराम तक पहुँचाने को विवश करता है। इन्द्रजित इसी अवसर का लाभ उठाकर निकुम्भिला में अपना होम पूरा करने चला जाता है: वही होम जो उसे अजेय बनाता है। निकुम्भिला का यह उल्लेख आगे की निर्णायक घटना का बीज है।

सीता-वध सुनकर श्रीराम की मूर्च्छा और लक्ष्मण का सान्त्वन

राक्षसों और वानरों के युद्ध का वह महान कोलाहल सुनकर राघव ने जाम्बवान से कहा, “हे सौम्य, जिस प्रकार भयंकर और अति-उच्च आयुध-ध्वनि सुनाई दे रही है, उससे लगता है हनुमान ने अवश्य कोई अति-दुष्कर कर्म किया है। अतः अपनी सेना सहित जाकर उस युद्धरत कपिश्रेष्ठ को शीघ्र सहायता दीजिए, हे ऋक्षपते।” “ऐसा ही हो” कहकर ऋक्षराज जाम्बवान अपनी सेना सहित पश्चिमी द्वार की ओर चले जहाँ हनुमान थे। वहाँ ऋक्षपति ने हनुमान को लौटते देखा, जो युद्ध कर चुके वानरों से घिरे, शोक से साँसें भरते आ रहे थे। नील-मेघ-सी, उद्यत ऋक्ष-सेना को मार्ग में युद्ध-उद्यत देख हनुमान उसे भली-भाँति रोककर लौट पड़े।

उस सेना के साथ महायशस्वी हनुमान शीघ्र राम के पास पहुँचकर दुःखी होकर बोले, “जब हम रण में लड़ रहे थे और देखते रह गए, तभी रावण-पुत्र इन्द्रजित ने रोती हुई सीता को मार डाला। हे अरिन्दम, उसे देखकर मैं उद्भ्रान्त-चित्त और विषण्ण हो उठा; अतः यह वृत्तान्त आपको सुनाने आया हूँ।” हनुमान का यह वचन सुनकर राघव शोक से मूर्च्छित होकर कटे-मूल वृक्ष-से भूमि पर गिर पड़े। देव-सरीखे राघव को गिरा देख कपि-श्रेष्ठ सब ओर से उछलकर उनके पास आए और कमल-उत्पल की सुगन्ध वाले जल से उन्हें वैसे सींचने लगे जैसे सहसा भभकती असह्य अग्नि को सींचा जाता है।

तब अत्यन्त दुःखी लक्ष्मण ने राम को बाहुओं में भरकर, अस्वस्थ राम से हेतु और अर्थ से युक्त यह वचन कहा, “हे आर्य, आप शुभ मार्ग पर स्थित और जितेन्द्रिय हैं, फिर भी धर्म आपको अनर्थों से नहीं बचा सका, अतः वह निरर्थक प्रतीत होता है। जैसे स्थावर-जंगम प्राणियों का अस्तित्व प्रत्यक्ष है, वैसे धर्म प्रत्यक्ष सुख-हेतु नहीं दीखता; अतः धर्म ही सुख का कारण नहीं, ऐसा मेरा मत है। यदि अधर्म फलदायी होता तो रावण नरक में जाता और आप धर्मयुक्त होकर कभी व्यसन न पाते। रावण व्यसन-रहित है और आप पर विपत्ति आई, मानो धर्म-अधर्म ने आपस में भूमिका बदल ली।”

एक उप-कथा: लक्ष्मण का यह धर्म-निषेधक भाषण वस्तुतः निराशा-जन्य है: माया-सीता के ‘वध’ से व्याकुल श्रीराम को देखकर उपजा। जैसे दिव्य राम का अपनी प्रिया की माया-छवि के नाश पर शोकग्रस्त होना प्रेम की लीला-मात्र है, वैसे ही राम को व्यथित देखकर लक्ष्मण का यह असंगत-सा प्रलाप भी प्रेम-जनित उद्वेग है। आगे (इसी सर्ग के अन्त में) लक्ष्मण स्वयं कहते हैं कि उन्होंने यह सब केवल राम के शोक को मिटाने और उन्हें कर्म के लिए प्रेरित करने को कहा था।

लक्ष्मण ने आगे तर्क रखे, “यदि धर्म से ही सुख और अधर्म से ही दुःख मिलता, तो अधर्मियों को केवल दुःख और धर्मियों को केवल सुख मिलता। पर जिनमें अधर्म प्रतिष्ठित है, उनकी सम्पत्ति बढ़ती है और धर्मशील क्लेश पाते हैं, अतः ये दोनों निरर्थक-से जान पड़ते हैं। यदि पापकर्मी अपने अधर्म से नष्ट होते हैं, तो वह वध-कर्मरूप अधर्म स्वयं क्षणिक होने से नष्ट हो जाता है: जो स्वयं तीन क्षण में नष्ट हो, वह किसे मारेगा? यदि धर्म दुर्बल होकर बल का सहारा माँगता है, तो वह शक्तिहीन धर्म त्याज्य ही है। यदि धर्म बल के पराक्रमों का गुण-भूत है, तो धर्म छोड़कर बल का आश्रय लीजिए जैसे अब तक धर्म का लिया।”

“यदि कहें कि पिता के सत्य-वचन की रक्षा-रूप धर्म का पालन किया, तो पिता ने आपको युवराज बनाने की घोषणा करके भी न निभाकर असत्य से आपको अलग कर दिया, क्या आप उस घोषणा से बँधे न थे? हे संताप-धारी, यदि धर्म-अधर्म प्रत्यक्ष होते तो वज्री इन्द्र मुनि (त्वष्टा-पुत्र विश्वरूप) को मारकर अश्वमेध न करते। हे राघव, धर्म तभी शत्रुओं को नष्ट करता है जब बल से युक्त हो; अतः बुद्धिमान दोनों, धर्म और बल, का यथेच्छ आश्रय लेता है। राज्य त्यागकर तब आपने धर्म के मूल, अर्थ, को ही काट डाला।”

एक उप-कथा, विश्वरूप-वध और इन्द्र का अश्वमेध: लक्ष्मण ने इन्द्र का उदाहरण दिया कि उसने त्वष्टा-पुत्र विश्वरूप-मुनि को मारा और ब्रह्म-हत्या के प्रायश्चित में अश्वमेध किया। यह कथा श्रीमद्भागवत में विस्तार से आती है: विश्वरूप तीन सिरों वाला तपस्वी था जो गुप्त रूप से असुरों को भी आहुति देता था, और इसी से इन्द्र ने उसके तीन सिर काट दिए।

“बढ़े और संचित अर्थों से ही सब क्रियाएँ वैसे प्रवृत्त होती हैं जैसे पर्वतों से नदियाँ। निर्धन, अल्प-बुद्धि की सब क्रियाएँ ग्रीष्म की छोटी नदियों-सी सूख जाती हैं। जो सुख-कामी, सुख में पला अर्थ त्यागकर पाप करने जाता है, तो दोष उपजता है। जिसके पास अर्थ है, उसके मित्र, बन्धु; वही पुरुष, वही पण्डित, वही पराक्रमी, वही बुद्धिमान, वही महाभाग, वही गुणाधिक है। अर्थ-त्याग के ये दोष मैंने इनके विपरीत रूप में बताए। हे धीर, राज्य त्यागकर सर्वस्व-त्याग का जो आपने संकल्प किया, उसका कारण मुझे ज्ञात नहीं।”

“जिसके पास अर्थ है, उसके धर्म-काम-अर्थ सब सहज सिद्ध होते हैं; पर निर्धन को यत्न के बिना अर्थ नहीं मिलता। हर्ष, काम, दर्प, धर्म, क्रोध, शम, दम, ये सब अर्थ से ही प्रवृत्त होते हैं, हे नराधिप। जिनके त्याग से धर्मशील-तपस्वियों का लोक नष्ट होता है, वे अर्थ आपमें वैसे नहीं दीखते जैसे मेघ-दिन में ग्रह नहीं दीखते। हे वीर, आपके वनवास और गुरु-वचन-पालन के बीच ही प्राणों से प्रिय आपकी भार्या रावण ने हर ली। हे वीर, इन्द्रजित ने जो विपुल दुःख दिया है, उसे मैं आज कर्म से दूर करूँगा; अतः उठिए, हे राघव!”

“उठिए, हे नर-शार्दूल, दीर्घबाहु, धृतव्रत! आप महान बुद्धिवाले परमात्मा-स्वरूप अपने को क्यों नहीं पहचानते? हे अनघ, यह सब मैंने आपकी प्रसन्नता के लिए कहा; जनक-पुत्री के विनाश को जानकर रुष्ट होकर मैं रथ-हाथी-घोड़े और राक्षसेन्द्र रावण सहित लंका को अपने बाणों से ध्वस्त कर दूँगा।”

सार: माया-सीता का वध सुनकर श्रीराम का मूर्च्छित होना उनकी मानवीय लीला है। लक्ष्मण का लम्बा धर्म-निषेधक भाषण निराशा से उपजा है, पर अन्त में वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि यह सब राम को कर्म के लिए जगाने को कहा गया। यह सर्ग रामायण के गहनतम दार्शनिक प्रसंगों में एक है: धर्म और बल के सम्बन्ध पर।

विभीषण का रहस्योद्घाटन, सीता जीवित है

भ्रातृ-वत्सल लक्ष्मण जब राम को आश्वस्त कर रहे थे, तभी गुल्मों (सेना-चौकियों) को यथास्थान बिठाकर विभीषण वहाँ आ पहुँचे: नाना आयुधधारी, काजल-राशि-से नील-अंजन-वर्ण हाथी-यूथपति-सरीखे चार वीरों से घिरे। शोक में लीन महात्मा राघव और अश्रु-पूर्ण नेत्रों वाले वानरों को देखकर विभीषण ने राघव, इक्ष्वाकु-कुल-नन्दन, को मूर्च्छित और लक्ष्मण की गोद में पड़ा पाया। राम को लज्जित और शोक-संतप्त देखकर विभीषण अन्तर्दुःख से दीन होकर बोले, “यह क्या?”

विभीषण का मुख देखकर, सुग्रीव और वानरों की ओर देखकर अश्रु-पूर्ण लक्ष्मण ने संक्षेप में कहा, “हे सौम्य, ‘इन्द्रजित ने सीता को मार डाला’, हनुमान के मुख से यह सुनकर राघव मूर्च्छित हो गए।” बोलते लक्ष्मण को रोककर विभीषण ने मूर्च्छित राम से पुष्कल-अर्थ वाला यह वचन कहा, “हे नरेन्द्र, हनुमान ने आर्त-रूप होकर जो कहा, उसे मैं समुद्र के सूख जाने-सा असम्भव मानता हूँ। हे महाबाहु, मैं दुरात्मा रावण का सीता के प्रति अभिप्राय जानता हूँ: वह सीता का वध कभी न कराएगा।”

“मैंने हित-इच्छा से बार-बार उससे याचना की कि ‘वैदेही को छोड़ दो’, पर उसने वह वचन कभी न माना। उसे न साम से, न दान से, न भेद से, और युद्ध से तो कौन कहे, कोई देख तक नहीं सकता, मारना तो दूर। वह राक्षस वानरों को मोहित कर लौट गया है; हे महाबाहु, जनक-पुत्री को उसने जो मारा, उसे माया-मयी जानिए। दुष्ट इन्द्रजित आज निकुम्भिला नामक चैत्य पर पहुँचकर होम करेगा। यदि वह होम पूरा कर लौट आया, तो इन्द्र सहित देव भी उसे रण में दुर्जय पाएँगे। निश्चय ही यह माया उसने हमें भ्रमित करने को रची, क्योंकि वानरों का पराक्रम रण में अबाधित रहता तो वे उसके यज्ञ में विघ्न डालते। अतः जब तक यज्ञ समाप्त न हो, हम सेना सहित वहाँ चलें।”

“हे नर-शार्दूल, इस मिथ्या आए संताप को त्यागिए; आपको शोक-कृश देखकर सारी सेना सीदती है। हे महाबाहु, आप उच्च-सत्त्व होकर स्वस्थ-हृदय यहाँ ठहरिए और सेना-सहित हमारे साथ लक्ष्मण को भेजिए। यह नर-शार्दूल तीक्ष्ण बाणों से उस रावण-पुत्र को उस कर्म (होम) से रोकेगा, तब वह वध्य हो जाएगा। पक्षी-पंख वाले लक्ष्मण के ये तीक्ष्ण बाण क्रूर पक्षियों-से इन्द्रजित का रक्त पिएँगे। अतः हे महाबाहु, राक्षस के विनाश हेतु शुभ-लक्षण लक्ष्मण को वैसे ही भेजिए जैसे वज्रधर इन्द्र शत्रु-नाश हेतु वज्र चलाता है।”

“हे मनुजश्रेष्ठ, शत्रु-वध में अब काल का विलम्ब उचित नहीं; आप शत्रु-वध हेतु लक्ष्मण को वैसे ही छोड़िए जैसे महेन्द्र दिविज-शत्रु के मन्थन हेतु वज्र छोड़ता है। यदि वह राक्षस-श्रेष्ठ कर्म समाप्त कर लेगा, तो रण में सुर-असुरों से भी अदृश्य हो जाएगा; कर्म पूरा करने पर युद्ध-इच्छुक उससे लड़ने में देवों को भी महान संशय होगा।”

समझने की कुंजी, निकुम्भिला का होम: इन्द्रजित का बल उसके निकुम्भिला-चैत्य में सम्पन्न होम पर टिका था: होम पूरा होने पर वह अदृश्य और देवों के लिए भी अजेय हो जाता। विभीषण का यह रहस्य ही इन्द्रजित-वध का एकमात्र मार्ग खोलता है: होम पूरा होने से पहले उस पर आक्रमण करना। यही कारण है कि लक्ष्मण को तुरन्त भेजने का परामर्श दिया जाता है।

सार: विभीषण का यह उद्घाटन इस अंक का निर्णायक मोड़ है: वे दो रहस्य खोलते हैं: मारी गई सीता असली नहीं, माया थी; और इन्द्रजित का बल निकुम्भिला-होम पर निर्भर है। शोक से उठाकर वे श्रीराम को कर्म की ओर मोड़ते हैं और लक्ष्मण को होम-विघ्न हेतु भेजने का परामर्श देते हैं, जो आगे इन्द्रजित-वध की भूमिका रचता है।

विभीषण की सलाह और लक्ष्मण का निकुम्भिला की ओर प्रस्थान

विभीषण के पहले कहे वचन सुनकर भी शोक से व्याकुल श्रीराम स्पष्ट न समझ सके कि उस राक्षस ने क्या कहा। तब धैर्य धरकर शत्रु-नगरियों के विजेता श्रीराम ने हनुमान की उपस्थिति में अपने पास बैठे विभीषण से कहा: हे राक्षसराज विभीषण, जो बात आपने कही, उसे हम फिर सुनना चाहते हैं; जो आपके मन में था, उसे दुहराइए। तब वचन-कुशल विभीषण ने अपनी पहली बात फिर कही: हे महाबाहो वीर, आपकी आज्ञा होते ही जैसा आपने कहा था वैसी ही सेना की रचना मैंने कर दी है; सब सेनाएँ यथास्थान बाँट दी गई हैं और सब यूथपति (सेना-नायक) अपने-अपने पद पर नियुक्त हैं। अब एक और निवेदन सुनिए, हे महाप्रभु। आप बिना कारण संताप में हैं; आपका कष्ट देखकर हमारे भी हृदय संतप्त होते हैं।

विभीषण बोले: हे राजन, यह शोक त्याग दीजिए; यह झूठा संताप शत्रु का ही हर्ष बढ़ाता है, अतः यह चिन्ता भी छोड़िए। हे वीर, उद्यम कीजिए और हर्ष धरिए। यदि सीता को पाना है और निशाचरों का नाश करना है, तो सुनिए: रावण-पुत्र इन्द्रजित निकुम्भिला (न्यग्रोध-वृक्ष के नीचे का यज्ञ-स्थान) पहुँच चुका है। यदि वह यज्ञ पूरा करके उठ गया, तो हम सबको मरा हुआ ही समझिए। ब्रह्मा का वर ऐसा है कि निकुम्भिला पहुँचने से पहले, हवन-अग्नि सिद्ध करने से पहले, धनुष ताने आक्रमण करने पर जो शत्रु उसे मारेगा, वही उसकी मृत्यु का कारण बनेगा। हे इन्द्रशत्रु के काल, तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयम्भू ब्रह्मा ने उसे ब्रह्मशिर नामक अस्त्र और इच्छानुसार चलने वाले अश्व दिए हैं; इसी विधान से उस बुद्धिमान राक्षस का वध भी रचा गया है।

विभीषण बोले: अतः हे राघवनन्दन, मेरा हितकर वचन सुनिए। महान सेना से घिरे सुमित्रापुत्र लक्ष्मण निकुम्भिला पहुँचे इन्द्रजित को मारने जाएँ। महाधनुर्धर, रण में सदा विजयी लक्ष्मण उस रावण-पुत्र को सर्प-विष-समान बाणों से मार सकते हैं। हे महाबाहो, उस अस्त्र-सम्पन्न राक्षस का वध इसी प्रकार रचा गया है। हे राम, इन्द्रजित के वध के लिए लक्ष्मण को भेजिए; वह मारा गया तो सकुटुम्ब रावण को मरा ही समझिए।

श्रीराम ने उत्तर दिया: हे सत्यपराक्रम, उस रौद्र राक्षस की माया मैं जानता हूँ। वह ब्रह्मास्त्र का ज्ञाता, महामायावी, महाबली है; वरुण समेत देवताओं तक को संग्राम में मूर्च्छित कर देता है। हे वीर, जब वह सरथ आकाश में विचरता है, तब उसकी गति वैसे ही नहीं जानी जाती जैसे बादलों के पीछे चलते सूर्य की। उस दुरात्मा शत्रु की माया-शक्ति जानकर श्रीराम ने कीर्तिसम्पन्न लक्ष्मण से कहा: हनुमान-प्रमुख यूथपतियों के साथ, समस्त सुग्रीव-सेना से घिरकर, और सेना समेत ऋक्षराज जाम्बवान से सुरक्षित होकर, उस मायाबली राक्षस-पुत्र को मार डालिए। यह महात्मा राक्षस विभीषण, जो उसकी मायाओं को भलीभाँति जानते हैं, अपने मन्त्रियों समेत आपके पीछे-पीछे चलेंगे।

श्रीराम का यह वचन सुनकर भीमपराक्रम लक्ष्मण ने विभीषण के साथ एक और श्रेष्ठ धनुष उठाया। कवच पहने, खड्ग और बाणों से सज्जित, बाएँ हाथ में धनुष धारण किए सुमित्रापुत्र ने श्रीराम के चरण छूकर हर्ष से कहा: हे आर्य, आज मेरे धनुष से छूटे बाण रावण-पुत्र को बेधकर लंका में वैसे ही जा गिरेंगे जैसे हंस कमल-सरोवर में उतरते हैं। आज ही मेरे महान धनुष की डोरी से छूटे बाण उस रौद्र राक्षस का शरीर बेधकर उसे चूर कर देंगे। ज्येष्ठ भ्राता के सामने यह कहकर रावण-पुत्र के वध के अभिलाषी तेजस्वी लक्ष्मण शीघ्र चल पड़े।

ज्येष्ठ भ्राता के चरणों को प्रणाम कर और उनकी प्रदक्षिणा करके लक्ष्मण इन्द्रजित से रक्षित निकुम्भिला-चैत्य की ओर बढ़े। ज्येष्ठ भ्राता ने मंगल-मन्त्रों से जिनका स्वस्तिवाचन किया, वे प्रतापी राजकुमार लक्ष्मण विभीषण के साथ शीघ्र चल दिए। सहस्रों वानरों से घिरे हनुमान और मन्त्रियों समेत विभीषण भी शीघ्र लक्ष्मण के पीछे हुए। महान वानर-सेना के साथ बढ़ते लक्ष्मण ने मार्ग में खड़ी ऋक्षराज जाम्बवान की सेना भी देखी। बहुत दूर का मार्ग चलकर मित्रनन्दन सुमित्रापुत्र ने दूर से ही व्यूह में स्थित राक्षसेन्द्र की सेना देखी। निकुम्भिला पहुँचकर शत्रुदमन लक्ष्मण धनुष हाथ में लिए, ब्रह्मा के विधान (इन्द्रजित को दिए वर) के अनुसार उसे जीतने को डट गए।

विभीषण, वीर अंगद और पवनपुत्र हनुमान के साथ प्रतापी राजकुमार लक्ष्मण ने शत्रु की उस विचित्र सेना में प्रवेश किया, जो निर्मल अस्त्रों से चमकती, ध्वजाओं से सघन, महारथों से भरी, अत्यन्त भयानक और अपरिमित वेग वाली थी; मानो कोई गहन अन्धकार को चीरकर भीतर घुस रहा हो।

समझने की कुंजी (स्थान): “निकुम्भिला” लंका के बाहर का एक वट-वृक्ष (न्यग्रोध) के नीचे का गुप्त यज्ञ-स्थल है। इन्द्रजित यहीं अग्नि में आहुति देकर ब्रह्मा से प्राप्त रथ और अदृश्य होने की शक्ति सिद्ध करता है। ब्रह्मा का वर यह था कि यदि यह यज्ञ अधूरा रहते हुए, अग्नि सिद्ध होने से पूर्व कोई शत्रु उस पर आक्रमण कर दे, तो वही उसकी मृत्यु बनेगा। पूरी रणनीति इसी “अधूरे यज्ञ पर समय रहते आघात” पर टिकी है।

सार: विभीषण श्रीराम को बताते हैं कि इन्द्रजित निकुम्भिला में गुप्त यज्ञ कर रहा है; यदि वह सिद्ध हो गया तो अजेय हो जाएगा। श्रीराम लक्ष्मण को हनुमान, अंगद, जाम्बवान और मायाज्ञ विभीषण के साथ उसका वध करने भेजते हैं। लक्ष्मण निकुम्भिला पहुँचकर राक्षस-सेना का व्यूह चीरते हुए भीतर घुसते हैं।

हनुमान का प्रचण्ड संहार और इन्द्रजित का रण-प्रवेश

उस अवसर पर शुभलक्षण लक्ष्मण को रावण के अनुज विभीषण ने शत्रु के लिए घातक और अर्थसाधक सलाह दी: यह जो मेघ-समान श्याम राक्षस-सेना दीख रही है, इसे शिलायुधधारी वानरों से शीघ्र युद्ध में उलझा दीजिए। हे लक्ष्मण, इस महान सेना को तोड़ने का यत्न कीजिए; यह सेना तोड़ी जाएगी तो राक्षसेन्द्र-पुत्र इन्द्रजित यहीं प्रकट हो जाएगा। अतः जब तक इन्द्रजित का यह यज्ञ-कार्य पूरा न हो, तब तक शीघ्र इन्द्र-वज्र-समान बाणों से शत्रुओं को ढककर आक्रमण कीजिए। हे वीर, उस मायापरायण, सर्वलोक-भयकारी, क्रूरकर्मा, दुरात्मा रावण-पुत्र को मार डालिए।

विभीषण का परामर्श सुनकर लक्ष्मण ने राक्षसेन्द्र-पुत्र की ओर बाण-वर्षा आरम्भ कर दी। शिलायुध वानरों और वृक्षयोधी भालुओं ने मिलकर उस व्यूह में स्थित सेना पर धावा बोला; राक्षसों ने भी कपि-सेना का संहार करने को तीक्ष्ण बाणों, खड्गों, शक्तियों और तोमरों से प्रतिआक्रमण किया। वानरों-राक्षसों का वह तुमुल संग्राम महाशब्द से समूची लंका को गुँजा उठा। विकृत मुख और भुजाओं वाले राक्षसों ने वानर-प्रमुखों पर शस्त्र चलाकर महान भय उत्पन्न किया, और महाकाय बलवान वानरों-भालुओं ने भी वृक्षों और पर्वत-शिखरों से सब राक्षसों को घायल किया।

अपनी सेना को शत्रुओं से पीड़ित सुनकर दुर्धर्ष इन्द्रजित अधूरे यज्ञ से ही उठ खड़ा हुआ। वृक्षों की छाया के अन्धकार से निकलकर, क्रोध से भरा वह रावण-पुत्र अपने सुसज्जित, अश्व-जुते रथ पर चढ़ गया। ताम्र मुख, रक्त नेत्र, भीषण धनुष-बाण धारण किए वह काले अंजन-राशि-सा भयंकर राक्षस अन्तक-समान शोभा पाने लगा। उसे रथ पर देखते ही लक्ष्मण से युद्ध को उत्सुक भीमवेग राक्षस-सेना उसके चारों ओर घिर आई।

उसी समय पर्वत-सरीखे शत्रुदमन हनुमान ने एक दुर्धर्ष महावृक्ष उखाड़ लिया। कालाग्नि-से राक्षस-सेना को भस्म करते हुए हनुमान ने अनेक वृक्षों से उसे रण में निःसंज्ञ कर दिया। पवनपुत्र को वेग से सेना का विध्वंस करते देख सहस्रों राक्षसों ने उन पर शस्त्र-वर्षा कर दी। शूलधारी शूलों से, खड्गधारी खड्गों से, शक्तिधारी शक्तियों से, पट्टिशधारी पट्टिशों से, तथा अन्य परिघ, गदा, कुन्त, सैकड़ों शतघ्नी, लोहे के मुद्गर, घोर फरसे, भिन्दिपाल, वज्र-समान मुक्के और अशनि-से थप्पड़ लेकर पर्वत-से हनुमान पर सब ओर से टूट पड़े। क्रुद्ध हनुमान ने उन सबका भी महान संहार कर डाला।

इन्द्रजित ने उस पर्वताकार पवनपुत्र को निर्भय होकर अपने शत्रुओं को मारते देखा और सारथि से कहा: जहाँ यह वानर है वहीं रथ ले चलो; उपेक्षा की तो यह हम सब राक्षसों का नाश कर देगा। ऐसा कहने पर सारथि उस दुर्धर्ष इन्द्रजित को रथ पर लेकर हनुमान के पास पहुँचा। निकट आकर उस राक्षस ने वानर के सिर पर बाण, खड्ग, पट्टिश और फरसे बरसाए। उन घोर शस्त्रों को सहते हनुमान महान रोष से भरकर बोले: हे दुर्बुद्धि रावण-पुत्र, शूर हों तो युद्ध कीजिए। पवनपुत्र से भिड़कर आप जीवित न लौटेंगे। यदि मुझसे द्वन्द्व-युद्ध करना है तो भुजाओं से लड़िए; मेरा वेग सह सकें तो आप राक्षसों में श्रेष्ठ माने जाएँगे।

हनुमान को मारने के लिए धनुष उठाए इन्द्रजित को विभीषण ने लक्ष्मण को दिखाया: हे सौमित्र, रथ पर बैठा यह रावण-पुत्र इन्द्रजित ही इन्द्र का विजेता है; यही हनुमान को मारना चाहता है। अपने अनुपम, शत्रुनिवारक, जीवनान्तकारी घोर बाणों से इसे मार डालिए। विभीषण के ऐसा कहने पर महात्मा लक्ष्मण ने रथ पर स्थित, पर्वत-से, भीमबल, दुर्धर्ष उस राक्षस की ओर दृष्टि गड़ाई।

सार: विभीषण की सलाह पर लक्ष्मण राक्षस-सेना पर बाण-वर्षा करते हैं; तुमुल युद्ध छिड़ता है। अधूरे यज्ञ से ही उठकर इन्द्रजित रथ पर रण में आता है। हनुमान महावृक्ष से राक्षस-सेना का संहार करते हैं और इन्द्रजित को द्वन्द्व की चुनौती देते हैं। विभीषण लक्ष्मण को इन्द्रजित दिखाते हैं, और लक्ष्मण उसकी ओर बढ़ते हैं।

इन्द्रजित और विभीषण का तीखा वाग्-विवाद

विभीषण लक्ष्मण और वानरों को वटवृक्ष के नीचे हवन करते इंद्रजित की ओर संकेत करते हैं।

लक्ष्मण से ऐसा कहकर हर्षित विभीषण उन्हें साथ लेकर शीघ्र चल पड़े। थोड़ी दूर जाकर एक विशाल वन में प्रवेश कर रावण के अनुज ने लक्ष्मण को वह स्थान दिखाया जहाँ इन्द्रजित अग्नि में आहुति देता था। नील मेघ-से, भयानक दिखने वाले एक वट-वृक्ष की ओर संकेत कर तेजस्वी विभीषण बोले: यहाँ बलवान रावण-पुत्र भूतों को बलि देकर फिर युद्ध को निकलता है। उसके बाद वह राक्षस समस्त प्राणियों के लिए अदृश्य हो जाता है, और रण में अदृश्य रहकर शत्रुओं को मारता तथा श्रेष्ठ बाणों से बाँध लेता है। अतः जब तक यह बलवान रावण-पुत्र इस वट-वृक्ष तक न पहुँचे, तभी इसे रथ, अश्व और सारथि समेत दीप्त बाणों से नष्ट कर दीजिए।

“तथास्तु” कहकर महातेजस्वी मित्रनन्दन लक्ष्मण वहीं अपने विचित्र धनुष को पूरा तानकर डट गए। तभी अग्नि-वर्ण रथ पर बैठा, कवच पहने, खड्ग धारण किए, ध्वजायुक्त बलवान रावण-पुत्र इन्द्रजित प्रकट हुआ। महातेजस्वी लक्ष्मण ने उस सदा-अपराजित पौलस्त्य इन्द्रजित से कहा: मैं आपको युद्ध को ललकारता हूँ; रण में सम्मुख आकर मुझसे लड़िए।

ऐसा कहे जाने पर तेजस्वी मनस्वी इन्द्रजित ने वहाँ विभीषण को देखकर कठोर वचन कहे: हे राक्षस, इसी कुल में जन्मे-पले आप मेरे पिता के सगे भाई और मेरे चाचा हैं; फिर अपने भतीजे (पुत्र-तुल्य) से ऐसा द्रोह क्यों करते हैं? हे दुर्बुद्धि, हे धर्मदूषक, आप में न ज्ञातित्व है, न सौहार्द, न कुल का गौरव, न विवेक, न भ्रातृभाव, न धर्म। हे दुष्ट, अपने स्वजनों को छोड़कर शत्रु की सेवा करने वाले आप साधुजनों के द्वारा शोचनीय और निन्दनीय हैं। ढीली बुद्धि से आप इस बड़े अन्तर को नहीं समझते कि कहाँ स्वजनों के बीच निवास और कहाँ नीच पराश्रय। हे नीच, गुणवान पराया हो या निर्गुण स्वजन, निर्गुण स्वजन ही श्रेष्ठ है; जो पराया है वह पराया ही रहता है। जो अपना पक्ष त्यागकर पराये पक्ष का सेवन करता है, उसे अपने पक्ष के नष्ट होने पर वे ही शत्रु मार डालते हैं। हे रावण के अनुज, अपना मर्म दिखाने में जो निर्दयता और लक्ष्मण को यहाँ लाने में जो पराक्रम आपने दिखाया, वह स्वजन ही दिखा सकता था।

भतीजे के ऐसे वचन पर विभीषण ने उत्तर दिया: हे राक्षस, मेरे स्वभाव को न जानते हुए की भाँति व्यर्थ क्यों बकते हैं? हे राक्षसेन्द्र-पुत्र, बड़प्पन का आदर रखकर कठोर वाणी त्याग दीजिए। यद्यपि मैं क्रूरकर्मा राक्षस-कुल में जन्मा, तथापि मनुष्यों का प्रथम गुण जो सत्त्व है, वही मेरा स्वभाव है; मेरा शील राक्षस-सा नहीं। मैं न क्रूरता में रमता, न अधर्म में। पर विषमशील भाई को भाई कैसे निकाल बाहर करे? जो धर्म से भ्रष्ट, पापनिश्चयी पुरुष को त्याग देता है, वह वैसे ही सुख पाता है जैसे हाथ से विषधर सर्प को झटक देने वाला।

विभीषण बोले: पराये धन का हरण, परस्त्री-स्पर्श और सुहृदों पर अति-शंका, ये तीन दोष नाश लाते हैं। महर्षियों का घोर वध, सब देवताओं से वैर, अभिमान, क्रोध, स्थायी शत्रुता और प्रतिकूलता, जीवन और ऐश्वर्य का नाश करने वाले इन दोषों ने मेरे भाई रावण के गुणों को वैसे ढक दिया जैसे मेघ पर्वतों को। इन्हीं दोषों के कारण मैंने अपने भाई और आपके पिता को त्याग दिया। अब न यह लंकापुरी रहेगी, न आप, न आपके पिता। हे राक्षस, अतिमानी, बालबुद्धि, उद्दण्ड और कालपाश में बँधे आप जो चाहें कहें। मुझे कठोर कहकर आज आप पर संकट आ पड़ा है; अब आप इस वट-वृक्ष तक न पहुँच सकेंगे। श्रीराम का अपमान करके आप जीवित न रहेंगे। राजकुमार लक्ष्मण से रण में लड़िए; मारे जाकर यमलोक पहुँचकर आप देवताओं का कार्य सिद्ध करेंगे। अपना सारा बल और सब अस्त्र-बाण लगा दीजिए; पर लक्ष्मण के बाण-पथ में आकर आज आप सेना समेत जीवित न लौटेंगे।

समझने की कुंजी (अवधारणा): यह संवाद वाल्मीकि का एक नीति-प्रसंग है। इन्द्रजित कुल और रक्त-सम्बन्ध की दुहाई देता है (“स्वजन निर्गुण भी हो तो पराये गुणी से श्रेष्ठ है”)। विभीषण इसका उत्तर धर्म-दृष्टि से देते हैं: पापी, अधर्मी का त्याग ही श्रेय है। दोनों पक्ष अपने-अपने धर्म-तर्क रखते हैं; यही वाल्मीकि की युद्ध-काव्य की विशेषता है कि शत्रु को भी अपना तर्क मिलता है।

सार: विभीषण लक्ष्मण को इन्द्रजित का गुप्त यज्ञ-स्थल दिखाते हैं और वट-वृक्ष तक पहुँचने से पूर्व उसे मारने को कहते हैं। इन्द्रजित प्रकट होकर विभीषण को कुलद्रोही कहकर कोसता है; विभीषण धर्म की दुहाई देकर उत्तर देते हैं कि पापी का त्याग ही उचित है, और इन्द्रजित को लक्ष्मण से युद्ध की चुनौती देते हैं।

लक्ष्मण और इन्द्रजित का घोर बाण-युद्ध

विभीषण के वचन सुनकर क्रोध से मूर्च्छित इन्द्रजित ने फिर कठोर वाणी कही और झपटकर आगे बढ़ा। काले अश्वों से जुते रथ पर, उठाए हुए धनुष-खड्ग के साथ, भीमबल इन्द्रजित कालान्तक-सा प्रतीत हुआ। हनुमान के कंधों पर चढ़े, उदयाचल पर उगते सूर्य-से शोभायमान लक्ष्मण को देखकर वह विभीषण और वानरश्रेष्ठों समेत लक्ष्मण से बोला: मेरा पराक्रम देखिए। आज आप मेरे धनुष से छूटी आकाश में बादलों की वर्षा-सी दुर्धर्ष बाण-वर्षा सहेंगे। मेरे बाण आप सबके शरीरों को वैसे जलाएँगे जैसे अग्नि रुई के ढेर को। तीक्ष्ण बाणों से बेधकर शूल, शक्ति, ऋष्टि और तोमर से मैं आप सबको आज यमलोक भेज दूँगा। मेघ-से गरजते मुझसे रण में कौन सम्मुख ठहर सकता है? पहले रात्रि-युद्ध में मैंने आप दोनों को सहायकों समेत वज्र-अशनि-से बाणों से मूर्च्छित कर भूमि पर सुला दिया था। जान पड़ता है वह स्मृति आपको नहीं रही, या स्पष्ट ही आप यमलोक जाने को तत्पर हैं, जो आशीविष-समान क्रुद्ध मुझसे लड़ने आए हैं।

राक्षसेन्द्र की यह गर्जना सुनकर क्रुद्ध लक्ष्मण ने निर्भय मुख से उत्तर दिया: हे राक्षस, आपने अपने कार्यों की सिद्धि का बखान किया; पर कार्य का पार जो कर्म से पाता है, वही बुद्धिमान है, केवल वचन से नहीं। हे दुर्बुद्धि, जो दूसरों के लिए दुष्प्राप्य है, उसे वचनमात्र से कहकर आप स्वयं को कृतार्थ समझते हैं। अदृश्य होकर युद्ध करना जो आपने अपनाया, वह चोरों का मार्ग है, वीरों का नहीं। अब मैं आपके बाण-पथ में आकर खड़ा हूँ; आज अपना तेज दिखाइए; वचन से क्यों बखानते हैं?

ऐसा कहे जाने पर महाबली इन्द्रजित ने अपने भीषण धनुष को छूकर तीक्ष्ण बाण छोड़े। सर्प-विष-समान महावेग बाण लक्ष्मण तक पहुँचकर फुफकारते सर्पों-से उन्हें बेध गए। शुभलक्षण लक्ष्मण के शरीर को इन्द्रजित ने अति-वेगवान बाणों से छेद डाला; रक्त में सने, अंग-अंग बिंधे लक्ष्मण धूमरहित अग्नि-से शोभा पाने लगे। अपने कर्म पर अभिमान करता इन्द्रजित पास आकर महानाद कर बोला: हे सौमित्र, मेरे धनुष से छूटे ये पंखयुक्त, तीक्ष्ण-धार, जीवनान्तकारी बाण आज आपके प्राण ले लेंगे। मुझसे मारे गिरे आप पर सियार, श्येन और गीध टूटेंगे। आज ही नीच क्षत्रबन्धु आपको, अपना भक्त अनुज, मुझसे मारा हुआ देखकर परम दुर्बुद्धि राम विलाप करेगा। कवच छिनकर, धनुष फेंककर, सिर कटकर भूमि पर पड़े आपको वह आज देखेगा।

ऐसा कठोर बोलते इन्द्रजित को अर्थज्ञ लक्ष्मण ने युक्तियुक्त उत्तर दिया: हे क्रूरकर्मा दुर्बुद्धि राक्षस, वाणी का बल छोड़िए; जो कहते हैं उसे उत्तम कर्म से सिद्ध कीजिए। बिना कर्म किए बखानते क्यों हैं? वह कर्म कीजिए जिससे मैं आपकी डींग पर विश्वास करूँ। मैं कठोर वचन कहे बिना, तनिक भी न बखानते हुए, आपको मारूँगा; देखिए। ऐसा कहकर लक्ष्मण ने कान तक खींचकर पाँच नाराच (लोहे के बाण) महावेग से राक्षस की छाती में गड़ा दिए। सुन्दर पंखों से सजे जलते सर्पों-से वे बाण इन्द्रजित की छाती में सूर्य-किरणों-से शोभा पाने लगे।

क्रुद्ध इन्द्रजित ने तीन सुप्रयुक्त बाणों से लक्ष्मण को बेधा। नर-सिंह लक्ष्मण और राक्षस-सिंह इन्द्रजित का परस्पर-जय चाहने वाला तुमुल मर्दन-युद्ध इन्द्र-वृत्र के संग्राम-सा भयंकर हुआ। बल और पराक्रम में समान, दुर्जय वे दोनों आकाश में स्थित ग्रहों-से, या दो सिंहों-से जूझने लगे; अनेक बाण-समूह छोड़ते हुए डटे रहे। तब अमित्रकर्षण दाशरथि लक्ष्मण ने सर्प-से फुफकारते क्रुद्ध होकर राक्षसेन्द्र पर बाण छोड़े। ज्या-तल का घोष सुनकर विवर्ण-मुख इन्द्रजित ने लक्ष्मण की ओर देखा। उसका पीला मुख देखकर विभीषण ने युद्धरत लक्ष्मण से कहा: हे महाबाहो, मुख पर पीलेपन-से जो लक्षण दीख रहे हैं, उनसे निश्चय है कि यह रावण-पुत्र भग्न (हताश) हो चुका है; अब शीघ्रता कीजिए।

तब सुमित्रापुत्र ने आशीविष-समान बाण जोड़कर इन्द्रजित पर छोड़े। शक्र-वज्र-से बाणों से बिंधा इन्द्रजित मुहूर्तभर मूढ़ हो गया; उसकी सब इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो उठीं। मुहूर्त में संज्ञा पाकर, इन्द्रियाँ लौटने पर इन्द्रजित ने रण में डटे वीर दाशरथि लक्ष्मण को देखा, और रोष से रक्त-नेत्र होकर उन पर झपटा। पास आकर फिर कठोर बोला: क्या आपको पहले युद्ध का मेरा पराक्रम स्मरण नहीं, जब मैंने आपको भाई समेत बाँधकर रण में तड़पाया था? आप दोनों भाई महायुद्ध में पहले ही वज्र-अशनि-से बाणों से मूर्च्छित होकर सहायकों समेत भूमि पर पड़ गए थे। जान पड़ता है वह स्मृति आपको नहीं, या आप स्पष्ट ही यमसदन जाना चाहते हैं। यदि पहले युद्ध में मेरा पराक्रम न देखा हो, तो आज दिखाऊँगा; अब डटे रहिए।

ऐसा कहकर उसने सात बाणों से लक्ष्मण को और दस तीक्ष्ण बाणों से हनुमान को बेधा; फिर दुगुने क्रोध से सौ बाणों से विभीषण को बेध डाला। इन्द्रजित का यह कर्म देखकर “यह कुछ नहीं” कहते हुए हँसकर श्रीराम-अनुज लक्ष्मण ने घोर बाण लेकर रावण-पुत्र पर छोड़े और बोले: हे निशाचर, शूर रण में ऐसे प्रहार नहीं करते; ये हल्के, अल्पबल बाण तो मेरे लिए सुखकर ही हैं; युद्धाभिलाषी शूर ऐसे नहीं लड़ते। ऐसा कहते हुए धनुर्धर लक्ष्मण ने इन्द्रजित को बाणों से ढक दिया। उनके बाणों से इन्द्रजित का बड़ा सोने का कवच रथ में आकाश से तारों-के-जाल-सा टूटकर बिखर गया।

फिर महातेजस्वी क्रुद्ध इन्द्रजित ने सहस्र बाणों से लक्ष्मण को बेध डाला; लक्ष्मण का दिव्य कवच भी टूट गया। शत्रुदमन वे दोनों परस्पर वार और प्रतिवार करने लगे। सुवर्ण-पुंख नाराचों से घायल, यश के अभिलाषी वे दोनों वीर रक्त बहाने लगे। बहुत समय युद्ध करते हुए वे दो काले प्रलय-मेघों-से घोर बाण-वर्षा करते रहे; पर न रण से विमुख हुए, न थके। बार-बार अस्त्र दिखाते वे अस्त्रवेत्ता आकाश में छोटे-बड़े बाणों का जाल बुनते रहे। उनके ज्या-तल का भयानक घोष वज्रपात-सा लोगों को कँपा देता था। बाण-जालों से बिंधे वे दोनों महावीर वृक्षों से भरे दो पर्वतों-से शोभा पाने लगे। रक्त से सने उनके सब अंग जलती अग्नियों-से चमकने लगे। बहुत काल बीत गया, पर न वे विमुख हुए, न थके। तब समर में अजेय लक्ष्मण का श्रम मिटाने और उन्हें प्रिय-हित पहुँचाने को महात्मा विभीषण रणभूमि में उनके पास आ डटे।

सार: इन्द्रजित और लक्ष्मण के बीच लम्बा, समान-बल का घोर बाण-युद्ध छिड़ता है। दोनों एक-दूसरे को बेधते, कवच तोड़ते, रक्त बहाते रहते हैं। बीच-बीच में इन्द्रजित गर्जता है, लक्ष्मण उत्तर देते हैं। विभीषण देखते हैं कि इन्द्रजित का मुख पीला (हताश) पड़ रहा है, और लक्ष्मण का श्रम मिटाने उनके पास आ खड़े होते हैं।

विभीषण का आक्रमण और इन्द्रजित के सारथि-अश्वों का वध

परस्पर-जय चाहते, मतवाले हाथियों-से लड़ते उस नर और राक्षस को देखकर श्रेष्ठ धनुष धारण किए बलवान विभीषण उनका युद्ध देखने को संग्राम-मुख पर डट गए। स्थिर होकर उन्होंने अपना महान धनुष खींचा और राक्षसों पर तीक्ष्ण-अग्र महाबाण छोड़े। अग्नि-स्पर्श-से वे बाण घनी वर्षा-से गिरते हुए राक्षसों को वैसे चीरने लगे जैसे वज्र महान पर्वतों को। विभीषण के राक्षस-अनुचरों ने भी शूल, खड्ग और पट्टिशों से वीर राक्षसों को चीर डाला। उन राक्षसों से घिरे विभीषण मतवाले हाथी-शावकों के बीच गजराज-से शोभित हुए।

तब राक्षस-वध के प्रेमी वानरों को उत्साहित करते हुए कालज्ञ राक्षसश्रेष्ठ विभीषण ने अवसरोचित वचन कहे: हे वानरेश्वरो, यहाँ राक्षसेन्द्र का यही एक अन्तिम सहारा (इन्द्रजित) खड़ा है, और यही उसकी शेष सेना है; आप निष्क्रिय क्यों खड़े हैं? रण में इस पापी के मारे जाने पर रावण को छोड़ शेष सब सेना मरी हुई ही है। शूर प्रहस्त, महाबली निकुम्भ, कुम्भकर्ण, कुम्भ, निशाचर धूम्राक्ष, जम्बुमाली, महामाली, तीक्ष्णवेग, अशनिप्रभ, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, वज्रदंष्ट्र, संह्रादी, विकट, अरिघ्न, तपन, मन्द, प्रघास, प्रघस, प्रजंघ, जंघ, दुर्धर्ष अग्निकेतु, वीर्यवान रश्मिकेतु, विद्युज्जिह्व, द्विजिह्व, सूर्यशत्रु, अकम्पन, सुपार्श्व, चक्रमाली, कम्पन, देवान्तक और नरान्तक, ये सब अतिबल राक्षसश्रेष्ठ मारे जा चुके हैं। इन्हें मारकर आप मानो भुजाओं से समुद्र तर चुके; अब इस गाय के खुर-भर तालाब (शेष सेना) को सहज लाँघ जाइए।

विभीषण बोले: चाचा होकर पिता-तुल्य मैं अपने पुत्र-तुल्य भतीजे का वध करूँ, यह उचित नहीं; पर राम के लिए दया त्यागकर मैं भाई के पुत्र (इन्द्रजित) को मार भी सकता हूँ। पर मारने की इच्छा होते ही मेरी आँखें आँसुओं से रुक जाती हैं, अतः इसे महाबाहु लक्ष्मण ही शान्त करेंगे। हे वानरो, मिलकर इसके पास खड़े सेवकों को मार डालिए। उस अति-यशस्वी विभीषण से उत्साहित होकर हर्षित वानर-यूथपति पूँछें पटककर सिंहनाद करने लगे, और मेघ देखकर मयूरों-से भाँति-भाँति के स्वर छोड़ने लगे। अपने यूथों से घिरे जाम्बवान भी वानरों समेत पत्थरों, नखों और दाँतों से राक्षसों को मारने लगे।

राक्षस-संहार करते ऋक्षराज जाम्बवान को महाबली राक्षसों ने भय त्यागकर अनेक आयुधों से घेर लिया और बाण, फरसे, पट्टिश, यष्टि और तोमरों से उन पर प्रहार किया। वानरों और राक्षसों का वह तुमुल संग्राम क्रुद्ध देव-असुरों के युद्ध-सा भयानक हुआ। क्रुद्ध हनुमान ने भी पर्वत से साल-वृक्ष उखाड़ा; लक्ष्मण को अपनी पीठ से उतारकर महामनस्वी दुर्धर्ष हनुमान ने अनेक वृक्षों से सहस्रों राक्षसों का संहार किया। उधर परस्पर-जय चाहते लक्ष्मण और इन्द्रजित परस्पर बाण-वर्षा करते रहे; ग्रीष्मान्त में मेघों से ढके सूर्य-चन्द्र-से वे दोनों एक-दूसरे को बार-बार बाण-जालों से आच्छादित करते रहे। हाथ की फुर्ती से यह जाना ही न जाता था कि वे कब धनुष-डोरी पकड़ते, कब तरकश से बाण निकालते, कब उन्हें छाँटते-जोड़ते, कब धनुष तानते, कब बाण छोड़ते और कब लक्ष्य बेधते। बाण-जालों से आकाश ढक गया और अन्धकार-सा छा गया; राम-रावण-पुत्र (लक्ष्मण-इन्द्रजित) के परस्पर-संघर्ष से दोनों सेनाओं में घोर भगदड़ मच गई।

सूर्य अस्त होने और सब ओर अन्धकार छाने पर रक्त की सहस्रों महानदियाँ बहने लगीं। दारुण माँसभक्षी जन्तु भयानक स्वर करने लगे; उस समय न वायु बही, न अग्नि जली। “लोकों का कल्याण हो”, यह कहते महर्षि वहाँ संतप्त हुए, और गन्धर्व-चारण व्यथित होकर भाग गए। इसी बीच सुमित्रापुत्र लक्ष्मण ने राक्षससिंह इन्द्रजित के सोने के आभूषणों से सजे चार काले अश्वों को चार बाणों से बेधा। फिर एक और पीले, तीक्ष्ण, सुन्दर पंखों वाले, महेन्द्र-वज्र-से भल्ल से, हाथ की फुर्ती से, ज्या-तल के घोष से गूँजते हुए, उस घूमते रथ पर बैठे इन्द्रजित के सारथि का सिर श्रीमान लक्ष्मण ने धड़ से अलग कर दिया। सारथि मारे जाने पर महातेजस्वी मन्दोदरी-पुत्र इन्द्रजित ने स्वयं ही सारथ्य किया और फिर धनुष भी सँभाला; देखने वालों को रण में यह अद्भुत सारथ्य चकित कर गया।

जब इन्द्रजित के हाथ अश्वों में उलझे होते, लक्ष्मण उसे तीक्ष्ण बाणों से बेधते, और जब वह धनुष में व्यग्र होता तब अश्वों पर बाण छोड़ते। शीघ्रकर्मा सुमित्रापुत्र ने उन छिद्रों में निर्भय-सा विचरते इन्द्रजित को बाण-समूहों से पीड़ित किया। रण में सारथि मारा देखकर रावण-पुत्र युद्ध का उत्साह खोकर विषण्ण हो गया। राक्षस का विषण्ण मुख देखकर परम हर्षित वानर-यूथपतियों ने लक्ष्मण की प्रशंसा की। तब प्रमाथी, रभस, शरभ और गन्धमादन, चार वानरश्रेष्ठ अपना वेग न रोक सके; भीमविक्रम वे चारों इन्द्रजित के चार उत्तम अश्वों पर कूद पड़े। उन पर्वत-से वानरों के भार से दबे अश्वों के मुखों से रक्त बहने लगा; कुचले-मसले वे प्राणहीन होकर भूमि पर गिर पड़े। अश्वों को मारकर, महान रथ चूर करके वे वानर फिर वेग से उछलकर लक्ष्मण के पास आ खड़े हुए। हताश्व इन्द्रजित मारे गए सारथि वाले रथ से कूदकर बाण-वर्षा से लक्ष्मण पर टूट पड़ा; पर महेन्द्र-समान लक्ष्मण ने उत्तम बाण छोड़ते उस पैदल हुए इन्द्रजित को बाण-समूहों से बुरी तरह घायल कर डाला।

एक उप-कथा: विभीषण की उत्साह-वाणी में जो राक्षसों की लम्बी सूची है (प्रहस्त, कुम्भकर्ण, कुम्भ, धूम्राक्ष, अकम्पन, देवान्तक, नरान्तक आदि), वह कोई शोभा-मात्र नहीं; ये सभी पूरे युद्धकाण्ड में पहले मारे जा चुके योद्धा हैं। विभीषण की गिनती यह स्मरण कराती है कि लंका की समूची शक्ति क्रमशः नष्ट हो चुकी है और अब केवल इन्द्रजित और रावण शेष हैं। यह सूची युद्ध की प्रगति का लेखा-जोखा है।

सार: विभीषण और हनुमान राक्षस-सेना का संहार करते हैं; विभीषण मारे गए सब राक्षसों को गिनाकर वानरों को उत्साहित करते हैं। सूर्यास्त के बाद घोर निशायुद्ध में लक्ष्मण इन्द्रजित के सारथि का सिर काटते हैं; इन्द्रजित स्वयं सारथ्य करता है, पर वानर उसके अश्व और रथ नष्ट कर देते हैं और इन्द्रजित पैदल रह जाता है।

इन्द्रजित का वध

हताश्व होकर भूमि पर खड़ा महातेजस्वी निशाचर इन्द्रजित परम क्रोध से तेज में जलने लगा। दोनों धनुर्धर एक-दूसरे को बाणों से मारने को उद्यत होकर, वन में विजय को निकले दो गजराज-वृषभों-से भिड़ गए। राक्षस और वानर परस्पर वध करते हुए इधर-उधर झपटते, पर रण में अपने स्वामी को न छोड़ते। तब अपने राक्षसों को उत्साहित और स्वयं हर्षित होते इन्द्रजित ने कहा: हे राक्षसश्रेष्ठो, यह अन्धकार सब ओर छाया है; अपना-पराया जानना कठिन है। आप वानरों को मोहित (भ्रमित) करने को साहस से लड़ते रहिए; मैं रथ लेकर लौटूँगा। ऐसा प्रबन्ध कीजिए कि मेरे नगर में घुसते समय ये महाबली वानर मुझसे युद्ध न कर सकें। ऐसा कहकर रावण-पुत्र वानरों को छलकर दूसरा रथ लेने नगर में घुस गया।

एक सुन्दर, स्वर्ण-जटित, प्रास-खड्ग-बाणों से युक्त, उत्तम अश्वों से जुते, अश्वों के मन को पढ़ने वाले हितैषी सारथि से अधिष्ठित रथ को सजाकर समितिंजय (युद्धविजयी) इन्द्रजित उस पर चढ़ा। श्रेष्ठ राक्षस-गणों से घिरा, कृतान्त-बल से प्रेरित मन्दोदरी-पुत्र वीर इन्द्रजित फिर नगर से निकला। नगर से निकलकर परम-ओज इन्द्रजित ने वेगवान अश्वों से विभीषण समेत लक्ष्मण पर धावा बोला। रथ पर बैठे रावण-पुत्र को देखकर सुमित्रापुत्र लक्ष्मण, महावीर्य वानर और विभीषण उस बुद्धिमान राक्षस की फुर्ती पर अत्यन्त विस्मित हुए। क्रुद्ध इन्द्रजित ने सैकड़ों-सहस्रों बाणों से वानर-यूथपतियों को गिराया; उन्होंने प्रजापति-की-शरण-प्राणियों-से लक्ष्मण की शरण ली। तब समर-क्रोध से जलते राघव-नन्दन लक्ष्मण ने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए इन्द्रजित का धनुष काट डाला। इन्द्रजित ने दूसरा धनुष चढ़ाया, उसे भी लक्ष्मण ने तीन बाणों से काट दिया।

धनुष कटे इन्द्रजित को सुमित्रापुत्र ने आशीविष-समान पाँच बाणों से छाती में बेध डाला; वे बाण उसका शरीर भेदकर लाल महासर्पों-से भूमि में जा घुसे। मुख से रक्त वमन करते इन्द्रजित ने एक और दृढ़-डोरी, बलवत्तर श्रेष्ठ धनुष लिया, और हाथ की फुर्ती से लक्ष्मण पर इन्द्र-सी बाण-वर्षा की। पर अविचलित लक्ष्मण ने वह दुर्धर्ष बाण-वर्षा रोक ली और इन्द्रजित को अपना अद्भुत पराक्रम दिखाया। फिर रण के सब राक्षसों को तीन-तीन बाणों से और इन्द्रजित को बाण-समूहों से बेधा। बलवान शत्रु से अति-बिंधे लक्ष्मण पर इन्द्रजित ने दस बाण छोड़े, पर वे लक्ष्मण के स्वर्ण-प्रभ कवच तक आकर ही नष्ट हो गए।

लक्ष्मण को अभेद्य कवच वाला मानकर परम क्रुद्ध इन्द्रजित ने अस्त्र-फुर्ती दिखाते हुए तीन सुन्दर बाणों से लक्ष्मण को ललाट पर बेधा; ललाट में बिंधे बाणों से लक्ष्मण तीन-शिखर वाले पर्वत-से शोभायमान हुए। घायल होकर भी लक्ष्मण ने धनुष तानकर सुन्दर कुण्डल वाले इन्द्रजित के मुख पर पाँच बाण मारे। रक्त से सने वे दोनों वीर खिले पलाश-वृक्षों-से शोभा पाने लगे। तब इन्द्रजित ने तीन लोहमुख बाणों से विभीषण को बेधा, और सब वानर-यूथपतियों को एक-एक बाण से। क्रुद्ध महातेजस्वी विभीषण ने गदा से दुरात्मा रावण-पुत्र के अश्व मार डाले। हताश्व इन्द्रजित ने महारथ से कूदकर अपने चाचा पर एक शक्ति (बरछी) फेंकी, पर सुमित्रानन्द-वर्धन लक्ष्मण ने उसे दस बाणों से दस टुकड़े कर भूमि पर गिरा दिया। तब क्रुद्ध विभीषण ने वज्र-स्पर्श-समान पाँच बाण उस हताश्व इन्द्रजित की छाती में गड़ा दिए; स्वर्ण-पुंख वे बाण उसका शरीर भेदकर लाल महासर्पों-से रक्त से सने निकल गए।

चाचा पर अत्यन्त क्रुद्ध महाबली इन्द्रजित ने राक्षसों के बीच यमदत्त उत्तम बाण उठाया। उसे जोड़ते देख भीमपराक्रम लक्ष्मण ने भी कुबेर का स्वयं स्वप्न में दिया हुआ, देव-असुर-इन्द्र तक के लिए दुर्जय बाण उठाया। दोनों के बाण मुख-से-मुख टकराकर तेज से आकाश को प्रकाशित करते हुए भिड़े; उस संघर्ष से धुएँ-चिंगारी समेत दारुण अग्नि उठी, और दोनों बाण महाग्रहों-से टकराकर सौ-सौ टुकड़े होकर भूमि पर गिर पड़े। अपने बाण व्यर्थ होते देख लज्जित और रोषभरे लक्ष्मण-इन्द्रजित में फिर भिड़न्त हुई। क्रुद्ध सुमित्रापुत्र ने वारुण-अस्त्र उठाया, और युद्ध-निष्ठ इन्द्रजित ने रौद्र-अस्त्र छोड़ा; उस रौद्र-अस्त्र ने परम-अद्भुत वारुण-अस्त्र को व्यर्थ कर दिया। तब क्रुद्ध इन्द्रजित ने लोक को समेटने-सा दीप्त आग्नेय-अस्त्र जोड़ा; वीर लक्ष्मण ने उसे सौर-अस्त्र से रोक दिया। अस्त्र रुका देखकर इन्द्रजित क्रोध से मूर्च्छित हुआ और शत्रुदारक आसुर-अस्त्र उठाया; उससे कूट-मुद्गर, शूल, भुशुण्डि, गदा, खड्ग और फरसे निकल पड़े। उस सर्वभूत-अवार्य अस्त्र को देखकर द्युतिमान लक्ष्मण ने माहेश्वर-अस्त्र से उसे रोका।

तब दोनों में रोमांचकारी अद्भुत युद्ध हुआ; आकाश में स्थित भूत-प्राणी लक्ष्मण को घेरकर उनकी रक्षा करने लगे। ऋषि, पितर, देव, गन्धर्व, गरुड़ और नाग शतक्रतु इन्द्र को आगे करके रण में लक्ष्मण की रक्षा करने लगे। इसी बीच राघव-अनुज लक्ष्मण ने हुताशन-स्पर्श-समान, सुपंख, सुपर्व, रावण-पुत्र-दारक, राक्षस-भयकारी, आशीविष-विष-प्रख्य, देवपूजित वह श्रेष्ठ बाण जोड़ा, जिससे महातेजस्वी हरिवाहन इन्द्र ने पूर्व-काल के देव-असुर-युद्ध में दानवों को जीता था।

लक्ष्मण ज्योतिर्मय बाण चढ़ाकर आकाश में रथ पर सवार इंद्रजित पर निशाना साधते हैं, पीछे वानर सेना खड़ी है।

संग्राम में अपराजित ऐन्द्र-अस्त्र को श्रेष्ठ धनुष पर तानते हुए श्रीमान लक्ष्मण ने अर्थसाधक प्रार्थना की: यदि दशरथ-पुत्र श्रीराम धर्मात्मा, सत्यसन्ध और पौरुष में अप्रतिद्वन्द्व हैं, तो इस रावण-पुत्र का वध हो। ऐसा कहकर कान तक खींचकर ऐन्द्र-अस्त्र से युक्त वह सीधा जाने वाला बाण इन्द्रजित पर छोड़ा। उस बाण ने ज्वलित-कुण्डल, शिरस्त्राण-सहित इन्द्रजित का श्रीमान सिर धड़ से काटकर भूमि पर गिरा दिया। रक्त से सना वह स्वर्ण-सा महान सिर भूमि पर पड़ा दिखाई दिया। कवच और शिरस्त्राण समेत, धनुष फेंके हुए, मारा गया रावण-पुत्र भूमि पर गिर पड़ा। तब वानर और विभीषण वैसे ही हर्षनाद करने लगे जैसे वृत्र-वध पर देवता। आकाश में देव, महर्षि, गन्धर्व और अप्सराओं का जयघोष उठा।

इन्द्रजित को गिरा देखकर विजयोल्लसित वानरों ने उस राक्षस-सेना को मारते हुए भगाया; शस्त्र फेंककर, संज्ञा-शून्य राक्षस लंका की ओर भागे। सहस्रों राक्षसों में एक भी न दिखा; जैसे सूर्यास्त पर किरणें नहीं ठहरतीं, वैसे इन्द्रजित के गिरते ही राक्षस दिशाओं में बिखर गए। सब लोकों का भयकारी वह राक्षस गिरा तो जल निर्मल हो गया, आकाश स्वच्छ हुआ; देव-दानव हर्षित हुए और कहने लगे: अब ब्राह्मण निर्भय विचरें। देवताओं ने पुष्प-वर्षा की; इन्द्र महर्षियों समेत प्रसन्न हुआ। शान्त-रश्मि सूर्य-से, बुझती अग्नि-से वह महाबाहु इन्द्रजित निष्प्राण पड़ा रहा।

विजयोल्लसित वानर-यूथपतियों ने रक्त में सने लक्ष्मण की प्रशंसा की; विभीषण, हनुमान और ऋक्षराज जाम्बवान ने भी उनका अभिनन्दन किया। पूँछें पटकते, उछलते, गर्जते वानर “लक्ष्मण की जय” का घोष करते रघुसुत लक्ष्मण को घेरकर खड़े हो गए। हर्षित वानर एक-दूसरे से लिपटकर श्रीराम-आश्रित मनोहर चर्चा करने लगे। दूसरों के लिए दुष्कर लक्ष्मण का वह कर्म देखकर वानर परम हर्ष पाने लगे, और इन्द्र-शत्रु इन्द्रजित का वध सुनकर देवता भी मन में परम प्रसन्न हुए।

समझने की कुंजी (अवधारणा): अस्त्रों का यह “द्वन्द्व” प्रत्येक अस्त्र को एक अधिष्ठाता देवता से जोड़ता है, वारुण (जल) बनाम रौद्र (शिव-संहार), आग्नेय (अग्नि) बनाम सौर (सूर्य), आसुर बनाम माहेश्वर। प्रत्येक अस्त्र अपने प्रतिपक्षी अस्त्र से ही शान्त होता है। अन्त में ऐन्द्र-अस्त्र निर्णायक होता है, पर वह तभी सिद्ध होता है जब लक्ष्मण श्रीराम के धर्म और सत्य की सत्य-प्रतिज्ञा (सत्यक्रिया) करते हैं, अस्त्र का बल अन्ततः धर्म पर टिका है।

सार: इन्द्रजित नया रथ लेने लंका लौटता है, फिर लौटकर भयानक अस्त्र-युद्ध करता है। वारुण-रौद्र, आग्नेय-सौर, आसुर-माहेश्वर अस्त्र परस्पर कटते हैं। अन्त में श्रीराम के धर्म-सत्य की प्रतिज्ञा करके लक्ष्मण ऐन्द्र-अस्त्र से इन्द्रजित का सिर काट देते हैं। देव-वानर हर्षनाद करते हैं; राक्षस-सेना भाग खड़ी होती है।

श्रीराम का हर्ष और सुषेण की औषधि से लक्ष्मण का उपचार

शुभलक्षण लक्ष्मण रक्त में सने अपने अंगों के साथ, रण में शत्रुजेता इन्द्रजित को मारकर हर्षित हुए। फिर जाम्बवान, हनुमान और सब वानरों को साथ लेकर महातेजस्वी वीर लक्ष्मण विभीषण और हनुमान के सहारे शीघ्र वहाँ लौटे जहाँ सुग्रीव और श्रीराम थे। श्रीराम की प्रदक्षिणा और अभिवादन करके सुमित्रापुत्र इन्द्र-अनुज वामन-से अपने ज्येष्ठ भ्राता के पास खड़े हो गए। हर्षित मुख से लौटे वीर विभीषण ने महात्मा श्रीराम को इन्द्रजित के घोर वध का समाचार सुनाया कि महात्मा लक्ष्मण ने रावण-पुत्र का सिर काट डाला।

लक्ष्मण के हाथों इन्द्रजित-वध सुनते ही महावीर्य श्रीराम अतुल हर्ष से बोले: साधु लक्ष्मण, मैं संतुष्ट हूँ; आपने दूसरों के लिए दुष्कर कर्म किया। रावण-पुत्र के नाश से हमारी विजय निश्चित जानिए। कीर्तिवर्धक लक्ष्मण का सिर सूँघकर, प्रशंसा से लज्जित होते लक्ष्मण को बलपूर्वक स्नेह से गोद में बैठाकर, घायल भाई को आलिंगन में भरकर श्रीराम बार-बार उन्हें स्नेह से देखने लगे। शल्यों से पीड़ित, साँस लेते, दुःख-संतप्त लक्ष्मण का सिर फिर सूँघकर, शीघ्रता से उन्हें स्पर्श कर, आश्वस्त करते हुए पुरुषर्षभ श्रीराम बोले: दुष्कर कर्म करने वाले आपने परम कल्याणकारी कार्य किया; अब पुत्र के मारे जाने से मैं रावण को मरा हुआ ही मानता हूँ। उस दुरात्मा के मारे जाने से आज मैं विजयी हूँ। हे वीर, सौभाग्य से आपने नृशंस रावण की दाहिनी भुजा-सा सहारा (इन्द्रजित) काट डाला; विभीषण और हनुमान ने भी रण में महान कर्म किया।

श्रीराम बोले: तीन दिन-रात में यह वीर किसी प्रकार गिराया गया; आज मैं निःशत्रु हो गया। पुत्र का वध सुनकर रावण अब महान सेना-व्यूह से निकलेगा; उसे घेरकर मैं उस दुर्जय को मार डालूँगा। हे लक्ष्मण, आप-से रक्षक के रहते इन्द्रजित के मरने पर अब न सीता दुष्प्राप्य है, न पृथ्वी। ऐसा कहकर भाई को आश्वस्त कर, आलिंगन कर, श्रीराम ने प्रसन्न होकर सुषेण से कहा: हे महाप्राज्ञ, मित्रवत्सल लक्ष्मण की ऐसी चिकित्सा कीजिए कि ये शल्यों से मुक्त होकर पूर्ण स्वस्थ हो जाएँ। शीघ्र ही विभीषण समेत सुमित्रापुत्र को शल्य-मुक्त कीजिए, और वृक्षयोधी शूर भालू-वानरों में जो भी घायल और बिंधे हैं, उन सबका भी यत्न से उपचार कीजिए।

श्रीराम के ऐसा कहने पर महात्मा वानर-यूथपति सुषेण ने लक्ष्मण को नाक के मार्ग से परम औषधि दी। उस औषधि की गन्ध सूँघते ही लक्ष्मण शल्य-मुक्त हो गए; पीड़ा मिटी और घाव भी भर गए। श्रीराम की आज्ञा से सुषेण ने विभीषण आदि सुहृदों और सब वानर-प्रमुखों की भी चिकित्सा की। प्रकृतिस्थ, शल्यहीन और श्रमरहित लक्ष्मण क्षणभर में ज्वर-मुक्त होकर हर्षित हुए। उसी अवसर पर श्रीराम, सुग्रीव, विभीषण और जाम्बवान सेना समेत बहुत देर तक हर्ष मनाते रहे, लक्ष्मण को नीरोग और प्रसन्न देखकर। महात्मा दाशरथि श्रीराम ने लक्ष्मण के अति-दुष्कर कर्म की पुनः प्रशंसा की, और इन्द्रजित का वध सुनकर वानरेन्द्र सुग्रीव भी हर्षित हुए।

सार: विभीषण श्रीराम को इन्द्रजित-वध का समाचार देते हैं; श्रीराम हर्षित होकर घायल लक्ष्मण को गले लगाते और सराहते हैं। वानर-वैद्य सुषेण की औषधि की गन्ध से लक्ष्मण शल्य-मुक्त और नीरोग हो जाते हैं, और विभीषण तथा घायल वानरों का भी उपचार होता है।

पुत्र-शोक में रावण का सीता-वध का संकल्प और सुपार्श्व का निवारण

इन्द्रजित का वध जानकर रावण के मन्त्री शीघ्र दशग्रीव के पास आकर बोले: हे महाराज, विभीषण की सहायता से लक्ष्मण ने आपके पुत्र को हमारे देखते-देखते मार डाला। संग्राम में अपराजित, इन्द्र के विजेता आपके शूर पुत्र को शूर लक्ष्मण ने मारा; वह लक्ष्मण को बाणों से तृप्त करके परम लोकों को चला गया। पुत्र का वह घोर वध सुनकर रावण महान मूर्च्छा में जा पड़ा। बहुत देर में संज्ञा पाकर पुत्र-शोक से व्याकुल रावण विलाप करने लगा: हाय, हे राक्षस-सेना के मुख्य, हे महाबली वत्स, इन्द्र को जीतकर भी आज आप लक्ष्मण के वश कैसे हो गए? आप तो क्रुद्ध होकर काल और यम तक को, मन्दराचल के शिखरों तक को बाणों से बेध सकते थे, फिर लक्ष्मण की बात ही क्या। आज वैवस्वत यम मेरे और भी आदरणीय हो गए, जिन्होंने आपको कालधर्म से युक्त कर दिया। स्वामी के लिए मारा गया पुरुष स्वर्ग पाता है, यही सुयोद्धाओं का मार्ग है।

रावण विलाप करता रहा: इन्द्रजित के मारे जाने का सुनकर सब देवगण, लोकपाल और महर्षि आज निर्भय होकर सुख से सोएँगे। एक इन्द्रजित के बिना यह वनसहित समूची पृथ्वी और तीनों लोक मुझे सूने प्रतीत होते हैं। आज मैं अन्तःपुर में राक्षस-कन्याओं का वैसा रुदन सुनूँगा जैसे पर्वत-गुफा में हथिनियों का चिग्घाड़। हे शत्रुतापन, युवराज-पद, लंका, राक्षस, अपनी माता, मुझे और अपनी पत्नियों को छोड़कर आप कहाँ चले गए? हे वीर, यमलोक जाते मेरे प्रेत-कार्य तो आपको करने थे; आपने तो विपरीत किया कि पहले ही चले गए। हे वत्स, सुग्रीव और सराघव लक्ष्मण के जीवित रहते, मेरा यह शल्य निकाले बिना, हमें छोड़कर आप कहाँ चले गए?

ऐसा विलाप करते रावण को पुत्र-शोक से उपजा महान क्रोध घेर बैठा; ग्रीष्म में किरणें जैसे दीप्त सूर्य को और दीप्त करती हैं, वैसे ही पुत्र-व्यसन ने स्वभाव से क्रोधी रावण को और दहका दिया। ललाट पर भौंहें चढ़ाए वह युगान्त के मगर-तरंगयुक्त समुद्र-सा शोभित हुआ। क्रोध से जँभाई लेते रावण के मुख से वृत्र के मुख-सी सधूम अग्नि निकलने लगी। पुत्र-वध से संतप्त, क्रोध-वश रावण ने बुद्धि से विचार कर सीता के वध का निश्चय किया। स्वभाव से लाल और क्रोधाग्नि से और लाल उसके नेत्र भयानक हो उठे। दाँत पीसते रावण का दशन-स्वर देव-दानवों से मथे जाते क्षीर-समुद्र-मन्थन-दण्ड-सा सुनाई पड़ा। कालाग्नि-से क्रुद्ध वह जिस-जिस दिशा को देखता, उस-उस ओर भयभीत राक्षस छिप जाते। चराचर को निगलने को उद्यत अन्तक-से रावण के पास कोई राक्षस न जाता।

तब रण में राक्षसों को स्थिर करने को परम क्रुद्ध रावण ने उनके बीच कहा: मैंने सहस्रों वर्ष परम तप करके स्वयम्भू ब्रह्मा को प्रसन्न किया; उसी तप के फल और ब्रह्मा की कृपा से मुझे न असुरों से भय है, न देवों से। ब्रह्मा-दत्त आदित्य-प्रभ कवच देव-असुर-युद्धों में वज्रमुष्टियों से भी न छिदा। आज सकवच रथ पर बैठे मुझ पर रण में साक्षात इन्द्र भी आक्रमण नहीं कर सकता। ब्रह्मा का दिया वह भीषण धनुष-बाण आज सैकड़ों तूर्यों के घोष के साथ राम-लक्ष्मण के वध के लिए मेरे पास लाया जाए। ऐसा निश्चय करके दीन, घोरदर्शन, ताम्रनेत्र रावण ने उन दीनस्वर राक्षसों से कहा: मेरे वत्स ने माया से वानरों को छलने को ही “सीता मारी गई” ऐसा दिखाया था; पर अब मैं उसी झूठ को सत्य कर दूँगा और राम-भक्त वैदेही को मार डालूँगा। ऐसा कहकर रावण ने निर्मल आकाश-सा उज्ज्वल अपना श्रेष्ठ खड्ग खींच लिया।

दस-मुख रावण अनेक भुजाओं में तलवारें लिए इंद्रजित के शव के पास शोक और क्रोध में गरजता है।

पुत्र-शोक से अति-व्याकुल चित्त रावण भार्या मन्दोदरी और मन्त्रियों से घिरा वेग से वहाँ दौड़ा जहाँ मिथिला-कन्या सीता थीं। खड्ग लिए जाते रावण को देखकर मन्त्रियों ने सिंहनाद किया और एक-दूसरे से लिपटकर बोले: इस क्रुद्ध राक्षस को देखकर आज राम-लक्ष्मण दोनों भाई काँप उठेंगे। क्रुद्ध इस राक्षस ने चारों लोकपालों को जीता और रण में अनेक शत्रु गिराए; इसके पराक्रम और बल का भूमि पर कोई समान नहीं। तीनों लोकों के रत्न लाकर रावण भोगता है। ऐसी बातें करते मन्त्रियों के बीच क्रोध-मूर्च्छित रावण अशोकवाटिका में सीता की ओर झपटा। हितैषी सुहृदों के बहुत रोकने पर भी वह आकाश में रोहिणी की ओर झपटते क्रूर ग्रह-सा सीता की ओर दौड़ा।

राक्षसियों से रक्षित अनिन्द्य मिथिला-कन्या सीता ने क्रुद्ध, खड्गधारी राक्षस को अपनी ओर आते देखा और दुःख से विलाप करने लगीं: जैसे यह क्रुद्ध स्वयं मुझ पर झपट रहा है, उससे जान पड़ता है यह दुर्बुद्धि सनाथ होते हुए भी मुझे अनाथ-सी मार डालेगा। पतिव्रता मुझसे इसने बहुत बार “मेरी भार्या बनो” कहा था, और मैंने निश्चय ही ठुकराया था। मेरी सेवा न मिलने से निराश यह क्रोध-मोह में मुझे मारने को उद्यत है। अथवा क्या इस अनार्य ने मेरे कारण नरव्याघ्र राम-लक्ष्मण को आज रण में मार डाला? बहुत हर्षित और चिल्लाते राक्षसों का घोर नाद मैंने सुना; हाय, यदि मेरे कारण राजकुमारों का विनाश हुआ हो। अथवा राम-लक्ष्मण को मार न सका, तो पुत्र-शोक से रौद्र, पापनिश्चयी राक्षस मुझे मार डालेगा।

सीता विलाप करती रहीं: हनुमान का वह वचन मुझ क्षुद्रा ने न माना; यदि मैं उनकी पीठ पर बैठकर वहाँ चली गई होती, तो आज पति-गोद में सती-सी होकर शोक न करती। मानती हूँ, युद्ध में पुत्र का नाश सुनकर एकपुत्रा कौसल्या का हृदय फट जाएगा; रोती वह महात्मा राम के जन्म, बाल्य, यौवन, धर्म-कार्य और रूप का स्मरण करेगी। पुत्र-वध पर निराश, अचेत होकर श्राद्ध करके वह निश्चय ही अग्नि में प्रवेश करेगी या जल में डूब जाएगी। उस असती कुब्जा पापनिश्चयी मन्थरा को धिक्कार, जिसके कारण कौसल्या यह शोक पाएगी। इस प्रकार रोहिणी-सी ग्रहवश हुई तपस्विनी मिथिला-कन्या को विलाप करते देखा।

इसी बीच रावण के शीलवान, शुचि, वेदविद्या-व्रत-स्नातक, स्वकर्मनिरत, मेधावी मन्त्री सुपार्श्व ने, अन्य मन्त्रियों के रोकने पर भी, राक्षसश्रेष्ठ रावण से कहा: हे दशग्रीव, हे कुबेर के साक्षात अनुज, क्रोध से धर्म त्यागकर वैदेही को मारना क्यों चाहते हैं? वेदविद्या के ब्रह्मचर्य-व्रत के बाद आप सदा स्वकर्म (अग्निहोत्र आदि) में निरत रहे; फिर हे राक्षसेश्वर वीर, स्त्री-वध कैसे उचित मानते हैं? हे पार्थिव, रूपसम्पन्न मिथिला-कन्या की रक्षा कीजिए, और अपना क्रोध हम सबके साथ रण में राम पर उतारिए। आज कृष्णपक्ष चतुर्दशी है; अभ्युत्थान (युद्ध-तैयारी) करके कल अमावस्या को सेना समेत विजय को निकलिए। हे शूर बुद्धिमान, रथी और खड्गधारी होकर श्रेष्ठ रथ पर बैठ, दशरथ-पुत्र राम को मारकर ही आप मिथिला-कन्या को पाएँगे। सुहृद के इस धर्मसम्मत वचन को स्वीकार कर दुरात्मा पर वीर्यवान रावण अपने भवन को लौट गया, और फिर सुहृदों समेत सभा को चला।

समझने की कुंजी (अवधारणा): सुपार्श्व का तर्क केवल दया का नहीं, धर्म और लोक-नीति का है, स्त्री-वध राजा के लिए महापातक है, और जिस सीता के लिए युद्ध चल रहा है, उसे मारकर रावण का लक्ष्य ही व्यर्थ हो जाएगा। ध्यान दें कि सीता का विलाप यहाँ भीतरी पश्चात्ताप का है (हनुमान का प्रस्ताव न मानने का), और रावण का संकल्प शोक से उपजे विवेक-नाश का; वाल्मीकि दोनों के मनोभाव बिना अतिरंजना के दिखाते हैं।

सार: इन्द्रजित-वध सुनकर रावण मूर्च्छित और फिर क्रोध-मूर्च्छित होकर सीता-वध का संकल्प लेता है और खड्ग लेकर अशोकवाटिका की ओर दौड़ता है। सीता पश्चात्ताप-भरा विलाप करती हैं। मन्त्री सुपार्श्व रावण को धर्म और नीति याद दिलाकर रोकते हैं कि स्त्री-वध छोड़कर वह स्वयं रण में निकलकर राम से लड़े; रावण मान जाता है।

श्रीराम के हाथों राक्षस-सेना का संहार

सभा में प्रवेश कर दीन, परम दुःखी रावण क्रुद्ध सिंह-सा फुफकारते हुए श्रेष्ठ आसन पर बैठ गया। पुत्र-व्यसन से कृश महाबली रावण ने हाथ जोड़कर अपने सब सेना-मुख्यों से कहा: आप सब हस्ती-अश्व, रथ-समूहों और पैदल सेना से घिरकर निकलिए। अकेले राम को घेरकर वर्षाकाल के मेघों-सी बाण-वर्षा करते हुए रण में मार डालिए। अथवा महायुद्ध में आपके तीक्ष्ण बाणों से जब उसके अंग छिद जाएँगे, तब लोक के देखते-देखते कल मैं ही उसे सहज मार दूँगा। राक्षसेन्द्र का यह वचन सुनकर राक्षस अनेक सेनाओं समेत शीघ्र रथों पर निकले।

उन्होंने परिघ, पट्टिश, बाण, खड्ग, फरसे और जीवनान्तकारी आयुध वानरों पर फेंके; वानरों ने भी वृक्ष और शैल राक्षसों पर फेंके। सूर्योदय के समय राक्षसों-वानरों का वह महाभीषण संग्राम तुमुल हो उठा। विचित्र गदाओं, प्रासों, खड्गों और फरसों से वे एक-दूसरे को मारने लगे। ऐसा युद्ध छिड़ने पर उठी अद्भुत धूल राक्षसों-वानरों के रक्त-स्रोतों से शान्त हो गई। हाथी-रथ-रूपी तट, बाण-रूपी मछली, ध्वज-रूपी वृक्ष और शव-समूह बहाती रक्त-नदियाँ रणभूमि में बहने लगीं। रक्त-स्रोतों में नहाए वानर-यूथपति बार-बार उछल-उछलकर ध्वज, कवच, रथ, अश्व और नाना आयुध तोड़ने लगे; तीक्ष्ण दाँतों-नखों से राक्षसों के केश, कान, भौंहें और नासिकाएँ काट डालीं। फल-लदे वृक्ष पर पक्षियों-से एक-एक राक्षस पर सौ-सौ वानर टूट पड़े। पर्वत-से महाकाय राक्षसों ने भी भारी गदाओं, प्रासों, खड्गों और फरसों से घोर वानरों को मारा।

राक्षसों से मारी जाती वानरों की विशाल सेना शरण-योग्य दशरथ-पुत्र श्रीराम की शरण आई। तब महातेजस्वी वीर्यवान श्रीराम धनुष लेकर राक्षस-सेना में घुसकर बाण-वर्षा करने लगे। आकाश में बादलों के बीच सूर्य-से, घुसे श्रीराम के पास घोर राक्षस उनके बाण-अग्नि-भय से न जा सके। चमक-से शीघ्रकर्मा श्रीराम के अति-घोर, दूसरों के लिए दुष्कर कर्म वे निशाचर तभी देख पाते जब वे हो चुके होते, होते समय नहीं; वन में बहती वायु-से उन्हें वे महासेना को रौंदते-महारथों को नष्ट करते न देख सके। वे केवल कटी-बिंधी-जली-तोड़ी-पीड़ित सेना देखते, पर शीघ्रकारी श्रीराम को न देख पाते। जैसे प्राणी अपने भीतर इन्द्रियार्थ भोगते आत्मा को नहीं देखते, वैसे ही राक्षस अपने शरीरों पर प्रहार करते श्रीराम को न देख पाते।

“यह हाथी-सेना मार रहा है, यह महारथ मार रहा है, यह तीक्ष्ण बाणों से पैदल-अश्वारोही मार रहा है”, ऐसा कहते राक्षस श्रीराम-सादृश्य के भ्रम में रण में परस्पर एक-दूसरे को ही मारने लगे। महात्मा श्रीराम के गान्धर्व-अस्त्र से मोहित राक्षस सेना को जलाते श्रीराम को न देख सके। कभी वे रण में सहस्रों राम देखते, कभी एक ही राम देखते। महात्मा के धनुष का घूमता, अलात-चक्र-सा स्वर्ण-कोटि (सिरा) देखते, पर राघव को नहीं। शरीर रूपी नाभि, सत्त्व रूपी ज्वाला, बाण रूपी अरे, धनुष रूपी नेमि, ज्या-तल-घोष रूपी ध्वनि, तेज-बुद्धि-गुण रूपी प्रभा और दिव्यास्त्र रूपी धार वाले उस राम-चक्र को प्राणी कालचक्र-सा राक्षसों का संहार करते देखते।

दिन के आठवें भाग (लगभग डेढ़ घण्टे) में, अकेले श्रीराम ने अग्निशिखा-से बाणों से कामरूपी राक्षसों की वायु-वेग वाली दस सहस्र रथ, अठारह सहस्र तीव्र हाथी, चौदह सहस्र सवार-सहित अश्व और पूरे दो लाख पैदल राक्षसों की सेना का संहार कर डाला। हताश्व, हतरथ, ध्वज-भग्न, मारकाट से बचे राक्षस लंका की ओर भागे। मारे हाथी-पैदल-अश्वों से वह रणभूमि महात्मा क्रुद्ध रुद्र की क्रीड़ा-भूमि-सी हो गई। तब गन्धर्व, सिद्ध और परम ऋषियों समेत देव “साधु, साधु” कहकर श्रीराम के कर्म की प्रशंसा करने लगे। उस समय धर्मात्मा श्रीराम ने पास खड़े सुग्रीव, विभीषण, हनुमान, जाम्बवान, मैन्द और द्विविद से कहा: इतना दिव्य अस्त्र-बल या तो मुझ (विष्णु) में है या त्र्यम्बक शिव में। उस राक्षस-सेना का संहार करके इन्द्र-समान महात्मा श्रीराम, अस्त्र-शस्त्रों के श्रम को जीतकर, परम हर्षित देवगणों से प्रशंसित हुए।

समझने की कुंजी (अवधारणा): श्रीराम का “अदृश्य-सा” युद्ध वाल्मीकि का एक काव्य-रूपक है: उनकी गति इतनी शीघ्र है कि राक्षस उन्हें नहीं, केवल उनका कर्म देख पाते हैं। “राम-चक्र” की उपमा (शरीर=नाभि, बाण=अरे, धनुष=नेमि) कालचक्र से जोड़ी गई है, राम स्वयं काल-रूप होकर राक्षस-सेना का संहार करते हैं। दिन के आठवें भाग में दो लाख से अधिक की सेना का अकेले संहार रावण-वध से पूर्व श्रीराम के दैवी-बल की भूमिका है।

सार: रावण अपनी समूची सेना राम पर भेजता है। शरण आई वानर-सेना की रक्षा करते श्रीराम राक्षस-सेना में घुसकर इतनी शीघ्रता से संहार करते हैं कि राक्षस उन्हें देख ही नहीं पाते; भ्रम में वे परस्पर ही लड़ मरते हैं। दिन के आठवें भाग में अकेले श्रीराम पूरी विशाल सेना नष्ट कर देते हैं; देव प्रशंसा करते हैं।

राक्षसियों का विलाप

अनेक हजार हाथी, सवार-सहित घोड़े, अग्नि-वर्ण ध्वजायुक्त सहस्रों रथ, गदा-परिघ से लड़ते स्वर्ण-ध्वज वाले सहस्रों कामरूपी शूर राक्षस, अक्लिष्टकर्मा श्रीराम के दीप्त, तप्त-स्वर्ण-भूषित बाणों से नष्ट हुए। यह देख-सुनकर मारकाट से बचे निशाचर और राक्षसियाँ संभ्रान्त, दीन और चिन्ता में डूब गईं। पति, पुत्र और बन्धु खो बैठीं विधवा राक्षसियाँ मिलकर दुःखार्त होकर विलाप करने लगीं।

राक्षसियाँ कहने लगीं: वृद्धा, कराल, धँसे पेट वाली शूर्पणखा ने वन में कामदेव-से रूप वाले राम के पास जाने का दुस्साहस कैसे किया? सर्वगुण-सम्पन्न, महौजस, सुमुख राम पर सर्वगुणहीन, दुर्मुखी राक्षसी ने प्रेम-भाव कैसे किया? हमारे जन के दुर्भाग्य और दूषण-खर तथा समस्त राक्षस-कुल के विनाश के लिए उस श्वेतकेशी, झुर्रीदार, विकृत स्त्री ने राघव का अनुचित अपमान किया। उसी के कारण रावण ने यह महान वैर ठाना और अपने विनाश के लिए सीता का हरण किया।

राक्षसियाँ बोलीं: दशग्रीव जनककुमारी सीता को न पा सकेगा, और बलवान राघव से अक्षय वैर बाँध बैठा। राम ने अकेले ही सीता को चाहते विराध को मारा, यही उसके लिए चेतावनी थी। राम ने अग्निशिखा-से बाणों से जनस्थान में चौदह सहस्र भीमकर्मा राक्षस मारे, यही पर्याप्त निदर्शन था। खर, दूषण और त्रिशिरा सूर्य-से बाणों से रण में मारे गए, यही पर्याप्त निदर्शन था। योजन-भुजा वाला रक्तभोजी कबन्ध भी क्रोध-नाद करते-करते मारा गया, यही पर्याप्त था। इन्द्र-पुत्र, मेरु-से बलवान वाली को राम ने मारा, यही पर्याप्त था। ऋष्यमूक पर भग्न-मनोरथ रहते सुग्रीव को राम ने राज्य दिलाया, यही पर्याप्त था। विभीषण ने धर्म-अर्थ-सहित, सब राक्षसों के हितकर युक्त वचन कहे, पर मोह से रावण को रुचे नहीं। यदि कुबेर-अनुज रावण ने विभीषण की बात मानी होती, तो यह लंका शोक से श्मशान न बनती।

राक्षसियाँ विलाप करती रहीं: महाबली कुम्भकर्ण और दुर्मर्ष अतिकाय का वध, और प्रिय पुत्र इन्द्रजित का लक्ष्मण के हाथों वध सुनकर भी रावण नहीं चेता। “मेरा पुत्र, मेरा भाई, मेरा पति रण में मारा गया”, यह स्वर हर राक्षसी-कुल से सुनाई पड़ता है। शूर राम ने रथ-अश्व-हाथी और पैदल हजारों स्थान-स्थान पर मारे। रुद्र, विष्णु, महेन्द्र शतक्रतु या स्वयं अन्तक ही राम-रूप में हमारा संहार कर रहे हैं। अपने प्रवीर खोकर हम जीवन से निराश, भय का अन्त न देखती, अनाथ-सी विलाप करती हैं। शूर रावण, जिसे ब्रह्मा का महान वर मिला, राम से उपजे इस महाघोर भय को नहीं समझता। आक्रमण किए जाने पर इस राम से रावण को न देव, न गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस बचा सकेंगे। रावण के हर युद्ध में उत्पात दीखते हैं, जो राम के हाथों उसका नाश सूचित करते हैं।

राक्षसियाँ बोलीं: ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर रावण को देव-दानव-राक्षसों से अभय दिया, पर मनुष्यों से अभय उसने नहीं माँगा। अतः मैं इस उपस्थित भय को मानुष भय मानती हूँ, जो राक्षसों और रावण के जीवन का अन्त करने वाला घोर भय है। बलवान वरदानी रावण से पीड़ित होकर देवताओं ने ब्रह्मा को पूजा था; देवहित के लिए ब्रह्मा ने आश्वासन दिया कि आज से सब दानव-राक्षस सदा भयभीत होकर तीनों लोकों में विचरेंगे। तब इन्द्र-प्रमुख देवों ने त्रिपुरारी महादेव को प्रसन्न किया; प्रसन्न महादेव ने कहा कि आप सबके हित के लिए राक्षस-नाशिनी एक नारी प्रकट होगी। देवों की भेजी वह नारी, पूर्व-काल की भूख-सी, हम सबको रावण समेत निगल जाएगी। दुर्विनीत, दुर्बुद्धि रावण के दुष्कर्म से शोक-व्याप्त यह घोर विनाश आ पड़ा है। राघव से, युगान्त-काल-से उपस्थित संहार से, हमें शरण देने वाला कोई लोक में नहीं दीखता; दावाग्नि से घिरी हथिनियों-सी हमारी कोई शरण नहीं। महात्मा पौलस्त्य (विभीषण) ने समय रहते उचित किया कि जिससे भय था, उसी (राम) की शरण ली। इस प्रकार सब राक्षसियाँ भुजाओं से एक-दूसरे को भरकर विषाद, आर्ति और भय से पीड़ित होकर अति-दारुण उच्च स्वर में रोने लगीं।

समझने की कुंजी (अवधारणा): यह राक्षसी-विलाप पूरे रामकथा का एक “स्मरण-सर्ग” है, शूर्पणखा का अपमान, खर-दूषण-वध, कबन्ध, वाली, सुग्रीव-राज्य, जनस्थान आदि सब घटनाएँ एक साथ याद की जाती हैं, जो दिखाती हैं कि रावण को बार-बार चेतावनियाँ मिलीं पर वह न चेता। विशेष ध्यान दें: रावण ने ब्रह्मा से देव-दानव-राक्षस से अभय माँगा, पर मनुष्य को तुच्छ मानकर मनुष्य से अभय नहीं माँगा, यही उसकी मृत्यु का द्वार बनता है, क्योंकि राम मनुष्य-रूप में आते हैं।

सार: सेना-नाश के बाद राक्षसियाँ विलाप करती हैं। वे शूर्पणखा को दोष देती हैं, रामकथा की सब घटनाएँ याद कर कहती हैं कि रावण को चेतावनियाँ मिलीं पर वह न चेता। रावण ने मनुष्य से अभय न माँगा, इसी से राम-रूपी मानुष-भय उसके विनाश का कारण बनेगा।

रावण का रण-प्रस्थान और सेनापतियों का निकलना

लंका के घर-घर में आर्त राक्षसियों का करुण विलाप रावण ने सुना। लम्बी साँस लेकर मुहूर्तभर ध्यान में डूबकर परम क्रुद्ध रावण भीमदर्शन हो उठा। दाँतों से ओठ दबाए, क्रोध से रक्त-नेत्र, साक्षात कालाग्नि-सा, राक्षसों के लिए भी दुर्दर्श रावण ने पास खड़े महोदर, महापार्श्व और विरूपाक्ष से क्रोध से अस्पष्ट वाणी में, मानो दृष्टि से ही भस्म करता हुआ, कहा: शीघ्र सेनाओं से कहो कि मेरी आज्ञा से रण को निकलें। उसके वचन से भयभीत राक्षसों ने राजा की आज्ञा से उन सेनाओं को बिना विलम्ब निकलने को कहा।

तथास्तु कहकर भीमदर्शन वे सब राक्षस स्वस्तिवाचन करके युद्ध-मुख की ओर निकले। यथानियम रावण की पूजा कर वे महारथी विजय की कामना से हाथ जोड़े खड़े हो गए। क्रोध से मूर्च्छित रावण ने हँसकर महोदर, महापार्श्व और विरूपाक्ष से कहा: आज युगान्त-सूर्य-से बाणों से राम और लक्ष्मण को यमलोक भेजूँगा। खर, कुम्भकर्ण, प्रहस्त और इन्द्रजित का बदला आज शत्रु-वध से चुकाऊँगा। मेरे बाण-मेघों से ढके न अन्तरिक्ष दीखेगा, न दिशा, न आकाश, न समुद्र। आज वानर-यूथों को धनुष-बाण-जाल से बारी-बारी मार डालूँगा। वायु-वेग रथ पर बैठकर धनुष-समुद्र से उठी बाण-तरंगों से वानर-सेना को मथ दूँगा। हाथी-सा मैं आज वानर-यूथ-रूपी तालाबों को कुचल डालूँगा। आज सबाण मुखों से वानर-यूथपति वसुधा को नाल-सहित कमलों-से सजा देंगे। एक-एक बाण से सौ-सौ वृक्षयोधी वानर बेधूँगा। जिनके भाई-पुत्र मारे गए हैं, उनके आँसू आज शत्रु-वध से पोंछूँगा। बाण-बिंधे, चेतनाहीन, बिखरे वानरों से भूमि को इतना ढक दूँगा कि भूतल यत्न से ही दीखे। आज कौवे, गीध और सब माँसभक्षियों को बाण-मारे शत्रु-माँस से तृप्त करूँगा। शीघ्र मेरा रथ तैयार हो और धनुष लाया जाए; जो निशाचर बचे हैं, वे मेरे पीछे रण को आएँ।

यह सुनकर महापार्श्व ने सेनाध्यक्षों से कहा कि शीघ्र सेना सजाई जाए। आज्ञा पाकर लघुपराक्रमी सेनाध्यक्ष घर-घर के राक्षसों को प्रेरित करते लंका में दौड़ने लगे। मुहूर्त में भीमदर्शन, भीममुख राक्षस गर्जते हुए खड्ग, पट्टिश, शूल, गदा, मूसल, हल, तीक्ष्ण-धार शक्ति, महामुद्गर, यष्टि, चक्र, फरसे, भिन्दिपाल, शतघ्नी आदि श्रेष्ठ आयुध भुजाओं में लिए निकल पड़े। रावण की आज्ञा से चार सेनाध्यक्षों ने एक लाख से अधिक रथ, तीन लाख हाथी, साठ करोड़ अश्व, उतने ही खच्चर-ऊँट और असंख्य पैदल राक्षस रण को निकाले।

सेनाध्यक्ष राजा की सेना को आगे खड़ा कर चुके थे; इसी बीच सारथि ने रावण का वह रथ ला खड़ा किया जो श्रेष्ठ दिव्यास्त्रों से सम्पन्न, नाना अलंकारों से सजा, नाना आयुधों से भरा, घण्टी-जालों से युक्त, नाना रत्नों से जड़ा, रत्न-स्तम्भों से शोभित और सहस्रों स्वर्ण-कलशों से युक्त था। उसे देखकर सब राक्षस विस्मित हुए। करोड़ों सूर्य-से, जलती अग्नि-से, सारथि-नियन्त्रित, आठ अश्वों से जुते, अपने तेज से दीप्त उस भीषण रथ को देखकर राक्षसेश्वर रावण सहसा उठकर उस पर चढ़ गया। अनेक राक्षसों से घिरा रावण सत्त्व-गाम्भीर्य से मानो पृथ्वी को चीरते हुए लंका से निकल पड़ा। तूर्य, मृदंग, पटह, शंख और राक्षसों के कोलाहल का महानाद सब ओर उठा।

“छत्र-चामर समेत सीताहारी, ब्रह्मघाती, देव-कण्टक, दुर्वृत्त राक्षसराज रघुश्रेष्ठ राम से लड़ने आ रहा है”, ऐसा कोलाहल सुनाई पड़ा। उस महानाद से पृथ्वी काँप उठी और उसे सुनकर वानर भय से भागे। महाबाहु महातेजस्वी रावण मन्त्रियों से घिरा विजय की कामना से रण में आया। रावण की अनुमति से दुर्धर्ष महापार्श्व, महोदर और विरूपाक्ष भी रथों पर चढ़े। हर्ष से गर्जते, पृथ्वी मानो चीरते, घोर नाद छोड़ते वे विजयाभिलाषी निकले। राक्षस-गणों से घिरा तेजस्वी रावण उठाए धनुष के साथ कालान्त-यम-सा युद्ध को निकला।

तब महारथी रावण वेगवान अश्वों से उत्तर द्वार से निकला, जहाँ राम-लक्ष्मण थे। उस समय सूर्य की प्रभा नष्ट हो गई, दिशाएँ अन्धकार से ढक गईं, पक्षी घोर बोलने लगे और पृथ्वी काँप उठी। मेघ रक्त बरसाने लगा, घोड़े लड़खड़ाए, ध्वज-शिखर पर गीध आ बैठा और सियारिनें अशुभ बोलीं। रावण का बायाँ नेत्र फड़का, बायीं भुजा काँपी, मुख पीला पड़ा और स्वर तनिक मन्द हो गया। रण को निकलते दशग्रीव के सामने मृत्यु-सूचक ये उत्पात उठे। आकाश से वज्रपात-से शब्द वाली उल्का गिरी; कौवों से मिली गीधें अशुभ बोलीं। इन घोर उत्पातों को न मानकर, कालप्रेरित रावण मोह से अपने वध को निकल पड़ा।

उन महात्मा राक्षसों के रथ-घोष से वानर-सेना भी युद्ध को सम्मुख आ डटी। परस्पर ललकारते, क्रुद्ध, विजय चाहते वानरों-राक्षसों का तुमुल युद्ध छिड़ गया। तब क्रुद्ध दशग्रीव ने स्वर्ण-भूषित बाणों से वानर-सेनाओं में महान संहार किया। रथ से जहाँ-जहाँ जाता, क्रोध से नेत्र घुमाता रावण उस-उस ओर के वानर-यूथपति उसके बाण-वेग को न सह पाते। किसी का सिर कटा, किसी का हृदय बिंधा, किसी के कान कटे; कोई प्राणहीन हुआ, कोई पार्श्व से चीरा गया, किसी का सिर फूटा, किसी की आँख फूटी।

समझने की कुंजी (संख्या): रावण की सेना की संख्याएँ (एक लाख रथ, तीन लाख हाथी, साठ करोड़ अश्व) वाल्मीकि की अतिशयोक्ति-शैली में हैं; ये सटीक गणना नहीं, अपितु लंका की बची हुई समस्त शक्ति की विशालता दिखाने वाले अलंकार हैं। साथ ही रावण के रण-प्रस्थान पर उत्पातों की झड़ी (सूर्य-कान्ति-नाश, रक्त-वर्षा, नेत्र-स्फुरण, ध्वज पर गीध) महाकाव्य की उस परम्परा का अंग है जहाँ नायक/प्रतिनायक की आसन्न मृत्यु प्रकृति-संकेतों से पहले ही सूचित हो जाती है।

सार: रावण स्वयं रण को निकलने का निश्चय करता है, अपनी बची हुई विशाल सेना और दिव्य रथ सजाता है। मृत्यु-सूचक अनेक उत्पातों को अनदेखा कर वह उत्तर द्वार से निकलता है और बाण-वर्षा से वानर-यूथपतियों का संहार करने लगता है।

सुग्रीव के हाथों राक्षस-संहार और विरूपाक्ष का वध

दशग्रीव के बाणों से कटे-अंग वानरों से लंका की वह रणभूमि बिखर गई। पतंगों के जलती अग्नि-सी, वानर रावण की दुर्धर्ष बाण-वर्षा क्षणभर भी न सह सके। तीक्ष्ण बाणों से पीड़ित, चिल्लाते वे वानर अग्नि से घिरे जलते हाथियों-से भाग खड़े हुए। महान बल के संहार और विरूपाक्ष के वध से दुगुना क्रुद्ध हुए राक्षसाधिप रावण को रोकने को सुग्रीव वानरों को भग्न देख, सुषेण को गुल्म (चौकी) सौंपकर शीघ्र युद्ध को बढ़े। अपने-समान वीर वानर को नियुक्त कर वृक्षायुध सुग्रीव शत्रु के सम्मुख निकले; पार्श्व और पीछे सब वानर-यूथपति महाशैल और नाना वनस्पति लेकर साथ हो लिए।

सुग्रीव महान स्वर से गर्जे और श्रेष्ठ राक्षसों को मथते, नाना राक्षसों को कुचलते रहे; जैसे वायु बड़े मेघ-समूहों को उड़ाता है, वैसे ही महाकाय वानरेश्वर ने युगान्त-वायु-से बढ़े वृक्षों-से राक्षसों को मार गिराया। वन में पक्षि-समूहों पर मेघ-से ओले बरसाते, सुग्रीव ने राक्षस-सेना पर शैल-वर्षा की। कपिराज की शैल-वर्षा से सिर फूटे राक्षस बिखरे पर्वतों-से गिरने लगे। सब ओर राक्षस क्षीण होते, सुग्रीव से भग्न होकर गर्जते-गिरते रहे। तब दुर्धर्ष धनुर्धर राक्षस विरूपाक्ष रथ से कूदकर अपना नाम सुनाकर हाथी की पीठ पर चढ़ गया, और भीषण नाद कर वानरों पर झपटा। सेना-मुख पर सुग्रीव पर घोर बाण छोड़ते उसने भयभीत राक्षसों को उत्साहित किया।

उस राक्षस के तीक्ष्ण बाणों से अति-बिंधे महाक्रोधी कपीन्द्र सुग्रीव चिल्लाए और उसके वध का निश्चय किया। शूर सुग्रीव एक वृक्ष उखाड़ झपटकर उसके सम्मुख खड़े महागज को मारा। सुग्रीव के प्रहार से वह महागज धनुष-भर पीछे हटकर बैठ गया और चिग्घाड़ने लगा। मथे हाथी से वीर्यवान राक्षस विरूपाक्ष कूदकर सम्मुख आया। सुग्रीव ने मेघ-सी विशाल शिला उस पर फेंकी; आती शिला देखकर सुविक्रान्त राक्षस हटकर खड्ग से प्रहार कर बैठा। बलवान राक्षस के खड्ग-प्रहार से सुग्रीव मुहूर्तभर भूमि पर मानो विसंज्ञ हो गए। सहसा उठकर वेग से मुट्ठी घुमाकर राक्षस की छाती पर मारी। मुक्के से आहत विरूपाक्ष ने उस खड्ग से सुग्रीव का कवच काटा और लात मारी, जिससे सुग्रीव गिर पड़े। गिरकर उठते ही सुग्रीव ने वज्र-अशनि-से थप्पड़ चलाया; नैपुण्य से विरूपाक्ष उसे बचाकर मुक्के से सुग्रीव की छाती पर लगा। तब वानरेश्वर सुग्रीव और भी क्रुद्ध हुए, और राक्षस का बचाव देखकर उसका छिद्र ताकने लगे। क्रोध से उन्होंने उसके शंख-प्रदेश (कनपटी) पर महातल-प्रहार किया; महेन्द्र-वज्र-से उस थप्पड़ से रक्त में सना विरूपाक्ष नवों द्वारों से झरने-से रक्त बहाता भूमि पर गिर पड़ा।

रक्त-झाग में सने, क्रोध से नेत्र घुमाते, और भी विकृत हुए विरूपाक्ष को मरा देखकर वानर-राक्षस की संयुक्त सेना उमड़ी हुई गंगा-सी हो गई। दोनों वेगवान सेनाएँ, समुद्र-सी विशाल, सेतु टूटने पर मिले दो महासमुद्रों-सी गरजने लगीं। महाबली प्रसिद्ध विरूपाक्ष को सुग्रीव के हाथों मरा देखकर रणभूमि उमड़ी गंगा-सी दीखने लगी।

सार: रावण की बाण-वर्षा से वानर भागते हैं, तो सुग्रीव मोर्चा सँभालते हैं और शैल-वर्षा से राक्षसों को कुचलते हैं। राक्षस विरूपाक्ष हाथी पर चढ़कर सुग्रीव से मल्ल-युद्ध करता है; अन्ततः सुग्रीव कनपटी पर वज्र-से थप्पड़ मारकर उसे मार डालते हैं।

महोदर का सुग्रीव के साथ घोर युद्ध और वध

महायुद्ध में परस्पर मारी जाती वे दोनों सेनाएँ ग्रीष्म के दो तालाबों-सी क्षीण हो गईं। अपनी सेना के संहार और विरूपाक्ष के वध से राक्षसाधिप रावण दुगुना क्रुद्ध हुआ। वानरों से मारी जाती अपनी क्षीण सेना देखकर और दैव की विपरीतता देखकर वह व्यथित हुआ। पास खड़े महोदर से उसने कहा: हे महाबाहो, इस समय मेरी विजय की आशा आप पर टिकी है। आज पराक्रम दिखाकर शत्रु-सेना का नाश कीजिए; स्वामी के अन्न का ऋण चुकाने का यही समय है, भलीभाँति युद्ध कीजिए।

तथास्तु कहकर राक्षसश्रेष्ठ महोदर पतंग-से अग्नि में, शत्रु-सेना में घुस पड़ा। स्वामी के वचन और अपने वीर्य से प्रेरित तेजस्वी महोदर वानरों का संहार करने लगा। महासत्त्व वानर विशाल शिलाएँ लेकर भीषण शत्रु-सेना में घुसकर राक्षसों को मारने लगे। क्रुद्ध महोदर ने स्वर्ण-भूषित बाणों से वानरों के हाथ, पैर और जाँघें काट डालीं। राक्षसों से अति-पीड़ित वानर दसों दिशाओं में भागे; कुछ सुग्रीव की शरण आए। वानरों की महासेना को भग्न देख सुग्रीव पास खड़े महोदर पर झपटे। महातेजस्वी कपीश्वर ने पर्वत-सी विशाल घोर शिला उसके वध को फेंकी; पर अविचलित महोदर ने दुर्धर्ष शिला को बाणों से सहस्र टुकड़े कर दिया; वह गीध-समूह-सी विकल होकर भूमि पर गिरी।

शिला टूटी देखकर क्रोध-मूर्च्छित सुग्रीव ने साल-वृक्ष उखाड़ फेंका, उसे भी महोदर ने अनेक टुकड़े कर दिया। शत्रु-सेना-दारक वीर महोदर ने सुग्रीव को बाणों से चीरा। तब सुग्रीव ने भूमि पर पड़ा एक परिघ (लोहे का डण्डा) देखा, उसे घुमाकर उग्र-वेग से महोदर के श्रेष्ठ अश्व मार गिराए। हताश्व महोदर महारथ से कूदकर गदा हाथ में ले लड़ा। गदा-परिघ धारण किए वे दोनों वीर वृषभों-से गर्जते, सविद्युत मेघों-से भिड़े। क्रुद्ध महोदर ने सूर्य-सी जलती गदा सुग्रीव पर फेंकी; आती घोर गदा को रोष-ताम्रनेत्र सुग्रीव ने परिघ से मारा, जिससे गदा और परिघ दोनों टूटकर गिर पड़े। तब तेजस्वी सुग्रीव ने भूमि से स्वर्ण-जड़ा घोर लोह-मूसल उठाकर फेंका; महोदर ने भी गदा फेंकी, दोनों परस्पर टकराकर टूट गिरे।

आयुध टूटने पर दोनों मुट्ठियों से भिड़े, दो जलती अग्नियों-से तेज-बल से भरे। गर्जते हुए परस्पर थप्पड़ मारकर वे भूमि पर लोटे, फिर शीघ्र उठकर अजेय वीर भुजाओं से एक-दूसरे को धकेलने लगे। बाहु-युद्ध में थके वीरों में से महावेग महोदर ने पास पड़ा चर्म-सहित खड्ग उठाया; वेगवत्तर वानरश्रेष्ठ सुग्रीव ने भी चर्म-सहित महाखड्ग उठाया। रोष-व्याप्त, शस्त्रविशारद वे दोनों उठाए खड्ग लिए, हर्षित होकर एक-दूसरे पर झपटे। दोनों परस्पर-जय चाहते, क्रुद्ध होकर शीघ्रता से एक-दूसरे की दक्षिण-वाम मण्डल-गति से प्रहार बचाने लगे। वीर्य पर अभिमानी दुर्बुद्धि महोदर ने सुग्रीव के भारी कवच पर खड्ग चलाया; खड्ग कवच में फँस गया, और उसे निकालते महोदर का कुण्डल-शिरस्त्राण-सहित सिर सुग्रीव ने अपने खड्ग से काट डाला। सिर कटे महोदर के गिरते ही उसकी सेना रणभूमि से लुप्त हो गई। उसे मारकर हर्षित सुग्रीव गर्जे; रावण क्रुद्ध हुआ और श्रीराम हर्षित हुए। विषण्ण-मुख दीन राक्षस भयभीत होकर भाग चले। टूटे पर्वत के एक भाग-से महोदर को भूमि पर गिराकर सूर्यपुत्र सुग्रीव अपनी श्री से उस अप्रधृष्य सूर्य-से शोभा पाने लगे। रण में विजय पाकर वानरेन्द्र सुग्रीव हर्ष से व्याकुल देव, सिद्ध, यक्ष और भूत-समूहों से निहारे जाने लगे।

सार: रावण महोदर को आगे करता है। महोदर वानरों का संहार करता है, पर सुग्रीव से उसका शिला, वृक्ष, परिघ, गदा, मूसल और अन्ततः खड्ग और मुट्ठियों से लम्बा द्वन्द्व होता है। महोदर का खड्ग सुग्रीव के कवच में फँसता है, और उसी क्षण सुग्रीव उसका सिर काट देते हैं।

अंगद के हाथों महापार्श्व का वध

महोदर के मारे जाने पर सुग्रीव को देखकर क्रोध से रक्त-नेत्र महाबली महापार्श्व ने अंगद की भीषण सेना को बाणों से क्षुब्ध कर दिया। उस राक्षस ने वानर-प्रमुखों के सिर वैसे ही धड़ से गिरा दिए जैसे वायु डंठल से फल। किन्हीं की भुजाएँ काटीं, किन्हीं के पार्श्व चीरे। महापार्श्व की बाण-वर्षा से पीड़ित सब वानर विषाद से विमुख और हतोत्साह हो गए। राक्षस से पीड़ित अपनी सेना को उद्विग्न देख महावेग अंगद पूर्णिमा के समुद्र-से उमड़ पड़े।

सूर्य-रश्मि-से प्रभायुक्त लोहे का परिघ लेकर वानरश्रेष्ठ अंगद ने रण में महापार्श्व पर प्रहार किया; उस प्रहार से विचेतन महापार्श्व सारथि समेत रथ से विसंज्ञ होकर भूमि पर गिरा। तभी मेघ-से अपने यूथ से निकलकर, नीलांजन-राशि-से तेजस्वी महावीर्य ऋक्षराज जाम्बवान ने क्रुद्ध होकर गिरि-शिखर-सी विशाल शिला उठाई और वेग से उसके अश्व मारकर रथ चूर कर दिया। मुहूर्त में संज्ञा पाकर महाबली महापार्श्व ने फिर अनेक बाणों से अंगद को बेधा और तीन बाणों से जाम्बवान की छाती में मारा; गवाक्ष को भी अनेक बाणों से बेधा।

गवाक्ष और जाम्बवान को बाण-पीड़ित देखकर क्रोध-मूर्च्छित अंगद ने एक घोर लोह-परिघ उठाया। दूर खड़े राक्षस के सूर्य-रश्मि-से उस परिघ को दोनों भुजाओं से पकड़, वेग से घुमाकर वालिपुत्र ने महापार्श्व के वध को फेंका। उस बलवान के फेंके परिघ ने राक्षस के हाथ से सबाण धनुष और शिरस्त्राण गिरा दिया। फिर वेग से पास आकर प्रतापी वालिपुत्र अंगद ने क्रुद्ध होकर कुण्डल वाली उसकी कनपटी पर थप्पड़ मारा। क्रुद्ध महावेग महाद्युति महापार्श्व ने एक हाथ से विशाल फरसा उठाया और तैल-धौत, निर्मल, शैलसार-मय, दृढ़ उस फरसे को वालिपुत्र पर फेंका; अंगद के बायें कन्धे की हड्डी पर गिरते उस फरसे को रोषभरे अंगद ने हटा दिया। पिता-तुल्य पराक्रमी अंगद ने वज्र-संकाश मुट्ठी बाँधी, और मर्म जानते हुए राक्षस की छाती के पास हृदय पर इन्द्र-वज्र-से वह मुट्ठी पटक दी। उस प्रहार से महायुद्ध में राक्षस की छाती फट गई और वह मरकर भूमि पर गिर पड़ा। उसके गिरते ही उसकी सेना क्षुब्ध हो गई, रण में रावण का महान क्रोध जागा, और हर्षित वानरों का उत्कट सिंहनाद उठा। अट्टालिकाओं-गोपुरों समेत लंका को मानो चीरते उस नाद से इन्द्र समेत देवों का-सा महान शब्द हुआ। देवों और वानरों का वह महानाद रोष से सुनकर इन्द्रशत्रु राक्षसेन्द्र रावण फिर युद्ध को सम्मुख खड़ा हो गया।

सार: महापार्श्व वानरों का संहार करता है, पर अंगद परिघ से उसे गिरा देते हैं; जाम्बवान उसके अश्व-रथ चूर करते हैं। संज्ञा पाकर महापार्श्व फिर लड़ता है, फरसा फेंकता है, पर अंगद उसे बचाकर वज्र-सी मुट्ठी से उसका हृदय फोड़ देते हैं। महापार्श्व मारा जाता है और रावण फिर युद्ध को डट जाता है।

श्रीराम और रावण का प्रथम सम्मुख-युद्ध

महोदर और महापार्श्व को, तथा महाबली वीर विरूपाक्ष को मारा देखकर महायुद्ध में रावण को महान क्रोध घेर बैठा। उसने सारथि को प्रेरित कर कहा: राम-लक्ष्मण को मारकर, मारे गए मन्त्रियों और घेरी गई नगरी के दुःख से मैं छुटकारा पाऊँगा। सीता-रूपी पुष्प-फल देने वाले उस राम-वृक्ष को रण में काट डालूँगा, जिसकी प्रशाखाएँ सुग्रीव, जाम्बवान, कुमुद, नल, द्विविद, मैन्द, अंगद, गन्धमादन, हनुमान, सुषेण और सब वानर-यूथपति हैं। ऐसा कहकर दसों दिशाओं को रथ-घोष से गुँजाते महारथी रावण शीघ्र राघव की ओर दौड़ा। उस शब्द से नदी-पर्वत-वन समेत समूची पृथ्वी काँप उठी, और सिंह आदि पशु-पक्षी भयभीत हुए।

रावण ने अति-घोर, सुदारुण तामस-अस्त्र (राहु-अधिष्ठित) प्रकट किया, और उससे वानरों को जलाने लगा; वे सब ओर गिरने लगे। ब्रह्मा के स्वयं रचे उस अस्त्र को न सह सकने से भग्न-भागते वानरों से भूमि पर धूल उठी। रावण के श्रेष्ठ बाणों से सैकड़ों वानर-सेनाएँ भग्न देखकर श्रीराम रण में डट गए। वानरों को भग्न और रावण को आते देख शत्रुदमन श्रीराम धनुष को बीच से पकड़कर खड़े हो गए, जैसे अनुज उपेन्द्र विष्णु समेत इन्द्र। आकाश को छीलते-से अपने महान धनुष को सँभाले, कमलपत्र-से विशाल नेत्र, दीर्घबाहु लक्ष्मण के साथ अपराजित खड़े श्रीराम को रावण ने देखा। पहले ही रावण को घेरने को लक्ष्मण ने धनुष तानकर अग्निशिखा-से बाण छोड़े; पर महातेजस्वी रावण ने आकाश में ही उन बाणों को अपने बाणों से रोक लिया।

लक्ष्मण के एक बाण को एक से, तीन को तीन से, दस को दस से काटते हुए रावण ने हाथ की फुर्ती दिखाई। फिर लक्ष्मण को लाँघकर समितिंजय रावण रण में पर्वत-से अडिग खड़े श्रीराम के पास पहुँचा। क्रोध से रक्त-नेत्र रावण ने श्रीराम पर बाण-वर्षा की। रावण के धनुष से छूटी बाण-धाराओं को आते देख श्रीराम ने शीघ्र भल्ल उठाए, और तीक्ष्ण भल्लों से सर्प-से जलते उन घोर बाण-समूहों को काट डाला। तब राम और रावण नाना तीक्ष्ण बाण-वर्षाओं से एक-दूसरे को ढकने लगे, और परस्पर बायें-दायें मण्डल-गति से बहुत देर तक विचित्र चक्र खींचते रहे; अजेय वे दोनों एक-दूसरे को बाण-वेग से धकेलते रहे। यम और अन्तक-से उन दोनों के एक साथ बाण छोड़ते समय सब प्राणी भयभीत हो उठे। आकाश नाना बाणों से वैसे ढक गया जैसे वर्षा में बिजली-मालाओं वाले मेघों से; गीध-पंख वाले तीक्ष्ण बाणों से आकाश मानो छिद्रित हो गया।

सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय में उठे दो महामेघों-से, दोनों वीरों ने आकाश को अन्धकार से भर दिया। वृत्र-इन्द्र-से दुर्धर्ष, अचिन्त्य महायुद्ध छिड़ा। दोनों श्रेष्ठ धनुर्धर, युद्धविशारद, अस्त्रज्ञ रण में बेरोक विचरते रहे; दोनों जिधर जाते उधर बाण-तरंगें वायु-बिंधे समुद्रों-सी उठतीं। तब लोक-रुलाने वाले रावण ने सतत हाथ से श्रीराम के ललाट पर नाराचों की माला-सी जड़ दी; पर रौद्र-धनुष से छूटी नीलकमल-दल-सी उस बाण-माला को श्रीराम ने सिर पर धारण किया और व्यथित न हुए।

क्रुद्ध श्रीराम ने और बाण लेकर रौद्र-अस्त्र के मन्त्र पढ़कर धनुष तानकर रावण पर अविच्छिन्न बाण छोड़े; पर महामेघ-से रावण के कवच पर गिरकर वे अवध्य कवच पर व्यथा न ला सके। तब सर्वास्त्रकुशल श्रीराम ने रथ पर बैठे रावण के ललाट पर परम अस्त्र से प्रहार किया; पर रावण से व्यर्थ किए गए वे बाण पाँच-शिर सर्पों-से फुफकारते भूमि में घुस गए। राघव के अस्त्र को व्यर्थ कर क्रोध-मूर्च्छित रावण ने आसुर अस्त्र प्रकट किया, और सिंह-व्याघ्र-मुख, कंक-कौवा-मुख, गीध-श्येन-मुख, सियार-मुख, ईहामृग-मुख, खर-मुख, वराह-मुख, श्वान-कुक्कुट-मुख, मगर-सर्प-मुख तीक्ष्ण बाण माया से छोड़े। इन और अन्य बाणों को श्रीराम पर रावण ने सर्प-से फुफकारते छोड़ा। आसुर-अस्त्र से व्याप्त श्रीराम ने अग्नि-से तेजस्वी होकर आग्नेय-अस्त्र छोड़ा, और अग्नि-मुख, सूर्य-मुख, चन्द्र-अर्धचन्द्र-मुख, धूमकेतु-मुख, महोल्का-मुख, ग्रह-नक्षत्र-वर्ण, बिजली-से बाण प्रकट किए। राघव-अस्त्र से बिंधे रावण के घोर बाण आकाश में ही नष्ट हो गए, पर नष्ट होने से पहले सहस्रों वानर मार गए। उस आसुर-अस्त्र को व्यर्थ देखकर कामरूपी सब वानर हर्षित होकर सुग्रीव की ओर मुख कर उच्च नाद करने लगे। आसुर-अस्त्र को बलपूर्वक व्यर्थ करके महात्मा दाशरथि श्रीराम हर्षित हुए, और हर्षित कपीश्वर उच्च स्वर में गर्जे।

सार: मन्त्रियों के वध से क्रुद्ध रावण स्वयं श्रीराम पर झपटता है। तामस-अस्त्र से वानरों को भगाता है, पर श्रीराम लक्ष्मण समेत डट जाते हैं। राम-रावण का अद्भुत बाण और अस्त्र-युद्ध छिड़ता है; रावण के आसुर-अस्त्र (पशु-पक्षी-मुख बाणों) को श्रीराम आग्नेय-अस्त्र से व्यर्थ कर देते हैं।

रावण की शक्ति से लक्ष्मण की मूर्च्छा और रावण का पलायन

अपना अस्त्र व्यर्थ होने पर राक्षसाधिप रावण ने दुगुना क्रोध किया और तुरन्त मय-रचित दूसरा भीषण रौद्र-अस्त्र श्रीराम पर छोड़ा। उसके धनुष से सब ओर वज्रसार शूल, गदा, मूसल, मुद्गर, कूटपाश और जलते अशनि युगान्त-वायु-से निकलने लगे। पर श्रीराम ने गान्धर्व-अस्त्र से उसे व्यर्थ कर दिया। तब क्रोध-ताम्रनेत्र रावण ने सौर-अस्त्र छोड़ा; भीमवेग रावण के धनुष से बड़े चमकीले चक्र निकलने लगे, जिनसे आकाश चन्द्र-सूर्य-ग्रहों-से दीप्त हो उठा। पर शीघ्रकर्मा श्रीराम ने उन चक्रों और विचित्र आयुधों को बाण-समूहों से काट डाला। अपना अस्त्र नष्ट देखकर रावण ने दस बाणों से श्रीराम के सब मर्मों को बेधा; पर महातेजस्वी श्रीराम तनिक भी विचलित न हुए।

तब परम क्रुद्ध श्रीराम ने अनेक बाणों से रावण के सब अंग बेधे। इसी बीच क्रुद्ध बलवान शत्रुघाती लक्ष्मण ने सात बाण लेकर रावण के मनुष्य-सिर वाले ध्वज के अनेक टुकड़े कर दिए, और एक ही बाण से ज्वलित-कुण्डल राक्षस-सारथि का सिर काटा। फिर पाँच तीक्ष्ण बाणों से रावण का गज-सूँड-सा धनुष काट डाला। तब वेग से कूदकर विभीषण ने गदा से रावण के मेघ-से, पर्वत-से नील अश्व मार गिराए। हताश्व रावण ने रथ से कूदकर अपने भाई विभीषण पर तीव्र क्रोध किया, और प्रदीप्त अशनि-सी महाशक्ति विभीषण पर फेंकी। पर महातेजस्वी लक्ष्मण ने उसके पहुँचने से पहले ही तीन बाणों से उसे काट डाला; रण में वानरों का संनाद उठा। स्वर्ण-मालिनी वह शक्ति तीन टुकड़े होकर आकाश से गिरी महोल्का-सी चिंगारियाँ बिखेरती गिरी।

तब रावण ने एक विशाल शक्ति उठाई, जो काल के लिए भी दुरासद, अपने तेज से दीप्त, घण्टी-युक्त, महानाद वाली, मय-निर्मित, अमोघ और शत्रुघातिनी थी। उसे लक्ष्मण के लिए तानकर परम क्रुद्ध रावण ने गर्जते हुए छोड़ा। भीमवेग से छूटी, वज्र-अशनि-से शब्द करती वह शक्ति वेग से लक्ष्मण की ओर बढ़ी। आती शक्ति को सम्बोधित कर श्रीराम ने अभिमन्त्रित-सा कहा: लक्ष्मण का कल्याण हो; यह शक्ति व्यर्थ हो जाए, इसका उद्यम भग्न हो। पर क्रुद्ध रावण के बल से छूटी, विषधर-सी वह दीप्त शक्ति निर्भय खड़े लक्ष्मण की छाती में जा घुसी, और वासुकि की जिह्वा-सी जलती लक्ष्मण के विशाल वक्ष में गहरी धँस गई। रावण के वेग से अति-दूर तक घुसी शक्ति से छाती बिंधे लक्ष्मण भूमि पर गिर पड़े।

उस अवस्था में लक्ष्मण को देख महातेजस्वी श्रीराम भ्रातृ-स्नेह से विषण्ण हुए। मुहूर्तभर सोचकर, आँखें आँसुओं से भरकर वे युगान्त-अग्नि-से और क्रुद्ध हो उठे। “यह विषाद का समय नहीं” विचारकर, रावण-वध के निश्चय से यत्न से लक्ष्मण को देखकर श्रीराम ने तुमुल युद्ध किया। रण में शक्ति से बिंधे, रक्त में सने, सर्प-घुसे पर्वत-से लक्ष्मण को देखकर श्रीराम ने वह भयावह शक्ति हाथों से पकड़ी; क्रुद्ध बलवान श्रीराम ने उसे खींचकर तोड़ डाला। शक्ति निकालते समय बलवत्तर रावण ने मर्मभेदी बाण श्रीराम के सब अंगों पर बरसाए। पर उन बाणों की चिन्ता न कर लक्ष्मण को आलिंगन कर श्रीराम ने हनुमान और सुग्रीव से कहा: हे वानरश्रेष्ठो, लक्ष्मण को इसी प्रकार घेरे रहो; मेरे चिर-अभिलषित पराक्रम का समय आ गया है। इस पापनिश्चयी दशग्रीव का वध हो; ग्रीष्मान्त में चातक की मेघ-कामना-सी इसकी मृत्यु मुझे अभीष्ट है।

श्रीराम बोले: हे वानरो, मैं इसी मुहूर्त में यह सत्य-प्रतिज्ञा करता हूँ कि शीघ्र ही आप जगत को रावण-रहित या राम-रहित देखेंगे। राज्य-नाश, वनवास, दण्डक में भटकना, सीता का अपमान, राक्षसों से संगर, नरक-सा घोर दुःख और क्लेश, आज रावण को रण में मारकर मैं इन सब कष्टों से छुटकारा पाऊँगा। जिसके लिए यह वानर-सेना यहाँ लाई, वाली को मारकर सुग्रीव को राज्य दिया, समुद्र लाँघा और सेतु बाँधा, वह पापी आज मेरी दृष्टि-गोचर हुआ है; दृष्टि में आकर अब यह जीवित न रहेगा। दृष्टिविष सर्प की दृष्टि में आए या गरुड़ की दृष्टि में आए सर्प-से, रावण अब न बचेगा। हे दुर्धर्ष वानरश्रेष्ठो, पर्वत-शिखरों पर बैठकर सुख से मेरे और रावण के इस युद्ध को देखिए। आज तीनों लोक, गन्धर्व, देव, ऋषि और चारण मेरे रण में राम का रामत्व देखें। आज मैं ऐसा कर्म करूँगा कि जब तक पृथ्वी प्राणियों को धारण करती रहेगी, चराचर सहित लोक उसका वर्णन करते रहेंगे। ऐसा कहकर तत्पर श्रीराम तप्त-स्वर्ण-भूषित तीक्ष्ण बाणों से रण में रावण पर प्रहार करने लगे। रावण ने भी जलते नाराच और मूसलों से श्रीराम पर मेघ-सी वर्षा की।

राम और रावण के परस्पर प्रहार करते बाणों का तुमुल घोष हुआ। आकाश से कटे-बिखरे, दीप्त-अग्र बाण भूमि पर गिरने लगे। दोनों के ज्या-तल का सब प्राणियों को त्रास देने वाला महानाद सुनने में अद्भुत-सा हुआ। तब महात्मा श्रीराम की बाण-वर्षाओं से ढका और दीप्त-धनुष से पीड़ित रावण भयभीत होकर भागा, जैसे वायु से आहत मेघ बिखर जाता है।

सार: रावण रौद्र, सौर आदि अस्त्र छोड़ता है, सबको श्रीराम व्यर्थ कर देते हैं। लक्ष्मण रावण का ध्वज, सारथि और धनुष काटते हैं, विभीषण उसके अश्व मारते हैं। क्रुद्ध रावण मय-रचित अमोघ शक्ति लक्ष्मण की छाती में मारता है; लक्ष्मण गिर पड़ते हैं। श्रीराम शक्ति तोड़कर रावण-वध की सत्य-प्रतिज्ञा करते हैं, और उनकी बाण-वर्षा से रावण भयभीत होकर भाग जाता है।

लक्ष्मण का विलाप और हनुमान का संजीवनी-पर्वत लाना

बलवत्तर रावण की शक्ति से रण में गिराए, रक्त-स्रोत में सने शूर लक्ष्मण को देखकर, दुरात्मा रावण से तुमुल युद्ध कर चुके श्रीराम बाण-समूह छोड़ते हुए सुषेण से बोले: देखिए, रावण के पराक्रम से लक्ष्मण भूमि पर गिरकर सर्प-से तड़प रहे हैं और मुझे शोक दे रहे हैं। प्राणों से भी प्रिय इस वीर को रक्त में सना देखते हुए, व्याकुल चित्त मुझमें युद्ध की शक्ति कहाँ रही? यदि समर-प्रशंसी मेरा यह शुभलक्षण भाई पंचत्व पा गया, तो मुझे प्राणों या सुख से क्या? मेरा पराक्रम मानो लज्जित हो रहा है, धनुष हाथ से फिसलता-सा है, बाण गिरते हैं और दृष्टि आँसुओं के वश है। स्वप्न में सोते मनुष्यों-से मेरे अंग शिथिल पड़ रहे हैं; तीव्र चिन्ता बढ़ रही है और मरने की इच्छा भी होती है। मर्म में बिंधे, दुःखार्त, कराहते भाई को देखकर मेरे अंग गल रहे हैं।

प्राण-से बाहर विचरते प्रिय अनुज को देख महादुःख में डूबे श्रीराम चिन्ता-शोक में पड़ गए। रण-धूल में बिंधे लक्ष्मण को देखकर परम विषाद में व्याकुल इन्द्रियों से विलाप करने लगे: मुझे विजय भी प्रिय न होगी; नेत्रहीन के सामने चन्द्रमा क्या प्रीति देगा? जहाँ लक्ष्मण रणभूमि में मारे पड़े हैं, उस युद्ध और प्राणों से मुझे क्या प्रयोजन? जैसे महाद्युति लक्ष्मण मेरे वन जाने पर साथ आए, वैसे ही मैं भी इन्हें यमलोक तक अनुसरण करूँगा। मुझ-सा बन्धु-प्रेमी, सदा मेरा अनुव्रत यह भाई कूटयोधी राक्षसों से इस दशा को पहुँचा। देश-देश में पत्नियाँ और बन्धु मिल जाते हैं, पर वह देश नहीं दीखता जहाँ सहोदर भाई मिले। दुर्धर्ष लक्ष्मण बिना राज्य से मुझे क्या? पुत्रवत्सल माता सुमित्रा से क्या कहूँगा? सुमित्रा का उपालम्भ मैं सह न सकूँगा; माता कौसल्या और कैकेयी से क्या कहूँगा? महाबली भरत और शत्रुघ्न पूछेंगे कि लक्ष्मण को साथ ले गए, बिना उसके कैसे लौटे, तो क्या कहूँगा? बन्धु-निन्दा सुनने से तो यहीं मर जाना श्रेय है। पूर्व जन्म में मैंने क्या दुष्कर्म किया कि मेरा धर्मात्मा भाई आगे मारा पड़ा है? हे भाई, अनुजश्रेष्ठ, शूरप्रवर प्रभो, मुझे अकेला छोड़कर परलोक क्यों जा रहे हैं? विलाप करते मुझसे क्यों नहीं बोलते? उठिए, देखिए; क्यों पड़े हैं? दीन मुझे आँखें खोलकर देखिए।

शोक-व्याकुल इन्द्रियों से ऐसा कहते श्रीराम को आश्वासन देते हुए सुषेण ने उत्तम वचन कहा: हे नरश्रेष्ठ, शोक उत्पन्न करने वाली, समर-मुख में बाणों-सी कष्टकर इस वैक्लव्यकारी बुद्धि को त्याग दीजिए। लक्ष्मीवर्धन लक्ष्मण पंचत्व को नहीं पाए; उनका मुख न विकृत हुआ, न काला पड़ा; उनका मुख अब भी सुप्रभ और प्रसन्न दीख रहा है। हे आँसुओं से भरी आँख वाले राजन, अपनी आँखों से देखिए, उनकी हथेलियाँ अब भी कमल-दल-सी हैं और नेत्र अति-प्रसन्न; प्राणहीनों का ऐसा रूप नहीं दीखता। भूमि पर अंग ढीले किए सोते-से लक्ष्मण का बार-बार धड़कता, साँस लेता हृदय यही बताता है कि वे जीवित हैं। हे शत्रुदमन, विषाद न कीजिए; ये सप्राण हैं।

ऐसा कहकर महाप्राज्ञ सुषेण ने पास खड़े महाकपि हनुमान से कहा: हे सौम्य, यहाँ से शीघ्र महोदय पर्वत पर जाइए, जो जाम्बवान ने पहले आपको बताया था। उसके दक्षिण शिखर पर उगी विशल्यकरणी, सावर्ण्यकरणी, संजीवकरणी और सन्धानी, ये महान औषधियाँ वीर लक्ष्मण की संजीवन के लिए ले आइए।

ऐसा कहे जाने पर श्रीमान हनुमान औषधि-पर्वत पर जाकर भी उन औषधियों को न पहचान सके, इससे चिन्तित हुए। तब अमित-ओज पवनपुत्र के मन में विचार उठा: मैं इस पूरे शिखर को ही लेकर लौटूँगा। सुषेण ने इसी शिखर पर उगी सुखकारी औषधि बताई है, यह मैं तर्क से जानता हूँ। यदि विशल्यकरणी को बिना लिए लौटूँगा तो काल बीतने से दोष होगा और महान वैक्लव्य उठ खड़ा होगा। ऐसा सोचकर महाबली हनुमान शीघ्र श्रेष्ठ पर्वत पर पहुँचे और गिरि-शिखर को तीन बार हिलाकर, नाना खिले वृक्षों वाले उस शिखर को उखाड़कर दोनों हाथों से सँभाल लिया। जल-भरे नील मेघ-से उस गिरि-शिखर को लेकर हनुमान भूमि से आकाश में उछल पड़े।

शिखर रखकर, तनिक विश्राम कर महावेग हनुमान ने सुषेण से कहा: हे वानरश्रेष्ठ, मैं उन औषधियों को न पहचान सका, अतः उस पर्वत का यह सम्पूर्ण शिखर ही ले आया। ऐसा कहते पवनपुत्र की प्रशंसा कर वानरश्रेष्ठ सुषेण ने औषधि उखाड़ ली। वहाँ उपस्थित सब वानरश्रेष्ठ हनुमान का देवों के लिए भी दुष्कर वह कर्म देखकर विस्मित हुए। महाद्युति सुषेण ने उस औषधि को पीसकर लक्ष्मण को नाक के मार्ग से दी। उसे सूँघते ही शल्ययुक्त, शत्रुघाती लक्ष्मण विशल्य और नीरोग होकर शीघ्र भूमि से उठ खड़े हुए। उठे हुए लक्ष्मण को देख हर्षित वानर “साधु, साधु” कहकर उनका अभिनन्दन करने लगे।

श्रीराम ने “आओ, आओ” कहकर आँसुओं से भरी आँखों से लक्ष्मण को गाढ़ आलिंगन में भरा और कहा: हे वीर, सौभाग्य से आपको मृत्यु से लौटा हुआ देखता हूँ। आपके पंचत्व पाने पर मुझे न जीवन से, न सीता से, न विजय से प्रयोजन रहता; मेरे जीवित रहने का अर्थ ही क्या? श्रीराम की इस शिथिल वाणी से खिन्न होकर लक्ष्मण ने कहा: हे सत्यपराक्रम, पहले रावण-वध और विभीषण के राज्याभिषेक की प्रतिज्ञा करके अब किसी अल्पसत्त्व-से ऐसा न कहिए। सत्यवादी अपनी प्रतिज्ञा व्यर्थ नहीं करते; प्रतिज्ञा-पालन ही महत्त्व का लक्षण है। हे निष्पाप, मेरे लिए निराश होना आपको शोभा नहीं देता; आज रावण-वध से अपनी प्रतिज्ञा पूरी कीजिए। आपके बाण-पथ में आया शत्रु तीक्ष्ण-दाढ़ सिंह की पकड़ में आए महागज-से जीवित न लौटेगा। मैं चाहता हूँ कि कृतकर्मा सूर्य के अस्त होने से पूर्व ही यह दुरात्मा शीघ्र मारा जाए। हे आर्य, यदि रण में रावण का वध, अपनी ली प्रतिज्ञा की पूर्ति और जनककुमारी का अभिलाष चाहते हैं, तो हे वीर, मेरा कहा शीघ्र आज ही कीजिए।

समझने की कुंजी (अवधारणा): ये चार औषधियाँ अपने-अपने कार्य से नामित हैं: विशल्यकरणी (शरीर से शल्य/बाण निकालकर घाव भरने वाली), सावर्ण्यकरणी (घाव-दाह से बदले रंग को मूल रंग में लौटाने वाली), संजीवकरणी (मूर्च्छित को सचेत करने वाली) और सन्धानी (टूटी हड्डी जोड़ने वाली)। हनुमान का “औषधि न पहचानने पर पूरा पर्वत उठा लाना” उनकी व्यावहारिक बुद्धि और अपार बल दोनों दिखाता है; आगे की कथा-परम्परा में यही प्रसंग “संजीवनी पर्वत” के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

सार: गिरे लक्ष्मण को देख श्रीराम गहरे शोक में विलाप करते हैं। वैद्य सुषेण आश्वस्त करते हैं कि लक्ष्मण जीवित हैं और हनुमान को हिमालय की औषधियाँ लाने भेजते हैं। औषधि न पहचान पाने पर हनुमान पूरा पर्वत-शिखर उठा लाते हैं; सुषेण की औषधि से लक्ष्मण नीरोग होकर उठ खड़े होते हैं और श्रीराम को विषाद त्यागकर रावण-वध की प्रतिज्ञा पूरी करने को प्रेरित करते हैं।

मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, युद्धकाण्ड (गीता प्रेस गोरखपुर)।