कथा · 2
लीला और पद्म: एक मण्डप में अनेक संसार
राजा पद्म की मृत्यु का भय रानी लीला को सरस्वती की आराधना तक ले जाता है। दो वरदानों से आरम्भ हुई उनकी यात्रा चेतना, स्मृति, समय और जन्म के भीतर खुलते संसारों तक पहुँचती है। ब्राह्मण वसिष्ठ से राजा विदुरथ और फिर फूलों में सुरक्षित पद्म तक लौटती यह कथा प्रेम, वासना और आत्मज्ञान की असाधारण गति खोलती है।
प्रेम के बीच उठा मृत्यु का प्रश्न
श्रीवसिष्ठ ने राम से कहा कि इस जगत् की प्रतीति को समझने के लिए मण्डप का आख्यान ध्यान से सुनना चाहिए। पृथ्वी पर पद्म नाम के एक तेजस्वी राजा थे। वे समृद्ध, सन्तानवान, मर्यादा का पालन करने वाले, विद्वानों का आदर करने वाले और प्रजा की रक्षा में तत्पर थे। उनके राज्य में राजसी वैभव था, पर उनका परिचय केवल विजय और सम्पत्ति से पूरा नहीं होता। उनके आचरण में उदारता थी, मित्रों के प्रति अनुराग था और शासन के साथ धर्म का विचार जुड़ा था।
उनकी पत्नी लीला सौम्य, मधुरभाषिणी और पति के प्रति समर्पित थीं। पद्म भी उन्हें अपने प्राणों की तरह मानते थे। दोनों का साथ राजसभा और अन्तःपुर से उद्यानों, सरोवरों, तीर्थों और मनोहर वनस्थलों तक फैला था। वे संगीत सुनते, खेल खेलते और एक-दूसरे के साथ कविता रचते। उनमें से एक पद कहता, दूसरा उसे पूरा करके संस्कृत श्लोक बना देता। इस आत्मीय अभ्यास में उनके सम्बन्ध की गरिमा, मैत्री और बौद्धिक निकटता एक साथ दिखाई देती है।

समय उनके लिए सुख के अनेक रूप लेकर आया। फिर एक दिन लीला की दृष्टि उसी सुख की सीमा पर ठहर गई। उन्होंने सोचा कि पद्म युवा हैं, सुन्दर हैं और उन्हें अत्यन्त प्रिय हैं, पर उनका शरीर काल के नियम से बाहर नहीं। यदि राजा पहले चले गए तो इस साथ का क्या होगा? प्रेम के बीच उठे इस प्रश्न ने उनके भीतर गहरी चिन्ता जगा दी।

उन्होंने तपस्वी, शास्त्रज्ञ और वृद्ध ब्राह्मणों को आदरपूर्वक बुलाया। उनकी पूजा करके पूछा, “मनुष्य के शरीर को अजर और अमर करने का कोई उपाय है? जप, तप, यज्ञ या नियम से क्या मृत्यु को रोका जा सकता है?”
विद्वानों ने स्पष्ट उत्तर दिया। तप, जप, यम और नियम से अनेक सिद्धियाँ मिल सकती हैं; देह का अमरत्व उनसे प्राप्त नहीं होता। शरीर परिवर्तनशील है। लीला ने इस उत्तर को टालने का प्रयत्न नहीं किया। उन्होंने मृत्यु की अनिवार्यता स्वीकार की, फिर अपने प्रेम के भीतर सम्भव उपाय खोजा। यदि उनका शरीर पहले छूटे, तो वे उस गति को स्वीकार करेंगी। यदि पद्म पहले जाएँ, तो उनका जीव अन्तःपुर से बाहर न जाए और लीला को उनका दर्शन फिर मिल सके। इसी संकल्प के साथ उन्होंने ज्ञानस्वरूपा सरस्वती की आराधना आरम्भ की।
एक सौ त्रिरात्र व्रत और दो वरदान
लीला ने अपने तप को राजकीय प्रदर्शन नहीं बनने दिया। वे पद्म की सेवा, राज्य के दायित्व और दैनिक व्यवहार पहले की तरह निभाती रहीं। पति को क्लेश न हो, इसका भी पूरा ध्यान रखा। उनके नियम का क्रम कठिन था: तीन रात और दिन उपवास, चौथे दिन पारणा। स्नान, दान, देवपूजा, ब्राह्मणों, गुरुजनों, विद्वानों और ब्रह्मज्ञानियों का सत्कार, ध्यान और स्तुति उस साधना के अंग थे।
इस प्रकार उन्होंने एक सौ त्रिरात्र व्रत पूरे किए। तीन सौ दिन बीतने पर सरस्वती प्रसन्न हुईं और उनके सामने प्रकट हुईं। देवी ने कहा, “पुत्री, तुम्हारी निरन्तर आराधना और पतिभक्ति से मैं प्रसन्न हूँ। जो अभिलाषा हो, कहिए।”

लीला ने दो वर माँगे। पहला यह कि जब पद्म का शरीर छूटे, तब उनका जीव अथवा पुर्यष्टक इस अन्तःपुर से बाहर न जाए। पुर्यष्टक से यहाँ उस सूक्ष्म संचय का आशय है जिसमें मन, इन्द्रियों की प्रवृत्तियाँ, प्राण और वासनाएँ जीव की अनुभूत निरन्तरता को सँभाले रहते हैं। दूसरा वर यह था कि जब भी लीला सरस्वती का स्मरण करें, देवी उन्हें दर्शन दें। सरस्वती ने दोनों वर स्वीकार किए और अन्तर्धान हो गईं।

लीला को कुछ आश्वासन मिला। मृत्यु का दिन फिर भी अपने समय पर आया। राजा पद्म रणभूमि में शत्रुओं के प्रहार से घायल हुए, महल लौटे और अन्तःपुर में उनका देहान्त हो गया। उनका शरीर निश्चेष्ट पड़ा था और लीला का मन उस सत्य को ग्रहण नहीं कर पा रहा था। कभी वे विलाप करतीं, कभी वाणी थम जाती। शोक इतना तीव्र हुआ कि उनके प्राण भी जैसे शरीर छोड़ने को उद्यत थे।
उसी समय सरस्वती की वाणी सुनाई दी। देवी ने कहा कि पद्म के शरीर को चारों ओर से फूलों में ढककर सुरक्षित रखिए। ये फूल नहीं मुरझाएँगे, शरीर नष्ट नहीं होगा और राजा का निर्मल जीव इस मण्डप से बाहर नहीं जाएगा। समय आने पर लीला उन्हें फिर पाएँगी।
रानी ने शरीर को ऊपर और नीचे से फूलों की राशियों में सँभालकर रखा। इस व्यवस्था ने उन्हें धैर्य दिया, पर वियोग का प्रश्न बना रहा। पति की देह सामने थी और वह परिचित उपस्थिति अब उत्तर नहीं दे रही थी। उसी दिन आधी रात को, जब महल के परिजन सो चुके थे, लीला ने फूलों से ढके पद्म के पास बैठकर सरस्वती का आवाहन किया।
देवी प्रकट हुईं और पूछा कि वह इतनी व्याकुल क्यों हैं। लीला ने विनम्रता से कहा, “माता, मेरे पति कहाँ हैं? किस अवस्था में हैं? कृपा करके मुझे उनके पास ले चलिए। उनके बिना यहाँ अकेले रहना मेरे लिए कठिन है।”
सरस्वती ने उत्तर देने से पहले उस आकाश को समझाया जिसमें लीला की खोज होने वाली थी।
फूलों के मण्डप से चिदाकाश तक
सरस्वती ने भूताकाश, चित्ताकाश और चिदाकाश का भेद रखा। भूताकाश वह विस्तार है जिसमें देह, महल, पृथ्वी और दूसरे स्थूल पदार्थ एक-दूसरे से दूर अथवा पास दिखाई देते हैं। चित्ताकाश मन, स्मृति, कल्पना और वासना का क्षेत्र है, जहाँ चेतना क्षण भर में एक देश से दूसरे देश तक पहुँचती जान पड़ती है। चिदाकाश वह शुद्ध चेतना है जिसमें भूताकाश और चित्ताकाश, दोनों का अनुभव सम्भव होता है।
देवी ने कहा कि उनके पति के जीव का वर्तमान अनुभव चित्त और वासना के स्तर पर खुला है। उसका आधार चिदाकाश ही है। जब लीला सभी संकल्पों का अवलम्ब छोड़कर उस शुद्ध चेतना में स्थिर होंगी, तब पति और उनके जगत् का दर्शन उसी स्थान से हो सकेगा। दूर जाने के लिए भौतिक रास्ता तय करना आवश्यक नहीं था; अनुभूति का पूरा प्रदेश उसी चेतना में उपस्थित था।
सरस्वती के वर और अपने साधना-बल से लीला निर्विकल्प समाधि में स्थित हुईं। स्थूल शरीर का अहंभाव शान्त हुआ। उन्होंने अपने ही अन्तःपुर के आकाश में पति के जीव को एक विशाल राजसभा में सिंहासन पर बैठे देखा। बन्दीजन जयघोष कर रहे थे, राजाओं और विद्वानों की पंक्तियाँ थीं, चारों ओर सेना, परिचारक, स्त्रियाँ, दूत और अधिकारी अपने कार्य में लगे थे। दिशाओं से युद्ध और शासन के समाचार आ रहे थे। नगर, ग्राम, पर्वत, नदियाँ और एक पूरा राज्य अपने क्रम में चल रहा था।
उस सभा के बीच पति का जीव सोलह वर्ष के युवा राजा की तरह दिखाई दिया। पुराने शरीर की आयु और थकान का कोई चिह्न नहीं था। इसी राजा का नाम आगे विदुरथ प्रकट होता है। लीला ने अपने पहले परिचित मन्त्री, विद्वान, बालक और सेवक भी देखे; कुछ लोग और व्यवहार नए थे। वह सबके बीच घूमीं, पर किसी ने उन्हें नहीं देखा। उनका शरीर उस जगत् की स्थूल व्यवस्था का अंग नहीं था।
सभा किसी रुके हुए स्वप्न की तरह निश्चेष्ट नहीं थी। यज्ञशाला में वेदमन्त्रों का उच्चारण हो रहा था, संगीतशाला में वाद्य बज रहे थे और सामन्त अपने-अपने कार्य में व्यस्त थे। अलग दिशाओं से आए दूत सीमा, सेना और दूर देशों का समाचार सुना रहे थे। शिल्पी नए नगरों की तैयारी में लगे थे। लीला ने देखा कि इस जगत् में रूपों के साथ शासन, दायित्व, समाचार, स्मृति और अपेक्षा का पूरा क्रम चल रहा है। युवा राजा का शरीर उस क्रम के बीच उतना ही स्वाभाविक था जितना पहले महल में पद्म का प्रौढ़ शरीर रहा था।
इस दर्शन ने उन्हें जितना चकित किया, उतने ही प्रश्न भी दिए। क्या उनके पति के साथ पूरा नगर मरकर यहाँ आ गया था? जो लोग वहाँ थे, वे पहले महल में भी कैसे हो सकते थे? वह समाधि से लौटीं तो उसी रात का मध्य पहर था। सखियाँ और सेवक वैसे ही सो रहे थे जैसे कुछ क्षण पहले थे।
लीला ने उन्हें जगाया और राजसभा सजाने को कहा। दीप जलाए गए, स्थान स्वच्छ हुआ और मन्त्री, सामन्त, गुरुजन, सम्बन्धी, सेवक तथा नागरिक अपने-अपने आसनों पर आ बैठे। लीला ने उन चेहरों को देखा जिन्हें अभी दूसरे जगत् की सभा में देख आई थीं। यहाँ वे जीवित थे, अपने परिचित व्यवहार में थे। एक ही दर्पण के भीतर और बाहर समान रूप दिखाई देने जैसा अनुभव हुआ।
उन्होंने फिर सरस्वती का स्मरण किया। देवी कुमारी के रूप में प्रकट हुईं। लीला ने पूछा, “यहाँ की सृष्टि और वहाँ की सृष्टि में कौन कृत्रिम है और कौन अकृत्रिम? यदि यह हमारा पहला जगत् है और वह पद्म की मृत्यु के बाद खुला है, तो क्या यह अधिक सत्य है?”
सरस्वती ने कारण, कार्य और स्मृति की जाँच कराई। किसी एक जगत् को केवल इस आधार पर स्थायी सत्य नहीं कहा जा सकता कि उसकी स्मृति पहले आती है। स्वप्न में भी स्मृति, सम्बन्ध, देश और काल का पूरा अनुक्रम बन जाता है। जागने पर वही क्रम किसी दूसरे अनुभव में स्थान छोड़ देता है। पति के उस नए जगत् के लिए पृथ्वी, जल, नगर या देह का कोई अंश इस महल से उठकर वहाँ नहीं गया। वह वासना और चित्त में उतना ही सुव्यवस्थित दिखाई दे रहा था जितना लीला को अपना वर्तमान संसार।
लीला के प्रश्न का आग्रह बना रहा। यदि एक अनुभव दूसरे से निकला है, तो पहले को कारण और दूसरे को कार्य मानने में कठिनाई क्या है? देवी ने उन्हें ध्यान दिलाया कि कारण का नाम दे देने से कोई स्थूल सामग्री मिल नहीं जाती। स्मृति का विषय सामने उपस्थित न रहते हुए भी स्मरण में पूरा दृश्य उठता है। मनोरथ में बना नगर अपने मार्ग, भवन और निवासियों सहित जाना जाता है। उस ज्ञान की व्यवस्था अनुभव में स्पष्ट होती है, यद्यपि उसके लिए बाहर से ईंट, मिट्टी और जल नहीं लाए जाते। इसी प्रकार उनके पति का जगत् अपनी वासना-व्यवस्था में पूर्ण था। लीला का सामने वाला जगत् भी चेतना में ज्ञात होने के कारण उसी जाँच के अधीन था।
लीला ने मिट्टी और घड़े का उदाहरण दिया। मिट्टी स्वयं जल नहीं रखती, घड़ा जल रखता है; इसलिए कार्य में कारण से अलग सामर्थ्य दिखाई दे सकती है। देवी ने समझाया कि उस भिन्नता के लिए कुम्हार, चक्र, दण्ड और प्रयत्न जैसे सहायक कारण होते हैं। पति की नई सृष्टि के लिए यहाँ के स्थूल पदार्थों से ऐसा कोई स्थानान्तरण नहीं हुआ। स्मृति भी कोई ठोस उपादान नहीं; वह पूर्व अनुभव का मानसिक संस्कार है। इस विवेचन से दोनों जगतों का आश्रय एक ही चिदाकाश में दिखाई देने लगा।
अब सरस्वती ने वह पूर्व कथा सुनाई जिससे पद्म का राज्य और लीला का अपना जीवन समझ में आ सके।
ब्राह्मण वसिष्ठ और अरुन्धती
एक विस्तृत जगत् के भीतर पर्वत, नदी और वन से घिरा एक छोटा पर्वतीय ग्राम था। वहाँ ब्राह्मण वसिष्ठ और अरुन्धती रहते थे। उनका नाम राम को उपदेश देने वाले महर्षि से मिलता था, पर वे पर्वतीय ग्राम के गृहस्थ ब्राह्मण थे। नाम, धर्मनिष्ठा और बाहरी गुणों में कुछ समानता थी; आत्मज्ञान की स्थिति और जीवन की भूमिका अलग थी। ग्राम के वसिष्ठ अग्निहोत्री थे। उनके बच्चे थे, गाय और दूसरे पशु थे, घर में अतिथियों के सत्कार की व्यवस्था थी। अरुन्धती उनके साथ धर्म और गृहस्थ जीवन को सँभालती थीं।
प्रसिद्ध महर्षि वसिष्ठ और उनकी अरुन्धती आत्मज्ञान में प्रतिष्ठित थे। पर्वतीय ग्राम के ये दम्पति धर्मशील और आदरणीय थे, मगर उस समय अपनी वासना और देह-स्मृति से बँधे हुए थे। समान नाम के पीछे दो अलग जीवन थे। सरस्वती ने लीला को यह भेद समझाकर आगे का क्रम खोला।
एक दिन ब्राह्मण वसिष्ठ पर्वत की हरी समतल भूमि पर बैठे थे। नीचे से शिकार के लिए निकला एक राजा अपने पूरे वैभव के साथ गुज़रा। आगे हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना थी। छत्र, चँवर, ध्वजा और आभूषणों की चमक के बीच राजकीय घोष पर्वत तक पहुँच रहा था। वसिष्ठ ने उस यात्रा को देखा तो उनके मन में राजा होने की प्रबल इच्छा उठी। उन्होंने सोचा कि उनके सामने भी ऐसी सेना चले, दिशाएँ उनके यश से भरें और विशाल राज्य उनके अधीन हो।
यह इच्छा क्षणिक आकर्षण बनकर चली नहीं गई। वसिष्ठ अपने धार्मिक कर्तव्य करते रहे, साथ ही राजसत्ता का संकल्प भीतर दृढ़ होता गया। आयु बढ़ी, शरीर जर्जर हुआ और मृत्यु समीप आई। अरुन्धती को पति के वियोग की चिन्ता हुई। उन्होंने सरस्वती की आराधना की और वही मूल वर माँगा जो आगे चलकर लीला माँगने वाली थीं: पति का जीव मृत्यु के बाद घर से बाहर न जाए।
सरस्वती ने वर दे दिया। वसिष्ठ का शरीर छूटा तो उनका जीव उसी गृहमण्डप के आकाश में रहा। राजत्व की दृढ़ वासना वहाँ एक सम्पूर्ण अनुभव बनकर फली। उन्होंने स्वयं को विशाल राज्य के अधिपति पद्म के रूप में जाना। अरुन्धती ने पति को मृत देखकर कुछ समय बाद अपना शरीर छोड़ा और आतिवाहिक रूप में उसी अनुभव तक पहुँचीं। वही अरुन्धती राजा पद्म की रानी लीला हुईं।
सरस्वती ने लीला से कहा कि पर्वतीय घर में ब्राह्मण की मृत्यु को केवल आठ दिन हुए हैं। वहाँ शोक और अशौच का समय भी पूरा नहीं हुआ। लीला को अपना साठ हजार वर्षों का राजजीवन, विवाह, सन्तान, शासन, यात्राएँ और पद्म का अन्त स्मरण था। एक घर के आठ दिनों और इतने विस्तृत जीवन के बीच का अन्तर उन्हें स्वीकार करना कठिन लगा।
उन्होंने पूछा कि एक छोटे गृह-मण्डप के भीतर पर्वत, समुद्र, दिशाएँ और पूरा राज्य कैसे स्थित हो सकते हैं। सरस्वती ने उत्तर दिया कि माप उसी अनुभव के साथ बनता है जिसे मापा जा रहा है। स्वप्न में एक क्षण के भीतर जन्म, आयु, सम्बन्ध और अनेक वर्षों का इतिहास उपस्थित हो सकता है। जागने वाला उसे कमरे की लम्बाई में रखने की चेष्टा नहीं करता। ब्राह्मण के घर, पद्म के राज्य और लीला के सामने उपस्थित महल का आधार भी चिदाकाश है। वहाँ दूरी चेतना से बाहर रखी हुई दीवार नहीं है।

मृत्यु को भी देवी ने स्मृति के एक क्रम के शान्त होने और दूसरे क्रम के जागने से समझाया। जीव पुराने माता-पिता, घर और आयु को भूलकर नए सम्बन्धों के साथ एक नया अतीत अनुभव करता है। उस अतीत की क्रमबद्धता अनुभव के समय पूर्ण लगती है। इसी कारण वसिष्ठ का राजत्व, पद्म का जीवन और अब खुलता आगे का संसार अपने-अपने भीतर दीर्घ और व्यवस्थित प्रतीत हुए।
लीला ने यह बात बुद्धि से सुनी, फिर उसे प्रत्यक्ष देखना चाहा। उन्होंने सरस्वती से निवेदन किया कि उन्हें उस पर्वतीय घर तक ले चलें जहाँ उनका अरुन्धती वाला जीवन समाप्त हुआ था।
आतिवाहिक यात्रा और अपने ही घर में अतिथि
सरस्वती ने कहा कि किसी दूसरे के चित्त में खुलते जगत् तक स्थूल देह के आग्रह के साथ पहुँचना सम्भव नहीं। अपने ही संकल्प से बने नगर में भी यह शरीर प्रवेश नहीं कर सकता, तब किसी दूसरे के वासना-जगत् में कैसे जाएगा? ज्ञान के अभ्यास से जब देह में दृढ़ अहंभाव शान्त होता है, मन आतिवाहिकता ग्रहण करता है। आतिवाहिक का अर्थ यहाँ चेतना और वासना के अनुकूल सूक्ष्म गमन-रूप है।
देवी ने अभ्यास का स्वरूप भी बताया। सत्य का निरन्तर चिन्तन, योग्य ज्ञाता से संवाद, परस्पर विचार और उसी में मन की स्थिरता ज्ञानाभ्यास हैं। लीला ने केवल एक अद्भुत यात्रा की इच्छा नहीं रखी; वे उस दृष्टि को पुष्ट कर रही थीं जिसमें दृश्य की स्वतन्त्र सत्ता का आग्रह ढीला पड़ता है।
आधी रात को दोनों पद्म के फूलों से सुरक्षित शरीर के पास बैठीं और समाधिस्थ हुईं। महल के द्वार बन्द थे और पहरेदार जाग रहे थे। उनकी यात्रा के लिए किसी दरवाज़े की आवश्यकता नहीं थी। चित्त का स्थूल सीमा-बोध शान्त होते ही उन्होंने अपने को विशाल आकाश में गतिमान पाया। कमल, द्वीप, समुद्र, पर्वत और ब्रह्माण्डीय आवरणों की विस्तृत रचना खुली। उनका गमन इन्हीं रूपों के पार उस ब्रह्माण्ड तक पहुँचा जिसमें ब्राह्मण वसिष्ठ का पर्वतीय घर था।

ग्राम की पहले वाली शोभा बुझी हुई थी। घर के लोग वसिष्ठ और अरुन्धती के निधन से शोकाकुल थे। दासियाँ रो रही थीं, आँगन और मार्गों पर उत्सव का चिह्न नहीं था, परिवार को अपना संसार रिक्त लग रहा था। लीला ने संकल्प किया कि घरवाले उन्हें और सरस्वती को देख सकें। दोनों का रूप उनके सामने वनदेवियों जैसा प्रकाशित हुआ।
शोक घरवालों के अनुभव से पूरे परिवेश पर फैल गया था। पर्वत की गुफाओं में आता पवन विलाप करता जान पड़ता, नदी की तरंगें आँसू जैसी लगतीं और पक्षियों का स्वर वियोग में डूबा सुनाई देता। जिसके मन में पीड़ा भरी हो, उसके लिए परिवेश भी उसी भाव में रंग जाता है। वसिष्ठ ने इसी प्रसंग से समझाया कि मनुष्य अपने चित्त की वृत्ति के अनुसार जगत् को पूर्ण, कामनायुक्त, दुःखमय या लोभमय देखता है।
ब्राह्मण के ज्येष्ठ पुत्र ज्येष्ठशर्मा ने परिवार के साथ आगे बढ़कर फूल अर्पित किए। उन्होंने कहा, “देवियो, हमारे माता-पिता अतिथि-सत्कार और धर्म में स्थित रहते थे। अब दोनों चले गए हैं। उनके बिना यह घर और जगत् सूना लगता है। कृपा करके हमारे शोक को शान्त कीजिए।”
लीला ने ज्येष्ठशर्मा के सिर पर हाथ रखा। उनके स्पर्श से उसका ताप शान्त हुआ और घर के दूसरे लोगों को भी धैर्य मिला। उसने अपने सामने खड़ी स्त्री को अपनी माता अरुन्धती के पुराने रूप में नहीं देखा। राम ने इसी बात पर प्रश्न किया। वसिष्ठ ने समझाया कि लीला में उस पूर्व शरीर का “मैं” और “मेरा” वाला आग्रह समाप्त हो चुका था। वह दया से पुत्र का शोक हर रही थीं; पुरानी देह और मातृत्व की पहचान को फिर धारण करने की आवश्यकता नहीं रही थी।
परिवार से अदृश्य होने के बाद लीला ने सरस्वती से पूछा कि पति की पहली दिखाई दी राजसभा में कोई उन्हें देख न सका, जबकि यहाँ उनके संकल्प से सबने दर्शन कर लिया। देवी ने कहा कि पहले दर्शन के समय उनका ज्ञानाभ्यास परिपक्व नहीं था। अब सत्यसंकल्प की शक्ति जागी है। जिस व्यवहार का संकल्प ज्ञान के साथ स्थिर होता है, वैसा अनुभव सम्भव हो जाता है।
इस बिन्दु पर लीला अपने पति के तीन निकट रूप स्पष्ट देख सकीं। ब्राह्मण वसिष्ठ का शरीर जल चुका था। पद्म का शरीर फूलों के नीचे उनके महल में सुरक्षित था। उसी जीव का तीसरा राजकीय अनुभव राजा विदुरथ के रूप में एक और संसार-मण्डप में चल रहा था।
सरस्वती की कृपा से लीला की स्मृति और दूर खुली। उन्हें आठ सौ जन्म स्मरण हुए। उनमें विद्याधर की पत्नी, मनुष्य स्त्री, नागराज की संगिनी, भीलनी, वनलता, मुनि की कन्या, सौराष्ट्र में सौ वर्ष तक राजा, नौ वर्ष तक नेवली, आठ वर्ष तक गाय, फिर पक्षी, भ्रमरी, हरिणी, मछली, पुलिन्द स्त्री, सारसी, अप्सरा, कछुई, राजहंसिनी, मच्छर और जलवेतस जैसे विविध रूप आए। प्रत्येक पहचान के पीछे अनुभवों की विशाल परम्परा थी। वासना, कर्म और अन्तिम स्मृति के अनुसार उसका केन्द्र बार-बार नया रूप ग्रहण करता रहा था।
लीला अब उस तीसरे निकट अनुभव में लौटना चाहती थीं जहाँ उन्होंने पहले पति के जीव को युवा राजा के रूप में देखा था। अब वे जानती थीं कि वह राजा विदुरथ हैं। दोनों ने फिर सूक्ष्म मार्ग ग्रहण किया। अनेक लोक और ब्रह्माण्ड पास और दूर की धारणाओं के साथ खुलते गए। अन्ततः वे उसी राज्य तक पहुँचीं जहाँ युद्ध की उथल-पुथल चल रही थी।
राजा विदुरथ से पद्म का पुनर्जागरण
युद्ध का एक दिन समाप्त हुआ था। दोनों सेनाएँ रात के लिए रुकीं और राजा विदुरथ मन्त्रियों से विचार करके महल में विश्राम करने आए। पहली दृष्टि में यही राजा सोलह वर्ष के दिखाई दिए थे। लीला और सरस्वती के प्रश्न, अभ्यास और पर्वतीय ग्राम की यात्रा के दौरान इस जगत् में एक लम्बा जीवनक्रम बीत चुका था। दोनों सूक्ष्म रूप से भीतर पहुँचीं। उनके प्रकाश से राजा जागे, आदरपूर्वक उठे और पुष्प अर्पित किए। सरस्वती ने मन्त्री को भी जगाया और उससे वंश का परिचय पूछा। उसने कुन्दरथ से आरम्भ होकर भद्ररथ, विश्वरथ, बृहद्रथ, सिन्धुरथ, शैलरथ, कामरथ, महारथ, विष्णुरथ और नभोरथ तक की परम्परा बताई। नभोरथ ने विदुरथ को दस वर्ष की आयु में राज्य देकर वन में तप के लिए प्रस्थान किया था।
सरस्वती ने विदुरथ के सिर पर हाथ रखकर उन्हें अपने पहले रूपों को स्मरण करने को कहा। आवरण हटते ही उन्हें ब्राह्मण वसिष्ठ का संकल्प, राजा पद्म का जीवन, पहली लीला, अपनी मृत्यु और वर्तमान राज्य याद आ गया। उन्होंने आश्चर्य से पूछा कि पद्म के रूप में मृत्यु को अभी एक दिन जैसा समय हुआ है, जबकि विदुरथ के जीवन में सत्तर वर्ष बीत चुके हैं। देवी ने फिर समझाया कि मृत्यु-मूर्च्छा में स्मृति का क्रम बदलते ही नए जन्म, कुल, आयु और इतिहास का पूरा विस्तार सामने आ सकता है।
विदुरथ ने वर माँगा कि आगामी मृत्यु के बाद वे पद्म के फूलों से सुरक्षित शरीर और अपने पुराने नगर को फिर प्राप्त करें। उन्होंने अपने मन्त्री और अविवाहित पुत्री के लिए भी उस नगर तक पहुँचने की प्रार्थना की। सरस्वती ने स्वीकार किया कि वे सूक्ष्म रूप में वहाँ पहुँचेंगे।
उसी समय सूचना मिली कि राजा सिन्धु की सेना ने राजधानी पर आक्रमण कर दिया है। आग और युद्ध महल तक बढ़ रहे थे। विदुरथ की रानी भी परिचारिकाओं के साथ भीतर आईं। उनका नाम भी लीला था और उनका रूप पहली लीला से बहुत मिलता था। पहली लीला को यह पुनरावृत्ति देखकर विस्मय हुआ। सरस्वती ने कहा कि चित्त में स्थित गहरी वासना और परिचित रूप दूसरे अनुभव में प्रतिबिम्ब की तरह फिर प्रकट हो सकते हैं।

दूसरी लीला ने बताया कि वह सरस्वती की आराधना करती रही हैं और स्वप्न में देवी के दर्शन पाती थीं। उन्होंने वर माँगा कि पति के युद्धभूमि में शरीर छोड़ने पर वह अपने इसी परिचित रूप में उनके साथ जा सकें। सरस्वती ने यह अलग वर भी दे दिया।
विदुरथ युद्ध में लौटे। उनका रथ आठ घोड़ों से जुता था। दोनों राजाओं के बीच अस्त्रों का दीर्घ संघर्ष हुआ। अग्नेय और वारुण, वायव्य और पर्वत, वज्र और वैष्णव जैसे अनेक अस्त्र चले और उनके प्रतिकार हुए। विदुरथ ने शक्ति से सिन्धु की छाती घायल की, पर वह प्रहार प्राणघातक नहीं हुआ। सिन्धु ने उनके रथ, घोड़े, सारथि, धनुष, कवच और उपकरण नष्ट किए। उसने विदुरथ की दोनों पिण्डलियों पर घात किया और पीछा करते हुए तलवार से उनका आधा कंठ काट दिया।
सारथि गिरते राजा को सँभालकर महल के भीतर ले गया। सरस्वती की रक्षा के कारण सिन्धु भीतर प्रवेश नहीं कर सका। विदुरथ को कोमल मृत्यु-शय्या पर रखा गया। दूसरी लीला उनके पास रहीं। बाहर सिन्धु की विजय हुई, उसके पक्ष ने शासन सँभाला और नई व्यवस्था स्थापित की। इस परिणाम के बाद दोनों राजाओं की कोई सन्धि या भेंट नहीं हुई।
विदुरथ की इन्द्रियाँ क्रमशः शान्त हुईं और प्राण ने शरीर छोड़ दिया। सरस्वती और पहली लीला उनके जीव की गति देखती हुई साथ चलीं। मृत्यु-मूर्च्छा में विदुरथ ने सूक्ष्म शरीर, परिजनों द्वारा किए जा रहे संस्कार, यमदूत और दक्षिण दिशा की यात्रा अनुभव की। यम ने उनके कर्मों की जाँच कर उन्हें पाप से रहित, धर्मनिष्ठ और सरस्वती के वर से सुरक्षित पाया। आदेश हुआ कि जीव को उस पुराने शव में प्रवेश करने दिया जाए जो पद्म के महल में फूलों से ढका रखा है।
यमपुरी की राह इतनी दूर थी कि साधारण यात्रा में एक वर्ष लगे। विदुरथ की मृत्यु-चेतना में वही अनुक्रम दूसरे कालमान से पूरा हुआ। उन्हें अपने लिए किए गए संस्कार भी अनुभव हुए और यम के सामने कर्म का निर्णय भी। आठ दिनों में फैले पद्म जीवन और सत्तर वर्षों वाले विदुरथ जीवन की समस्या फिर खुली। अनुभूत काल अपनी घटनाओं के साथ सघन या विस्तृत होता है और हर अवस्था अपना कालमान लेकर आती है।
एक-दूसरे में खुले तीनों संसारों की दूरी फिर चित्त की गति में खुली। विदुरथ का जीव पद्म के नगर की ओर चला। सरस्वती और पहली लीला उसे देख सकती थीं; वह उन्हें नहीं देख रहा था। इस बीच दूसरी लीला अपने वर के प्रभाव से पहले ही पद्म के फूलों भरे कक्ष में पहुँच चुकी थीं। वह संरक्षित शरीर को अपना सोया हुआ पति मानकर चँवर कर रही थीं।
सरस्वती और पहली लीला कक्ष में पहुँचीं। पद्म का शरीर मन्दार और कुन्द के फूलों के नीचे था। देवी के संकल्प से दूसरी लीला ने दोनों आगन्तुकों को देखा, प्रणाम किया और विदुरथ के जलते महल से मृत्यु-मूर्च्छा तथा सूक्ष्म यात्रा के द्वारा यहाँ आने का वृत्तान्त सुनाया।
अब सरस्वती ने विदुरथ के जीव को मुक्त किया। वह सुगन्धित वायु के खोखले बाँस में प्रवेश करने की तरह राजा पद्म की नासिका से भीतर गया। मुख पर रंग लौटा, अंगों में गति हुई, श्वास चली और आँखें खुलीं। पद्म ने सामने एक जैसी दिखाई देने वाली दो रानियों को देखा।
पहली लीला ने कहा, “महाराज, मैं आपकी पहले वाली पत्नी लीला हूँ। ये आपके विदुरथ जीवन की पत्नी हैं, जो अपने वर से यहाँ पहुँची हैं। हमारे सामने ज्ञान और जीवन का उपकार करने वाली देवी सरस्वती विराजमान हैं।”
पद्म ने देवी को प्रणाम किया और ज्ञान, दीर्घ आयु, समृद्धि, दुःख से निवृत्ति तथा प्रजा के कल्याण का आशीर्वाद माँगा। सरस्वती ने उन्हें आत्मतत्त्व का बोध, सत्बुद्धि, सुख और सम्पन्न राज्य का वर दिया।
प्रभात होते ही महल जाग उठा। राजा के जीवित होने का समाचार फैला और उत्सव आरम्भ हुआ। पद्म ने पूरा वृत्तान्त सुना, चारों समुद्रों से लाए गए जल से स्नान किया और फिर उनका राज्याभिषेक हुआ। पहली लीला, दूसरी लीला और पद्म आत्मज्ञान में स्थित होकर जीवन्मुक्त हुए। उन्होंने अस्सी हजार वर्ष तक धर्मपूर्वक राज्य किया। अन्त में तीनों ने विदेहमुक्ति प्राप्त की।
प्रेम का विस्तृत आकाश
लीला की यात्रा एक प्रिय देह को अपने पास रखने की इच्छा से आरम्भ हुई थी। सरस्वती ने उन्हें भूताकाश, चित्ताकाश और चिदाकाश का अनुभव कराया। महल की दूरी, स्मृति में खुलते राज्य और उन सबको प्रकाशित करती चेतना अब एक ही खोज के अलग आयाम थे। पद्म, विदुरथ और पर्वतीय ब्राह्मण की जीवन-धाराएँ इसी चेतना में अपना-अपना काल और इतिहास लेकर खुली थीं।
ज्येष्ठशर्मा के सिर पर रखा लीला का हाथ इस विशाल विचार को मानवीय धरातल देता है। पुराना मातृरूप शान्त हो चुका था, मगर करुणा पूरी तरह उपस्थित थी। आत्मज्ञान ने सम्बन्धों के प्रति उनकी संवेदना को अधिक स्वच्छ बनाया। विदुरथ की धर्मनिष्ठा, दूसरी लीला की भक्ति और पद्म की प्रजा के प्रति जिम्मेदारी भी अपने-अपने संसार में फल देती रही।
पद्म का जागना यात्रा का एक पड़ाव था। सरस्वती से आत्मज्ञान पाने के बाद तीनों ने राजधर्म निभाया और जीवन्मुक्त जीवन जिया। लीला का प्रेम अब एक शरीर, एक महल और एक कालमान की सीमा से मुक्त हो चुका था। चिदाकाश की व्यापकता में वह प्रेम स्मृति, कर्तव्य और बदलती पहचान को सँभालते हुए स्थिर रहा।