कथा · 01
लीला और पद्म: एक राजा की मृत्यु, एक रानी की यात्रा
रानी ने एक वर माँगा – कि पति अगर मरे तो कहीं दूर न जाए। उसी वर ने उसे संसार के भीतर एक संसार दिखाया। और उस संसार के भीतर एक और। और एक और।
बहुत पुरानी बात है। एक राज्य था, बहुत सुंदर। उसमें एक राजा थे पद्म नाम के, और उनकी रानी थीं लीला। दोनों में इतना प्रेम था कि एक-दूसरे के बिना एक दिन भी कटना मुश्किल लगता था। राजा दरबार जाते, तो लीला खिड़की पर बैठी रहती – कब लौटेंगे। राजा लौटते, तो लीला उन्हें सीढ़ियों पर मिल जाती। दोनों हँसते, साथ बैठते।
एक रात लीला पलंग पर लेटी सोच रही थी। बाहर चाँद था, खिड़की से रोशनी आ रही थी। राजा सोए हुए थे। लीला ने उन्हें देखा। फिर सोचा – “अगर कभी राजा से मेरा बिछोह हो गया, तो मैं क्या करूँगी?”
यह विचार उसके मन में बैठ गया। दिन भर रहता। रात भर भी। उसका मन कहता, “ऐसा कुछ करो कि बिछोह कभी न हो। या अगर हो भी, तो दूरी न हो।”
उसने मन्दिर में जाकर माँ सरस्वती की उपासना शुरू की। ज्ञान की देवी। जो जानने वाली, जो दिखाने वाली। लीला ने व्रत लिया। फूल चढ़ाए। मंत्र जपे। महीनों लगे, फिर साल। राजा को कुछ पता नहीं था। सोचते थे रानी पूजा-पाठ करती है, ठीक है।
एक रात माँ प्रसन्न होकर सामने प्रकट हुईं। चेहरे पर सौम्य मुस्कान। हाथ में वीणा। पीछे एक हलकी सी रोशनी।
“बेटी, क्या चाहिए?”
लीला ने हाथ जोड़े। बोली, “माँ, मैं चाहती हूँ कि अगर मेरे राजा का देहांत हो जाए, तो उनकी आत्मा कहीं दूर न जाए। यहीं इस महल में कहीं रहे, और मुझे दिखे।”
माँ ने सिर हिलाया। बोलीं, “तथास्तु। मगर बेटी, यह वर तुम्हें कुछ ऐसा दिखाएगा जो तुमने सोचा भी नहीं। तैयार रहना।”
“मैं तैयार हूँ।”
माँ अंतर्ध्यान हो गईं।
मृत्यु
समय बीता। लीला ने वर के बारे में किसी को नहीं बताया। राजा के साथ ज़िंदगी पुराने ढर्रे पर चलती रही।
एक दिन सीमा पर युद्ध की ख़बर आई। राजा को जाना पड़ा। लीला ने उन्हें विदा किया। हाथ में आरती की थाली। आँखों में थोड़ी नमी, थोड़ी हिम्मत।
हफ़्तों बाद ख़बर आई। पद्म के घोड़े पर एक बाण लगा था। फिर पद्म पर भी। दो बाणों में कई घावों के बाद वो गिरे। प्राण त्याग दिए।
लीला ख़बर सुनकर बेहोश हो गई। दासियों ने उसे संभाला। पानी छिड़का।
आँख खुली। उसने सबसे पहले माँ का वचन याद किया।
“उनकी आत्मा कहीं दूर न जाए…”
उसने तय किया – रोएगी नहीं। पहले देखेगी।
राजा के शव को महल के एक कक्ष में रखा गया था। फूलों से ढका। लीला उस कक्ष में अकेली गई। दीप जलाए। बैठ गई। आँखें मूँदीं।
उसने ध्यान किया – पद्म कहाँ हैं?
थोड़ी देर कुछ नहीं। फिर एक झलक मिली।
राजा महल में ही थे। मगर इस वाले महल में नहीं। एक और महल में। एक चित्र-लोक में।
चित्र-लोक
लीला हैरान हो गई।
उस चित्र-लोक में पद्म जीवित थे। राजा थे। पूरा एक राज्य था। और एक रानी थी – उसका नाम भी लीला था।
एक और लीला!
लीला ने ध्यान में देखा – दूसरी लीला बिल्कुल उसी जैसी थी। उसी की उम्र, उसी का चेहरा, उसी की आदतें। वो दूसरी लीला राजा के साथ बातें कर रही थी, सब कुछ साधारण था।
लीला (पहली वाली) ने अपनी आँखें खोल लीं।
माँ सरस्वती फिर प्रकट हुईं।
“बेटी, यही तो असली बात है। तुम्हारा यह संसार भी ऐसा ही है। हर जीव अपने मन में एक संसार रचता है। राजा का चित्र-लोक उसके अपने संकल्प से बना है, जैसे तुम्हारा यह जगत भी सबके सम्मिलित संकल्पों से बना है।”
लीला ने पूछा, “मगर माँ, अगर सब कुछ संकल्प है, तो सच क्या है?”
माँ बोलीं, “सच केवल चेतना है। बाक़ी सब उसमें उठने वाली लहरें हैं। चलो, मैं तुम्हें राजा के चित्र-लोक में ले चलती हूँ।”
पहले लोक के भीतर
माँ ने लीला को छुआ। दोनों चित्र-लोक में पहुँच गईं।
वहाँ राजा पद्म थे। दूसरी लीला उनके बग़ल में थी। मगर उन्हें यह नहीं दिख रहा था कि कोई बाहर से आया है। माँ और लीला अदृश्य थीं।
लीला ने ध्यान दिया। यह राजा वैसा ही था जैसे उसका अपना। मगर थोड़ा अलग। चेहरे की रेखाएँ थोड़ी बदली हुई। बातचीत का ढंग कुछ अलग। यह उसका राजा नहीं था पूरी तरह। यह उसके राजा का एक स्मरण था।
माँ ने कहा, “देखो बेटी, यह राजा अपने ही पूर्व जन्म में जी रहा है। तुम्हारा राजा – जो अभी मरा है – यह उसका कई जीवन पहले का स्वरूप है। उसकी अंतिम चेतना ने यह रूप पकड़ लिया।”
“पूर्व जन्म?”
“हाँ। तुम्हारा राजा हमेशा से तुम्हारा राजा नहीं था। पहले वो कोई और था। और उससे भी पहले कोई और। हर जीव की कई पर्तें होती हैं।”
लीला ने राजा को देखा। राजा ने अपनी रानी से कहा – “लीला, चलो वन की ओर। आज सूर्यास्त देखेंगे।”
दूसरी लीला हँसी। दोनों उठे।
लीला (असली वाली) उन्हें देखती रही। उसके भीतर एक अजीब सा प्रेम उमड़ा – इस दूसरी लीला के लिए।
दूसरी पर्त
माँ ने कहा, “अब और गहरा देखो। यह राजा भी एक चित्र-लोक रच रहा है। उसके भीतर एक और लोक है।”
लीला ने ध्यान दिया।
उसने देखा – राजा पद्म, इस चित्र-लोक के अंदर, अपने मन में एक तीसरा लोक रच रहा था। उसमें वो एक ब्राह्मण था। नाम वसिष्ठ। (यह वो वसिष्ठ नहीं जो कथा सुना रहे हैं। दूसरा कोई।) उसकी पत्नी थी अरुंधती। दोनों एक छोटी सी कुटिया में रहते थे। पूजा करते, यज्ञ करते। बच्चे पाले। बच्चे बड़े हुए, चले गए। फिर वसिष्ठ बूढ़े हो गए। मरे।
लीला सकते में आ गई।
“माँ, यह कितने स्तर हैं?”
“बेटी, अंत नहीं है। हर लोक के भीतर एक और लोक है। हर जीव के भीतर अनगिनत जीव हैं। हर जीवन एक तरह का सपना है। एक के भीतर एक।”
लीला को कुछ चकराने लगा।
“माँ, मगर मैं असली कौन हूँ? यह जो लीला तुम्हारे साथ खड़ी है, यह असली है? या वो लीला जो दूसरे लोक में पद्म के साथ है? या किसी और लोक की कोई और लीला?”
माँ ने मुस्कुराकर कहा, “तुम सब कुछ हो। और कुछ नहीं हो। एक चेतना है, जो हर लोक में अलग रूप में दिखती है। तुम वो चेतना हो। बाक़ी सब रूप हैं।”
वापसी
माँ और लीला धीरे-धीरे वापस लौटीं।
दोनों लोक छोड़ती हुईं। पहले वसिष्ठ-अरुंधती का लोक छूटा। फिर पद्म और दूसरी लीला का लोक छूटा। फिर वो अपने महल में थीं।
लीला ने आँखें खोलीं। राजा के शव के सामने बैठी थी। दीप अभी जल रहे थे। मगर भीतर वो वो लीला नहीं थी जो कुछ घंटों पहले बैठी थी।
उसने अब रोना छोड़ दिया था। उसने जान लिया था कि न जन्म असली है, न मृत्यु। दोनों चेतना की लीलाएँ हैं।
उसने राजा के शव को देखा। फिर मुस्कुराई।
“पद्म, तुम कहीं नहीं गए। तुम कहीं और कई जीवन एक साथ जी रहे हो। मैं भी कहीं और कई जीवन जी रही हूँ।
“मगर असली में, हम दोनों एक ही चेतना हैं।”
उसने दीप जलाए रखे। महल के बाहर लोगों को बुलाया। उन्होंने राजा का अंतिम संस्कार किया।
लीला ने राज्य चलाया कुछ साल। फिर एक दिन वो भी अपनी देह छोड़कर चली गई। शांति से। डर नहीं था।
क्योंकि उसे पता था – मरना भी एक रूप का बदलना है। चेतना कहीं नहीं जाती।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राजकुमार, तुम भी यदि लीला की तरह देख सको, तो जन्म-मरण का भय कहाँ रहेगा? तुम्हारे जीवन के भीतर अनगिनत जीवन हैं। हर एक से तुम जुड़े हो। हर एक तुम हो। और कोई नहीं भी हो।”
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