लीला और पद्म

कथा · 01

लीला और पद्म: एक राजा की मृत्यु, एक रानी की यात्रा

रानी ने एक वर माँगा, कि पति अगर मरे तो कहीं दूर न जाए। उसी वर ने उसे संसार के भीतर एक संसार दिखाया, और उस संसार के भीतर एक और, और एक और।

सरयू पर अब चाँद चढ़ रहा था। राम और वसिष्ठ कुछ देर पहले ही लौटे थे, हाथ में एक दिया जिसकी लौ हवा में हिलती थी, पर बुझती नहीं थी। पीछे कहीं से एक टिड्डे की लम्बी पुकार आ रही थी, और दूर एक बूढ़ी अपने पोते को घर बुला रही थी।

राम ने पानी की ओर देखा, फिर वसिष्ठ की ओर मुड़े – “गुरुदेव, जब हम किसी से बहुत प्रेम करते हैं, तो क्या हम सच में डरते भी हैं? मेरा मतलब है, क्या प्रेम के भीतर एक डर हमेशा बैठा रहता है, कि कहीं वो जो हमें इतना प्रिय है, वो कभी न रहे?”

वसिष्ठ की आँखों में एक गहराई उतरी, जैसे मुस्कुराहट के नीचे कोई बड़ी चीज़ ठहरी हो। उन्होंने पूछा – “राम, यह प्रश्न तुम्हारे भीतर कहाँ से आया है?”

“आज दोपहर माता कौसल्या मुझे देखकर बिना कारण रो दीं। मैंने पूछा क्यों, तो उन्होंने कहा, बस, मैं तुम्हें देख रही हूँ। फिर बोलीं, मुझे कभी-कभी डर लगता है कि तुम अयोध्या से कहीं दूर चले जाओगे। मैंने हँसकर कहा, माँ, मैं कहाँ जाऊँगा। पर उनकी आँखों में जो डर था, वो जाने का डर नहीं था, उससे बड़ा था। मैं उसे अब तक भीतर रखे बैठा हूँ।”

On the moonlit bank of the Sarayu, the elder sage Vasistha and a young Rama sit by a small flickering oil lamp, the river silvered behind them and the distant Ayodhya skyline beyond, the sage beginning to tell a tale; rich painterly classical Indian color illustration, dignified, no text or watermark

वसिष्ठ ने अपनी हथेली दिए की लौ के पास रखी, और बोले – “राम, जो स्त्री किसी से प्रेम करती है, उसके भीतर एक रात ज़रूर आती है जब वो अपने प्रेम को सोता हुआ देखती है और उसे लगता है कि अगर यह साँस रुक जाए तो मैं भी रुक जाऊँगी। यह डर असली है। और इस डर से कैसे पार हुआ जाए, यह एक रानी ने सीखा था। उसका नाम लीला था, और उसके पति का नाम पद्म।”

राम बैठ गए। पानी का बहाव धीमा था।

वसिष्ठ ने कहा – “लीला की कथा सबसे विचित्र कथाओं में से है, राम। यह सिर्फ़ एक रानी की प्रेम-कथा नहीं है, यह संसार के भीतर संसार की कथा है, और उस प्रश्न की कथा है जिसका कोई एक उत्तर नहीं। तुम धीरज से सुनना। बहुत बातें ऐसी आएँगी जो पहली बार में बेल नहीं खाएँगी, पर अन्त में सब अपनी जगह बैठ जाएँगी।”

“मैं सुनूँगा,” राम ने कहा।

पद्म और लीला

पद्म एक राजा थे। उनके राज्य का नाम कथाओं में कई बार आता है, पर हम उसका नाम नहीं लेंगे। यह नाम लेने की कथा नहीं है, यह उस राज्य की कथा है जो किसी राज्य में बँधा नहीं था।

पद्म लम्बे थे, चौड़े कन्धों के, और उनकी काली दाढ़ी में कनपटी से नीचे एक पतली सफ़ेद रेखा थी जो उन्हें अधेड़ से थोड़ा छोटा दिखाती थी। उनकी आँखें भूरी और गहरी थीं, और उनकी मुस्कान धीरे से आती थी, जैसे वो हर मुस्कान को थोड़ी देर सोचकर भेजते हों। जब वो किसी की बात सुनते, तो दाहिने हाथ की उँगलियाँ अपनी कलाई पर रखी सोने की कड़ी पर हलकी थपकी देते रहते, और यह उनके सोचने का स्वर था।

लीला रानी थीं, पर बहुत बरस पहले वो रानी नहीं, दक्षिण के एक छोटे देश की राजकुमारी थीं। जब पद्म का प्रस्ताव आया था, तो उन्होंने तीन रात सोचा और तीन दिन कुछ नहीं खाया था। उनके मन में पद्म नहीं थे, कोई भी पुरुष नहीं था। उन्हें राज-काज से डर लगता था, राजमहलों से डर लगता था, और सबसे ज़्यादा इस बात से कि एक दिन उन्हें किसी की पत्नी कहा जाएगा और वो जान नहीं पाएँगी कि अपना मन उन्होंने किसको दिया है।

On a temple verandah at dusk King Padma, broad-shouldered with a turban and a thin white streak in his black beard, sits a respectful distance from the young princess Lila in a soft sari, speaking gently with his hand raised in courtesy; jasmine vines and a stone column frame them; rich painterly classical Indian color illustration, dignified, no text or watermark

पर जब पद्म से उनकी पहली मुलाक़ात हुई, तो उन्होंने अपने डर को धीरे-धीरे जाते देखा। वो किसी मन्दिर के बरामदे पर अकेली बैठी थीं, और पद्म आकर बैठने से पहले अनुमति माँगी थी। यह छोटी सी बात लीला जीवन भर भूलीं नहीं। पद्म बैठ गए, और कुछ देर मौन के बाद बोले – “मैं आपसे सिर्फ़ यह कहने आया हूँ कि अगर आप मेरे साथ नहीं चलना चाहतीं, तो भी मैं आपको अपना मित्र मानूँगा। मेरा प्रस्ताव बँधन नहीं है।”

लीला ने उन्हें देखा, और एक ऐसी हँसी हँसीं जिसमें राहत थी। “मुझे चलना है,” उन्होंने कहा।

इस कथा के शुरू होते-होते उनकी शादी के पन्द्रह बरस हो चुके थे। उनकी कोई संतान नहीं थी, और यह उनके बीच एक चुप मौन था जिसका वो दोनों अब इतना अभ्यस्त थे कि उसकी पीड़ा को भीतर कहीं रख चुके थे, और वो पीड़ा अब उनके प्रेम का एक छिपा हुआ रंग बन चुकी थी, बिना नाम के।

पन्द्रह बरस में उन्होंने एक-दूसरे की हर आदत सीख ली थी। पद्म जब कोई कठिन निर्णय ले रहे होते, तो रात को सोते समय अपने तकिए को दो बार पलटते, और लीला जब बहुत ख़ुश होतीं, तो अपनी एक चूड़ी को घुमातीं, जो थोड़ी ढीली थी। पद्म को पता था कि लीला कौन सा फूल पसन्द करती हैं, और लीला को पता था कि पद्म रात के आख़िरी पहर में पानी पीते हैं। लीला यह भी जानती थीं कि पद्म जब किसी मन्त्री की बात सुनकर ख़ामोश रहते, तो वो असहमत हैं। शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।

उनका प्रेम बहुत बातों का नहीं था, वो ज़्यादातर चुप रहते थे। पर उस चुप्पी में एक ऐसा घर बन चुका था जिसमें दोनों आराम से बैठते थे।


लीला के पास अपनी एक चूड़ी थी जो उन्हें माँ ने शादी के दिन दी थी। वो पुरानी और थोड़ी ढीली थी, और कलाई पर हिलती रहती थी। पद्म ने एक बार पूछा था, “आप इसे क्यों रखी हैं? यह तो ढीली है। नई बनवा दूँ?”

लीला ने कहा – “नहीं। यह माँ ने दी है। ढीली है, यही इसका सौन्दर्य है। जब मैं अपना हाथ हिलाती हूँ, तो यह बजती है, और मुझे माँ की याद आती है।”

उसके बाद कई बार पद्म ने लीला के पास उस चूड़ी की हलकी आवाज़ सुनी, और हर बार उन्हें यह बात याद आती कि उनकी पत्नी अपने भीतर अपनी माँ को कैसे रखे हुए हैं।

आधी रात

एक रात लीला सो नहीं पा रही थीं।

रात आधी से ज़्यादा बीत चुकी थी। पद्म पास सीधे सोए थे, बायाँ हाथ अपनी छाती पर रखे, और उनकी साँस लम्बी और बराबर थी। बाहर एक पुराने कनेर के पेड़ की डाली खिड़की पर बहुत हलके सुर में रगड़ती थी, जैसे कोई आहिस्ता बजती हुई चीज़ हो।

लीला ने उन्हें बहुत देर तक देखा।

चन्द्रमा आधा था, और उसका प्रकाश खिड़की से चूकर पद्म के माथे पर पड़ता था। उम्र की वो पतली रेखा जो उनके माथे के बीच थी, चाँद की रोशनी में और साफ़ दिख रही थी। उनके होंठ हलके खुले थे, जैसे वो सपने में कुछ कहना चाहते हों पर शब्द नहीं आ रहे, और उनकी छाती धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रही थी।

और अचानक लीला के भीतर एक खाली सा डर उठा।

यह डर कहीं से नहीं आया था। न कोई दुःस्वप्न था, न कोई बीमारी का संकेत, न कोई बाहर की आहट। यह डर बस अपनी जगह बना, जैसे एक ठंड हो जो सीने के भीतर कहीं जम जाए।

अगर कल पद्म की साँस रुक जाए?

लीला ने सिर हिलाकर इस सोच को झटकना चाहा। यह बेहूदा सोच थी। पर सोच गई नहीं।

अगर कल नहीं, तो परसों? पाँच बरस बाद? दस बरस बाद?

लीला ने अपनी हथेली पद्म की छाती के पास रखी, बिना छुए। उनकी साँस की हलकी हवा हथेली पर पड़ी, और वो गरम थी।

In a moonlit royal bedchamber Queen Lila in bridal jewelry sits up in bed, her hand hovering above the chest of the sleeping King Padma without touching him, her face shadowed with sudden dread; a half-moon glows through an arched window and a small diya burns at the bedside; rich painterly classical Indian color illustration, dignified, no text or watermark

एक दिन यह गरम हवा नहीं होगी। एक दिन यह छाती ऊपर-नीचे नहीं होगी। एक दिन यह सोता हुआ चेहरा ठंडा होगा।

लीला उठ बैठीं। उनका हृदय बहुत तेज़ चल रहा था। उन्होंने अपने हाथ छाती पर रखे और एक लम्बी साँस ली, पर हृदय शान्त नहीं हुआ।

खिड़की के बाहर कनेर की डाली अब भी रगड़ रही थी।

लीला ने सोचा, यह तो हर किसी के साथ होता है। हर पत्नी, हर पति, हर पुत्र, हर माता। हर प्रेम का अन्त है। यही सच है।

पर यह सोच उनके भीतर बैठी नहीं। उनके देह को यह सच पसन्द नहीं था, और उनकी हड्डियाँ इस सच से मना कर रही थीं।

उन्होंने पद्म की ओर देखा। वो वैसे ही सो रहे थे, साँस ले रहे थे, जीवित थे।

लीला ने अपने जूड़े को छुआ, और एक चूड़ी हलके से बजी, अपनी माँ वाली। रात बहुत लम्बी थी।

लीला ने अपने भीतर देखा। उन्हें पता था कि यह साधारण डर नहीं है। यह वो डर है जिसका सामना हर एक अपने जीवन में कभी न कभी करता है, पर सब उससे भागते हैं, उसे अनदेखा करते हैं, और ख़ुद को बचाने के लिए कोई न कोई काम पकड़ लेते हैं।

लीला ने मन में ठाना, मैं नहीं भागूँगी।

जब सुबह हुई, तो लीला एक निर्णय कर चुकी थीं। पर वो निर्णय उन्होंने किसी को नहीं बताया, क्योंकि वो किसी को बताने वाली बात नहीं थी।


पद्म ने कुछ भाँप लिया था। उन्होंने तीन दिन बाद पूछा – “लीला, आप ठीक हैं?”

“हाँ।”

“मुझे लग रहा है कुछ है। कहो।”

लीला हलके से हँसीं और बोलीं – “महाराज, स्त्रियों के कुछ डर ऐसे होते हैं जिनका नाम नहीं होता। आप अपना राजकाज देखिए। मेरे डर मैं अपने आप सम्हाल लूँगी।”

पद्म की आँखों में कुछ ऐसा था जो लीला ने पहले नहीं देखा था। उन्होंने कहा – “अगर आप कहना चाहें, तो मैं सुनूँगा।”

“पता है मुझे।”

“पर कह नहीं रही हैं।”

“नहीं।”

पद्म ने और नहीं पूछा।

यह उनके प्रेम का एक नियम था, कि वो एक-दूसरे को जगह देते थे। यह जगह कभी-कभी एकान्त बन जाती थी, पर वो दोनों जानते थे कि बिना इस जगह के यह प्रेम पुराना नहीं रह सकता था।

सरस्वती की प्रतीक्षा

लीला ने उसी रात से तप शुरू कर दिया था।

उन्होंने सरस्वती को चुना, ज्ञान की देवी, जो सिर्फ़ बोलने की नहीं, बल्कि उस बोलने की देवी हैं जो भीतर हमेशा चल रहा होता है, उस मौन का स्रोत जिसमें से शब्द आते हैं। लीला ने सरस्वती को क्यों चुना, यह उन्होंने ख़ुद नहीं जाना। बस उन्हें लगा कि अगर कोई इस डर का जवाब दे सकती है, तो वो विष्णु नहीं, शिव नहीं, ब्रह्मा नहीं, बल्कि वो हैं जो वाणी और मौन के बीच की देहरी पर रहती हैं।

उन्होंने राजमहल में अपने लिए एक कक्ष चुना जो पीछे के बगीचे की तरफ़ खुलता था। उसमें बस एक चटाई थी, पानी का एक मटका, और एक आसन-चौकी। एक खिड़की थी जिससे चाँद की रोशनी रात भर अन्दर आती रहती थी।

रात होते ही वो कक्ष में जातीं, बैठतीं, आँखें बन्द करतीं, और मन्त्र शुरू करतीं।


पहले दस रातें मुश्किल थीं।

मन भागता था, तरह-तरह की बातें आती थीं। दिन भर के काम याद आते, पद्म याद आते, उनकी आँखें याद आतीं, और वो पुराने दिन याद आते जब लीला के माता-पिता जीवित थे और उन्होंने एक बार उन्हें झूले पर बिठाया था।

लीला ने मन को बार-बार लौटाया, पर मन छोटे बच्चे की तरह नटखट था। हर बार उसी जगह लौटाने पर वो दूसरी जगह भाग जाता।

एक रात उन्होंने मन से कहा – “भाग। मैं देखूँगी।”

और उन्होंने मन को छोड़ दिया, भागना नहीं रोका, बस देखती रहीं। मन भागा, बहुत भागा। फिर एक समय आया जब मन थक गया।


बीसवीं रात उनके भीतर कुछ बदला।

मन्त्र पहले बाहर से आता था, अब भीतर से आने लगा। उन्होंने यह सीखा नहीं, यह उनके भीतर अपने आप ठहर गया। मन्त्र अब एक स्वर था जो शरीर के भीतर बजता था।

जब वो दिन में राज-काज करतीं, तब भी कहीं भीतर एक हलका स्वर बजता रहता, मन्त्री से बात करते समय भी, प्रजा को सुनते समय भी, पद्म के पास बैठते समय भी।

पद्म ने एक बार पूछा था – “लीला, आप कुछ अलग सी लग रही हैं।”

लीला बोलीं – “महाराज, बस उम्र। हम सब बदलते हैं।” पर पद्म की आँखों में जिज्ञासा थी।

पचासवीं रात उनके भीतर एक प्रकाश का अनुभव हुआ।

आँखें बन्द थीं, फिर भी एक भीतर का प्रकाश था, सफ़ेद और हलका, जो धीरे-धीरे फैलता था। पहले वो उनके सीने के बीच एक छोटे बिन्दु से शुरू हुआ, फिर ऊपर गले तक बढ़ा, फिर माथे तक, फिर पूरे शरीर में।

लीला ने उसे न रोका, न पकड़ने की कोशिश की। वो आता, ठहरता, चला जाता था।

बाहर से उनका देह स्थिर था, भीतर एक उत्सव। पर उत्सव शान्त था, नाटक का नहीं।


अस्सीवीं रात वो प्रकाश रुका।

लीला कक्ष में आँखें बन्द किए बैठी थीं, और भीतर वो प्रकाश इतना भर गया था कि अब वो शरीर के बाहर भी फैल रहा था। कक्ष की हवा बदल गई थी।


और सौंवी रात किसी ने उनके कक्ष में पुकारा – “लीला।”

लीला ने आँखें खोलीं। कक्ष में एक स्त्री खड़ी थीं।

In a bare moonlit meditation chamber the goddess Saraswati stands in a plain white sari with a chandra-mani jewel in her hair and a vina resting on her shoulder, her face luminous and shifting, her eyes clear and bottomless; Lila kneels before her with folded hands; rich painterly classical Indian color illustration, dignified, no text or watermark

वो साधारण थीं। बहुत सादी सफ़ेद साड़ी, बालों में एक चन्द्र-मणि का छोटा हार, और हाथ में एक वीणा जो उनके कन्धे पर टिकी थी। उनका चेहरा ऐसा था कि लीला उसे देखकर भी देख नहीं पा रही थीं, क्योंकि वो हर पल बदलता था, कभी एक बूढ़ी स्त्री का, कभी एक बच्ची का, कभी एक माँ का, कभी एक राजकुमारी का। पर हर रूप में आँखें वही थीं, साफ़, बिना तल वाली।

“देवी,” लीला ने काँपती आवाज़ में कहा।

सरस्वती हँसीं, और वो हँसी ऐसी थी जिसे सुनकर कान नहीं, छाती सुनती थी। उन्होंने कहा – “पुत्री, तुमने मुझे सौ रातों बुलाया है। मैं आ गई। बोलो।”


लीला अपनी जगह से उठीं, फिर बैठीं, फिर उठीं, और अपने हाथ जोड़ लिए।

“देवी, मुझे एक वर चाहिए।”

“कौन सा?”

Lila kneels with folded hands beseeching the seated goddess Saraswati who holds her vina and a lotus, a tall oil lamp burning between them in the small chamber; the moon visible through the window; the moment of asking the fateful boon; rich painterly classical Indian color illustration, dignified, no text or watermark

लीला ने एक पल साँस रोककर कहा – “पद्म मेरे पति हैं। मैं उन्हें बहुत प्रेम करती हूँ। मुझे यह नहीं चाहिए कि वो अमर हों, यह संभव नहीं, मुझे पता है। पर मुझे यह चाहिए कि जब वो मुझसे पहले जाएँ, तो उनकी आत्मा मेरे इस कक्ष से न जाए। यहीं रहे, मेरे पास।”

सरस्वती ने उन्हें बहुत देर तक देखा, फिर पूछा – “पुत्री, तुम जानती हो यह वर माँगना क्या होता है?”

“नहीं।”

“यह वर माँगना तुम्हारे लिए नहीं, उनके लिए जोखिम है। आत्मा जब देह छोड़ती है, तो उसके अपने रास्ते होते हैं। तुम उसे यहाँ रोकोगी, तो वो यहीं रहेगी, पर देह के बिना। बिना देह की आत्मा का अपना संसार होता है, जिसमें वो अपनी कथा बुनती है। तुम उस कथा को नहीं देख पाओगी, सिवाय जब तुम मेरे साथ उसमें चलो।”

लीला ने कहा – “मुझे यह वर चाहिए।”

“पुत्री।”

“देवी।”

सरस्वती ने आगे कहा – “एक बात और। यह वर सिर्फ़ तुम्हें मिलेगा, ऐसा नहीं है। तुमसे पहले भी एक स्त्री ने यही वर माँगा था। उसका नाम मैं तुम्हें बाद में बताऊँगी। उस स्त्री का पति भी जब गया, तो उसका जीव यहीं रुका, और तुम्हारे पति का जीव भी यहीं रुकेगा। पर तुम्हें यह जानना होगा कि तुम पहली नहीं हो। यह कोई असाधारण वर नहीं है, यह उन्हीं को मिलता है जो माँगते हैं।”

लीला कुछ देर मौन रहीं, फिर बोलीं – “देवी, अगर पहले किसी ने माँगा, तो उसका क्या हुआ?”

सरस्वती हँसीं और बोलीं – “यह बात आगे चलकर बताऊँगी। अभी एक बात कह दूँ। पुत्री, यह वर ले तो लो, पर ध्यान रखना। आत्मा को रोकना संसार में अपने नियमों के साथ आता है। तुम्हें बहुत कुछ देखना होगा जो साधारण आँखों से नहीं दिखता। तुम तैयार हो?”

“हाँ।”

सरस्वती ने अपनी वीणा से एक तार छेड़ा, और कक्ष में एक स्वर भर गया। उन्होंने कहा – “तो ले लो वर।”

लीला ने सिर झुकाया, और जब उन्होंने सिर उठाया, सरस्वती नहीं थीं।


लीला ने पद्म को यह बात कभी नहीं बताई।

उन्होंने अपने कक्ष को वैसा ही रखा। वो उसमें रोज़ रात जातीं, थोड़ी देर बैठतीं, फिर लौट आतीं। पद्म ने एक बार पूछा था, “लीला, यह कक्ष क्या है?” लीला ने कहा था, “मेरा अपना कक्ष है। हर रानी का एक अपना कक्ष होता है।” पद्म ने और नहीं पूछा।

बरस गुज़रते रहे।

लीला का डर पूरा नहीं गया, पर अब वो छोटा था। उसकी जगह भीतर एक चुप शान्ति आ गई थी। पद्म जब सोते, तो वो उन्हें वैसे ही देखतीं, पर अब वो जानती थीं कि जो होगा, उसका इन्तज़ाम वो कर चुकी हैं। यह जानकारी उनके भीतर बैठी रहती थी, बिना नाम के।

संदेश

युद्ध की ख़बर अचानक नहीं आई थी।

सीमा पर बहुत महीनों से एक झगड़ा था। पद्म ने पहले अपने सेनापति को भेजा, फिर अपने मन्त्री को, फिर ख़ुद जाने की बात उठी। मन्त्री ने मना किया, सेनापति ने भी। लीला ने पूछा था, “महाराज, आपका जाना ज़रूरी है?” पद्म ने कहा था, “हाँ। यह छोटी बात नहीं है। अगर मैं ख़ुद नहीं गया, तो यह बढ़ जाएगा।”

एक रात पहले लीला ने पद्म की पगड़ी ख़ुद बाँधी थी, और उनकी उँगलियाँ कई बार रुकीं। पद्म ने उन्हें कुछ देर देखकर कहा – “लीला, मैं लौटूँगा।”

“मुझे पता है।”

पर लीला की आवाज़ में कुछ था जो पद्म ने पहले नहीं सुना था। उन्होंने लीला का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा – “आप पन्द्रह बरस से मेरी पत्नी हैं।”

“जी।”

The night before war, Lila in royal attire holds King Padma's hand to her cheek as he stands in dhoti and shoulder-cloth giving a tender farewell; through the arched palace gateway behind them cavalry, horses and banners gather for the march; rich painterly classical Indian color illustration, dignified, no text or watermark

“मैंने आपसे एक बार भी यह नहीं कहा कि आप मेरे लिए क्या हैं। आज कहता हूँ। आप मेरे लिए वो हैं जिसके बिना मैं राज्य भी नहीं चला सकता था, और जिसके बिना यह जीवन भी नहीं हो सकता था। यह बात मैंने इसलिए कह दी आज कि कल मैं युद्ध पर जा रहा हूँ, और हर युद्ध के स्वभाव में कुछ कह नहीं रखा होता।”

लीला ने पद्म का हाथ अपने गाल से लगाया, कुछ नहीं बोलीं।

“लौटूँगा,” पद्म ने फिर कहा।

“हाँ।”

पद्म चले गए।


पहला सप्ताह कुछ नहीं था। दूसरे में एक संदेश आया कि सब ठीक है, सीमा पर लड़ाई चल रही है, पर हम जीत रहे हैं। तीसरे में फिर संदेश आया कि थोड़ा ठहराव है। चौथे में संदेश नहीं आया।

पाँचवें सप्ताह की एक दोपहर लीला अपने कक्ष में अपनी आसन-चौकी पर बैठी थीं। बाहर बागीचे में एक माली पानी दे रहा था, उसकी मटकी से पानी गिरने की आवाज़ नियमित थी। दूर एक कौआ काँव-काँव कर रहा था, और हवा में बेला की महक थी।

तभी बाहर दौड़ते हुए पैरों की आवाज़ हुई।

लीला ने आँखें खोलीं।

दरवाज़े पर एक दूत खड़ा था। उसके चेहरे पर धूल थी, उसकी पगड़ी आधी खुली थी, और उसकी साँस ऊपर-नीचे हो रही थी। उसने लीला को देखा, और उसकी आँखें झुक गईं।

लीला उठीं।

दूत ने सिर झुकाए हुए ही कहा – “महारानी।”

लीला ने उसे रोका नहीं। उन्होंने अपना हाथ हलका सा हिलाया, जैसे कह रही हों, बोलो।

“महारानी, महाराज…”

दूत ने यहाँ रुकना चाहा, पर रुकने का सहारा नहीं था।

“महारानी, महाराज नहीं रहे।”

लीला बिल्कुल नहीं हिलीं।

बाहर बागीचे में माली की मटकी से पानी अब भी गिर रहा था, कौआ अब भी काँव-काँव कर रहा था, और हवा में बेला की महक अब भी थी।

लीला ने पूछा – “उनका शव?”

“महारानी, हम ले आए हैं। बाहर है।”

“उन्हें मेरे कक्ष में लाओ। इस वाले में। अभी।”

दूत सिर झुकाकर चला गया।

लीला ने अपने हाथ अपनी गोद में रखे, फिर खोले, फिर मिलाए। रोई नहीं।

बन्द कमरा

पद्म का शव चटाई पर रखा गया था।

In Lila's chamber the shrouded body of King Padma lies on a mat, his face uncovered with a small wound above the brow, eyes closed and lips slightly parted; a single corner diya burns; the queen kneels nearby in grief without tears; rich painterly classical Indian color illustration, dignified, no text or watermark

सेना के सबसे विश्वासी सैनिकों ने उन्हें साफ़ कपड़ों में लपेटा था, पर चेहरा बाहर था। आँखें बन्द थीं, ओंठ हलके खुले, जैसे वो अपनी आख़िरी साँस लेने को थे और तभी वो साँस अधूरी रह गई। माथे पर आँख के ऊपर एक छोटा ज़ख़्म था, जिससे अब ख़ून नहीं बह रहा था, पर उसका निशान दिख रहा था।

लीला ने मन्त्री, सेनापति, दूत, सबको बाहर भेज दिया। उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, “मुझे एक रात चाहिए, अकेले। किसी को भीतर मत आने देना।”

मन्त्री ने पूछा था, “महारानी, अंतिम संस्कार?”

“कल। अभी मुझे एक रात चाहिए।”

“महारानी, यह…”

“कल।”

लीला की आवाज़ में कुछ ऐसा था कि मन्त्री सिर झुकाकर चले गए। दरवाज़ा बन्द हुआ।


लीला ने पद्म को देखा।

वो कक्ष में अकेली थीं। बाहर अब रात थी। एक दिया कोने में जल रहा था, उसकी लौ हवा में हलकी हिलती थी, पर इतनी नहीं कि बुझ जाए।

लीला ने दरवाज़े पर अन्दर से एक छड़ी लगा दी, फिर पद्म के पास आकर घुटनों के बल बैठीं।

उन्होंने पद्म का हाथ अपने हाथ में लिया। हाथ ठंडा था।


लीला ने अपनी आँखें बन्द कीं।

बहुत देर तक उन्होंने कुछ नहीं किया, बस वो हाथ अपने हाथ में रखे रहीं। उनकी अपनी साँस धीमी हो गई, और हृदय की धड़कन भी।

बाहर बहुत दूर से एक पंछी पुकारा। कक्ष की दीवार पर एक छिपकली एक कीड़े की ओर बढ़ी। बाहर एक चौकीदार ने अपनी छड़ी ज़मीन पर थोड़ी ज़ोर से मारी, शायद किसी पहरेदार को कोई संकेत, और उसकी आवाज़ बहुत दूर से आकर भी कक्ष में स्पष्ट सुनाई दी।

लीला यह नहीं देख रही थीं।

उन्होंने अपने भीतर एक बहुत पुरानी जगह छुई, वो जगह जहाँ सरस्वती मिली थीं। बहुत बरस पहले की वो सौंवी रात, सरस्वती का प्रकट होना, सरस्वती की वो हँसी जो कान नहीं छाती सुनती थी।

लीला ने उस रात की हवा को अपने भीतर पूरी तरह लाया। उन्होंने अपनी साँस को उसी रात की साँस से जोड़ दिया। उनका देह अब कक्ष में था, पर उनकी चेतना उस रात में थी, बहुत बरस पीछे।

फिर उन्होंने एक बात और की। उन्होंने उस रात की चेतना को अब की चेतना से मिलाया, और दोनों एक हो गईं। बहुत बरस की दूरी कम हुई, और समय का परदा हलका हुआ।

पद्म का हाथ अब भी ठंडा था, पर लीला अब कहीं और थीं।

“देवी,” उन्होंने धीरे से कहा।

कक्ष में कुछ नहीं हुआ।

“देवी।”

दिए की लौ कुछ हिली।

“देवी।”


और कक्ष की हवा बदल गई।

यह दिखाई नहीं दे रहा था, सुनाई नहीं दे रहा था, पर महसूस हो रहा था। हवा का वज़न बदल गया, दीवारों का रंग बदल गया, और दीये की लौ अब हिल नहीं रही थी, वो अब एक स्थिर सफ़ेद रोशनी में बदल चुकी थी।

सरस्वती कक्ष में थीं।


लीला ने आँखें खोलीं।

सरस्वती चटाई के दूसरी ओर बैठी थीं। वैसी ही सफ़ेद साड़ी, वैसा ही चन्द्र-मणि का हार, वीणा पास, बायाँ हाथ चटाई पर। उनका चेहरा अब बदल नहीं रहा था, एक स्थिर स्त्री-रूप था, जिसकी उम्र पता नहीं चलती थी, पर जिसमें बहुत पुरानापन था।

“पुत्री।”

“देवी।”

“आज?”

“आज।”

सरस्वती ने पद्म को देखकर कहा – “वो यहीं हैं।”

लीला ने पूछा – “मैं उन्हें कैसे देखूँ?”

सरस्वती हलके से मुस्कुराईं और बोलीं – “पुत्री, इसी के लिए तो मैं आई हूँ।”


लीला ने एक प्रश्न पूछा – “देवी, मुझे एक बात नहीं समझ आ रही। पद्म यहाँ हैं, पर वो हैं तो उनका देह क्यों ठंडा है?”

सरस्वती ने पद्म के माथे पर हाथ रखा, अपने माथे पर भी, और बोलीं – “पुत्री, पद्म की आत्मा यहीं है, पर देह छूट गया है। आत्मा अब इस कक्ष में है, पर उसने अपना नया रूप शुरू कर लिया है। वो अब चित्र-लोक में हैं। हम वहाँ जाएँगे, तुम्हें देखना है।”


“और इस देह का?”

“यह यहीं रहेगा। तुम्हारी प्रतीक्षा करेगा। हम लौटेंगे तो यह वैसा ही मिलेगा।”

लीला कुछ देर मौन रहीं, फिर बोलीं – “देवी, चलिए।”

चित्र-लोक

सरस्वती ने अपनी हथेली बढ़ाई – “लो।”

लीला ने हथेली पकड़ी, और कक्ष चला गया।


लीला को पहले लगा कि वो गिर रही हैं, फिर लगा कि वो उठ रही हैं, फिर पता चला कि वो न गिर रही हैं, न उठ रही हैं, बल्कि कहीं और हैं।

पर वो “कहीं और” एकाएक नहीं आया। वो धीरे-धीरे आया, परत दर परत, जैसे कोई बहुत लम्बा परदा एक तरफ़ खिंच रहा हो।

पहले प्रकाश बदला।

Lila and the goddess Saraswati stand at the threshold of the self-luminous Chitra-loka, where trees, ground and air each glow with their own inner light in a nameless color, a vast walled city shimmering beyond; rich painterly classical Indian color illustration, dignified, no text or watermark

यह कक्ष का दिया नहीं था, सूरज की रोशनी नहीं थी, यह कुछ और था, कोई ऐसा प्रकाश जिसमें ख़ुद की रोशनी थी, जो किसी स्रोत से नहीं, बल्कि चीज़ों के भीतर से आ रहा था। पेड़ अपनी रोशनी देते थे, ज़मीन अपनी, हवा अपनी।

और प्रकाश का रंग भी अलग था, पहले सूरज की पीली रोशनी जैसा, फिर थोड़ा हलका, फिर लगभग बिना रंग के, और फिर एक ऐसा रंग जो लीला ने पहले नहीं देखा था, एक रंग जिसका कोई नाम नहीं था।

फिर हवा बदली।

उसका वज़न कुछ हलका था, और साँस लेने पर वो भीतर तक अलग तरह से जाती थी, जैसे साँस को भीतर खींचने के लिए कोई ज़ोर न लगाना पड़ रहा हो। हवा अपने आप भीतर आती थी, अपने आप बाहर जाती थी। लीला ने एक पल अपनी साँस रोकने की कोशिश की, फिर भी हवा हलकी अन्दर-बाहर हो रही थी, उनकी इच्छा से अलग।

हवा में किसी अनजान फूल की बहुत हलकी महक थी जो लीला ने पहले नहीं सूँघी थी। यह महक चमेली जैसी नहीं थी, बेला जैसी नहीं थी, गुलाब जैसी नहीं थी। यह कुछ और थी, कुछ ऐसी जो शायद यहाँ के अलावा कहीं नहीं उगती।

फिर लीला के मुँह में बिना खाने के एक हलका मीठा स्वाद आया, पर मिठाई का नहीं, शायद हवा का स्वाद, क्योंकि यहाँ की हवा के अपने स्वाद थे।

और सबसे अलग यह था कि ध्वनियाँ एक-दूसरे पर चढ़ती नहीं थीं। हर ध्वनि अलग, साफ़, अपनी जगह पर सुनाई देती थी। दूर कोई पंछी पुकार रहा था, और उसकी पुकार उतनी ही साफ़ थी जितनी पास के पत्ते की रगड़। यहाँ कुछ नहीं दूर था, हर चीज़ अपनी जगह पर पास थी।

लीला ने अपने नीचे की ज़मीन देखी। ज़मीन ठोस थी, पर अलग तरह की, न रेत, न मिट्टी, कुछ और। उन्होंने अपने पाँव को ज़मीन पर थोड़ा दबाया, तो ज़मीन ने हलकी प्रतिक्रिया दी, जैसे यह भी जानती हो कि वो कौन हैं।

लीला ने अपने देह को छुआ, पर देह नहीं था। मतलब, देह की एक छाया थी, पर वज़न नहीं, ठंडक नहीं, गरमी नहीं।

“देवी, मेरा देह कहाँ है?”

“पुत्री, तुम्हारा देह उस कक्ष में है। यहाँ तुम्हारी चेतना है, जिसने एक छाया-देह ले ली है। तुम्हें यह छाया-देह असली लगेगा, पर वो असली नहीं, यह तुम्हारी चेतना का रूप है।”



लीला और सरस्वती एक रास्ते पर खड़ी थीं। पीछे जंगल था, आगे एक नगर।

नगर बहुत बड़ा था। ऊँची दीवारें, उन पर पहरेदार, दीवारों के पीछे महल, महल के पीछे और महल। नगर इतना फैला था कि उसकी सीमाएँ दूर पहाड़ों के पीछे जाती थीं।

“यह कहाँ है, देवी?” लीला ने पूछा।

“यह चित्र-लोक है, पुत्री। यह वो लोक है जहाँ पद्म की आत्मा अपनी अगली कथा रच रही है।”

लीला ने नगर को देखकर पूछा – “वो यहाँ हैं?”

“हाँ।”

“मुझे ले चलिए।”


वो दोनों चलीं।

नगर में बहुत लोग थे। बाज़ार थे, उनमें दुकानें खुली थीं। एक स्त्री अपने बच्चे को कन्धे पर लिए कुछ बेच रही थी, एक बूढ़ा फूल बेच रहा था, एक नाई अपनी छुरी पर पानी डाल रहा था, और एक छोटा कुत्ता एक दुकान के बाहर सो रहा था।

कोई भी लीला और सरस्वती को नहीं देख रहा था।

“वो हमें नहीं देख सकते?” लीला ने पूछा।

“नहीं, पुत्री। हम उनकी कथा के भीतर हैं, पर उनकी कथा का हिस्सा नहीं।”

लीला ने यह सुना, पर पूरी तरह समझा नहीं।

वो चलती रहीं, बाज़ार पार किया, फिर एक पुल, जिसके नीचे साफ़ पानी की एक नदी थी, फिर एक चौक, और फिर महल का द्वार।

“भीतर?” लीला ने पूछा।

“भीतर।”

वो दीवारों के पार ऐसे चली गईं जैसे वो दीवार थी ही नहीं, और पहरेदार वहीं खड़े रहे।

महल के एक बड़े आँगन में वो आ गईं। आँगन में फव्वारे थे, और पास एक खुली बैठक थी जिसमें मन्त्री, सेनापति और कुछ राजकाजी बैठे थे।

और सिंहासन पर एक राजा बैठा था।


लीला रुक गईं।

राजा बहुत युवा था, शायद बीस-इक्कीस बरस का। दाढ़ी अभी पूरी नहीं आई थी, होंठों के ऊपर मूँछों की पतली रेखा थी, चौड़े कन्धे, भूरी आँखें।

और उसकी आदत थी कि जब वो सुनता, तो अपने दाहिने हाथ की उँगलियाँ अपनी कलाई पर रखी सोने की कड़ी पर हलकी थपकी देता था।

लीला की साँस रुक गई। उन्होंने धीमे से कहा – “देवी, यह पद्म हैं।”

“हाँ। पर अब उनका नाम पद्म नहीं है।”

“फिर?”

“विदुरथ।”


विदुरथ किसी मन्त्री की बात सुन रहे थे, जो किसी सीमा के बारे में कह रहे थे। विदुरथ ने कुछ उत्तर दिया, और उनकी आवाज़ पद्म की तरह नहीं, थोड़ी भारी पर ऊँची और जवान थी।

लीला ने उन्हें बहुत देर तक देखा।

उनके भीतर एक अजीब मिश्रित भावना थी। एक तरफ़ पहचान, क्योंकि हर भाव, हर इशारा, हर बात पद्म की थी। दूसरी तरफ़ अजनबीपन, क्योंकि यह चेहरा अलग था, यह उम्र अलग थी, यह आवाज़ अलग थी। जैसे कोई गीत अलग वाद्य पर बजाया जाए, धुन वही, स्वर वही, पर वाद्य अलग।

“देवी, पर पद्म इतने युवा?” लीला ने पूछा।

“पुत्री, चित्र-लोक के अपने नियम हैं। यहाँ कोई बीस-इक्कीस बरस का है, पर उसी विदुरथ के भीतर सब बरस मौजूद हैं। यह चित्र-लोक की बात है, हम बाद में समझेंगे।”


तभी एक आहट हुई, और बैठक के एक दरवाज़े से एक स्त्री भीतर आईं।

लीला ने देखा, और रुक गईं।

स्त्री लीला थीं।

मतलब, वो स्त्री वही थीं जो लीला थीं, बिल्कुल। बाल वैसे ही जूड़े में बँधे, साड़ी वैसी ही पतली, जूड़े में वही चन्द्र-मणि का छोटा फूल जो लीला ने अपनी शादी के दिन से लगा रखा था, चाल वैसी ही, और कलाई पर वही एक थोड़ी ढीली चूड़ी।

लीला ने अपनी कलाई की चूड़ी देखी, फिर उस स्त्री की चूड़ी, दोनों वही।

विदुरथ ने उन्हें देखकर मुस्कुराया।

वो स्त्री विदुरथ के पास के एक छोटे आसन पर बैठीं, धीरे से कुछ कहा, और विदुरथ ने उन्हें कुछ जवाब दिया।

लीला अपनी जगह से हिल नहीं पा रही थीं। उन्होंने धीमे से पूछा – “देवी, यह कौन हैं?”

सरस्वती ने थोड़ी देर सोचकर कहा – “पुत्री, यह भी लीला हैं।”

लीला ने सरस्वती की ओर मुड़कर पूछा – “मतलब?”

In a fountained palace courtyard the youthful King Viduratha sits on a throne tapping a gold wristband, while a second Lila identical to the first, with the same loose bangle and chandra-mani hair-flower, sits beside him; the invisible Lila and Saraswati watch from aside; rich painterly classical Indian color illustration, dignified, no text or watermark

“मतलब, इस लोक में यह विदुरथ की पत्नी हैं, और उनका नाम भी लीला है, और वो तुम्हारी तरह दिखती हैं। यह इसलिए कि पद्म की चेतना ने अपनी रानी को वैसा ही रचा है जैसा उसने तुम्हें देखा था।”

लीला कुछ देर मौन रहीं, फिर बोलीं – “तो वो असली हैं या मैं असली हूँ?”

सरस्वती मुस्कुराईं और बोलीं – “पुत्री, यह प्रश्न आज नहीं। आज सिर्फ़ देखो।”


लीला ने देखा।

दूसरी लीला और विदुरथ बात कर रहे थे, छोटी-छोटी बातें। दूसरी लीला ने कुछ कहा, और विदुरथ हलके से हँसे। दूसरी लीला ने अपनी एक चूड़ी को घुमाया, वही जो थोड़ी ढीली थी।

लीला के भीतर एक छोटी, बहुत हलकी जलन उठी, और तुरन्त उसके पीछे एक भारी करुणा। उन्होंने अपने भीतर की उस झलक को देखा, फिर उसे जाने दिया।

यह कौन हैं? यह वो हैं जो मैं हूँ। यह वो हैं जो मैं पन्द्रह बरस पहले थी। यह वो हैं जो हो सकती थीं, अगर सब अलग होता।

विदुरथ बैठक से उठे, दूसरी लीला भी उठीं, और वो दोनों एक भीतर के दरवाज़े से चले गए। लीला और सरस्वती बाहर रह गईं।


“देवी, मुझे और देखना है।”

“देखेंगे, पुत्री। पर पहले एक और बात। तुम्हें पता है पद्म पहले कौन थे?”

“नहीं।”

सरस्वती ने अपनी वीणा को एक हाथ से छूकर कहा – “बैठो। यह कथा थोड़ी लम्बी है।”

ब्राह्मण और अरुन्धती

लीला सरस्वती के पास एक छोटे पत्थर पर बैठ गईं।

सरस्वती ने कहा – “पुत्री, बहुत बरस पहले एक छोटा सा गाँव था, बहुत छोटा, एक नदी के किनारे। नदी का नाम भी छोटा था, ज़्यादा बड़ी नहीं थी, बस इतनी कि एक छोटा पुल उसके पार जा सकता था। उस गाँव में मिट्टी की दीवारों की एक झोंपड़ी थी, बहुत साधारण।”

“बड़ी थी?” लीला ने पूछा।

“पुत्री, दस हाथ लम्बी, बारह हाथ चौड़ी। बस इतनी।”

“इतनी छोटी झोंपड़ी?”

“हाँ। अब सुनो।”


सरस्वती ने कहा – “उस झोंपड़ी में एक ब्राह्मण रहता था, जिसका नाम था वसिष्ठ।”

लीला ने सरस्वती को देखकर पूछा – “देवी, यह वो वसिष्ठ?”

सरस्वती बोलीं – “नहीं, पुत्री। उस ज़माने में कई वसिष्ठ हुए हैं। यह एक साधारण ब्राह्मण थे, वो वसिष्ठ नहीं जो राम के गुरु हैं, या जो सप्तर्षियों में हैं। ये एक छोटे गाँव के एक छोटे ब्राह्मण थे, जिनका नाम भी वसिष्ठ था। नाम पुनरावृत्ति में आते हैं, पुत्री। यह कथा सुनो। उनकी पत्नी का नाम था अरुन्धती।”

“अरुन्धती और वसिष्ठ झोंपड़ी में रहते थे। उनके पास कुछ नहीं था, एक गाय, एक चूल्हा, एक चटाई, और एक छोटा बगीचा जिसमें वो हलदी और अदरक उगाते थे। दोनों एक-दूसरे से उतना ही प्रेम करते थे जितना तुम और पद्म।”

लीला की आँखें भरने लगीं।


“उनकी दिनचर्या साधारण थी। सुबह वसिष्ठ नदी पर स्नान करते, यज्ञ करते, मन्त्र पढ़ते, फिर बगीचे का काम और गाय का चारा, दोपहर अरुन्धती के साथ भोजन, फिर थोड़ी देर पाठ, और शाम को दोनों घर के बाहर मिलकर बैठते और दिन की बातें करते।

“उन्हें कोई संतान नहीं थी, पर इसका दुख उन्होंने एक-दूसरे के साथ बाँट लिया था, और यह दुख उनके बीच एक हलका बँधन बन गया था।”

लीला ने कहा – “देवी, यह तो मेरी कथा है।”

सरस्वती मुस्कुराईं – “हाँ, पुत्री। यह तुम्हारी कथा है। पर पहले यह उनकी थी।

“एक दिन झोंपड़ी के सामने से एक राज-शोभा निकली।”

लीला ने सिर ऊपर उठाया।

“राजा अपनी सेना के साथ। हाथी थे, घोड़े थे, छत्र थे, झंडे थे, बहुत भीड़ थी। राजा बीच में हाथी पर बैठे थे, हाथ में राज-दण्ड, और चारों ओर सेवक उन पर चँवर डुला रहे थे। हाथी के पाँवों के नीचे ज़मीन हलकी काँप रही थी, और बाजे बज रहे थे।

“वसिष्ठ झोंपड़ी के बाहर खड़े होकर देख रहे थे, क्योंकि उन्होंने कभी इतनी शोभा नहीं देखी थी। अरुन्धती भी पास खड़ी थीं।

“राज-शोभा गुज़र गई, धूल बैठ गई, बाजे की आवाज़ दूर हो गई।

“वसिष्ठ कुछ देर खड़े रहे, फिर भीतर गए। उन्होंने अरुन्धती से कुछ नहीं कहा, पर भीतर एक बीज पड़ चुका था।”


“उस रात वसिष्ठ ने कुछ नहीं खाया। अरुन्धती ने पूछा, क्या हुआ, तो वसिष्ठ ने कहा, कुछ नहीं। पर वो पूरी रात नहीं सोए।

“उनके भीतर पहली बार एक इच्छा उठी थी। उन्होंने सोचा, मैं तो कुछ भी नहीं हूँ, यह मेरी झोंपड़ी कुछ नहीं है, मेरी ज़िन्दगी कुछ नहीं है। काश मैं भी राजा होता, तो जीवन अलग होता। काश मैं एक बार उस हाथी पर बैठ पाता, काश एक बार वो छत्र मेरे ऊपर भी डाला जाता।

“यह इच्छा उन्होंने अरुन्धती को नहीं बताई, पर भीतर वो रहती गई।”

लीला ने एक हाथ अपने मुँह के पास लाकर पूछा – “और आगे, देवी?”

“समय बीता, ब्राह्मण और बूढ़े हुए, पर वो इच्छा भीतर रही, बिना नाम के, बिना उत्तर के। कभी-कभी रात को वसिष्ठ को सपने आते जिनमें वो राजा होते, पर सुबह जागकर वो अपनी झोंपड़ी में होते, अरुन्धती के पास, और अपने ही सपनों पर हलके से हँस देते।

“पर भीतर वो इच्छा थी।

“एक दिन वसिष्ठ बीमार पड़े। अरुन्धती ने उनकी सेवा की, पर बीमारी ठीक नहीं हुई। आख़िर एक रात वसिष्ठ चले गए, और अरुन्धती उनके देह के पास बहुत देर तक बैठी रहीं।”


“उसी रात अरुन्धती ने मुझे पुकारा।”

लीला ने सरस्वती को देखकर पूछा – “उन्होंने भी आप ही को पुकारा?”

“हाँ, पुत्री। और जो वर तुमने माँगा, वही वर अरुन्धती ने भी माँगा, उसी झोंपड़ी में, उसी रात। मैंने उन्हें भी वही दिया।”

लीला बहुत देर तक मौन रहीं।


“देवी, तो वसिष्ठ की आत्मा?”

“उस झोंपड़ी में रही, अरुन्धती के पास।”

“और फिर?”

“पुत्री, अब सुनो। यह कथा का सबसे गहरा हिस्सा है।”

सरस्वती ने अपनी वीणा का एक तार छेड़ा, और स्वर हवा में फैला।

“वसिष्ठ की आत्मा ने अपनी इच्छा रची, वो इच्छा जो उन्होंने राज-शोभा देखकर भीतर रखी थी। बिना देह के, आत्मा इच्छा को ही जगत बनाती है। वसिष्ठ की आत्मा ने एक बड़ा राज्य रचा, एक राजधानी, एक सिंहासन, एक रानी, और एक राजा का जीवन। पन्द्रह बरस का जीवन, पच्चीस बरस का जीवन, पचास बरस का जीवन।”

“वो राज्य कहाँ है, देवी?”

“पुत्री।”

“बताइए।”

सरस्वती बोलीं – “वो राज्य उसी झोंपड़ी में है।”


लीला ने पूछा – “मतलब?”

Inside a tiny ten-by-twelve-hand mud hut a luminous vision opens revealing an entire kingdom of mountains, rivers, a walled city and thousands of people contained within, Saraswati and Lila gazing at the cosmos-inside-the-hut; rich painterly classical Indian color illustration, dignified, no text or watermark

“मतलब, उस झोंपड़ी की दस-बारह हाथ की जगह में वसिष्ठ की चेतना ने हज़ारों मील का एक पूरा राज्य रचा है। उस राज्य में नगर हैं, नदियाँ हैं, पहाड़ हैं, हज़ारों लोग हैं, सब उसी झोंपड़ी के भीतर, बिना झोंपड़ी के बाहर निकले।”

लीला कुछ देर हिल नहीं पाईं, फिर बोलीं – “देवी, यह कैसे हो सकता है?”

“पुत्री, चेतना का स्वभाव यही है। तुम कहती हो हज़ारों मील? चेतना के लिए मील की कोई परिभाषा नहीं है, मील देह के लिए है। चेतना तो जितना चाहे रच ले, उसके लिए स्थान कोई बाधा नहीं है।”


लीला को पहले कुछ समझ नहीं आया, फिर एक झलक मिली।

“देवी, तो मेरा यह राज्य?”

“वो भी तुम्हारी चेतना का है, पुत्री।”

“पर मेरा देह बाहर है, उस झोंपड़ी से।”

“पुत्री, तुम्हारा देह तुम्हारी चेतना के भीतर है, बाहर नहीं। यह जो तुम बाहर समझती हो, वो चेतना के भीतर का बाहर है। चेतना के बाहर कुछ नहीं।”

लीला बहुत देर तक मौन रहीं।


लीला ने सरस्वती को देखकर पूछा – “फिर अरुन्धती?”

“अरुन्धती उसी झोंपड़ी में हैं, वहीं बैठी हैं। उनके पति का देह वहीं है, और वो उनकी प्रतीक्षा कर रही हैं।”

“और वो राज्य?”

“उस राज्य में वसिष्ठ ने ख़ुद को राजा बनाया है। उनका नाम पद्म है।”

लीला बहुत देर तक मौन रहीं।


“गुरुदेव,” राम ने यहाँ रोका। “क्या यह सच में संभव है? एक छोटी सी झोंपड़ी, बस दस हाथ बारह हाथ, और उसके भीतर एक पूरा राज्य?”

वसिष्ठ ने राम को देखकर कहा – “राम, तुम्हें लगता है यह असम्भव है क्योंकि तुम स्थान को बाहरी समझते हो। पर सोचो, तुम सपने में एक पूरा नगर देखते हो, उसमें चलते हो, बाज़ार जाते हो, लोगों से मिलते हो, और यह सब तुम्हारे सिर के भीतर हो रहा होता है। और सिर कितना बड़ा है? तुम्हारी मुट्ठी से थोड़ा बड़ा। फिर भी उसमें पूरा नगर समा जाता है। यह तो रोज़ हो रहा है। चेतना का स्थान देह के स्थान से नहीं नापा जाता, उसका नाप अलग है।”

राम ने धीरे-धीरे सिर हिलाकर कहा – “समझा।”

“नहीं, अभी नहीं। पर समझने की दिशा में हो। सुनो आगे।”

लीला ने आख़िर सिर उठाकर पूछा – “देवी, तो मैं?”

“तुम वो रानी हो जो वसिष्ठ की चेतना ने रची। तुम पद्म की रानी हो, पर तुम वसिष्ठ की पत्नी अरुन्धती भी हो। तुम ख़ुद अरुन्धती की चेतना से रचित हो, क्योंकि अरुन्धती ने भी वही वर माँगा था। तुम दोनों अलग नहीं हो, पर तुम दोनों एक भी नहीं हो।”

लीला कुछ देर हिल नहीं पाईं, फिर बोलीं – “देवी, मैं असली कौन हूँ?”


सरस्वती की आँखों में वही तह थी जो लीला ने पहले कक्ष में देखी थी। उन्होंने कहा – “पुत्री, यह प्रश्न आज नहीं। आज तुम सिर्फ़ देखो, बहुत कुछ देखना है। उत्तर बाद में आएँगे। उत्तर देखने से आते हैं, सुनने से नहीं।”

लीला ने पूछा – “और दूसरी लीला?”

“दूसरी लीला विदुरथ की चेतना से रचित हैं, पर वो भी तुम्हारी छाया हैं। हर लोक में, हर कथा में, एक लीला रहती हैं। तुम्हारा रूप उस सबमें फैला है।”

“देवी, अरुन्धती के पास मुझे ले चलिए।”

“उन्हें बाद में देखेंगे, पुत्री। पहले यहाँ का कुछ और देखो, चित्र-लोक का, क्योंकि यहाँ अभी कुछ बहुत बड़ा होने वाला है।”

“क्या?”

सरस्वती ने उत्तर नहीं दिया, बस वीणा का एक और तार छेड़ा।

युद्ध

विदुरथ के राज्य की सीमा पर एक दूसरा राज्य था, जिसके राजा का नाम सिन्धु था।

सिन्धु बूढ़े थे, उनकी दाढ़ी पूरी सफ़ेद, पर उनकी आँखें युवा की तरह तेज़। उनके पास एक बड़ी सेना थी, और उन्हें विदुरथ का राज्य चाहिए था।

क्यों? यह कथा बहुत पुरानी थी। सिन्धु के पिता और विदुरथ के पिता के बीच बहुत बरस पहले एक झगड़ा था, एक सीमा की बात पर, एक नदी का अधिकार किसका, इस बात पर। दोनों पिता मर गए, पर झगड़ा रह गया।

सिन्धु अब बूढ़े हो गए थे, और उस झगड़े का हल अपने जीवन में, अपने हाथ से करना चाहते थे। उनकी सेना सीमा पर इकट्ठा हो रही थी।


विदुरथ ने यह सुना। वो रात भर अपनी सभा में मन्त्रियों के साथ बैठे रहे, और दूसरी लीला उनके पास थीं।

“महाराज,” मन्त्री ने कहा। “हमें युद्ध से बचना चाहिए।”

“कैसे?”

“हम सिन्धु से एक सन्धि कर सकते हैं। उन्हें कुछ भूमि दे सकते हैं, कुछ धन दे सकते हैं।”

विदुरथ ने कहा – “सन्धि होगी, अगर सिन्धु राज़ी हों। पर मुझे लगता नहीं। सिन्धु इस झगड़े को बहुत बरस से लिए बैठे हैं, उन्हें अब सन्धि नहीं, जीत चाहिए।”

मन्त्री चुप हो गए।

“प्रयास करेंगे,” विदुरथ ने आख़िर कहा। “एक दूत भेजेंगे। अगर सिन्धु मान जाएँ, तो ठीक, नहीं तो मैं स्वयं युद्ध में जाऊँगा।”

दूसरी लीला ने उन्हें देखकर पूछा – “महाराज, आप जाएँगे?”

विदुरथ ने मुस्कुराकर कहा – “क्यों, आप कहना चाहती हैं कि मैं न जाऊँ?”

दूसरी लीला बोलीं – “नहीं। आप जाइए। पर लौटिए।”

“लौटूँगा।”


दूत गए, सिन्धु ने सन्धि से मना किया, दूत ख़ाली हाथ लौटे। विदुरथ ने युद्ध की तैयारी की।


सीमा पर युद्ध शुरू हुआ।

लीला और सरस्वती एक पहाड़ी पर खड़ी होकर दूर से सब देख रही थीं। नीचे एक बड़ा मैदान था, एक तरफ़ विदुरथ की सेना, दूसरी तरफ़ सिन्धु की, और दोनों के बीच सूखी ज़मीन की एक खाली पट्टी, जहाँ कुछ देर में सब कुछ बदलने वाला था।


लीला ने पहले दोनों ओर से बाजे सुने। दोनों के बाजे एक-दूसरे से अलग थे, विदुरथ की सेना के बाजे ऊँचे और तेज़, सिन्धु की सेना के बाजे भारी और धीमे।

फिर शंख बजे, एक-दूसरे के बाद, पहले एक तरफ़ से, फिर दूसरी तरफ़ से, फिर दोनों एक साथ। शंख की आवाज़ हवा को चीरती थी।


पहले हाथी आगे आए।

विदुरथ की सेना के हाथी सोने की झूल में थे, सिन्धु की सेना के काले रंग में। उनकी पीठ पर सैनिक बैठे थे, हाथ में लम्बे भाले। हाथियों के पाँवों के नीचे ज़मीन इतनी काँप रही थी कि लीला को अपनी पहाड़ी पर भी हलकी हलचल महसूस हुई। हाथियों की सूँडें ऊपर थीं, और उनकी आँखें लाल थीं, क्योंकि उन्हें युद्ध के लिए कोई मादक पिलाया गया था।

हाथी मिले, और एक बड़ी आवाज़ हुई, जैसे कई पेड़ एक साथ टूटें। हाथियों ने एक-दूसरे को सूँडों से पकड़ा, उन पर बैठे सैनिकों ने भाले चलाए। एक हाथी ज़मीन पर एक बड़ी धमाक के साथ गिरा, उस पर बैठा सैनिक नीचे आकर हाथी के नीचे दब गया। दूसरा हाथी गिरा।

लीला ने मुँह फेर लिया।


फिर दोनों सेनाओं से घुड़सवार तेज़ी से आए। उनके घोड़ों के पाँव बहुत तेज़ चल रहे थे, और इतनी धूल उठी कि कुछ देर के लिए कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

जब धूल बैठी, तो मैदान बदल चुका था। बहुत घोड़े गिरे, बहुत सैनिक गिरे।


फिर पैदल सैनिक आए, तलवार से तलवार, ढाल से ढाल।

हवा में ख़ून की गंध थी, मिट्टी में ख़ून मिल रहा था, और चीख़ें, रोने की आवाज़ें, घोड़ों की आवाज़ें सब एक साथ उठ रही थीं।

लीला ने अपनी हथेली अपने सीने पर रखी। यह सब उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। पद्म ने युद्ध की बातें की थीं, पर उन्हें कभी यह दिखाया नहीं था।

विदुरथ बीच में एक रथ पर थे। उन्होंने अपनी तलवार बार-बार चलाई। उनके बाज़ू पर एक ज़ख़्म लगा था, ख़ून बह रहा था, पर वो रुक नहीं रहे थे।

लीला ने अपने पति को कभी ऐसे नहीं देखा था। पद्म ने कभी तलवार नहीं चलाई थी, पर विदुरथ चला रहे थे, और वो वही चेहरा था, बस उम्र अलग।


सिन्धु भी ख़ुद अपने हाथी पर थे। उन्होंने सीधे विदुरथ के रथ की ओर इशारा करके चिल्लाया – “उस रथ को पकड़ो।”

सिन्धु के सैनिक उस ओर भागे।

विदुरथ ने उन्हें आते देखकर अपनी तलवार उठाई।

पहला सैनिक आया, विदुरथ ने उसे मारा। दूसरा, विदुरथ ने उसे मारा। तीसरा, विदुरथ ने उसे मारा।


पर एक चौथा सैनिक पीछे से आया।

वो बहुत जवान था, शायद विदुरथ से भी छोटा। पर उसके पास एक भाला था, और उसके चेहरे पर वो जोश था जो उन जवान सैनिकों में होता है जिन्हें मरने का डर अभी नहीं लगा।

On a dusty battlefield King Viduratha stands on his chariot with raised sword as a very young soldier hurls a spear that strikes his chest; elephants in gold and black trappings clash, banners and dust all around; rich painterly classical Indian color illustration, dignified, no text or watermark

उसने अपना भाला उठाया। विदुरथ ने उसे देखा नहीं था। भाला हवा में बहुत तेज़ी से गया, और विदुरथ के सीने में लगा।

विदुरथ रुके।


विदुरथ की तलवार धीरे से नीचे आई। उन्होंने एक हाथ उस भाले की ओर बढ़ाया जो उनके सीने में था, दूसरा हाथ अब भी तलवार पर था। वो आकाश की ओर देखे, फिर रथ से नीचे गिरे।


लीला ने अपने हाथ अपने मुँह के पास लाए – “देवी।”

सरस्वती ने उनका हाथ पकड़ा।


विदुरथ रथ के पास ज़मीन पर पड़े थे, एक हाथ भाले पर, और तलवार दूसरे हाथ से छूट चुकी थी। उनकी आँखें खुली थीं, पर वो देख नहीं रहे थे।

सिन्धु ने यह दूर से देखा, एक पल रुके, फिर बोले – “सेना रोको।”

युद्ध धीरे-धीरे रुक गया।


सिन्धु आगे विदुरथ के देह के पास आए। उन्होंने उन पर एक कपड़ा डाला और कहा – “महाराज विदुरथ।”

देह ने जवाब नहीं दिया।

सिन्धु ने फिर कहा – “महाराज विदुरथ, मेरे पिता और आपके पिता का झगड़ा हल हुआ, पर इस कीमत पर। यह बात कोई कीमत के लायक़ नहीं थी।”

सिन्धु की आँखों में कुछ था जो उनकी सेना ने पहले नहीं देखा था, एक हलकी थकान, शायद एक हलकी पछताहट।


लीला और सरस्वती अब लड़ाई नहीं देख रही थीं, वो विदुरथ के पास आ गई थीं।

लीला उनके पास घुटनों के बल बैठीं और उनका हाथ अपने हाथ में लिया।

हाथ ठंडा था, बिल्कुल वैसा ही ठंडा जैसा कुछ घंटे पहले पद्म का हाथ था।

“देवी, यह तो हुआ ही था, एक बार पहले हो चुका था।”

“हाँ।”

“फिर मैं यहाँ क्यों आई?”

सरस्वती ने उन्हें देखकर कहा – “पुत्री, इसलिए कि अब तुम्हें कुछ देखना है। दूसरी लीला।”

लीला ने सिर उठाया।

दो लीलाएँ

दूसरी लीला विदुरथ के महल में थीं।

ख़बर अभी पहुँची नहीं थी। वो अपने कक्ष में बैठी एक छोटी मटकी में हलदी का पानी मिला रही थीं। उन्होंने एक रात पहले विदुरथ की चोट के बारे में सोचा था, कि जब वो लौटेंगे तो उनके बाज़ू पर यह हलदी का पानी लगाएँगी। यह उनकी आदत थी, पन्द्रह बरस से।

लीला और सरस्वती कक्ष में आ गईं।

लीला ने दूसरी लीला को बहुत देर तक देखा। वो स्त्री अकेली बैठी हलदी मिला रही थीं, और उन्हें अभी पता नहीं था कि विदुरथ नहीं रहे।


लीला के भीतर एक अजीब पीड़ा उठी।

यह उनकी अपनी पीड़ा थी, क्योंकि पाँच घंटे पहले उन्होंने ही अपने पद्म को इसी तरह खोया था। पर यह दूसरी लीला की पीड़ा भी थी, जो आने वाली थी। और यह तीसरी पीड़ा भी थी, जो दूर के किसी समय में किसी और लीला की होगी।


“देवी, मैं इन्हें छू सकती हूँ?”

“पुत्री, अब हाँ। अब यह क्षण है।”

लीला आगे बढ़ीं और दूसरी लीला के कन्धे पर हाथ रखा।

दूसरी लीला रुकीं, उनकी हलदी मिलाने वाली उँगली रुक गई, और उन्होंने सिर उठाकर लीला को देखा।


दूसरी लीला कुछ देर मौन रहीं, फिर पूछा – “आप कौन हैं?”

लीला ने अपने आप को देखा, अपनी साड़ी, अपने जूड़े का चन्द्र-मणि, अपनी चूड़ी जो थोड़ी ढीली थी। फिर उन्होंने दूसरी लीला को देखा।

दोनों की आँखें एक ही ऊँचाई पर थीं, दोनों के होंठ एक ही तरह के, दोनों की कलाई पर एक ही जैसी चूड़ी।

“मेरा नाम भी लीला है,” लीला ने कहा।

दूसरी लीला ने पूछा – “आप यहाँ कैसे आईं?”

“मैं सरस्वती के साथ आई।”

दूसरी लीला ने पीछे मुड़कर सरस्वती को देखा और हाथ जोड़े – “देवी, यह कौन हैं?”

“यह भी लीला हैं, पर एक और लोक की, तुम्हारे लोक से अलग।”

दूसरी लीला ने यह बात सुनी, पर उनके चेहरे पर भ्रम नहीं था। शायद वो भी एक स्तर पर जानती थीं कि उनकी पहचान सिर्फ़ इस कक्ष तक सीमित नहीं है।

“और महाराज?” दूसरी लीला ने पूछा।


लीला ने उनका हाथ पकड़कर कहा – “बहन, मैं तुम्हें बताने आई हूँ।”

दूसरी लीला ने बहुत धीरे से पूछा – “वो नहीं रहे?”

“हाँ।”


दूसरी लीला कुछ देर हिल नहीं पाईं। उनके हाथ की हलदी मटकी में गिर गई, पानी हलका सा छलका, और हलदी का पीला रंग पानी में फैल गया।

उन्होंने अपने हाथ अपने मुँह के पास लाए, आँखें बन्द कीं।

लीला ने उनके कन्धे पर अपना हाथ रखकर कहा – “मैं जानती हूँ। मेरे महाराज भी आज ही गए।”

दूसरी लीला ने आँखें खोलीं – “आपके?”

“हाँ।”

“पर वो तो…”

“हाँ, वही। जो विदुरथ हैं, वो मेरे यहाँ पद्म थे। अलग नाम, अलग देह, पर वही।”


दोनों एक-दूसरे को देखते हुए कुछ देर मौन रहीं।

फिर दूसरी लीला ने पूछा – “तो आप मेरी कौन हैं?”

लीला ने कुछ सोचकर कहा – “मैं तुम्हारी बहन हूँ। बहन से भी ज़्यादा। मैं तुम हूँ, पर तुम भी मैं हो। हम एक-दूसरे को नहीं जानते थे, आज जान गए।”

और लीला ने उन्हें गले लगाया।


दोनों कुछ देर एक-दूसरे को थामे रहीं।

लीला ने दूसरी लीला के कन्धे पर अपना सिर रखा, और दूसरी लीला ने उनके बाल को छुआ।

यह एक अजीब क्षण था, एक आत्म-आलिंगन, पर बाहरी भी, अपने ही प्रतिबिम्ब को छूना, पर वो प्रतिबिम्ब अपनी अलग जीवन-कथा जी रहा था।

लीला ने महसूस किया कि दूसरी लीला की साँस उनकी साँस से थोड़ी अलग थी, हलकी सी तेज़, शायद उम्र अलग थी, पर लय वही थी। और जब लीला ने अपनी हथेली दूसरी लीला की कलाई पर रखी, तो उन्हें वही चूड़ी मिली, ढीली, थोड़ी हिलती।

“बहन, यह चूड़ी।”

“हाँ?”

“यह मेरी माँ ने मुझे दी थी।”

दूसरी लीला बोलीं – “मेरी भी।”

“पर हमारी माँ एक तो नहीं।”

“शायद हैं। हम एक हैं, तो हमारी माँ भी एक होगी।”

लीला हलके से हँसीं – “शायद।”


दूसरी लीला ने एक बात पूछी – “बहन, क्या तुम्हें कभी पद्म से नाराज़ी हुई?”

लीला ने एक पल सोचकर कहा – “हाँ, कभी-कभी।”

“किस बात पर?”

“कई बातों पर। जब उन्होंने मेरी कोई बात अनसुनी कर दी। जब उन्होंने अपने राज-काज को मेरे ऊपर रखा। जब उन्होंने मुझे एक रात अकेली छोड़ दिया, क्योंकि वो किसी मन्त्री से बात कर रहे थे।”

“पर?”

“पर मैं नाराज़ रहती नहीं थी। मुझे लगता था कि वो भी अपनी सीमा में अच्छे हैं, और उससे ज़्यादा माँगना मेरा काम नहीं।”

दूसरी लीला ने कहा – “मेरा भी ऐसा ही था।”

“हम सब लीलाएँ एक जैसी हैं।”

“शायद यही हमारी पहचान है।”

“बहन,” दूसरी लीला ने धीरे से कहा। “मुझे डर लग रहा है।”

“मुझे भी।”

“पर तुम यहाँ हो।”

“हाँ।”

“और सरस्वती।”

“हाँ।”

दोनों ने आँखें बन्द कीं।


सरस्वती ने वीणा का एक तार छेड़कर कहा – “पुत्री दोनों, अब सुनो। अभी और काम बाक़ी है।”


सरस्वती ने अपनी हथेली बढ़ाई, और दोनों ने एक-एक तरफ़ से उनकी हथेली पकड़ी।

सरस्वती ने कहा – “पुत्री दोनों, तुम्हें एक बात समझनी है। यह कथा अभी ख़त्म नहीं हुई है।”

लीला ने उन्हें देखकर कहा – “देवी, विदुरथ चले गए।”

“विदुरथ का देह चला गया, पर उनकी आत्मा यहाँ है, चित्र-लोक में, अरुन्धती की झोंपड़ी की चेतना के भीतर। और आत्मा यह तय करेगी कि वो आगे किस कथा में जाएगी।”

“मतलब?”

“मतलब, विदुरथ-पद्म फिर से देह ले सकते हैं, अगर तुम चाहो।”


लीला ने दूसरी लीला को देखा, दूसरी लीला ने लीला को। दोनों के भीतर एक ही प्रश्न था।

लीला ने आख़िर कहा – “देवी, हम क्या चाहें?”

सरस्वती मुस्कुराईं – “पुत्री, यह तुम तय करो। मेरा काम तुम्हें दिखाना था, मैंने दिखा दिया। अब निर्णय तुम्हारा।”


लीला ने दूसरी लीला का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा – “बहन, मैं एक बात कहूँ?”

“हाँ।”

“तुम्हें विदुरथ चाहिए।”

दूसरी लीला ने कहा – “हाँ, मुझे चाहिए।”

“और तुम्हारा यह जीवन, यह राज्य, यह तुम्हारे लोग, तुम्हें यह सब चाहिए।”

“हाँ।”

लीला ने कहा – “तो विदुरथ लौटेंगे, तुम्हारे पास।”

दूसरी लीला ने उन्हें देखकर पूछा – “पर तुम्हारे पद्म?”


लीला कुछ देर मौन रहीं, फिर बोलीं – “मेरे पद्म अब लौटना नहीं चाहते।”

“कैसे पता?”

लीला ने बहुत हलकी मुस्कान के साथ कहा – “क्योंकि मैं भी अब लौटना नहीं चाहती। जो मैंने यहाँ देख लिया, उसके बाद वो पुराना जीवन अब मेरे लिए ज़रूरी नहीं है। मेरी कथा कहीं और जाएगी, पद्म की कथा भी कहीं और जाएगी। पर तुम्हारे विदुरथ तुम्हारे साथ रहेंगे।”

दूसरी लीला की आँखें भीगीं – “बहन, धन्यवाद।”

लीला ने उनके माथे पर अपना माथा लगाया।


सरस्वती ने वीणा का एक और तार छेड़ा।

विदुरथ का शव, जो दूर सीमा पर पड़ा था, अचानक हिला। फिर साँस आई, फिर पूरी साँस, फिर आँखें खुलीं।

विदुरथ उठ बैठे।

उनके बाज़ू का ज़ख़्म अभी भी था, उनके सीने का ज़ख़्म अभी भी था, पर वो जीवित थे।

उनके चारों ओर सैनिक हैरान थे। सिन्धु, जो पास थे, उन्होंने यह देखा, और एक पल कुछ नहीं बोल पाए।


विदुरथ खड़े हुए, सिन्धु को देखा, और बोले – “महाराज, हम सन्धि करेंगे?”

सिन्धु, जो ख़ुद इस चमत्कार से डर गए थे, उन्होंने सिर झुकाकर कहा – “हाँ, हम सन्धि करेंगे।”

लीला और दूसरी लीला ने यह सब दूर से देखा।

लीला ने दूसरी लीला से कहा – “जाओ, उनसे मिलो।”

दूसरी लीला ने लीला को गले लगाकर पूछा – “बहन, हम फिर मिलेंगे?”

“हाँ।”

“कब?”

लीला हँसीं – “पता नहीं। पर हम एक ही हैं, चाहे जहाँ भी हों, तो हम हमेशा साथ हैं।”

दूसरी लीला चली गईं, और लीला सरस्वती के साथ अकेली रह गईं।

अरुन्धती

“देवी, मुझे अरुन्धती के पास ले चलिए।”

“क्यों, पुत्री?”

“उन्हें भी जानना चाहिए, और मुझे उन्हें देखना है।”

सरस्वती ने सिर हिलाया।


वो दोनों फिर हवा से गुज़रीं। प्रकाश फिर बदला, हवा फिर बदली।

जब वो रुकीं, तो एक छोटे गाँव में थीं, एक नदी के किनारे। वहाँ मिट्टी की दीवारों की एक छोटी झोंपड़ी थी, दस हाथ लम्बी, बारह हाथ चौड़ी, बस इतनी।

लीला एक पल रुककर झोंपड़ी देखती रहीं। वो बहुत छोटी थी।


झोंपड़ी के बाहर एक बूढ़ी स्त्री बैठी थीं। उनके बाल पूरे सफ़ेद थे, उनका चेहरा झुर्रियों में था, और उनके सामने उनके पति का देह एक सादे कपड़े में लिपटा रखा था।

लीला ने उन्हें देखा, और रुक गईं।

यह स्त्री लीला थीं।

मतलब, उनका चेहरा वही था जो लीला का था, बस बहुत बूढ़ा हो गया था। उनके माथे की वो रेखा वहीं थी, उनकी एक भौं की वो हलकी ऊँचाई वहीं थी, और उनकी कलाई पर वो चूड़ी, थोड़ी ढीली, वहीं थी।

“देवी, यह…”

“हाँ, यह अरुन्धती हैं, तुम्हारी पुनरावृत्ति, पर इस लोक में पहले की। यह वो हैं जिनकी कथा से तुम्हारी कथा शुरू हुई।”


लीला आगे बढ़ीं।

अरुन्धती ने सिर उठाकर लीला को देखा। उनकी आँखें पहले हैरान, फिर शान्त, फिर मुस्कुराईं।

“बहन,” अरुन्धती ने कहा।

लीला ने भी कहा – “बहन।”


अरुन्धती ने अपना हाथ बढ़ाया, लीला ने अपना, और दोनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा।

अरुन्धती के हाथ की उम्र की हड्डियाँ साफ़ दिख रही थीं, पर उनकी पकड़ मज़बूत थी।

“तुम आ गईं,” अरुन्धती ने कहा।

“हाँ।”

“मैं बहुत बरस से तुम्हारा इन्तज़ार कर रही थी।”

लीला ने सिर हिलाया।


अरुन्धती ने पूछा – “देवी ने तुम्हें वर दिया था?”

“हाँ।”

“तुमने वो वर पाकर क्या किया?”

लीला ने अरुन्धती को सब बताया – पद्म की कथा, चित्र-लोक की कथा, विदुरथ की कथा, दूसरी लीला की कथा।

अरुन्धती ने सब सुना, बीच में कुछ नहीं बोलीं, सिर्फ़ कभी-कभी सिर हिलाया। जब लीला ख़त्म कर चुकीं, तो अरुन्धती ने सिर हिलाया।


“पुत्री, तुम्हें पता है तुम कौन हो?”

लीला ने सरस्वती को, फिर अरुन्धती को देखकर कहा – “मुझे ख़ुद से पूछना है।”

अरुन्धती हँसीं। उनकी हँसी बहुत पुरानी थी, और उसमें कुछ ऐसा था जो रोने जैसा भी था। उन्होंने कहा – “पुत्री, तुम मैं हो, और मैं तुम हूँ। और जो वसिष्ठ थे, वो पद्म थे, और जो पद्म थे, वो विदुरथ थे। और इन सब में एक ही चेतना है, जो अपनी कथाएँ रचती जाती है। हर कथा में नए नाम, पर भीतर एक ही प्राण।”


लीला ने अरुन्धती को देखकर पूछा – “और इसका अन्त क्या है, बहन?”

अरुन्धती ने एक पल सरस्वती को, फिर लीला को देखकर कहा – “अन्त वहाँ है जहाँ कथा अपने रचयिता को पहचान लेती है।”


लीला ने अरुन्धती के अन्दर देखकर पूछा – “बहन, आपने पहचान लिया?”

अरुन्धती बोलीं – “पुत्री, मैं अभी पहचान रही हूँ। यह कोई एक दिन का काम नहीं, यह धीमा है। पर हाँ, पहचान रही हूँ।”

“और इस झोंपड़ी से बाहर?”

“पुत्री, बाहर कुछ नहीं है, यह झोंपड़ी ही है। पर इस झोंपड़ी के भीतर सब है। यह जो पद्म का राज्य है, यह भी इसी के भीतर है, और तुम भी।”

“और हम?”

“हम भी इसी के भीतर, हम सब, हर कथा।”

लीला ने अरुन्धती को गले लगाया, और बहुत देर तक उन्हें थामे रहीं।

जब वो अलग हुईं, तो अरुन्धती ने कहा – “अब तुम जाओ। तुम्हारे पद्म तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

“देवी?”

सरस्वती ने सिर हिलाकर कहा – “पुत्री, चलो।”

लीला ने अरुन्धती की ओर एक बार और देखा। अरुन्धती हँसीं, हाथ हिलाया, और लीला ने भी हाथ हिलाया।


बीच की यात्रा

सरस्वती की हथेली पकड़े हुए, लीला फिर हवा से गुज़रीं।


इस बार वो प्रकाश और तीव्र था।

लीला ने अपने भीतर देखा।


उनके भीतर बहुत बातें थीं – अरुन्धती के शब्द, दूसरी लीला का चेहरा, विदुरथ का गिरना, पद्म की मृत्यु, यह सब। पर इन सब के पीछे एक स्थिर सी चीज़ थी।


“देवी, मुझे एक बात समझ आ रही है।”

“क्या?”


“देवी, मैंने सोचा था कि पद्म चले गए। फिर मैंने यह यात्रा की, और देखा कि वो कहीं और हैं, विदुरथ के रूप में। फिर मैंने अरुन्धती को देखा, जो मेरी ही पुनरावृत्ति हैं।

“पर अब मुझे लगता है, ये सब कथाएँ अलग नहीं हैं। पद्म, विदुरथ, ब्राह्मण वसिष्ठ, सब एक चेतना के अलग रूप हैं। लीला, दूसरी लीला, अरुन्धती, सब एक चेतना के अलग रूप हैं। और हम सब, एक ही बड़ी चेतना के भीतर हैं।”


सरस्वती ने कहा – “पुत्री, हाँ।”

“और?”

“और तुम भी उसी बड़ी चेतना का एक रूप हो।”


लीला कुछ देर मौन रहीं, फिर बोलीं – “देवी, तो मेरा शोक?”

“वो भी एक रूप।”

“मेरा प्रेम?”

“वो भी।”

“मेरी इच्छा?”

“वो भी।”

लीला हलके से हँसीं – “देवी, यह सब बहुत हलका हो रहा है।”

“हाँ, पुत्री।”


सरस्वती ने कहा – “पुत्री, अब तुम लौटने वाली हो। पर एक बात।”

“क्या?”

“जब तुम लौटोगी, तो तुम्हारा शोक एक स्तर पर अब भी रहेगा। तुम्हारा देह उसे जानेगा, पर तुम्हारी चेतना उसे देखेगी, डूबेगी नहीं। यह दोनों एक साथ होगा। यह जीवन-मुक्त की अवस्था है, जीते हुए मुक्त।”


“देवी, एक और प्रश्न। क्या मैं फिर से इस यात्रा पर आ सकूँगी?”


सरस्वती ने कहा – “पुत्री, ज़रूरत नहीं। जो तुमने देखा है, वो अब हर समय तुम्हारे भीतर है, तुम्हें कहीं जाने की आवश्यकता नहीं। पर अगर तुम चाहो, तो हाँ, तुम कभी भी मुझे पुकार सकती हो।”


लौटना

प्रकाश फिर बदला, हवा फिर बदली।

जब लीला ने आँखें खोलीं, तो वो अपने कक्ष में थीं। बाहर अभी रात थी, दिया अभी जल रहा था, और चटाई पर पद्म रखे थे।

लीला पद्म के पास घुटनों के बल बैठीं।


उन्होंने पद्म के माथे पर हाथ रखा। माथा ठंडा था। लीला ने हाथ नहीं हटाया।

“पद्म।”

कोई जवाब नहीं।

“महाराज।”

कोई जवाब नहीं।


लीला हलके से हँसीं और बोलीं – “मैंने अभी बहुत कुछ देखा, बहुत कुछ जाना। पर एक बात जो जानी, वो यह कि आप कहीं नहीं गए। आप यहीं हैं, मेरे भीतर। और मैं कहीं नहीं हूँ, मैं भी आपके भीतर हूँ। हम कभी अलग नहीं थे, और आज भी अलग नहीं हैं।”

उन्होंने पद्म के माथे को चूमकर कहा – “महाराज, अब आप अपनी कथा कहीं और रचिए। मेरी कथा अब अलग चलेगी, पर हम दूर नहीं हैं।”

वो उठीं।


सुबह उन्होंने दरवाज़ा खोला। बाहर मन्त्री, सेनापति और दूत थे।

“महारानी?”

“अंतिम संस्कार तैयार करो,” लीला ने कहा। “आज ही।”

“महारानी, आप ठीक हैं?”

“हाँ।”

मन्त्री ने सिर झुकाया।

अंतिम संस्कार हुआ। पद्म के देह को नदी के किनारे जलाया गया। लीला वहाँ खड़ी रहीं, उन्होंने पूरा क्रियाक्रम देखा, और रोईं नहीं।

लोगों ने सोचा कि महारानी कठोर हैं। पर लीला ने जो देखा था, उसके बाद उनका रोना अब उसी पुरानी तरह नहीं हो सकता था। उनकी पीड़ा अब उनकी अकेली नहीं थी, वो अब उस बड़े चित्र-लोक का एक हिस्सा थी जिसे उन्होंने देखा था।


लीला ने राज्य सम्हाला।

पद्म की कोई संतान नहीं थी, इसलिए लीला ने ख़ुद राज्य का काम लिया। मन्त्री-मण्डल पुराना था, उन्होंने उसे रखा, पर कुछ नए नियम बनाए।

राज्य में जो कमज़ोर थे, उन तक मदद पहुँचाने का नियम। राज्य की जो विधवाएँ थीं, उनके लिए एक घर। राज्य के जो छोटे बच्चे माता-पिता बिना थे, उनके लिए एक स्कूल।

बीस बरस तक उन्होंने राज्य चलाया।


पहले पाँच बरस सबसे मुश्किल थे।

लोगों को आदत नहीं थी। मन्त्री-मण्डल में कुछ ऐसे थे जिन्हें लगता था कि महारानी अकेली राज्य नहीं चला सकतीं, और उन्होंने अपनी बात कई बार छिपकर रखी। पर लीला सब समझती थीं। उन्होंने तीन मन्त्रियों को बिना ग़ुस्से के बदला, बस यह कहकर कि अब वो अपने पुराने काम पर बैठें। एक चौथे मन्त्री ने यह देखा, और चुप हो गया।

पहले दस बरस में राज्य पर तीन छोटी समस्याएँ आईं – एक सूखा, एक छोटा सीमा-झगड़ा, और एक आबादी का दुर्भिक्ष। लीला ने तीनों को अलग-अलग रास्तों से सम्हाला। सूखे में उन्होंने अनाज के गोदाम खोले, सीमा-झगड़े में दूत भेजकर सन्धि कराई और युद्ध नहीं किया, और दुर्भिक्ष में अपने महल के कई हीरे बेचकर अनाज मँगवाया।

लोगों ने ध्यान दिया।


दस बरस के बाद कुछ शान्ति आई।

राज्य की बागडोर अब लीला के हाथ में पक्की हो चुकी थी। मन्त्री-मण्डल अब उनके आदेश के बिना कोई बड़ा क़दम नहीं उठाता था।

पर लीला के भीतर कहीं एक अकेलापन था।

वो हर रात अपने उसी कक्ष में जातीं। पद्म अब वहाँ नहीं थे, उनका देह बहुत बरस पहले जला दिया गया था। पर लीला उस कक्ष में जातीं, क्योंकि वहाँ उन्हें वो रात याद आती थी, चित्र-लोक की रात, सरस्वती के साथ की यात्रा।

एक रात उन्होंने आँखें बन्द कीं और सरस्वती को बुलाया।

देवी आईं, वैसी ही।

“पुत्री।”

“देवी, मेरा अकेलापन क्या है?”

सरस्वती ने कहा – “पुत्री, यह अकेलापन तुम्हारे देह का है। तुम्हारे देह को पद्म के देह की आदत थी, अब पद्म का देह नहीं है, तो देह में एक खाली जगह है। पर तुम्हारी चेतना अकेली नहीं है, वो कभी अकेली नहीं रही।”

“पर मुझे यह खालीपन क्यों दिखता है?”

“क्योंकि तुम अब भी देह से जुड़ी हो। तुम्हें यह जुड़ाव छोड़ने की ज़रूरत नहीं, बस उसे देखो, समझो, फिर वो ख़ुद बदलेगा।”

लीला ने सिर हिलाया।


बीस बरस में उनका देह बूढ़ा हुआ, बाल सफ़ेद होते गए, चलना धीमा हुआ। पर उनके चेहरे पर एक शान्ति थी जो लोगों ने पहले नहीं देखी थी।

एक मन्त्री ने एक बार पूछा था – “महारानी, आप कैसे इतनी शान्त हैं?”

लीला ने कहा – “मन्त्री, मैंने एक बात सीखी है। हर चीज़ अपनी जगह है, हर कथा अपनी जगह, और हम सब उसी के भीतर। तो शान्ति अपने आप आती है।”

मन्त्री समझे नहीं, पर सम्मान दिया।


पन्द्रहवें बरस की एक शाम राज-दरबार में एक बच्ची अपनी माँ के साथ आई। बच्ची शायद आठ बरस की थी, उसके बाल छोटे, उसकी आँखें बड़ी, और उसके कपड़े साधारण।

माँ ने लीला से कहा – “महारानी, मेरी बेटी आपको बहुत बरस से देखना चाहती थी। आज मैं उसे लाई।”

लीला ने बच्ची को पास बुलाकर कहा – “बेटी।”

बच्ची एक क़दम आगे आई और सिर झुकाकर बोली – “महारानी।”

“क्या नाम है?”

“लीला।”

लीला रुक गईं।


बच्ची ने ऊपर देखकर कहा – “महारानी, माँ ने मुझे आपका नाम दिया है, मेरा भी वही नाम।”

लीला कुछ देर मौन रहीं, फिर हलके से हँसकर बोलीं – “बेटी, यह तो बहुत अच्छी बात है।”

लीला ने अपनी कलाई से वो चूड़ी निकाली, माँ की दी हुई, थोड़ी ढीली। उन्होंने वो चूड़ी बच्ची की कलाई पर डालकर कहा – “बेटी, यह मेरी माँ ने मुझे दी थी, अब मैं तुम्हें दे रही हूँ। ढीली है, पर जब हाथ हिलाओगी तो बजेगी, और तब तुम्हें कोई याद आएगी, शायद।”

बच्ची ने सिर हिलाकर कहा – “धन्यवाद, महारानी।”


बच्ची और उसकी माँ चली गईं।

लीला ने उन्हें जाते देखा। उनकी आँखें भीगीं नहीं, पर भीतर कुछ खुला।

मेरी कथा बच्ची तक पहुँच गई, मेरी चूड़ी अब उसके पास है। यह कथा अब आगे चलेगी, मेरे बिना।


एक दिन वो अपने उसी पुराने कक्ष में बैठी थीं। उन्होंने अपने मन्त्री को बुलाकर कहा – “मन्त्री, मेरा समय आ गया है।”

“महारानी, ऐसा क्यों कह रही हैं?”

“क्योंकि मुझे पता है। आज रात तक।”

मन्त्री ने सिर झुकाया।

“महारानी की अंतिम बात।”

“बोलिए।”

“मेरे जाने के बाद यह कक्ष ख़ाली रखना, इसमें कुछ मत बदलना। बस यह छोटा सा दिया जलाए रखना।”

मन्त्री ने सिर झुकाया।


रात आई।

लीला अपने कक्ष में बैठीं, आँखें बन्द कीं।

उन्होंने सरस्वती को नहीं पुकारा, पुकारने की ज़रूरत नहीं थी। उन्होंने पद्म को नहीं पुकारा, पुकारने की ज़रूरत नहीं थी। उन्होंने बस अपने भीतर देखा।

भीतर एक प्रकाश था।

Aged Queen Lila in white sits in final meditation in her old chamber, eyes closed and lips faintly smiling, dissolving into a soft inner radiance surrounded by ghostly visions of the embracing two Lilas, a king on a throne, and the hut by a fire; one small lamp burns at her side; rich painterly classical Indian color illustration, dignified, no text or watermark

वो उसी प्रकाश में डूब गईं।


सुबह जब मन्त्री ने दरवाज़ा खोला, तो लीला बैठी थीं। उनकी आँखें खुली थीं, उनका चेहरा शान्त था, और उनके होंठ हलके मुस्कुराते थे।

पर साँस नहीं थी।

मन्त्री ने सिर झुकाया। दिया अब भी जल रहा था।

राम बहुत देर तक चुप थे।

सरयू अब लगभग पूरी काली थी। चाँद ऊपर ऊँचा था, और उसके प्रकाश में पानी पर एक चाँदी की रेखा बन रही थी, जो लहरों के साथ हलकी हिल रही थी। पीछे टिड्डे की पुकार अब भी थी।

“गुरुदेव।”

“बोलो, राम।”

“क्या हम भी एक चित्र-लोक रच रहे हैं?”

वसिष्ठ की आँखों में वो हँसी थी जो बहुत पुरानी थी। उन्होंने कहा – “राम, यह प्रश्न ही पहला क़दम है। जिस दिन तुम्हें इस प्रश्न में संदेह न हो, उस दिन तुम कथा के रचयिता हो जाओगे। पर अभी प्रश्न रखो, कुछ बरस उसके साथ बैठो, एक दिन यह प्रश्न ख़ुद उत्तर दे देगा।”

राम ने सिर हिलाया।


“और लीला?”

“लीला कहाँ हैं?”

“वो भी अब प्रकाश में हैं, पद्म के साथ। पर अब प्रकाश में कोई पद्म नहीं है, कोई लीला नहीं है, बस प्रकाश है। यह जो हम चित्र कहते हैं, यह सब उस प्रकाश के पर्दे हैं। पर्दा हटाते हो, तो प्रकाश ही बचता है।”

राम ने पानी की ओर देखा।


“गुरुदेव, माँ कौसल्या की आज की आँखों में जो डर था, उसे अब मैं समझ रहा हूँ।”

“और?”

“और मैं जानता हूँ कि वो डर सच है, हर प्रेम के भीतर वो डर है। पर लीला की कथा कहती है कि उस डर के पार जाने का रास्ता प्रेम से भागना नहीं है, बल्कि प्रेम के इतने भीतर जाना है कि उस भीतर में डर अपने आप घुल जाए।”

वसिष्ठ ने कहा – “बहुत अच्छा कहा, राम।”


राम ने कुछ देर बाद फिर पूछा – “गुरुदेव, क्या लीला ने पद्म को सच में बचाया?”


वसिष्ठ ने सोचकर कहा – “राम, यह बहुत अच्छा प्रश्न है।”

“बताइए।”

“लीला ने पद्म को बचाया नहीं। पद्म चले गए, उनका शरीर जल गया, यह बात नहीं बदली।

“पर लीला ने अपने प्रेम को बचाया, और वो प्रेम कहीं और गया, चित्र-लोक में, जहाँ विदुरथ रहे। विदुरथ अपने जीवन में आगे चले, दूसरी लीला के साथ, बच्चे हुए, बहुत बरस। पद्म एक स्तर पर वहाँ चलता रहा।”

राम ने धीरे से कहा – “तो लीला का प्रेम दो रूपों में था। एक उनके पास, इस लोक में, जहाँ पद्म चले गए, दूसरा वहाँ, चित्र-लोक में, जहाँ विदुरथ रहे।”

“हाँ।”

“और दोनों रूप अलग नहीं थे।”

“बिल्कुल।”


राम ने कुछ देर बाद पूछा – “गुरुदेव, क्या मेरा प्रेम भी ऐसा हो सकता है? अगर मैं किसी से बहुत प्रेम करूँ?”


वसिष्ठ ने कहा – “राम, हर प्रेम एक स्तर पर ऐसा होता है, बस हमें यह दिखता नहीं। हम सोचते हैं कि प्रेम सिर्फ़ देह से देह तक है, पर प्रेम चेतना से चेतना तक है, और चेतना के लिए मृत्यु कोई बाधा नहीं। जब तुम्हारी पत्नी एक दिन तुमसे दूर होगी, चाहे जिस कारण से, तो भी तुम्हारा प्रेम कहीं नहीं जाएगा, वो दोनों के भीतर रहेगा।”

राम ने सिर हिलाया।


“गुरुदेव, मेरा लीला को एक प्रणाम।”

“क्यों?”

“क्योंकि उन्होंने मुझे प्रेम का यह रूप दिखाया।”


वसिष्ठ ने कहा – “राम, लीला तुम्हारे प्रणाम को सुनेंगी। वो भी एक चेतना हैं, हर चेतना की तरह।”


राम ने पानी की ओर हाथ बढ़ाकर एक हलका सा प्रणाम किया।


राम ने पानी को छुआ। पानी ठंडा था।

दूर एक नाव हलकी हिल रही थी, और उसके भीतर एक छोटा दिया जल रहा था।

राम ने उस दिए को देखकर पूछा – “गुरुदेव, वो जो दूर नाव में दिया है, वो क्या लीला का दिया है?”

वसिष्ठ हँसे और बोले – “राम, हो सकता है। हर दिया लीला का है, हर दिया अरुन्धती का है, हर दिया हमारा है।”


राम ने पानी पर एक हलकी झलक देखी। दूर वो दिया अब बहुत छोटा था, पर अब भी जल रहा था।

“गुरुदेव, मुझे एक बात लग रही है।”

“क्या?”


“जब मैं आज सोऊँगा, तो मुझे लीला का सपना आएगा।”

वसिष्ठ ने कहा – “शायद। पर अगर आए, तो डरना मत।”

“क्यों डरूँ?”

“क्योंकि सपने में लीला तुम्हें कुछ कहेंगी। यह कथा अब तुम्हारे भीतर है, वो किसी रात फिर खुलेगी।”


राम कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, धन्यवाद।”


वसिष्ठ ने कहा – “राम, धन्यवाद की क्या ज़रूरत। यह कथा तो एक स्तर पर तुम्हारी ही थी, मैंने बस उसे बाहर निकाला।”


पानी पर वो दूर का दिया अब और भी छोटा था, पर बुझ नहीं रहा था।


एक हलकी हवा चली।

राम ने अपनी हथेली अपने सीने पर रखी, एक छोटा सा प्रणाम। बहुत बरस के लिए, बहुत स्त्रियों के लिए, बहुत लीलाओं के लिए।


वसिष्ठ ने यह देखा, और एक बहुत पुरानी हँसी हँसे, वही हँसी जो वो भुशुण्ड के पास से लाए थे।

रात अब बहुत घनी थी। दोनों ने उठने का मन नहीं किया, बैठे रहे। सरयू बहती रही।


बहुत दूर एक माँ अपने बच्चे को बुला रही थी – “बेटा, घर आ।”

बच्चा शायद देर से खेल रहा था।


राम ने यह सुना, और उनके होंठों पर एक हलकी मुस्कान आ गई।


“गुरुदेव, वो माँ भी एक लीला हैं।”

“हाँ।”

राम ने सिर हिलाया।

दिया दूर हिल रहा था, पर बुझ नहीं रहा था।


साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा योग वासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 3.15-58 पर आधारित है, और इसका अन्तिम मोड़ निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) सर्ग 156-157 में आता है। ब्राह्मण वसिष्ठ की पत्नी अरुन्धती और रानी लीला की समान वरदान-कथा एक-दूसरे का दर्पण है। चित्र-लोक का सिद्धान्त, और दस-बारह हाथ की झोंपड़ी में हज़ारों मील के राज्य की संभावना, चेतना के स्थान-सम्बन्धी सिद्धान्त का सबसे पुराना दार्शनिक प्रस्ताव है। स्वामी वेंकटेशानन्द के अनुवाद और विहारी-लाला मित्र के अनुवाद, दोनों में इस कथा का विस्तार से वर्णन है। लीला के “मैं असली कौन हूँ” प्रश्न का उत्तर शास्त्र में कई बार आता है, पर हर बार थोड़ा अलग, क्योंकि उत्तर वो है जो स्वयं देखने से आता है, सुनने से नहीं।

दर्शन-दृष्टि

लीला अपने पति की मृत्यु से डरती हैं, सरस्वती से वर माँगती हैं, और पाती हैं कि उनके दस-बारह हाथ के कमरे में हज़ारों कोसों का राज्य समाया है। एक जन्म के भीतर दूसरा जन्म, उस जन्म के भीतर तीसरा, और हर परत में वही प्रेम, वही डर, वही खोज। कथा यह कहती है कि लोक कोई बाहरी वस्तु नहीं, चेतना की एक तह है, और मृत्यु किसी एक तह से दूसरी तह में जाना है, अन्त नहीं।

भारतीय परम्परा में आदि शङ्कराचार्य (788-820) ने अपनी ब्रह्मसूत्र भाष्य में अधिष्ठान (substratum) और विवर्त (apparent transformation) की व्याख्या की, कि एक ही चेतना अनेक रूपों में दिखती है बिना स्वयं बदले। लीला की कथा इसी सिद्धान्त को एक जीती-जागती स्त्री की आँख से देखती है। पति की मृत्यु पर वो रोती नहीं रहती, वो अपनी ही चेतना के भीतर उतरकर देखती हैं कि वो रूप कहाँ गया, और पाती हैं कि वो कहीं नहीं गया, बस अपनी अगली परत में चला गया।