अयोध्या के सिंहासन पर श्रीराम विराजमान थे और रात ढल रही थी जब उन्होंने लक्ष्मण को ययाति की कथा सुनाई। नहुष के पुत्र राजा ययाति को उशना (शुक्राचार्य) के शाप से असमय वृद्धावस्था (बुढ़ापा) मिली थी। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु से प्रार्थना की कि वह यह जरा (वृद्धावस्था) कुछ काल के लिए स्वीकार कर ले, ताकि वे भोगों का अनुभव कर सकें। यदु ने अस्वीकार कर दिया, पर कनिष्ठ पुत्र पूरु ने हाथ जोड़कर कहा, “हम धन्य हैं और अनुगृहीत हैं, हम आपकी आज्ञा के अधीन हैं।” यही वह कथा थी जिसे सुनाते-सुनाते पूर्व दिशा अरुण की किरणों से ऐसे रंग गई मानो किसी ने उस पर कुसुम-रस से छुड़ाया हुआ लाल वस्त्र ओढ़ा दिया हो, और तारे विरल पड़ गए।
ययाति का यौवन-विनिमय और पूरु का राज्याभिषेक
ययाति ने जो जरा पूरु को न्यास (अमानत, धरोहर) रूप में सौंपी थी, उसे सहर्ष पूरु ने ग्रहण कर लिया और स्वयं वृद्ध होकर भी अपने तेज से दीप्त रहे। वृद्ध हुए ययाति ने तब हज़ारों यज्ञ किए और अनेक सहस्र वर्षों तक पृथ्वी का पालन किया। दीर्घकाल बीत जाने पर उन्होंने पूरु से कहा, “हे पुत्र, अब हमारी वह जरा लौटा दीजिए, जो हमने आपमें न्यास रूप में रखी थी। हम उसे पुनः ग्रहण करेंगे, आप व्यथित न हों। आपके इस आज्ञा-पालन से हम प्रसन्न हैं, और हम प्रसन्न होकर आपको प्रजा का शासक नियुक्त करते हैं।”
इसी क्रम में ययाति ने यदु को शाप दिया था। क्रुद्ध राजा ने देवयानी के उस पुत्र से कहा, “आप क्षत्रिय-रूप में राक्षस के रूप में उत्पन्न हुए हैं। आपने हमारी, अपने पिता और गुरु की, अवज्ञा (अनादर) की है, इसलिए आप क्रूर राक्षस और यातुधान (दुष्ट प्राणी) उत्पन्न करेंगे। आपका वंश सोमवंश में स्थित नहीं रहेगा।” यदु ने तब क्रौंचवन नामक दुर्गम वन में हज़ारों यातुधानों को जन्म दिया, क्योंकि वह राजवंश से बहिष्कृत हो चुका था। पूरु को अभिषेक से सम्मानित कर ययाति वानप्रस्थ आश्रम में प्रविष्ट हुए और महान काल के पश्चात अपने इष्ट गन्तव्य को प्राप्त होकर स्वर्ग चले गए।
इस सम्पूर्ण वृत्तान्त को सुनाकर श्रीराम ने अपने मन की बात कही, “हम सब आने वालों को, जो कार्य लेकर आएँ, दर्शन देंगे, ताकि वह दोष हमसे न हो जो राजा नृग से हुआ था।” इतना कहते-कहते चन्द्रमुख श्रीराम के सम्मुख वही प्रभात उतर आया।
सार: ययाति-पूरु की यौवन-विनिमय की कथा से उत्तरकाण्ड की पूर्व-कथा-शृंखला विश्राम लेती है, और श्रीराम का यह संकल्प प्रकट होता है कि कोई याचक अनसुना न लौटे। यहीं से लवणासुर-वध की मुख्य कथा का सूत्रपात होता है।
एक उप-कथा: मूल पाठ में यहाँ एक “प्रक्षिप्त सर्ग” (बाद में जोड़ा गया अंश) मिलता है, जिसमें एक कुत्ता राजद्वार पर न्याय माँगने आता है और एक ब्राह्मण के अन्याय की शिकायत करता है। गीता प्रेस इसे स्वयं प्रक्षिप्त (अमौलिक) मानकर अलग रखता है, इसलिए हम इसे वाल्मीकि की मूल कथा-धारा में नहीं गूँथ रहे।
यमुना-तट के ऋषियों की पुकार
राम और लक्ष्मण के इस वार्तालाप में ही वासन्ती रात्रि (वसन्त की रात) बीती, जो न शीतल थी न तापदायी। निर्मल प्रभात में पूर्वाह्निक क्रिया (प्रातःकालीन कर्म) करके काकुत्स्थ श्रीराम प्रजा के दर्शन-स्थल की ओर बढ़े। तभी सूत सुमन्त्र ने आकर कहा कि कुछ तपस्वी द्वार पर रुके खड़े हैं। उन्होंने बताया कि भृगुपुत्र च्यवन को आगे रखकर, यमुना-तट पर निवास करने वाले महर्षि आपके दर्शन की प्रार्थना कर रहे हैं। श्रीराम ने तुरन्त आज्ञा दी कि भार्गव-प्रमुख ब्राह्मण प्रवेश करें।

सौ से अधिक तपस्वी, अपने तेज से दीप्त, राजभवन में प्रविष्ट हुए। उन ब्राह्मणों ने सभी तीर्थों के जल से पवित्र किए हुए पूर्ण कलशों, तथा फल-मूल को लेकर श्रीराम को अर्पित किया। उन सबको प्रीतिपूर्वक ग्रहण कर श्रीराम ने महामुनियों से कहा, “आपके आगमन का क्या कार्य है? मैं समाहित (एकाग्र) होकर आपके लिए क्या करूँ? मैं महर्षियों की आज्ञा के अधीन हूँ। यह सम्पूर्ण राज्य, हमारा जीवन, और जो हमारे हृदय में स्थित है, यह सब ब्राह्मणों के लिए है, हम आपसे सत्य कहते हैं।”
यह सुनकर महान साधुकार (प्रशंसा का स्वर) उठा। उन कांचन (स्वर्ण) के बने सुन्दर आसनों पर ऋषि विराजे। हाथ जोड़कर श्रीराम ने पूछा कि उन्हें किस भय ने यहाँ तक पहुँचाया है। ऋषियों ने कहा, “हे नरश्रेष्ठ, यह वचन इस पृथ्वी पर आपको ही शोभा देता है, अन्य किसी को नहीं। अनेक महाबली राजा कार्य का गौरव (भार) समझकर प्रतिज्ञा करने से बचते रहे, पर आपने ब्राह्मणों के प्रति आदर से बिना दूसरी बार सोचे प्रतिज्ञा कर ली। निःसन्देह आप ऋषियों को महान भय से उबारेंगे।”
सार: यमुना-तट के सौ से अधिक ऋषि, भृगुपुत्र च्यवन को आगे रखकर, श्रीराम से रक्षा की याचना करते हैं। श्रीराम बिना शर्त वचन दे देते हैं, और तभी उनसे वह भय बताया जाता है जिसका नाम है लवण।
मधु का शूल और लवणासुर का आतंक

च्यवन भार्गव ने भयों का मूल बताया। प्राचीन कृतयुग में दैत्यों में लोला का ज्येष्ठ पुत्र मधु नामक महाअसुर था, जो ब्राह्मण्य (ब्राह्मणों का आदर करने वाला), शरण देने वाला और बुद्धि में स्थिर था। देवों के प्रति आदर के कारण रुद्र (महादेव) ने प्रसन्न होकर उसे एक अद्भुत वर दिया। महादेव ने अपने शूल (त्रिशूल) से एक महावीर्यवान, महाप्रभावी शूल निकालकर मधु को देते हुए कहा, “जब तक आप ब्राह्मणों और देवों का विरोध नहीं करेंगे, यह शूल आपके पास रहेगा, अन्यथा नष्ट हो जाएगा। जो भी निर्भय होकर युद्ध में आपको ललकारेगा, यह शूल उसे भस्म कर के आपके हाथ में लौट आएगा।”
मधु ने महादेव को प्रणाम कर प्रार्थना की कि यह अनुत्तम शूल उसके वंश में सदा बना रहे। महादेव ने कहा, “ऐसा नहीं होगा। किन्तु हमारी प्रसन्नता से कही वाणी व्यर्थ न जाए, इसलिए यह शूल आपके एक पुत्र के पास रहेगा। जब तक यह उसके हाथ में रहेगा, वह सब प्राणियों के लिए अवध्य (न मारा जा सकने वाला) रहेगा।” मधु ने एक देदीप्यमान भवन बनवाया। उसकी प्रिय पत्नी कुम्भीनसी, विश्वावसु की पुत्री, अनला से उत्पन्न हुई थी। उसका पुत्र महावीर्यवान, क्रूर लवण था, जो बचपन से ही दुष्ट और पापकर्मा था। दुर्विनीत पुत्र को देखकर मधु शोकग्रस्त हुए, पर कुछ कहा नहीं। वे यह लोक त्यागकर वरुणालय (समुद्र) में प्रविष्ट हुए, लवण को शूल और वर सौंपकर।
उसी शूल के प्रभाव और अपनी दुरात्मता से लवण तीनों लोकों को, और विशेषकर तपस्वियों को, सन्तप्त करता रहा। ऋषियों ने कहा, “हे काकुत्स्थ, ऐसा है लवण का प्रभाव और वैसा ही वह शूल। पहले अनेक राजाओं से हमने रक्षा माँगी, पर रक्षक न मिला। अब रावण को सेना-वाहन सहित मारा हुआ सुनकर, इस पृथ्वी पर हम आपके अतिरिक्त किसी राजा को रक्षक नहीं मानते। लवण से पीड़ितों की रक्षा कीजिए। आप यह भय दूर करने में समर्थ हैं, हे अहीनविक्रम (अमित पराक्रम वाले)।”
एक उप-कथा: लवण की अवध्यता किसी जादू में नहीं, एक शर्त में बँधी थी। शूल तभी तक अजेय था जब तक वह उसके हाथ में हो। जिस क्षण लवण उसे भवन में रखकर बाहर निकलता, उसी क्षण वह साधारण प्राणी की तरह वध्य हो जाता। यही दुर्बलता आगे की पूरी रणनीति की धुरी बनी।
शत्रुघ्न का चयन
हाथ जोड़कर श्रीराम ने ऋषियों से पूछा, “लवण क्या आहार करता है, उसका आचार कैसा है, और वह कहाँ रहता है?” ऋषियों ने बताया कि उसका आहार समस्त प्राणी हैं, विशेषकर तपस्वी। उसका आचार नित्य रौद्र (क्रूर) है और निवास मधुवन में है। वह सहस्रों सिंह, व्याघ्र, मृग, पक्षी और मनुष्यों को मारकर नित्य का आहार बनाता है, और काल की भाँति मुख फैलाकर समस्त प्राणियों का भक्षण करता है। श्रीराम ने कहा, “मैं उस राक्षस को मारूँगा, आपका भय दूर हो।”
फिर उन्होंने भाइयों से पूछा कि लवण को कौन वीर मारेगा, यह कार्य भरत को सौंपा जाए या बुद्धिमान शत्रुघ्न को। भरत ने तुरन्त कहा, “मैं इसे मारूँगा, यह कार्य मुझे दिया जाए।” भरत के धैर्य और शौर्यपूर्ण वचन सुनकर शत्रुघ्न अपना स्वर्ण-आसन छोड़कर उठ खड़े हुए और राजा को प्रणाम कर बोले, “हे रघुनन्दन, हम सबमें मध्यम भरत अपना कर्म पहले ही कर चुके हैं। उन्होंने आपके वियोग में नन्दिग्राम में दुःख की शय्या पर सोते हुए, फल-मूल खाते, जटा और चीर (वल्कल) धारण किए दीर्घ कष्ट सहा है। मेरे रहते भरत पुनः क्लेश न पाएँ।”

श्रीराम ने प्रसन्न होकर कहा, “ऐसा ही हो, काकुत्स्थ। मधु के पवित्र नगर के राज्य पर मैं आपका अभिषेक करूँगा। आप शूर, कृतविद्य और नगर बसाने में समर्थ हैं। जो राजवंश को उखाड़कर भी वहाँ राजा स्थापित नहीं करता, वह नरक जाता है। इसलिए आप पापनिश्चयी लवण को मारकर उस राज्य पर धर्मपूर्वक शासन कीजिए। मेरे वचन में कोई उत्तर न दीजिएगा। यह अभिषेक वसिष्ठ-प्रमुख विप्रों के मन्त्रोच्चार सहित स्वीकार कीजिए।”
सार: भरत आगे आते हैं, पर शत्रुघ्न उन्हें रोककर स्वयं भार लेते हैं, यह स्मरण कराते हुए कि भरत पहले ही चौदह वर्ष का कष्ट सह चुके हैं। श्रीराम शत्रुघ्न को मधुपुरी के राज्य पर अभिषिक्त करना तय करते हैं।
शत्रुघ्न का अभिषेक और दिव्य बाण
यह सुनकर वीर्यवान शत्रुघ्न परम लज्जित हुए और धीरे-धीरे बोले, “हे काकुत्स्थ, इस कार्य में मुझे अधर्म दिखता है। ज्येष्ठों के रहते कनिष्ठ का अभिषेक कैसे हो? पर आपकी आज्ञा अवश्य पालनीय है। मैंने आपसे और श्रुतियों से सुना है कि मध्यम भाई के प्रतिज्ञा कर लेने पर मुझे कुछ नहीं कहना चाहिए था। मैंने वह दुर्वचन कह दिया कि ‘लवण को युद्ध में मारूँगा’, और इसी दुरुक्ति का यह फल है। ज्येष्ठ के कहने पर कनिष्ठ को उत्तर नहीं देना चाहिए। मैं दूसरी बार उत्तर नहीं दूँगा, हे मानद। आप मेरे लिए जो अधर्म-अंश हो, उसे दूर कर दीजिए।”
शत्रुघ्न के इन वचनों से श्रीराम संतुष्ट हुए और भरत-लक्ष्मण से कहा कि अभिषेक की सामग्री लाई जाए। पुरोहित वसिष्ठ, नैगम (नगरवासी), ऋत्विज और मन्त्रियों को बुलाया गया। राजमाताएँ कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी ने राजभवन में मंगल किया। यमुना-तट के महर्षियों ने माना कि शत्रुघ्न के अभिषेक से लवण मानो मारा ही गया। अभिषिक्त शत्रुघ्न आदित्य (सूर्य) के समान शोभित हुए, ठीक वैसे ही जैसे प्राचीन काल में देवों ने इन्द्र सहित स्कन्द (कार्तिकेय) का अभिषेक किया था।

श्रीराम ने शत्रुघ्न को गोद में बिठाकर मधुर वाणी में कहा, “हे रघुनन्दन, यह अमोघ (कभी व्यर्थ न जाने वाला) दिव्य बाण लीजिए। इसी से आप लवण को मारेंगे। यह बाण तब रचा गया था जब स्वयम्भू अजित विष्णु महासागर में शयन कर रहे थे, जिन्हें सुर-असुर देख तक न पाते थे। क्रोधाभिभूत विष्णु ने मधु और कैटभ नामक दो दुरात्माओं के विनाश के लिए, और उनके वध के पश्चात तीनों लोकों की रचना के लिए, इसी बाण को चलाया था। रावण के वध के समय भी मैंने इसे नहीं चलाया, क्योंकि इससे अन्य प्राणियों का भी महान संहार होता।”
श्रीराम ने रणनीति समझाई, “हे पुरुषशार्दूल, वह शूल को घर में रखकर, चारों दिशाओं में घूमकर आहार लाता है। जब कोई युद्ध की इच्छा से उसे ललकारता है, तब वह शूल हाथ में लेकर शत्रु को भस्म कर देता है। इसलिए आप शूल से रहित, आयुध धारण किए हुए, पूर्व द्वार पर खड़े रहिए, और जब वह भवन में प्रवेश न कर पाया हो, तब उसे युद्ध के लिए ललकारिए। तभी आप उस राक्षस को मार सकेंगे। अन्यथा वह अवध्य रहेगा। श्रीमान नीलकण्ठ (शिव) का कृत्य दुरतिक्रम (अलंघ्य) है।”
सार: शत्रुघ्न का राजसी विधि से अभिषेक होता है। श्रीराम उन्हें वही दिव्य अमोघ बाण देते हैं जिससे विष्णु ने मधु-कैटभ का संहार किया था, और स्पष्ट रणनीति बताते हैं कि लवण को तभी ललकारना है जब उसका शूल हाथ में न हो।
समझने की कुंजी: कथा में शूल और बाण, दो विरोधी दिव्यास्त्र आमने-सामने हैं। शूल शिव का, बाण विष्णु का; और बाण की पूर्व-कथा सृष्टि के आदि (मधु-कैटभ-वध) तक जाती है। यह संकेत है कि लवण-वध केवल एक राजनैतिक विजय नहीं, सृष्टि-व्यवस्था की पुनर्स्थापना का अंग है।
सेना का प्रस्थान, शत्रुघ्न अकेले
श्रीराम ने काकुत्स्थ की बार-बार प्रशंसा कर फिर कहा, “हे पुरुषशार्दूल, ये चार हज़ार अश्व, दो हज़ार रथ और सौ श्रेष्ठ हाथी आपके साथ चलें; नट और नर्तक भी चलें। एक लाख स्वर्ण-मुद्राएँ लेकर, धन और वाहन से सम्पन्न होकर आप मधुरा की ओर बढ़िए। सेना को मधुर वचनों से प्रसन्न और सन्तुष्ट रखिए, उद्धत नहीं। युद्ध के समय वहाँ न धन काम आता है, न पत्नी, न बान्धव; काम आता है वह सेवक-वर्ग जो प्रसन्न रहा हो।”
“इसलिए हर्षित जनों से भरी इस बड़ी सेना को आगे भेजकर, आप अकेले धनुर्धारी होकर मधुवन जाइए, इस प्रकार कि मधुपुत्र लवण आपके युद्ध-अभियान को न जान पाए। उसकी मृत्यु का अन्य कोई उपाय नहीं; जो भी उस पर सीधे आक्रमण करता है, मारा जाता है। ग्रीष्म बीतने और वर्षाकाल आने पर आप उसे मारिए, वही इस दुर्मति का काल है। आपके सैनिक महर्षियों को आगे कर चलें, ताकि ग्रीष्म के शेष में ही वे जाह्नवी (गंगा) का जल पार कर लें। सेना को नदी-तट पर ठहराकर, हे लघुविक्रम (शीघ्रगामी), केवल धनुष लेकर आप अकेले आगे जाइए।”
श्रीराम की आज्ञा पाकर शत्रुघ्न ने सेना-नायकों को बुलाकर उनके पड़ाव-स्थल निश्चित किए और कहा कि वे किसी को बाधा दिए बिना सौहार्द से ठहरें। फिर उन्होंने कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी को प्रणाम किया, राम की प्रदक्षिणा की, लक्ष्मण, भरत और पुरोहित वसिष्ठ के चरणों में नमन किया, और पुनः राम की प्रदक्षिणा कर प्रस्थान किया। हाथी-घोड़ों से भरी सेना को आगे भेजकर, शत्रुघ्न स्वयं एक मास तक श्रीराम के पास रहे, फिर वे भी चल पड़े।
सार: सेना पहले रवाना होती है, शत्रुघ्न एक मास बाद अकेले धनुष लेकर चलते हैं, ताकि लवण को अभियान की भनक न लगे। समय भी निश्चित है, ग्रीष्म बीतने पर, वर्षाकाल में आक्रमण।
समझने की कुंजी (संख्या): चार हज़ार अश्व, दो हज़ार रथ, सौ हाथी और एक लाख स्वर्ण-मुद्राएँ; एक पूरे नगर को नए सिरे से बसाने और चलाने योग्य पूँजी। यह केवल वध-अभियान नहीं, राज्य-स्थापना की पूरी तैयारी थी।
वाल्मीकि का आश्रम और कल्माषपाद की कथा

सेना को भेजकर, मार्ग में एक मास रुककर, शत्रुघ्न अकेले शीघ्र आगे बढ़े। बीच में दो रात्रि बिताकर वे वाल्मीकि के पवित्र आश्रम में पहुँचे, जो निवास के लिए परम उत्तम था। मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि को प्रणाम कर, हाथ जोड़कर उन्होंने कहा, “भगवन, मैं गुरु (श्रीराम) के कार्य से आया हूँ और यहाँ रुकना चाहता हूँ; कल प्रातः पश्चिम, वारुणी (वरुण की) दिशा में जाऊँगा।” वाल्मीकि ने प्रसन्न होकर कहा, “आपका स्वागत है। यह आश्रम तो रघुवंशियों का अपना ही है। आसन, पाद्य (पैर धोने का जल) और अर्घ्य निःशंक होकर स्वीकार कीजिए।” फल-मूल का भोजन कर शत्रुघ्न परम तृप्त हुए।
भोजन के पश्चात शत्रुघ्न ने आश्रम के पूर्व में दिख रही यज्ञ-सामग्री देखकर पूछा कि यह किसका यज्ञायतन (यज्ञ-स्थल) है। वाल्मीकि ने कथा सुनाई, “आपके पूर्वज सुदास के राजा थे, और उनका पुत्र था वीरसह नामक, वीर्यवान और अतिधार्मिक, जो सौदास कहलाता था। बाल्यकाल में ही सौदास आखेट (शिकार) पर निकला और उसने दो राक्षसों को देखा, जो व्याघ्र-रूप धारण कर सहस्रों मृगों को खा रहे थे, फिर भी तृप्त नहीं होते थे। वन को मृगहीन देखकर क्रुद्ध सौदास ने एक राक्षस को बाण से मार डाला। दूसरे साथी राक्षस ने सन्तप्त होकर कहा, ‘आपने मेरे निरपराध साथी को मारा है, इसलिए हे पापिष्ठ, मैं आपसे प्रतिशोध लूँगा।’ इतना कहकर वह वहीं अन्तर्धान हो गया।”
“कालक्रम से वीरसह, जो मित्रसह भी कहलाते थे, अयोध्या के राजा हुए। उन्होंने आश्रम के समीप अश्वमेध महायज्ञ किया, जिसमें वसिष्ठ ने भी भाग लिया। यह महायज्ञ अनेक वर्षों तक चला और देवयज्ञ के समान समृद्ध रहा। यज्ञ के अन्त में, पूर्व वैर स्मरण कर, उसी राक्षस ने वसिष्ठ का रूप धरकर राजा से कहा कि उसे तुरन्त मांस-युक्त भोजन दिया जाए, इसमें कोई विचार न किया जाए। ब्रह्मरूपी राक्षस के इस वचन को सुनकर राजा ने रसोइयों को आदेश दिया कि गुरु वसिष्ठ के लिए ऐसा स्वादिष्ट हविष्य-भोजन शीघ्र बने जिससे वे तृप्त हों।”
“राजा के आदेश से सम्भ्रान्त रसोइए के पास वही राक्षस अब रसोइए का वेश धरकर पहुँचा और उसने मनुष्य का मांस लाकर राजा को सौंप दिया। राजा ने वह भोजन अपनी पत्नी मदयन्ती के साथ वसिष्ठ को परोसा। मनुष्य-मांस जानकर अत्यन्त क्रुद्ध वसिष्ठ बोले, ‘जिस कारण आप मुझे ऐसा भोजन देना चाहते हैं, वही भोजन आपका हो जाएगा।’ तब सौदास क्रुद्ध होकर वसिष्ठ को शाप देने को हाथ में जल लेने लगे, पर पत्नी ने रोका कि वसिष्ठ हमारे पूज्य देवतुल्य पुरोहित हैं, उन्हें प्रति-शाप नहीं देना चाहिए। धर्मात्मा राजा ने वह क्रोध-भरा जल अपने ही चरणों पर छिड़क दिया। इससे उनके दोनों पैर कल्माष (चितकबरे) रंग के हो गए, और तभी से वे कल्माषपाद नाम से विख्यात हुए।”
“राजा ने पत्नी सहित बार-बार वसिष्ठ के चरणों में पड़कर सारी सच्चाई बताई कि यह ब्रह्मरूपी राक्षस का कृत्य था। वसिष्ठ ने कहा, ‘क्रोध में कहा मेरा वचन व्यर्थ नहीं हो सकता, किन्तु मैं आपको वर देता हूँ; यह शाप बारह वर्ष में समाप्त होगा, और मेरी कृपा से आप बीते को स्मरण नहीं करेंगे।’ इस प्रकार वह शाप भोगकर राजा ने पुनः राज्य पाया और प्रजा का पालन किया। उसी कल्माषपाद का यह यज्ञायतन है, जिसके विषय में आपने पूछा।” यह सुनकर शत्रुघ्न महर्षि को प्रणाम कर पर्णशाला में प्रविष्ट हुए।
एक उप-कथा: कल्माषपाद की कथा में राक्षस का प्रतिशोध रक्त से नहीं, छल से लिया गया; उसने गुरु और रसोइए दोनों का रूप धरकर राजा को अनजाने पाप में फँसाया। और गुरु का शाप भी पूर्ण मिटाया नहीं जा सका, केवल कालबद्ध और स्मृति-रहित किया गया, यह वाल्मीकि की कथाओं में वचन की अटल शक्ति का संकेत है।
लव और कुश का जन्म

जिस रात शत्रुघ्न पर्णशाला में प्रविष्ट हुए, उसी रात सीता ने दो पुत्रों को जन्म दिया। अर्धरात्रि में मुनि-बालकों ने वाल्मीकि को सीता के शुभ प्रसव का प्रिय समाचार सुनाया और प्रार्थना की, “भगवन, राम की पत्नी ने दो पुत्रों को जन्म दिया है। हे महातेजस्वी, भूत-विनाशिनी (अनिष्ट प्राणियों को दूर करने वाली) रक्षा कीजिए।” यह सुनकर महर्षि वहाँ पहुँचे और बालचन्द्र (नवचन्द्र) के समान, देवपुत्रों जैसे महाओजस्वी दोनों कुमारों को देखा। हर्षित होकर उन्होंने राक्षस-विनाशिनी रक्षा की।
वाल्मीकि ने कुश की मुट्ठी और लव लेकर, मन्त्रों से सत्कृत कुशों से दोनों की रक्षा-विधि सम्पन्न की। उन्होंने कहा, “इन दोनों में जो पहले जन्मा है, उसे मन्त्र-पवित्र कुशों से निर्मार्जन (शुद्धि) किया जाएगा, इसलिए उसका नाम ‘कुश’ होगा। जो बाद में जन्मा, उसे वृद्धाओं द्वारा ‘लव’ से शुद्ध किया जाएगा, इसलिए वह ‘लव’ नाम से जाना जाएगा। इस प्रकार ये यमज (जुड़वाँ) कुश और लव, मेरे दिए नामों से विख्यात होंगे।” आश्रम की शुद्ध-मना वृद्धाओं ने मुनि के हाथ से वह रक्षा-विधान लेकर ध्यानपूर्वक दोनों की रक्षा की।

उसी समय, जब वृद्धाएँ गोत्र-नाम कीर्तन सहित यह विधान कर रही थीं और श्रीराम तथा सीता के शुभ प्रसव की चर्चा हो रही थी, शत्रुघ्न ने अर्धरात्रि में यह परम प्रिय समाचार सुना। वे पर्णशाला में जाकर बोले, “हे माता, ईश्वर की कृपा से आपको दो पुत्र हुए हैं।” प्रहर्षित महात्मा शत्रुघ्न की वह श्रावणी (श्रावण-मास की) वर्षा-रात्रि शीघ्र बीत गई। प्रभात में पूर्वाह्निक क्रिया कर, मुनि से हाथ जोड़कर विदा लेकर, वे पश्चिम दिशा की ओर बढ़े।
यमुना-तट पर पहुँचकर, मार्ग में सात रात्रि बिताकर, शत्रुघ्न पुण्यकीर्ति ऋषियों के आश्रम में ठहरे। वहाँ भार्गव-प्रमुख मुनियों के साथ अवसर के अनुकूल कथाओं में भाग लेते हुए, च्यवन आदि कांचन-तेजस्वी मुनियों के संग, अनेक धार्मिक कथाओं को सुनते हुए उन्होंने वह रात्रि बिताई।
सार: जिस रात शत्रुघ्न वाल्मीकि के आश्रम में थे, उसी रात सीता ने दो पुत्रों को जन्म दिया। वाल्मीकि ने उन्हें कुश और लव नाम दिए, ये नाम उनके निर्मार्जन (शुद्धि) में प्रयुक्त कुश और लव से ही पड़े। शत्रुघ्न आगे यमुना-तट के ऋषियों के पास पहुँचते हैं।

समझने की कुंजी (नाम): “कुश” वही पवित्र दर्भ-घास है और “लव” उसका निचला कोमल भाग। जन्म के समय शुद्धि-विधान में जिस वस्तु से जिस बालक को मार्जित किया गया, वही उसका नाम बना; यही “कुश-लव” नामों का मूल है, जिनसे आगे “कुशीलव” (कथा-गायक) शब्द भी जुड़ता है।
च्यवन की चेतावनी और मान्धाता की कथा
रात्रि होने पर शत्रुघ्न ने भृगुनन्दन च्यवन से लवण के बल और शूल की शक्ति के विषय में पूछा, “हे ब्रह्मन, पहले कौन-कौन इस शूल से नष्ट हुए जो लवण से द्वन्द्व-युद्ध में उतरे?” महातेजस्वी च्यवन ने उत्तर दिया, “लवण के असंख्य कर्मों में जो इक्ष्वाकु-वंश के आदि-राजा मान्धाता के साथ घटा, वह सुनिए। प्राचीन काल में अयोध्या में युवनाश्व के पुत्र, तीनों लोकों में प्रसिद्ध बली मान्धाता थे। समस्त पृथ्वी को अपने शासन में करके उन्होंने सुरलोक को जीतने का उद्योग किया।”
“मान्धाता के देवलोक-विजय के उद्योग से इन्द्र और महात्मा देवों को तीव्र भय हुआ। पाकशासन इन्द्र ने उनके अभिप्राय को जानकर सान्त्वनापूर्वक कहा, ‘हे पुरुषशार्दूल, आप अभी मानव-लोक में भी पूर्ण राजा नहीं बने, पृथ्वी को वश में किए बिना देवराज्य चाहते हैं। यदि सम्पूर्ण पृथ्वी आपके वश में हो, तो भृत्य-सेना-वाहन सहित देवराज्य पर भी शासन कीजिए।’ मान्धाता ने पूछा, ‘हे शक्र, मेरा शासन पृथ्वी पर कहाँ बाधित है?’ सहस्राक्ष इन्द्र ने कहा, ‘हे अनघ, मधुवन में मधुपुत्र लवण नामक राक्षस आपकी आज्ञा नहीं मानता।’”

“इस घोर अप्रिय वचन से लज्जित राजा अधोमुख होकर कुछ न बोल सका। इन्द्र से विदा लेकर वह इस लोक में लौटा और सेना-वाहन सहित लवण को वश में करने आया। उसने युद्ध के लिए एक दूत भेजा, जिसने अनेक अप्रिय वचन कहे; लवण ने उस दूत को बोलते ही निगल लिया। दूत के विलम्ब से क्रुद्ध राजा ने राक्षस पर चारों ओर से बाण-वर्षा की। तब राक्षस ने हँसकर शूल हाथ में लिया और मान्धाता को उसके अनुचरों सहित मारने के लिए वह उत्तम आयुध छोड़ दिया। वह देदीप्यमान शूल राजा को सेना-वाहन सहित भस्म कर के पुनः लवण के हाथ में लौट आया।”
“इस प्रकार वह महान राजा सेना-वाहन सहित मारा गया, हे सौम्य; शूल का बल अप्रमेय (अमाप) और अनुत्तम है। कल प्रभात में आप निःसन्देह लवण को तब मारेंगे जब वह आहार के लिए शूल-रहित निकलेगा; तभी आपकी विजय निश्चित है। इसी से लोकों का कल्याण होगा। मान्धाता का विनाश उसके यत्न के कारण हुआ, क्योंकि वह शूलधारी लवण से सीधे भिड़ गया था।”
सार: च्यवन मान्धाता का उदाहरण देकर वही रणनीति दोहराते हैं: जो शूलधारी लवण से सीधे भिड़ा, भस्म हुआ। मान्धाता जैसा त्रिलोक-विजयी भी इसी भूल से नष्ट हुआ। शत्रुघ्न को तभी प्रहार करना है जब लवण शूल-रहित आहार पर निकला हो।
द्वार पर प्रतीक्षा और कटु संवाद

च्यवन तथा अन्य मुनियों के साथ, जो उनकी शुभ विजय चाहते थे, वार्तालाप करते-करते शत्रुघ्न की रात्रि शीघ्र बीती। निर्मल प्रभात में वह राक्षस भोजन-आहार की इच्छा से नगर से बाहर निकला। इसी बीच वीर शत्रुघ्न यमुना नदी पार कर, धनुष हाथ में लिए, मधुपुर के द्वार पर खड़े हो गए। मध्याह्न में क्रूरकर्मा लवण अनेक सहस्र प्राणियों का भार ढोता हुआ लौटा।
द्वार पर आयुध धारण किए खड़े शत्रुघ्न को देखकर राक्षस ने कहा, “इस आयुध से क्या करोगे? आप जैसे सहस्रों सशस्त्र मनुष्यों को मैंने क्रोध में निगल लिया है, हे नराधम। काल आपके निकट आ पहुँचा है। मेरा आहार अभी अधूरा है, और आप स्वयं ही मेरे मुख में आ गए, हे दुर्मति।” राक्षस के इस प्रकार बोलते और बार-बार हँसते रहने पर वीर्यवान शत्रुघ्न क्रोध से आँसू बहाने लगे। उनके समस्त अंगों से तेजोमय मरीचि (किरणें) निकलने लगीं।
अत्यन्त क्रुद्ध शत्रुघ्न ने उस निशाचर से कहा, “हे दुर्बुद्ध, मैं आपसे द्वन्द्व-युद्ध चाहता हूँ। मैं दशरथ का पुत्र, बुद्धिमान राम का भाई, शत्रुघ्न नाम का हूँ, आपके वध की इच्छा से आया हूँ। मुझ युद्धकामी को द्वन्द्व दीजिए। आप समस्त प्राणियों के शत्रु हैं; मेरे जीवित रहते जीवित नहीं जाएँगे।” लवण ने मानो हँसते हुए कहा, “हे दुर्मति, सौभाग्य से आप मेरी पहुँच में आ गए। मेरी मौसी के भाई रावण को राम ने एक स्त्री के कारण मारा। रावण के कुल-क्षय और विशेषकर आप लोगों की अवज्ञा, यह सब मैंने क्षमा कर दिया था। पर अब जो भी जन्मे हैं या जन्मेंगे, और आप नराधम भी, मेरे द्वारा तिनके की तरह उड़ा दिए जाएँगे।”
शत्रुघ्न बोले, “आप युद्ध चाहते हैं तो युद्ध दूँगा। एक मुहूर्त ठहरिए, मैं अपना आयुध (शूल) ले आऊँ।” शत्रुघ्न ने तुरन्त कहा, “मेरे जीवित रहते आप कहाँ जाएँगे? जो शत्रु स्वयं आ गया हो, उसे संयमी पुरुष नहीं छोड़ता। जो विकल बुद्धि से शत्रु को निकलने का अवसर देता है, वह मन्दबुद्धि कापुरुष की भाँति मारा जाता है। इसलिए आप इस जीवलोक को भली-भाँति देख लीजिए; मैं तीखे बाणों से आपको यमलोक भेजूँगा, हे त्रिलोक और रघुकुल के शत्रु।”
सार: लवण आहार लेकर लौटता है, शूल भवन में ही है। वह शत्रुघ्न का उपहास करता है, पर शत्रुघ्न उसे शूल लेने भीतर जाने की चाल नहीं चलने देते, यही वह क्षण है जिसकी प्रतीक्षा थी।
द्वन्द्व-युद्ध और लवण का वध
शत्रुघ्न के इन वचनों से लवण अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और बोला, “ठहरिए।” एक हाथ दूसरे पर रगड़कर, दाँत किटकिटाते हुए, उसने रघुश्रेष्ठ को बार-बार ललकारा। घोरदर्शन लवण से देवशत्रुघ्न (देवों के शत्रु का नाश करने वाले) शत्रुघ्न ने कहा, “जब आपने औरों को जीता तब शत्रुघ्न जन्मा ही नहीं था; आज मेरे बाण से आहत होकर यमसदन जाइए। हे पापात्मा, ऋषि और विद्वान विप्र आज आपको उसी प्रकार रण में मरा देखें जैसे देवों ने रावण को देखा था। आपके गिरने पर नगर और जनपद में शान्ति होगी।”
तब वीर्यवान लवण ने हँसकर एक महावृक्ष उखाड़कर शत्रुघ्न के वक्ष पर फेंका, पर शत्रुघ्न ने उसे बाणों से सौ टुकड़ों में काट दिया। अपना प्रयास व्यर्थ देख बलवान राक्षस ने और अनेक वृक्ष उखाड़कर फेंके, जिन्हें तेजस्वी शत्रुघ्न ने तीन-चार बाणों से एक-एक कर काट दिया। शत्रुघ्न ने राक्षस पर बाण-वर्षा की, पर राक्षस व्यथित नहीं हुआ। फिर लवण ने एक वृक्ष उठाकर शत्रुघ्न के सिर पर ऐसा प्रहार किया कि अंग शिथिल हो जाने से वे मूर्च्छित होकर गिर पड़े। वीर के गिरने पर ऋषियों, देवसमूहों, गन्धर्वों और अप्सराओं में महान हाहाकार उठा।
शत्रुघ्न को मरा हुआ मानकर, अवसर पाकर भी राक्षस न तो अपने भवन में गया, न शूल उठाने गया; उसे मरा समझकर वह अपना आहार-भार ले आया। एक मुहूर्त में होश में आकर, ऋषियों से सत्कृत शत्रुघ्न पुनः आयुध लेकर मधुपुर के द्वार पर खड़े हो गए। तब उन्होंने वह दिव्य अमोघ उत्तम बाण लिया, जो तेज से जाज्वल्यमान, दसों दिशाओं को भरता हुआ, वज्र-समान मुखवाला, वज्र-समान वेगवाला, मेरु और मन्दर पर्वतों के समान, सब संग्रामों में अपराजित, और दानवेन्द्रों तथा असुरों के लिए दारुण था। युगान्त में प्रकट कालाग्नि के समान दीप्त उस बाण को देखकर समस्त प्राणी भयभीत हो उठे।
देव, असुर, गन्धर्व, मुनि और अप्सराएँ, सम्पूर्ण जगत अस्वस्थ होकर पितामह (ब्रह्मा) के पास पहुँचा। उन्होंने पूछा, “हे देव, क्या लोक-क्षय या युग-क्षय आ पहुँचा है? ऐसा न कभी देखा, न सुना।” लोकपितामह ब्रह्मा ने मधुर वाणी में कहा, “हे समस्त देवताओ, सुनिए। यह बाण शत्रुघ्न ने लवण-वध के लिए धारण किया है। यह पूर्व देव, लोककर्ता विष्णु का सनातन तेजोमय बाण है। इसी को महात्मा विष्णु ने दिति के दो पुत्रों मधु और कैटभ के वध के लिए रचा था। इस तेजोमय बाण को केवल विष्णु ही जानते हैं। यह उन महात्मा विष्णु का ही पूर्व-स्वरूप है। यहाँ से जाइए और देखिए, राम के अनुज वीर शत्रुघ्न द्वारा राक्षसश्रेष्ठ लवण का वध।”
देवों ने उस स्थान पर पहुँचकर देखा जहाँ शत्रुघ्न और लवण युद्ध कर रहे थे। आकाश को देवों से भरा देख शत्रुघ्न ने सिंहनाद कर पुनः लवण को ललकारा। क्रोध-भरा लवण युद्ध को आ खड़ा हुआ। धनुर्धरों में श्रेष्ठ शत्रुघ्न ने धनुष को कान तक खींचकर वह महाबाण लवण के विशाल वक्ष पर छोड़ा। बाण ने उसका वक्ष फाड़कर रसातल में प्रवेश किया, फिर देवों से पूजित होकर शीघ्र इक्ष्वाकु-कुल-नन्दन शत्रुघ्न के पास लौट आया। शत्रुघ्न के बाण से बिंधा वह निशाचर लवण वज्र से आहत पर्वत की भाँति सहसा भूमि पर गिर पड़ा। लवण के मारे जाने पर वह महान दिव्य शूल भी, समस्त देवों के देखते-देखते, रुद्र के वश में लौट गया।
एक ही बाण-पात से तीनों लोकों के इस भय को गिराकर, उत्तम चाप-बाणधारी रघुप्रवीर शत्रुघ्न सहस्ररश्मि सूर्य की भाँति, अन्धकार को हटाते हुए, देदीप्यमान हुए। देव, ऋषि, नाग और सभी अप्सराओं ने दशरथ-पुत्र की निर्भय विजय की प्रशंसा की, और जगत भय त्यागकर शान्त हुए सर्प की भाँति प्रशान्त हो गया।
सार: लवण पहले वृक्षों से प्रहार करता है और एक बार शत्रुघ्न को मूर्च्छित भी कर देता है, पर उसे मरा मानकर शूल लेने नहीं जाता, यही उसकी अन्तिम भूल बनती है। होश में आकर शत्रुघ्न वही विष्णु-रचित अमोघ बाण छोड़ते हैं और लवण मारा जाता है; शूल रुद्र के पास लौट जाता है।
समझने की कुंजी (अवधारणा): मधु-कैटभ-वध की कथा सृष्टि के आदि की है, जब विष्णु क्षीरसागर में शयन कर रहे थे। उसी आदि-अस्त्र का यहाँ पुनः प्रयोग यह दर्शाता है कि लवण-वध एक चक्र की पूर्णता है, वही दिव्य शक्ति जो सृष्टि के आरम्भ में अधर्म का संहार कर चुकी थी, अब फिर सक्रिय हुई।
मधुपुरी की स्थापना और राम-दर्शन का संकल्प
लवण के मारे जाने पर इन्द्र और अग्नि को आगे रखकर देवों ने तोषक शत्रुघ्न से मधुर वाणी में कहा, “हे पुरुषसिंह, सौभाग्य से आपकी विजय हुई और राक्षस मारा गया; हे सुव्रत, वर माँगिए। हम सब आपकी विजय चाहने वाले आए हैं; हमारा दर्शन निष्फल नहीं होगा।” हाथ जोड़कर शत्रुघ्न ने उत्तर दिया, “यह रमणीय, देवनिर्मित मधुपुरी (मधुरा) शीघ्र ही समृद्ध नगरी बन जाए, बस यही मेरा परम वर है।” देवों ने प्रसन्न होकर कहा, “ऐसा ही हो; यह सुन्दर नगरी निःसन्देह वीरों की सेना से युक्त शूरसेना नाम से प्रसिद्ध होगी।” यह कहकर देव स्वर्ग लौट गए।
महातेजस्वी शत्रुघ्न ने गंगा-तट से सेना मँगवाई। लवण-वध का समाचार सुनकर वह सेना शीघ्र आई, और शत्रुघ्न ने श्रावण मास में नगर-स्थापना आरम्भ की। वह दिव्य-कान्ति वाली, अर्धचन्द्र के आकार की, यमुना-तट पर शोभित नगरी बारह वर्षों में बस गई। शूरसेनों का यह राज्य निर्भय होकर स्थापित हुआ; खेत धान्य से भरे, इन्द्र समय पर वर्षा करते, और शत्रुघ्न के बाहु-संरक्षण में वीर-पुरुष नीरोग रहे। श्रेष्ठ भवनों, चौराहों और बाज़ार-वीथियों से सुशोभित, चार वर्णों से युक्त, अनेक व्यापारों से भरी यह नगरी समृद्ध हुई। लवण द्वारा पहले बनवाया श्वेत भवन शत्रुघ्न ने और सजाया; आराम-स्थलों, विहारों और मानवीय-दैवी अलंकरणों से नगरी चमक उठी।
नाना देशों से आए वणिकों और सभी प्रकार के पण्य (बिक्री-योग्य वस्तुओं) से सुशोभित उस अमरपुरी-सी नगरी को देखकर समृद्धार्थ शत्रुघ्न परम प्रसन्न हुए। बारहवें वर्ष में, मधुरा बसाकर, उनके मन में यह बुद्धि उत्पन्न हुई कि अब वे श्रीराम के चरणों के दर्शन करेंगे। रघुकुल-वंश-वर्धन शत्रुघ्न ने रघुपति के पाद-दर्शन का निश्चय किया।
सार: देवों के वर से शत्रुघ्न मधुरा (शूरसेना) नगरी की स्थापना का वरदान माँगते हैं। बारह वर्षों में समृद्ध नगरी बस जाती है, और तब शत्रुघ्न को श्रीराम के दर्शन की उत्कण्ठा जागती है।
वाल्मीकि के आश्रम में रामकथा का गान
बारहवें वर्ष में शत्रुघ्न ने थोड़े-से अनुचरों और सेना के साथ राम-पालित अयोध्या जाने की इच्छा की। मन्त्रियों और सेना-प्रमुखों को लौटाकर, वे एक श्रेष्ठ अश्व पर, सौ रथों के साथ चले। मार्ग में सात-आठ पड़ावों पर रुककर महायशस्वी शत्रुघ्न वाल्मीकि के आश्रम में पहुँचे और वहाँ निवास किया। मुनि वाल्मीकि के चरणों में प्रणाम कर उन्होंने पाद्य, अर्घ्य और आतिथ्य ग्रहण किया।
मुनि ने शत्रुघ्न को नाना प्रकार की सहस्रों मधुर कथाएँ सुनाईं, और लवण-वध की प्रशंसा करते हुए कहा, “हे महाबाहो, लवण को मारकर आपने अति-दुष्कर कार्य किया है। अनेक महाबली राजा लवण से युद्ध करते हुए सेना-वाहन सहित मारे गए, पर आपने उस पापी को लीला से मारा, और आपके तेज से जगत का भय शान्त हुआ। रावण का घोर वध श्रीराम ने महान यत्न से किया था, यह महाकर्म आपने अनायास कर दिखाया। मेरे हृदय में भी परम प्रीति है, हे शत्रुघ्न; मैं आपके मस्तक को सूँघूँगा, यही स्नेह की परम गति है।” ऐसा कहकर महामति वाल्मीकि ने शत्रुघ्न और उनके अनुचरों का आतिथ्य किया।
भोजन के पश्चात नरश्रेष्ठ शत्रुघ्न ने उस समय रामचरित (श्रीराम की लीला) का गान सुना, जो उत्तम गीत-माधुर्य से युक्त था, वीणा की लय से मिला हुआ, तीन स्थानों के स्वर-वैभव से सम्पन्न, तालबद्ध, संस्कृत में रचा हुआ, और लक्षण-युक्त था। उन्होंने श्रीराम के पूर्व किए कर्मों को क्रमशः गाया जाते सुना; वे अक्षर सत्य थे और जैसे घटित हुए थे वैसे ही क्रम से कहे गए थे। यह सुनकर पुरुषशार्दूल शत्रुघ्न नेत्रों में अश्रु भरकर, विसंज्ञ (अचेत) से हो गए और बार-बार गहरी साँसें भरते हुए एक मुहूर्त मूर्च्छित रहे।
उस गान में जो वर्तमान-सा घटित होता प्रतीत होता था, उसे सुनकर राजा के अनुचर सैनिक भी अवाक्, अधोमुख और दीन होकर “यह आश्चर्य है” कहने लगे। वे आपस में बोले, “यह क्या है, हम कहाँ हैं, क्या यह स्वप्न-दर्शन है? जो अर्थ हमने पहले देखा था, उसे ही इस आश्रम में पुनः देख-सुन रहे हैं। क्या स्वप्न में यह उत्तम गीत-रचना सुन रहे हैं?” अत्यन्त विस्मित होकर उन्होंने शत्रुघ्न से कहा, “हे नरश्रेष्ठ, कृपया मुनिपुंगव वाल्मीकि से पूछिए कि यह किसने रचा।” शत्रुघ्न ने कौतूहल-भरे सैनिकों से कहा, “इस प्रकार मैं वाल्मीकि से पूछ नहीं सकता; इस मुनि के आश्रम में अनेक आश्चर्य हैं, केवल कौतूहल से महामुनि से प्रश्न करना उचित नहीं।” ऐसा कहकर महर्षि को प्रणाम कर रघुनन्दन अपने निवास को लौट गए।
सार: लौटते समय शत्रुघ्न फिर वाल्मीकि के आश्रम में रुकते हैं और वहाँ वीणा-संगत में, ताल-स्वर-सहित गाई जाती रामकथा सुनकर अश्रुपूरित होकर मूर्च्छित हो जाते हैं। यह वही गान है जिसे आगे कुश और लव गाएँगे; पर अभी शत्रुघ्न श्रद्धावश पूछने का साहस नहीं करते।
एक उप-कथा: वाल्मीकि कहते हैं कि यह सम्पूर्ण रामकथा-युद्ध उन्होंने इन्द्र की सभा में बैठे हुए “यथावत” देखा था। यह संकेत है कि आदिकवि की दृष्टि घटनाओं के साक्षी-रूप थी; जो उन्होंने रचा वह कल्पना नहीं, दर्शन था, और यही “रामायण” के आदिकाव्य होने का आधार है।
अयोध्या में राम से मिलन
शयन करते हुए नरव्याघ्र शत्रुघ्न को निद्रा न आई; वे राम के उस अनुत्तम, अर्थगर्भित गान का चिन्तन करते रहे। वीणा की लय से युक्त उस मधुर स्वर को सुनते-सुनते रात्रि बीत गई। प्रभात में पूर्वाह्निक कर्म कर शत्रुघ्न ने हाथ जोड़कर वाल्मीकि से कहा, “भगवन, मैं रघुनन्दन श्रीराम के दर्शन करना चाहता हूँ; इन संशितव्रत (दृढ़व्रती) ऋषियों सहित आपकी अनुज्ञा चाहता हूँ।” वाल्मीकि ने शत्रुघ्न को आलिंगन कर विदा किया। मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम कर, सुप्रभ रथ पर चढ़कर, राम-दर्शन के उत्सुक शत्रुघ्न शीघ्र अयोध्या पहुँचे।

रमणीय नगरी में प्रवेश कर इक्ष्वाकु-नन्दन शत्रुघ्न उस राजभवन में गए जहाँ महाद्युति श्रीराम थे। मन्त्रियों के बीच विराजमान, पूर्णचन्द्र-मुख श्रीराम को, देवों के बीच सहस्रनयन इन्द्र की भाँति बैठे देखकर, तेज से जाज्वल्यमान उन महात्मा को प्रणाम कर, हाथ जोड़कर शत्रुघ्न ने सत्यपराक्रमी राम से कहा, “हे महाराज, आपने जो आज्ञा दी, वह सब मैंने किया; पापी लवण मारा गया और उसकी नगरी बसा दी गई। हे रघुनन्दन, ये बारह वर्ष मैंने आपके बिना बिताए; अब आपसे विरहित होकर रहने का उत्साह नहीं। हे काकुत्स्थ, मुझ पर कृपा कीजिए; जैसे मातृहीन बछड़ा, वैसे मैं चिरकाल दूर नहीं रह सकता।”
श्रीराम ने उन्हें आलिंगन कर कहा, “हे शूर, विषाद न कीजिए, यह क्षत्रिय का आचरण नहीं। हे राघव, अपने राज्य से दूर रहकर भी राजा हतोत्साह नहीं होते; क्षात्रधर्म के अनुसार प्रजा का पालन अवश्य करना है। हे नरश्रेष्ठ, समय-समय पर अयोध्या आकर मुझसे मिलते रहिए, और अपनी नगरी मधुरा भी जाइए। आप मुझे प्राणों से भी प्रिय हैं, इसमें सन्देह नहीं; पर राज्य का पालन अनिवार्य कर्तव्य है। इसलिए हे काकुत्स्थ, सात रात्रि मेरे साथ रहिए, फिर भृत्य-सेना-वाहन सहित मधुरा जाइए।” धर्मयुक्त, मनोनुकूल यह वचन सुनकर शत्रुघ्न ने दीन वाणी में “ऐसा ही हो” कहा।
राम की आज्ञा से सात रात्रि वहाँ बिताकर महाधनुर्धर शत्रुघ्न ने प्रस्थान की तैयारी की। सत्यपराक्रमी महात्मा राम तथा भरत और लक्ष्मण से विदा लेकर वे उत्तम रथ पर चढ़े। महात्मा लक्ष्मण और भरत दूर तक पैदल पीछे आए, और शत्रुघ्न शीघ्र मधुपुरी की ओर चल पड़े।
सार: शत्रुघ्न अयोध्या लौटकर श्रीराम को आज्ञा-पालन का समाचार देते हैं और बारह वर्ष के विरह की पीड़ा कहते हैं। श्रीराम उन्हें क्षात्रधर्म का स्मरण कराते हैं, सात रात्रि साथ रखकर पुनः मधुरा भेजते हैं।

ब्राह्मण का विलाप और मृत बालक
शत्रुघ्न को विदा कर श्रीराम दोनों भाइयों सहित धर्मपूर्वक राज्य का पालन करते हुए सुखी और प्रमुदित रहे। कुछ दिनों बाद अयोध्या का एक वृद्ध ब्राह्मण अपने मृत बालक का शव लेकर राजद्वार पर आया। स्नेह और दुःख से भरकर, रोते हुए, बार-बार “पुत्र, पुत्र” कहता हुआ वह विलाप करने लगा, “हाय पुत्र, मैंने पूर्वजन्म में कौन-सा दुष्कर्म किया कि अपने एकमात्र पुत्र को मृत देख रहा हूँ। यौवन को न पाए, मात्र पाँच हज़ार दिन के इस बालक का असमय काल आ गया, जो मेरे दुःख का कारण है। थोड़े ही दिनों में मैं और इसकी माता भी आपके शोक में मर जाएँगे। मुझे न कभी असत्य कहना स्मरण है, न किसी की हिंसा, न किसी प्राणी के प्रति पाप।”
“किस दुष्कर्म से मेरा बालक पितृ-कार्य (हमारे अन्तिम संस्कार) किए बिना ही वैवस्वत यम के लोक चला गया? ऐसी असमय, अपरिपक्व, घोरदर्शन मृत्यु न मैंने देखी, न सुनी। अकाल-मृत्यु तो राम के राज्य में होती ही नहीं। निःसन्देह श्रीराम का कोई महान दुष्कर्म होगा, जिससे उनके राज्य में बालकों की मृत्यु हो रही है। अन्य राज्यों में बालकों को मृत्यु का भय नहीं। हे राजन, इस मृत्यु-वश बालक को पुनर्जीवित कीजिए, अन्यथा मैं पत्नी सहित राजद्वार पर अनाथ-सा प्राण त्याग दूँगा, और हे राम, ब्रह्महत्या का पाप पाकर आप सुखी रहिए।”
“हे राजन, अब तक हम आपके राज्य में सुख से रहे, हे महाबली। पर अब इक्ष्वाकुओं का राज्य अनाथ-सा हो गया, जहाँ बालक की मृत्यु हो रही है। जो प्रजा विधिपूर्वक पालित नहीं होती, वह राजा के दोषों से नष्ट होती है; असद्वृत्त राजा के राज्य में जन असमय मरते हैं। नगर-जनपद में जो अनुचित कर्म होते हैं और उनसे रक्षा नहीं की जाती, तभी ऐसा काल-कृत भय आता है। यह स्पष्ट राज-दोष है, इसी से नगर और जनपद में यह बाल-वध हुआ है।” इस प्रकार बहुविध वचनों से राजा को बार-बार उपालम्भ (उलाहना) देता हुआ, दुःख से सन्तप्त वह ब्राह्मण अपने मृत पुत्र को आलिंगन करता रहा।
सार: रामराज्य में एक बालक की असमय मृत्यु होती है, और उसका पिता राजद्वार पर विलाप करते हुए इसे राजा के किसी दोष का परिणाम बताता है। वाल्मीकि की दृष्टि में राजा की धार्मिकता और प्रजा के जीवन का सीधा सम्बन्ध है, यही इस प्रसंग का मूल भाव है।
नारद का युग-धर्म-उपदेश
उस ब्राह्मण के करुण विलाप को दुःख-शोक सहित सुनकर श्रीराम ने सन्तप्त होकर अपने मन्त्रियों, वसिष्ठ, वामदेव, भाइयों और नैगमों को बुलाया। वसिष्ठ सहित आठ ब्राह्मण प्रविष्ट हुए और देवतुल्य राजा से “वृद्धि (कल्याण) हो” कहा। ये थे मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, काश्यप, कात्यायन, जाबालि, गौतम और नारद। मन्त्री और नैगम यथायोग्य आसनों पर बैठे। हाथ जोड़कर श्रीराम ने महर्षियों को बताया कि यह ब्राह्मण राजद्वार रोके खड़ा है। दीन राजा का वचन सुनकर नारद ने ऋषियों के समक्ष शुभ वाणी में कहा:
“हे राजन, सुनिए, यह बाल-मृत्यु असमय कैसे हुई, और जो करना उचित है वह कीजिए। प्राचीन कृतयुग में केवल ब्राह्मण ही तपस्वी थे; उस युग में अब्राह्मण कभी तप नहीं करते थे। वह युग ब्रह्म-तेज से प्रज्वलित था, अज्ञान-रहित था; सभी अमृत्यु (दीर्घजीवी) और दीर्घदर्शी जन्म लेते थे। फिर त्रेतायुग आया, जिसमें वपुष्मान (शरीरधारी) मनुष्यों में क्षत्रिय तप से युक्त होकर जन्मने लगे। पूर्वजन्म के वीर्य और तप में कृतयुग वाले श्रेष्ठ थे; त्रेता में ब्राह्मण और क्षत्रिय समान वीर्यवान हुए।”
“त्रेता में चार वर्णों की व्यवस्था सम्मत हुई। पर यहीं अधर्म ने एक पाद (पैर) से प्रवेश किया, और इसके पश्चात क्रमशः धर्म घटता जाएगा। पूर्वजों के लिए जो राजसिक ‘आमिष’ (कृषि आदि कर्म) था, उसे अनृत (निम्न, अनुशंसनीय नहीं) माना गया; वही कर्म त्रेता में अधर्म के एक पाद रूप में पृथ्वी पर दृढ़ हुआ। अनृत के एक पाद से जीवों की आयु पूर्व-निर्धारित और सीमित हुई। उस अनृत के स्थापित होने पर, सत्य-धर्म-परायण लोग शुभ कर्म ही करते रहे।”
“त्रेता में ब्राह्मण और क्षत्रिय ही तप करते थे; शेष जन सेवा (श्रुषा) करते थे। वैश्य और शूद्र को सेवा-धर्म मिला; शूद्र विशेषकर सभी वर्णों की पूजा करते थे। इसी बीच अधर्म और अनृत बढ़ा, और पुनः ह्रास हुआ। तब अधर्म ने पृथ्वी पर दूसरा पाद रखा, जिससे तीसरा युग द्वापर गिना गया। द्वापर में अधर्म और अनृत बढ़े। इस युग में तप ने वैश्यों में प्रवेश किया; इस प्रकार तीन युगों में तप क्रमशः तीन वर्णों में प्रविष्ट हुआ। शूद्र को इन युगों में तप का अधिकार नहीं मिला। भविष्य के कलियुग में शूद्र-योनि में तप होगा।”
“द्वापर में भी शूद्र का तप परम अधर्म माना जाता है; तो (अब त्रेता में) निश्चय ही आपके राज्य की किसी सीमान्त-प्रदेश में कोई दुर्बुद्धि शूद्र महातप कर रहा है, उसी से यह बाल-वध हुआ है। जो राजा के राज्य में अधर्म या अकार्य करता है और उसके नगर में रहता है, वह राज्य की समृद्धि का मूल नष्ट करता है, और वह राजा भी शीघ्र नरक जाता है, इसमें सन्देह नहीं। राजा प्रजा से अध्ययन, तप और सुकृत के फल का छठा भाग पाता है, फिर छठे भाग का भोक्ता प्रजा की रक्षा क्यों न करे? इसलिए हे पुरुषशार्दूल, अपने राज्य का अन्वेषण कीजिए; जहाँ दुष्कर्म दिखे वहाँ यत्न कीजिए। ऐसा करने से मनुष्यों में धर्म और आयु की वृद्धि होगी, और इस बालक का जीवन भी लौटेगा।”
सार: नारद युग-धर्म समझाते हैं: कृतयुग में केवल ब्राह्मण, त्रेता में क्षत्रिय, द्वापर में वैश्य और कलियुग में शूद्र तप के अधिकारी हैं। इस त्रेता में कोई शूद्र असमय तप कर रहा है, जो वर्ण-धर्म के विपरीत है, और यही बालक की अकाल-मृत्यु का कारण है। नारद राजा को राज्य का अन्वेषण कर इसे ठीक करने को कहते हैं।
समझने की कुंजी (अवधारणा): नारद धर्म को “वृषभ” (बैल) के रूपक से समझाते हैं, जिसके चार पाद कृतयुग में पूर्ण होते हैं, और प्रत्येक युग में एक पाद घटता जाता है, अनृत (असत्य) पहले, फिर अधर्म के और पाद। यही “चतुष्पाद धर्म” की प्राचीन अवधारणा है, जिससे युगों का क्रमिक ह्रास समझाया जाता है। यह सर्ग प्राचीन वर्णाश्रम-व्यवस्था का वही चित्र प्रस्तुत करता है जो उस इतिहास-काल का था।
पुष्पक पर अन्वेषण और तपस्वी का दर्शन
नारद के अमृततुल्य वचन सुनकर श्रीराम अतुल हर्ष को प्राप्त हुए और लक्ष्मण से बोले, “हे सौम्य सुव्रत, जाइए और उस द्विजश्रेष्ठ को आश्वस्त कीजिए; बालक के शरीर को तैल-द्रोणी (तेल के पात्र) में रखवाइए। परम उत्तम, सुगन्धित तैलों और गन्धों से ऐसा प्रबन्ध कीजिए कि बालक का शरीर क्षीण न हो, विकृत न हो, और अंग पृथक न हों।” इस प्रकार लक्ष्मण को आदेश देकर महायशस्वी काकुत्स्थ ने मन से पुष्पक का स्मरण किया, “हे यशस्वी, आओ।”
संकेत समझकर स्वर्ण-भूषित पुष्पक एक मुहूर्त में श्रीराम के समीप आ गया और प्रणत होकर बोला, “हे महाबाहो राजन, मैं उपस्थित हूँ, आपका वश्य किंकर।” पुष्पक के रुचिर वचन सुनकर श्रीराम महर्षियों को प्रणाम कर विमान पर चढ़े। धनुष, तूणीर और रुचिर-प्रभा वाली तलवार लेकर, लक्ष्मण और भरत दोनों को नगर में छोड़कर, अधर्म खोजते हुए वे इधर-उधर पश्चिम दिशा की हरीतिमा में गए, फिर हिमवान से आवृत उत्तर दिशा में पहुँचे। वहाँ भी रंचमात्र दुष्कर्म न देखकर पूर्व दिशा भी पूरी देखी, जो प्रविशुद्ध-आचार वाली, दर्पण-तल सी निर्मल थी।
तब राजर्षि-नन्दन श्रीराम दक्षिण दिशा की ओर बढ़े। शैवल पर्वत के उत्तरी पार्श्व में उन्होंने एक महान सरोवर देखा। उस सरोवर में, अधोमुख (सिर नीचे किए) लटकते हुए, महातप करते एक तापस को श्रीमान राघव ने देखा। उस उत्तम तप करते तापस के पास जाकर राजा ने कहा, “हे सुव्रत, आप धन्य हैं। हे दृढ़विक्रम, तप से वृद्ध, आप किस योनि (वर्ण) में हैं? कौतूहलवश पूछता हूँ; मैं दशरथ-पुत्र राम हूँ। आपका अभीष्ट क्या है, स्वर्ग-लाभ या कोई अन्य अर्थ, जिसके लिए आप यह दूसरों के लिए दुष्कर तप कर रहे हैं? जिस उद्देश्य से आपने तप किया, वह सुनना चाहता हूँ। आपका कल्याण हो; क्या आप ब्राह्मण हैं, या दुर्जय क्षत्रिय, या तृतीय वर्ण वैश्य, अथवा शूद्र? सत्य कहिए।”
राजा के इस प्रकार पूछने पर, अधोमुख उस तापस ने नृपपुंगव दशरथ-पुत्र से अपनी जाति और तप का कारण कहना आरम्भ किया।
सार: श्रीराम कुबेर के पुष्पक विमान पर चढ़कर समस्त दिशाओं में अधर्म खोजते हैं। उत्तर, पूर्व और पश्चिम में कुछ नहीं मिलता; दक्षिण में शैवल पर्वत के पास एक सरोवर में सिर नीचे किए तप करता एक तापस मिलता है। श्रीराम उससे उसकी जाति और तप का प्रयोजन पूछते हैं, और तापस उत्तर देने को होता है।
समझने की कुंजी (स्थान): पुष्पक वही दिव्य आकाशगामी विमान है जो कुबेर का था और रावण-वध के बाद श्रीराम को प्राप्त हुआ। “मन से स्मरण करते ही आ जाना” इसकी विशेषता है, यह संकल्प-संचालित था। शैवल पर्वत और उसके उत्तरी सरोवर का यह उल्लेख आगे की शम्बूक-कथा का रंगमंच तैयार करता है।
मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, उत्तरकाण्ड (गीता प्रेस गोरखपुर)।