अध्याय 29 · कर्ण-अर्जुन व कर्ण-वध

महाभारत · कर्ण पर्व
कर्ण और अर्जुन का अन्तिम महायुद्ध, कर्ण के रथ का पहिया धरती में धँसना, परशुराम और ब्राह्मण के शापों का फल, और कृष्ण के संकेत पर अर्जुन के बाण से कर्ण का वध।

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सूर्य आकाश के बीचों-बीच चढ़ चुका था और कुरुक्षेत्र की धूल में लहू की लाली घुल गई थी, जब अधिरथ के पुत्र कर्ण ने अपना धनुष विजय (वही पुराना, मन्त्रों से पुष्ट किया हुआ धनुष) उठाया और प्रत्यंचा को बार-बार रगड़ा। सत्रहवें दिन का तीसरा पहर था। पाण्डव सेना की पंक्तियाँ उसके बाणों के नीचे ऐसे टूट रही थीं जैसे आँधी में सरकण्डों का वन। पाञ्चाल, सोमक, चेदि, कैकेय (ये सब पाण्डवों के मित्र-गण थे) उसके सामने आकर ऐसे गिर रहे थे जैसे दीपक की लौ में पतंगे। और इसी प्रलय के बीच श्वेत अश्वों वाला वह रथ, जिसकी ध्वजा पर वानर बैठा था और जिसकी बागडोर स्वयं वासुदेव के हाथ में थी, धूल चीरता हुआ कर्ण की ओर बढ़ रहा था। यह उस अध्याय की कथा है जिसमें दो आजीवन वैरी अन्तिम बार आमने-सामने हुए, जिसमें धरती ने एक रथ का पहिया निगल लिया, जिसमें दो पुराने शाप एक ही दोपहर में फलित हुए, और जिसमें कृष्ण के संकेत पर अर्जुन के एक बाण ने वह सिर काट गिराया जिसे देवता भी अजेय मानते थे।

जब दोनों भाई आमने-सामने हुए

कथा यहाँ से उठती है कि अर्जुन अपने भाई धर्मराज युधिष्ठिर को शिविर में सकुशल देखकर लौटे थे। कर्ण के बाणों से जर्जर होकर महाराज युद्ध से हट गए थे, और एक क्षण के लिए उन्होंने यह समझ लिया था कि कर्ण मारा जा चुका। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि वह सूतपुत्र अब भी रणभूमि में जीवित है और पाञ्चालों को निगल रहा है, तो उन्होंने अर्जुन को कठोर वचन कह डाले। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि यदि अर्जुन कर्ण से नहीं लड़ सकते तो वे अपना गाण्डीव किसी और को दे दें।

कृष्ण तलवार उठाते अर्जुन की बाँह थामकर उन्हें रोक रहे हैं, आसपास योद्धा चिंतित देख रहे हैं

यह वचन अर्जुन के हृदय में विष की भाँति उतरा। उनकी एक गुप्त प्रतिज्ञा थी कि जो कोई उनसे यह कहे कि गाण्डीव किसी और को दे दो, वे उसका वध कर देंगे। बड़े भाई के मुख से वही वचन सुनकर अर्जुन ने क्रोध में तलवार खींच ली। तब कृष्ण ने, जो मनुष्य के हृदय की गति को जानते थे, उन्हें रोका। बोले, “हे पार्थ, यहाँ किसी से आपका युद्ध नहीं है। किस पर तलवार उठाते हैं?”

अर्जुन ने उत्तर दिया कि जो उनसे यह कहे, उसका सिर काटना उनका व्रत है, और इस व्रत को सत्य रखने के लिए वे युधिष्ठिर का वध करेंगे। यहाँ कृष्ण ने धर्म का वह सूक्ष्म रहस्य खोला जिसे महाभारत कभी सरल नहीं करता। उन्होंने कहा कि सत्य से बढ़कर कुछ नहीं, किन्तु सत्य का स्वरूप अत्यन्त गहन है। प्राण-संकट में, विवाह के समय, सर्वस्व-हरण के अवसर पर, और ब्राह्मण की रक्षा हेतु असत्य भी निर्दोष हो जाता है। जो मनुष्य सत्य और असत्य का भेद जाने बिना केवल शब्द का सत्य पकड़ता है, वह मूर्ख है। फिर उन्होंने व्याध बलाक और तपस्वी कौशिक की दो कथाएँ सुनाईं, जिनमें एक ने हिंसा करके भी स्वर्ग पाया और दूसरे ने सत्य बोलकर भी नरक।

कृष्ण बैठे अर्जुन को समझा रहे हैं, ऊपर कर्ण के जीवन और शापों के दृश्य उभरे हैं

एक उप-कथा: व्याध बलाक अपने पुत्रों और स्त्रियों के पालन हेतु पशु मारता था, द्वेष से नहीं। एक दिन उसने एक अन्धे हिंसक पशु को जल पीते देखकर मार डाला। उस पशु ने तप से ऐसा वर पाया था जिससे वह समस्त प्राणियों का संहारक बनने वाला था, इसी से उसे अन्धा कर दिया गया था। उसका वध करते ही बलाक पर आकाश से पुष्पवृष्टि हुई और वह स्वर्ग को गया। उधर तपस्वी कौशिक, जिसने सदा सत्य बोलने का व्रत लिया था, जब डाकुओं ने पूछा कि भयभीत मनुष्य किस ओर भागे, तो उसने सत्य कह दिया। डाकुओं ने उन्हें ढूँढकर मार डाला, और उस वाक्-दोष से कौशिक नरक में गिरा। कृष्ण इन कथाओं से यही कहना चाहते थे कि “जो रक्षा करता है, वही धर्म है”।

कृष्ण ने अर्जुन को एक उपाय बताया जिससे व्रत भी सत्य रहे और भाई भी जीवित। जो पूज्य पुरुष सदा सम्मान पाता आया हो, उसका अपमान कर देना उसे जीवित रहते हुए ही मार देने के समान है। इसलिए कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि वे युधिष्ठिर को, जिन्हें वे सदा आदर के साथ सम्बोधित करते आए हैं, इस बार वह आदर त्यागकर तिरस्कारपूर्ण वचन कह दें। ऐसा करने से व्रत पूरा हो जाएगा और भ्रातृहत्या का पाप भी न लगेगा।

अर्जुन ने ऐसा ही किया। उन्होंने युधिष्ठिर से कठोर शब्द कहे, जो उन्होंने पहले कभी न कहे थे। उन्होंने कहा कि जो दो कोस दूर युद्ध से हटकर बैठा है, उसे उन्हें उपालम्भ देने का अधिकार नहीं। यह अधिकार तो भीम का है, जो संसार के प्रबल वीरों से जूझ रहे हैं। उन्होंने स्मरण कराया कि महाराज ही द्यूत में हारे थे, उन्हीं के कारण सब वन गए, उन्हीं की दुर्बलता से यह सम्पूर्ण कुल विनाश की ओर बढ़ा। इतना कहकर अर्जुन का हृदय ग्लानि से भर गया और उन्होंने फिर तलवार खींची, इस बार अपने ही वध के लिए। कृष्ण ने उन्हें फिर रोका और कहा कि आत्म-वध भ्रातृ-वध से भी घोर नरक में डालता है। अपनी प्रशंसा अपने ही मुख से कह डालिए, यही आपका अपना वध होगा। अर्जुन ने वैसा किया, अपने पराक्रम का वर्णन किया, और इस प्रकार दोनों संकटों से उबर गए।

युधिष्ठिर शिविर में घुटने टेके दो योद्धाओं के सिरों पर आशीर्वाद का हाथ रखे खड़े हैं

अन्त में युधिष्ठिर का रोष शान्त हुआ। उन्होंने उठकर अर्जुन को गले लगाया, दोनों भाई बहुत देर तक रोते रहे, फिर शोक से मुक्त होकर पहले की भाँति प्रसन्न हो गए। महाराज ने आशीर्वाद दिया, “हे महाबाहु, जाइए और कर्ण का वध कीजिए, जैसे इन्द्र ने अपने ऐश्वर्य के लिए वृत्र का वध किया था।” अर्जुन ने सत्य की, युधिष्ठिर की कृपा की, भीम की और दोनों जुड़वाँ भाइयों की शपथ लेकर कहा कि आज वे या तो कर्ण को मारेंगे या स्वयं मारे जाकर धरती पर गिरेंगे।

सार: कर्ण-वध की भूमिका एक भाई के क्रोध और एक गुप्त प्रतिज्ञा से बँधी हुई है। कृष्ण युधिष्ठिर को अर्जुन के हाथों मरने से बचाते हैं, किन्तु उपाय निर्मल नहीं, आदर त्यागकर तिरस्कार करवाकर ही। महाभारत यहाँ धर्म को सपाट नहीं रखता, यहाँ सत्य भी परिस्थिति के अधीन है और रक्षा करना ही धर्म का गहरा-से-गहरा अर्थ है।

कृष्ण की चेतावनी और अर्जुन की प्रतिज्ञाएँ

रथ सजाया गया, श्वेत अश्व जोते गए, ब्राह्मणों ने मंगल-स्वस्तिवाचन किया, और अर्जुन उस उत्तम रथ पर चढ़े। जब वे कर्ण के रथ की ओर बढ़े तो दिशाएँ निर्मल हो गईं। मार्ग में कृष्ण ने उन्हें सावधान किया कि वे कर्ण को साधारण योद्धा न समझें। उन्होंने कहा, “हे पार्थ, मैं इस महारथी कर्ण को आपके समान, अथवा शायद आपसे भी बढ़कर मानता हूँ। तेज में वह अग्नि के समान है, वेग में वायु के, क्रोध में साक्षात् काल के। आठ रत्नि (एक रत्नि कोहनी से अँगुलियों के सिरे तक की माप, लगभग आधा हाथ) उसकी ऊँचाई है। बड़ी सावधानी और दृढ़ संकल्प से उसका वध करना।”

कृष्ण ने आगे स्मरण कराया कि यह सत्रहवाँ दिन है। भीष्म शरशय्या पर हैं, द्रोण मारे जा चुके हैं। उस विशाल धार्तराष्ट्र सेना के अब केवल पाँच महारथी शेष हैं, अश्वत्थामा, कृतवर्मा, कर्ण, शल्य और कृप। कृष्ण ने उन सब अन्यायों की सूची गिनाई जिनकी जड़ में कर्ण था, द्यूत के समय की कुटिलता, द्रौपदी के प्रति कहे गए कठोर वचन, अभिमन्यु के वध में उसका भाग, और लाक्षागृह में पाण्डवों को सोते हुए जला देने का षड्यन्त्र। उन्होंने कहा कि कर्ण के पास परशुराम से प्राप्त वह भार्गव अस्त्र है, जिसका भयंकर रूप अभी सम्पूर्ण सेना को झुलसा रहा है। उसी कर्ण को आज पार्थ अपने तीक्ष्ण बाणों से यमलोक भेज दें।

संध्याकालीन रणभूमि में कृष्ण उदास बैठे अर्जुन की बाँह पर हाथ रखे सांत्वना दे रहे हैं

समझने की कुंजी (पात्र): कर्ण को कथा कई नामों से पुकारती है। अधिरथ (सूत) का पालित पुत्र होने से वह “सूतपुत्र” और “अधिरथि” कहलाता है। राधा उसकी पालिका माता थीं, इससे “राधेय”। वैकर्तन सूर्य का नाम है, और कर्ण सूर्य का गुप्त पुत्र होने से “वैकर्तन” कहलाता है। “वृष” भी उसी का एक नाम है। ये सब एक ही व्यक्ति के विभिन्न नाम हैं।

अर्जुन ने कृष्ण के वचन सुनकर अपनी चिन्ता त्याग दी और गाण्डीव की प्रत्यंचा रगड़कर अनेक प्रतिज्ञाएँ कीं। उन्होंने कहा कि आज वे उस कर्ण का वध करेंगे जिसने भरी सभा में द्रौपदी से कहा था कि अब आपका कोई पति नहीं रहा, अब किसी और को वर लें। उन्होंने कहा कि आज उनके बाण उस वचन को मिथ्या कर देंगे। आज वे तेरह वर्ष से सँजोए शोक से मुक्त होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वे कर्ण की वह प्रतिज्ञा झुठलाएँगे जिसमें उसने कहा था कि जब तक अर्जुन जीवित है, वह अपने पैर नहीं धोएगा। इतना कहकर रक्त-रंजित नेत्रों वाले अर्जुन भीम को बचाने और कर्ण का सिर उसके धड़ से अलग करने के लिए वेग से युद्ध की ओर चले।

सार: कृष्ण कर्ण को छोटा नहीं आँकते। वे अर्जुन को चेताते हैं कि कर्ण उसके बराबर या उससे भी बढ़कर है, साथ ही उन सब अन्यायों की गाँठ खोलते हैं जो इस वैर के मूल में हैं। अर्जुन की प्रतिज्ञाएँ केवल पराक्रम की घोषणा नहीं, तेरह वर्ष के अपमान और शोक का बोझ हैं।

भीम का प्रलय और रणभूमि का मिलन

इधर भीमसेन अकेले ही कुरु सेना को पीस रहे थे। उन्होंने अपने सारथि विशोक से पूछा कि उनके रथ पर कितने बाण शेष हैं। विशोक ने गिनाया, साठ हज़ार सामान्य बाण, दस-दस हज़ार क्षुरप्र (छुरे के समान फलवाले) और भल्ल (चौड़े फलवाले) बाण, दो हज़ार नाराच, तीन हज़ार प्रदर, और इतने गदा, खड्ग, शक्ति, तोमर कि छह बैलों की गाड़ी पर भी न ढोए जा सकें। भीम ने प्रतिज्ञा की कि या तो वे आज अकेले समस्त कुरुओं को परास्त करेंगे या स्वयं रणभूमि में गिरेंगे।

तभी विशोक ने उल्लास से कहा कि वह गाण्डीव की भयंकर टंकार सुनें, वह वानर-ध्वजा देखें जो शत्रु-हाथियों के बीच लहरा रही है। उसने अर्जुन के मुकुट की चमक, देवदत्त शंख का घोष, और जनार्दन के हाथ में सुदर्शन चक्र की सूर्य-सी आभा का वर्णन किया। यह सुनकर भीम आनन्द से भर गए। उन्होंने प्रसन्न होकर विशोक को चौदह गाँव, सौ दासियाँ और बीस रथ देने का वचन दे डाला।

भीम ने ऐसा संहार मचाया कि वहाँ एक रुधिर-नदी बह निकली। उसमें रक्त जल था, रथ भँवर थे, हाथी मगर थे, मनुष्य मछलियाँ और अश्व शार्क के समान थे। कटे हुए बाहु उसमें साँपों की तरह बहते थे, मणि-रत्न उसकी धारा में लुढ़कते थे, जाँघें कंकड़ थीं और मज्जा कीचड़। जो वीर थे वे सरलता से उसे पार कर गए, जो भयभीत थे उनके लिए वह वैतरणी (यमलोक की ओर बहने वाली पुराणोक्त नदी) के समान दुस्तर थी। शकुनि ने भीम को रोकना चाहा, पर भीम ने उसके अश्व और सारथि मारकर, ध्वजा काटकर उसे रथहीन कर दिया, और शकुनि भागकर उलूक के रथ पर चढ़ गया।

अन्ततः अर्जुन का श्वेताश्व रथ भीम के समीप पहुँचा। गरुड़-जैसे वेग से दौड़ते अश्वों ने उस सेना को ऐसे मथ दिया जैसे तूफ़ान समुद्र को। दोनों भाई एक हुए। अब वह क्षण आ पहुँचा था जिसकी ओर सत्रह दिन का सम्पूर्ण युद्ध बढ़ता आ रहा था।

सार: भीम का अकेला पराक्रम पूरे युद्ध को थामे हुए है। रुधिर-नदी का चित्र महाभारत की उस शैली का है जो विजय को भी भयावह बनाकर दिखाता है। अर्जुन का भीम से मिलना दोनों मोर्चों को एक कर देता है, और कथा का केन्द्र अब कर्ण की ओर मुड़ जाता है।

कर्ण और अर्जुन का महायुद्ध आरम्भ होता है

सोमक चिल्ला उठे, “शीघ्र चलिए, अर्जुन, कर्ण को बेधिए, उसका सिर काट दीजिए।” उधर कौरव कर्ण को उकसा रहे थे कि वह अर्जुन को मारकर पाण्डवों को फिर वन भेज दे। पहले कर्ण ने अर्जुन को दस प्रबल बाणों से बेधा, अर्जुन ने उत्तर में दस तीक्ष्ण बाण उसके वक्ष के मध्य में मारे। दोनों ने एक-दूसरे को सुन्दर पंखों वाले बाणों से छलनी कर दिया, और प्रसन्न हृदय से एक-दूसरे की चूक खोजते हुए परस्पर टूट पड़े।

अर्जुन ने एक आग्नेय अस्त्र छोड़ा जिसने धरती, आकाश और दसों दिशाओं को अपने तेज से भर दिया, योद्धाओं के वस्त्र जलने लगे। कर्ण ने वरुणास्त्र से उस आग को बुझा दिया और मेघ खड़े करके दिशाओं को अन्धकार से ढक दिया। अर्जुन ने वायव्यास्त्र से वे मेघ छितरा दिए। इस प्रकार अस्त्र अस्त्र को काटते रहे। आकाश के देवता, सिद्ध और चारण यह द्वन्द्व देखने उतर आए। अप्सराएँ इन दोनों वीरों को पंखों से हवा कर रही थीं, स्वयं शक्र (इन्द्र) और सूर्य अपने-अपने पुत्र का मुख कोमलता से सहला रहे थे, क्योंकि अर्जुन इन्द्र के पुत्र थे और कर्ण सूर्य के।

कर्ण रथ पर बाण साधे हैं और तरकश में फन उठाए सर्प है, सामने अर्जुन का रथ है

एक उप-कथा: इसी समय एक पुराना वैर भीतर-भीतर जाग उठा। अश्वसेन नाम का एक नाग पाताल में रहता था। खाण्डव-दाह के समय अर्जुन ने उसकी माता को मार डाला था, और तभी से वह अर्जुन से बैर रखता था। इस युद्ध को देखकर वह आकाश में उठा और बाण का रूप धरकर चुपचाप कर्ण के तरकश में जा घुसा। कर्ण को इसका कुछ पता न था। जब कर्ण ने अपना वह एक अमोघ, सर्प-मुख वाला, चन्दन-धूलि में बरसों सँभालकर रखा बाण प्रत्यंचा पर चढ़ाया, तो दिशाएँ जल उठीं और उल्काएँ गिरने लगीं। शल्य ने सावधान किया, “हे कर्ण, यह बाण अर्जुन का सिर नहीं काट पाएगा, कोई दूसरा बाण साधिए।” पर कर्ण ने रोष से उत्तर दिया, “कर्ण एक ही बाण को दो बार नहीं साधता। हम-जैसे लोग कुटिल योद्धा नहीं होते।” यह कहकर उसने वह बाण छोड़ दिया।

वह बाण आकाश में अग्नि-सा दीप्त होकर ऐसे चला मानो स्त्री के सिर की माँग खींच रहा हो। तभी कंस-घातक मधुसूदन ने अपने पैरों से रथ को इतने वेग से दबाया कि वह एक हाथ धरती में धँस गया। श्वेत अश्व घुटने टेककर भूमि पर बैठ गए। इस कारण वह सर्प-बाण अर्जुन का सिर न काट सका, केवल उनके मस्तक का वह दिव्य मुकुट उड़ा ले गया जिसे स्वयं ब्रह्मा ने पुरन्दर के लिए बनाया था और इन्द्र ने अर्जुन को दिया था। मुकुट पृथ्वी पर अस्ताचल से गिरते सूर्य-बिम्ब की भाँति गिरा। मुकुट-विहीन श्याम-वर्ण अर्जुन ने अपनी अलकें श्वेत वस्त्र से बाँध लीं और निश्चल खड़े रहे।

कर्ण हाथ बढ़ाकर दूर खड़े अर्जुन के रथ से कुछ कह रहे हैं, पास विशाल सर्प फन उठाए है

वह नाग अर्जुन का मुकुट जलाकर लौटा और कर्ण से बोला कि उसने उसे बिना देखे छोड़ दिया, इसी से लक्ष्य चूका, अब उसे फिर साधे। कर्ण ने उसका परिचय पूछा। नाग ने अपना वैर बताया। कर्ण ने दृढ़ता से उत्तर दिया, “कर्ण आज दूसरे के बल पर विजय नहीं चाहता। चाहे सौ अर्जुनों को मारना पड़े, मैं एक ही बाण दो बार नहीं छोड़ूँगा। आप सुखी रहें, अन्यत्र चले जाइए।” तब वह नाग स्वयं बाण-रूप धरकर अर्जुन की ओर बढ़ा। कृष्ण ने अर्जुन को सावधान किया, और अर्जुन ने छह तीक्ष्ण बाणों से उस नाग को आकाश में ही काट गिराया।

सार: अश्वसेन का प्रसंग बताता है कि कर्ण की पराजय में अकेला अर्जुन का बल नहीं, अनेक धागे बुने हुए हैं, एक पुराना खाण्डव-वैर, कृष्ण की तत्परता, और कर्ण की अपनी ऋजुता भी। कर्ण का “एक बाण दो बार नहीं” वाला हठ उसका गुण भी है और उसी क्षण उसकी क्षति भी। कृष्ण द्वारा रथ को धँसाकर अर्जुन को बचाना नियम का सीधा पालन नहीं, यह कथा उसे छिपाती नहीं।

अस्त्रों का अन्तहीन द्वन्द्व

नाग के कटते ही कृष्ण ने अपनी भुजाओं से वह धँसा हुआ रथ धरती से उठा लिया। कर्ण ने तिरछी दृष्टि से कृष्ण को दस बाणों से बेधा। अर्जुन ने उत्तर में कर्ण को बारह बाणों से बेधकर एक ऐसा बाण छोड़ा जो उसका कवच चीरकर, उसका रक्त पीकर, पंखों तक रुधिर में भीगकर धरती में समा गया। कर्ण ने भी छड़ी से पिटे साँप की भाँति क्रुद्ध होकर जनार्दन को बारह और अर्जुन को निन्यानवे बाणों से बेधा।

अर्जुन ने तब नब्बे बाण छोड़े, हर एक काल-दण्ड के समान। कर्ण पर्वत की भाँति काँप उठा। अर्जुन ने उसका रत्नजटित शिरस्त्राण और कुण्डल काटकर धरती पर गिरा दिए, और क्षण-भर में उसका वह उत्तम कवच भी अनेक टुकड़ों में काट डाला जिसे अनेक शिल्पियों ने बरसों परिश्रम से गढ़ा था। कवच-हीन कर्ण को अर्जुन ने चार तीक्ष्ण बाणों से बेधा, और कर्ण को ऐसी पीड़ा हुई जैसे वात-पित्त-कफ और ज्वर से ग्रस्त रोगी को।

एक क्षण के लिए कर्ण अपना धनुष और तरकश छोड़कर निश्चल, मूर्च्छित-सा, हाथों की पकड़ ढीली किए खड़ा रह गया। धर्मनिष्ठ अर्जुन ने ऐसी दशा में पड़े शत्रु पर प्रहार करना उचित न समझा। तब कृष्ण ने उत्तेजना से कहा, “हे पाण्डुपुत्र, यह विस्मृति क्यों? बुद्धिमान लोग दुर्बल शत्रु को भी एक क्षण के लिए नहीं छोड़ते। संकट में पड़े शत्रु को मारकर मनुष्य पुण्य और यश दोनों पाता है। विलम्ब मत कीजिए।” अर्जुन ने “ऐसा ही हो, कृष्ण” कहकर फिर कर्ण को अनेक बाणों से बेधना आरम्भ किया।

धँसे रथ पर खड़े कर्ण धनुष तानकर बाण छोड़ रहे हैं, सामने अर्जुन के तेजस्वी बाण आ रहे हैं

कर्ण ने सँभलकर ब्रह्मास्त्र का आह्वान किया। अर्जुन ने ऐन्द्र अस्त्र से उत्तर दिया। कर्ण ने तीक्ष्ण बाणों से अर्जुन की प्रत्यंचा काट दी, फिर दूसरी, तीसरी, चौथी, इस प्रकार ग्यारह प्रत्यंचाएँ क्रम से काटीं। पर बाण चलाने में निपुण कर्ण यह न जानता था कि अर्जुन के पास सौ प्रत्यंचाएँ हैं। अर्जुन इतनी शीघ्रता से प्रत्येक टूटी डोरी बदल लेते कि कर्ण यह जान ही न पाता कि वह कब टूटी और कब बदली गई। यह कौशल उसे आश्चर्यजनक लगा।

सार: यह द्वन्द्व किसी एक के स्पष्ट प्रभुत्व का नहीं। कभी कर्ण आगे, कभी अर्जुन। अर्जुन का सौ प्रत्यंचाओं वाला धैर्य और कर्ण का बार-बार सँभलना, दोनों समान-शक्ति दिखाते हैं। अर्जुन का दुर्बल शत्रु पर प्रहार न करना और कृष्ण का उन्हें टोकना, यह तनाव भी कथा बनाए रखती है।

दो शाप एक ही दोपहर में फलित होते हैं

अब वह घड़ी आ पहुँची जो कर्ण के लिए ठहरी हुई थी। काल अदृश्य रूप से समीप आया और उस ब्राह्मण के शाप की ओर संकेत करते हुए, मानो कर्ण को सूचित करता हुआ कि उसकी मृत्यु निकट है, बोला, “धरती आपका पहिया निगल रही है।” और सचमुच, उसी क्षण कर्ण को वह उच्च ब्रह्मास्त्र विस्मृत हो गया जो भार्गव परशुराम ने उसे सिखाया था, और धरती उसके रथ का बायाँ पहिया निगलने लगी।

एक उप-कथा: ये दो शाप कर्ण ने स्वयं अपने जीवन में अर्जित किए थे। एक उसके गुरु परशुराम का था। कर्ण ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर उनसे ब्रह्मास्त्र सीखा था, क्योंकि वे क्षत्रियों को विद्या नहीं देते थे। एक दिन गुरु उसकी जाँघ पर सिर रखकर सोए थे, तभी एक कीड़ा कर्ण की जाँघ खाने लगा, पर गुरु की निद्रा भंग न हो, इस भय से कर्ण पीड़ा सहता रहा। रक्त की धारा से गुरु जागे और समझ गए कि इतनी पीड़ा कोई ब्राह्मण नहीं सह सकता, यह क्षत्रिय है। तब परशुराम ने शाप दिया कि छल से पाई गई वह विद्या ठीक उसी घड़ी विस्मृत हो जाएगी ठीक उस घड़ी जब उसे उसकी परम आवश्यकता होगी। दूसरा शाप एक ब्राह्मण का था, जिसकी गाय कर्ण के बाण से अनजाने में मारी गई थी। उस ब्राह्मण ने शाप दिया था कि जिस प्रकार उसकी निरपराध गाय असहाय अवस्था में मारी गई, उसी प्रकार युद्ध के निर्णायक क्षण में कर्ण के रथ का पहिया धरती में धँस जाएगा और वह असहाय हो जाएगा। आज दोनों शाप एक ही दोपहर में आ मिले।

घायल कर्ण धँसे पहिये के पास घुटनों पर हाथ फैलाए हैं, पीछे अर्जुन धनुष ताने खड़े हैं

ब्राह्मण के शाप से कर्ण का रथ डगमगाने लगा, धरती में गहरा धँसकर वह ऐसे जड़ हो गया जैसे पुष्पभार से लदा कोई पवित्र वृक्ष ऊँचे चबूतरे पर खड़ा हो। परशुराम से पाया हुआ अस्त्र अब भीतर के प्रकाश से उसमें प्रकट न हुआ, उसका सर्प-मुख बाण भी अर्जुन काट चुके थे। कर्ण विषाद से भर गया। इन सब विपत्तियों को न सह सकने के कारण उसने अपनी भुजाएँ हिलाते हुए धर्म को कोसना आरम्भ किया, “धर्म के ज्ञाता सदा कहते हैं कि धर्म धर्मियों की रक्षा करता है। हम तो यथाशक्ति धर्म का ही पालन करते आए, फिर वही धर्म आज हमारी रक्षा करने के स्थान पर हमारा नाश कर रहा है। इससे मैं समझता हूँ कि धर्म सदा अपने उपासकों की रक्षा नहीं करता।”

तभी कर्ण ने एक भयंकर बाण साधा। उसके चढ़ते ही धरती अपने पर्वतों, जल और वनों सहित काँप उठी, प्रचण्ड वायु कंकड़ बरसाने लगी, दिशाएँ धूल से भर गईं और देवता आकाश में शोक करने लगे। सूर्य-पुत्र की भुजाओं से छूटा वह शक्र के वज्र-तुल्य तेज वाला बाण अर्जुन के वक्ष पर ऐसे आ पड़ा जैसे साँप बाँबी में घुसता हो। अर्जुन गहरी चोट खाकर डगमगा गए, उनकी पकड़ ढीली पड़ी, गाण्डीव हाथ से छूट गया, वे भूकम्प में पर्वतराज की भाँति काँप उठे।

कर्ण धरती में धँसे रथ के पहिये को हाथों से निकाल रहे हैं, दूर कृष्ण और अर्जुन का रथ है

उसी अवसर को पाकर महारथी वृष ने अपने धँसे हुए पहिये को निकालने की चेष्टा में रथ से नीचे कूदकर दोनों भुजाओं से उसे पकड़ा और ऊपर खींचने लगा। उसके बल से वह धरती, जिसने पहिया निगला था, अपने सात द्वीपों, पर्वतों, जलाशयों और वनों सहित चार अंगुल ऊपर उठ आई, पर पहिया न निकला, क्योंकि नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। पहिया धँसा देखकर कर्ण ने रोष से अश्रु बहाए और अर्जुन को देखकर बोला।

समझने की कुंजी (अवधारणा): भार्गव अर्थात् भृगुवंशी परशुराम। ब्रह्मास्त्र को मन्त्रों से सिद्ध करना पड़ता था और उसका स्मरण ही उसकी कुंजी थी। परशुराम के शाप का मर्म यही था कि अन्तिम घड़ी में कर्ण को वह मन्त्र ही याद न रहे। दोनों शाप कोई बाहरी दुर्भाग्य नहीं, कर्ण के अपने किए के फल हैं, और महाभारत इन्हें ठीक उस क्षण फलित दिखाता है जब वे परम मार्मिक होते हैं।

सार: कर्ण की मृत्यु एक ही क्षण में अनेक धागों के खिंचने से होती है, ब्रह्मास्त्र का विस्मरण, पहिये का धँसना, सर्प-बाण का कट जाना। कर्ण का धर्म को कोसना उसकी पीड़ा का गहरा-से-गहरा मानवीय स्वर है। ध्यान रहे, उसी समय उसका बाण अर्जुन को भी मूर्च्छा के कगार तक ले आता है, यह एकतरफ़ा विजय नहीं।

धर्म की दुहाई और कृष्ण का उत्तर

कर्ण ने कहा, “हे पार्थ, हे पार्थ, एक क्षण ठहर जाइए, जब तक मैं यह धँसा पहिया निकाल लूँ। मेरे रथ का बायाँ पहिया दैववश धरती ने निगल लिया है, ऐसे में आप यह कायरों योग्य विचार त्याग दीजिए। श्रेष्ठ वीर बिखरे केशों वाले पर, युद्ध से मुख फेरे हुए पर, ब्राह्मण पर, हाथ जोड़े हुए या शरण माँगते हुए पर, अस्त्र रखे हुए पर, और जिसके बाण समाप्त हो चुके हों या कवच हट गया हो, उस पर बाण नहीं चलाते। आप संसार के बहादुर पुरुष हैं, धर्माचरण वाले हैं, युद्ध के नियमों के ज्ञाता हैं। इसलिए जब तक मैं अपना पहिया निकालूँ, क्षमा कीजिए। आप रथ पर स्थित हैं और मैं धरती पर दुर्बल खड़ा हूँ, ऐसे में मुझे मारना आपको शोभा नहीं देता।”

कृष्ण उँगली उठाकर घायल कर्ण से कठोर सत्य कह रहे हैं, ऊपर द्यूतसभा और चक्रव्यूह के दृश्य उभरे हैं

तब रथ पर खड़े वासुदेव ने कर्ण को उत्तर दिया, और महाभारत यहाँ अपना परम तीखा स्वर खोलता है। कृष्ण बोले, “हे राधेय, बड़े सौभाग्य की बात है कि आपको धर्म का स्मरण आया। प्रायः देखा गया है कि नीच पुरुष जब संकट में पड़ते हैं तो भाग्य को कोसते हैं, अपने कुकर्मों को नहीं। जब आपने, सुयोधन, दुःशासन और शकुनि ने एक वस्त्र में लिपटी द्रौपदी को भरी सभा में घसीटवाया था, तब यह आपका धर्म कहाँ था? जब शकुनि ने छल के द्यूत में युधिष्ठिर को जीता, तब यह धर्म कहाँ था? जब आपके परामर्श से भीम को विष और सर्पों से मारने का यत्न हुआ, तब कहाँ था? जब वारणावत में लाक्षागृह में सोते पाण्डवों को जलाने की चेष्टा हुई, तब यह धर्म कहाँ था? जब रजस्वला और अल्प-वस्त्रा द्रौपदी सभा में खड़ी थी और आपने उससे कहा कि पाण्डव नष्ट हो गए, अब दूसरा पति वर लो, तब यह धर्म कहाँ था? जब अनेक महारथियों ने बालक अभिमन्यु को घेरकर मारा, तब यह धर्म कहाँ गया था? जो धर्म उन अवसरों पर कहीं नहीं था, उसे अब तालू सुखाकर पुकारने से क्या लाभ? आज आप धर्म की बात करते हैं, पर आप जीवित नहीं बचेंगे।”

इन वचनों को सुनकर कर्ण ने लज्जा से सिर झुका लिया और कोई उत्तर न दिया। पर क्रोध से उसके अधर काँप उठे और उसने धनुष उठाकर पार्थ से युद्ध जारी रखा। तब कृष्ण ने अर्जुन से कहा, “हे महाबाहु, किसी दिव्य अस्त्र से कर्ण को बेधकर गिरा दीजिए।” कृष्ण द्वारा गिनाए गए उन सब प्रसंगों को स्मरण कर अर्जुन क्रोध से जल उठे, उनके रोम-रोम से मानो अग्नि की लपटें निकलने लगीं।

सार: यह वह क्षण है जहाँ महाभारत की नैतिक जटिलता अपने चरम पर है। कर्ण का धर्म-निवेदन सर्वथा निराधार नहीं, युद्ध के नियम सचमुच ऐसे ही हैं। पर कृष्ण उत्तर देते हैं कि जिसने इन्हीं नियमों को बार-बार रौंदा, वह अन्तिम क्षण में उनकी ओट नहीं ले सकता। कथा न कर्ण को निर्दोष बनाती है, न उसकी पीड़ा को झुठलाती है।

कृष्ण का संकेत और कर्ण का वध

कर्ण ने फिर ब्रह्मास्त्र का आह्वान कर बाण बरसाए और रथ निकालने का यत्न करता रहा। अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र से उत्तर दिया। फिर कुन्तीपुत्र ने आग्नेय अस्त्र छोड़ा, कर्ण ने वरुणास्त्र से उसे बुझाया और मेघ खड़े करके दिशाओं को अन्धकार से ढक दिया। अर्जुन ने वायव्यास्त्र से वे मेघ हटा दिए। तब कर्ण ने पाण्डुपुत्र के वध हेतु अग्नि-सा एक भयंकर बाण उठाया। उसके चढ़ते ही धरती काँपी, प्रचण्ड वायु बही, दिशाएँ धूल से भर गईं और देवता आकाश में शोक करने लगे। वह शक्र-वज्र-तुल्य बाण अर्जुन के वक्ष पर आ पड़ा। अर्जुन डगमगा गए और गाण्डीव उनके हाथ से छूट गया।

उसी अवसर को पाकर वृष अपना धँसा पहिया निकालने रथ से कूद पड़ा। उसने दोनों भुजाओं से पहिया पकड़कर उसे खींचने का बहुत यत्न किया, पर महाबली होते हुए भी, नियति के कारण, वह असफल रहा। इधर मुकुट-धारी अर्जुन ने अपने होश सँभालकर काल-दण्ड-सा एक बाण उठाया, जिसका नाम अञ्जलिक था। तब वासुदेव ने अर्जुन से कहा, “अपने इस शत्रु वृष का सिर अपने बाण से काट दीजिए, इससे पहले कि वह अपने रथ पर चढ़ पाए।”

यही कृष्ण का वह संकेत था। शत्रु का पहिया अभी धँसा ही था कि अर्जुन ने पहले एक तीक्ष्ण क्षुरप्र बाण से कर्ण की वह ध्वजा काट गिराई जिस पर हाथी की रस्सी का चिह्न था, जो सोने, मोती और रत्नों से जड़ी, कुशल शिल्पियों द्वारा गढ़ी, सूर्य-सी देदीप्यमान थी और जो सदा कौरव सेना का साहस और शत्रु का भय बढ़ाती थी। उस ध्वजा के गिरते ही मानो कुरुओं का यश, गर्व, विजय की आशा और हृदय भी गिर पड़े, और “हाय, हाय” की चीत्कारें उठीं।

अर्जुन कान तक प्रत्यंचा खींचकर तेजस्वी बाण साध रहे हैं, बादलों में ऋषि और एक शोकाकुल मुख दिखते हैं

फिर अर्जुन ने तरकश से वह उत्तम अञ्जलिक अस्त्र निकाला, जो इन्द्र के वज्र या अग्नि-दण्ड के समान था और सहस्र-किरण सूर्य की आभा वाला था। वह मर्म-भेदी, रक्त-मांस से लिप्त, मनुष्य-अश्व-हाथियों का संहारक, सीधी गति वाला, तीन हाथ और छह फुट लम्बा बाण समस्त प्राणियों के लिए भयंकर था। उसे हाथ में लेते ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड चराचर सहित काँप उठा, और ऋषि ऊँचे स्वर में पुकार उठे, “विश्व का कल्याण हो।”

अर्जुन ने उस अद्वितीय बाण को गाण्डीव पर चढ़ाकर कहा, “यदि मैंने कभी तप किया हो, अपने गुरुजनों को प्रसन्न किया हो, और हितैषियों के वचन सुने हों, तो यह बाण शीघ्र मेरे शत्रु के शरीर और हृदय का नाश करे। उसी सत्य से यह मेरे शत्रु कर्ण का वध करे।” इतना कहकर अर्जुन ने वह बाण छोड़ दिया, जिसे साक्षात् मृत्यु भी युद्ध में सह न सके।

कर्ण के गिरे शरीर से तेजोमय ज्योति सूर्य की ओर उठ रही है, पास दुर्योधन शोक में झुके हैं

उस सूर्य-तेज वाले बाण ने सब दिशाओं को आलोकित कर दिया, और जैसे इन्द्र ने वज्र से वृत्र का सिर काटा था, वैसे ही इन्द्र-पुत्र ने उस अपराह्न में वैकर्तन का सिर धड़ से अलग कर दिया। कर्ण का धड़ धरती पर गिर पड़ा। उदित सूर्य और शरद के मध्याह्न-सूर्य के समान कान्ति वाला उसका सिर पृथ्वी पर ऐसे गिरा जैसे अस्ताचल से रक्तिम बिम्ब वाला सूर्य ढल जाए। वह सिर अपने सुन्दर, ऐश्वर्य में पले शरीर को ऐसी अनिच्छा से छोड़ रहा था जैसे कोई स्वामी अपने धन-भरे विशाल भवन को छोड़ता हो। प्रत्येक घाव से रक्त बहाता हुआ कर्ण का ऊँचा धड़, वर्षा के बाद रुधिर-धारा बहाते लाल खड़िया-पर्वत के शिखर की भाँति गिरा। तब उसके गिरे शरीर से एक ज्योति निकलकर आकाश को चीरती हुई सूर्य में जा समाई, यह अद्भुत दृश्य कर्ण के गिरने के बाद सबने देखा।

पाण्डवों ने, कृष्ण और अर्जुन ने हर्ष से शंख फूँके। सोमक आनन्द से उछल पड़े, उन्होंने तुरही बजाई, भुजाएँ और वस्त्र लहराए, एक-दूसरे को आलिंगन कर नाचने लगे और पुकार उठे, “बड़े सौभाग्य से कर्ण धरती पर बेधा हुआ पड़ा है।” कर्ण का कटा सिर तूफ़ान से ढहे पर्वत-शिखर-सा, यज्ञ के बाद बुझी अग्नि-सा, अस्त हुए सूर्य-बिम्ब-सा सुन्दर दिखता था। बाणों को किरणें बनाकर शत्रु-सेना को झुलसाने वाला वह कर्ण-सूर्य अन्ततः अर्जुन-रूपी काल के द्वारा अस्ताचल को पहुँचा दिया गया। कर्ण की मृत्यु का समय उस दिन का अपराह्न था। ध्वजा से रहित उस रथ को देखकर कौरव सेना भयभीत होकर रणभूमि से भाग चली, बार-बार पीछे मुड़कर अर्जुन की उस ऊँची ध्वजा को देखती हुई जो उसके यश से दीप्त थी।

सार: कर्ण इन्हीं नियमों की दुहाई देते हुए मारा जाता है जिनकी उसने सभा में उपेक्षा की थी, और मारा जाता है उसी असहाय अवस्था में जिसका शाप उसे मिला था। कृष्ण का संकेत और अर्जुन का अञ्जलिक, दोनों मिलकर सत्रह दिन से सँजोए वैर का अन्त करते हैं। महाभारत इस विजय को न पूर्ण हर्ष से रंगता है, न पूर्ण शोक से, कर्ण-सूर्य का अस्त एक साथ उल्लास और करुणा दोनों जगाता है।

रक्त की नदी और दोनों भाइयों का प्रचण्ड वेग

उस दिन की दोपहर ढल चुकी थी, और रणभूमि पर वह घड़ी आ पहुँची थी जिसकी ओर अठारह दिनों का सारा युद्ध बहता आ रहा था। संजय धृतराष्ट्र से कह रहे हैं, और उनकी वाणी में वह काँपती हुई गम्भीरता है जो किसी प्रत्यक्षदर्शी के स्वर में ही हो सकती है।

हे राजन्, आपके पक्ष के बड़े-बड़े रथी, बाघों के समान पराक्रमी, मृत्यु का भय छोड़कर एक साथ अर्जुन पर टूट पड़े। पर अर्जुन ने उन कौरव सेनापतियों के दल को वैसे ही तितर-बितर कर दिया जैसे आँधी घने बादलों के पुंज को उड़ा ले जाती है। वे महान् धनुर्धर, सब-के-सब प्रहार में निपुण, अनेक रथों के साथ अर्जुन की ओर बढ़े और तीखे बाणों से उन्हें बेधने लगे। तब अर्जुन ने अपने बाणों से हज़ारों रथ, हाथी और घोड़े यमलोक भेज दिए। उन्होंने युद्ध में चार सौ वीर रथियों को, जो पूरी शक्ति से लड़ रहे थे, अपने पैने बाणों से मार गिराया। शेष चारों ओर भागे, और उनके भागने से जो कोलाहल उठा वह वैसा था जैसे समुद्र की लहरें किसी शिला से टकराकर गरजती हैं।

उस सेना को भयभीत करके अर्जुन सूतपुत्र (कर्ण; सूत वर्णसंकर सारथि-जाति, उसी का पुत्र) के दल की ओर बढ़े। उनका गर्जन ऐसा था मानो प्राचीन काल में गरुड़ साँपों पर झपटते समय करते थे। यह सुनकर भीमसेन, जो बहुत समय से पार्थ (पृथा अर्थात् कुन्ती का पुत्र, अर्जुन) के दर्शन की प्रतीक्षा में थे, हर्ष से भर उठे। पवन के समान वेग वाले वायुपुत्र भीम युद्ध में वायु की ही भाँति विचरने लगे। उनसे पीड़ित आपकी सेना समुद्र के वक्ष पर टूटी हुई नौका के समान डगमगाने लगी।

दुर्योधन ने यह देखकर अपने सब राजाओं और धनुर्धरों को आज्ञा दी कि भीम को मार डालो, क्योंकि भीम के गिरते ही वह पाण्डव-सेना को नष्ट हुई मान लेता था। पुत्र की आज्ञा पाकर सब राजाओं ने भीम को चारों ओर से बाणों की वर्षा में ढक लिया। अनगिनत हाथी, विजय की इच्छा रखने वाले मनुष्य, रथ और घुड़सवार वृकोदर (भेड़िये के समान उदर वाला, भीम का नाम) को घेरकर खड़े हो गए। उन वीरों से घिरे हुए भीम तारों से घिरे चन्द्रमा के समान शोभा पा रहे थे। उन सब राजाओं ने क्रोध से लाल आँखें किए हुए वृकोदर पर बाण-वृष्टि की।

भीम उस विशाल सेना में से ऐसे निकल आए जैसे मछली जाल को चीरकर निकल जाती है। उन्होंने दस हज़ार न लौटने वाले हाथी, दो लाख दो सौ मनुष्य, पाँच हज़ार घोड़े और सौ रथी मार गिराए। इन सबका वध करके भीम ने वहाँ रक्त की एक नदी बहा दी। रक्त ही उसका जल था, और रथ उसके भँवर। हाथी उसमें घड़ियाल थे, मनुष्य मछलियाँ और घोड़े मगर। पशुओं के बाल उसके वन और काई बने। धड़ों से कटी हुई भुजाएँ उसमें भयानक साँपों के समान तैर रही थीं। अनगिनत रत्न और मणियाँ उसकी धारा में बहती जाती थीं। जाँघें उसकी बजरी थीं और मज्जा (हड्डी के भीतर का चिकना पदार्थ) उसका कीचड़। कटे हुए सिर उसकी चट्टानें बने। छत्र और ध्वजाएँ उसके हंस थीं, और शिरस्त्राण उसका फेन। हार उसके कमल थे। जो शूर थे वे उसे सहज ही पार कर जाते, पर जो डरपोक और भयभीत थे उनके लिए वह पार करना कठिन था। वह नदी यमलोक की ओर बहती जा रही थी, मानो वैतरणी (पुराणों की वह नदी जो जीवित और मृत के लोकों को अलग करती है) ही प्रकट हो गई हो।

समझने की कुंजी (संख्याएँ): व्यास की कथा में संख्याएँ अतिशयोक्ति की भाषा हैं, गिनती की नहीं। “दो लाख दो सौ मनुष्य”, “दस हज़ार हाथी”, ये किसी सेना-गणक का लेखा नहीं, उस अनुभव को नापने का प्रयास हैं जिसमें संहार इतना विशाल था कि गिना ही न जा सके। आधुनिक पाठक इन्हें “असंख्य”, “अगणित” पढ़े। मूल का घनत्व बना रहे, इसलिए हम संख्याएँ ज्यों-की-त्यों रख रहे हैं।

यह देखकर दुर्योधन ने शकुनि से कहा कि मामा, इस भीम को जीत लीजिए, इसके हारते ही पाण्डव-सेना हारी हुई मान ली जाएगी। सुबल-पुत्र शकुनि अपने भाइयों सहित भीम की ओर बढ़े और उन्हें वैसे रोका जैसे समुद्र को तट रोकता है। तीखे बाणों से रोके जाने पर भी भीम सुबल के पुत्रों की ओर बढ़ते गए। शकुनि ने सोने के पंख वाले, पत्थर पर तेज़ किए हुए बाण भीम के वक्ष के बाएँ भाग में मारे, जो कवच को भेदकर भीतर धँस गए। तब भीम ने भी एक स्वर्णजटित बाण उन पर चलाया, पर हस्तलाघव में निपुण शकुनि ने उसे सात टुकड़ों में काट डाला।

क्रोध से भरकर भीम ने शकुनि का धनुष काट दिया। शकुनि ने दूसरा धनुष और सोलह चौड़े फल वाले बाण उठाए, उनमें से दो से भीम को बेधा, एक से उनकी ध्वजा और दो से छत्र काटे, और शेष चार से उनके चार घोड़ों को बेधा। तब भीम ने सोने से जड़े दण्ड वाला लोहे का एक भाला फेंका, जो साँप की जीभ के समान लपलपाता हुआ शकुनि के रथ पर जा गिरा। शकुनि ने वही भाला उठाकर लौटा मारा, जो भीम की बाईं भुजा को बेधकर बिजली के समान धरती पर गिरा। तब भीम ने नया धनुष लेकर शकुनि के घोड़े और सारथि मार दिए और ध्वजा काट दी। रथहीन शकुनि धरती पर खड़े होकर लड़ने लगे, पर भीम ने उन्हें गहरे बाणों से बेधकर लगभग मूर्च्छित कर दिया। तब आपके पुत्र दुर्योधन ने भीम के सामने ही उन्हें अपने रथ पर उठाकर युद्ध से दूर ले जाया, और कौरव-सेना भयभीत होकर भाग खड़ी हुई।

भीम से मारी जाती हुई वह भागती सेना उस स्थान पर पहुँची जहाँ कर्ण थे, और उन्हें घेरकर फिर युद्ध के लिए खड़ी हो गई। महान् तेजस्वी कर्ण उनका आश्रय बने। कर्ण को पाकर आपके सैनिक वैसे ही धीरज पा गए जैसे जहाज़ डूब जाने पर संकट में पड़े मल्लाह अन्त में किसी द्वीप पर पहुँच जाएँ।

सार: कर्ण-पर्व के इस अन्तिम अध्याय का आरम्भ ही रक्त की दो नदियों से होता है, एक भीम बहाते हैं, दूसरी अर्जुन। दोनों भाई इस ओर से सेना को चीरते आ रहे हैं, और सेना बार-बार टूटकर एक ही आश्रय की ओर लौटती है: कर्ण। यही कर्ण का अन्तिम दिन है, और सारी कथा अब उसी एक बिन्दु की ओर सिमट रही है।

कर्ण का संहार, और अर्जुन की दूसरी रक्त-नदी

धृतराष्ट्र ने पूछा कि जब भीमसेन ने हमारी सेना तोड़ दी, तब दुर्योधन और शकुनि ने क्या कहा? कर्ण ने, कृप ने, कृतवर्मा ने, अश्वत्थामा ने, दुःशासन ने क्या किया? पाण्डुपुत्र का पराक्रम मुझे अत्यन्त विस्मयकारी जान पड़ता है कि अकेले ही उसने मेरी सारी सेना से युद्ध किया। कर्ण तो कुरुओं की समृद्धि है, कवच है, यश है, जीवन की आशा है। उस सेना को टूटते देख राधापुत्र (राधा सूत-पत्नी जिसने कर्ण का पालन किया; उसी का पुत्र) कर्ण ने क्या किया?

संजय ने कहा, उस दोपहर बाद, हे राजन्, कर्ण भीम के सामने ही सोमकों (पाण्डव-पक्ष का एक यादव-संबंधी कुल) का संहार करने लगे। फिर उन्होंने अपने सारथि शल्य से कहा कि मुझे पाञ्चालों की ओर ले चलिए। शल्य, मद्रराज, उन मन के समान वेग वाले श्वेत घोड़ों को चेदियों, पाञ्चालों और करूषों की ओर हाँक ले गए। बाघ की खाल से मढ़ा और बादल-सा दिखने वाला वह रथ देखकर पाण्डव और पाञ्चाल भयभीत हो गए। उस रथ की गड़गड़ाहट वज्र की कड़क या पर्वत के टूटने के समान सुनाई दे रही थी।

कर्ण ने कान तक खींची प्रत्यंचा से सैकड़ों-हज़ारों बाण छोड़कर पाण्डव-सेना के हज़ारों योद्धा मार डाले। तब शिखण्डी, भीम, धृष्टद्युम्न, नकुल, सहदेव, द्रौपदी के पाँचों पुत्र और सात्यकि, सब कर्ण को घेरकर बाण-वृष्टि करने लगे। सात्यकि ने कर्ण के कन्धे की सन्धि में बीस तीखे बाण मारे, शिखण्डी ने पच्चीस, धृष्टद्युम्न ने सात, द्रौपदी-पुत्रों ने चौंसठ, सहदेव ने सात, नकुल ने सौ, और क्रोध से भरे भीम ने नब्बे सीधे बाण उनके कन्धे की सन्धि में मारे।

तब अधिरथ-पुत्र (अधिरथ वह सूत जिसने कर्ण को पाला; उसी का पुत्र) कर्ण तिरस्कार से हँसते हुए अपना श्रेष्ठ धनुष खींचकर बाण छोड़ने लगे। उन्होंने इन सबको लौटते बाणों से बेधा। सात्यकि का धनुष और ध्वजा काटकर उन्हें वक्ष के बीच नौ बाणों से बेधा। भीम को तीस बाणों से बेधा। सहदेव की ध्वजा एक चौड़े बाण से काटी और तीन बाणों से उनके सारथि को पीड़ित किया। पलक झपकते ही उन्होंने द्रौपदी के पाँचों पुत्रों को रथहीन कर दिया। यह देखकर सब विस्मित रह गए। अकेले कर्ण ने उन सब धनुर्धरों को रोक लिया जो पूरी शक्ति से लड़ रहे थे। उनके हस्तलाघव से देवता, सिद्ध और चारण तक प्रसन्न हुए, और कौरव-धनुर्धरों ने उनकी प्रशंसा की।

तब कर्ण ने शत्रु-सेना को वैसे जलाया जैसे ग्रीष्म में प्रचण्ड अग्नि सूखी घास के ढेर को जलाती है। पाण्डव-सेना भयभीत होकर चारों ओर भाग चली। पाञ्चालों में हाहाकार मच गया। पाण्डव-सेना ने कर्ण को ही उस युद्ध का एकमात्र योद्धा मान लिया, क्योंकि एक साथ मिलकर भी वे उसकी ओर देख तक न सकते थे। जैसे पर्वत से टकराकर जल की उमड़ती राशि टूट जाती है, वैसे ही कर्ण से टकराकर पाण्डव-सेना टूट गई। कर्ण ने अपने वीर शत्रुओं की भुजाएँ, सिर और कुण्डलों से सजे कान काट डाले। हाथीदाँत की मूठ वाली तलवारें, ध्वजाएँ, भाले, घोड़े, हाथी, रथ, धुरियाँ, जुए और पहिए, सब कर्ण ने नाना प्रकार से काट डाले। हाथियों और घोड़ों के शवों से, मांस और रक्त से धरती ऐसी कीचड़मयी हो गई कि चलना कठिन हो गया। कर्ण के दिव्यास्त्र से उठे बाणों के अन्धकार में मित्र और शत्रु पहचाने न जाते थे।

रथ पर सवार कर्ण बाण चला रहे हैं और सामने एक योद्धा अनेक बाणों से बिंधकर लड़खड़ा रहा है

तब दुर्योधन हर्ष से भर उठा और सारी सेना में बाजे बजवाए। पाञ्चाल टूटकर भी मृत्यु को ही लक्ष्य मानकर लौट आए, पर कर्ण ने उन्हें फिर तोड़ डाला। बीस पाञ्चाल रथी और सौ से अधिक चेदि-योद्धा कर्ण के बाणों से मारे गए। दोपहर के सूर्य के समान, युगान्त के संहारक के समान कर्ण की ओर देखा भी नहीं जाता था। उस समय दुर्योधन, दुःशासन, कृप, अश्वत्थामा, कृतवर्मा और शकुनि भी पाण्डव-योद्धाओं को सैकड़ों-हज़ारों में मार रहे थे। कर्ण के दो पुत्र भी पाण्डव-सेना का संहार कर रहे थे। उधर धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और द्रौपदी-पुत्र आपकी सेना का संहार कर रहे थे, और भीम के हाथों आपकी सेना की भारी क्षति हो रही थी।

इसी बीच, हे राजन्, अर्जुन ने चतुरंगिणी सेना (हाथी, रथ, घोड़े, पैदल, चारों अंगों वाली) का संहार करके, और क्रुद्ध सूतपुत्र को सामने देखकर, वहाँ भी रक्त की एक नदी बहा दी, जो मांस, मज्जा और हड्डियों से पीली थी। मनुष्यों के सिर उसकी चट्टानें थीं, हाथी-घोड़े उसके तट। वह कौओं और गिद्धों के स्वर से गूँज रही थी। छत्र उसके हंस थे, हार कमल। धनुष और बाण उसकी मछलियाँ थीं। ढाल और कवच उसके भँवर थे, रथ उसकी नौकाएँ। जो विजय के अभिलाषी थे वे उसे सहज पार कर लेते, और जो कायर थे उनके लिए वह अपार थी।

उस नदी को बहाकर अर्जुन ने वासुदेव (वसुदेव-पुत्र, श्रीकृष्ण) से कहा, हे कृष्ण, वह देखिए सूतपुत्र की ध्वजा। वहाँ भीमसेन आदि उस महारथी से लड़ रहे हैं। पाञ्चाल कर्ण से डरकर भाग रहे हैं। वहाँ सिर पर श्वेत छत्र लिए दुर्योधन, कर्ण के साथ, पाञ्चालों को खदेड़ता शोभा पा रहा है। कृप, कृतवर्मा और अश्वत्थामा दुर्योधन की रक्षा कर रहे हैं, और स्वयं सूतपुत्र की रक्षा में हैं। वहाँ रथ चलाने में निपुण शल्य कर्ण के रथ पर शोभा पा रहे हैं। मुझे उसी महारथी के पास ले चलिए, यही मेरी इच्छा है। कर्ण को मारे बिना मैं इस युद्ध से कभी न लौटूँगा।

सार: दो रक्त-नदियाँ, दो भाई, और दोनों का प्रवाह एक ही ओर है। कर्ण अकेले पाण्डव-सेना को बार-बार तोड़ रहे हैं, और अर्जुन अब कृष्ण से कहते हैं कि मुझे उसी के सामने ले चलो। यह कथा का वह मोड़ है जहाँ अनेक द्वन्द्वों में बँटा हुआ युद्ध सिमटकर केवल एक द्वन्द्व की प्रतीक्षा करने लगता है।

शल्य का उकसाना और कर्ण का अर्जुन-स्तवन

स्वर्ण कवचधारी कर्ण रथ पर श्वेत अश्वों की रास थामे हैं, पीछे बैठे शल्य हाथ उठाकर कुछ कह रहे हैं

कृष्ण ने रथ को कर्ण की ओर बढ़ाया, ताकि कर्ण और सव्यसाची (बाएँ हाथ से भी बाण चलाने वाला, अर्जुन) में द्वन्द्व-युद्ध हो। अर्जुन का रथ देखकर मद्रराज शल्य ने कर्ण से कहा, वह देखिए, श्वेत घोड़ों वाला, कृष्ण को सारथि बनाए, गाण्डीव धारण किए वही आ रहा है जिसके विषय में आप पूछ रहे थे। यदि आज आप उसे मार सकें तो हमारा बड़ा कल्याण हो। हमारे प्रमुख योद्धाओं को मारता हुआ वह आपसे भिड़ने आ रहा है। आप भीष्म, द्रोण, अश्वत्थामा और कृप के समान हैं। इस सव्यसाची को रोकिए। शेष सब राजा तो अर्जुन के भय से एक-दूसरे की चिन्ता किए बिना भाग रहे हैं। आपके सिवा कोई नहीं जो इन भागते योद्धाओं का भय दूर कर सके।

कर्ण ने कहा, अब आप अपने स्वभाव में लौट आए हैं और मुझे प्रिय लग रहे हैं। आप धनंजय का भय मन में न रखें। आज मेरी भुजाओं का बल और कौशल देखिए। अकेले ही मैं आज पाण्डव-सेना को और उन दोनों कृष्णों (कृष्ण और अर्जुन, दोनों को महाभारत “दो कृष्ण” कहता है) को नष्ट कर दूँगा, यह मैं सत्य कहता हूँ। आज दोनों वीरों को मारे बिना मैं युद्ध से न लौटूँगा, अथवा उनसे मारा जाकर रणभूमि पर सोऊँगा। युद्ध में विजय अनिश्चित है। मारकर या मारा जाकर, आज मैं अपना प्रयोजन सिद्ध करूँगा।

शल्य ने कहा, सब महारथी कहते हैं कि अकेला अर्जुन भी अजेय है। फिर जब वह कृष्ण से रक्षित हो, तो उसे जीतने का साहस कौन करेगा? कर्ण ने कहा, जितना मैंने सुना है, ऐसा श्रेष्ठ रथी पृथ्वी पर कभी जन्मा ही नहीं। फिर भी मेरा पराक्रम देखिए, मैं उसी पार्थ से युद्ध करूँगा। सम्भव है वह आज मुझे यमलोक भेज दे, पर जान लीजिए, कर्ण की मृत्यु से ये सब नष्ट हो जाएँगे। उसकी दोनों भुजाएँ कभी पसीने से नहीं भीगतीं, कभी काँपती नहीं। वह बाणों के समूह को एक बाण की भाँति छोड़ता है, और दो कोस तक उन्हें फेंक देता है। उसके समान कोई योद्धा पृथ्वी पर नहीं।

कर्ण ने आगे कहा, उसने खाण्डव में अग्नि को तृप्त किया, वहीं कृष्ण को चक्र मिला और पार्थ को गाण्डीव धनुष, श्वेत घोड़ों वाला दिव्य रथ, दो अक्षय तरकश और अनेक दिव्यास्त्र अग्निदेव से मिले। इन्द्रलोक में उसे देवदत्त शंख मिला और उसने असंख्य दैत्यों तथा कालकेयों को मारा। उसने महादेव को प्रसन्न करके पाशुपत अस्त्र पाया, जो तीनों लोकों का संहार कर सकता है। लोकपालों ने उसे अपने अस्त्र दिए। विराटनगर में अकेले एक रथ पर उसने हम सबको हराकर गायें छीन लीं और हमारे वस्त्र तक ले लिए। ऐसे वीर से, जिसका सहायक वृष्णिवंशी (कृष्ण) है, युद्ध की इच्छा रखने के कारण मैं स्वयं को संसार का परम साहसी पुरुष मानता हूँ।

वह केशव से रक्षित है, जो स्वयं नारायण है, जिसका कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं, जो शंख-चक्र-गदाधारी वासुदेव है, जिसके गुणों को सारा संसार मिलकर दस हज़ार वर्षों में भी गिना न सके। एक ही रथ पर दोनों कृष्णों को देखकर मेरे हृदय में साहस के साथ भय भी प्रवेश करता है। हिमालय के पर्वत भले अपने स्थान से हट जाएँ, पर ये दोनों कृष्ण नहीं हटेंगे। मेरे सिवा, हे शल्य, ऐसे फाल्गुन और वासुदेव की ओर कौन बढ़ेगा? आज या तो मैं इन दोनों को गिराऊँगा, या ये दोनों मुझे गिरा देंगे।

एक उप-कथा: कर्ण का यह दीर्घ अर्जुन-स्तवन व्यास की कथा का सूक्ष्म स्थल है। शल्य कर्ण के सारथि नियुक्त किए गए थे इस गुप्त शर्त पर कि वे रथ चलाते-चलाते कर्ण का उत्साह तोड़ते रहेंगे, ताकि कर्ण का तेज क्षीण हो। यहाँ शल्य की प्रशंसा को कर्ण ने पहचान लिया है, पर ध्यान दीजिए, कर्ण शत्रु अर्जुन की महिमा को घटाते नहीं, उसे पूरे विस्तार से स्वीकार करते हैं। यह वीर की वह विडम्बना है जो जानता है कि वह सम्भवतः अपने से बड़े के सामने खड़ा है, और फिर भी पीछे नहीं हटता।

इतना कहकर कर्ण ने मेघों के समान गर्जना की। फिर दुर्योधन के पास जाकर उसने उससे, कृप से, भोजराज कृतवर्मा से, गन्धर्वराज (शकुनि) और उसके पुत्र से, अपने छोटे भाइयों से और सब पैदल-घुड़सवारों से कहा, अच्युत और अर्जुन की ओर दौड़िए, चारों ओर से उनका मार्ग रोकिए और उन्हें परिश्रम से थका दीजिए, ताकि जब आप सब उन्हें गहरा घायल कर दें, तो मैं उन दोनों को सहज ही मार सकूँ। “ऐसा ही हो” कहकर वे सब वीर अर्जुन की ओर बढ़े और उन पर अनगिनत बाण बरसाने लगे।

पर जैसे महासमुद्र सब नदियों को अपनी सहायक धाराओं सहित ग्रहण कर लेता है, वैसे ही अर्जुन ने उन सब योद्धाओं को झेल लिया। शत्रु यह जान ही न पाते थे कि वे कब बाण धनुष पर चढ़ाते हैं और कब छोड़ते हैं। केवल इतना दिखता था कि अर्जुन के बाणों से बिंधे मनुष्य, घोड़े और हाथी प्राणहीन होकर गिरते जा रहे हैं। मुस्कराते हुए पार्थ ने उन महारथियों के बाणों को अपनी बाण-वृष्टि से काट डाला और तीन-तीन बाणों से प्रत्येक का वक्ष बेधा। अश्वत्थामा ने अर्जुन को दस बाणों से, केशव को तीन से बेधा, पर अर्जुन ने तीन बाणों से अश्वत्थामा का धनुष, क्षुरप्र (छुरे-सी धार वाले) बाण से उसके सारथि का सिर, चार बाणों से चार घोड़े और तीन से ध्वजा काटकर उसे रथ से गिरा दिया। अश्वत्थामा ने दूसरा धनुष लेकर फिर से बाण छोड़े।

तब कृप, कृतवर्मा और दुर्योधन ने भी अर्जुन को ढक लिया। पर अर्जुन ने सहस्रबाहु कार्तवीर्य के समान पराक्रम से कृप के धनुष, घोड़े, ध्वजा और सारथि पर बाण बरसाए, और जितने बाणों से पहले भीष्म को बेधा था, उतने ही बाणों से कृप को बेधा। फिर दुर्योधन की ध्वजा और धनुष काटे, कृतवर्मा के सुन्दर घोड़े नष्ट किए और ध्वजा काट दी। आपकी विशाल सेना जल से बहाए गए बाँध के समान सौ टुकड़ों में बँट गई। तब शिखण्डी, सात्यकि और दोनों जुड़वाँ (नकुल-सहदेव) अर्जुन की दिशा में बढ़कर शत्रुओं को रोकने लगे। कुरु और सृंजय एक-दूसरे को मारने लगे, मानो प्राचीन काल में देवता और असुर लड़ रहे हों।

सार: कर्ण ने अर्जुन को थकाने की योजना बनाई, पहले औरों से लड़वाओ, फिर मैं मारूँगा। पर अर्जुन एक-एक करके कृप, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, दुर्योधन सबको परास्त करते जाते हैं। कर्ण का यह स्तवन कथा को मानवीय गहराई देता है: वह शत्रु को छोटा करके अपना साहस नहीं बढ़ाता, शत्रु की पूरी महिमा जानकर भी उसके सामने खड़ा होता है।

भीम की गदा और दुःशासन का अन्त

संजय ने कहा, तब अर्जुन ने, अनेक योद्धाओं से घिरकर डूबते-से जान पड़ते भीम की रक्षा की इच्छा से, सूतपुत्र की सेना को छोड़कर भीम के शत्रुओं को यमलोक भेजना आरम्भ किया। आकाश अर्जुन के बाणों से ढक गया। चार सौ मतवाले हाथी, सोने के कवच पहने योद्धाओं से सजे, अर्जुन के बाणों से मारे जाकर पर्वत-शिखरों के समान गिर पड़े। गाण्डीव की टंकार वज्र की कड़क के समान गूँज रही थी।

तब अर्जुन ने भीम से मिलकर बताया कि युधिष्ठिर के शरीर से बाण निकाल लिए गए हैं और वे स्वस्थ हैं। भीम की अनुमति लेकर अर्जुन फिर आगे बढ़े। आपके दस पुत्रों ने, जो दुःशासन से छोटे थे, उन्हें घेरा, पर अर्जुन ने दस चौड़े बाणों से उन दसों के सिर काट गिराए, जिनके होंठ क्रोध से चबाए हुए और आँखें लाल थीं। फिर नब्बे कौरव रथी अर्जुन पर टूटे, पर कृष्ण ने श्वेत घोड़ों को कर्ण के रथ की ओर हाँका, और अर्जुन ने उन नब्बे को भी सारथियों और ध्वजाओं सहित काट डाला।

इसी बीच भीम, अर्जुन को विशाल सेना से घिरा देखकर, बची-खुची कौरव-सेना को छोड़कर अर्जुन के रथ की ओर दौड़े। गदा हाथ में लिए अविश्राम भीम ने बची हुई सेना का संहार किया। मृत्यु-रात्रि के समान भयानक वह गदा मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों पर निरन्तर गिरती रही। उसने दस हज़ार घोड़े और अनेक पैदल मार डाले। आपके सैनिकों ने भीम को गदा हाथ में लिए देखकर समझा कि यमराज ही दण्ड लिए उनके बीच खड़ा है। भीम मतवाले हाथी के समान कौरव-हाथी-सेना में घुस पड़े जैसे मगर समुद्र में घुसता है, और थोड़ी ही देर में उसे यमलोक भेज दिया। फिर रथ पर चढ़कर वे अर्जुन के पीछे हो लिए।

तब आपके पुत्र दुःशासन ने निर्भय होकर भीम पर बाण-वृष्टि की। भीम बड़े मृग पर सिंह के समान उस पर झपटे। दोनों में वैसा भयानक युद्ध हुआ जैसा प्राचीन काल में सम्वर और इन्द्र में हुआ था। भीम ने दुःशासन का धनुष और ध्वजा काटी, एक बाण से उसका मस्तक बेधा और एक से उसके सारथि का सिर काटा। दुःशासन ने दूसरा धनुष लेकर भीम को बारह बाणों से बेधा, और स्वयं घोड़ों की रास सँभालकर बाण-वृष्टि की। फिर उसने सूर्य-किरण के समान चमकता, सोने-हीरे से जड़ा एक बाण छोड़ा, जिससे बिंधकर भीम शिथिल अंगों के साथ अपने रथ पर गिर पड़े। पर सचेत होकर वे फिर सिंह के समान गरजे।

दुःशासन ने एक बाण से भीम का धनुष और छह से सारथि को बेधा, फिर नौ बाणों से भीम को। भीम ने क्रोध से भरकर एक भाला फेंका, पर दुःशासन ने उसे दस बाणों से काट डाला। तब भीम ने कहा, हे वीर, आपने मुझे गहरा बेध दिया, अब मेरी गदा का प्रहार सहिए। और उन्होंने अपनी भयानक गदा उठाई और कहा, हे दुष्ट, आज मैं रणभूमि पर आपका रक्त पीऊँगा। दुःशासन ने मृत्यु के समान एक भाला फेंका, पर भीम ने अपनी गदा घुमाकर उसे फेंका, जो दुःशासन के भाले को तोड़कर उसके सिर पर जा लगी, और उसे रथ से दस धनुष की दूरी पर गिरा दिया। उसके घोड़े मारे गए, रथ चूर-चूर हो गया।

तब भयानक युद्ध के बीच कुरु-सेना के बड़े-बड़े योद्धाओं के बीच खड़े भीम को आपके पुत्रों के सब अत्याचार स्मरण हो आए, द्रौपदी के केश खींचना और रजस्वला अवस्था में उसका वस्त्र-हरण, और वे सारे अपमान जो उस राजकुमारी पर तब हुए जब उसके पति मुँह फेरे बैठे थे। भीम घी की आहुति पाई अग्नि के समान क्रोध से धधक उठे। उन्होंने कर्ण, सुयोधन (दुर्योधन का दूसरा नाम), कृप, अश्वत्थामा और कृतवर्मा से कहा, आज मैं इस नीच दुःशासन को मारूँगा, जो रक्षा कर सकें करें। यह कहकर भीम सिंह के समान दुःशासन पर झपटे।

भीम खड्ग लिए भूमि पर गिरे दुःशासन की छाती पर पैर रखे खड़े हैं

रथ से कूदकर वे धरती पर उतरे और गिरे हुए शत्रु पर दृष्टि गड़ाई। फिर अपनी पैनी तलवार खींचकर, क्रोध से काँपते हुए, उन्होंने दुःशासन के गले पर पैर रखा, उसका वक्ष चीरकर उसका गरम रक्त पिया। फिर तलवार से उसका सिर काटकर, अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए, उन्होंने धीरे-धीरे फिर रक्त पिया जैसे उसका स्वाद ले रहे हों। फिर क्रोधभरी आँखों से देखते हुए कहा, इस शत्रु के रक्त का स्वाद मुझे माता के दूध, मधु, घी, उत्तम मद्य, जल, दही या संसार के सब अमृत-तुल्य पेयों से बढ़कर लगता है। फिर दुःशासन को मरा देखकर वे धीरे से हँसे और बोले, अब आप पर और क्या करूँ? मृत्यु ने आपको मेरे हाथों से छुड़ा लिया।

जिन्होंने भीम को शत्रु का रक्त पीते देखा वे भय से गिर पड़े, औरों के हाथ से हथियार छूट गए। बहुतों ने अधमुँदी आँखों से देखकर पुकारा, यह मनुष्य नहीं है! कुछ ने कहा, यह भीम तो राक्षस होगा! और वे चित्रसेन के साथ भाग चले।

समझने की कुंजी (नैतिक जटिलता): भीम का दुःशासन का रक्त पीना महाभारत का एक भयावह दृश्य है, और कथा इसे न छिपाती है, न सुन्दर बनाती है। यह तेरह वर्ष पुरानी उस प्रतिज्ञा की पूर्ति है जो भीम ने द्रौपदी के अपमान के बाद की थी। पर सेना इसे देखकर भीम को “राक्षस” कहती है, अर्थात् कथा स्वयं इस कृत्य को सहज वीरता नहीं मानती। यहाँ न्याय और हिंसा, प्रतिज्ञा और पाशविकता एक साथ खड़े हैं, और व्यास किसी को सपाट नहीं करते।

तब पाञ्चालराजपुत्र युधामन्यु ने भागते चित्रसेन का पीछा कर सात बाणों से उसे बेधा। चित्रसेन ने मुड़कर युधामन्यु को तीन और उसके सारथि को छह बाणों से बेधा, पर युधामन्यु ने एक तीखे बाण से उसका सिर काट दिया।

भीम ने दुःशासन का थोड़ा रक्त हाथ में लेकर, ऊँचे स्वर में, सब वीरों के सुनते हुए कहा, हे नराधम, यहाँ मैं आपके कण्ठ से आपका जीवन-रक्त पीता हूँ। अब प्रसन्न होकर फिर से हमें “पशु, पशु” कहकर गाली दीजिए। जो हम पर तब “पशु, पशु” कहकर नाचे थे, अब हम उन्हीं के शब्द दोहराते हुए उन पर नाचेंगे। प्रमाणकोटि के भवन में हमारी नींद में विष देना, हमारे भोजन में हलाहल मिलाना, काले साँपों के डँसने, लाक्षागृह में आग लगाना, द्यूत से हमारा राज्य छीनना, वनवास, द्रौपदी के सुन्दर केशों का क्रूर खींचना, विराट के यहाँ हमारे कष्ट, ये सब दुःख शकुनि, दुर्योधन और राधापुत्र की कुमन्त्रणा से आपसे ही उपजे। धृतराष्ट्र और उसके पुत्र की दुष्टता से हमने ये सब सहे। सुख हमें कभी न मिला।

तब रक्त में नहाए, घावों से रक्त बहाते भीम ने कृष्ण और अर्जुन से कहा, हे वीरो, दुःशासन के विषय में जो प्रतिज्ञा की थी वह आज पूरी कर दी। अब दूसरी प्रतिज्ञा भी पूरी करूँगा, इस युद्ध-यज्ञ में दूसरे पशु दुर्योधन को मारकर। कौरवों के सामने उसका मस्तक पैर से कुचलकर मुझे शान्ति मिलेगी। यह कहकर भीम वैसे ही गरजे जैसे वृत्र को मारकर सहस्राक्ष इन्द्र गरजे थे।

सार: कर्ण-वध से ठीक पहले व्यास भीम के दुःशासन-वध को रखते हैं, एक प्रतिज्ञा की भयावह पूर्ति, जो सेना को काँपा देती है। यह दृश्य कर्ण की मृत्यु के लिए वातावरण बनाता है: अब दुर्योधन भाई-शोक से स्तब्ध है, और कर्ण भीम के पराक्रम से भय खा रहे हैं।

वृषसेन का वध, पुत्र-शोक से कर्ण का अर्जुन की ओर वेग

दुःशासन के वध के बाद आपके दस पुत्रों ने, निषंगी, कवची, पाशी, दण्डधर, धनुर्ग्रह, अलोलुप, साह, शण्ड, वातवेग और सुवर्चा, मिलकर भीम को बाणों से घेरा। पर अर्जुन ने दस चौड़े बाणों से उन दसों को यमलोक भेज दिया। तब कर्ण के मन में भीम के संहारक-तुल्य पराक्रम को देखकर भय प्रवेश कर गया।

शल्य ने कर्ण के मुख से उनकी मनोदशा भाँपकर कहा, हे राधापुत्र, शोक न कीजिए, यह आपको शोभा नहीं देता। भीम के भय से ये राजा भाग रहे हैं। दुःशासन का रक्त पिया जाने के दुःख से दुर्योधन स्तब्ध है। पाण्डव आपकी ओर बढ़ रहे हैं। अतः क्षत्रिय-धर्म को सामने रखकर धनंजय की ओर बढ़िए। विजय में महान् यश है, पराजय में स्वर्ग निश्चित है। वह देखिए, आपका पुत्र वृषसेन आपकी मूर्च्छा देखकर क्रोध से पाण्डवों की ओर दौड़ रहा है।

वृषसेन भीम की ओर दौड़ा, पर नकुल ने उस पर आक्रमण किया। नकुल ने उसकी ध्वजा और सोने की पेटी वाला धनुष काटा। कर्ण-पुत्र ने दुःशासन के प्रति आदर दिखाने की इच्छा से दूसरा धनुष लेकर नकुल को दिव्यास्त्रों से बेधा। दोनों में घोर युद्ध हुआ। कर्ण-पुत्र ने नकुल के वायुजात नस्ल के श्वेत घोड़े मार डाले। रथहीन नकुल सोने के चन्द्रमाओं से जड़ी ढाल और आकाश-नीली तलवार लेकर पक्षी के समान उछलते हुए लड़ने लगे, और दो हज़ार वीरों को काट डाला।

तब वृषसेन ने वेग से आकर नकुल को बाणों से बेधा, उनकी सहस्र-ताराओं वाली ढाल और इस्पात की तलवार छह बाणों से काट डाली, और वक्ष के मध्य गहरे बाण मारे। भीम से रक्षित होकर नकुल ने अद्भुत पराक्रम दिखाया, पर अन्ततः कर्ण-पुत्र के बाणों से पीड़ित होकर वे भीम के रथ पर सिंह के समान कूद पड़े, अर्जुन के देखते हुए। वृषसेन ने उन दोनों पर बाण-वृष्टि की।

तब भीम ने अर्जुन से कहा, देखिए, नकुल पीड़ित है, कर्ण-पुत्र हमें रोक रहा है। आप कर्ण-पुत्र की ओर बढ़िए। अर्जुन भीम के रथ के पास आए। नकुल ने कहा, इसे शीघ्र मारिए। तब अर्जुन ने कृष्ण द्वारा संचालित अपना कपिध्वज (वानर-ध्वज वाला) रथ वृषसेन की ओर बढ़ाया।

नकुल का रथ और तलवार कटी जान, ग्यारह वीर, द्रुपद के पाँच पुत्र, सात्यकि और द्रौपदी के पाँच पुत्र, वेग से आगे आए और आपके हाथी-रथ-मनुष्य-घोड़ों का संहार करने लगे। तब कृतवर्मा, कृप, अश्वत्थामा, दुर्योधन, शकुनि-पुत्र, वृक, क्रथ और देववृध उनकी ओर बढ़े। इसी बीच कुलिन्द (हिमालय-प्रदेश का एक पर्वतीय गण) पर्वत-शिखरों के समान हाथियों पर चढ़कर कौरव-वीरों पर टूटे। कुलिन्दराजपुत्र ने कृप को बेधा, पर कृप के बाणों से वह हाथी सहित गिर पड़ा। उसके छोटे भाई का सिर गन्धर्वराज (कृप) ने काट दिया।

शतानीक (नकुल-पुत्र) ने भारी संहार किया, पर एक कुलिन्द-योद्धा ने उसे बेधा, और शतानीक ने उसका कमल-सा सिर काट दिया। तब कर्ण-पुत्र वृषसेन ने शतानीक, अर्जुन, भीम, नकुल और जनार्दन को बाणों से बेधा। यह देखकर कौरव हर्षित हुए, पर जो धनंजय का पराक्रम जानते थे, वे वृषसेन को अग्नि में पड़ी आहुति के समान ही मान चुके थे।

अर्जुन ने नकुल को रथहीन और कृष्ण को घायल देखकर सूतपुत्र के सामने खड़े वृषसेन पर आक्रमण किया। नमुचि के इन्द्र पर झपटने के समान वृषसेन भी अर्जुन पर झपटा और उसने पार्थ को एक बाण से बेधकर गर्जना की, फिर कई बाणों से, फिर कृष्ण को नौ और पार्थ को दस बाणों से। तब अर्जुन की भौंह क्रोध से तीन रेखाओं में सिकुड़ गई।

क्रोध से लाल आँखें किए, यमराज को भी मार सकने वाले अर्जुन भयानक हँसे और कर्ण तथा सब कौरव-वीरों से बोले, हे कर्ण, आज आपके सामने ही मैं इस वृषसेन को यमलोक भेजूँगा। लोग कहते हैं कि आप सबने मिलकर, मेरी अनुपस्थिति में, मेरे अकेले-असहाय पुत्र को मारा था। मैं आपके पुत्र को आप सबके सामने मारूँगा। उसके बाद, हे मूर्ख, मैं आपको मारूँगा, जो इस झगड़े की जड़ है और दुर्योधन के संरक्षण से इतना घमण्डी हुआ है। और भीम इस नराधम दुर्योधन को मारेगा, जिसकी कुनीति से यह द्यूत-जनित झगड़ा उठा।

कृष्ण के हाँके रथ से अर्जुन तेजस्वी बाणों की झड़ी लगा रहे हैं, सामने एक योद्धा बिंधकर गिर रहा है

यह कहकर अर्जुन ने वृषसेन के सब मर्मस्थलों में दस बाण मारे, और चार क्षुरप्र बाणों से उसका धनुष, दोनों भुजाएँ और सिर काट डाला। भुजाहीन, मस्तकहीन कर्ण-पुत्र फूलों से लदे शाल वृक्ष के समान रथ से गिर पड़ा। अपने पुत्र को इस प्रकार गिरा देखकर, पुत्र-शोक से दग्ध कर्ण क्रोध से भरकर अर्जुन और कृष्ण के रथ की ओर वेग से बढ़े।

सार: अभिमन्यु के अन्याय-पूर्ण वध का प्रतिशोध यहाँ चुकता होता है, अर्जुन कर्ण के सामने ही उसके पुत्र वृषसेन को मारते हैं, और यही कर्ण को अन्तिम द्वन्द्व की ओर खींच लाता है। पुत्र-शोक दोनों ओर है: कर्ण ने अभिमन्यु-वध में भाग लिया था, अब अर्जुन उसका पुत्र मारते हैं। यह बदले की वह श्रृंखला है जिससे महाभारत का कोई वीर मुक्त नहीं।

दो सूर्य आमने-सामने, सृष्टि का विभाजन

देवताओं से भी अजेय, समुद्र के समान उमड़ते कर्ण को आते देख दाशार्ह-वंशी कृष्ण ने अर्जुन से कहा, वह श्वेत घोड़ों वाला, शल्य को सारथि बनाए, जिससे आपको युद्ध करना है, आ रहा है। अतः हे धनंजय, सारा धैर्य बटोरिए। देखिए, कर्ण की वह ध्वजा जिस पर हाथी की रस्सी (नागपाश) का चिह्न है, इन्द्र-धनुष के समान आकाश को विभाजित करती दिख रही है। हे कुन्तीपुत्र, आपको ही सावधानी से सूतपुत्र को मारना है। आपके सिवा कोई कर्ण के बाण नहीं सह सकता। आप तीनों लोकों को देवताओं और गन्धर्वों सहित जीतने में समर्थ हैं। आपने युद्ध में स्वयं शिव को प्रसन्न किया था। उन्हीं की कृपा से, हे पार्थ, कर्ण को मारिए, जैसे इन्द्र ने असुर नमुचि को मारा।

अर्जुन ने कहा, हे कृष्ण, मेरी विजय निश्चित है, इसमें सन्देह नहीं, क्योंकि आप मुझ पर प्रसन्न हैं। घोड़ों को हाँकिए, हे हृषीकेश। आज फाल्गुन कर्ण को मारे बिना युद्ध से न लौटेगा। आज या तो कर्ण मेरे बाणों से कटा हुआ दिखेगा, या आप मुझे कर्ण के बाणों से मरा देखेंगे। वह भयानक युद्ध आ पहुँचा है जिसकी चर्चा जब तक पृथ्वी रहेगी, तब तक लोग करते रहेंगे। यह कहकर अर्जुन का रथ शीघ्र कर्ण के रथ के सामने जा पहुँचा।

तब वे दोनों रथ, दोनों सूर्य-तेज वाले, बाघ की खाल से मढ़े, पास आने पर दो सूर्यों के समान दिखे। श्वेत घोड़ों वाले वे दोनों महान् धनुर्धर आकाश में सूर्य और चन्द्र के समान शोभा पाने लगे। उन दोनों को इन्द्र और विरोचन-पुत्र (बलि) के समान युद्ध की तैयारी में देखकर सब प्राणी विस्मित हुए। कर्ण की हाथी-रस्सी वाली ध्वजा और पार्थ की वानर वाली ध्वजा को पास आते देख सब राजा विस्मय से भर गए।

हज़ारों योद्धाओं ने बगलें बजाईं और वस्त्र हिलाए। कौरवों ने कर्ण को प्रसन्न करने को बाजे बजाए और शंख फूँके, पाण्डवों ने अर्जुन को प्रसन्न करने को दिशाओं को शंख-नाद से गुँजा दिया। दोनों मनुष्य-व्याघ्र अपने रथों पर, भयानक धनुष लिए, बाण-भालों से सज्जित, ऊँची ध्वजाएँ लिए खड़े थे। दोनों कवच पहने, दोनों के घोड़े श्वेत, दोनों के गले सिंह के समान, दोनों की भुजाएँ लम्बी, दोनों की आँखें लाल, दोनों स्वर्ण-माला से सजे। एक के सारथि कृष्ण थे, दूसरे के शल्य।

कर्ण और अर्जुन के बाणों से आकाश भर गया है, ऊपर बादलों से देवता युद्ध देख रहे हैं

एक-दूसरे को ललकारते हुए, दोनों गोशाला के दो बैलों के समान भिड़ने को बढ़े। वे दो मतवाले हाथियों, दो क्रुद्ध पर्वतों, दो विषधर साँपों, दो प्रलयंकारी यमों के समान थे। इन्द्र और वृत्र के समान क्रुद्ध, सूर्य और चन्द्र के समान तेजस्वी, युगान्त में संसार के विनाश को उदित दो ग्रहों के समान वे दिख रहे थे। दोनों देव-पिताओं से उत्पन्न (कर्ण सूर्य के, अर्जुन इन्द्र के), दोनों देव-तुल्य। उन्हें देखकर सब के मन में सन्देह उठा कि कौन विजयी होगा।

तब आकाश में देवताओं, नागों, असुरों, सिद्धों, यक्षों, गन्धर्वों और राक्षसों के बीच कर्ण और अर्जुन के विषय में विवाद उठ खड़ा हुआ। सारी सृष्टि दो पक्षों में बँट गई। समस्त नक्षत्रों सहित आकाश कर्ण के लिए चिन्तित हुआ, और विशाल पृथ्वी पार्थ के लिए, जैसे माता पुत्र के लिए। नदियाँ, समुद्र, पर्वत, वृक्ष, औषधियाँ, सब अर्जुन के पक्ष में हुए। असुर, यातुधान, गुह्यक और आकाश-चारी कौए कर्ण के पक्ष में। सब रत्न, चारों वेद, इतिहास, उपवेद, उपनिषद्, वासुकि, चित्रसेन, तक्षक, सब बड़े नाग और सब पर्वत अर्जुन के पक्ष में हुए। ऐरावत और उसकी सन्तान, सुरभि की सन्तान अर्जुन के साथ; छोटे साँप कर्ण के साथ। वसु, मरुत्, साध्य, रुद्र, विश्वेदेव, अश्विनी, अग्नि, इन्द्र, सोम, पवन और दसों दिशाएँ धनंजय के पक्ष में; सब आदित्य कर्ण के पक्ष में। ब्राह्मण, क्षत्रिय, यज्ञ और दक्षिणाएँ अर्जुन के लिए। प्रेत, पिशाच, मांसभक्षी पशु-पक्षी, राक्षस, कुत्ते और सियार कर्ण के लिए। वैश्य, शूद्र, सूत और वर्णसंकर जातियाँ राधापुत्र के पक्ष में।

ब्रह्मा, ऋषियों और प्रजापतियों सहित, और भव (शिव) स्वयं अपने वाहन पर, आकाश के उस भाग में आ पहुँचे। शक्र (इन्द्र) ने कहा, अर्जुन कर्ण को जीते। सूर्य ने कहा, मेरा पुत्र कर्ण अर्जुन को जीते। इन्द्र और सूर्य, ये दोनों, विपरीत पक्ष लेकर विवाद करने लगे। देवता पार्थ के पक्ष में थे, असुर कर्ण के।

तब देवताओं ने स्वयम्भू ब्रह्मा से प्रार्थना की, हे देव, इन दोनों मनुष्य-सिंहों की विजय समान हो। इस युद्ध से विशाल सृष्टि नष्ट न हो जाए। इन दोनों की विजय समान कर दीजिए। यह सुनकर मघवान् (इन्द्र) ने पितामह को प्रणाम कर कहा, पहले आपने ही कहा था कि दोनों कृष्ण सदा विजयी होंगे। अब वही हो। तब ब्रह्मा और ईशान (शिव) ने इन्द्र से कहा, विजय उसी उच्चात्मा विजय (अर्जुन) की निश्चित है, उसी सव्यसाची की, जिसने खाण्डव-वन में अग्नि को तृप्त किया और स्वर्ग में जाकर आपकी सहायता की। कर्ण दानवों के पक्ष में है, अतः उचित है कि उसकी पराजय हो। इससे देवताओं का प्रयोजन सिद्ध होगा। पार्थ सत्य और धर्म में निरत है, उसे विजयी होना ही चाहिए। उसका सारथि स्वयं वासुदेव विष्णु है। ये दोनों कृष्ण नर और नारायण हैं, वे प्राचीन और श्रेष्ठ ऋषि हैं, इन पर कोई शासन नहीं कर सकता। तीनों लोक इनके पीछे चलते हैं।

पर ब्रह्मा ने यह भी कहा, कर्ण, यह मनुष्य-वृषभ, यहाँ श्रेष्ठ लोक प्राप्त करे। वह वसुओं या मरुतों के साथ एकता पाए। द्रोण और भीष्म के साथ स्वर्ग में पूजित हो, क्योंकि वैकर्तन-पुत्र (सूर्य-पुत्र) कर्ण वीर है। पर विजय दोनों कृष्णों की हो। तब सहस्राक्ष इन्द्र ने उन वचनों को आदर देकर, सब प्राणियों को प्रणाम कर कहा, आपने दोनों देवों का वचन सुना। ऐसा ही होगा, अन्यथा नहीं। प्रसन्न मन से ठहरें। यह सुनकर सब प्राणी विस्मित हुए और देवताओं ने सुगन्धित पुष्प बरसाए।

समझने की कुंजी (अवधारणा, नर-नारायण): “दो कृष्ण” से कथा का तात्पर्य कृष्ण और अर्जुन दोनों से है, जिन्हें व्यास नर (अर्जुन) और नारायण (कृष्ण) के रूप में देखते हैं, वे दो प्राचीन ऋषि जो युग-युग में धर्म-रक्षा को अवतरित होते हैं। इसीलिए ब्रह्मा कहते हैं कि इनकी विजय निश्चित है। पर ध्यान दीजिए: देवता भी कर्ण को स्वर्ग और पूजा का अधिकारी मानते हैं। कथा कर्ण को “बुरा” कहकर नहीं काटती, वह दानव-पक्ष में होने से पराजित होगा, पर उसका तेज स्वर्ग-लोक का अधिकारी है।

सार: इस द्वन्द्व को व्यास केवल दो वीरों का युद्ध नहीं, सृष्टि का विभाजन बनाते हैं। नदियाँ, पर्वत, वेद, देवता, असुर, सब पक्ष चुन लेते हैं। पिता-पिता आमने-सामने हैं: सूर्य कर्ण के पक्ष में, इन्द्र अर्जुन के। और अन्तिम निर्णय ब्रह्मा करते हैं, विजय अर्जुन की, पर कर्ण को स्वर्ग।

दिव्यास्त्रों का संग्राम और अश्वसेन की प्रतिशोध-यात्रा

सारथियों की भी एक-दूसरे पर दृष्टि पड़ी। केशव ने शल्य को तीखी दृष्टि से बेधा, शल्य ने भी वैसी ही दृष्टि डाली, पर वासुदेव ने शल्य को अपनी दृष्टि से जीत लिया, और अर्जुन ने कर्ण को। तब कर्ण ने मुस्कराकर शल्य से पूछा, यदि आज पार्थ मुझे मार डाले, तो आप क्या करेंगे? शल्य ने उत्तर दिया, यदि आप मारे गए तो मैं स्वयं कृष्ण और अर्जुन दोनों को मारूँगा। उधर अर्जुन ने भी कृष्ण से यही पूछा। कृष्ण ने मुस्कराकर गम्भीर वचन कहे, सूर्य अपने स्थान से गिर पड़े, पृथ्वी हज़ार टुकड़े हो जाए, अग्नि शीतल हो जाए, फिर भी कर्ण आपको न मार सकेगा। यदि ऐसा हो भी जाए तो जान लीजिए कि सृष्टि का विनाश निकट है। फिर भी, मैं अपनी नंगी भुजाओं से कर्ण और शल्य दोनों को मार दूँगा।

तब अर्जुन की वानर-ध्वजा कर्ण की हाथी-रस्सी वाली ध्वजा पर झपट पड़ी और नखों-दाँतों से उस पर टूटी, जैसे गरुड़ साँप पर। यह उन दोनों ध्वजाओं का युद्ध था, जो द्यूत के समय जो ठहर गया था उसी का परिणाम था।

कर्ण के धनुष से छूटा अग्निमय महाबाण आकाश चीर रहा है, दूसरी ओर कृष्ण हाथ बढ़ाकर संकेत कर रहे हैं

युद्ध आरम्भ हुआ। कर्ण ने पहले पार्थ को दस बाणों से बेधा, अर्जुन ने भी वक्ष के मध्य दस तीखे बाण मारे। फिर अर्जुन ने एक आग्नेय अस्त्र छोड़ा जिसने पृथ्वी, आकाश और दिशाओं को अपने तेज से जला दिया। सब योद्धाओं के वस्त्र जलने लगे। कर्ण ने वरुणास्त्र छोड़कर उसे बुझाया, और आकाश को मेघों से ढक दिया। अर्जुन ने वायव्यास्त्र से वे मेघ उड़ा दिए और इन्द्र का प्रिय अस्त्र छोड़ा, जिससे गाण्डीव से हज़ारों बाण वज्र के वेग से निकले और कर्ण के घोड़ों, धनुष, जुए, पहियों और ध्वजा में धँस गए। रक्त में नहाए कर्ण ने भार्गव अस्त्र (परशुराम से प्राप्त) छोड़कर पार्थ की बाण-वृष्टि काट डाली और पाण्डव-सेना के रथ-हाथी-पैदल नष्ट किए।

तब क्रुद्ध भीम ने अर्जुन से कहा, हे जिष्णु, यह धर्मभ्रष्ट सूतपुत्र आपके सामने इतने पाञ्चाल-वीरों को कैसे मार रहा है? जिसे देवता और कालकेय भी न जीत सके, जिसने स्वयं स्थाणु (शिव) की भुजाओं का स्पर्श पाया, वे आपके बाण आज यह सूतपुत्र कैसे व्यर्थ कर रहा है? द्रौपदी के दुःख और इसके कटु, निर्दय वचन, “बिना गिरी के तिल!”, स्मरण कर इस नीच कर्ण को आज ही मार डालिए। यह उपेक्षा का समय नहीं। मैं भी अपनी गदा से इसे कुचलूँगा।

तब कृष्ण ने भी कहा, हे अर्जुन, यह क्या कि कर्ण आज आपके अस्त्र काट रहा है? आप अपनी सुधि क्यों खो रहे हैं? देखते नहीं कि कौरव हर्ष से चिल्ला रहे हैं? जिस धैर्य से आपने खाण्डव में अग्नि को तृप्त किया, उसी धैर्य से कर्ण को मारिए। मैं आपको यह सुदर्शन देता हूँ, इससे इसका सिर काटिए, जैसे इन्द्र ने वज्र से नमुचि का सिर काटा। भीम और जनार्दन से प्रेरित अर्जुन ने कहा, मैं अब संसार के कल्याण और सूतपुत्र के विनाश के लिए एक भयानक अस्त्र छोड़ता हूँ। और उन्होंने ब्रह्मा को प्रणाम कर ब्रह्मास्त्र छोड़ा, जो केवल मन से चलाया जा सकता था। पर कर्ण ने उसे भी व्यर्थ कर दिया।

तब भीम के फिर कहने पर अर्जुन ने दूसरा ब्रह्मास्त्र छोड़ा, जिससे सोने के पंख वाले सैकड़ों-हज़ारों बाण कर्ण के रथ को ढकने लगे। कर्ण ने भीम, जनार्दन और अर्जुन, तीनों को तीन-तीन बाणों से बेधकर गर्जना की। अर्जुन ने फिर अठारह बाण छोड़े, कर्ण की ध्वजा को एक से, शल्य को चार से और कर्ण को तीन से बेधा, और सोने के कवच वाले कौरव-योद्धा सभापति को दस बाणों से मारा, जो शाल वृक्ष के समान गिर पड़ा। फिर अर्जुन ने कर्ण को बार-बार बेधते हुए चार सौ हाथी, आठ हज़ार रथी, सवारों सहित एक हज़ार घोड़े और आठ हज़ार पैदल मार डाले, और कर्ण को सारथि-रथ-घोड़े-ध्वजा सहित बाणों से अदृश्य कर दिया।

तब घायल युधिष्ठिर, जिनके शरीर से बाण निकाल लिए गए थे और जो मन्त्र-औषधि से स्वस्थ किए गए थे, इस द्वन्द्व को देखने उस स्थल पर आए। राहु के मुख से छूटे पूर्ण चन्द्र के समान उन्हें देख सब प्राणी आनन्दित हुए।

एक उप-कथा (अश्वसेन): इसी द्वन्द्व के बीच नीचे पाताल में अश्वसेन नाम का नाग, तक्षक का पुत्र, अपने समय बिता रहा था। खाण्डव-दाह में अर्जुन ने उसकी माता को मार डाला था, और उसी वैर को स्मरण कर वह अर्जुन के विनाश के लिए ऊपर आया। वह बाण का रूप धारण कर कर्ण के तरकश में जा घुसा, कर्ण को यह ज्ञात भी न था। यह कथा का वह सूत्र है जो खाण्डव-दाह से आरम्भ होकर अब कर्ण के अन्तिम बाण तक पहुँचता है।

तब कर्ण ने पार्थ की प्रत्यंचा टूटते ही सौ छोटे बाण मारे, कृष्ण को साठ और अर्जुन को आठ। फिर कर्ण ने भीम पर हज़ारों बाण बरसाए। पर अर्जुन ने फिर प्रत्यंचा बाँधकर शल्य के कवच पर दस बाण, कर्ण पर बारह और सात बाण मारे। कर्ण रक्त में नहाए हुए प्रलयकालीन रुद्र के समान दिखे। तब कर्ण ने पाँच बाण कृष्ण के शरीर में पैठाए, वे पाँचों तक्षक-पुत्र अश्वसेन के पक्ष के मायावी नाग थे। पर अर्जुन ने उन पाँचों को तीन-तीन टुकड़ों में काट डाला। कृष्ण के अंग उन साँप-बाणों से कटे देख अर्जुन घास के ढेर को जलाती अग्नि के समान क्रोध से धधक उठे और कर्ण के मर्मों में अनेक बाण मारे। कर्ण पीड़ा से काँप उठे, पर बड़े कष्ट से धैर्य धारण कर खड़े रहे। अर्जुन ने दो हज़ार कौरव-वीरों को मार डाला जो कर्ण के रथ-चक्रों और पार्श्वों की रक्षा कर रहे थे। तब आपके पुत्र और शेष कौरव कर्ण को छोड़कर भाग चले। फिर भी कर्ण विचलित नहीं हुए, और प्रसन्न मन से अर्जुन पर झपटे।

सार: यह दिव्यास्त्रों का संग्राम है, आग्नेय बनाम वरुण, वायव्य बनाम मेघ, ब्रह्मास्त्र बनाम ब्रह्मास्त्र। कर्ण भार्गव अस्त्र से, जो परशुराम ने दिया, अर्जुन के अस्त्र काटते जाते हैं। और इसी बीच अश्वसेन नाग कर्ण के तरकश में छिप जाता है, खाण्डव-दाह की एक पुरानी कथा अब अन्तिम बाण में लौट रही है।

अश्वसेन-बाण और किरीट का गिरना

उस भयानक संग्राम में, जब कर्ण किसी प्रकार पार्थ पर विजय न पा सके और स्वयं बाणों से अत्यन्त घायल हो गए, तब उन्होंने उस एक बाण पर मन लगाया जो अकेला एक तरकश में पड़ा था। यह वही फणमुख (साँप के मुख वाला), तेजस्वी, भयानक बाण था जिसे कर्ण ने बहुत वर्षों से पार्थ के विनाश के लिए सँभालकर रखा था और जो चन्दन-चूर्ण के बीच सोने के तरकश में पूजित था। उसे प्रत्यंचा पर चढ़ाकर, कान तक खींचकर, कर्ण ने पार्थ के मस्तक को काटने के लिए लक्ष्य साधा। यह वही ऐरावत-कुल में जन्मा बाण था, जिसमें अश्वसेन नाग समाया था। आकाश और दिशाएँ धधक उठीं, उल्काएँ और वज्र गिरने लगे। इन्द्र समेत लोकपाल हाहाकार करने लगे। कर्ण को यह ज्ञात न था कि अश्वसेन अपनी योग-शक्ति से उस बाण में प्रवेश कर चुका है।

कर्ण को वह बाण साधते देख शल्य ने कहा, हे कर्ण, यह बाण अर्जुन का सिर काटने में सफल न होगा। ध्यान से कोई दूसरा बाण साधिए जो शत्रु का सिर काट सके। पर क्रोध से जलती आँखों वाले कर्ण ने कहा, हे शल्य, कर्ण एक बाण को दो बार नहीं साधता। हम-जैसे योद्धा कुटिल नहीं होते। यह कहकर उन्होंने बड़ी सावधानी से वह बाण छोड़ा और कहा, हे फाल्गुन, आप मारे गए!

कर्ण की भुजाओं से छूटा वह भयानक बाण आकाश में अग्नि या सूर्य के समान धधकता हुआ ऐसे चला मानो किसी स्त्री की माँग खींची हो। उसे आकाश में धधकता देख, कंसहन्ता माधव ने बड़ी सहजता से अपने पैरों से उस श्रेष्ठ रथ को लगभग एक हाथ धरती में दबा दिया। इससे चन्द्र-किरण के समान श्वेत, सोने के साज वाले घोड़े घुटने टेककर धरती पर बैठ गए। तब आकाश में वासुदेव की प्रशंसा में स्वर गूँज उठे और कृष्ण पर दिव्य पुष्प बरसे।

रथ के धरती में दब जाने से कर्ण का वह बाण अर्जुन का सिर तो न काट सका, पर पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग और जल में प्रसिद्ध, अर्जुन के मस्तक का वह श्रेष्ठ किरीट (मुकुट), अपने साँप-बाण के स्वभाव और जिस क्रोध और सावधानी से वह छोड़ा गया था, उससे, अर्जुन के सिर से उड़ा ले गया। वह किरीट सूर्य, चन्द्र, अग्नि या ग्रह के तेज वाला, सोने-मोती-रत्न-हीरे से सजा, स्वयम्भू ब्रह्मा ने पुरन्दर (इन्द्र) के लिए बड़ी सावधानी से बनाया था, और इन्द्र ने उसे अर्जुन को दिया था जब वह देवताओं के शत्रुओं का संहार करने गए थे। वह किरीट रुद्र, वरुण और कुबेर के पिनाक, पाश और वज्र से भी न टूट सकता था। पर वृष (कर्ण) ने उसे साँप-प्रेरित बाण से बलपूर्वक तोड़ डाला। वह सुन्दर किरीट उदयाचल से गिरते सूर्य-बिम्ब के समान धरती पर गिर पड़ा। सारे लोकों में वैसा कोलाहल उठा जैसा आँधी से क्षुब्ध होने पर पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग और जल गरजते हैं।

सर्पबाण से अर्जुन का मुकुट उड़ गया है, कृष्ण ने रथ को दबाकर धरती में धँसा दिया है

किरीटहीन, श्यामवर्ण और युवा पार्थ ऊँचे शिखर वाले नीले पर्वत के समान शोभा पा रहे थे। उन्होंने अपने केश एक श्वेत वस्त्र से बाँध लिए और पूर्णतया अविचल खड़े रहे। उस श्वेत पट्टी के साथ वे सूर्य-रश्मियों से प्रकाशित उदयाचल के समान दिखे। इस प्रकार उस नागिनी ने, जिसे अर्जुन ने खाण्डव में मारा था, अपने पुत्र अश्वसेन के द्वारा, कर्ण से छोड़े बाण के रूप में, अर्जुन का केवल किरीट ही ले लिया। पर अर्जुन भी उस नाग को यमराज के वश में किए बिना युद्ध से न लौटे।

अर्जुन का किरीट जलाकर वह बाण-रूपी नाग फिर अर्जुन की ओर लौटना चाहता था। कर्ण ने, जो उसे देख तो रहे थे पर पहचान न पाए, पूछा, आप कौन हैं ऐसे भयानक रूप वाले? नाग ने कहा, मुझे पार्थ का सताया हुआ जानिए। मेरी माता को मारने के कारण मेरा उससे वैर है। मुझे फिर से छोड़िए, मैं आपके और अपने शत्रु को मार डालूँगा। कर्ण ने कहा, कर्ण आज दूसरे के बल का आश्रय लेकर विजय नहीं चाहता। चाहे सौ अर्जुन मारने पड़ें, मैं वही बाण दो बार न छोड़ूँगा। आप सुखी रहें, अन्यत्र जाएँ। तब क्रोध से वह नाग स्वयं बाण-रूप धारण कर पार्थ के वध को चला।

तब कृष्ण ने अर्जुन से कहा, अपने इस शत्रु महान् नाग को मार डालिए। अर्जुन ने पूछा, यह कौन नाग स्वयं ही मेरी ओर आ रहा है, मानो गरुड़ के मुख की ओर बढ़ रहा हो? कृष्ण ने बताया, खाण्डव में जब आप अग्नि को तृप्त कर रहे थे, यह नाग आकाश में अपनी माता के शरीर में छिपा था। एक ही साँप समझकर आपने उसकी माता को मारा। उसी वैर को स्मरण कर यह आज आपके विनाश को आया है। तब क्रोध से मुख फेरकर अर्जुन ने छह तीखे बाणों से उस तिरछे चलते नाग को आकाश में ही काट डाला, और वह धरती पर गिर पड़ा। तब कृष्ण ने अपनी भुजाओं से वह रथ धरती से उठा लिया।

समझने की कुंजी (कृष्ण का हस्तक्षेप): ध्यान दीजिए, यह कृष्ण का पहला सीधा हस्तक्षेप है, वे पैरों से रथ को धरती में दबाकर कर्ण के अमोघ बाण को अर्जुन के सिर के बजाय किरीट पर पड़ने देते हैं। यह “नियम” का उल्लंघन नहीं, पर युद्ध-कौशल का वह क्षण है जहाँ सारथि स्वयं युद्ध की दिशा मोड़ देता है। कथा इसे छिपाती नहीं, उत्सव के साथ कहती है: आकाश से वासुदेव की प्रशंसा में पुष्प बरसते हैं। साथ ही कर्ण की चारित्रिक ऊँचाई भी यहीं उभरती है, वे एक बाण दो बार नहीं चलाते, और दूसरे के बल पर विजय नहीं चाहते।

सार: कर्ण का अमोघ साँप-बाण अर्जुन के प्राण के बजाय केवल किरीट ले पाता है, क्योंकि कृष्ण रथ को धरती में दबा देते हैं। अश्वसेन फिर लौटना चाहता है, पर कर्ण उसे ठुकरा देते हैं, और अर्जुन उसे काट डालते हैं। खाण्डव-दाह का पुराना वैर यहीं चुकता हो जाता है।

धर्म की पुकार, और रथ के पहिये का धरती में धँसना

तब कर्ण ने तिरछी दृष्टि से अर्जुन को देखकर कृष्ण को दस बाणों से बेधा। अर्जुन ने कर्ण को बारह बाणों से बेधकर एक बाण ऐसा छोड़ा जो कर्ण के कवच को भेदकर, उनका रक्त पीकर, धरती में समा गया। कर्ण ने भी जनार्दन को बारह और अर्जुन को निन्यानबे बाणों से बेधकर गर्जना की। पर अर्जुन शत्रु का यह हर्ष न सह सके। मानव-शरीर के सब मर्मों के ज्ञाता पार्थ ने उन मर्मों में सैकड़ों बाण मारे और फिर नब्बे बाण, जो प्रत्येक यम-दण्ड के समान थे, कर्ण पर छोड़े। उनसे बिंधकर कर्ण वज्र से टूटे पर्वत के समान काँप उठे।

अर्जुन ने अपने पंख वाले बाणों से कर्ण का रत्नजटित शिरस्त्राण और कुण्डल काट डाले। फिर अनेक कारीगरों द्वारा बड़े यत्न से बनाया कर्ण का चमकीला कवच क्षण भर में अनेक टुकड़ों में काट दिया, और चार तीखे बाणों से कर्ण को बेधा। बाण-दर-बाण अर्जुन कर्ण के मर्मों को बेधते रहे, और कर्ण रक्त की लाल धाराओं वाले गेरू-पर्वत के समान दिखने लगे। तब कर्ण अपना शक्र-तुल्य धनुष और तरकश छोड़कर, पीड़ा से स्तब्ध और डगमगाते, निष्क्रिय खड़े रह गए।

धर्मात्मा और पुरुषार्थ के नियम को मानने वाले अर्जुन ने इस संकट में पड़े शत्रु को मारना न चाहा। तब इन्द्र के अनुज (विष्णु अर्थात् कृष्ण) ने उत्तेजना से कहा, हे पाण्डुपुत्र, आप इतने भुलक्कड़ क्यों हो रहे हैं? जो सचमुच बुद्धिमान हैं वे शत्रु को, चाहे वह दुर्बल ही हो, क्षण भर के लिए भी नहीं छोड़ते। संकट में पड़े शत्रु को मारकर मनुष्य पुण्य और यश पाता है। इस कर्ण को शीघ्र कुचलिए, यह सँभलते ही फिर आप पर आक्रमण करेगा। इसे नमुचि को मारते इन्द्र के समान मारिए।

“ऐसा ही हो, हे कृष्ण” कहकर अर्जुन ने जनार्दन की पूजा कर फिर कर्ण को अनेक बाणों से बेधा, और कर्ण तथा उनके रथ-घोड़ों को सोने के पंख वाले बाणों से ढक दिया। कर्ण भी बाण-वृष्टि करते हुए अस्ताचल की ओर बढ़ते सूर्य के समान शोभा पाने लगे। पर अर्जुन के बाणों ने कर्ण के साँप-तुल्य बाणों को आकाश में ही नष्ट कर दिया। कर्ण ने फिर धैर्य पाकर पार्थ को दस और कृष्ण को छह बाणों से बेधा।

तब अर्जुन ने एक भयानक लोहे का बाण साधा, जिसकी टंकार इन्द्र-वज्र के समान थी। ठीक उसी समय, जब कर्ण की मृत्यु की घड़ी आ पहुँची थी, काल अदृश्य रूप से पास आकर, ब्राह्मण के शाप का संकेत देता हुआ, कर्ण को उनकी निकट मृत्यु बताता हुआ बोला, “पृथ्वी आपका पहिया निगल रही है!” और सचमुच कर्ण की मृत्यु-घड़ी आते ही वह उच्च ब्रह्मास्त्र, जो परशुराम ने उन्हें दिया था, उनकी स्मृति से लुप्त हो गया, और धरती उनके रथ का बायाँ पहिया निगलने लगी।

उस ब्राह्मण के शाप से कर्ण का रथ धरती में गहरा धँसकर ऐसे अटक गया जैसे ऊँचे चबूतरे पर फूलों से लदा कोई पवित्र वृक्ष। जब रथ डगमगाने लगा, जब परशुराम से पाया अस्त्र भीतर से प्रकाशित न हुआ, और जब उनका साँपमुख बाण भी पार्थ ने काट डाला, तब कर्ण विषाद से भर उठे। इन कष्टों को न सह पाकर वे भुजाएँ हिलाते हुए धर्म को कोसने लगे, “धर्म के ज्ञाता सदा कहते हैं कि धर्म धर्मियों की रक्षा करता है। हम तो यथाशक्ति धर्म का ही पालन करते रहे, पर वही धर्म आज हम-जैसे धर्मनिष्ठ को रक्षा करने के बदले नष्ट कर रहा है। अतः मैं मानता हूँ कि धर्म सदा अपने उपासकों की रक्षा नहीं करता।” यह कहते-कहते वे अर्जुन के बाणों से व्याकुल हो उठे। उनके घोड़े और सारथि भी अपने स्थान से विचलित हो गए।

समझने की कुंजी (दो शाप): कर्ण के दो शाप यहाँ फलित होते हैं। पहला, परशुराम (भार्गव) का, कर्ण ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर उनसे ब्रह्मास्त्र सीखा था; भेद खुलने पर परशुराम ने शाप दिया कि गहरे-से-गहरे संकट में वह अस्त्र भूल जाएगा, और ठीक वही होता है। दूसरा, एक ब्राह्मण का, कर्ण ने अनजाने में उसकी गाय मारी थी, और उसने शाप दिया कि युद्ध में कर्ण का रथ-पहिया धरती निगल लेगी जब वह परम असहाय होगा। दोनों एक साथ फलित होते हैं। कर्ण का धर्म को कोसना कथा की नैतिक जटिलता का शिखर है, जो जीवन भर धर्म का दावा करता रहा, वह अन्तिम क्षण में धर्म से छला हुआ अनुभव करता है।

सार: यहाँ कर्ण के दोनों शाप एक साथ फलते हैं: परशुराम का दिया अस्त्र स्मृति से उड़ जाता है, और ब्राह्मण के शाप से रथ का पहिया धरती निगल लेती है। कर्ण धर्म को कोसते हैं, यह क्षण कथा को सरल “अच्छाई की जीत” नहीं रहने देता।

पहिये के लिए कर्ण की प्रार्थना और कृष्ण की फटकार

कर्ण ने तीन भयानक बाणों से कृष्ण की भुजा और सात से पार्थ को बेधा। अर्जुन ने सत्रह सीधे, अग्नि-तुल्य बाण छोड़े, जो कर्ण को बेधकर धरती में समा गए। काँपते हुए कर्ण ने पूरी शक्ति से ब्रह्मास्त्र का आह्वान किया, और अर्जुन ने ऐन्द्रास्त्र से उसे रोका। कर्ण ने अनेक तीखे बाणों से अर्जुन की प्रत्यंचा काटी, एक, फिर दूसरी, फिर तीसरी, यों ग्यारह प्रत्यंचाएँ काटीं। पर अर्जुन इतनी शीघ्रता से हर प्रत्यंचा बदल देते थे कि कर्ण यह जान ही न पाए कि पार्थ के धनुष में सौ प्रत्यंचाएँ हैं। यह उन्हें अत्यन्त विस्मयकारी लगा।

तब कृष्ण ने कहा, पार्थ, पास जाकर श्रेष्ठ अस्त्रों से प्रहार कीजिए। क्रोध से भरे अर्जुन ने एक दिव्यास्त्र पर रौद्र अस्त्र जोड़कर छोड़ने की इच्छा की। उसी समय, हे राजन्, धरती ने कर्ण के रथ का एक पहिया निगल लिया। कर्ण शीघ्र रथ से उतरे और दोनों भुजाओं से वह धँसा पहिया पकड़कर पूरी शक्ति से उठाने लगे। कर्ण के बल से वह धरती, जो पहिया निगल चुकी थी, अपने सात द्वीपों, पर्वतों, जलों और वनों सहित चार अंगुल ऊपर उठ आई। पर पहिया न उठा। पहिया धँसा देख कर्ण क्रोध से आँसू बहाने लगे और अर्जुन से बोले,

“हे पार्थ, हे पार्थ, क्षण भर ठहर जाइए, जब तक मैं यह धँसा पहिया उठा लूँ। मेरे रथ का बायाँ पहिया संयोगवश धरती में धँस गया है, अतः इस उद्देश्य को त्याग दीजिए जो केवल कायर के मन में आ सकता है। धर्मनिष्ठ वीर बिखरे केश वालों पर, युद्ध से मुँह फेरे लोगों पर, ब्राह्मण पर, हाथ जोड़े या शरण माँगते पर, हथियार रखे, बाण समाप्त किए, कवच गिरे या हथियार टूटे योद्धा पर बाण नहीं चलाते। आप संसार के परम वीर और धर्मात्मा हैं, युद्ध के नियमों के ज्ञाता हैं। अतः क्षण भर मुझे क्षमा कीजिए, जब तक मैं पहिया निकाल लूँ। आप रथ पर हैं और मैं धरती पर दुर्बल खड़ा हूँ, मुझे अभी मारना आपको शोभा नहीं देता। न वासुदेव, न आप, मुझे रत्ती भर भय देते हैं। आप क्षत्रिय हैं, उच्च कुल के रक्षक हैं। धर्म के उपदेश स्मरण कर मुझे क्षण भर क्षमा कीजिए।”

कर्ण घुटनों पर बैठे घायल नकुल के गले में धनुष डालकर उन्हें छोड़ रहे हैं, पीछे कृष्ण का रथ है

तब रथ पर खड़े वासुदेव ने कर्ण से कहा, “सौभाग्य है, हे राधापुत्र, कि आपको धर्म स्मरण आ रहा है! प्रायः देखा जाता है कि जो नीच हैं, वे संकट में पड़ने पर भाग्य को कोसते हैं, अपने दुष्कर्मों को नहीं। आपने, सुयोधन, दुःशासन और शकुनि ने मिलकर एक वस्त्र में लिपटी द्रौपदी को सभा में घसीटवाया था, उस समय, हे कर्ण, आपका यह धर्म कहाँ था? जब सभा में शकुनि ने पासे के अनजान युधिष्ठिर को छल से हराया, तब आपका यह धर्म कहाँ गया था? जब दुर्योधन ने आपकी मन्त्रणा से भीम को साँपों और विष-भोजन से मारना चाहा, तब कहाँ था? जब वनवास और तेरहवाँ वर्ष पूरा हुआ और आपने पाण्डवों का राज्य न लौटाया, तब कहाँ था? वारणावत में लाक्षागृह को आग लगाकर सोते पाण्डवों को जलाना चाहा, तब, हे राधापुत्र, कहाँ था? रजस्वला और अल्प-वस्त्रा द्रौपदी पर आप सभा में हँसे, तब कहाँ था? अन्तःपुर से निर्दोष कृष्णा को घसीटा गया और आपने न रोका, तब कहाँ था? आपने स्वयं द्रौपदी से कहा, ‘पाण्डव नष्ट हो गए, नरक में जा गिरे, आप दूसरा पति चुन लीजिए’, और उस दृश्य को प्रसन्न होकर देखा, तब, हे कर्ण, यह धर्म कहाँ था? जब अनेक महारथियों ने बालक अभिमन्यु को घेरकर मारा, तब कहाँ था? यदि वह धर्म उन अवसरों पर कहीं न था, तो अब उसका नाम लेकर तालू सुखाने से क्या लाभ? अब आप धर्म पर चलना चाहते हैं, हे सूत, पर जीवित न बचेंगे।”

समझने की कुंजी (नैतिक जटिलता का केन्द्र): यह महाभारत का गहरे-से-गहरा नैतिक स्थल है, और इसे न छिपाया जा सकता है, न नरम किया जा सकता है। कर्ण युद्ध-नियम का सहारा माँगते हैं, रथहीन, असहाय शत्रु को मारना अधर्म है, और यह सत्य है। पर कृष्ण उसी कर्ण के पुराने अधर्मों की सूची गिनाते हैं। कथा यहाँ किसी एक को निर्दोष नहीं ठहराती: कर्ण का धर्म-दावा भी सच्चा है, और कृष्ण की भर्त्सना भी। यही व्यास की दृष्टि है, जहाँ धर्म और अधर्म एक-दूसरे में गुँथे हैं, और विजय का मार्ग भी पूर्णतया निष्कलंक नहीं।

कृष्ण ने आगे कहा, जैसे नल पुष्कर से पासे में हारकर भी पराक्रम से राज्य वापस पा गए, वैसे ही निर्लोभ पाण्डव अपने बाहुबल से, अपने सब मित्रों सहित, राज्य फिर पाएँगे। शत्रुओं को मारकर वे, सोमकों सहित, अपना राज्य पाएँगे, और धृतराष्ट्र-पुत्र उन्हीं सिंह-तुल्य पाण्डवों के हाथों, जो सदा धर्म से रक्षित हैं, विनाश को प्राप्त होंगे।

यों कहे जाने पर कर्ण ने लज्जा से सिर झुका लिया और कोई उत्तर न दिया। क्रोध से काँपते होंठों के साथ उन्होंने अपना धनुष उठाया और पार्थ से युद्ध करते रहे। तब वासुदेव ने अर्जुन से कहा, हे महाबली, दिव्यास्त्र से कर्ण को बेधकर गिरा दीजिए।

सार: कर्ण पहिये के लिए क्षण भर माँगते हैं और युद्ध-धर्म की दुहाई देते हैं। कृष्ण उनके सब पुराने अधर्म गिनाकर वह दुहाई काट देते हैं, द्यूत, चीर-हरण, लाक्षागृह, अभिमन्यु-वध। यह वह क्षण है जहाँ महाभारत का धर्म सीधी रेखा नहीं रहता: दोनों पक्ष आधे सच्चे, आधे दोषी।

अंजलिक बाण और कर्ण का वध

कृष्ण के वचनों को स्मरण करते अर्जुन क्रोध से धधक उठे, और उनके शरीर के सब रोमकूपों से मानो अग्नि की ज्वालाएँ निकलने लगीं। यह दृश्य अत्यन्त अद्भुत था। यह देखकर कर्ण ने ब्रह्मास्त्र से अर्जुन पर बाण-वृष्टि की और फिर रथ निकालने का यत्न किया। अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र से वर्षा की। कुन्तीपुत्र ने आग्नेय बाण छोड़ा, कर्ण ने वरुणास्त्र से उसे बुझाकर मेघों से दिशाएँ अन्धकारमय कर दीं। अर्जुन ने वायव्य अस्त्र से वे मेघ उड़ा दिए।

तब कर्ण ने अर्जुन के वध को एक भयानक, अग्नि-तुल्य बाण उठाया। जब वह बाण प्रत्यंचा पर चढ़ा, तब पृथ्वी अपने पर्वतों-जलों-वनों सहित काँप उठी, प्रचण्ड वायु कंकड़ बरसाने लगी, दिशाएँ धूल से ढक गईं, और आकाश में देवताओं के बीच शोक के स्वर उठे। वह बाण कर्ण की भुजाओं से छूटकर अर्जुन के वक्ष में ऐसे घुसा जैसे साँप बाँबी में घुसता है। उससे गहरे बिंधकर विभत्सु (अर्जुन का नाम) डगमगा उठे, उनकी पकड़ ढीली हुई और गाण्डीव हाथ से छूट गया। वे भूकम्प में पर्वतराज के समान काँप उठे।

उस अवसर का लाभ उठाकर कर्ण, अपना धँसा पहिया निकालने को, रथ से कूद पड़े। दोनों भुजाओं से पहिया पकड़कर उन्होंने पूरी शक्ति लगाई, पर महान् बल होने पर भी, जैसा भाग्य था, वे विफल रहे। इसी बीच किरीटधारी अर्जुन सचेत हुए और उन्होंने यम-दण्ड के समान घातक “अंजलिक” नामक बाण उठाया। तब वासुदेव ने कहा, हे पार्थ, इस शत्रु वृष (कर्ण) का सिर अपने बाण से काट डालिए, इससे पहले कि यह रथ पर चढ़ जाए।

वासुदेव के वचनों का अभिनन्दन करते हुए, जब तक शत्रु का पहिया धँसा हुआ था, अर्जुन ने एक तेज, क्षुरप्र बाण से कर्ण की वह हाथी-रस्सी वाली ध्वजा काट दी, जो सोने-मोती-रत्न-हीरे से जड़ी, श्रेष्ठ कारीगरों द्वारा बनाई, सूर्य के समान देदीप्यमान थी, और जो आपकी सेना का उत्साह तथा शत्रु का भय थी। उस ध्वजा के गिरते ही कुरुओं का यश, गर्व, विजय की आशा और हृदय, सब गिर पड़े, और कौरव-सेना में “हाय” “हाय” के स्वर उठे। आपकी सेना को कर्ण की विजय की आशा न रही।

अर्जुन के बाण से कर्ण के रथ की हाथी-चिह्न वाली स्वर्णिम ध्वजा टूटकर गिर रही है

तब कर्ण के विनाश के लिए शीघ्रता करते अर्जुन ने अपने तरकश से वह श्रेष्ठ अंजलिक अस्त्र निकाला, जो इन्द्र-वज्र या अग्नि-दण्ड के समान, सहस्र-किरण सूर्य के तेज वाला, मर्मभेदी, रक्त-मांस से लिप्त, मनुष्य-घोड़े-हाथी का नाशक, तीन हाथ और छह पाँव लम्बा, और सब प्राणियों के लिए भयानक था। यह बाण देवताओं से भी अजेय था, और सदा पाण्डुपुत्र द्वारा पूजित। उसे साधते देख सम्पूर्ण सचराचर सृष्टि काँप उठी, और ऋषि ऊँचे स्वर में पुकार उठे, “सृष्टि का कल्याण हो!”

गाण्डीवधारी ने उस अनुपम बाण को धनुष पर चढ़ाकर कहा, “यदि मैंने कभी तप किया हो, गुरुजनों को तृप्त किया हो, और हितैषियों की मन्त्रणा सुनी हो, तो मेरा यह बाण शत्रु के शरीर और हृदय का शीघ्र नाश करने वाला महान् अस्त्र हो। इस सत्य से, मेरे द्वारा पूजित यह तीक्ष्ण बाण मेरे शत्रु कर्ण को मार डाले।” यह कहकर धनंजय ने वह भयानक बाण कर्ण के विनाश के लिए छोड़ा, जो अंगिरा के अथर्वन में बताए विधान के समान फलदायी, तेज से देदीप्यमान, और युद्ध में स्वयं मृत्यु के लिए भी असह्य था। और किरीट-माला से सजे पार्थ ने प्रसन्नता से कहा, “यह बाण मेरी विजय का कारण बने। मेरा छोड़ा यह सूर्य-तुल्य बाण कर्ण को यमराज के पास पहुँचा दे।”

उस अंजलिक अस्त्र से अर्जुन ने अपने शत्रु का सिर वैसे काट डाला जैसे इन्द्र ने वज्र से वृत्र का सिर काटा था। दोपहर बाद के उस समय में इन्द्रपुत्र ने वैकर्तन कर्ण का सिर काट दिया। कर्ण का धड़ धरती पर गिर पड़ा। उगते सूर्य के समान तेजस्वी उनका मस्तक धरती पर ऐसे गिरा जैसे अस्ताचल से रक्तिम सूर्य गिरता हो। वह मस्तक कर्ण के सुन्दर, सदा वैभव में पले शरीर को बड़ी अनिच्छा से ऐसे छोड़ रहा था जैसे कोई स्वामी धन से भरे अपने सुन्दर भवन को बड़ी अनिच्छा से छोड़ता है। रक्त बहाते कर्ण का लम्बा धड़ वर्षा के बाद बहती रक्तिम धाराओं वाले गेरू-पर्वत के शिखर के समान गिर पड़ा। तब उस गिरे हुए कर्ण के शरीर से एक ज्योति आकाश को चीरती हुई सूर्य में समा गई। यह अद्भुत दृश्य कर्ण के गिरने के बाद मनुष्य-योद्धाओं ने देखा।

तब पाण्डवों ने हर्ष से शंख फूँके। कृष्ण और अर्जुन ने भी शंख बजाए। सोमक हर्ष से चिल्लाने लगे, बाजे बजाने और वस्त्र हिलाने लगे। सब योद्धा पार्थ के पास आकर उनकी प्रशंसा करने लगे, और कुछ नाचते-गाते कहने लगे, सौभाग्य से कर्ण धरती पर लेटा और बाणों से बिंधा। कर्ण का कटा मस्तक आँधी से ढहे पर्वत-शिखर, यज्ञ के बाद बुझी अग्नि, या अस्ताचल पहुँचे सूर्य-बिम्ब के समान दिख रहा था। बाणों को किरण बनाकर शत्रु-सेना को तपाने वाले उस कर्ण-सूर्य को अन्ततः महाबली अर्जुन-काल ने अस्त कर दिया। जैसे अस्ताचल की ओर जाता सूर्य अपनी सब किरणें समेट ले जाता है, वैसे ही अर्जुन का वह बाण कर्ण के प्राण समेट ले गया। सहस्र दल वाले कमल के समान सुन्दर मुख वाला कर्ण का सिर धरती पर ऐसे गिरा जैसे दिन के अन्त में सहस्र-किरण सूर्य।

कर्ण को बाणों से बिंधा, रक्त में नहाया देखकर मद्रराज शल्य ध्वजाहीन रथ पर चल पड़े। कर्ण के गिरने पर शेष कौरव, भय से भरकर, अर्जुन की देदीप्यमान ध्वजा पर बार-बार दृष्टि डालते हुए, युद्ध से भाग चले।

समझने की कुंजी (कर्ण का सत्य-बल): अर्जुन अंजलिक बाण को सत्य की शपथ से अभिमन्त्रित करते हैं, “यदि मैंने तप किया हो, गुरुओं को तृप्त किया हो”, यह सत्यक्रिया कहलाती है, जहाँ अपने जीवन के सत्य को साक्षी बनाकर असम्भव को सम्भव किया जाता है। कर्ण के शरीर से ज्योति का सूर्य में समाना उनके सूर्य-पुत्र होने का संकेत है, और कथा का वह आदर है जो वह अपने पराजित नायक को देती है।

सार: जब कर्ण धँसा पहिया उठाने को रथ से उतरते हैं, अर्जुन कृष्ण के कहने पर अंजलिक बाण से उनका सिर काट देते हैं। कर्ण के शरीर की ज्योति सूर्य में समा जाती है, वही सूर्य जो उनके पिता थे। कौरव-सेना की आशा, गर्व और हृदय कर्ण के साथ ही गिर पड़ते हैं।

कर्ण के बाद, टूटी सेना, दुर्योधन की पुकार

संजय ने कहा, कर्ण और अर्जुन के युद्ध में बाणों से कुचली अपनी सेना देखकर शल्य क्रोध से, साज-रहित रथ पर, चल पड़े। अपनी सेना को सूतपुत्र से हीन, उसके रथ-घोड़े-हाथी नष्ट देखकर दुर्योधन की आँखों से आँसू बहने लगे, और वह बार-बार शोक की मूर्ति बना दीर्घ श्वास लेने लगा। बाणों से बिंधे, रक्त में नहाए, आकाश से गिरे सूर्य के समान धरती पर लेटे कर्ण को देखने योद्धा आकर उन्हें घेरकर खड़े हो गए। उनमें से कुछ हर्ष, कुछ भय, कुछ शोक और कुछ विस्मय दिखा रहे थे।

कर्ण को मारा गया सुनकर कुछ कौरव, अपने बैल को खोकर भयभीत गायों के झुण्ड के समान, भाग चले। भीम भयानक गर्जना करते, बगलें बजाते, उछलते-नाचते कौरवों को भयभीत करने लगे। सोमक और सृंजय शंख फूँकने लगे। सब क्षत्रिय कर्ण को मरा देख हर्ष से एक-दूसरे को गले लगाने लगे। भयानक युद्ध करके कर्ण सिंह द्वारा हाथी के समान अर्जुन के हाथों मारे गए। इस प्रकार पार्थ ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की और कर्ण के प्रति अपने वैर का अन्त किया।

स्तब्ध-हृदय मद्रराज शल्य ध्वजाहीन रथ पर शीघ्र दुर्योधन के पास पहुँचकर शोक से बोले, आपकी सेना के हाथी, घोड़े और श्रेष्ठ रथी मारे गए। पर्वत-तुल्य योद्धा और हाथी एक-दूसरे से टकराकर मारे जाने से आपकी सेना यमलोक-सी दिखती है। हे भारत, कर्ण और अर्जुन के आज के समान युद्ध पहले कभी न हुआ। कर्ण ने आज दोनों कृष्णों और आपके सब शत्रुओं पर प्रबल आक्रमण किया। पर निश्चय ही भाग्य पार्थ के वश में बहा है। इसी से भाग्य पाण्डवों की रक्षा और हमारी हानि कर रहा है। हे भारत, इसके लिए शोक न करें, यह भाग्य है, स्वयं को धीरज दें, सफलता सदा नहीं मिलती। यह सुनकर अपने दुष्कर्मों पर विचार करते दुर्योधन, शोक की मूर्ति बने, लगभग अपनी सुधि खो बैठे और बार-बार दीर्घ श्वास लेने लगे।

धृतराष्ट्र ने पूछा, उस भयानक दिन, जब कर्ण और अर्जुन के उस युद्ध में मेरी सेना बाणों से कुचली और भाग रही थी, उसका क्या रूप था? संजय ने कहा, सुनिए, हे राजन्, ध्यान से, कि वह भयानक संहार कैसे हुआ। कर्ण के गिरने पर पार्थ ने सिंह-गर्जना की, और आपके पुत्रों के हृदय में महान् भय भर गया। कर्ण के गिरने के बाद किसी योद्धा ने सेना को संभालने या पराक्रम दिखाने में मन न लगाया। अपना आश्रय अर्जुन द्वारा नष्ट देख वे ऐसे हो गए जैसे जिनकी नौका अथाह समुद्र में डूब गई हो। सूतपुत्र के वध के बाद कौरव, भयभीत और बाणों से बिंधे, स्वामी-रहित, सिंहों से पीड़ित हाथियों के झुण्ड के समान हो गए। टूटे सींग वाले बैलों या टूटी दाढ़ वाले साँपों के समान वे भाग चले। हथियार और कवच से रहित, दिशाओं का ज्ञान खोकर, एक-दूसरे को कुचलते हुए वे भागे, “वह विभत्सु मेरा पीछा कर रहा है!” “वह वृकोदर मेरा पीछा कर रहा है!”, यही सोचते हर कौरव भय से पीला पड़ गया।

उन्हें भागते देख दुर्योधन ने “हाय” “हाय” करते हुए सारथि से कहा, पार्थ मुझ धनुर्धारी को कभी लाँघ न सकेगा। मेरे घोड़ों को सारी सेना के पीछे धीरे-धीरे हाँकिए। यदि मैं सेना के पीछे खड़ा होकर लड़ूँ, तो कुन्तीपुत्र मुझे वैसे ही न लाँघ सकेगा जैसे समुद्र अपने तट को नहीं लाँघता। अर्जुन, गोविन्द, घमण्डी वृकोदर और शेष शत्रुओं को मारकर मैं कर्ण के ऋण से उऋण हो जाऊँगा। ये वीर और सम्मानित वचन सुनकर सारथि ने घोड़े धीरे हाँके।

तब आपकी सेना के पच्चीस हज़ार पैदल योद्धा, रथ-घोड़े-हाथी से रहित, युद्ध को तैयार हुए। क्रुद्ध भीम और धृष्टद्युम्न ने उन्हें चतुरंगिणी सेना से घेरकर बाण मारे। उन योद्धाओं ने भी भीम और धृष्टद्युम्न से युद्ध किया, कुछ ने नाम लेकर ललकारा। तब भीम क्रोध से भरकर, उचित युद्ध-नियम का पालन करते हुए, रथ से उतरकर, गदा लेकर, उन पैदल शत्रुओं से पैदल ही लड़े और उन सब पच्चीस हज़ार को मार डाला। फिर वे धृष्टद्युम्न को आगे रखकर खड़े हुए।

धनंजय कौरव-रथसेना की ओर बढ़े। नकुल-सहदेव और सात्यकि हर्ष से शकुनि की ओर दौड़े और सुबल-पुत्र की सेना का संहार किया। श्वेत घोड़ों वाला, कृष्ण को सारथि बनाए, गाण्डीव की टंकार करता अर्जुन का रथ देखकर आपकी सेना भाग चली। कोविदार-ध्वज वाले धृष्टद्युम्न का रथ देखकर भी कौरव भयभीत हुए। चेकितान, शिखण्डी और द्रौपदी-पुत्र शंख फूँकने लगे। सब वीर भागती सेना का पीछा करने लगे।

तब अर्जुन ने आपकी सेना का बचा भाग अब भी युद्ध को खड़ा देख, क्रोध से गाण्डीव खींचकर उन्हें बाणों से ढक दिया। उठी धूल से दृश्य अन्धकारमय हो गया और कुछ न दिखने लगा, और आपकी सेना भयभीत होकर सब ओर भाग चली। जब कुरु-सेना यों टूटी, तब कुरुराज दुर्योधन सब शत्रुओं की ओर बढ़ा और सब पाण्डवों को युद्ध को ललकारा, जैसे प्राचीन काल में असुर बलि ने देवताओं को ललकारा था। सब पाण्डव-वीर मिलकर उस पर टूटे, पर क्रोध से भरे दुर्योधन ने निर्भय होकर सैकड़ों-हज़ारों शत्रु मार डाले। अकेले-असहाय उसका सब पाण्डवों से लड़ना अत्यन्त विस्मयकारी था।

फिर दुर्योधन ने बाणों से बिंधी, भागने को उद्यत अपनी सेना को रोककर, अपने सम्मान की रक्षा को संकल्पित होकर, उन योद्धाओं को हर्षित करते हुए कहा, “मुझे धरती या पर्वतों पर वह स्थान नहीं दिखता जहाँ भागकर पाण्डव आपको न मारें! तो भागने से क्या लाभ? पाण्डवों की सेना अब थोड़ी है, दोनों कृष्ण भी अत्यन्त घायल हैं। यदि हम सब युद्ध को खड़े रहें तो विजय निश्चित हमारी होगी। यदि फूट में भागे, तो ये पापी पाण्डव पीछा कर हम सबको मार डालेंगे। अतः रणभूमि में मरना ही श्रेष्ठ है। युद्ध में मृत्यु सुखदायी है। मरा हुआ कोई दुःख नहीं जानता, परलोक में नित्य सुख भोगता है। सुनिए, हे क्षत्रियो, क्षत्रिय-धर्म का पालन करते हुए लड़िए।”

समझने की कुंजी (दुर्योधन का अन्तिम स्वर): कर्ण के गिरते ही कौरव-पक्ष की रीढ़ टूट जाती है, पर दुर्योधन भागता नहीं। शल्य उसे भाग्य का सहारा देते हैं, पर दुर्योधन क्षत्रिय-धर्म और मृत्यु की महिमा का स्वर उठाता है। यहाँ व्यास दुर्योधन को केवल खलनायक नहीं रहने देते; उसके शोक, उसके पश्चात्ताप (“अपने दुष्कर्मों पर विचार करते”), और उसके अन्तिम वीर-संकल्प को साथ रखते हैं।

सार: कर्ण का वध युद्ध का धुरी-बिन्दु था, और उसके गिरते ही कौरव-सेना स्वामी-रहित हो बिखर जाती है। भीम पच्चीस हज़ार पैदल योद्धाओं का संहार करते हैं, और दुर्योधन, शोक और पश्चात्ताप के बीच भी, क्षत्रिय-धर्म का सहारा लेकर अन्तिम बार सेना को खड़ा करता है। कर्ण-पर्व अपने चरम पर पहुँचकर अब शल्य-पर्व की ओर मुड़ रहा है।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), कर्ण पर्व; गीता प्रेस गोरखपुर परम्परा।