अंग 1423

अंग
1423
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बिनु नावै सभु दुखु है दुखदाई मोह माइ ॥
नानक गुरमुखि नदरी आइआ मोह माइआ विछुड़ि सभ जाइ ॥17॥
गुरमुखि हुकमु मंने सह केरा हुकमे ही सुखु पाए ॥
हुकमो सेवे हुकमु अराधे हुकमे समै समाए ॥
हुकमु वरतु नेमु सुच संजमु मन चिंदिआ फलु पाए ॥
सदा सुहागणि जि हुकमै बुझै सतिगुरु सेवै लिव लाए ॥
नानक क्रिपा करे जिन ऊपरि तिना हुकमे लए मिलाए ॥18॥
मनमुखि हुकमु न बुझे बपुड़ी नित हउमै करम कमाइ ॥
वरत नेमु सुच संजमु पूजा पाखंडि भरमु न जाइ ॥
अंतरहु कुसुधु माइआ मोहि बेधे जिउ हसती छारु उडाए ॥
जिनि उपाए तिसै न चेतहि बिनु चेते किउ सुखु पाए ॥
नानक परपंचु कीआ धुरि करतै पूरबि लिखिआ कमाए ॥19॥
गुरमुखि परतीति भई मनु मानिआ अनदिनु सेवा करत समाइ ॥
अंतरि सतिगुरु गुरू सभ पूजे सतिगुर का दरसु देखै सभ आइ ॥
मंनीऐ सतिगुर परम बीचारी जितु मिलिऐ तिसना भुख सभ जाइ ॥
हउ सदा सदा बलिहारी गुर अपुने जो प्रभु सचा देइ मिलाइ ॥
नानक करमु पाइआ तिन सचा जो गुर चरणी लगे आइ ॥20॥
जिन पिरीआ सउ नेहु से सजण मै नालि ॥
अंतरि बाहरि हउ फिरां भी हिरदै रखा समालि ॥21॥
जिना इक मनि इक चिति धिआइआ सतिगुर सउ चितु लाइ ॥
तिन की दुख भुख हउमै वडा रोगु गइआ निरदोख भए लिव लाइ ॥
गुण गावहि गुण उचरहि गुण महि सवै समाइ ॥
नानक गुर पूरे ते पाइआ सहजि मिलिआ प्रभु आइ ॥22॥
मनमुखि माइआ मोहु है नामि न लगै पिआरु ॥
कूड़ु कमावै कूड़ु संघरै कूड़ि करै आहारु ॥
बिखु माइआ धनु संचि मरहि अंति होइ सभु छारु ॥
करम धरम सुचि संजमु करहि अंतरि लोभु विकार ॥
नानक मनमुखि जि कमावै सु थाइ न पवै दरगह होइ खुआरु ॥23॥
सभना रागां विचि सो भला भाई जितु वसिआ मनि आइ ॥
रागु नादु सभु सचु है कीमति कही न जाइ ॥
रागै नादै बाहरा इनी हुकमु न बूझिआ जाइ ॥
नानक हुकमै बूझै तिना रासि होइ सतिगुर ते सोझी पाइ ॥
सभु किछु तिस ते होइआ जिउ तिसै दी रजाइ ॥24॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: माया का मोह दुखदाई साबित होता है। परमात्मा के नाम के बिना और सारा (उद्यम) दुख (का ही मूल) है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर (जिस मनुष्य को यह भेद) दिखाई दे जाता है। (उसके अंदर से) माया का सारा मोह दूर हो जाता है। 17। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रह के पति-प्रभू का हुकम मानता है। वह हुकम में टिक के ही आत्मिक आनंद भोगता है। वह मनुष्य प्रभू के हुकम को हर वक्त याद रखता है। हुकम की भगती करता है। हर वक्त हुकम में लीन रहता है। व्रत (आदि रखने का) नियम। शारीरिक पवित्रता। इन्द्रियों को रोकने का यतन- यह सब कुछ उस मनुष्य के लिए प्रभू का हुकम मानना ही है। (हुकम मान के) वह मनुष्य मन-माँगी मुराद प्राप्त करता है। हे भाई ! जो जीव-स्त्री परमात्मा की रजा को समझती है। जो सुरति जोड़ के गुरू की शरण पड़ी रहती है। वह जीव-स्त्री सदा भाग्यशाली है। हे नानक ! जिन जीवों पर (परमात्मा) मेहर करता है। उनको (अपने) हुकम में लीन कर लेता है। 18। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाली बद्-नसीब जीव-स्त्री (परमात्मा की) रज़ा को नहीं समझती। सदा अहंकार के आसरे (अपने द्वारा मिथे हुए धार्मिक) काम करती रहती है। वह व्रत-नेम। सुच-संजम-देव पूजा (आदि कर्म करती है। पर ये हैं निरे दिखावे। और) दिखावे से मन की भटकना दूर नहीं होती। हे भाई ! (जिन मनुष्यों का मन) अंदर से खोटा रहता है। जो माया के मोह में भेदे रहते हैं (उनके किए हुए धार्मिक कर्म ऐसे ही हैं) जैसे हाथी (नहा कर अपने ऊपर) मिट्टी उड़ा के डाल लेता है। वे मनुष्य उस परमात्मा को याद नहीं करते। जिसने (उनको) पैदा किया। (हरी-नाम का) सिमरन किए बिना कोई मनुष्य कभी सुख नहीं पा सकता। हे नानक ! करतार ने ही धुर-दरगाह से (अपने हुकम से) जगत-रचना की हुई है। हरेक जीव अपने पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार ही (अब भी) कर्म किए जाता है। 19। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के अंदर (गुरू के प्रति) श्रद्धा बनी रहती है। (उसका) मन (गुरू में) पतीजा रहता है। वह हर वक्त सेवा करते हुए (सेवा में) मस्त रहता है। (जिस मनुष्य के) दिल में (सदा) गुरू बसता है सबका आदर-सत्कार करता है। वह सारी लुकाई में गुरू के दर्शन करता है। हे भाई ! सबसे ऊँची आत्मिक विचार के मालिक गुरू में श्रद्धा बनानी चाहिए। जिस (गुरू) के मिलने से (माया की) सारी भूख सारी प्यास दूर हो जाती है। हे भाई ! मैं सदा ही अपने गुरू से सदके जाता हूँ क्योंकि वह गुरू सदा कायम रहने वाला परमात्मा मिल जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के चरणों में आ के टिक गए। उन्होंने सदा कायम रहने वाली (रॅबी) मेहर प्राप्त कर ली। 20। हे भाई ! जिन (सत्संगियों का) प्यारे प्रभू के साथ साथ बना हुआ है। वह सत्संगी सज्जन मेरे (सहयोगी) हैं। (उनके सत्संग की बरकति से) मैं अंदर बाहर (दुनिया के कार-व्यवहार में भी) चलता-फिरता हूँ। (फिर) भी (परमात्मा को अपने) हृदय में संभाल के रखता हूँ। 21। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरु-चरणों में चित्त जोड़ के एकाग्र मन से एकाग्र चित्त से (परमात्मा का नाम) सिमरा है। उनके सारे दुख दूर हो जाते हैं। उनकी माया की भूख दूर हो जाती है। उनके अंदर से अहंकार का बड़ा रोग दूर हो जाता है। (प्रभू-चरणों में) सुरति जोड़ के वे पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं। वह मनुष्य सदा प्रभू के गुण गाते हैं। गुण उचारते हैं। हे भाई ! (गुरू चरणों में सुरति जोड़ के) मनुष्य परमात्मा के गुणों में सदा लीन रहता है टिका रहता है। हे नानक ! परमात्मा पूरे गुरू के माध्यम से ही मिलता है। आत्मिक अडोलता में आ मिलता है। 22। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के अंदर माया का मोह (बना रहता) है। (इसलिए उसका परमात्मा से) नाम में प्यार नहीं बनता। वह मनुष्य ठॅगी-फरेब करता रहता है। ठॅगी-फरेब (के संस्कार अपने अंदर) इकट्ठे करता जाता है। ठॅगी-फरेब से ही अपनी आजीविका बनाए रखता है। हे भाई ! आत्मिक मौत लाने वाली माया का धन (मनुष्य के) अंत समय (उसके लिए तो) सारा राख हो जाता है। (पर। इसी) धन को जोड़-जोड़ के (जीव) आत्मिक मौत सहेड़ते रहते हैं। (अपनी तरफ से तीर्थ-यात्रा आदि मिथे हुए) धार्मिक कर्म करते रहते हैं। शारीरिक पवित्रता रखते हैं। (एक समान हरेक) संयम करते हैं। (पर। उनके) अंदर लोभ टिका रहता है विकार टिके रहते हैं। हे नानक ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (सारी उम्र) जो कुछ करता रहता है वह परमात्मा की हजूरी में परवान नहीं होता। वहाँ पर वह मुसीबत में ही रहता है। 23। हे भाई ! सारे रागों में वह (हरी-नाम-सिमरन ही) अच्छा (उद्यम) है। क्योंकि उस (सिमरन) से (ही परमात्मा मनुष्य के) मन में आ बसता है। सदा-स्थिर हरी-नाम ही (मनुष्य के लिए) राग है नाद है। (हरी-नाम के सिमरन का) मूल्य बयान नहीं किया जा सकता। परमात्मा (का मिलाप) राग (की कैद) से परे है। नाद (की कैद) से परे है। इन (रागों-नादों) से (परमात्मा की) रज़ा को समझा नहीं जा सकता। हे नानक ! (जो जो मनुष्य परमात्मा की) रज़ा को समझ लेता है उनके लिए (राग भी) सहायक हो सकता है (वैसे सिर्फ राग ही आत्मिक जीवन के रास्ते में सहायक नहीं हैं)। हे भाई ! गुरू के माध्यम से ये (बात) समझ आ जाती है कि सब कुछ उस परमात्मा से ही हो रहा है। जैसे उसकी रजा है। (वैसे ही सब कुछ हो रहा है)। हे भाई ! सदा-स्थिर हरी-नाम (का सिमरन ही मनुष्य के लिए) सब कुछ है। 24।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “माया का मोह दुखदाई साबित होता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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