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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1422 · वारों से अतिरिक्त सलोक

अंग
1422
वारों से अतिरिक्त सलोक
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  1. हउ जीउ करी तिस विटउ चउ खंनीऐ जो मै पिरी दिखावए ॥

गुरु राम दास जी · सलोक

हउ जीउ करी तिस विटउ चउ खंनीऐ जो मै पिरी दिखावए ॥

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हउ जीउ करी तिस विटउ चउ खंनीऐ जो मै पिरी दिखावए ॥
नानक हरि होइ दइआलु तां गुरु पूरा मेलावए ॥5॥
अंतरि जोरु हउमै तनि माइआ कूड़ी आवै जाइ ॥
सतिगुर का फुरमाइआ मंनि न सकी दुतरु तरिआ न जाइ ॥
नदरि करे जिसु आपणी सो चलै सतिगुर भाइ ॥
सतिगुर का दरसनु सफलु है जो इछै सो फलु पाइ ॥
जिनी सतिगुरु मंनिआं हउ तिन के लागउ पाइ ॥
नानकु ता का दासु है जि अनदिनु रहै लिव लाइ ॥6॥
जिना पिरी पिआरु बिनु दरसन किउ त्रिपतीऐ ॥
नानक मिले सुभाइ गुरमुखि इहु मनु रहसीऐ ॥7॥
जिना पिरी पिआरु किउ जीवनि पिर बाहरे ॥
जां सहु देखनि आपणा नानक थीवनि भी हरे ॥8॥
जिना गुरमुखि अंदरि नेहु तै प्रीतम सचै लाइआ ॥
राती अतै डेहु नानक प्रेमि समाइआ ॥9॥
गुरमुखि सची आसकी जितु प्रीतमु सचा पाईऐ ॥
अनदिनु रहहि अनंदि नानक सहजि समाईऐ ॥10॥
सचा प्रेम पिआरु गुर पूरे ते पाईऐ ॥
कबहू न होवै भंगु नानक हरि गुण गाईऐ ॥11॥
जिन॑ा अंदरि सचा नेहु किउ जीवनि॑ पिरी विहूणिआ ॥
गुरमुखि मेले आपि नानक चिरी विछुंनिआ ॥12॥
जिन कउ प्रेम पिआरु तउ आपे लाइआ करमु करि ॥
नानक लेहु मिलाइ मै जाचिक दीजै नामु हरि ॥13॥
गुरमुखि हसै गुरमुखि रोवै ॥
जि गुरमुखि करे साई भगति होवै ॥
गुरमुखि होवै सु करे वीचारु ॥
गुरमुखि नानक पावै पारु ॥14॥
जिना अंदरि नामु निधानु है गुरबाणी वीचारि ॥
तिन के मुख सद उजले तितु सचै दरबारि ॥
तिन बहदिआ उठदिआ कदे न विसरै जि आपि बखसे करतारि ॥
नानक गुरमुखि मिले न विछुड़हि जि मेले सिरजणहारि ॥15॥
गुर पीरां की चाकरी महां करड़ी सुख सारु ॥
नदरि करे जिसु आपणी तिसु लाए हेत पिआरु ॥
सतिगुर की सेवै लगिआ भउजलु तरै संसारु ॥
मन चिंदिआ फलु पाइसी अंतरि बिबेक बीचारु ॥
नानक सतिगुरि मिलिऐ प्रभु पाईऐ सभु दूख निवारणहारु ॥16॥
मनमुख सेवा जो करे दूजै भाइ चितु लाइ ॥
पुतु कलतु कुटंबु है माइआ मोहु वधाइ ॥
दरगहि लेखा मंगीऐ कोई अंति न सकी छडाइ ॥

हिन्दी अर्थ: मैं उस पर से (अपनी) जिंद चार टुकड़े कर दूँ (सदके करने को तैयार हॅूँ)। हे नानक! जब हरी प्रभू (स्वयं) दयावान होते हैं, तब वह पूरे गुरू से मिलाते हैं (और, पूरा गुरू प्रभू-पति के चरणों में जोड़ देता है)। 5। हे भाई! जिस मनुष्य के अंदर अहंकार भारी हुआ रहता है जिसके शरीर में माया का प्रभाव बना रहता है। वह मनुष्य (गुरू के दर पर) सिर्फ दिखावे की खातिर ही आता रहता है। वह मनुष्य गुरू के बताए हुए हुकम में श्रद्धा नहीं बना सकता। (इस वास्ते वह मनुष्य इस संसार-समुंद्र से) पार नहीं लांघ सकता जिससे पार लांघना बहुत मुश्किल है। (पर, हे भाई!) वह मनुष्य (ही) गुरू की रजा में (जीवन-चाल) चलता है। जिस पर परमात्मा अपनी मेहर की निगाह करता है। हे भाई! गुरू का दीदार जरूर फल देता है। (गुरू के दर्शन करने वाला मनुष्य) जो मांग अपने मन में धारण करता है। वही माँग प्राप्त कर लेता है। हे भाई! जिन मनुष्यों ने गुरू पर श्रद्धा बनाई। मैं उनके चरणों में लगता हूँ। जो मनुष्य हर वक्त (गुरू-चरणों में) सुरति जोड़े रखता है। नानक उस मनुष्य का (सदा के लिए) दास है। 6। हे भाई! जिन (मनुष्यों) के अंदर प्यारे का प्रेम होता है। (अपने प्यारे के) दर्शन के बिना उनके मन में शांति नहीं होती। हे नानक! वह मनुष्य (प्यारे के) प्रेम में लीन रहते हैं। (इसी कारण) गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य का यह मन सदा खिला रहता है। 7। हे भाई! जिन (मनुष्यों) के अंदर प्यारे का प्रेम होता है। वे अपने प्यारे के मिलाप के बिना सुखी नहीं जी सकते। हे नानक! जब वे अपने पति-प्रभू का दर्शन करते हैं, तब वे दोबारा आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। 8। हे नानक! (कहें:) हे प्रीतम प्रभू! सदा कायम रहने वाले आपने गुरू के माध्यम से जिन मनुष्यों के अंदर (अपना) प्यार पैदा किया है। वे मनुष्य आपके प्यार में दिन-रात लीन रहते हैं। 9। हे भाई! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों के अंदर (परमात्मा के लिए) सदा कायम रहने वाला प्यार (पैदा हो जाता है)। उस प्यार की बरकति से वह सदा-स्थिर प्रीतम-प्रभू उनको मिल जाता है। और वे हर वक्त आनंद में टिके रहते हैं। हे नानक! (प्यार की बरकति से) आत्मिक अडोलता में लीन रहा जाता है। 10। हे भाई! (परमात्मा के साथ) सदा कायम रहने वाला प्रेम-प्यार पूरे गुरू से ही मिलता है। (और वह प्यार) कभी नहीं टूटता। हे नानक! (इस प्यार को कायम रखने के लिए) परमात्मा की सिफतसालाह करते रहना चाहिए। 11। हे भाई! जिन मनुष्यों के दिल में (परमात्मा के साथ) सदा कायम रहने वाला प्यार बन जाता है। वह मनुष्य परमात्मा की याद के बिना सुखी जीवन नहीं जी सकते (पर, ये उसकी अपनी ही मेहर है)। हे नानक! चिरों से विछुड़े जीवों को प्रभू स्वयं ही गुरू के द्वारा अपने साथ मिलाता है। 12। हे नानक! (कहें:) हे हरी! आपने खुद ही मेहर करके जिनके अंदर अपना प्रेम-प्यार पैदा किया है। उनको आप (अपने चरणों में) जोड़े रखते हैं। हे हरी! मुझे मँगते को (भी) अपना नाम बख्शें। 13। हे भाई! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (भगती के आत्मिक आनंद में कभी) खिल उठता है (कभी भगती के बिरह रस के कारण) वैराग में आ जाता है। हे भाई! असल भगती वही होती है जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रह कर करता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ा रहता है। वह (परमात्मा की सिफत-सालाह को) अपने मन में बसाए रखता है। हे नानक! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (इस संसार-समुंद्र का) परला छोर तलाश लेता है। 14। हे भाई! सतिगुरू की बाणी को मन में बसा कर जिन मनुष्यों के हृदय में परमात्मा का नाम-खजाना आ बसता है। उनके मुँह उस सदा कायम रहने वाले (ईश्वरीय) दरबार में सदा रौशन रहते हैं। हे भाई! करतार ने स्वयं जिन मनुष्यों पर मेहर की होती है। उनको बैठते-उठते किसी भी वक्त (परमात्मा का नाम) नहीं भूलता। हे नानक! जिन मनुष्यों को सृजनहार प्रभू ने (स्वयं अपने चरणों में) जोड़ा होता है। वे मनुष्य गुरू के द्वारा (प्रभू चरणों में) मिले हुए फिर कभी नहीं बिछुड़ते। 15। हे भाई! महा पुरुषों की (बताई हुई) कार बहुत मुश्किल होती है (क्योंकि उसमें स्वै मारना पड़ता है। पर उसमें से) श्रेष्ठ आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। (इस सेवा को करने के लिए) उस मनुष्य के अंदर (परमात्मा) प्रीत-प्यार पैदा करता है। जिस पर अपनी मेहर की निगाह करता है। हे भाई! गुरू की (बताई हुई) सेवा में लग के जगत संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। (जो भी मनुष्य गुरू की बताई हुई सेवा करेगा वह) मन-माँगी मुरादें प्राप्त कर लेगा। उसके अंदर अच्छे-बुरे काम की परख की सूझ (पैदा हो जाएगी)। हे नानक! अगर गुरू मिल जाए, तो वह परमात्मा मिल जाता है। जो हरेक दुख दूर करने वाला है। 16। हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाल मनुष्य जो भी सेवा करता है। (उसके साथ-साथ वह अपना) चित्त (परमात्मा के बिना) और के प्यार में जोड़े रखता है। (यह मेरा) पुत्र (है। यह मेरी) स्त्री (है। यह मेरा) परिवार है (-यह कह कह के ही वह मनुष्य अपने अंदर) माया का मोह बढ़ाए जाता है। परमात्मा की दरगाह में (किए हुए कर्मों का) हिसाब (तो) माँगा (ही) जाता है। (माया के मोह के फंदे से) अंत में कोई छुड़ा नहीं सकता।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1422 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।