राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नदरि करहि जे आपणी तां आपे लैहि सवारि ॥ नानक गुरमुखि जिन॑ी धिआइआ आए से परवाणु ॥63॥ जोगु न भगवी कपड़ी जोगु न मैले वेसि ॥ नानक घरि बैठिआ जोगु पाईऐ सतिगुर कै उपदेसि ॥64॥ चारे कुंडा जे भवहि बेद पड़हि जुग चारि ॥ नानक साचा भेटै हरि मनि वसै पावहि मोख दुआर ॥65॥ नानक हुकमु वरतै खसम का मति भवी फिरहि चल चित ॥ मनमुख सउ करि दोसती सुख कि पुछहि मित ॥ गुरमुख सउ करि दोसती सतिगुर सउ लाइ चितु ॥ जंमण मरण का मूलु कटीऐ तां सुखु होवी मित ॥66॥ भुलिआं आपि समझाइसी जा कउ नदरि करे ॥ नानक नदरी बाहरी करण पलाह करे ॥67॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: अगर आप मेहर की निगाह करे। तो आप स्वयं ही (जीवों के आत्मिक जीवन) सुंदर बना लेता है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर जिन मनुष्यों ने प्रभू का नाम सिमरा है। जगत में उन्हीं का पैदा होना (प्रभू की हजूरी में) कबूल हुआ है। 63। हे भाई ! (गृहस्त त्याग के) गेरुए रंग के कपड़ों से अथवा मैले पहरावे से (परमात्मा का) मिलाप नहीं हो जाता। पर। हाँ। हे नानक ! गुरू के उपदेश से गृहस्थ में रहते हुए ही (परमात्मा से) मिलाप हो सकता है। 64। हे भाई ! (गृहस्थ त्याग के) अगर आप (धरती पर) चारों तरफ भागता फिरे। और। अगर आप सदा ही वेद (आदि धर्म-पुस्तकें) पढ़ता रहे (तो भी विकारों से खलासी का रास्ता नहीं पा सकता)। हे नानक ! (कह- हे भाई !) आप विकारों से निजात का दरवाजा (तब) ढॅूँढ लेगा। जब सदा कायम रहने वाला परमात्मा आपको मिल जाएगा। जब हरी (आपके) मन में आ बसेगा। 65। हे नानक ! (कह- हे भाई ! आपके भी कया वश। सारे संसार में) मालिक-प्रभू का हुकम चल रहा है (उस हुकम में ही) आपकी मति उल्टे रास्ते पर पड़ी हुई है। और आप चंचल-चित्त हैं के (धरती पर) विचर रहा है। पर। हे मित्र ! (यह तो बता कि) अपने मन के पीछे चलने वालों के साथ दोस्ती पा के आप आत्मिक आनंद की आस कैसे कर सकता है। हे भाई गुरू के सन्मुख रहने वालों के साथ मित्रता बना। गुरू (के चरणों) से चित्त जोड़े रख। (इस तरह जब) जनम-मरण के चक्करों की जड़ काटी जाती है। तब आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। 66। हे भाई ! जिन्दगी के गलत रास्ते पर पड़े हुए भी जिस मनुष्य पर (परमात्मा) मेहर की निगाह करता है। उसको खुद (ही आत्मिक जीवन की) समझ बख्श देता है। हे नानक ! परमात्मा की मेहर की निगाह से वंचित हुआ मनुष्य (सदा) विरलाप ही करता रहता है। 67।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: सलोक महला 4 वह परब्रह्म केवल एक (ओंकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर जिन जीव-सि्त्रयों को प्रभू-पातशाह मिल जाता है। वे अति भाग्यशाली बन जाती है। वे सोहगनें कहलाती है। प्रभू के नाम में लीन रह के उनके अंदर परमात्मा की ज्योति चमक उठती है। 1। हे भाई ! महापुरुष गुरू धन्य है धन्य है। जिस (गुरू) ने सदा कायम रहने वाले प्रभू के साथ गहरी सांझ डाली हुई है। जिस (गुरू) को मिलने से (माया की) तष्णा दूर हो जाती है। (मनुष्य का) तन और मन ठंडा शांत हो जाता है। हे भाई ! गुरू सत्पुरख सराहनीय है धन्य है। क्योंकि उसको हरेक जीव एक जैसा (दिखता) है। गुरू धन्य है। गुरू धन्य है। गुरू को किसी से वैर नहीं (कोई मनुष्य गुरू की निंदा करे) गुरू को (वह) निंदा अथवा वडिआई एक जैसी ही प्रतीत होती है। हे भाई ! गुरू धन्य है गुरू धन्य है। गुरू (आत्मिक जीवन की सूझ में) समझदार है। गुरू के अंदर परमात्मा सदा बस रहा है। गुरू सराहने-योग्य है। गुरू (उस) निरंकार (का रूप) है जिसके गुणों का अंत इस पार का-उस पार का अंत नहीं पाया जा सकता। गुरू धन्य है गुरू धन्य है। क्योंकि वह (मनुष्य के हृदय में) सदा-स्थिर प्रभू (का नाम) पक्का कर देता है। हे नानक ! जिस (गुरू) से परमात्मा का नाम हासिल होता है। उसको (सदा) धन्य-धन्य कहा करो। 2। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों के लिए हरी प्रभू का नाम (ही) सदा कायम रहने वाला खुशी का गीत है। जिन मनुष्यों ने हरी-नाम की सिफत की। हरी-नाम ही जपा। उनके मन में आनंद बना रहता है। हे भाई ! बड़े भाग्यों वाले मनुष्यों ने सबसे ऊँचे आत्मिक आनंद के मालिक प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया। हे दास नानक ! (जिन्होंने हर वक्त) हरी-नाम की वडिआई की। उनके मन में उनके तन में (आत्मिक आनंद की) दोबारा कभी कमी नहीं आती। 3। हे भाई ! (अपने) प्यारे (प्रभू) के साथ मेरा प्यार है (मेरी हर वक्त तमन्ना है कि मुझे) कैसे (वह) प्यारे सज्जन मिल जाएं (जो मुझे प्रभू-पति से मिला दें)। मैं उन सज्जनों को ढूँढती फिरती हूँ। सदा-स्थिर हरी-नाम ने जिनको सुंदर जीवन वाले बना दिया है। हे भाई ! गुरू (ही) मेरा (असल) मित्र है। अगर (मुझे गुरू) मिल जाए। तो (मैं अपना) यह मन (उस पर से) सदके कर दूँ। (गुरू ही) मुझे बता सकता है कि सृजनहार हरी (ही असल) सज्जन है। हे नानक ! (कह-) हे सतिगुरू ! मैं अपना पति-प्रभू ढूँढ रही थी। तूने (मुझे मेरे) साथ (बसता) दिखा दिया है। 4। हे भाई ! मैं चाह से राह ताक रही हूँ कि शायद मेरा सज्जन । जो मुझे (मेरा प्रभू-) पति आज (इसी जीवन में) ला के मिला देता हैं। जो मुझे मेरे प्यारे का दर्शन करा दे।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा।
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।