कथा · 19
इंद्र और अहल्या: मन का व्यभिचार
गौतम मुनि के साधना से दूर जाने पर इंद्र ने उनका रूप धरा। मगर योग वसिष्ठ कहता है – इंद्र शायद आए ही नहीं थे। फिर क्या हुआ था?
आपने यह कथा बहुत बार सुनी होगी। ऋषि गौतम मुनि और उनकी पत्नी अहल्या। गौतम बहुत समय ध्यान में रहते थे। अहल्या घर सँभालती। बहुत सुंदर थी।
एक रात गौतम कहीं तीर्थ करने गए। तभी इंद्र, देवताओं के राजा, अहल्या को देख चुके थे। उन्होंने मौक़ा देखकर गौतम का रूप धरा। अहल्या के पास आए।
अहल्या ने कुछ अजीब महसूस किया। पति की आँखें उतनी ही थीं, मगर भीतर कुछ अलग था। फिर भी – उसने रोका नहीं। शायद वो जानती थी, शायद नहीं।
गौतम लौटे। योग-दृष्टि से सब देखा। उनका क्रोध भभक उठा।
“इंद्र, तेरी देह पर सहस्र छिद्र होंगे। तू वासना के निशान सदा पहनेगा।” इंद्र को एक हज़ार आँखें बन गईं।
“अहल्या, तू पत्थर बन।” अहल्या तुरंत पत्थर हो गई।
“जब त्रेता युग में राम तुझे छुएँगे, तब मुक्ति मिलेगी।”
यह कथा सब जानते हैं।
मगर वसिष्ठ जी ने राम को एक और बात बताई।
“राम, तुम्हें मालूम है, इंद्र वहाँ आए ही नहीं थे।”
राम चौंके।
“नहीं आए?”
“शायद नहीं। यह कथा एक तरफ़ से ऐसी कही जाती है। दूसरी तरफ़ से देखो।
“अहल्या के मन में पहले से इंद्र की कल्पना थी। वो देवों के राजा, उनकी सुंदरता की कथाएँ – उसने बहुत सुनी थीं। मन में एक बीज था।
“उस रात पति बाहर थे। एकांत था। उसके मन ने ख़ुद इंद्र को बनाया। पूरा अनुभव मन में हुआ। बाहर कुछ नहीं हुआ।
“मगर मन का व्यभिचार भी व्यभिचार है। शरीर ने नहीं किया, मन ने किया। और फल मन को मिलना ही था।
“गौतम ने जब योग-दृष्टि से देखा, तो उन्हें मन की कथा दिखी। उन्होंने उसी कथा को बाहर कर दिया, और उसी का दंड दिया।
“इंद्र की हज़ार आँखें – वो वासना का चिह्न हैं, जो हर मन में चुपचाप पनपता है।
“अहल्या का पत्थर – वो जड़ता है, जो मन के व्यभिचार के बाद आती है। आदमी अपने ही ख़यालों के बोझ से जम जाता है।
“और राम का स्पर्श – वो सजगता है, जो जड़ता को जगाती है। जब कोई पवित्र चेतना छूती है, पत्थर ज़िंदा हो जाता है।”
राम चुप थे।
“तो माँ अहल्या ने पाप किया?”
“नहीं। वो असुरक्षित मन की एक छवि है। हर मनुष्य के भीतर एक अहल्या बैठी है। वासना का बीज सब में है। फर्क़ इसमें है कि कौन उसे सींचता है, कौन देखता है।
“जो देखता है, उसे दंड नहीं मिलता। जो सींचता है, उसे जड़ता मिल जाती है।”
राम ने हाथ जोड़े। “और इंद्र?”
“इंद्र मन की वासना का राजा है। वो हम सबके भीतर है। हर बार जब मन कोई इच्छा रचता है, इंद्र अहल्या के पास आ रहा है।”
“मार्ग क्या है?”
“देखो। बस देखो। इच्छा को दबाओ नहीं, बहाओ नहीं। बस देख लो। तब वो आती है, बैठती है, और चली जाती है। न पत्थर बनता है, न हज़ार आँखें।”
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, बाहर का व्यभिचार आसान है पकड़ने में। भीतर का मुश्किल। मगर असली खेल भीतर है।”
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