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इन्द्र और अहल्या: मन का अडिग संस्कार

कथा · 17

इन्द्र और अहल्या: मन का अडिग संस्कार

मगध के राजा इन्द्रद्युम्न की रानी अहल्या ने इन्द्र नामक एक ब्राह्मणकुमार के विषय में सुना और उनका मन उसी पर टिक गया। गुप्त मिलन प्रकट हुआ तो राजा ने कठोर दण्ड दिए; भरत मुनि ने शाप दिया। देहें मिटती रहीं, पर संस्कार मृग, पक्षी और फिर ब्राह्मण दम्पती के जन्म तक उनका पीछा करता रहा।

भानु के आख्यान में मन की शक्ति

भानु, अर्थात सूर्य, ब्रह्मा से दस ऐन्दव ब्राह्मणों की सृष्टियों के विषय में बात कर रहे थे। उन ब्राह्मणों ने अपने चित्त के दृढ़ निश्चय से अलग-अलग जगतों की रचना कर ली थी। ब्रह्मा के सामने प्रश्न था कि इन सृष्टियों का क्या किया जाए। भानु ने निवेदन किया कि देह और इन्द्रियों से बने किसी कार्य को बाहरी साधनों से बदला जा सकता है, किंतु दीर्घ अभ्यास से मन में जड़ पकड़ चुका निश्चय दूसरे के प्रयत्न से नहीं मिटता। शरीर नष्ट हो जाए, तब भी वह संस्कार अपनी दिशा बनाए रख सकता है।

भानु ने इसी बात को समझाने के लिए एक प्राचीन इतिहास सुनाया। उससे पहले उन्होंने मन को जगतों का रचयिता और समष्टि में हिरण्यगर्भ कहा। मनुष्य अपने को तुच्छ देह मानता है तो जन्म और मरण के धर्मों से बँधा अनुभव करता है। देहभावना से भीतर हटे हुए योगी के लिए शरीर के प्रिय और अप्रिय अनुभव अपना पुराना अधिकार खो देते हैं। ब्रह्मा ने पूछा, “वह अहल्या कौन थी और इन्द्र कौन था, जिनका वृत्तान्त सुनने से मन की ऐसी शक्ति समझ में आती है?” तब भानु ने मगध की कथा आरम्भ की।

मगध की रानी और ब्राह्मणकुमार

प्राचीन मगध देश में इन्द्रद्युम्न नाम के एक प्रतापी राजा थे, जिनकी प्रभा पुराणों में प्रसिद्ध इन्द्रद्युम्न जैसी कही जाती थी। उनकी पटरानी अहल्या चन्द्रमण्डल जैसी कान्ति और कमल जैसे विशाल नेत्रों वाली थीं। उसी नगर में इन्द्र नामक एक सुन्दर और बलवान ब्राह्मणकुमार रहता था। वह नगर-व्यवहार, विनोद और प्रणय-कला में निपुण सुसंस्कृत युवक था। उसका नाम इन्द्र था; वह स्वर्ग का देवता नहीं था।

एक दिन रानी ने गौतम की पत्नी प्राचीन अहल्या और देवराज इन्द्र का वृत्तान्त सुना। उनकी सखी ने नामों का साम्य और स्पष्ट कर दिया: “पूर्वकाल की वह स्त्री अहल्या थी, आप भी अहल्या हैं। उस कथा में इन्द्र था और हमारे नगर में भी इन्द्र नाम का एक सुन्दर ब्राह्मण है।” इस संयोग ने रानी के चित्त में स्थानीय इन्द्र की छवि बैठा दी। सुनी हुई कथा, एक समान नाम और मन की कल्पना ने अनुराग को तीखा बना दिया।

रानी सोचतीं कि जिस इन्द्र पर उनका मन आसक्त है, वह उनके पास क्यों नहीं आता। शरीर उस मानसिक ताप को प्रकट करने लगा। शीतल कमलनालों और केले के पत्तों की शय्या भी उन्हें राहत न दे सकी। राजमहल की सम्पदा, भोजन, विश्राम और इन्द्रियों को रुचने वाले पदार्थ फीके पड़ गए। उनकी दशा ग्रीष्म की तपती वनभूमि में तड़पती मछली जैसी हो गई। वे बार-बार इन्द्र का नाम लेतीं और कामदेव के अधीन होकर लोकलज्जा छोड़ बैठीं। एक नाम और सुनी हुई छवि ने उनके चित्त पर पूरा अधिकार कर लिया था।

रानी की एक सखी ने उनकी व्यथा देखी। वह दुखी हुई और बड़े स्नेह से बोली, “प्रिये, मैं इन्द्र को बिना किसी विघ्न के तुम्हारे समीप ले आऊँगी।” रानी की आँखें खिल उठीं। वे मुरझाई नलिनी की तरह अपनी सखी के चरणों पर गिर पड़ीं। सखी उसी शाम उनकी व्याकुलता का उपाय करने निकल पड़ी।

सखी की प्रतिज्ञा और गुप्त मिलन

दिन ढला और सन्ध्या हुई। सखी इन्द्र नामक उस ब्राह्मण युवक के पास पहुँची। उसने युक्तिपूर्वक समझा-बुझाकर उसे तैयार किया और रात में अहल्या के निकट ले आई। एक गुप्त भवन में बहुत-सी फूलमालाएँ थीं, सुगन्धित अंगराग था और मिलन की पूरी तैयारी थी। वहीं रानी और ब्राह्मणकुमार का एकान्त मिलन हुआ। दोनों का चित्त परस्पर स्नेह में बँध गया और वे एक-दूसरे के बिना क्षण भर भी नहीं रह सकते थे।

हार और केयूर से सुसज्जित, प्रणय-कला में कुशल इन्द्र ने रानी को अपने अनुराग में बाँध लिया। अहल्या की दृष्टि में सारा जगत उसी से भर उठा। गुणवान पति की निकटता भी उन्हें रुचिकर न रही। इन्द्र की इन्द्रियाँ भी अहल्या में लगी थीं; वह उनके बिना कहीं एक क्षण न ठहर पाता। दोनों का सम्बन्ध गुप्त स्थान में आरम्भ हुआ, पर उनके चेहरे और व्यवहार उस गुप्तता को निभा न सके। जितनी देर रानी इन्द्र का ध्यान करतीं, उनका मुख पूर्ण चन्द्रमा से खिले कुमुद की तरह शोभित होता।

कुछ समय बीता। उनका प्रगाढ़ अनुराग और उससे उपजा दुर्विनय लोगों की चर्चा में आया, फिर राजा के कानों तक पहुँचा। रानी विवाहित थीं और इन्द्र राजा की पत्नी के साथ सम्बन्ध में था। राजा ने इसे अपने घर और राजधर्म के विरुद्ध आचरण माना। उन्होंने दोनों को पकड़वाया और अनेक दण्डों से उनका शासन आरम्भ किया।

राजा इन्द्रद्युम्न के सामने खड़े अहल्या और ब्राह्मण इन्द्र

राजा के दण्डों के बीच एक ही स्मृति

पहला स्पष्ट दण्ड शीत ऋतु के तालाब का है। दोनों को हेमन्त में जल के भीतर छोड़ दिया गया। ठंडे पानी में शरीर पीड़ित होना चाहिए था, फिर भी वे सन्तुष्ट होकर हँसते रहे। राजा ने उन्हें निकलवाकर पूछा, “दुर्मतियो, तुम खिन्न हुए या नहीं?” उन्होंने कहा कि एक-दूसरे के निर्दोष मुख की स्मृति में उनका मन इतना बँधा था कि वे अपनी अलग देह और उसकी व्यथा को पहचान ही न सके। अंगों के छेदन का भय भी उस मानसिक संग को ढीला नहीं कर रहा था।

इसके बाद उन्हें भाड़ में झोंका गया। वहाँ भी वे प्रसन्न रहे और पूछे जाने पर वही उत्तर दिया। उन्हें हाथी के पैरों में बाँधा गया; परस्पर स्मरण ने फिर पीड़ा को ध्यान में प्रवेश न करने दिया। कोड़ों से पीटा गया और दूसरे अनेक दण्ड दिए गए। हर बार राजा ने उन्हें निकलवाया, उनकी दशा पूछी और हर बार उनके उत्तर का भाव एक रहा। अनुभव का पूरा प्रकाश प्रिय की स्मृति पर केन्द्रित था। जिस वस्तु को चित्त बार-बार और तीव्र वेग से धारण करता है, उसी से उसका जगत भर जाता है।

राजा ने शीत, अग्नि, हाथी और प्रहार से शरीर को कठोर पीड़ा देकर अनुराग तोड़ना चाहा। हर दण्ड के बाद उनका मन अपनी धारण की हुई मूर्ति पर पहले की तरह टिका मिला।

राजा का प्रश्न बढ़ता गया। अग्नि, शीत, हाथी और प्रहार के बीच दुख कहाँ खो गया? अहल्या का उत्तर था कि उन्हें सब ओर इन्द्र ही दिखाई देता है। इन्द्र ने कहा कि उसे सारा जगत अहल्या से भरा अनुभव होता है। दूसरे अनुभव के लिए स्थान बचे, तभी दण्ड का दुख अपना पूरा रूप बना सके। उनकी मानसिक तन्मयता ने ध्यान को इतने संकरे और कठोर पथ पर रख दिया था कि शरीर का समाचार गौण पड़ गया। भानु ने इस अवस्था को दृढ़ विषयराग और मोह-संस्कार कहा।

इन्द्र का उत्तर: देह मन का विस्तार

इन्द्र ने राजा से कहा, “सम्पूर्ण जगत मेरे लिए दयितामय है।” उसके लिए अहल्या हर दिशा में उपस्थित थीं और अहल्या के लिए जगत इन्द्रमय था। वह अपने को मनोमात्र कहता है और मन को ही पुरुष का अनुभवात्मक रूप बताता है। देह उस मन का विस्तार है। बहुत-से दण्ड एक साथ लगाए जाएँ, तब भी उस वीर मन का भेदन कठिन है जिसने अपने भाव को दीर्घ अभ्यास से स्थिर कर लिया हो। शरीर बढ़े, घटे या नष्ट हो, विचारित विषय की ओर मुड़ा हुआ मन अपनी पुरानी दिशा बनाए रखता है।

उसने एक सुन्दर उपमा दी। जैसे किसी ऊँचे देवालय में देवी प्रतिष्ठित रहती हैं, वैसे ही अहल्या उसके मन-कोष में प्रतिष्ठित थीं। प्रिय की स्मृति से युक्त होकर वह अपने को ऐसे पर्वत जैसा अनुभव करता था जिसके शिखर पर मेघमाला ठहरी हो और जिसे ग्रीष्म का ताप न जला सके। जहाँ वह रहता या गिरता, वहाँ अपने इच्छित विषय के अतिरिक्त किसी और अनुभूति पर उसका ध्यान टिकता ही नहीं था। सैकड़ों प्रयत्न उसके स्वभाव को दूसरी दिशा में मोड़ नहीं पाए।

इन्द्र ने धीर और एकाग्र मन की तुलना मेरु से की। वर, शाप और बाहरी आघात देह की अवस्था बदल सकते हैं; गहराई से निविष्ट मन को वे सहज नहीं हिला पाते। भानु ने इस स्थिरता को मोह-संस्कार कहा, क्योंकि एकाग्रता जिस विषय पर बैठी थी, मन की रचना और अनुभव पर उसी का प्रभाव प्रबल होता गया।

राजा मान रहा था कि देह को पीड़ित करने से मन टूट जाएगा। इन्द्र ने कारण का क्रम उलटा बताया। दिखाई देने वाले शरीर मन के उत्पादक नहीं, मन उनके रूपों का कारण है। उसने वन की लताओं और उनके भीतर बहते रस का दृष्टान्त दिया। जल रस का आधार बनता है; उसी तरह मन शरीरों की कल्पना और अनुभूति का आधार बनता है। जहाँ “मैं” का अभिमान किसी रूप में उदित होता है, वहाँ उसी के अनुरूप देह का आकार अनुभव में आता है।

फिर बीज और वृक्ष की उपमा आती है। मन मुख्य अंकुर है; शरीर पत्तों, शाखाओं और फूलों की तरह उससे फैलता है। पत्ते झड़ने पर अंकुर बचा रहे तो वृक्ष फिर फैल सकता है। अंकुर मिट जाए तो नये पत्तों की सम्भावना भी मिटती है। देह का अन्त मन को अनेक नयी देहें बनाने से रोक नहीं पाता। चित्त का मूल उपशम हो जाए तो नये शरीर की कल्पना का कारण शान्त हो जाता है। भानु इसी तर्क को आगे भरत के शाप और पुनर्जन्मों से प्रत्यक्ष कराते हैं।

भरत मुनि का शाप

इन्द्र का उत्तर सुनकर कमलनयन राजा ने समीप बैठे भरत मुनि की ओर देखा। उन्होंने कहा, “भगवन्, आप सम्पूर्ण धर्म का मर्म जानते हैं। मेरी पत्नी का अपहरण करने वाले इस पुरुष की धृष्टता देखिए और इसके पाप के अनुरूप दण्ड दीजिए।” राजा का तर्क था कि दण्ड के योग्य को छोड़ देना भी राजधर्म में दोष देता है। उनके शब्दों में पति के साथ द्रोह, घर का अपमान और अपराध की सार्वजनिक निर्भीकता साथ-साथ उपस्थित थे।

भरत मुनि ने घटना के पूर्वापर पर विचार किया। फिर उन्होंने इन्द्र को सम्बोधित करके शाप दिया कि वह पति से द्रोह करने वाली इस स्त्री के साथ नष्ट हो जाए। शाप सुनकर दोनों ने राजा और भरत से कहा कि कठोर तप से कमाई हुई शक्ति इस शाप में व्यय होगी, पर उससे उनका मूल स्वरूप समाप्त न होगा। देह गिर जाएगी; अत्यन्त सूक्ष्म, चिन्मय और दूसरों की दृष्टि से दुर्लक्ष्य मन बचा रहेगा। उसी मन से वे आगे और शरीर धारण करेंगे।

अहल्या और इन्द्र को शाप देते भरत मुनि

उनका उत्तर विनयपूर्ण नहीं था। उन्होंने राजा और भरत को दुर्मति कहा। यह धृष्टता उनके पहले व्यवहार की ही निरन्तरता थी। भरत के शाप से दोनों ऐसे पृथ्वी पर गिर पड़े जैसे वृक्ष से कटे पल्लव नीचे गिरते हैं। उस जन्म की देहें समाप्त हो गईं। मानसिक बन्धन का क्रम वहीं रुका नहीं।

मृग, पक्षी और ब्राह्मण दम्पती

प्रगाढ़ विषय-राग से बँधे हुए दोनों पहले मृगयोनि में गए। उसके बाद उसी दृढ़ आसक्ति के कारण पक्षी हुए। देहों की जाति बदलती रही और वही मानसिक प्रवृत्ति दोनों को फिर साथ बाँधती रही।

बहुत जन्मों के बाद, भानु ने कहा, “हमारे ब्रह्माण्ड में” वे तपस्या में निरत ब्राह्मण दम्पती हुए। उनके जीवन की रीति बदली, फिर भी मुक्ति या इच्छा के अन्त की घोषणा नहीं हुई। भरत का शाप शरीर का विनाश कर सका था; मन को वश में नहीं ला सका।

बाद के जन्म में तपस्वी ब्राह्मण दम्पती बने अहल्या और इन्द्र

वे जहाँ-जहाँ उत्पन्न होते, उसी मोह-संस्कार के कारण दम्पती बनते। उनका स्नेह इतना प्रबल कहा गया कि उसे देखकर वृक्ष भी प्रेमरस से युक्त होकर श्रृंगार-चेष्टा करने लगें। यह तीव्रता उनके बन्ध का माप थी। संस्कार की धारा अभी चल रही थी।

भानु इसी निष्कर्ष के साथ ब्रह्मा के प्रश्न पर लौटे। भरत का शाप मन का निग्रह न कर सका। उसी प्रकार ब्रह्मा दस ऐन्दवों की मनोमयी सृष्टियों को बाहरी अधिकार से मिटा नहीं सकते थे। मन के निश्चय से बने अनुभव का द्रव्य, औषधि अथवा दण्ड से उच्छेद कठिन था। इन्द्र और अहल्या का वृत्तान्त यहीं पूरा हुआ।

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