कथा · 19
इंद्र और अहल्या
रामायण की कथा से अलग, योग वासिष्ठ में अहल्या और इन्द्र दो प्रेमी हैं जो समाज की हर रोक के बाहर खड़े होते हैं। भरत ऋषि का शाप उन्हें जन्म-जन्म साथ रहने को विवश करता है। हज़ार देहों के बाद इच्छा थककर मुक्ति बनती है।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, अगर किसी का प्रेम धर्म के बाहर हो, तो क्या वो हमेशा बँधा ही रहेगा?”

वसिष्ठ बोले – “राम, इन्द्र और अहल्या की कथा सुनो। पर यह वो कथा नहीं जो रामायण में है, यह योग वासिष्ठ की कथा है। इसमें दोनों ने एक-दूसरे को कभी नहीं छोड़ा, और अन्त में दोनों मुक्त हुए। यह कथा बहुत बरसों की यात्रा है, बहुत जन्मों की।”
दो इन्द्र
यह बहुत बरस पहले की बात है, जब एक राज्य था जिसका राजा इन्द्र था। वह एक पुरुष था, राजा, और उसकी पत्नी का नाम अहल्या था।
राजा इन्द्र कोई साधारण इन्द्र नहीं था। उसका नाम वही था जो स्वर्ग के राजा का है, पर वह स्वर्ग का इन्द्र नहीं था। वह तो पृथ्वी का एक राजा था, जिसका नाम भी संयोग से इन्द्र ही था।
उस राज्य में एक और इन्द्र भी रहता था, और यह दूसरा इन्द्र देव था, यानी कोई चाहे तो उसे स्वर्ग का इन्द्र कह सकता है। पर इस समय वह एक राज्य में, साधारण आदमी की तरह, नीचे आया हुआ रहता था।
दोनों का नाम एक था, पर दोनों अलग थे।
अहल्या रानी थी। उम्र अट्ठाईस बरस, चेहरा गोल, और बायीं भौं के ऊपर एक तिल। उसकी उँगलियाँ लम्बी थीं, क्योंकि बचपन में उसने वीणा बहुत बजाई थी।
राजा इन्द्र अच्छे राजा थे। एक साधारण पुरुष, मध्यम कद, थोड़ी-सी तोंद, न्याय में सख़्त पर घर में सरल। शाम को वे अपनी सभा से लौटते, हाथ-मुँह धोते, और फिर रानी से दिन भर की कोई साधारण-सी बात करते।
अहल्या इन साधारण बातों को बहुत बरसों तक सुनती रही।
राजा के साथ रहना मुश्किल नहीं था, बस उसमें कुछ ख़ास भी नहीं था।
अहल्या जब अकेली होती, तो अपनी वीणा निकालती और एक धीमी धुन बजाती। वह धुन उसकी अपनी थी, किसी से सीखी हुई नहीं।
राजा को यह धुन कभी समझ नहीं आती थी।

एक दिन राजमहल के पास के एक उद्यान में उसकी मुलाक़ात दूसरे इन्द्र से हुई।
देव इन्द्र की देह थोड़ा ऊँचा था। उसकी आँखें असामान्य रूप से चमकदार थीं, पर मुख पर थकान थी, और माथे पर बहुत महीन रेखाएँ, जैसे वह किसी बहुत बड़ी थकान का बोझ उठाए हुए हो। बाल कन्धों तक खुले थे, और होंठों के ऊपर एक पतली मूँछ।
वह एक चम्पा के पेड़ के नीचे अकेला बैठा था, हाथ में कुछ नहीं, बस आँखें ज़मीन पर गड़ी हुई थीं।
अहल्या वहीं रुक गई। उसने इससे पहले कभी किसी देव को इतने पास से नहीं देखा था, पर उसे लगा कि यह देव से ज़्यादा कोई थका हुआ पुरुष है।
दोनों एक-दूसरे को देखकर ठहर गए।
पहली मुलाक़ात
“देवी।” “देव।”
देव इन्द्र ने पूछा – “आप कौन?”
“मैं अहल्या, राजा इन्द्र की पत्नी।”
“और मैं इन्द्र, पर देव।”
अहल्या बोली – “दो इन्द्र, और एक ही नाम। पर आप दोनों अलग दिखते हैं।”
“हाँ।”
उसने फिर पूछा – “आप यहाँ क्यों हैं?”

देव इन्द्र बोले – “देवी, सच कहूँ? मैं स्वर्ग से थक गया हूँ।”
अहल्या चौंक गई – “देव, स्वर्ग से थक गए? पर स्वर्ग तो सबसे ऊँचा है।”
देव इन्द्र बोले – “देवी, यह बात लोग कहते हैं। पर भीतर से देखें तो स्वर्ग एक बहुत बड़ी ऊब है। वहाँ हर इच्छा पूरी हो जाती है, तो कोई इच्छा बचती ही नहीं, और इच्छा के बिना ज़िन्दगी का कोई स्वाद नहीं रहता। मैंने वहाँ बहुत बरस बिताए, फिर एक दिन सोचा, चलूँ, नीचे चलूँ।”
अहल्या ने कहा – “देव, मैंने कभी ऐसा सोचा ही नहीं था, कि स्वर्ग में भी ऊब हो सकती है।”
देव इन्द्र बोले – “देवी, हर जगह वही होता है जो उस जगह की सीमा होती है। और स्वर्ग की सीमा है उसकी अपनी पूर्णता।”
दोनों उद्यान में बैठे रहे और देर तक बातें करते रहे।
अहल्या ने पाया कि देव इन्द्र से वह वे सब बातें कर सकती थी जो राजा इन्द्र से वह कभी नहीं कर पाई थी। दर्शन की बातें, प्रेम की बातें, मन की बातें, और ऊब की वे बातें भी जिनके लिए उसके पास कभी भाषा ही नहीं थी।
देव इन्द्र ने पाया कि अहल्या के पास एक ऐसी बुद्धि थी जो स्वर्ग की किसी अप्सरा के पास नहीं थी। अप्सराएँ सुन्दर तो थीं, पर वे हर बात पर हाँ ही कहती थीं, जबकि अहल्या ने तीसरी ही बात पर उसके एक तर्क को काट दिया था।
देव इन्द्र बोले – “देवी, आप मुझे एक बात बताइए। क्या आपके यहाँ कोई वीणा है?”
अहल्या ने आश्चर्य से उसे देखा और कहा – “हाँ, है।”
“मुझे लगा ही था। आपकी उँगलियाँ बजाने वाली उँगलियाँ हैं।”
अहल्या ने अपनी उँगलियों को देखा और पूछा – “देव, आपने कैसे पहचाना?”
देव इन्द्र बोले – “देवी, मैंने हर वीणा बजाने वाली अप्सरा देखी है। पर आपकी उँगलियाँ उन सबसे अलग हैं, क्योंकि ये अपनी ही धुन बजाने वाली उँगलियाँ हैं।”

अहल्या ने अपनी आँखें नीची कर लीं, और दोनों एक-दूसरे को देर तक देखते रहे।
प्रेम
अहल्या और दूसरे इन्द्र के बीच प्रेम हुआ। यह तेज़ी से नहीं, बल्कि धीरे-धीरे हुआ। पहले मुलाक़ातें हुईं, फिर बातें, फिर वे बातें जो वे किसी और से नहीं कर सकते थे, फिर एक-दूसरे की आँखों में देखना, फिर एक-दूसरे का हाथ छूना, और फिर बाक़ी सब।
यह बात कुछ बरस छिपी रही, पर एक दिन राजा इन्द्र को इसका पता चल ही गया।
क्रोध
राजा ने दोनों को बुलाया और कहा – “तुम दोनों ने ग़लत किया है।”
अहल्या ने अपना सिर नीचा नहीं किया।
उसने कहा – “महाराज, मुझे कुछ कहना है।”
“बोलो।”
अहल्या ने राजा को सीधे देखा, आँखों में आँखें डालकर, और कहा – “महाराज, आप मुझे बारह बरस से जानते हैं। आपने मुझमें एक तिल देखा, एक हँसी देखी, मेरी वीणा सुनी, पर आपने मुझे कभी पूरा नहीं देखा। मेरे भीतर एक भूख थी, बातों की भूख, ऐसी बातों की जो आपके पास नहीं थीं। मैंने यह आपको कभी कहा नहीं, क्योंकि आप अच्छे थे और मैं नहीं चाहती थी कि आप दुखी हों। पर वह भूख बनी रही।”
राजा का चेहरा कठोर रहा, पर भीतर कुछ हिला। उसने पूछा – “और?”
अहल्या बोली – “और इस देव ने वे बातें मेरे साथ कीं। पहली बार मैंने उन्हें सुना, और पहली बार मुझे लगा कि मेरे भीतर की भूख का कोई उत्तर हो सकता है।”
राजा ने पूछा – “तो क्या यह सही है?”

अहल्या ने कहा – “महाराज, सही और ग़लत तो समाज की भाषा है, मेरे भीतर की भाषा इससे अलग है। मेरे भीतर की भाषा कहती है कि जो मेरे होने को पूरा करे वही असली है, और जो मेरे होने को अधूरा छोड़ दे वह असली नहीं, चाहे वह कितना भी सम्मानजनक क्यों न हो। मैंने यह चुनाव किया है, मुझे पता था कि इसकी क़ीमत चुकानी होगी, और मैं उसके लिए तैयार हूँ।”
राजा ने उसे देर तक देखा और कहा – “अहल्या, तुम जानती हो कि तुम क्या कह रही हो?”
“हाँ।”
“समाज तुम्हें त्याग देगा।”
“मुझे पता है।”
“तुम्हारे माता-पिता तुम पर शोक करेंगे।”
“मुझे पता है।”
“तुम पतिता कहलाओगी।”
“महाराज, यह आपका शब्द है, मेरा नहीं।”
राजा ने फिर देव की ओर देखकर पूछा – “और देव?”
देव इन्द्र ने सिर उठाया और कहा – “महाराज, मैं भी अहल्या के साथ हूँ। मैं भी पतित कहलाऊँगा, मुझे चलेगा।”
राजा ने कहा – “तो तुम्हें सज़ा मिलेगी।”
अहल्या बोली – “दीजिए।”
राजा ने दोनों को सज़ा दी। पहले शारीरिक यातना, फिर निर्वासन। अहल्या और इन्द्र को एक जंगल में छोड़ दिया गया, बिना भोजन के, बिना कपड़ों के।
पर वे दोनों एक थे।

जंगल में उन्होंने पत्तियों से एक झोंपड़ी बनाई, जिसकी दीवारें मिट्टी की थीं, बहुत साधारण। वे शिकार करते और खाते।
हर रात वे साथ बैठते, और इसी तरह बहुत बरस बीते।
भरत ऋषि
एक दिन भरत नाम के एक ऋषि उस जंगल से गुज़रे। उन्होंने इन दोनों को देखा, उनकी झोंपड़ी देखी, और उनका साथ देखा।
उन्होंने पूछा – “तुम कौन हो?”
“महाराज, हम दो लोग हैं जिन्हें प्रेम है। राजा ने हमें सज़ा दी है।”
भरत बोले – “प्रेम धर्म के बाहर है, यह ठीक नहीं।”
“महाराज, हमें कोई पछतावा नहीं।”
भरत ने मन ही मन सोचा कि ये दोनों अपनी इच्छा से बँधे हैं, और इच्छा को इस तरह रोकना मुश्किल है। पर एक बात है, अगर इच्छा को बहुत लम्बे समय तक चलने दिया जाए, तो वह ख़ुद ही थक जाती है। यही नियम है।

उन्होंने कहा – “तुम जब तक इस प्रेम में फँसे हो, तब तक मुक्त नहीं हो सकते। मैं तुम्हें शाप देता हूँ। तुम जन्म-जन्म एक-दूसरे से मिलोगे, पर बँधे रहोगे, जब तक तुम्हारी इच्छा ख़ुद ख़त्म न हो जाए।”
अहल्या और इन्द्र हँस पड़े और बोले – “महाराज, यह शाप नहीं, यह तो वर है। हम तो वैसे भी जन्म-जन्म एक-दूसरे के साथ रहना चाहते थे।”
भरत ने इतना ही कहा – “देखेंगे।”
जन्म-जन्म
अहल्या और इन्द्र मर गए।
फिर वे एक के बाद एक देह में पैदा होते रहे।
पहला जन्म।
एक बार वे दो शिखरबन्द कबूतर थे, एक नर और एक मादा। वे एक पुराने मन्दिर के गुम्बद पर रहते थे, जहाँ उनका घोंसला एक टूटी हुई जाली के पीछे था, जहाँ न तो ज़्यादा हवा आती थी और न ही ऊपर से बारिश का पानी उतरता था।
मादा का सीना हलका भूरा था, और नर के गले पर हरे रंग की एक झलक थी।
दोनों दिन भर साथ रहते। सुबह अनाज की तलाश में नीचे उतरते और शाम को वापस गुम्बद पर लौट आते।
एक बार मादा का पैर नीचे ज़मीन पर एक पतंग के मांझे में फँस गया, और नर ऊपर बैठा देखता रहा।
मादा छटपटाई और चोंच से मांझे को काटने की कोशिश करती रही, पर मांझा बहुत कड़ा था।

तब नर नीचे आया और अपनी चोंच से देर तक मांझे को काटता रहा, यहाँ तक कि उसकी अपनी चोंच पर भी ख़ून आ गया।
आख़िर उसने मादा को छुड़ा लिया।
दोनों कुछ देर बस एक-दूसरे को देखते रहे, फिर ऊपर उड़ गए, और यूँ ही बहुत बरस बीते।
एक दिन एक शिकारी ने मादा को मार दिया, और तीर गुम्बद के बहुत क़रीब आकर लगा।
नर ने यह सब देखा। वह उड़ नहीं पाया और उसी टूटी जाली के पीछे तीन दिन तक बैठा रहा।
चौथे दिन उसने भी, बिना किसी शिकारी के, अपना देह छोड़ दिया।
दूसरा जन्म।
इस बार वे दण्डक वन के दो हिरण थे, एक नर और एक मादा। नर के सींग छोटे थे, अभी पूरे नहीं आए थे।
वे एक ही झुंड में साथ-साथ पले-बढ़े।
एक बार ग्रीष्म में पानी कम पड़ गया, तो झुंड को बहुत दूर जाना पड़ा, पर बूढ़े हिरण उतना नहीं चल पाए।
मादा अपने बूढ़े पिता को छोड़कर नहीं जा सकी।
नर ने मादा को देखकर पूछा – “तू रुकेगी?”
“हाँ।”
“तो मैं भी रुकूँगा।”
“तू झुंड के साथ चल।”
“नहीं।”
दोनों बूढ़े हिरण के पास रुक गए।
तीन दिन बाद बूढ़ा हिरण चल बसा।
मादा ने अपना माथा नर के माथे से छुआ, क्योंकि यही उनकी भाषा थी।
फिर दोनों झुंड के पीछे चल पड़े, और बहुत बरस साथ रहकर, बूढ़े होकर मर गए।
तीसरा जन्म। इस बार वे दो मछुआरे थे।
वे एक ही गाँव में, पर अलग-अलग घरों में रहते थे, और उनकी मुलाक़ात बाज़ार में हुई। दोनों ने शादी की, उनके बच्चे हुए, और बहुत बरस साथ रहकर बूढ़े होकर मर गए।
चौथा जन्म।
इस बार वे दो ब्राह्मण थे, जो एक ही आश्रम में पले-बढ़े। उन्होंने ध्यान सीखा, पाठ सीखा, पर उनके बीच वही पुराना प्रेम बना रहा। जब वे जवान हुए, तो उन्होंने आश्रम छोड़ दिया, शादी की, बहुत बरस साथ रहे, और फिर मर गए।
पाँचवाँ जन्म।
इस बार वे एक ही गाँव में, पर अलग-अलग जातियों में पैदा हुए। बच्चा एक चमार के घर और बच्ची एक ब्राह्मण के घर।
बचपन में वे एक-दूसरे को कुएँ पर देखते थे। बच्ची को कुएँ पर पानी भरने भेजा जाता था, पर बच्चे को नहीं, क्योंकि माना जाता था कि उसकी छाया पड़ने से कुआँ अशुद्ध हो जाएगा।
पर एक बार बच्चे का पिता बीमार पड़ गया, और बच्चा कुएँ पर गया। दूर खड़े होकर उसने बच्ची से पानी माँगा।
बच्ची ने उसे देखा, फिर अपना घड़ा भरकर बिना कुछ कहे उसके पास रख दिया।
यह बच्ची की पहली अवज्ञा थी।
इसके बाद बहुत मौसम बीते।
जब वे जवान हुए, तो उन्होंने एक-दूसरे को पहचान लिया, पर समाज ने उन्हें मना किया।
बच्ची के पिता ने उसकी शादी किसी और से तय कर दी।
शादी से एक रात पहले बच्ची ने अपने पिता को एक पत्र लिखा – “पिता, मैं जा रही हूँ। आप मुझे माफ़ करें या न करें, यह आप पर है, पर मैं जा रही हूँ। मेरा मन वहाँ नहीं है जहाँ आप मुझे भेज रहे हैं। मेरा मन वहाँ है जहाँ मेरी हड्डियों ने हमेशा से जाना चाहा है।”
वह रात को घर से भाग निकली।
बच्चा कुएँ पर उसका इन्तज़ार कर रहा था।
दोनों भाग गए और बहुत दूर के एक जंगल में एक झोंपड़ी बनाई। जीवन बहुत साधारण था, पर वे साथ थे।
उन्होंने तीन बच्चे पाले, पर उन्हें कभी अपनी जाति नहीं बताई।
और बच्चों ने कभी पूछा भी नहीं।
इस तरह बहुत हज़ार जन्म बीते।
हर जन्म में वे एक-दूसरे से मिलते और हर बार बिना नाम के, बिना याद के एक-दूसरे को पहचान लेते, क्योंकि उनका देह दूसरे की ओर अपने-आप खिंच जाता था। हर बार वे एक-दूसरे को चुनते, चाहे समाज मना करे, चाहे परिवार मना करे, चाहे राजा मना करे। यूँ बहुत हज़ार जन्म बीते, और हर जन्म में वही प्रेम बना रहा।
धीमा बदलाव
पर एक बात होती गई। हर जन्म में उनकी इच्छा थोड़ी-थोड़ी कम होती गई।
पहले जन्म में वे एक-दूसरे को छुए बिना नहीं रह सकते थे, उन्हें हर पल साथ चाहिए था, और थोड़ी-सी दूरी भी उन्हें बेचैन कर देती थी। दसवें जन्म में वे दूर भी रह सकते थे, पर साथ रहना ही पसन्द करते थे। पचासवें जन्म में वे साथ रहते थे, पर कभी-कभी अकेले भी रह लेते थे। और सौवें जन्म में वे एक-दूसरे को देखकर हँस देते, और दोनों जानते थे कि यह बहुत पुराना नाता है, हालाँकि याद किसी को नहीं था।
हज़ारवें जन्म में वे एक-दूसरे को देखकर ठहर तो जाते, पर उसमें वह पुरानी तेज़ी नहीं थी, बस एक धीमी-सी पहचान थी।
इच्छा हलकी होती जाती थी। प्रेम वैसा ही रहता, पर उसका रूप बदलता जाता। पहले प्रेम तेज़ था, अब स्थिर हो चला था। पहले प्रेम बेचैन था, अब शान्त हो चला था।
एक और जन्म
एक और जन्म में वे दो बच्चे थे। बच्ची एक छोटे-से गाँव में पैदा हुई और बच्चा उसी गाँव में, और दोनों के घर पास-पास थे।
जब वे बच्चे थे, तो वे हर रोज़ साथ खेलते थे। जब वे थोड़े बड़े हुए, तो उन्हें एक-दूसरे के लिए कुछ ख़ास लगने लगा, और जब वे और बढ़े, तो उन्होंने शादी कर ली।
यह जन्म बहुत साधारण था। न कोई बड़ा नाटक, न कोई शाप, न कोई निर्वासन। बस दो लोग थे जो प्रेम करते थे, साथ रहे, उनके बच्चे हुए, वे बूढ़े हुए, और चले गए।
पर एक बात हुई। मरने से पहले बच्ची ने बच्चे का हाथ अपने हाथ में लिया और पूछा – “पति, क्या तुम्हें लगता है कि हम पहले भी मिले हैं?”
बच्चे ने कहा – “पत्नी, मुझे तो यह बहुत बरसों से लगता है।”
“मुझे भी।”
और दोनों शान्ति से मर गए।
अन्तिम जन्म
एक जन्म में वे दोनों तपस्वी बने, एक स्त्री तपस्विनी और एक पुरुष तपस्वी।
स्त्री हिमालय के एक हिस्से में, एक छोटी-सी कुटिया में अकेली रहती थी। पुरुष हिमालय के दूसरे हिस्से में, एक छोटी-सी गुफा में अकेला रहता था।
वे दूर रहते थे, पर दोनों को पता था कि वे एक-दूसरे के लिए हैं। उन्हें अपनी पिछली कथा याद नहीं थी, पर भीतर कहीं वे यह जानते थे।
एक दिन वे एक नदी के किनारे मिले।
स्त्री ने पुरुष को देखा, पुरुष ने स्त्री को देखा, और दोनों के होंठों पर एक धीमी पहचान की हँसी आ गई।
स्त्री बोली – “तुम वही हो, हमेशा वाले।”
“हाँ।”
“मैं भी।”
“हाँ।”
फिर दोनों चुप हो गए।
पर इस बार कुछ अलग था। पहले के जन्मों में वे मिलते ही एक-दूसरे की ओर खिंच जाते थे, पर इस बार वह खिंचाव नहीं था।
बस एक पहचान थी।
स्त्री ने कहा – “मुझे लग रहा है कि यह जन्म आख़िरी होगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि अब मुझे तुम्हें छूने की इच्छा नहीं होती। तुम्हें देखकर मेरा मन शान्त रहता है, बेचैन नहीं।”
पुरुष ने कहा – “मुझे भी ऐसा ही लग रहा है।”
“तो?”
“तो शायद अब हम मुक्त हैं।”
दोनों नदी के किनारे बैठ गए और देर तक चुप रहे।
स्त्री ने पुरुष का हाथ अपने हाथ में लिया। पर इस बार छूना अलग था। पहले यह छूना इच्छा थी, अब यह छूना एक प्रणाम था।
पुरुष ने पूछा – “तुम्हें हमारी पहली कथा याद है?”
“नहीं। पर भीतर कुछ है।”
“वह शाप मिला था, भरत ऋषि से।”
“शाप?”
“हाँ। उन्होंने कहा था, तुम जन्म-जन्म मिलोगे पर बँधे रहोगे, जब तक इच्छा ख़ुद ख़त्म न हो।”
“और अब?”
“अब इच्छा ख़त्म हो रही है।”
स्त्री ने पूछा – “तो शाप का क्या?”
“शाप अब पूरा हो रहा है। और शाप के पूरा होने का मतलब यही है कि हम मुक्त हो रहे हैं।”

फिर दोनों ने आँखें बन्द कीं और समाधि में चले गए।
जब लोगों ने उन्हें देखा, तो दोनों एक साथ बैठे थे, आँखें बन्द, चेहरे शान्त, पर साँस नहीं थी। दोनों एक ही साथ चले गए थे।
लोगों ने उन्हें वहीं नदी के किनारे दफ़न किया।
बहुत बाद में कुछ लोगों ने उनकी स्मृति में एक छोटा-सा मन्दिर बनाया। पर उस मन्दिर में कोई मूर्ति नहीं थी, बस एक खुली जगह थी और हवा में तैरती हुई एक धुँधली-सी आकृति। लोग कहते थे – “यहाँ दो प्रेमी मुक्त हुए, बहुत हज़ार जन्मों के बाद।”
भरत की एक बात
बहुत बरस बाद, भरत ऋषि ने अपने आख़िरी समय में यह कथा याद की और अपने शिष्यों से कहा – “मित्रों, मैंने एक बार दो लोगों को शाप दिया था, पर वह शाप उनके लिए वर बन गया। हज़ार जन्मों के बाद वे मुझसे मुक्त हुए।”
शिष्य चकित रह गए और पूछा – “महाराज, आपने उन्हें शाप दिया था, और वे मुक्त हुए?”

भरत बोले – “हाँ। क्योंकि शाप ने उन्हें मजबूर किया कि वे हर जन्म में मिलें, और हर जन्म में मिलकर उनकी इच्छा थोड़ी-थोड़ी कम होती गई। आख़िर इच्छा ख़त्म हुई, और यही तो मुक्ति है। अगर मैं उन्हें मार देता, तो वे हज़ार जन्म कम लेते, पर इच्छा बची रहती। मेरे शाप ने उस इच्छा को थका दिया।”
भरत ने आगे कहा – “मित्रों, यह सीख लो। हर इच्छा अन्ततः थक ही जाती है, चाहे वह कितनी भी तेज़ क्यों न हो। बस उसे समय चाहिए, और कई जन्म। जो लोग इच्छा से बहुत डरते हैं और उससे लड़ते हैं, वे बँधे रह जाते हैं। पर जो लोग इच्छा को उसके स्वाभाविक रास्ते पर चलने देते हैं, वे अन्ततः मुक्त हो जाते हैं।”
शिष्यों ने सिर झुकाकर यह बात ग्रहण की। फिर भरत चले गए, पर उनकी यह बात बनी रही।
राम बहुत देर तक चुप रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, तो धर्म के बाहर का प्रेम भी अन्ततः…”
वसिष्ठ बोले – “राम, इच्छा हर तरह की एक ही चीज़ है। वह धर्म-संगत हो या न हो, अगर बहुत तीव्र है, तो जन्म-जन्म खींचती रहेगी। और जब तक इच्छा ख़ुद नहीं थक जाती, तब तक मुक्ति नहीं आती। पर इच्छा एक दिन थकती ज़रूर है, और तभी मुक्ति आती है। यह कहानी एक ही बात कहती है, कि कोई इच्छा हमेशा के लिए नहीं रहती। हर एक का अन्त है, बस उसका रास्ता अलग है।”
राम ने पूछा – “और भरत ऋषि की बात? उन्होंने सही किया।”
वसिष्ठ बोले – “हाँ। उन्होंने जो किया, वह दण्ड नहीं था, वह एक रास्ता था, बहुत कठिन, पर रास्ता था।”
राम कुछ देर सरयू के जल की ओर देखते रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, क्या मेरे जीवन में भी ऐसी इच्छा होगी?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हर मनुष्य में होती है, तुम्हारी अपनी इच्छा भी होगी। पर तुम्हें राजा बनना है, और तुम्हें अपनी इच्छा को राजा-धर्म के साथ बैठाना होगा। यह तुम्हारी अपनी कथा है।”
राम ने फिर कहा – “गुरुदेव, अहल्या और इन्द्र की कथा में एक और बात मुझे लगती है।”
“क्या?”
“वे दोनों ने एक-दूसरे को कभी नहीं छोड़ा, चाहे जो भी हो।”
“हाँ।”
“यह बहुत बड़ी बात है।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यही असली प्रेम है। बहुत बार लोग बाहर के दबाव में अपने प्रेम को छोड़ देते हैं, पर अहल्या और इन्द्र ने नहीं छोड़ा।”
“क्यों?”
“क्योंकि उनकी इच्छा बहुत तीव्र थी, और समाज की कोई भी बाधा उन्हें छू तक नहीं पाई।”
राम ने पूछा – “गुरुदेव, यह तीव्रता क्या अच्छी है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, अच्छी या बुरी, यह बात ही नहीं है। बात यह है कि इच्छा का अपना स्वभाव होता है। इच्छा जब तीव्र होती है, तो वह हज़ारों जन्म खींचती है, और जब हलकी होती है, तो जल्दी थक जाती है। दोनों के अपने-अपने मार्ग हैं।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, मुझे यह बात अब स्पष्ट हो गई।”
बाहर एक धीमी हवा बह रही थी, और राम कुछ देर सरयू के जल की ओर देखते रहे।
बहुत बरसों की बात इस तरह कही गई, बहुत प्रश्न और बहुत उत्तर इस एक कथा में समा गए।
राम बोले – “गुरुदेव, धन्यवाद।”
“राम, अब चलो।”
और दोनों उठ खड़े हुए।
राम पल भर रुककर फिर सरयू के जल की ओर देखने लगे और बोले – “गुरुदेव, एक और प्रश्न। क्या अहल्या और इन्द्र की चेतनाएँ अब कहीं हैं?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हाँ। वे दोनों अब प्रकाश में हैं। पर एक स्तर पर उनकी कथा हम सब में भी है। जब भी कोई दो लोग अपनी इच्छा से एक-दूसरे को नहीं छोड़ते, चाहे कैसी भी बाधा क्यों न हो, तब अहल्या और इन्द्र वहीं होते हैं।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, यह बहुत कोमल बात है।”
“हाँ।”
और सरयू बहती रही।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 3.89-90 पर आधारित है। यह रामायण की अहल्या-इन्द्र कथा का एक भिन्न रूप है। यहाँ नैतिक निंदा नहीं, दार्शनिक तटस्थता है। दोनों प्रेमी अन्ततः अपनी इच्छा के थकने से मुक्ति पाते हैं। यह कथा इच्छा और बन्ध के सम्बन्ध की एक अनोखी समझ देती है। भरत ऋषि का अपने ही शाप को बाद में वर के रूप में देखना, यह कथा का सूक्ष्म मोड़ है।
दर्शन-दृष्टि
देव-इन्द्र और रानी अहल्या एक-दूसरे को पाते हैं, राजा-इन्द्र (अहल्या के पति) उन्हें पकड़ता है, ऋषि भरत उन्हें शाप देते हैं। दोनों जन्म-दर-जन्म एक-दूसरे को ढूँढते हैं, हर जन्म में पाते हैं, हर जन्म में फिर खोते हैं। आख़िर एक जन्म में वो तप करते हैं, और कामना के थक जाने पर मुक्त होते हैं। कथा यह कहती है कि कामना अपने वस्तु से समाप्त नहीं होती, उसे जब तक तप से छाना न जाए वो अपनी ही पुनरावृत्ति करती रहती है।
ऑस्ट्रियाई मनोविश्लेषक सिग्मण्ड फ़्रॉयड (Sigmund Freud, 1856-1939) ने अपनी Beyond the Pleasure Principle (1920) में repetition compulsion का सिद्धान्त रखा, कि अनसुलझी कामनाएँ अपने को बार-बार दोहराती हैं, हर बार उसी पैटर्न में, जब तक उन्हें भीतर देखा न जाए। इन्द्र और अहल्या का सिलसिला यही है। हर जन्म एक दोहराव है, और जब तक वो दोहराव चेतना के सामने आकर पारदर्शी न हो जाए, तब तक उनका मिलना मुक्ति नहीं, बन्धन की एक और परत है।