श्री राम गीता · खण्ड 8
उपसंहार
The Closing · श्लोक 58 से 62
राम की closing words। यह उपदेश किसको दो, किसको नहीं।
श्लोक 58
यद्येतद्ब्रह्मविज्ञानं रहस्यं परमं तव।
श्रद्धावते भक्तिमते दातव्यं वत्स लक्ष्मण॥
श्रद्धावते भक्तिमते दातव्यं वत्स लक्ष्मण॥
yady etad brahma-vijñānaṁ rahasyaṁ paramaṁ tava
śraddhāvate bhaktimate dātavyaṁ vatsa lakṣmaṇa
śraddhāvate bhaktimate dātavyaṁ vatsa lakṣmaṇa
अर्थ“यदि यह ब्रह्म-विज्ञान, परम-रहस्य, तेरा, हे लक्ष्मण बेटा, श्रद्धावान्, भक्ति-वाले को देने योग्य।”
सन्दर्भराम warning दे रहे हैं। यह विद्या हर एक को नहीं। केवल “श्रद्धावान्” और “भक्तिमान्” को।
श्लोक 59
नादातव्यं हि मूर्खाय न दाम्भिकाय नापि च।
शिष्यायैव प्रदातव्यं विरक्ताय जितेन्द्रिये॥
शिष्यायैव प्रदातव्यं विरक्ताय जितेन्द्रिये॥
nādātavyaṁ hi mūrkhāya na dāmbhikāya nāpi ca
śiṣyāyaiva pradātavyaṁ viraktāya jitendriye
śiṣyāyaiva pradātavyaṁ viraktāya jitendriye
अर्थ“न देना है मूर्ख को, न दम्भी को। शिष्य को ही देना है, विरक्त, जित-इन्द्रिय।”
श्लोक 60
ब्रह्मण्ये धार्मिके मेधाविने वैरी न यद्भवेत्।
न दातव्यं द्विषद्भ्यश्च न दुष्टेभ्योऽपरीक्षितम्॥
न दातव्यं द्विषद्भ्यश्च न दुष्टेभ्योऽपरीक्षितम्॥
brahmaṇye dhārmike medhāvine vairī na yad bhavet
na dātavyaṁ dviṣadbhyaś ca na duṣṭebhyo’parīkṣitam
na dātavyaṁ dviṣadbhyaś ca na duṣṭebhyo’parīkṣitam
अर्थ“ब्रह्मण्य, धार्मिक, मेधावी, जो शत्रु न बने, उसी को (देना है)। द्वेषियों को, दुष्टों को, बिना परीक्षा के नहीं।”
श्लोक 61
यः शृणोति श्रद्धा-युक्तो यश्च मे भक्ति-तत्परः।
स प्राप्नोति परं ज्ञानं ब्रह्म-भूयाय कल्पते॥
स प्राप्नोति परं ज्ञानं ब्रह्म-भूयाय कल्पते॥
yaḥ śṛṇoti śraddhā-yukto yaś ca me bhakti-tatparaḥ
sa prāpnoti paraṁ jñānaṁ brahma-bhūyāya kalpate
sa prāpnoti paraṁ jñānaṁ brahma-bhūyāya kalpate
अर्थ“जो श्रद्धा-युक्त सुनता है, और मुझ में भक्ति-तत्पर है, वो परम ज्ञान पाता है, ब्रह्म-भूय के लिए कल्पित।”
सन्दर्भ“मुझ में भक्ति”। राम कह रहे हैं भक्ति राम के प्रति, यानी ब्रह्म के प्रति। ज्ञान + भक्ति, दोनों एक साथ।
श्लोक 62 · अन्तिम श्लोक
इति श्रुत्वा रघुपते राम-गीतां सनातनीम्।
लक्ष्मणो परमं ज्ञानं प्राप्तवान्मुक्तिमेव च॥
लक्ष्मणो परमं ज्ञानं प्राप्तवान्मुक्तिमेव च॥
iti śrutvā raghu-pate rāma-gītāṁ sanātanīm
lakṣmaṇo paramaṁ jñānaṁ prāptavān muktim eva ca
lakṣmaṇo paramaṁ jñānaṁ prāptavān muktim eva ca
अर्थ“इस प्रकार रघुपति की सनातनी राम-गीता सुन कर, लक्ष्मण ने परम ज्ञान और मुक्ति प्राप्त की।”
सन्दर्भराम-गीता समाप्त। 62 श्लोक। एक प्रश्न, एक उत्तर, और एक मुक्त शिष्य।
॥ श्री राम गीता समाप्त ॥