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श्री राम गीता · खण्ड 8: उपसंहार

पढ़ने में लगभग 5 मिनट · 684 शब्द

श्री राम गीता · खण्ड 8

उपसंहार

समापन · श्लोक 58 से 62

राम का आख़िरी वचन। यह विद्या किसे सौंपी जाए, और किसे कभी नहीं।

अगर एक पंक्ति याद रखनी हो, तो वह यह है।

विज्ञानमेतदखिलं श्रुतिसारमेकं वेदान्तवेदचरणेन मयैव गीतम्।
यः श्रद्धया परिपठेद्गुरुभक्तियुक्तो मद्रूपमेति यदि मद्वचनेषु भक्तिः ॥

यह सम्पूर्ण विज्ञान, समस्त श्रुति का एक सार, हमने ही वेदान्त-वेद के अधिकार से गाया है। जो श्रद्धा से, गुरु-भक्ति में रंग कर इसे पढ़ता है, और जिसकी हमारे वचनों में भक्ति है, वह हमारे ही रूप को पा लेता है।

राम गीता, खण्ड 8

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अब राम अपनी बात समेट रहे हैं। पूरा ब्रह्मविज्ञान कह चुकने के बाद वे लक्ष्मण की ओर मुड़ते हैं, और स्वर में एक चेतावनी आ जाती है। यह परम-रहस्य है, बेटा, इसे हर किसी के हाथ में नहीं रखा जाता। जिसके भीतर श्रद्धा हो और जिसका हृदय भक्ति से भरा हो, ऐसे ही पात्र को यह विद्या सौंपी जाती है।

श्लोक 58

यावन्न पश्येदखिलं मदात्मकं तावन्मदाराधनतत्परो भवेत्।
श्रद्धालुरत्यूर्जितभक्तिलक्षणो यस्तस्य दृश्योऽहमहर्निशं हृदि॥58॥

फिर राम इस उपदेश की महिमा खोल देते हैं। यह श्रुति का सार है, बेटा, इसे निश्चय कर के हमने आपसे कहा है। जो बुद्धिमान इस पर विचार करता है, वह क्षण भर में पाप-राशियों से छूट जाता है। और इसके आगे वे एक सीधी बात रख देते हैं – हे भाई, यह सारा जगत जो दिख रहा है, माया ही है। इसे मन से छोड़ दीजिए, हमारे भाव में मन को शुद्ध कर लीजिए, तब आप सुखी, आनन्द-स्वरूप और सब रोग-शोक से परे हो जाएँगे।

श्लोक 59 · 60

रहस्यमेतच्छ्रुतिसारसङ्ग्रहं मया विनिश्चित्य तवोदितं प्रिय।
यस्त्वेतदालोचयतीह बुद्धिमान् स मुच्यते पातकराशिभिः क्षणात्॥59॥

भ्रातर्यदीदं परिदृश्यते जगन्मायैव सर्वं परिहृत्य चेतसा।
मद्भावनाभावितशुद्धमानसः सुखी भवानन्दमयो निरामयः॥60॥

फिर राम भक्त की महिमा कह देते हैं। जो हमें भजता है, चाहे निर्गुण रूप में जो गुणों से परे है, या कभी सगुण रूप में, उसका स्पर्श ही पवित्र कर देता है। राम कहते हैं, हम अपने चरणों की धूलि से जिसे छू लें, वह तीनों लोकों को वैसे ही पावन कर देता है जैसे सूर्य अपने प्रकाश से। और इसी के साथ कथा अपने छोर पर आती है। यह जो सम्पूर्ण विज्ञान है, श्रुति का एक ही सार, उसे वेदान्तवेद के अधिकार से स्वयं राम ने ही गाया है। जो श्रद्धा से, गुरु-भक्ति में रंग कर इसे पढ़ता है, और जिसकी राम के वचनों में भक्ति है, वह राम के ही रूप को पा लेता है। यहाँ ज्ञान और भक्ति, दोनों एक साथ चलते हैं, एक के बिना दूसरा अधूरा है। एक प्रश्न, एक उत्तर, और शिष्य के सामने मुक्ति का द्वार खुल गया।

श्लोक 61 · 62

यः सेवते मामगुणं गुणात्परं हृदा कदा वा यदि वा गुणात्मकम्।
सोऽहं स्वपादाञ्चितरेणुभिः स्पृशन् पुनाति लोकत्रितयं यथा रविः॥61॥

विज्ञानमेतदखिलं श्रुतिसारमेकं वेदान्तवेदचरणेन मयैव गीतम्।
यः श्रद्धया परिपठेद्गुरुभक्तियुक्तो मद्रूपमेति यदि मद्वचनेषु भक्तिः॥62॥

॥ श्री राम गीता समाप्त ॥

विस्तार: यह खण्ड और गहरा

राम का अंतिम वचन: सब कुछ कह दिया, श्रुति का पूरा सार एक ही विज्ञान में समेट दिया। अब लक्ष्मण का काम है इसे केवल समझना नहीं, अपने अनुभव में उतारना। राम उपदेश की मुद्रा से बाहर निकल कर फिर से राजा की मुद्रा में लौट जाएँगे।

बासठ श्लोकों की यात्रा: यह छोटी रचना है, मगर इसमें सब कुछ सिमटा हुआ है। भगवद् गीता के सात सौ श्लोकों की पूरी यात्रा को यहाँ बासठ श्लोकों में फिर से वाणी मिली है, एक और प्रसंग में, एक और श्रोता के लिए।

यह सार-रूप क्यों मूल्यवान है: आज जिसके पास सात सौ श्लोक पढ़ने का समय नहीं, उसके पास बासठ के लिए तो है। और इन बासठ श्लोकों में वेदान्त का पूरा निचोड़ बैठा हुआ है। राम-गीता मानो उसी विशाल शिक्षा का सार-संक्षेप है।

आज, अपने घर में: दादा अपने पढ़ने जाते पोते को विदा का संदेश दे रहे हैं, अब आप जाइए, हमने जो कहना था सब कह दिया। राम-गीता का समापन ठीक यही भाव है। कह देना पूरा हो गया, अब उतारना उसके हाथ में।

राम-गीता के बाद क्या: अष्टावक्र गीता, भगवद् गीता का विस्तृत रूप, या उपनिषद् जो मूल स्रोत हैं। बहुत-से पाठकों के लिए राम-गीता वह पहला द्वार है जहाँ से वे पूरे वेदान्त में प्रवेश पाते हैं।