साधना का मार्ग
The Path of Practice · श्लोक 43 से 50
सिद्धान्त समझा। अब practical। साधक क्या करे? राम के words.
मनसा च नियम्येन्द्रियाणि सर्वाणि सर्वथा॥
manasā ca niyamyendriyāṇi sarvāṇi sarvathā
अर्थ“प्रसन्न गुरु को पा कर, वेदान्त का श्रवण कर के, मन से सब इन्द्रियों को नियमित कर के।”
आत्मानमेकं श्रद्धा-समेतो ज्ञेयं विजानीयाद् यथार्थवृत्तिः॥
ātmānam ekaṁ śraddhā-sameto jñeyaṁ vijānīyād yathārtha-vṛttiḥ
अर्थ“शास्त्रोक्त मार्ग से, विवेक-दृष्टि से, निःशंक-चित्त से, उसका अर्थ जान कर, श्रद्धा-समेत, आत्मा को एक जान, ज्ञेय को यथार्थ वृत्ति से जाने।”
निदिध्यासः समाधिश्च क्रमेण फलदं भवेत्॥
nididhyāsaḥ samādhiś ca krameṇa phalaḍaṁ bhavet
अर्थ“पहले श्रवण, फिर मनन। फिर निदिध्यासन और समाधि। क्रम से फल देने वाले होते हैं।”
स तु मन्द-मतिर्भोगी न ज्ञानी न च योगिनम्॥
sa tu manda-matir bhogī na jñānī na ca yoginam
अर्थ“जो सिर्फ़ श्रवण से ही विद्या प्राप्त मानता है, वो मन्द-मति है, भोगी, न ज्ञानी न योगी।”
तात्पर्य-ज्ञानमेकाग्रचित्तेन निदिध्यासनम्॥
tātparya-jñānam ekāgra-cittena nididhyāsanam
अर्थ“मनन से सब शास्त्रार्थ के सन्देह दूर हो जाने पर, तात्पर्य-ज्ञान, एकाग्र-चित्त से, निदिध्यासन।”
स विद्यावान् धन्यतमो जीवन्मुक्तेन सङ्गतः॥
sa vidyāvān dhanyatamo jīvan-muktena saṅgataḥ
अर्थ“विद्या के साथ वैराग्य भी, उसके साधनों में जो रहे, वो विद्यावान् धन्य-तम, जीवन्मुक्त से संगत।”
श्रोतुं विद्यां समर्थः स्यान्न तु मन्द-मना नरः॥
śrotuṁ vidyāṁ samarthaḥ syān na tu manda-manā naraḥ
अर्थ“शम, दम आदि से सम्पन्न, मुमुक्षु, बुद्धिमान् मनुष्य, विद्या सुनने में समर्थ है। मन्द-मनुष्य नहीं।”
आत्म-तत्त्व-विदोऽप्येष ब्रह्म-भूयाय कल्पते॥
ātma-tattva-vido’py eṣa brahma-bhūyāya kalpate
अर्थ“गुरु-उपदेश से सम्पन्न, वेदान्त-श्रवण आदि वाला, आत्म-तत्त्व का ज्ञाता, यह ब्रह्म-भूय (ब्रह्म-होने) के लिए कल्पित है।”