श्री राम गीता · खण्ड 6: साधना का मार्ग

श्री राम गीता · खण्ड 6

साधना का मार्ग

The Path of Practice · श्लोक 43 से 50

सिद्धान्त समझा। अब practical। साधक क्या करे? राम के words.

श्लोक 43
गुरुं प्रसन्नं प्राप्यैव वेदान्तं श्रवणेन च।
मनसा च नियम्येन्द्रियाणि सर्वाणि सर्वथा॥
guruṁ prasannaṁ prāpyaiva vedāntaṁ śravaṇena ca
manasā ca niyamyendriyāṇi sarvāṇi sarvathā

अर्थ“प्रसन्न गुरु को पा कर, वेदान्त का श्रवण कर के, मन से सब इन्द्रियों को नियमित कर के।”

सन्दर्भतीन preliminary requirements: गुरु, श्रवण, indriya-niyaman।
श्लोक 44
शास्त्रोक्त-मार्गेण विवेक-दृष्ट्या निःशङ्क-चित्तेन तदर्थ-वित्।
आत्मानमेकं श्रद्धा-समेतो ज्ञेयं विजानीयाद् यथार्थवृत्तिः॥
śāstrokta-mārgeṇa viveka-dṛṣṭyā niḥśaṅka-cittena tad-artha-vit
ātmānam ekaṁ śraddhā-sameto jñeyaṁ vijānīyād yathārtha-vṛttiḥ

अर्थ“शास्त्रोक्त मार्ग से, विवेक-दृष्टि से, निःशंक-चित्त से, उसका अर्थ जान कर, श्रद्धा-समेत, आत्मा को एक जान, ज्ञेय को यथार्थ वृत्ति से जाने।”

श्लोक 45 · श्रवण
श्रवणं तावदाद्यं स्यान्मननं तदनन्तरम्।
निदिध्यासः समाधिश्च क्रमेण फलदं भवेत्॥
śravaṇaṁ tāvad ādyaṁ syān mananaṁ tad-anantaram
nididhyāsaḥ samādhiś ca krameṇa phalaḍaṁ bhavet

अर्थ“पहले श्रवण, फिर मनन। फिर निदिध्यासन और समाधि। क्रम से फल देने वाले होते हैं।”

सन्दर्भचार steps: श्रवण → मनन → निदिध्यासन → समाधि। यह क्रम है। एक के बिना दूसरा अधूरा।
श्लोक 46 · मनन
श्रवणादेव यो विद्यां प्राप्तां मन्येत निश्चयात्।
स तु मन्द-मतिर्भोगी न ज्ञानी न च योगिनम्॥
śravaṇād eva yo vidyāṁ prāptāṁ manyeta niścayāt
sa tu manda-matir bhogī na jñānī na ca yoginam

अर्थ“जो सिर्फ़ श्रवण से ही विद्या प्राप्त मानता है, वो मन्द-मति है, भोगी, न ज्ञानी न योगी।”

सन्दर्भ“सिर्फ़ सुनना काफ़ी नहीं”। मनन और निदिध्यासन भी ज़रूरी।
श्लोक 47 · निदिध्यासन
मननेन निरस्तेषु सर्व-शास्त्रार्थ-संशयैः।
तात्पर्य-ज्ञानमेकाग्रचित्तेन निदिध्यासनम्॥
mananena nirasteṣu sarva-śāstrārtha-saṁśayaiḥ
tātparya-jñānam ekāgra-cittena nididhyāsanam

अर्थ“मनन से सब शास्त्रार्थ के सन्देह दूर हो जाने पर, तात्पर्य-ज्ञान, एकाग्र-चित्त से, निदिध्यासन।”

श्लोक 48 · वैराग्य
वैराग्यं विद्यया युक्तं तत्साधनेषु यो भवेत्।
स विद्यावान् धन्यतमो जीवन्मुक्तेन सङ्गतः॥
vairāgyaṁ vidyayā yuktaṁ tat-sādhaneṣu yo bhavet
sa vidyāvān dhanyatamo jīvan-muktena saṅgataḥ

अर्थ“विद्या के साथ वैराग्य भी, उसके साधनों में जो रहे, वो विद्यावान् धन्य-तम, जीवन्मुक्त से संगत।”

श्लोक 49 · शिष्य के गुण
शम-दमादि-सम्पन्नो मुमुक्षुर्बुद्धिमान्नरः।
श्रोतुं विद्यां समर्थः स्यान्न तु मन्द-मना नरः॥
śama-damādi-sampanno mumukṣur buddhimān naraḥ
śrotuṁ vidyāṁ samarthaḥ syān na tu manda-manā naraḥ

अर्थ“शम, दम आदि से सम्पन्न, मुमुक्षु, बुद्धिमान् मनुष्य, विद्या सुनने में समर्थ है। मन्द-मनुष्य नहीं।”

सन्दर्भ“साधन-चतुष्टय”। शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान। और मुमुक्षुत्व। यह qualifications हैं।
श्लोक 50 · रहस्य
गुरूपदेश-सम्पन्नो वेदान्त-श्रवणादिमान्।
आत्म-तत्त्व-विदोऽप्येष ब्रह्म-भूयाय कल्पते॥
gurūpadeśa-sampanno vedānta-śravaṇādimān
ātma-tattva-vido’py eṣa brahma-bhūyāya kalpate

अर्थ“गुरु-उपदेश से सम्पन्न, वेदान्त-श्रवण आदि वाला, आत्म-तत्त्व का ज्ञाता, यह ब्रह्म-भूय (ब्रह्म-होने) के लिए कल्पित है।”

॥ साधना का मार्ग ॥