मोक्ष संन्यास योग
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अध्याय का सार
गीता का सबसे लंबा अध्याय, और सब का सार। कृष्ण यहाँ पिछले 17 अध्यायों की सारी बातें फिर से इकट्ठा करते हैं, मगर एक नई दिशा से।

पहले ‘त्याग’ और ‘संन्यास’ के बीच का फ़र्क़ साफ़ करते हैं। फिर पाँच कारण बताते हैं किसी भी कर्म के, अधिष्ठान (शरीर), कर्ता, इन्द्रियाँ, चेष्टा, और दैव। अकेला अहंकार कर्ता नहीं।
फिर तीन गुणों के हिसाब से सब का division: ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति, सुख। हर के तीन रंग।

और तब वर्ण-धर्म: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के कर्म। यह जात-व्यवस्था नहीं, स्वभाव-व्यवस्था है। हर एक का धर्म उसके अपने स्वभाव से जुड़ा है।

अंत में सबसे शक्तिशाली श्लोक, 18.66, ‘सब धर्मों को छोड़, मेरी शरण में आ। मैं तुझे सब पापों से मुक्त करूँगा। शोक मत कर।’ अर्जुन का संदेह मिटता है। वो धनुष उठाते हैं, युद्ध शुरू होता है।

मुख्य श्लोक
श्लोक 18.47
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
श्लोक 18.61
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥
ईश्वर हृदय में है, और सब को घुमा रहा है। हम ख़ुद नहीं चलते, हम यंत्र पर चढ़े हैं।
श्लोक 18.65
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
पाँच कार्य, एक वचन। मन-भक्ति-यज्ञ-नमन-कृष्ण। और बीच में एक भावुक पंक्ति: ‘क्योंकि तू मुझे प्रिय है।’

श्लोक 18.66
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
गीता का अंतिम सूत्र। ‘चरम-श्लोक’ कहलाता है। पूरी 700 श्लोकों की किताब इस एक पंक्ति में सिमट जाती है।

श्लोक 18.78
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
पूरी गीता का closing seal। संजय ने सारा वर्णन धृतराष्ट्र को सुनाया है। और एक वाक्य में निचोड़: कृष्ण + अर्जुन = विजय। ज्ञान + कर्म = success।
3.35 का repeat, मगर ज़्यादा मज़बूती से। यह repeat कुछ बता रहा है, यह बात बार-बार सुनने लायक है।