Chapter 11: विश्वरूप दर्शन योग

अध्याय 11

विश्व-रूप दर्शन योग

The Vision of the Cosmic Form
अर्जुन ने कहा, ”मुझे दिखाइए।” कृष्ण ने अपना विश्व-रूप दिखाया, सब देवता, सब लोक, समय का गला। अर्जुन काँप उठा।
55 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 10 मिनट
विश्व-रूप, कृष्ण का ब्रह्मांडीय रूप
विश्व-रूप, सब लोक, सब देवता, सब काल कृष्ण के एक रूप में।

अध्याय का सार

अर्जुन ने अध्याय 10 के बाद कहा, ‘आपने अपनी विभूतियाँ बता दीं। अब असली रूप दिखाइए।’ कृष्ण ने पहले बताया कि साधारण आँखों से यह दिखेगा नहीं, और ‘दिव्य-चक्षु’ दिए।

और तब वो रूप दिखा। हज़ारों मुख, हज़ारों आँखें, हज़ारों भुजाएँ। सब देवता उसी में, सब लोक उसी में, सूर्य-चन्द्र-तारे उसी में। और सामने एक मुख, जिसमें सब सेनाएँ अंदर जा रही थीं।

अर्जुन घबरा गया। पूछा, ‘आप कौन हैं?’ कृष्ण ने जवाब दिया: ‘मैं काल हूँ, संसार के नाश का कारण। यह सेनाएँ तो मार ही दी जा चुकी हैं। तू बस निमित्त बन।’

अर्जुन ने हाथ जोड़कर माफ़ी माँगी कि मित्र समझकर ‘अरे कृष्ण’ कहता रहा। फिर प्रार्थना की कि वो साधारण रूप में लौट आएँ। कृष्ण लौट आए। और कहा, ‘यह रूप तुझे इसलिए दिखाया कि कोई और इसे नहीं देख पाता। यह केवल भक्ति से देखा जा सकता है।’

मुख्य श्लोक

श्लोक 11.32

श्रीभगवानुवाच ।
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
साधारण अनुवाद‘मैं काल हूँ, संसार का नाश करने वाला, और बढ़ता हुआ हूँ। मैं यहाँ लोकों को समेटने में लगा हूँ। तेरे बिना भी, इन सब विरोधी सेनाओं में खड़े योद्धा नहीं बचेंगे।’

पूरी गीता का सबसे चौंकाने वाला कथन। यह वही ‘कालोऽस्मि’ है जो ओप्पेनहाइमर ने हिरोशिमा पर atomic bomb देखते वक़्त कहा था।

श्लोक 11.33

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥
साधारण अनुवाद‘इसलिए उठ, यश पा। शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य भोग। ये पहले से ही मेरे द्वारा मार दिए गए हैं। तू बस निमित्त बन, हे सव्यसाची।’

कृष्ण का सबसे साफ़ निर्देश। ‘तू कारण नहीं, माध्यम है।’ इस realization में कर्ता-भाव गिर जाता है।

श्लोक 11.55

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥
साधारण अनुवाद‘जो मेरा कर्म करता है, मुझे ही परम मानता है, मेरा भक्त है, आसक्ति-रहित है, सब प्राणियों से वैर-रहित है, हे पाण्डव, वही मुझे प्राप्त होता है।’

पूरे अध्याय का closing सूत्र। पाँच गुण: मेरा काम, मेरा लक्ष्य, मेरा प्रेम, अनासक्ति, और सब के प्रति निर्वैरता।

सारएक वाक्य में: समय ख़ुद कृष्ण है, और जो लड़ाई होनी है वो पहले से तय। तुम तो बस अपना हिस्सा निभाने के लिए हो।