विश्व-रूप दर्शन योग
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अध्याय का सार
अर्जुन ने अध्याय 10 के बाद कहा, ‘आपने अपनी विभूतियाँ बता दीं। अब असली रूप दिखाइए।’ कृष्ण ने पहले बताया कि साधारण आँखों से यह दिखेगा नहीं, और ‘दिव्य-चक्षु’ दिए।
और तब वो रूप दिखा। हज़ारों मुख, हज़ारों आँखें, हज़ारों भुजाएँ। सब देवता उसी में, सब लोक उसी में, सूर्य-चन्द्र-तारे उसी में। और सामने एक मुख, जिसमें सब सेनाएँ अंदर जा रही थीं।
अर्जुन घबरा गया। पूछा, ‘आप कौन हैं?’ कृष्ण ने जवाब दिया: ‘मैं काल हूँ, संसार के नाश का कारण। यह सेनाएँ तो मार ही दी जा चुकी हैं। तू बस निमित्त बन।’
अर्जुन ने हाथ जोड़कर माफ़ी माँगी कि मित्र समझकर ‘अरे कृष्ण’ कहता रहा। फिर प्रार्थना की कि वो साधारण रूप में लौट आएँ। कृष्ण लौट आए। और कहा, ‘यह रूप तुझे इसलिए दिखाया कि कोई और इसे नहीं देख पाता। यह केवल भक्ति से देखा जा सकता है।’
मुख्य श्लोक
श्लोक 11.32
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
श्लोक 11.33
जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥
कृष्ण का सबसे साफ़ निर्देश। ‘तू कारण नहीं, माध्यम है।’ इस realization में कर्ता-भाव गिर जाता है।
श्लोक 11.55
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥
पूरे अध्याय का closing सूत्र। पाँच गुण: मेरा काम, मेरा लक्ष्य, मेरा प्रेम, अनासक्ति, और सब के प्रति निर्वैरता।
पूरी गीता का सबसे चौंकाने वाला कथन। यह वही ‘कालोऽस्मि’ है जो ओप्पेनहाइमर ने हिरोशिमा पर atomic bomb देखते वक़्त कहा था।