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अंग 11

अंग
11
राग So Purakh
राग: So Purakh · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तूं घट घट अंतरि सरब निरंतरि जी हरि एको पुरखु समाणा ॥
इकि दाते इकि भेखारी जी सभि तेरे चोज विडाणा ॥
तूं आपे दाता आपे भुगता जी हउ तुधु बिनु अवरु न जाणा ॥
तूं पारब्रहमु बेअंतु बेअंतु जी तेरे किआ गुण आखि वखाणा ॥
जो सेवहि जो सेवहि तुधु जी जनु नानकु तिन कुरबाणा ॥2॥
हरि धिआवहि हरि धिआवहि तुधु जी से जन जुग महि सुखवासी ॥
से मुकतु से मुकतु भए जिन हरि धिआइआ जी तिन तूटी जम की फासी ॥
जिन निरभउ जिन हरि निरभउ धिआइआ जी तिन का भउ सभु गवासी ॥
जिन सेविआ जिन सेविआ मेरा हरि जी ते हरि हरि रूपि समासी ॥
से धंनु से धंनु जिन हरि धिआइआ जी जनु नानकु तिन बलि जासी ॥3॥
तेरी भगति तेरी भगति भंडार जी भरे बिअंत बेअंता ॥
तेरे भगत तेरे भगत सलाहनि तुधु जी हरि अनिक अनेक अनंता ॥
तेरी अनिक तेरी अनिक करहि हरि पूजा जी तपु तापहि जपहि बेअंता ॥
तेरे अनेक तेरे अनेक पड़हि बहु सिम्रिति सासत जी करि किरिआ खटु करम करंता ॥
से भगत से भगत भले जन नानक जी जो भावहि मेरे हरि भगवंता ॥4॥
तूं आदि पुरखु अपरंपरु करता जी तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥
तूं जुगु जुगु एको सदा सदा तूं एको जी तूं निहचलु करता सोई ॥
तुधु आपे भावै सोई वरतै जी तूं आपे करहि सु होई ॥
तुधु आपे स्रिसटि सभ उपाई जी तुधु आपे सिरजि सभ गोई ॥
जनु नानकु गुण गावै करते के जी जो सभसै का जाणोई ॥5॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे हरि! आप हरेक शरीर में व्यापक है, आप सारे जीवों में एक रस मौजूद है, आप एक खुद ही सभ में समाया हुआ है (फिर भी) कई जीव दानी हैं, कई जीव मंगते हैं, ये सारे आपके ही आश्चर्यजनक तमाशे हैं (क्योंकि असल में) आप स्वयं ही दातें देने वाला है, तथा, स्वयं ही (उन दातों का) उपयोग करने वाला है।(सारी सृष्टि में) मैं आपके बिना किसी और को नहीं पहचानता (आपके बिना और कोई नहीं दिखता)। मैं आपके कौन कौन से गुण गा के बताऊँ? आप बेअंत (अनंत) पारब्रह्म है। हे प्रभू! जो मनुष्य आपको याद करते हैं, आपको सिमरते हैं (आपका) दास नानक उनसे सदके (कुर्बान) जाता है।2। हे प्रभू जी! जो लोग आपको सिमरते हैं, आपका ध्यान धरते हैं, वो लोग अपनी जिंदगी में सुखी बसते हैं। जिन लोगों ने हरि नाम सिमरा है, वे हमेशा के लिए माया के बंधनों से आजाद हो गये हैं, उनकी यमों वाली फांसी टूट गई है (भाव, आत्मिक मौत उनके नजदीक नहीं फटकती)। जिन लोगों ने सदा निरभउ प्रभू का नाम सिमरा है; प्रभू उनका सारा डर दूर कर देता है। जिन मनुष्यों ने प्यारे प्रभू को हमेशा सिमरा है, वो प्रभू के रूप में ही लीन हो गये हैं। सौभाग्यशाली हैं वे मनुष्य, धन्य हैं वह लोग, जिन्होंने प्रभू का नाम सिमरा है। दास नानक उनके सदके जाता है।3। हे प्रभू! आपकी भक्ति के बेअंत खजाने भरे पड़े हैं। हे हरी! अनेकों और बेअंतों आपके भक्त आपकी सिफत सलाह कर रहे हैं। हे प्रभू! अनेकों जीव आपकी पूजा करते हैं। बेअंत जीव (आपको मिलने के लिए) तप साधना करते हैं। आपके अनेकों (सेवक) कई समृतियां व शास्त्र पढ़ते हैं (और उनके बताए हुए) छे धार्मिक कर्म व और कर्म करते हैं। हे दास नानक! वही भगत भले हैं (उनके ही प्रयत्न कबूल हुए मानों) जो प्यारे हरि-भगवंत को प्यारे लगते है।4। हे प्रभू ! आप (सारे जगत का) मूल है। सभ में व्यापक है, बेअंत है, सबको पैदा करने वाला है और आपके बराबर का और कोई नहीं। आप हरेक युग में एक स्वयं आप ही है, आप सदैव ही स्वयं ही स्वयं है, आप सदैव कायम रहने वाला है, सबको पैदा करने वाला है, सबकी सार लेने वाला है। हे प्रभू! जगत में वही होता है जो आपको स्वयं को अच्छा लगता है। वही होता है जो आप स्वयं करता है। हे प्रभू! सारी सृष्टि स्वयं तूने पैदा की है।आप खुद ही इसको पैदा करके, खुद ही इसका नाश करता है। दास नानक उस करतार के गुण गाता है जो हरेक जीव के दिल की जानने वाला है।5।1।नोट: इस शबद के पाँच बंद (Stanzas) हैं।हरेक बंद में पाँच तुके हैं।आखिरी बंद की समाप्ति पर अंक ‘5’ के साथ एक और अंक ‘1’ दिया गया है।इसका अर्थ है कि शीर्षक ‘सो पुरखु’ एक नया संग्रहि है जिसका यह पहला शबद है।
आसा महला 4 ॥
तूं करता सचिआरु मैडा सांई ॥
जो तउ भावै सोई थीसी जो तूं देहि सोई हउ पाई ॥1॥ रहाउ ॥
सभ तेरी तूं सभनी धिआइआ ॥
जिस नो क्रिपा करहि तिनि नाम रतनु पाइआ ॥
गुरमुखि लाधा मनमुखि गवाइआ ॥
तुधु आपि विछोड़िआ आपि मिलाइआ ॥1॥
तूं दरीआउ सभ तुझ ही माहि ॥
तुझ बिनु दूजा कोई नाहि ॥
जीअ जंत सभि तेरा खेलु ॥
विजोगि मिलि विछुड़िआ संजोगी मेलु ॥2॥
जिस नो तू जाणाइहि सोई जनु जाणै ॥
हरि गुण सद ही आखि वखाणै ॥
जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ ॥
सहजे ही हरि नामि समाइआ ॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ (हे प्रभू!) आप सबको पैदा करने वाला है, आप सदा कायम रहने वाला है, आप ही मेरा खसम (पति, मालिक) है। (जगत में) वही कुछ होता है जो आपको पसंद आता है। जो कुछ आप दे, मुझे वही कुछ प्राप्त हो सकता है।1।रहाउ। (हे प्रभू!) सारी सृष्टि आपकी (ही बनाई हुई) है, सारे जीव आपको ही सिमरते हैं। जिस पर आप दया करता है उसने आपका रतन जैसा (कीमती) नाम ढूँढ लिया है। गुरमुखों (साधकों) ने आपको प्राप्त किया ,जो अपने मन के पीछे चला, उसने (यह जीवन) गवा लिया। (पर, किसी जीव के क्या बस? हे प्रभू!) जीव को आप स्वयं ही (अपने आप से) विछोड़ता है, और स्वयं ही खुद से मिला लेता है।1। (हे प्रभू!) आप (जिंदगी का, मानो, एक) दरिया है, सारे जीव आपके में ही (मानों, लहरें) हैं। आपके बिना (आप जैसा) और कोई नहीं। ये सारे जीअ-जंतु आपकी (रची हुई) खेल हैं। जिनके माथे पर विछोड़े का लेख है, वह मानव जन्म प्राप्त करके भी आपसे विछुड़े हुए हैं।(पर, आपकी रज़ा अनुसार) संजोगों केलेख से (फिर आपके साथ) मिलाप हैं जाता है।2। (हे प्रभू!) जिस मनुष्य को आप खुद सूझ बख्शता है, वह मनुष्य (जीवन का सही रास्ता) समझता है। वह मनुष्य, हे हरी! सदा आपके गुण गाता है, और (औरों को) उचार उचारके सुनाता है। (हे भाई!) जिस मनुष्य ने प्रमात्मा का नाम सिमरा है, उसने सुख हासिल किया है। वह मनुष्य सदा आत्मिक अडोलता में टिका रहके प्रभू के नाम में लीन हो जाता है।3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ये नित्य की प्रार्थनाएँ हैं, अधिकांश पन्द्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी की शुरुआत में रची गयीं।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे हरि! आप हरेक शरीर में व्यापक है, आप सारे जीवों में एक रस मौजूद है, आप एक खुद ही सभ में समाया हुआ है (फिर भी) कई जीव दानी हैं, कई जीव मंगते हैं, ये सारे आपके ही आश्चर्यजनक तमाशे ।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।