तूं घटि घटि अंतरि सरब निरंतरि जी हरि एको पुरखु समाणा ॥ इकि दाते इकि भेखारी जी सभि तेरे चोज विडाणा ॥ तूं आपे दाता आपे भुगता जी हउ तुधु बिनु अवरु न जाणा ॥ तूं पारब्रहमु बेअंतु बेअंतु जी तेरे किआ गुण आखि वखाणा ॥ जो सेवहि जो सेवहि तुधु जी जनु नानकु तिनकुरबाणा ॥२॥
तू आदि पुरखु अपर्मपरु करता जी तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥ तूं जुगु जुगु एको सदा सदा तूं एको जी तूं निहचलु करता सोई ॥ तुधु आपे भावै सोई वरतै जी तूं आपे करहि सु होई ॥ तुधु आपे स्रिसटि सभ उपाई जी तुधु आपे सिरजि सभ गोई ॥ जनु नानकु गुण गावै करते के जी जो सभसै का जाणोई ॥३॥
गुरु राम दास का तीसरा शबद। focus shift, अब “creation” की बात।
“तू आदि पुरखु अपर्मपरु करता।” तू “आदि” (शुरू) पुरुष, “अपरम्पर” (बिना limit) करता है। “तुधु जेवडु अवरु न कोई।” तेरे जैसा दूसरा कोई नहीं।
“आदि” शब्द interesting है। यह सिख theology का key term है, “ਆਦਿ” (आदि) यानी original, primal। “आदि सच, जुगादि सच, है भी सच, नानक होसी भी सच।” यह जपजी का opening है, और यहाँ वही term आ रहा है।
“तूं जुगु जुगु एको, सदा सदा तूं एको।” युग-युग में तू एक है, सदा-सदा तू एक है। “तूं निहचलु करता सोई।” तू “निहचल” (अचल, स्थिर) करता है।
गुरु राम दास का scale यहाँ काल पर है। पहले scale “space” का था (घट-घट में), अब “time” का है (युग-युग में)। reality को define करने के दो axes, और दोनों पर हरि unchanging है।
“तुधु आपे भावै सोई वरतै।” जो तुझे भाता है वही “वरतै” (होता है)। “तूं आपे करहि सु होई।” तू जो करता है वही होता है। यह pure surrender की language है। मगर बिना passive होने के।
“तुधु आपे स्रिसटि सभ उपाई, तुधु आपे सिरजि सभ गोई।” तू ने सृष्टि उपाई (बनाई), तू ने सिरज (बना के) सब “गोई” (मिटा दी)।
“गोई” शब्द significant है। यह सिर्फ़ “destroy” नहीं, “wrap up” है। जैसे एक act के बाद theatre का curtain “गोल” कर के समेटा जाता है। हरि उसी तरह सृष्टि को “समेट” लेता है।
यह cosmic cycles का statement है। पैदा करना और समेट लेना, दोनों उसके खेल हैं। हिन्दू tradition में यह “सृष्टि-प्रलय” cycle है। नानक उसी idea को सिख language में बता रहे हैं।
“जनु नानकु गुण गावै करते के, जो सभसै का जाणोई।” नानक उस “करते” (creator) के गुण गाता है, जो सबको “जाणै” (जानता है)।
यह closing line एक बहुत intimate quality रखती है, “जाणोई।” वो “जानता” है। यह abstract creator नहीं, यह जानने वाला है। हम सब को individually जानता है।
दिल्ली के context में: हम सब anonymous feel करते हैं इस बड़े शहर में। कोई नहीं जानता मुझे कौन हूँ। मगर गुरु राम दास कह रहे हैं, एक है जो “सभसै का जाणोई” है। तू अकेला नहीं, वो जानता है।
॥ आसा महला ५ ॥ तू करता सचिआरु मैडा सांई ॥ जो तउ भावै सोई थीसी जो तूं देहि सोई हउ पाई ॥१॥ रहाउ ॥ सभ तेरी तूं सरब आगै सूझहि जिनिआ ॥ सेवक न दिसहि कोइ कुसामति बजै तूं भलीआ ॥१॥
और यहाँ Mahalla 5 (गुरु अर्जन देव जी) का स्वर शुरू होता है। नानक से 100 साल बाद, राम दास से 30 साल बाद। एक नई pulse।
“तू करता सचिआरु मैडा सांई।” तू करता, “सचिआर” (सच्चा), मेरा साईं। “मैडा” शब्द पंजाबी में बहुत intimate है, “मेरा” का affectionate form।
गुरु अर्जन का स्वर यहाँ बहुत personal है। यह कोई बड़ा cosmic statement नहीं, “मेरा साईं।” जैसे एक बच्चा अपनी माँ से कहे, “मेरी अम्मी,” यह वही register है।
“जो तउ भावै सोई थीसी।” जो तुझे भाता है वही “थीसी” (होगा)। “जो तूं देहि सोई हउ पाई।” जो तू देता है वही मैं पाता हूँ।
यह pure acceptance की language है। मगर ध्यान दो, यह passive resignation नहीं। यह “तेरे साथ संगति में रहने का choice” है। मैं अपनी मर्ज़ी नहीं, तेरी मर्ज़ी।
दिल्ली में हम सब बहुत “control freaks” हैं, हर detail हाथ में रखना चाहते हैं। और जब चीज़ें plan के मुताबिक़ नहीं चलतीं, हम devastated हो जाते हैं। गुरु अर्जन एक alternative बता रहे हैं, “जो होगा सो होगा” नहीं, बल्कि “जो होगा वो उसकी मर्ज़ी से होगा, और मैं उसमें peaceful हूँ।”
“सभ तेरी तूं सरब आगै सूझहि।” सब तेरी, और तू “सब के आगे सूझता” (दिखता) है। “जिनिआ” यानी जिनको दिखता है। यानी जिनको आँख मिली है, उनको हर जगह तू ही दिखता है।
“सेवक न दिसहि कोइ कुसामति।” सेवकों को कोई “कुसामति” (कुमति, बुरी समझ) नहीं दिखती। “बजै तूं भलीआ।” तू ही उनको “भली” (अच्छी) लगती है।
यह bhakti का psychological aspect है। जब आदमी genuinely surrender कर देता है, तो ज़िंदगी की “बुरी” चीज़ें भी “अच्छी” लगने लगती हैं। यह denial नहीं, perspective shift है। हर event “good or bad” classify करना बंद हो जाता है।
फ़रीद बाबा भी यही कहते हैं (अंग 1378 के आगे), “बुरे का भला करो।” गुरु अर्जन समान बात कह रहे हैं, “उसके सेवक को कोई कुमति नहीं दिखती।” क्योंकि कुमति is in the eye of the seer।
॥ आसा महला ५ ॥ सिमरि सिमरि स्वामी प्रब अपणे जिनि सजन कर लीनो ॥ कर बंदना नाई दिनि निसि बासरि करि एक सरण ल्यागा ॥१॥ तेरी दात तेरी टेक सजना तू ही करत न कोई ॥ तू समरथ साचा प्रब साजना सरब निधान तू ही ॥२॥
और गुरु अर्जन का एक और शबद इसी अंग पर। उनका intimate “मैडा सांई” register continue करता है।
“सिमरि सिमरि स्वामी प्रब अपणे।” “सिमरण-सिमरण, स्वामी, प्रभु अपने।”
repetitive structure। “सिमरि सिमरि” यानी continuous सिमरण। यह practice की rhythm है।
“जिनि सजन कर लीनो।” “जिसने साजन बना लिया।”
हरि ने मुझे “साजन” (friend) बना लिया। यह intimate transformation है।
दिल्ली में हम सब किसी न किसी “साजन” को carry करते हैं ज़िंदगी में। close friend, मित्र, जिससे genuine बात हो सके। गुरु अर्जन एक ultimate “साजन” बता रहे हैं।
“कर बंदना नाई दिनि निसि बासरि।” “नाई (नाम) करते बंदना, दिन-निशि-बासर (दिन-रात-हर वक़्त)।”
और “नाम” की बंदगी। यह continuous है।
“करि एक सरण ल्यागा।” “एक शरण लगा।”
सिर्फ़ एक शरण। यह exclusivity है।
“तेरी दात तेरी टेक सजना।” “तेरी ‘दात’ (देन), तेरी ‘टेक’ (support), साजना।”
“तू ही करत न कोई।” “तू ही करता, कोई और नहीं।”
simple acknowledgment। सब तेरे हाथ में, कोई और कर्ता नहीं।
“तू समरथ साचा प्रब साजना।” “तू समर्थ, सच्चा प्रभु, साजना।”
“सरब निधान तू ही।” “सब निधि तू ही।”
closing: सब treasure वो ही।
गुरु अर्जन के स्वर में “साजन” शब्द बहुत intimate है। यह hierarchy को dissolve करता है। राजा-नौकर relationship नहीं, friend-friend relationship।
दिल्ली में हम सब “above” किसी authority को relate करने में struggle करते हैं। नानक का mechanism, “साजन” relationship। यह सबसे approachable है।
पहली पंक्ति सबसे famous है। “तूं घटि घटि अंतरि सरब निरंतरि।” तू हर “घट” (शरीर, बर्तन) के अंदर है, सबमें निरंतर। “हरि एको पुरखु समाणा।” एक हरि पुरुष सब में समाया है।
यह सिख theology का foundation है। हरि कहीं दूर “स्वर्ग” में नहीं बैठा, हर शरीर के अंदर है। यह immanence (अंतर्निहितता) की philosophy है। transcendence (पारलौकिकता) नहीं।
“घट-घट” शब्द एक beautiful Hindi expression है। “घट” मतलब बर्तन, मगर metaphorically शरीर भी। कबीर भी कहते हैं, “घट-घट में राम बसे।” गुरु राम दास भी same बात, मगर थोड़े अलग ढंग से।
“इकि दाते इकि भेखारी, सभि तेरे चोज विडाणा।” कुछ “दाते” (देने वाले) हैं, कुछ “भेखारी” (भिक्षु)। यह सब तेरे “चोज विडाणा” (अद्भुत खेल) हैं।
गुरु राम दास social inequality को directly address कर रहे हैं। amir-गरीब का divide existential नहीं। यह “खेल” है। दोनों roles ज़रूरी हैं, drama का part हैं।
मगर ध्यान दो, यह “fatalism” नहीं, “हरि की मर्ज़ी” के नाम पर inequality को normalize नहीं किया जा रहा। बात यह है, “देने वाला” अहंकार न करे (मैंने दिया!), और “लेने वाला” शर्मिंदा न हो (मैंने लिया।)। क्योंकि actor असली में वो एक है। बीच में हम पात्र हैं।
दिल्ली में हर रोज़ हम traffic light पर भिखारी को देखते हैं। कुछ देते हैं, कुछ नहीं। दोनों के अंदर एक चलचित्र चलता है, “मैं अच्छा आदमी हूँ कि मैंने दिया,” या “क्यों उसने मुझे ऐसा बनाया।” गुरु राम दास का solution simple है, यह सब “खेल” है, इस moment में हम जो भी हैं, वो भी उसी का प्रकट रूप है।
“तूं आपे दाता आपे भुगता।” तू ख़ुद दाता है, तू ही “भुगता” (भोगने वाला, खाने वाला)। यह advaita-statement है। अगर हरि सब में है, तो जब मैं देता हूँ, असली में वो ख़ुद को दे रहा है। जब मैं खाता हूँ, वो ख़ुद को खा रहा है।
“हउ तुधु बिनु अवरु न जाणा।” मैं तेरे बिना और किसी को नहीं जानता। यह सबसे honest line है। मैं कोई sophisticated theology नहीं कर रहा, मुझे बस तू ही दिखता है।
“तेरे किआ गुण आखि वखाणा।” तेरे कौनसे गुण कहूँ, वर्णन करूँ? यह नानक की “नानकु किआ विचारे” का echo है। हम सब, अपनी limit पर बैठे हुए, उस अनंत के सामने speechless हैं।
“जो सेवहि तुधु, जनु नानकु तिनकुरबाणा।” जो तुझे सेवते हैं, नानक उन पर क़ुर्बान। यह बहुत significant बात है। गुरु राम दास हरि की पूजा नहीं कर रहे, “हरि की पूजा करने वालों” की पूजा कर रहे हैं। यह genuine humility है। मैं sufficient नहीं, मगर तेरे भक्त मेरे लिए door हैं।