आखा सिफति सालाह ॥ आखणि अउखा साच ॥ पंचउ सब्द साचि वसाहु ॥ सिमरतिआ रहु जुहु जोग ॥ मायाधारी सेइ संत न ॥ तिनि जाणीआ जै पहि जोगु ॥ सहसा भरमु हरि हरि हरि कीन ॥ सहसा भरमु तजि नामि लीन ॥४॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ राग आसा महला ४ ॥ सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा ॥ सभि धिआवहि सभि धिआवहि तुधु जी हरि सचे सिरजणहारा ॥ सभि जीआ तुम्हारे जी तूं जीआ का दातारा ॥ हरि धिआवहु संतहु जी सभि दूख विसारणहारा ॥ हरि आपे ठाकुरु हरि आपे सेवकु जी किआ नानक जंत विचारा ॥१॥
और यहाँ से “सो पुरखु” शुरू होता है। नया ੴ, नया “सतिगुर प्रसादि” (गुरु की कृपा से), नया author (गुरु राम दास जी, महला 4)। यह एक major sectional opening है।
“सो पुरखु” मतलब “वो पुरुष।” मगर सो दर ने पूछा था “कहाँ” है वो। अब सो पुरखु बता रहा है “कौन” है वो।
“सो पुरखु निरंजनु, हरि पुरखु निरंजनु।” वो पुरुष है, मगर “निरंजन” (बिना अंजन, बिना दाग़) है। यानी वो “person” है, लेकिन उसमें कोई कमी, कोई दाग़ नहीं। यह anthropomorphic है, मगर simultaneously transcendent।
“निरंजन” शब्द एक gift है। संस्कृत में “अंजन” मतलब काजल। निरंजन यानी जिसमें काजल नहीं, जिस पर कुछ नहीं चढ़ा। शुद्ध, untouched। यह एक beautiful image है, हरि एक “स्वच्छ आँख” है जिस पर दुनिया का कोई काजल नहीं चढ़ता।
“हरि अगमा अगम अपारा।” हरि “अगम” (पहुँच से बाहर), “अगम” (फिर repeat), “अपार” (बिना किनारा)। यह स्पष्ट repetition है, गुरु राम दास intentionally emphasis कर रहे हैं।
“सभि धिआवहि सभि धिआवहि तुधु जी।” सब ध्याते हैं, सब ध्याते हैं तुझे। यह सो दर के “सब गाते हैं” की extension है, मगर देखो वर्ब बदला, “गावहि” से “धिआवहि।” गाना और ध्याना अलग qualities हैं। गाने में voice आती है, ध्याने में silence।
यानी गुरु राम दास सो दर को आगे बढ़ा रहे हैं, “नानक ने कहा था सब गाते हैं। मैं कहता हूँ, सब ध्याते हैं।” दोनों एक ही reality के दो modes हैं।
“सभि जीआ तुम्हारे जी, तूं जीआ का दातारा।” सब जीव तुम्हारे हैं जी, तू जीवों का दाता है। “जी” शब्द respect का है, “साहिब जी, दाता जी।” गुरु राम दास का स्वर बहुत respectful है, nearly आत्मीय।
“हरि धिआवहु संतहु जी।” “संतहु” यानी संतों, हे संतजनों। यह audience को directly address करना है। “सभि दूख विसारणहारा।” यह सब दुखों को “विसारने” (भुलाने) वाला है।
फिर एक radical line: “हरि आपे ठाकुरु, हरि आपे सेवकु।” हरि ही ठाकुर है, हरि ही सेवक है। “किआ नानक जंत विचारा।” बिचारा नानक “जंत” (जंतु, छोटा जीव) क्या कह सकता है?
यह advaita का statement है, मगर सूफ़ी रंग में। हरि duality के दोनों sides खेल रहा है। मालिक भी वो, नौकर भी वो। यानी जब मैं उसकी “पूजा” करता हूँ, असली में वो ख़ुद ही अपनी पूजा करा रहा है। यह सबसे intimate non-dualism है।
और “बिचारा नानक” किसने कहा? यह गुरु राम दास हैं, मगर वो ख़ुद को “नानक” कह रहे हैं। यह सिख परंपरा का unique convention है, हर अगला गुरु ख़ुद को “नानक” के रूप में देखता है। यानी “नानक की ज्योति” continue हो रही है, अलग शरीरों में।
दिल्ली के context में: हम सब अपने आप को अलग entity मानते हैं, “मैं ऑफ़िस में बॉस हूँ, घर में पति, सड़क पर ग्राहक।” मगर असली में, अगर हरि “ठाकुर भी, सेवक भी” है, तो हम भी हर rôle में same one self हैं। यह बहुत stabilizing realization है।
तू घटि घटि अंतरि सरब निरंतरि जी हरि एको पुरखु समाणा ॥ तू सभना तेरै वसि सभु कुछ जी तेरै हाथि वडी अपणाई ॥१॥ हरि सेव दिव हम जी सीरि न करु बेरी ॥ तेरै दरि वडिआ नाम पाई ॥२॥
और एक additional M4 verse इसी अंग पर। गुरु राम दास सो पुरखु को continue कर रहे हैं।
“तू घटि घटि अंतरि सरब निरंतरि।” “तू घट-घट के अंदर, सब में निरंतर।”
omnipresence का statement। हर “घट” (शरीर, बर्तन) में, सब में continuously। कबीर भी यही कहते हैं, “घट-घट में राम बसे।”
“हरि एको पुरखु समाणा।” “एक हरि पुरुष समाया।”
subtle। हरि “एक” है, और “समाया हुआ” है। दोनों simultaneously।
“तू सभना तेरै वसि सभु कुछ जी।” “तू सबका, तेरे वश में सब कुछ।”
सब हरि के “वश” में। यानी control में।
“तेरै हाथि वडी अपणाई।” “तेरे हाथ में ‘वड़ी अपणाई’ (great ownership)।”
सब उसका। हम borrowers हैं।
दिल्ली में हम सब “ownership” को status मानते हैं, “मेरा घर,” “मेरी गाड़ी।” गुरु राम दास एक different ownership-paradigm बताते हैं। सब उसका। हम custodians हैं।
“हरि सेव दिव हम जी।” “हरि-सेवा दे, हम।”
simple request: मुझे तेरी सेवा का अवसर दे।
“तेरै दरि वडिआ नाम पाई।” “तेरे ‘दर’ (door, court) पर ‘वडिआ’ (great) नाम पाया।”
closing: तेरे दरवाज़े पर ही असली “नाम” मिलता है।
सो दर section की अंतिम पंक्तियाँ। नानक एक “instruction” mode में चले गए हैं।
“आखा सिफति सालाह।” मैं उसकी सिफ़त और सलाह (प्रशंसा) कहूँ। “आखणि अउखा साच।” मगर सच कहना मुश्किल है।
फिर एक tantric-sounding line: “पंचउ सब्द साचि वसाहु।” पाँचों शब्दों को “सच” में बसाओ। यह यौगिक language है। पाँच शब्द (पंच-शब्द) कहीं-कहीं panchaakshari (पाँच अक्षरी मंत्र), कहीं पाँच इन्द्रिय-शब्द (sense-experiences), कहीं पाँच नादों (internal sounds) के लिए use होते हैं।
गुरु नानक का instruction simple है, अपनी सारी inner experiences को “सच्चे” से जोड़ दो। यह spiritual discipline है, हर sound, हर thought, हर sensation, सब हरि में।
“सिमरतिआ रहु जुहु जोग।” सिमरण कर के “जुह” (युक्त, जुड़े) रहो, यह “योग” है। नानक “योग” शब्द को redefine कर रहे हैं। यह आसन या प्राणायाम नहीं, यह सिमरण है। और इस सिमरण से जुड़ाव ही “योग” है।
फिर एक sharp social comment: “मायाधारी सेइ संत न।” मायाधारी (पैसे-दौलत वाले) “संत” नहीं हैं। और “तिनि जाणीआ जै पहि जोगु।” वही जानता है जिसके पास “योग” (true connection) है।
दिल्ली में आज भी relevant है। हम कितने “spiritual celebrities” देखते हैं, fancy ashrams, expensive yoga retreats, branded “Guru” merch। नानक 500 साल पहले बोल गए थे, “मायाधारी संत नहीं।”
“सहसा भरमु हरि हरि हरि कीन।” “हरि-हरि-हरि” कहने से “सहसा” (शक) और “भरम” (illusion) “कीन” (खंडित, टूट)। “सहसा भरमु तजि नामि लीन।” शक और भ्रम को छोड़, नाम में लीन हो जाओ।
यह सो दर का closing instruction है। doubt से बाहर निकलने का तरीक़ा, repetition, “हरि-हरि-हरि” बार-बार। अकेले के लिए, धीरे-धीरे, अंदर। यह कोई loud chanting नहीं, quiet remembering है।