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अंग 10

अंग
10
राग So Dar
राग: So Dar · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिनि दिनु करि कै कीती राति ॥
खसमु विसारहि ते कमजाति ॥
नानक नावै बाझु सनाति ॥4॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: (आप ऐसा है) जिस ने दिन बनाया है और रात बनाई है। हे नानक! वे लोग नीच जीवन वाले बन जाते हैं जो (ऐसे) खसम प्रभू को भुला देते हैं। नाम से रहित जीव ही नीच हैं।4।3।
रागु गूजरी महला 4 ॥
हरि के जन सतिगुर सतपुरखा बिनउ करउ गुर पासि ॥
हम कीरे किरम सतिगुर सरणाई करि दइआ नामु परगासि ॥1॥
मेरे मीत गुरदेव मो कउ राम नामु परगासि ॥
गुरमति नामु मेरा प्रान सखाई हरि कीरति हमरी रहरासि ॥1॥ रहाउ ॥
हरि जन के वड भाग वडेरे जिन हरि हरि सरधा हरि पिआस ॥
हरि हरि नामु मिलै त्रिपतासहि मिलि संगति गुण परगासि ॥2॥
जिन हरि हरि हरि रसु नामु न पाइआ ते भागहीण जम पासि ॥
जो सतिगुर सरणि संगति नही आए ध्रिगु जीवे ध्रिगु जीवासि ॥3॥
जिन हरि जन सतिगुर संगति पाई तिन धुरि मसतकि लिखिआ लिखासि ॥
धनु धंनु सतसंगति जितु हरि रसु पाइआ मिलि जन नानक नामु परगासि ॥4॥4॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: रागु गूजरी महला 4 ॥ हे महापुरख गुरू! हे प्रभू के भक्त सत्गुरू! मैं, हे गुरू! आपके आगे विनती करता हूँ – कृपा करके (मेरे अंदर) प्रभू के नाम का प्रकाश पैदा कर। हे सत्गुरू! मैं निमाणा आपकी शरण आया हूँ।1। हे मेरे मित्र गुरू! मुझे प्रभू के नाम का प्रकाश बख्श। गुरू की बताई मति द्वारा मिला हुआ हरि नाम मेरे जीवन का साथी बना रहे, ईश्वर की सिफत सलाह मेरी जिंदगी के सफर के लिए राशि पूँजी बनी रहे।1।रहाउ । प्रभू के उन सेवकों के बड़े ही ऊँचे भाग्य हैं जिनके अंदर प्रभू के नाम के वास्ते श्रद्धा है, खिचाव है। जब उन्हें प्रमात्मा का नाम प्राप्त होता है वे (माया की तृष्णा से) त्रिप्त हो जाते हैं, साध-संगति में मिल के (उनके अंदर भले गुण) पैदा होते हैं।2। पर जिन मनुष्यों को परमात्मा के नाम का स्वाद नहीं आया, जिन को प्रभू का नाम नहीं मिला, वे बद्-किस्मत हैं, उन्हें जमों के वश (में समझो, उनके सिर पर आत्मिक मौत हमेशा सवार रहती है)। जो मनुष्य गुरू की शरण में नहीं आते, जो साध-संगति में नहीं बैठते, लाहनत है उनके जीवन को, उनका जीना तिरस्कार योग्य है।3। जिन प्रभू के सेवकों को गुरू की संगति में बैठना नसीब हुआ है, (समझो) उनके माथे पर धुर से ही भाग्यशाली लेख लिखे हुए हैं। हे नानक! धन्य है सत्संग! जिस में (बैठने से) प्रभू के नाम का आनन्द मिलता है, जहाँ गुरमुखों को मिलने से (हृदय में परमात्मा का) नाम आ बसता है।4।4।
रागु गूजरी महला 5 ॥
काहे रे मन चितवहि उदमु जा आहरि हरि जीउ परिआ ॥
सैल पथर महि जंत उपाए ता का रिजकु आगै करि धरिआ ॥1॥
मेरे माधउ जी सतसंगति मिले सु तरिआ ॥
गुर परसादि परम पदु पाइआ सूके कासट हरिआ ॥1॥ रहाउ ॥
जननि पिता लोक सुत बनिता कोइ न किस की धरिआ ॥
सिरि सिरि रिजकु संबाहे ठाकुरु काहे मन भउ करिआ ॥2॥
ऊडे ऊडि आवै सै कोसा तिसु पाछै बचरे छरिआ ॥
तिन कवणु खलावै कवणु चुगावै मन महि सिमरनु करिआ ॥3॥
सभि निधान दस असट सिधान ठाकुर कर तल धरिआ ॥
जन नानक बलि बलि सद बलि जाईऐ तेरा अंतु न पारावरिआ ॥4॥5॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: रागु गूजरी महला 5 ॥ हे मन! (आपकी खातिर) जिस आहर में प्रमात्मा स्वयं लगा हुआ है, उस वास्ते आप क्यूँ (सदा) चिंता-फिक्र करता रहता है? जो जीव प्रभू ने चट्टानों में पत्थरों में पैदा किए हैं, उनका भी रिजक (भोजन) उसने (उनको पैदा करने से) पहले ही बना रखा है।1। हे मेरे प्रभू जी! जो मनुष्य साध-संगति में मिल बैठते हैं, वो (व्यर्थ की चिंता-फिक्र से) बच जाते हैं। गुरू की कृपा से जिस मनुष्य को यह (अडोलता वाली) उच्च आत्मिक अवस्था मिल जाती है, वह (मानों) सूखी लकड़ी हरी हो गई।1।रहाउ। (हे मन!) माता, पिता, पुत्र, लोग, पत्नी – कोई भी किसी का आसरा नहीं। हे मन! आप क्यूँ डरता है? पालनहार प्रमात्मा हरेक जीव को स्वयं ही रिजक पहुँचाता है।2। (हे मन! देख! कूंज) उड़ उड़ के सैकड़ों ही कोसों से आ जाती हैं, पीछे उसके बच्चे (अकेले) छोड़े हुये होते हैं। उन्हें कोई खिलाने वाला नहीं, कोई उन्हें चोगा नहीं चुगाता। वह कूंज अपने बच्चों का ध्यान अपने मन में धरी रखती है (और, इसी को प्रभू उनके लालन पालन का वसीला बनाता है)।3। हे पालनहार प्रभू! जगत के सारे खजाने और अठारह सिद्धियां (मानो) आपके हाथों की तलियों पर रखे हुये हैं। हे दास नानक! ऐसे प्रभू से सदा सदके हो, सदा कुर्बान हो, (और कह, हे प्रभू!) आपकी बुर्जुगी के इस पार के और उस पार के छोर का अंत नहीं पाया जा सकता।4।5।
रागु आसा महला 4 सो पुरखु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा ॥
सभि धिआवहि सभि धिआवहि तुधु जी हरि सचे सिरजणहारा ॥
सभि जीअ तुमारे जी तूं जीआ का दातारा ॥
हरि धिआवहु संतहु जी सभि दूख विसारणहारा ॥
हरि आपे ठाकुरु हरि आपे सेवकु जी किआ नानक जंत विचारा ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: राग आसा महला 4 सो पुरखु ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। वह परमात्मा सारे जीवों में व्यापक है (फिर भी) माया के प्रभाव से ऊपर है, अपहुँच है और बेअंत है। हे सदा कायम रहने वाले और सभ जीवों को पैदा करने वाले हरी! सारे जीव आपको हमेशा सिमरते हैं, आपका ध्यान धरते हैं। हे प्रभू! सारे जीव आपके ही पैदा किये हुए हैं, आप ही सभ जीवों का दाता है। हे संत जनों! डस प्रमात्मा का ध्यान धरा करो, वह सारे दुखों का नाश करने वाला है। वह (सभी जीवों में व्यापक होने के कारण) स्वयं ही मालिक है और स्वयं ही सेवक है।हे नानक! उस के बिना जीव बिचारे क्या हैं? (उस हरि से अलग जीवों का कोई वजूद नहीं)।1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ये नित्य की प्रार्थनाएँ हैं, अधिकांश पन्द्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी की शुरुआत में रची गयीं।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(आप ऐसा है) जिस ने दिन बनाया है और रात बनाई है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।