अध्याय 24 · सेतु-बंध

वाल्मीकि रामायण · युद्धकाण्ड
नल की देख-रेख में वानरों का समुद्र पर पुल बाँधना, और लंका की ओर सेना का प्रयाण।

पढ़ने में लगभग 27 मिनट · 4,563 शब्द

समुद्र के उत्तर तट पर, जहाँ वानरों और भालुओं की सेना दूर तक डेरा डाले पड़ी थी, राक्षसराज रावण का एक चर (गुप्तचर) घूमता हुआ आ पहुँचा। उसका नाम शार्दूल था, और वह वीर्यवान् (पराक्रमी) था। चारों ओर से सुग्रीव के द्वारा सुरक्षित उस अपार सेना को उसने देखा, और उसे निर्भय तथा अविचलित खड़ी पाकर वह लौट पड़ा। वेग से लंका में प्रवेश करके उसने राजा रावण से यह कहा कि एक दूसरे समुद्र के समान अगाध (जिसकी थाह न मिले) और अप्रमेय (जिसे नापा न जा सके) यह वानरों और भालुओं का सैलाब लंका की ओर बढ़ा चला आ रहा है।

शार्दूल की चेतावनी और शुक का प्रस्थान

शार्दूल ने आगे कहा कि दशरथ के वे दोनों पुत्र, राम और लक्ष्मण, जो उत्तम रूप से सम्पन्न और श्रेष्ठ योद्धा हैं, सीता का पता पाकर समुद्र-तट तक आ पहुँचे हैं। हे अद्भुत तेज वाले राक्षसराज! वे समुद्र के पास डेरा डालकर बैठ गए हैं। यह सेना दसों दिशाओं में लगभग दस योजन की भूमि घेरे हुए है; आप इसका यथार्थ शीघ्र ही जान लीजिए। आपके चर तुरन्त सब बात जानने योग्य हैं; तब आप जैसा उचित समझें, वैसा उपप्रदान (देकर मिला लेना), सान्त्व (मीठी बात से समझाना) अथवा भेद (शत्रु-पक्ष में फूट डालना) इन उपायों में से कोई काम में लाइए।

शार्दूल का वचन सुनकर राक्षसों के स्वामी रावण सहसा व्यग्र हो उठे। अपने कर्तव्य का निश्चय करके उन्होंने शुक नामक राक्षस को, जो धर्म के जानकारों में श्रेष्ठ था, बुलाकर कहा कि वह तुरन्त जाकर मेरी ओर से वानरराज सुग्रीव से कोमल और उत्तम वाणी में, मेरी आज्ञा के अनुसार बिना किसी हिचक के यह कहे।

समझने की कुंजी (योजन): गीता प्रेस अनुवाद एक योजन को लगभग आठ मील मानता है। दस योजन घेरे सेना का अर्थ हुआ लगभग अस्सी मील (कोई एक सौ तीस किलोमीटर) की भूमि पर फैली छावनी। बाद में बनने वाला सेतु सौ योजन लम्बा बताया गया है, अर्थात् लगभग आठ सौ मील।

रावण का सन्देश यों था कि हे वानरराज! आप महाराजों के कुल में उत्पन्न हैं, महाबली हैं और ऋक्षरजा (सुग्रीव-वालि के पिता) के पुत्र हैं। मुझसे आपका न कोई लाभ हुआ है और न कोई हानि; फिर भी आप मेरे लिए भाई के समान हैं। हे सुग्रीव! यदि मैंने उस बुद्धिमान् राजकुमार की भार्या (पत्नी) को हर लिया, तो इसमें आपका क्या बिगड़ा? आप किष्किन्धा लौट जाइए। यह लंका वानरों के द्वारा किसी प्रकार भी प्राप्त नहीं की जा सकती; गन्धर्वों (देवों के गायकों) के साथ देवता भी इसे नहीं पा सकते, फिर मनुष्यों और वानरों की तो बात ही क्या।

इतना कहकर शुक पक्षी का रूप धारण कर आकाश में तेजी से उड़ चला। समुद्र के ऊपर-ऊपर बहुत दूर तक उड़कर वह आकाश में ही ठहर गया और सुग्रीव से वही सन्देश सुनाने लगा। दुरात्मा रावण ने जैसा आदेश दिया था, वह सारा वचन ज्यों-ज्यों कहता गया, त्यों-त्यों वानर तुरन्त उछलकर उसके पंख नोचने और मुक्कों से मारने लगे। उन सब वानरों ने उस निशाचर (रात में विचरने वाले राक्षस) को बलपूर्वक पकड़कर दबा लिया।

एक उप-कथा: ऋक्षरजा का नाम यहाँ रावण के मुँह से आया है। वाल्मीकि की परम्परा में सुग्रीव और वालि को ऋक्षरजा का पुत्र कहा गया है। रावण इसी सम्बन्ध को आगे करके सुग्रीव को राम से तोड़ने की चाल चल रहा है, यह वही भेद-नीति है जो शार्दूल ने सुझाई थी।

आकाश से शीघ्र ही पकड़कर शुक को नीचे भूमि पर उतार लिया गया। वानरों के पीड़ित किए जाने पर शुक ने कहा कि हे काकुत्स्थ (ककुत्स्थ-वंशी राम)! राजा लोग दूतों को नहीं मारते; इसलिए वानरों को रोकिए। हाँ, जो दूत अपने स्वामी के मत को छोड़कर अपना ही मत प्रकट करने लगता है, वही वध के योग्य होता है। शुक का यह करुण निवेदन सुनकर श्रीराम ने उन वानरों से, जो उसे पीट रहे थे, कहा कि इसे मत मारिए।

वानरों के द्वारा अभय (निर्भयता) दे दिए जाने पर शुक पंख फैलाकर फिर आकाश में जा ठहरा और फिर बोला कि हे सुग्रीव! आप सत्त्व से सम्पन्न, महाबली और पराक्रमी हैं; लोगों को रुलाने वाले रावण ने मुझसे आपके लिए क्या कहलवाया है। ऐसा कहे जाने पर वानरों के स्वामी, उत्तम सत्त्व वाले सुग्रीव ने उस राक्षस के चर शुक को निर्दोष उत्तर दिया।

सुग्रीव ने कहा कि (रावण से मेरी ओर से कहना कि) आप न मेरे मित्र हैं, न दया के पात्र, न मेरे उपकारी और न मुझे प्रिय। आप तो श्रीराम के शत्रु हैं, इसलिए वालि के समान अपने कुटुम्बियों सहित वध के योग्य हैं, हे वध के योग्य राक्षस! मैं अपने पुत्रों, बन्धुओं और जातिवर्ग सहित आपको और सारी लंका को बड़ी सेना के साथ आकर भस्म कर डालूँगा।

सार: रावण ने शार्दूल से सेना का समाचार पाकर भेद-नीति के अन्तर्गत शुक को सुग्रीव के पास भेजा कि वह राम से सुग्रीव को अलग कर दे। शुक पक्षी बनकर सन्देश सुनाने लगा तो वानरों ने उसे पकड़ लिया; राम के कहने पर वह न मारा गया। सुग्रीव ने रावण को दृढ़ उत्तर दिया कि वह राम का शत्रु है और अपने वंश सहित नष्ट होगा।

अंगद का मत और शुक की मुक्ति

तदनन्तर वालि के पुत्र अंगद ने, जो वानरों में श्रेष्ठ थे, कहा कि हे महाराज! यह दूत नहीं है, यह तो मुझे चर जान पड़ता है। यहीं खड़े-खड़े इसने हमारी सारी सेना को तौल लिया है। इसलिए इसे पकड़ लीजिए, यह लंका को न लौटे; मुझे तो यही उचित प्रतीत होता है। राजा अंगद की आज्ञा पाते ही वानर उछलकर उस राक्षस को, जो अनाथ की भाँति विलाप कर रहा था, पकड़कर बाँध बैठे।

उन प्रचण्ड वानरों के द्वारा अत्यन्त पीड़ित किए जाने पर शुक ने महात्मा दशरथनन्दन श्रीराम को ऊँचे स्वर से पुकारा कि मेरे पंख बलपूर्वक नोचे जा रहे हैं और मेरी दोनों आँखें फोड़ी जा रही हैं। जिस रात मैं जन्मा था और जिस रात मैं मरूँगा, इस बीच मुझसे जो भी अशुभ कर्म हुए हों, यदि मैं इस अवसर पर प्राण त्याग दूँ तो वे सब पाप आपके सिर पर आएँगे। उसका यह विलाप सुनकर श्रीराम ने उसे मारने नहीं दिया। उन्होंने वानरों से कहा कि इसे छोड़ दीजिए, यह दूत होकर आया है।

सुग्रीव की ओर से अंगद का वचन भी प्रकट हुआ, जिसमें उन्होंने सुग्रीव से कहा था कि यदि आप शक्तिमान् थे, तो आपने वृद्धावस्था से ग्रस्त गृध्रराज जटायु को क्यों मारा। और श्रीराम तथा लक्ष्मण के सामने विशाल नेत्रों वाली सीता को आपने हर ले जाने का साहस कैसे किया। सीता को पकड़कर आप आने वाली आपत्ति को क्यों नहीं देखते। आप महाबली, महात्मा और देवों के लिए भी दुर्धर्ष (कठिनाई से वश में होने वाले) रघुश्रेष्ठ श्रीराम को नहीं जानते, जो आपके प्राण हर लेंगे।

आगे यह भी कहा गया था कि हे मूढ़ रावण! इन्द्र सहित देवताओं के द्वारा सुरक्षित होने पर भी आप रघुनन्दन श्रीराम से नहीं बचेंगे। आप माया से अदृश्य होकर सूर्य के मार्ग (आकाश) में चले जाएँ अथवा पाताल में घुस जाएँ या कैलासपति गिरीश (शिव) के चरण-कमलों की शरण ले लें, फिर भी अपने छोटे भाई कुम्भकर्ण सहित आप श्रीराम के हाथों मारे जाएँगे। तीनों लोकों में मुझे ऐसा कोई पिशाच, राक्षस, गन्धर्व या असुर नहीं दिखता, जो आपकी रक्षा कर सके।

समझने की कुंजी (तीन लोक): वाल्मीकि में बारंबार ‘तीनों लोक’ कहे जाते हैं, अर्थात् भूः (पृथ्वी), भुवः (अन्तरिक्ष) और स्वः (स्वर्ग)। ‘सूर्य का मार्ग’ से आकाशमण्डल और ‘पाताल’ से परम नीचे का अधोलोक समझा जाता है। अंगद कहना चाहते हैं कि रावण के लिए कहीं छिपने का ठौर नहीं।

श्रीराम की आज्ञा पाकर वानरों ने अन्ततः उस दूत को छोड़ दिया, क्योंकि श्रीराम ने उसके करुण विलाप को सुनकर उसे मारने नहीं दिया था।

सार: अंगद ने शुक को दूत नहीं, चर ठहराकर उसे बाँध लेने को कहा, क्योंकि उसने सेना तौल ली थी। पीड़ा से शुक ने राम को पुकारकर अपने जन्म से मृत्यु तक के पाप राम के सिर डालने की दुहाई दी। राम ने उसे दूत मानकर मुक्त करा दिया। प्रसंग में जटायु-वध और सीता-हरण के कारण रावण के विनाश की अनिवार्यता दुहराई गई।

समुद्र-तट पर राम की प्रतीक्षा और कोप

तूफ़ानी रात में समुद्र किनारे कुश शय्या पर लेटे राम, पास खड़े लक्ष्मण और बैठे हनुमान।

इसके पश्चात् रघुनन्दन श्रीराम ने समुद्र के तट पर कुश (पवित्र दर्भ-तृण) बिछाकर, हाथ जोड़कर, पूर्व की ओर मुख करके महोदधि (महासमुद्र) से प्रार्थना की और लेट गए। शत्रुओं के संहारक श्रीराम ने अपनी दाहिनी भुजा को तकिया बनाया, जो साँप की कुण्डली के समान जान पड़ती थी और पहले सोने के आभूषणों से सजाई जाती थी।

वह भुजा गदा (मुद्गर) के समान विशाल थी; उसने हजारों गौएँ दान में दी थीं; अभिषेक और स्नान के समय वात्सल्य-भाव से भरी श्रेष्ठ नारियों के हाथों से वह बार-बार मली जाती थी; मणि, सोने और मोतियों के उत्तम आभूषणों से सजाई जाती थी; चन्दन, अगुरु और उगते सूर्य की आभा वाले केसर के लेप से सुगन्धित रहती थी। वही भुजा कभी विवाह-शय्या पर सीता के मस्तक से सुशोभित होती थी; गंगा के निर्मल जल पर टिकी तक्षक (एक नाग जिसका शरीर लाल आभा वाला माना गया है) की कुण्डली-सी वह श्वेत चादर पर शोभा पाती थी। उसी भुजा ने रणभूमि में शत्रुओं का शोक बढ़ाया और मित्रों को आनन्द दिया; वह जूए (बैल के कन्धे की लकड़ी) के समान लम्बी थी और चारों समुद्रों तक फैली पृथ्वी का आधार थी; प्रत्यंचा के आघातों से बायीं ओर बाण चलाते-चलाते उसकी त्वचा कठोर हो गई थी।

चांदनी रात में बालू पर विश्राम करते राम, पहरा देते लक्ष्मण, हनुमान और अन्य वानर।

यह निश्चय करके कि आज या तो समुद्र पार होगा या समुद्र का देवता मारा जाएगा, महाबाहु श्रीराम काया, वाणी और मन को संयत करके, नियमपूर्वक, मुनि के समान समुद्र के पास लेट गए। कुश बिछी हुई पृथ्वी पर लेटे, अपने व्रत में अप्रमत्त (असावधान न होने वाले) श्रीराम के यों ही तीन रातें बीत गईं। नीतिज्ञ और धर्म से प्रीति रखने वाले श्रीराम ने तीन रात उपवास करके नदियों के स्वामी समुद्र की उपासना की।

तूफ़ानी समुद्र की ओर बांह उठाकर संकेत करते क्रुद्ध राम, साथ लक्ष्मण और झुके हुए वानर।

फिर भी मन्द (आलसी) समुद्र ने श्रीराम को अपना रूप नहीं दिखाया। श्रीराम ने यथायोग्य पूजा की, तो भी समुद्र अपने व्यक्तिगत रूप में प्रकट नहीं हुआ। तब समुद्र पर क्रुद्ध होकर, नेत्रों के कोरों को लाल किए हुए श्रीराम ने पास खड़े शुभ लक्षणों वाले लक्ष्मण से कहा।

समझने की कुंजी (तक्षक की उपमा): वाल्मीकि राम की भुजा को तक्षक नाग की कुण्डली कहते हैं, जो श्वेत चादर पर रखी हो। यह केवल सौन्दर्य का वर्णन नहीं; इसमें भुजा का बल, गंभीरता और शोभा एक साथ बँधे हैं। गंगा-जल और श्वेत चादर की पवित्रता एक-दूसरे की समता में रखी गई है।

क्षमा का तिरस्कार और बाणों की वर्षा

चांदनी रात में समुद्र तट पर लक्ष्मण से बात करते हुए बांह फैलाए खड़े राम, चारों ओर वानर।

श्रीराम ने कहा कि देखिए समुद्र का यह घमण्ड, जो स्वयं प्रकट होकर दर्शन नहीं देता। शान्ति, क्षमा, सरलता और मधुर वचन ये सज्जनों के गुण ऐसे लोगों के प्रति निष्फल हो जाते हैं, जो इन गुणों से रहित हों। संसार उसी पुरुष का सत्कार करता है, जो अपनी प्रशंसा करने वाला, दुष्ट, ढीठ, इधर-उधर घूमकर अपना ढिंढोरा पीटने वाला और हर जगह बेधड़क दण्ड देने वाला हो। हे लक्ष्मण! इस लोक में सान्त्व-नीति से न कीर्ति मिलती है, न यश, न रणभूमि में विजय।

श्रीराम बोले कि हे सौमित्र (सुमित्रानन्दन लक्ष्मण)! आज मगर मारने वाले इस मकरालय (समुद्र, जिसे मगरों का घर कहा गया है) के सारे जल को मैं अपने बाणों से चारों ओर रोक दूँगा, देखिए। मेरे बाणों से चीरे हुए नागों के शरीर, मछलियों के विशाल कलेवर और हाथियों-से जल-जन्तुओं की सूँडें मैं खण्ड-खण्ड कर दूँगा। शंख, सीप, मछली और मगरों सहित इस मकरालय को आज मैं महायुद्ध से सुखा डालूँगा।

श्रीराम ने आगे कहा कि क्षमा से युक्त मुझे यह समुद्र असमर्थ समझ रहा है। ऐसे जन के प्रति दिखाई गई क्षमा को धिक्कार है। हे सौमित्र! मुझे धनुष और आशीविष (विषधर साँप) के समान बाण लाकर दीजिए; मैं अभी समुद्र को सुखा देता हूँ, जिससे वानर पैदल ही लंका को चले जाएँ। आज क्रुद्ध होकर मैं इस न क्षुब्ध होने योग्य समुद्र को भी क्षुब्ध कर दूँगा; जो सहस्रों लहरों से उमड़ता हुआ भी अपने तटों की मर्यादा में बँधा रहता है, उस समुद्र को आज महायुद्ध से सुखा डालूँगा। बाणों से इस वरुणालय (समुद्र, जल के देवता वरुण का घर) को मैं मर्यादाहीन कर दूँगा, और महान् दानवों से भरे इस महार्णव (महासमुद्र) को क्षुब्ध कर दूँगा।

एक उप-कथा: समुद्र के लिए वाल्मीकि अनेक नाम रखते हैं, मकरालय (मगरों का घर), वरुणालय (वरुण का घर) और सरिताम् पति (नदियों का स्वामी)। हर नाम एक भिन्न दृष्टि देता है, कभी जल-जन्तुओं का धाम, कभी देवता का अधिकार-क्षेत्र, कभी सब नदियों का अन्तिम गन्तव्य।

राम अग्निमय बाण से समुद्र पर संधान करते हुए, जल के भीतर व्याकुल नाग और जलजीव।

यों कहकर हाथ में धनुष लिए, क्रोध से नेत्र फैलाए श्रीराम प्रलयकाल की अग्नि के समान जलते हुए, दुर्धर्ष जान पड़ने लगे। उन्होंने अपने घोर धनुष को एक छोर से झुकाकर, धीरे-से प्रत्यंचा चढ़ाई और जगत् को कँपा देने वाले टंकार के साथ इन्द्र के वज्रों के समान तीखे बाण छोड़े। तेज से जलते, महान् वेग वाले वे उत्तम बाण नागों को त्रास देते हुए समुद्र के जल में गहरे घुस गए।

राम के बाण के तेज से खौलता उफनता समुद्र, भयभीत जलजीव, तट से देखते लक्ष्मण और वानर।

समुद्र के जल का वह महान् वेग मछलियों और मगरों सहित, हवा की गर्जना के साथ अत्यन्त भयंकर हो उठा। एकाएक समुद्र महान् लहरों की पंक्तियों से ढक गया, शंख और सीपों से भर गया, बाणों के प्रवेश से उठे धुएँ से घिर गया, और उस पर लहरें खेलने लगीं। प्रदीप्त मुख और जलते नेत्रों वाले नाग तथा पाताल में बसने वाले महावीर्यवान् दानव व्यथित हो उठे। विन्ध्य और मन्दर पर्वतों के समान ऊँची समुद्र की लहरें मगरों और मगरों के साथ सहस्रों की संख्या में उठने लगीं।

घुमड़ती लहरों के समूह से, उभरे हुए महान् ग्राहों (जल-जन्तुओं) से और भयभीत नागों तथा राक्षसों से युक्त वरुणालय गर्जने लगा। तब आकाश में अदृश्य खड़े ब्रह्मर्षियों और देवर्षियों ने भी ऊँचे स्वर से ‘हाय!’ और ‘रोको, रोको’ की पुकार मचाई।

उसी समय सौमित्र लक्ष्मण उछलकर, उस अप्रमेय धनुष को, जिसे अपनी जलती हुई उमंग में श्रीराम फिर खींच रहे थे और क्रोध से जिनकी साँसें तेज चल रही थीं, ‘और नहीं, और नहीं’ कहते हुए पकड़ बैठे। लक्ष्मण ने कहा कि इसके बिना भी आज समुद्र के पार आपका कार्य सिद्ध हो जाएगा, हे वीरश्रेष्ठ। आप जैसे जन क्रोध के वश नहीं होते; इसलिए आप कोई दूसरा, टिकाऊ और सज्जनोचित उपाय सोचिए।

समझने की कुंजी (मर्यादा): समुद्र को राम ‘मर्यादाहीन’ करने की धमकी देते हैं। यहाँ मर्यादा का अर्थ है समुद्र के तट की सीमा, जिसके भीतर वह सहस्रों लहरों के साथ भी बँधा रहता है। राम का कोप कहता है कि वे इस प्राकृतिक नियम को ही तोड़ देंगे यदि समुद्र मार्ग न दे।

सार: तीन रात की उपासना पर भी समुद्र ने रूप नहीं दिखाया तो क्षुब्ध राम ने उसे सुखा देने की ठानी। उन्होंने क्षमा-नीति का तिरस्कार करके इन्द्र के वज्र-से बाण छोड़े, जिससे समुद्र, उसके जीव, नाग और दानव सब व्यथित हो उठे। आकाश के ऋषियों की पुकार और लक्ष्मण के रोकने पर राम रुके।

समुद्र-देव का प्रकट होना और मरुकान्तार का वरदान

लक्ष्मण के यों कहने पर भी श्रीराम उस उमड़े हुए समुद्र के आगे न हटे; शत्रुसंहारक रघुनन्दन उस अहंकारी नदी-स्वामी के सामने अडिग रहे। तब समुद्र-देव स्वयं समुद्र के बीच से उठ खड़े हुए, जैसे मेरु पर्वत की शाखारूप उदयाचल नामक महाशैल के पीछे से सूर्य उदित होता है। चिकने वैदूर्यमणि (बिल्लौर) के समान चमकते और सोने में जड़े रत्नों से सजे वे समुद्र-देव प्रदीप्त मुख वाले नागों के साथ प्रकट हुए।

वे लाल माला और लाल वस्त्र धारण किए थे; उनके नेत्र कमल की पंखुड़ियों के समान थे; उन्होंने सिर पर सब प्रकार के फूलों की दिव्य माला पहन रखी थी। शुद्ध सोने और तपाये हुए सोने के आभूषणों से तथा अपने ही क्षेत्र से उपजे रत्नों के उत्तम गहनों से सजे वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो भाँति-भाँति के धातुओं से मण्डित हिमालय पर्वत हों।

लहरों से हाथ जोड़े प्रकट हुए समुद्र देव, सम्मुख धनुष ताने राम, तट पर विस्मित वानर।

उनकी विशाल छाती पर एक एकावली (एक लड़ी के हार) के बीच में टँका हुआ, श्वेत आभा वाला, चंचल और प्रमुख मणि सुशोभित था, जो भगवान् विष्णु की छाती के कौस्तुभमणि का सहोदर (सगा भाई) जैसा था। उनके पार्श्व में ऊपर-नीचे डोलती लहरों के समूह थे; वे बादलों और वायु से घिरे थे, और गंगा तथा सिन्धु जैसी प्रधान नदियों की अधिष्ठात्री देवियों से, जो भाँति-भाँति के सुन्दर रूप धारण किए थीं, चारों ओर से वेष्टित थे। उभरते महाग्राहों और सम्भ्रमित नागों-राक्षसों के बीच, उन वीर्यवान् समुद्र-देव ने पास आकर, पहले श्रीराम को सम्बोधित करके, हाथ जोड़े हुए हाथ में बाण लिए रघुनन्दन से यह वचन कहा।

समुद्र-देव बोले कि हे सौम्य रघुनन्दन! पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज ये अपने-अपने स्वभाव में स्थिर रहते हैं और अपने को चलाने वाले शाश्वत नियम के अधीन रहते हैं। मेरा स्वभाव भी यही है कि मैं अगाध हूँ और तैरकर पार न किया जा सकूँ। थाह मिल जाना तो मेरे स्वभाव से विकार (विकृति) होगा। फिर भी मैं आपको पार करने का उपाय बताता हूँ।

सूर्योदय के समय जल में हाथ जोड़े खड़े समुद्र देव और उनकी रानियां, तट पर राम।

समुद्र-देव ने कहा कि न काम से, न लोभ से और न भय से मैं अपने मगरों और जल-जन्तुओं से भरे जल को किसी प्रकार रोक सकता हूँ; तौ भी आपके लिए मैं ऐसा प्रबन्ध करूँगा कि आप पार हो सकें। जब तक आपकी सेना पार न उतर जाए, तब तक ग्राह आक्रमण न करें, यह मैं सम्भालूँगा। हे राम! वानरों के पार उतरने में मैं ऐसा प्रबन्ध करूँगा कि उनके पैरों को स्थल (ठोस भूमि) के समान आधार मिले।

तब श्रीराम ने उनसे कहा कि हे वरुणालय! मेरी बात सुनिए। यह महाबाण अमोघ (कभी व्यर्थ न जाने वाला) है; इसे किस प्रदेश पर गिराया जाए। श्रीराम का वचन सुनकर और उस महाबाण को देखकर महातेजस्वी महोदधि ने उत्तर दिया कि मेरे उत्तर की ओर द्रुमकुल्य नामक एक परम पवित्र प्रदेश है, जो आपके ही समान लोक में विख्यात है।

समुद्र-देव बोले कि वहाँ उग्र दर्शन और उग्र कर्म वाले बहुत-से दस्यु (लुटेरे) रहते हैं, जिनमें आभीर (एक जाति) प्रमुख हैं; वे पापी मेरा जल पीते हैं। उन पापकर्मियों के स्पर्श का वह पाप मैं नहीं सह सकता। इसलिए हे राम! यह उत्तम बाण उसी प्रदेश पर गिराकर अमोघ कीजिए।

राम का छोड़ा बाण दूर मरुभूमि पर अग्नि विस्फोट करता हुआ, तट से देखते चकित वानर।

महात्मा समुद्र का वह वचन सुनकर श्रीराम ने उस प्रदीप्त और श्रेष्ठ बाण को, समुद्र की इच्छा के अनुसार, उसी ओर छोड़ दिया। जहाँ वज्र और बिजली के समान आभा वाला वह बाण गिरा, वह प्रदेश इसी कारण पृथ्वी पर मरुकान्तार के नाम से विख्यात हुआ (जो लगभग आज के राजस्थान के मारवाड़ और बीकानेर के क्षेत्र में फैला माना जाता है)। बाण के शल्य (फल) से बिंधी हुई पृथ्वी उस समय चीख उठी, और उस दरार के मुख से रसातल (नीचे का एक अधोलोक) का जल फूट निकला।

वह दरार अब कूप (कुआँ) बन गई और व्रण (घाव) नाम से विख्यात हुई। उस कुएँ से निरन्तर उठता जल आज भी समुद्र के जल के समान खारा देखा जाता है। पृथ्वी को चीरने से एक भयंकर शब्द उठा; उसी शब्द से, बाण के पात से, श्रीराम ने भूमि की कुक्षियों (गड्ढों) के जल को सुखा दिया। वह प्रदेश तभी से तीनों लोकों में मरुकान्तार नाम से विख्यात हुआ। उस कुक्षि को सुखाकर देवों के समान पराक्रमी, विद्वान् दशरथनन्दन श्रीराम ने मरु-भूमि को यह वरदान दिया।

सूखी धरती की ओर हाथ बढ़ाकर आशीर्वाद देते राम, सामने फूल, गौएं और मधु के छत्ते।

श्रीराम ने वर दिया कि यह भूमि पशुओं के लिए हितकर होगी, रोग कम होंगे, चारों ओर फल, मूल और मधु (शहद) से भरी रहेगी, घी और दूध से समृद्ध होगी, और भाँति-भाँति की ओषधियों तथा सुगन्ध से पूर्ण रहेगी। श्रीराम के वर-दान से उन गुणों से युक्त मरु-भूमि एक रमणीय प्रदेश बन गई।

समझने की कुंजी (मरुकान्तार, आधुनिक समता): गीता प्रेस अनुवाद मरुकान्तार (या मरुजंगल) को आज के राजस्थान के मारवाड़ और बीकानेर के लगभग क्षेत्र से जोड़ता है। यहाँ राम का अमोघ बाण गिरा, जल सूख गया, और शाप-जैसा क्षण वर-दान में बदल गया; वही मरु-भूमि पशु, ओषधि और सुगन्ध से समृद्ध हुई। यह वाल्मीकि की वह शैली है जिसमें भूगोल और कथा परस्पर बँधे रहते हैं।

सार: समुद्र-देव दिव्य रूप में, नदी-देवियों और रत्न-आभूषणों सहित प्रकट हुए। उन्होंने अपने अगाध स्वभाव की विवशता बताकर सेतु का उपाय सुझाया और सेना पार होने तक ग्राहों को रोकने का वचन दिया। राम के अमोघ बाण को उन्होंने उत्तर के द्रुमकुल्य प्रदेश की ओर गिरवाया, जिससे मरुकान्तार बना; राम ने उस मरु-भूमि को समृद्धि का वर दिया।

नल का परिचय और सेतु-बन्धन का आरम्भ

समुद्र देव विशाल रूप में सेतु मार्ग दिखाते हुए, वानर लकड़ी और पत्थर जोड़ने में जुटे।

वह कुक्षि सूख जाने पर नदियों के स्वामी समुद्र ने सब शास्त्रों के ज्ञाता रघुनन्दन श्रीराम से कहा कि हे सौम्य! यह विश्वकर्मा (देवों के शिल्पी) का तेजस्वी पुत्र नल है, जिसे उसके पिता ने सब शिल्पों में निपुणता का वरदान दिया है; यह आपसे प्रेम रखता है, हे विश्व के रचयिता। यह महान् उत्साही वानर मुझ पर सेतु बनाए; मैं उसे धारण करूँगा। यह अपने पिता के समान ही श्रेष्ठ शिल्पी है।

यह कहकर समुद्र-देव अदृश्य हो गए। तब वानरश्रेष्ठ नल अपने पैरों पर उछलकर महाबली श्रीराम से बोले कि मैं विश्वकर्मा का औरस (अपने अंश से उत्पन्न) पुत्र हूँ और शिल्प में उन्हीं के समान हूँ। यह सब मुझे समुद्र ने स्मरण कराया है; उन्होंने यथार्थ कहा है। बिना पूछे मैं अपने गुण स्वयं नहीं कहता।

नल ने कहा कि अपने पिता के सामर्थ्य को पाकर मैं इस विस्तीर्ण मकरालय पर सेतु बना सकता हूँ; समुद्र ने ठीक कहा। मेरी माता को विश्वकर्मा ने मन्दर पर्वत पर यह वर दिया था कि ‘हे देवि! मेरे ही समान एक पुत्र आपको (मेरे द्वारा) प्राप्त होगा।’ मेरा मत है कि कृतघ्नों के प्रति लोक में पुरुष के लिए दण्ड ही परम उत्तम मार्ग है; ऐसे लोगों के प्रति क्षमा, सान्त्व अथवा दान को धिक्कार है।

नल ने आगे कहा कि यह भयंकर समुद्र, जिसे सगर (आपके पूर्वज) ने खुदवाकर विस्तृत किया था, कृतज्ञता से नहीं, दण्ड के भय से ही श्रीराम को मार्ग देने पर आया है; सेतु-बन्धन को देखने की इच्छा भी इसमें मिली हुई थी। हे वरुणालय! मैं भी निश्चय ही समुद्र पर सेतु बनाने में समर्थ हूँ। इसलिए आज ही वानरश्रेष्ठ सेतु की सामग्री बाँधना आरम्भ करें।

पहाड़ी वन से वृक्ष और शिलाएं ढोकर समुद्र की ओर लाती वानर सेना, राम देखते खड़े।

तब श्रीराम के भेजे हुए लाखों वानरश्रेष्ठ चारों ओर महान् अरण्य में हर्ष-भरे उछल पड़े। पर्वतों के समान विशाल वे वानर वहाँ वृक्षों और चट्टानों को उखाड़कर समुद्र की ओर खींच लाए।

एक उप-कथा: सगर का उल्लेख यहाँ नल के मुख से आता है। राम के पूर्वज सगर के साठ हजार पुत्रों के द्वारा पृथ्वी खोदे जाने से ही समुद्र विस्तृत हुआ माना जाता है, और इसी कारण समुद्र का एक नाम ‘सागर’ पड़ा। इसलिए नल कहते हैं कि यह समुद्र राम के कुल का ही उपकृत है, फिर भी दण्ड-भय से ही झुका।

सार: समुद्र ने विश्वकर्मा-पुत्र नल को सेतु-निर्माता बताया और स्वयं अदृश्य हो गए। नल ने अपना परिचय देकर पिता के वरदान से प्राप्त शिल्प-सामर्थ्य की बात कही और कृतघ्नों के लिए दण्ड को ही उचित ठहराया। राम की आज्ञा से लाखों वानर वन में फैलकर वृक्ष-शिला लाने लगे।

पाँच दिन में सौ योजन का सेतु

उन वानरों ने साल और अश्वकर्ण, धव और बाँस, कुटज, अर्जुन, ताड़, तिलक, तिनिश, बिल्व और सप्तपर्ण, फूले हुए कर्णिकार, तथा आम और अशोक के वृक्षों से समुद्र को भर दिया। वानरश्रेष्ठ कहीं समूल (जड़ सहित) तो कहीं बिना जड़ के वृक्षों को इन्द्र-ध्वजा (इन्द्र के सम्मान में खड़ी की जाने वाली पताका) के समान उठाकर समुद्र में फेंकने लगे। वे चारों ओर से ताड़, अनार की झाड़ियाँ, नारियल, बहेड़ा, करीर, बकुल और नीम के वृक्ष ले आए।

सेतु निर्माण का निर्देश देते वानर शिल्पी नल, वानर रस्सों से बंधी शिलाएं और शहतीर बिछाते।

महाबली, विशाल काया वाले वानर हाथी के समान बड़ी-बड़ी चट्टानों और पर्वतों को उखाड़कर यन्त्रों (साधनों) से समुद्र-तट तक ढोने लगे। चट्टानों के सहसा फेंके जाने पर जल ऊपर उछलकर आकाश तक उठ जाता और फिर नीचे गिर आता। कुछ वानर सेतु की लम्बाई-चौड़ाई नापने के लिए दण्ड (छड़ें) पकड़े थे, कुछ सूत्र (डोरियाँ) तानकर सौ योजन लम्बी सीध बना रहे थे। नल ने नदियों के स्वामी समुद्र के बीचों-बीच वह विस्तीर्ण महासेतु बनाया; घोर कर्म वाले अन्य वानरों के सहयोग से वह सेतु बँधता गया।

समझने की कुंजी (दिनवार माप): गीता प्रेस अनुवाद हर दिन का काम योजन में गिनाता है। पहले दिन 14 योजन (लगभग 112 मील), दूसरे दिन 20 योजन (लगभग 160 मील), तीसरे दिन 21 योजन (लगभग 168 मील), चौथे दिन 22 योजन (लगभग 176 मील) और पाँचवें दिन 23 योजन (लगभग 184 मील) सुवेल पर्वत तक। कुल मिलाकर सौ योजन लम्बा और दस योजन चौड़ा सेतु।

राम और लक्ष्मण तट से दूर द्वीप तक फैलते सेतु को देखते, उस पर काम करते वानर।

पहले ही दिन वानरों ने चौदह योजन सेतु बनाया, जो जल्दी-जल्दी काम करने वाले और हाथी के समान दिखने वाले हर्षित वानरों के द्वारा रचा गया। दूसरे दिन भयंकर काया और महाबल वाले वानरों ने उसी प्रकार बीस योजन शीघ्र बना डाले। तीसरे दिन तेज चलने वाले विशाल काया वानरों ने इक्कीस योजन सेतु समुद्र पर डाल दिया। चौथे दिन महान् वेग वाले और उतावले वानरों ने उससे आगे बाईस योजन पूरे किए। पाँचवें दिन शीघ्रता से काम करने वाले वानरों ने तेईस योजन बनाकर सुवेल पर्वत (उस पार के तट) तक सेतु पहुँचा दिया।

इस प्रकार वानरश्रेष्ठ, विश्वकर्मा के तेजस्वी और बलवान् पुत्र नल ने समुद्र पर सेतु बाँध दिया; वे शिल्प में अपने पिता के समान ही निपुण निकले। मकरालय समुद्र पर नल का बनाया वह सुन्दर और तेजस्वी सेतु आकाश में स्वातीपथ (आकाशगंगा) के समान शोभा पाने लगा।

क्षितिज तक फैले पूरे सेतु पर आनंद से उछलते वानर, बादलों से निहारते देवता, आगे राम।

तब गन्धर्वों सहित देवता, सिद्ध (जन्म से ही सिद्धियों वाले देवयोनि के प्राणी) और परमर्षि उस अद्भुत दृश्य को देखने की इच्छा से आकाश में आ खड़े हुए। देव और गन्धर्वों ने दस योजन चौड़े और सौ योजन लम्बे, औरों के लिए अत्यन्त दुष्कर नल-सेतु को देखा। लम्बी-छोटी छलाँगें मारते और गरजते हुए वानरों ने उस अचिन्त्य, असह्य, अद्भुत और रोमांच भरे सेतु-बन्धन को देखा; अन्य सब प्राणियों ने भी समुद्र पर इस सेतु-बन्धन को देखा। सेतु बाँधते-बाँधते ही महान् ओज वाले वे करोड़ों वानर महासमुद्र के उस पार जा पहुँचे।

वह विशाल, सुनिर्मित, श्रीसम्पन्न, सुगठित और दृढ़ता से जुड़ा महान् सेतु समुद्र पर स्त्री के माँग (बालों के बीच की पंक्ति) के समान शोभा पा रहा था। तब समुद्र के उस पार विभीषण अपने मन्त्रियों सहित गदा हाथ में लिए खड़े हो गए, कि यदि शत्रु सेतु को तोड़ने का यत्न करें तो उन्हें रोका जा सके।

समझने की कुंजी (माँग की उपमा): वाल्मीकि सेतु को ‘सीमन्त’ अर्थात् स्त्री के बालों की माँग कहते हैं, समुद्र के नीले विस्तार पर सेतु की सीधी श्वेत रेखा वैसी ही दिखती है, जैसे केशों के बीच की सफेद पंक्ति। आकाशगंगा (स्वातीपथ) की उपमा भी इसी श्वेत-दीर्घ रेखा के सौन्दर्य को कहती है।

सेना का प्रयाण और देवों का अभिषेक

सेतु पार करते हुए हनुमान के कंधों पर राम, दूसरे वानर के कंधों पर लक्ष्मण, संग सेना।

इसके पश्चात् सुग्रीव ने सत्य-पराक्रमी श्रीराम से कहा कि आप हनुमान् की पीठ पर चढ़िए और लक्ष्मण अंगद के कन्धे पर बैठें। हे वीर! यह मकरालय समुद्र बहुत विशाल है; आकाश में विचरण करने में समर्थ ये दोनों वानर आपको ले चलेंगे। सुग्रीव के साथ धनुर्धारी, धर्मात्मा श्रीराम लक्ष्मण सहित उस सेना के आगे-आगे चले। कुछ वानर बीच में चले, कुछ बगल में; कुछ जल में कूदकर तैरने लगे, कुछ सेतु के मार्ग पर बढ़े, और कुछ आकाश में उछलकर गरुड़-समान उड़ने लगे।

पार जाती हुई वह भयंकर वानर-सेना अपने महान् कोलाहल से समुद्र की उठती हुई भीषण गर्जना को भी ढक देती थी। नल-सेतु से वह वानर-वाहिनी पार उतर गई, और राजा सुग्रीव ने उसे उस पार के तट पर, जो जड़, फल और जल से भरा-पूरा था, ठहराया।

सेतु के आरंभ पर हाथ जोड़े खड़े राम, आकाश से कलश भरकर जल बरसाती देवियां।

श्रीराम के उस अद्भुत और औरों के लिए दुष्कर कर्म को देखकर सिद्धों, चारणों (आकाश में विचरने वाले गायकों) और महर्षियों के साथ देवता सहसा श्रीराम के पास आए और उन्हें अलग-अलग परम शुभ जल से अभिषिक्त किया। उन्होंने भाँति-भाँति के शुभ वचनों से नरदेवों (राजाओं) के द्वारा सत्कृत श्रीराम की पूजा की कि हे राजन! आप शत्रुओं को जीतिए, और समुद्रों सहित इस पृथ्वी का अनगिनत वर्षों तक पालन कीजिए।

सार: नल ने पाँच दिन में दस योजन चौड़ा और सौ योजन लम्बा सेतु समुद्र पर बाँधा; देवता उस अद्भुत कर्म को देखने आकाश में जुटे। विभीषण उस पार रक्षा को खड़े हुए। सुग्रीव की व्यवस्था से राम हनुमान् पर और लक्ष्मण अंगद पर बैठे, और करोड़ों वानर सेतु, जल और आकाश से पार उतरकर उस तट पर ठहरे। देवों ने राम का अभिषेक करके उन्हें विजय और दीर्घ राज्य का आशीर्वाद दिया।

मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, युद्धकाण्ड (गीता प्रेस गोरखपुर)।