अध्याय 25 · लंका-घेरा व प्रारंभिक युद्ध

वाल्मीकि रामायण · युद्धकाण्ड
लंका का घेरा, अंगद का दूत बनकर जाना, और प्रारम्भिक भीषण युद्ध जिसमें दोनों पक्षों के वीर भिड़ते हैं।

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धनुषधारी राजकुमार समुद्र तट से ग्रहण लगे सूर्य और गिरती उल्का को देखते हुए, दूर लंका नगरी।

समुद्र पार करके राघव अपनी अपार सेना के संग दक्षिण तट पर खड़े हुए, और ज्यों ही लंका की ओर पग बढ़ाने का समय आया, श्रीराम के नेत्रों ने आकाश और पृथ्वी पर भयानक अपशकुन देखे। लक्ष्मण को छाती से लगाकर, निमित्तों के ज्ञाता उन रघुनन्दन ने अपने अनुज से कहा कि घोर संकट सामने उपस्थित है। हवाएँ धूल से कलुषित होकर बह रही थीं, धरती काँप रही थी, पर्वतों के शिखर हिल रहे थे और महावृक्ष धराशायी हो रहे थे। मांसभक्षी पशुओं जैसे क्रूर और कर्कश स्वर वाले मेघ रक्त की बूँदों से मिश्रित वर्षा बरसा रहे थे। संध्या (सायंकाल की लाली) रक्तचन्दन के समान अत्यन्त दारुण थी, और सूर्य से जलता हुआ अग्निमण्डल टूटकर गिरता हुआ प्रतीत होता था। दीन-स्वर वाले क्रूर पशु-पक्षी चारों ओर सूर्य की ओर मुख करके भय उपजाते हुए चीत्कार कर रहे थे। रात्रि में भी चन्द्रमा कान्तिहीन होकर, काले-लाल मण्डल से घिरकर, ऐसे उष्णता बिखेर रहे थे मानो प्रलयकाल आ पहुँचा हो। सूर्य के चारों ओर एक छोटा, धूमिल, ताम्रवर्ण मण्डल दिख रहा था और निरभ्र आकाश में सूर्य पर एक नीला धब्बा प्रकट था। नक्षत्र भी घनी धूल से ढककर मानो समस्त लोकों के संहार का संकेत दे रहे थे। कौवे, श्येन और नीच गृध्र लंका पर टूट पड़ रहे थे और शृगालियाँ अमंगल नाद कर रही थीं।

श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि वानर और राक्षस दोनों पक्षों के वीरों के क्षय का यह संकेत है; ऐसे में जल और वन से सम्पन्न, फलों से भरे प्रदेश में सेना को भागों में बाँटकर, व्यूह (युद्ध की व्यवस्थित रचना) में खड़ा करके सावधान रहना चाहिए। फिर रावण द्वारा पालित, अत्यन्त दुर्जय लंकापुरी पर समस्त वानरों के संग आज ही द्रुत गति से अभियान करना उचित है। इतना कहकर वह धनुर्धर, संग्राम में शत्रुओं का दमन करने वाले विभु राम सबके आगे, अग्रभाग में लंका की ओर चल पड़े। विभीषण और सुग्रीव के संग समस्त वानर-श्रेष्ठ शत्रुओं के वध के लिए गरजते हुए आगे बढ़े, और हरियों की कर्मठ चेष्टाओं से राघव अत्यन्त प्रसन्न हुए।

समझने की कुंजी (व्यूह): वाल्मीकि के युद्ध में सेना को मनुष्य के आकार में रचा जाता था (मूर्धा=सिर, उरस्=छाती, कुक्षि=पेट, जघन=कमर का पिछला भाग)। हर अंग की रक्षा का दायित्व अलग सेनापति को सौंपा जाता था, जैसे आज किसी मोर्चे को वाम-दक्षिण-केन्द्र पंक्तियों में बाँटा जाता है।

लंका के द्वार पर सेना की रचना और शुक की वापसी

सुग्रीव द्वारा व्यूह में सजी वह वीर-सभा शरद् पूर्णिमा की रात्रि-सी सुशोभित हो रही थी। उस सागर-समान विशाल सेना के पगों के भार से, समुद्र-सी प्रचण्ड गति से, त्रस्त धरती हिल उठी। तभी वानरों ने लंका में भेरी और मृदंग के तुमुल घोष सुने और स्वयं उससे भी ऊँचे स्वर में गरज उठे। चित्र-विचित्र ध्वजा-पताकाओं से सजी लंका को देखकर राम का मन व्याकुल हो उठा और उन्होंने सीता का स्मरण किया, जो रावण द्वारा वैसे ही रोक रखी गई थीं जैसे लोहितांग मंगल ग्रह से रोहिणी नक्षत्र। उन्होंने लम्बी, उष्ण साँस भरते हुए लक्ष्मण से कहा कि देखें, विश्वकर्मा ने मानो अपने मन से ही पर्वत-शिखर पर इस उन्नत नगरी को रचा है, जो आकाश को छूती-सी जान पड़ती है; बहुत से सात-मंजिले भवनों से भरी यह लंका श्वेत मेघों से ढके आकाश-सी प्रतीत होती है। फिर श्रीराम ने शास्त्रोक्त रीति से सेना को बाँटने का आदेश दिया।

राम, लक्ष्मण और गदाधारी हनुमान वानर सेना संग शिलाएं उठाए लंका के दुर्ग की ओर बढ़ते हुए।

उन्होंने वानर-सेना को इस प्रकार सजाया कि दुर्जय अंगद नील के संग व्यूह की छाती पर खड़े हों; ऋषभ नामक वानर दक्षिण पक्ष पर रहे; मदोन्मत्त हाथी-सा दुर्धर्ष गन्धमादन वाम पक्ष का नेतृत्व करे; स्वयं श्रीराम लक्ष्मण के संग मस्तक (आगे) पर खड़े हों; जाम्बवान्, सुषेण और वेगदर्शी ये तीन महान् ऋक्ष-वानर-मुख्य उदर की रक्षा करें; और कपिराज सुग्रीव वरुण की भाँति जघन की रक्षा करें। इस प्रकार व्यवस्थित, महान् वानरों से रक्षित वह अनीकिनी (सेना) मेघमाला सहित आकाश-सी सुशोभित हुई। वानर पर्वत-शिखर और विशाल वृक्ष उठाकर लंका को कुचलने के लिए लपके और मन-ही-मन संकल्प करने लगे कि या तो पर्वत-शिखरों से, या केवल मुक्कों से ही इस लंका को चूर कर देंगे।

तब महातेजस्वी राम ने सुग्रीव से कहा कि सेना सुव्यवस्थित हो चुकी है, अब उस शुक को मुक्त कर दिया जाए। (शुक रावण का गुप्तचर था, जिसे वानरों ने पहले पकड़कर बन्दी बनाया था।) राम की आज्ञा सुनकर महाबली कपिराज ने उस दूत शुक को छोड़ दिया। वानरों से पीड़ित, अत्यन्त भयभीत शुक रावण के पास पहुँचा। रावण हँसते हुए बोला कि आपके ये दोनों पंख कैसे बँधे हैं और कटे-से क्यों दिखते हैं; कहीं आप उन चंचल बुद्धि वाले वानरों के वश में तो नहीं पड़ गए। भय से व्याकुल शुक ने उत्तर दिया कि उसने कोमल वाणी से समझा-बुझाकर रावण का सन्देश ज्यों-का-त्यों पहुँचाया, पर वानर स्वभाव से ही कोपशील और तीक्ष्ण हैं, उनसे बात करना सम्भव नहीं और न ही वहाँ कोई प्रश्न पूछने का अवसर मिला। मेरे दिखते ही क्रुद्ध वानरों ने मुझे पकड़कर मुक्कों से मारा और पंख नोच डाले। फिर उसने बताया कि विराध, कबन्ध और खर का संहार करने वाले राम, सुग्रीव सहित, सीता का पता पाकर आ गए हैं। उन्होंने समुद्र पर सेतु बाँधकर, लवण-समुद्र पार करके राक्षसों को तुच्छ करते हुए, धनुष धारण किए हुए, यहाँ डेरा डाल दिया है। पर्वत और मेघ-समान ऋक्ष-वानरों की सहस्रों सेनाएँ पृथ्वी को ढके हुए हैं। शुक ने दो उपाय बताए कि या तो उन्हें सीता लौटा दी जाए, या युद्ध दिया जाए।

Red-eyed Ravana on his throne erupts in fury, vowing he will never return Sita though gods and demons assail him.

यह सुनकर रावण की आँखें रोष से लाल हो उठीं और वह बोला कि चाहे देव, गन्धर्व और दानव भी उससे युद्ध करें, वह समस्त लोकों के भय से भी सीता को नहीं लौटाएगा। उसने अपने पराक्रम का बखान किया कि कब उसके बाण वसन्त में पुष्पित वृक्ष की ओर दौड़ते भौंरों-से राम की ओर दौड़ेंगे, और कब वह जलते बाणों से राम के रक्त-रंजित शरीर को मशालों से हाथी की भाँति दग्ध करेगा। उसने कहा कि उसका वेग समुद्र-सा और बल वायु-सा है, राम इसे नहीं जानते इसी से युद्ध चाहते हैं। उसने अपने धनुष को बाण-कोणों से बजाई जाने वाली वीणा कहा, जिसकी ज्या (धनुष की डोरी) का घोष, पीड़ितों की आर्त-पुकार और बाणों का नाद उसके तीन स्वर हैं। उसका दावा था कि सहस्रनेत्र इन्द्र, वरुण, यम या वैश्रवण कुबेर भी उसे महायुद्ध में पराजित नहीं कर सकते।

सार: सेतु पार करते ही श्रीराम लंका के सम्मुख पहुँच गए, अपशकुनों को लक्ष्य कर सेना को सतर्क व्यूह में सजाया, बन्दी दूत शुक को छोड़ा; पर रावण ने सीता-त्याग का प्रस्ताव ठुकराकर अहंकारपूर्ण ललकार दी।

शुक और सारण की गुप्तचरी, और राम की उदारता

श्रीराम सेना सहित समुद्र पार कर चुके थे, तब श्रीमान् रावण ने अपने दोनों मन्त्रियों शुक और सारण से कहा कि वानरों की वह दुस्तर सेना समुद्र पार कर आई है, और राम द्वारा समुद्र पर सेतु बाँधना ऐसी बात है जो पहले कभी न हुई थी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि सागर पर सेतु बँध सकता है, इसलिए उसने आज्ञा दी कि वे दोनों वानर-रूप धारण करके अलक्षित भाव से सेना में प्रवेश करें और उसका परिमाण, वीर्य, मुख्य वानर, राम-सुग्रीव के मन्त्री, सेनापति, तथा राम और लक्ष्मण के व्यवसाय (निश्चय), पराक्रम और शस्त्रों को यथातथ्य जानकर शीघ्र लौट आएँ।

विशाल वानर सेना चट्टानी तट पर लंका की ओर बढ़ती हुई, ऊपर शिला पर राम और लक्ष्मण।

आज्ञा पाकर दोनों वीर राक्षस वानर-रूप में सेना में घुस गए, पर वह सेना इतनी अचिन्त्य और रोमांचकारी थी कि वे उसे गिन भी न सके। वह सेना पर्वत-शिखरों, निर्झरों, गुफाओं, समुद्र-तटों, वनों और उपवनों में फैली थी; कुछ सागर पार कर चुकी, कुछ पार कर रही, कुछ पार करने को उद्यत थी। भयानक नाद करती उस अक्षोभ्य बल-सागर को दोनों निशाचर देख ही रहे थे कि महातेजस्वी विभीषण ने प्रच्छन्न-रूप उन्हें पहचानकर पकड़ लिया और राम के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए कहा कि ये रावण के मन्त्री शुक और सारण हैं, जो लंका से गुप्तचर बनकर आए हैं। डरे हुए दोनों राक्षस, जीवन की आशा छोड़कर, हाथ जोड़े बोले कि सौम्य राघव, रावण के भेजे हुए हम दोनों आपकी समस्त सेना का परिज्ञान करने आए हैं।

उनकी बात सुनकर सर्वभूत-हितैषी राम ने हँसते हुए कहा कि यदि उन्होंने पूरी सेना देख ली हो, हमें भली प्रकार देख लिया हो और स्वामी की आज्ञा के अनुसार कार्य पूरा कर लिया हो, तो वे इच्छानुसार लौट सकते हैं; और यदि कुछ अनदेखा रह गया हो तो विभीषण फिर से पूरी लंका-सेना दिखा देंगे। उन्होंने आश्वस्त किया कि इस बन्दी होने से उन्हें जीवन की चिन्ता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि शस्त्र रखकर पकड़े गए दूत वध के योग्य नहीं होते। फिर राम ने वानरों से कहकर उन दोनों रात्रिचर गुप्तचरों को मुक्त करा दिया, यद्यपि वे शत्रुपक्ष में सतत भेद डालने में लगे रहते थे।

राम ने उन्हें यह सन्देश रावण को देने को कहा कि रावण अपने सैन्य और बान्धवों सहित इच्छानुसार उस बल का प्रदर्शन कर दे, जिसके भरोसे उसने सीता का हरण किया; कल प्रातः वह लंका की दीवारों और तोरणों सहित नगरी तथा राक्षसों के बल को बाणों से ध्वस्त देखेगा, और राम वैसे ही अपना भीषण क्रोध रावण और उसके सैन्य पर छोड़ेंगे जैसे इन्द्र दानवों पर वज्र छोड़ते हैं। दोनों राक्षस “जय हो” कहकर लंका लौटे और रावण से बोले कि विभीषण ने उन्हें वध के लिए पकड़ लिया था, पर धर्मात्मा राम ने उन्हें छोड़ दिया। उन्होंने रावण को चेताया कि राम, लक्ष्मण, विभीषण और महातेजा सुग्रीव, ये चारों लोकपालों-समान वीर एक स्थान पर हैं, और इनमें से अकेला राम भी अपने रूप और अस्त्रों से लंका को उखाड़कर अन्यत्र ले जाने में समर्थ है। उन्होंने सलाह दी कि विरोध छोड़कर सन्धि की जाए और मिथिलापुत्री सीता राम को लौटा दी जाए।

सार: रावण के भेजे गुप्तचर शुक और सारण विभीषण द्वारा पकड़े गए, पर राम ने दूत-धर्म का सम्मान करके उन्हें छोड़ दिया; लौटकर उन्होंने रावण को राम-पक्ष की अजेयता बताकर सन्धि की सलाह दी।

प्रासाद पर चढ़कर सारण द्वारा वानर-नायकों का परिचय

सारण के सत्य और अकातर वचन सुनकर राजा रावण ने कहा कि चाहे देव-गन्धर्व-दानव उस पर मिलकर आक्रमण करें, वह समस्त लोकों के भय से भी सीता को नहीं देगा; सौम्य सारण तो वानरों से पीड़ित होकर भयभीत हो गया है इसी से आज ही सीता लौटाना उचित मानता है। “भला कौन शत्रु मुझे समर में जीत सकता है?” ऐसा कठोर वचन कहकर वह बहुत ताड़-वृक्षों जितने ऊँचे, हिमपाण्डुर प्रासाद पर वानर-सेना देखने को चढ़ गया। समुद्र, पर्वत और वनों को निहारते हुए उसने पृथ्वी को वानरों से भरी देखा; उस अपार, असह्य बल को देखकर उसने सारण से पूछा कि इनमें मुख्य, शूर और महाबली कौन हैं, किसकी सलाह सुग्रीव सुनता है और कौन यूथपों के यूथप (दलों के नायक) हैं।

दस सिर वाला रावण महल से तट पर उमड़ी वानर सेना देखता, पास एक दरबारी संकेत करता हुआ।

मुख्यों के ज्ञाता सारण ने उत्तर दिया। उसने बताया कि जो वानर लंका की ओर मुख किए गरज रहा है और एक लाख यूथपों से घिरा है, जिसके घोष से दीवारों-तोरणों सहित समस्त लंका थर्रा उठती है, वह महात्मा सुग्रीव की सेना के अग्रभाग पर खड़ा नील नामक यूथप है। जो भुजाएँ उठाए पृथ्वी पर चलता, क्रोध से बार-बार जँभाई लेता, पर्वत-शिखर-सा ऊँचा और पद्म-केसर-सा कान्तिमान्, अपनी पूँछ बार-बार पटकता है, जिसकी पूँछ के शब्द से दसों दिशाएँ गूँज उठती हैं, वह युवराज अंगद है, जो रावण को युद्ध के लिए ललकार रहा है; वह वाली-समान, सुग्रीव का प्रिय, राम के लिए वैसे ही पराक्रमी है जैसे इन्द्र के लिए वरुण। फिर सारण ने अनेक नायक गिनाए, सेतु-निर्माता नल, गोमती-तट के संरोचन पर्वत का राजा रहा कुमुद, गोलांगूलों का स्वामी रंभ, अदीन वानर चण्ड, संरोचन पर राज करता ज्वलित सर्प-सा रंभ, साल्वेय पर्वत का मृत्यु-निर्भय शरभ, समुद्र-तट पर द्वितीय सागर-सा खड़ा वेणा नदी का जल पीने वाला दर्दुर-समान विनत, और साठ लाख वानरों का स्वामी क्रोधन, और गैरिकवर्ण देह पुष्ट करने वाला, सबको तुच्छ मानने वाला गवय।

समझने की कुंजी (संख्या): सारण जो संख्याएँ बताता है (एक लाख, कोटि, साठ लाख यूथप) वे वाल्मीकि की अतिशयता-शैली में हैं, ये सेना के अकल्पनीय विस्तार का चित्र खींचने के लिए हैं, गणित का ठीक-ठीक हिसाब नहीं। आधुनिक दृष्टि से ये “अनगिनत मण्डल-दर-मण्डल टुकड़ियाँ” समझनी चाहिए।

सारण ने अन्त में कहा कि ये दुष्प्रसह वीर, जो सेनापतियों में श्रेष्ठ हैं और जिनकी संख्या नहीं गिनी जा सकती, अपने-अपने भागों में बँटी सेनाओं के स्वामी हैं।

सार: सीता-त्याग की सलाह ठुकराकर रावण प्रासाद पर चढ़ा, और सारण ने उसे नील, अंगद, नल, कुमुद, रंभ, शरभ, विनत, क्रोधन, गवय आदि वानर-नायकों का बल और स्वभाव विस्तार से बताया।

सारण द्वारा शेष नायकों और ऋक्ष-सेना का वर्णन

सारण ने आगे कहा कि राम के लिए जो प्राण की भी चिन्ता नहीं करते, ऐसे यूथपों का वर्णन करता हूँ। जिसकी लम्बी पूँछ के चिकने रोएँ, ताम्र, पीत, श्वेत, भूरे, सूर्य-किरणों-से चमकते और भूमि पर घिसटते हैं, वह घोरकर्मा वानर हर है; उसके पीछे सैकड़ों-सहस्रों किंकर वृक्ष उठाए चलते हैं। फिर काले अंजन-समान, सत्य-पराक्रमी, समुद्र-पार की रेत-से असंख्य जो दिखते हैं, वे पर्वतों, मैदानों और नदी-तटों पर रहने वाले अत्यन्त भयानक ऋक्ष (भालू) हैं। इनके बीच भीमाक्ष, भीमदर्शन धूम्र नामक यूथप खड़ा है, जो समस्त ऋक्षों का अधिपति है और नर्मदा का जल पीते हुए ऋक्षवान् पर्वत पर रहता है।

उसने धूम्र के छोटे भाई जाम्बवान् का परिचय दिया, महायूथपों का भी यूथप, प्रशान्त, गुरुवर्ती और संग्राम में असहिष्णु; देव-असुर-युद्ध में जिसने इन्द्र की महान् सहायता की और अनेक वर बाण-समान शिलाएँ फेंकने वाले उसके राक्षस-पिशाच-समान रोमश सैनिकों का; इन्द्र-समान पराक्रमी, सहस्राक्ष इन्द्र की सेवा करने वाले दम्भ का; एक योजन ऊँचे को देह से छू लेने वाले, वानरों के पितामह संनादन का, जिसने इन्द्र को युद्ध दिया पर पराजय न पाई; अग्नि से गन्धर्व-कन्या में उत्पन्न, युद्ध में कभी न डींग मारने वाले क्रथन का, जो कैलास पर रमता है; गंगा-तट पर हाथियों को त्रास देता, पुराने वैर का स्मरण करता प्रमाथी का; कोटि गोलांगूलों से घिरे गवाक्ष का; और सुमेरु पर रमने वाले, वानर-मुख्यों में श्रेष्ठ केसरी का। उसने बताया कि साठ हजार स्वर्ण-पर्वतों के अन्तिम शिखर पर पैने दाँतों और नखायुध वाले, सिंह-व्याघ्र-से दुरासद, अग्नि-समान, ज्वलित विषधर-से वानर बसते हैं। इनका अधिपति, हे निष्पाप, वैसे ही श्रेष्ठ खड़ा है जैसे आप राक्षसों में।

इनके बीच राम-प्रिय शतबलि नामक वीर है, जो प्रतिदिन सूर्य की उपासना करता और जय का अभिलाषी है। फिर गज, गवाक्ष, गवय, नल और नील नामक वानर हैं, जिनमें से प्रत्येक दस-दस कोटि योद्धाओं से घिरा है; तथा विन्ध्य-पर्वत-वासी और भी अनेक श्रेष्ठ वानर हैं, जो लघु-विक्रम (फुर्तीले) होने और बहुसंख्या के कारण गिने नहीं जा सकते। सारण ने कहा कि ये सब महाप्रभाव वाले, महाशैल-समान देह वाले, क्षण भर में पर्वतों सहित पृथ्वी को समतल कर देने में समर्थ हैं।

सार: सारण ने हर, धूम्र, जाम्बवान्, दम्भ, संनादन, प्रमाथी, गवाक्ष, केसरी, शतबलि आदि नायकों और घोर ऋक्ष-सेना का वर्णन करके बताया कि यह दल पर्वत-समान और अगणनीय है।

शुक द्वारा वर्णन की पूर्ति

सारण के मौन होने पर शुक ने रावण से कहा कि ये सब किष्किन्धा-वासी सुग्रीव के सचिव हैं, जो देव-गन्धर्वों से उत्पन्न और इच्छानुसार रूप धारण करने वाले हैं। जो दो कुमार देव-रूप खड़े दिखते हैं, वे मैन्द और द्विविद हैं; युद्ध में इनके समान कोई नहीं। ब्रह्मा की अनुमति से दोनों ने अमृत-पान किया है। शुक ने राक्षसों की संख्या इक्कीस हजार कोटि, एक सहस्र शंकु और सौ वृन्द बताई। फिर मदोन्मत्त हाथी-से खड़े, क्रुद्ध होने पर समुद्र को भी मथ देने वाले उस वानर की ओर संकेत किया जो पहले सीता और स्वयं रावण की खोज में लंका तक आया था, हनुमान्। शुक ने उसकी कथा सुनाई कि बाल्यकाल में भूखे हनुमान् ने उदित सूर्य को निगलने के लिए तीन हजार योजन की छलाँग लगाई थी; देव-ऋषि-राक्षसों के लिए भी अनासाद्य सूर्य तक न पहुँच पाने पर, सूर्योदय के पर्वत पर गिर पड़े। शिला-तल पर गिरने से उनकी एक हनु (ठोड़ी) कुछ भिन्न हो गई पर और दृढ़ हो गई, इसी से वे “हनुमान्” प्रसिद्ध हुए। उसने कहा कि इसी हनुमान् ने अपनी पूँछ की अग्नि से लंका जलाई थी, यह रावण भूल कैसे गया।

एक उप-कथा: शुक के अनुसार, शिशु हनुमान् को उदित सूर्य फल-सा दिखा और वे उसे खाने आकाश में उछल पड़े। सूर्य तक न पहुँच पाकर पूर्वाचल पर गिरे और उनकी एक हनु (ठोड़ी) शिला से टकराकर थोड़ी टेढ़ी पर अत्यन्त दृढ़ हो गई, इसी विशिष्ट ठोड़ी के कारण उनका नाम “हनुमान्” पड़ा।

श्याम वर्ण राम और लक्ष्मण वानर वीरों संग मंत्रणा करते, एक भूरा वानर हनुमान की ओर संकेत करता हुआ।

शुक ने राम और लक्ष्मण का भी परिचय दिया, इक्ष्वाकु-कुल के अतिरथी, सिंह-सी देह वाले श्याम, पद्म-नेत्र राम, जो ब्राह्मास्त्र और वेदों के ज्ञाता हैं, बाणों से आकाश भेद और मेदिनी विदीर्ण कर सकते हैं, जिनका क्रोध मृत्यु-सा और पराक्रम इन्द्र-सा है, जिनकी भार्या सीता का रावण ने जनस्थान से हरण किया, वही राम युद्ध के लिए आ रहे हैं। राम के दक्षिण पार्श्व में शुद्ध स्वर्ण-कान्ति, विशाल वक्ष, ताम्र-नेत्र, नील-कुंचित केश वाला लक्ष्मण है, जो नीति और युद्ध में कुशल, समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, राम का दक्षिण-बाहु और बाहर विचरता उसका प्राण है। राम के वाम पक्ष में राक्षस-गणों से घिरा राजा विभीषण है, जिसे श्रीराम ने लंका का राजा अभिषिक्त किया है। बीच में पर्वत-सा अचल खड़ा, स्वर्ण-कान्ति माला से सुशोभित सुग्रीव है, जिसे वाली का वध करके राम ने वह माला, तारा और स्थायी कपिराज्य प्रदान किया।

समझने की कुंजी (संख्या-समतुल्य): शुक शंकु, वृन्द, महावृन्द, पद्म, खर्व, समुद्र, ओघ जैसी पारिभाषिक संख्याएँ गिनाता है। सौ सहस्र = एक कोटि; एक लाख कोटि = एक शंकु; और इसी क्रम में हर अगली इकाई पिछली की एक लाख गुनी। यह प्राचीन भारतीय “बड़ी संख्याओं की नामावली” है, मानो आज के अरब-खरब-नील की शृंखला।

शुक ने कहा कि इतने बड़े बल, शंकु-सहस्रों, वृन्द-शतों, पद्म और खर्वों, समुद्र और महौघों की अगणित सेना से, तथा वीर विभीषण और अपने सचिवों से घिरा सुग्रीव युद्ध के लिए राम के पीछे चल रहा है। उसने रावण को परामर्श दिया कि प्रज्वलित ग्रह-सी उपस्थित इस सेना को सावधानी से देखकर अब परम प्रयत्न किया जाए, जिससे विजय हो और शत्रुओं से पराभव न हो।

सार: शुक ने मैन्द-द्विविद, हनुमान् की बाल-लीला और नामकरण, तथा राम-लक्ष्मण-विभीषण-सुग्रीव का परिचय देकर राक्षसों की अगणित किन्तु अजेय शत्रु-सेना का चित्र पूरा किया और रावण को सतर्क प्रयत्न की सलाह दी।

रावण का क्रोध, और शार्दूल आदि गुप्तचरों का भेजा जाना

शुक से दिखाए गए हरि-यूथपों, महावीर लक्ष्मण, विभीषण, भीमविक्रम सुग्रीव, बली अंगद, हनुमान्, जाम्बवान्, सुषेण, कुमुद, नील, नल, गज, गवाक्ष, शरभ, मैन्द और द्विविद को देखकर रावण का हृदय कुछ विह्वल हुआ और वह क्रुद्ध हो उठा। कथा के अन्त में उसने रोष से गद्गद वाणी में नतमस्तक खड़े शुक-सारण को फटकारा कि शत्रुओं की प्रशंसा करना उनके लिए शोभा नहीं देता; आचार्य, गुरु और वृद्धों की सेवा व्यर्थ गई जो राजशास्त्र का सार उन्होंने ग्रहण न किया; इन मूर्ख सचिवों के संग रहकर भी वह सौभाग्यवश राज्य कर रहा है। उसने कहा कि मृत्यु का भय न होने से ही वे ऐसे कठोर वचन बोल सके; राजदण्ड से ताड़ित अपराधी वृक्षों-से अछूते नहीं रह सकते। फिर भी पूर्व-उपकारों का स्मरण करके उसने उन्हें वध न देकर, अपनी दृष्टि से दूर हो जाने का आदेश दिया।

तब रावण ने महोदर से कहा कि शीघ्र दूसरे गुप्तचर लाए जाएँ। आज्ञा पाकर महोदर ने तुरन्त गुप्तचर उपस्थित कराए, जो हाथ जोड़े जय-आशीष देते खड़े हुए। रावण ने उन विश्वस्त, शूर, धीर और निर्भय गुप्तचरों से कहा कि वे राम और उसके निकटवर्ती मन्त्रियों के व्यवसाय (योजना) को परखें, वह कैसे सोता-जागता है, आज क्या करना चाहता है, यह सब बारीकी से जानकर लौटें; क्योंकि गुप्तचर द्वारा शत्रु का बल-अबल जानकर बुद्धिमान् राजा अल्प प्रयत्न से ही उसे परास्त कर देते हैं।

“तथास्तु” कहकर गुप्तचरों ने शार्दूल को आगे करके रावण की प्रदक्षिणा की और सुवेल पर्वत के समीप, जहाँ राम लक्ष्मण के संग थे, चल पड़े। प्रच्छन्न-रूप में उन्होंने सुग्रीव-विभीषण सहित राम-लक्ष्मण को देखा। उस सेना को देखकर वे भय से विह्वल हो उठे, इतने में धर्मात्मा विभीषण ने उन्हें पहचान लिया। वहाँ खड़े राक्षस विभीषण द्वारा अकस्मात् पकड़ लिए गए; “यह पापी है” कहकर केवल शार्दूल नाम से दिखाया गया। पर वानरों से पिटते उस शार्दूल को भी राम ने छुड़ा दिया, और अनृशंस (दयालु) राम ने अन्य राक्षसों को भी मुक्त कर दिया। फुर्तीले वानरों से पीड़ित वे राक्षस हाँफते, अचेत-से लंका लौटे और रावण से बोले कि राम का महाबल सुवेल पर्वत के समीप डेरा डाले है।

सार: शत्रु-प्रशंसा पर रावण ने शुक-सारण को फटकारकर निकाल दिया, और शार्दूल आदि नए गुप्तचर भेजे; विभीषण द्वारा पकड़े और राम द्वारा छोड़े गए वे लौटकर सुवेल-शिविर की सूचना लाए।

शार्दूल द्वारा प्रमुख वानर-नायकों का परिचय

एक घायल रक्तरंजित वानर स्वर्ण सिंहासन पर बैठे दस सिर वाले रावण के आगे घुटनों पर हाथ फैलाए।

गुप्तचरों ने रावण को बताया कि राघव अपनी अक्षोभ्य सेना के संग सुवेल पर्वत पर डेरा डाले हैं। महाबली राम के आ पहुँचने की बात सुनकर रावण कुछ उद्विग्न हुआ और उसने शार्दूल से पूछा कि उसका वर्ण विकृत और मुख दीन क्यों है; कहीं वह क्रुद्ध शत्रुओं के वश में तो नहीं पड़ गया। भय से व्याकुल शार्दूल ने मन्द स्वर में उत्तर दिया कि वे वानर-पुंगव गुप्तचरी के योग्य ही नहीं, क्योंकि वे विक्रान्त, बलवान् और राघव से रक्षित हैं; उनसे बात तक सम्भव नहीं, सब ओर मार्ग पर्वत-से वानरों से रक्षित है। प्रवेश करते ही वह पहचान लिया गया, बलपूर्वक पकड़ा गया, घुटनों-मुक्कों-दाँतों-थप्पड़ों से पीटा गया और सेना में घुमाया गया; अन्ततः रुधिर बहते, विह्वल वह राम की सभा में लाया गया, जहाँ वानरों से पिटते समय याचना करने पर राम ने “रुकें, रुकें” कहकर उसे बचा लिया।

शार्दूल ने बताया कि राम पर्वत-शिलाओं से महासमुद्र भरकर, लंका के द्वार पर सायुध खड़े हैं; गरुड़-व्यूह रचकर, वानरों से घिरे, उसे छोड़कर लंका की ओर बढ़ रहे हैं; इसलिए दीवार तक पहुँचने से पहले या तो सीता लौटा दी जाए या युद्ध दिया जाए। रावण ने फिर वही प्रतिज्ञा दोहराई कि देव-गन्धर्व-दानव भी लड़ें तो भी वह सीता नहीं देगा, और पूछा कि वे दुरासद वानर किसके पुत्र-पौत्र हैं, कितने प्रभावशाली हैं, यथातथ्य बताए, क्योंकि बल-अबल जानकर ही युद्ध-इच्छुक को संख्यान (आकलन) करना चाहिए।

शार्दूल ने नायकों के जन्म-परिचय दिए, ऋक्षरजा-पुत्र दुर्जय सुग्रीव; गद्गद-पुत्र (पालक के कारण) विख्यात जाम्बवान्; गद्गद का दूसरा पुत्र धूम्र; जिसके पुत्र हनुमान् ने अकेले राक्षसों का कदन किया, वह केसरी; धर्म-पुत्र धर्मात्मा सुषेण; सोम-पुत्र दधिमुख; मृत्यु-समान सुमुख, दुर्मुख और वेगदर्शी; इन्द्र का दौहित्र युवा अंगद; अश्विनी-कुमारों के पुत्र मैन्द और द्विविद; यम के पाँच पुत्र गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन। उसने कहा कि ऐसे दस कोटि देव-पुत्र शूर वानर हैं और शेष की गणना सम्भव नहीं। फिर सिंह-संहनन युवा राम का परिचय दिया, जिसने दूषण, खर, त्रिशिरा, विराध और काल-समान कबन्ध का वध किया, और जिसके पराक्रम-समान भूमि पर कोई नहीं। सेनापति नील अग्नि-पुत्र, हनुमान् वायु-पुत्र, श्वेत और ज्योतिर्मुख सूर्य-पुत्र, हेमकूट वरुण-पुत्र, नल विश्वकर्मा-पुत्र, और दुर्धर वसु-पुत्र है; तथा राक्षसों में श्रेष्ठ रावण का भाई विभीषण है, जो लंका को राम से उपहार-रूप पाकर राम-हित में लगा है। शार्दूल ने कहा कि सुवेल पर अधिष्ठित यह सम्पूर्ण वानर-बल मैंने यथावत् बता दिया, अब शेष कर्तव्य का निर्णय रावण ही करे।

समझने की कुंजी (अवधारणा): बालकाण्ड और इस सर्ग में कुछ वानर-नायकों के पिता भिन्न बताए गए हैं (जैसे सुषेण, शरभ, गन्धमादन)। टीकाकार इसका समाधान यह कहकर करते हैं कि समान नाम वाले भिन्न-भिन्न वानर रहे होंगे। यह बाद की व्याख्या-परम्परा का स्पष्टीकरण है।

सार: गुप्तचरी में बन्दी बने शार्दूल ने रावण को वानर-नायकों के दिव्य जन्म, राम-लक्ष्मण-विभीषण के बल का यथातथ्य परिचय देकर निर्णय का भार रावण पर छोड़ दिया।

रावण का माया-छल और सीता को मिथ्या मस्तक दिखाना

सुवेल पर राम के अधिष्ठित होने की सूचना पाकर उद्विग्न रावण ने मन्त्रियों को बुलाकर मन्त्रणा की। फिर मन्त्रियों को विदा करके वह अपने भवन में गया, और महाबली, महामायावी, माया-निपुण राक्षस विद्युज्जिह्व को साथ लेकर वहाँ पहुँचा जहाँ मैथिली थीं। उसने विद्युज्जिह्व से कहा कि वे माया से जनकपुत्री सीता को मोहित करेंगे; वह राघव का मायामय मस्तक और एक बड़ा सशर धनुष लेकर उपस्थित हो। “तथास्तु” कहकर विद्युज्जिह्व ने वह सुप्रयुक्त माया दिखाई, और प्रसन्न रावण ने उसे आभूषण दिया।

दस सिर वाला रावण शोक में डूबी सीता के आगे राम का मायावी कटा सिर थामे हुए।

सीता-दर्शन को उत्सुक रावण अशोकवाटिका में पहुँचा, जहाँ दीन किन्तु दैन्य के अयोग्य सीता नतमुख, शोकाकुल, पति का ध्यान करती, घोर राक्षसियों से घिरी भूमि पर बैठी थीं। समीप जाकर अपना नाम लेते हुए रावण ने ढिठाई से कहा कि जिस खर-हन्ता पति राम के भरोसे वह उसका तिरस्कार करती रही, वह समर में मारा गया; उसके मूल काट दिए गए और दर्प चूर हो गया। उसने कहा कि पति की मृत्यु के व्यसन से अब वह स्वयं उसकी भार्या बनेगी; मूर्ख स्त्री इस मति को छोड़ दे। फिर उसने वृत्रवध-सी घोर कथा सुनाई कि सेना सहित राम समुद्र-तट पर डेरा डाले थे, और रात्रि में थककर सुख से सोई उस सेना को प्रहस्त के नेतृत्व वाली विशाल राक्षस-सेना ने नष्ट कर दिया।

उसने झूठा वर्णन किया कि सोते राम का सिर कृतहस्त प्रहस्त ने महाखड्ग से काट डाला, विभीषण पकड़ लिया गया, लक्ष्मण सेना सहित दिशाओं में भागे, सुग्रीव की ग्रीवा टूट गई, हनुमान् की हनु तोड़कर मार डाला गया, जाम्बवान्, मैन्द, द्विविद, पनस, दरीमुख, कुमुद, अंगद आदि सब मारे गए, ऋक्ष वृक्षों पर चढ़ गए और बहुत-से वानर समुद्र-तट, शैलों और वनों में काट डाले गए। उसने कहा कि इस प्रकार उसकी सेना ने सीता के पति को ससैन्य नष्ट कर दिया, और रक्त से भीगा, धूल से सना यह मस्तक प्रमाण-रूप लाया गया है। फिर उसने विद्युज्जिह्व को बुलाकर वह प्रियदर्शन मस्तक सीता के सामने रखवाया और कहा कि यह दीन स्त्री अपने पति की अन्तिम दशा भली प्रकार देख ले। मस्तक रखते ही विद्युज्जिह्व अन्तर्धान हो गया। रावण ने वह तेजस्वी धनुष भी भूमि पर डालते हुए कहा कि यह तीनों लोकों में विख्यात राम का धनुष है, जिसे प्रहस्त उस मानव को रात्रि में मारकर ले आया; और सीता से कहा कि अब वह उसके वश में हो जाए।

सार: सुवेल-शिविर से व्याकुल रावण ने मायावी विद्युज्जिह्व से राम का मिथ्या कटा सिर और धनुष रचवाकर सीता के सम्मुख रखा, और राम की झूठी मृत्यु-कथा सुनाकर उन्हें वश में आने को कहा।

सीता का विलाप, और रावण का युद्ध-आयोजन

सीता वाटिका में राम के मायावी कटे सिर और धनुष के पास विलाप करती हुई, चारों ओर राक्षसियां।

वह मस्तक और उत्तम धनुष देखकर, हनुमान् द्वारा बताए सुग्रीव-राम सम्पर्क का स्मरण करके, पति-सदृश मुख, नेत्र, केश, और शुभ चूड़ामणि, इन सब चिह्नों से पहचानकर सीता अत्यन्त दुखी हो उठीं और कुररी-सी क्रन्दन करती कैकेयी को कोसने लगीं कि वह कलहशील कैकेयी सकाम हो जाए, कुल का नन्दन मारा गया, समस्त कुल उजड़ गया। काँपती हुई वह तपस्विनी बाला कटे केले-सी भूमि पर गिर पड़ीं। मुहूर्त भर में चेतना पाकर, मस्तक के समीप बैठकर वह आयतलोचना विलाप करने लगीं, हाय, मैं हत हो गई, हे वीरव्रत महाबाहो, मैं विधवा हो गई। उन्होंने कहा कि स्त्री से पहले पति की मृत्यु वैगुण्य कही जाती है; सुवृत्त होकर वह उनके सामने ही चल बसे। नीतिशास्त्र के ज्ञाता, व्यसनों के निवारण में कुशल होकर भी अदृष्ट मृत्यु को कैसे प्राप्त हुए, यही काल समस्त भूतों का प्रभव और अन्त है।

सीता ने पाणिग्रहण के समय की गई “साथ धर्माचरण करूँगा” की प्रतिज्ञा का स्मरण कराते हुए कहा कि उन्हें भी उसी लोक में ले चलें; उनका सुन्दर गात्र अब क्रव्याद (मांसभक्षी) खींच रहे होंगे, अग्निहोत्र संस्कार से भी वंचित रह जाएँगे, और कौसल्या तीनों में से केवल लक्ष्मण को लौटा देखेंगी। उन्होंने रावण से कहा कि वह उसे शीघ्र राम के ऊपर रखकर मार डाले, पति को पत्नी से मिला दे, सिर से सिर और काय से काय जोड़ दे, वह महात्मा पति की गति का अनुगमन करेगी। इसी प्रकार दुख से सन्तप्त वह आयतलोचना विलाप करती रहीं।

इसी बीच एक द्वारपाल राक्षस हाथ जोड़े रावण के पास आया और “जय हो आर्यपुत्र” कहकर निवेदन किया कि सेनापति प्रहस्त समस्त मन्त्रियों सहित उपस्थित हैं और दर्शन के अभिलाषी हैं। यह सुनकर रावण अशोकवाटिका छोड़कर मन्त्रियों के पास गया। मन्त्रियों से अपना कार्य भली प्रकार सोचकर, राम के पराक्रम को जानकर, सभा में प्रवेश करके उसने राम के विरुद्ध कार्य का निश्चय किया। रावण के निकलते ही वह मायामय मस्तक और धनुष अन्तर्धान हो गए। भीमविक्रम मन्त्रियों के संग मन्त्रणा करके रावण ने काल-सदृश वचन में सेनाध्यक्षों से कहा कि भेरी-घोष से शीघ्र सेनाएँ एकत्र की जाएँ, पर कारण न बताया जाए। “तथास्तु” कहकर दूतों ने तुरन्त महान् सेना जुटा ली और युद्ध-इच्छुक स्वामी से उसके एकत्र होने का निवेदन किया।

सार: मस्तक-धनुष पहचानकर सीता ने मर्मभेदी विलाप किया और पति के संग मृत्यु माँगी; इसी बीच प्रहस्त के आगमन की सूचना पर रावण माया समेटकर मन्त्रणा-सभा गया और गुप्त रूप से सेना एकत्र कराने लगा।

सरमा का सीता को आश्वासन

एक स्त्री उपवन में आंसू पोंछती सीता को सांत्वना देती हुई, दूर पहाड़ी पर लंका नगरी।

सीता को मोहित (भ्रमित) देखकर सरमा नामक राक्षसी, जो सीता की प्रेमिणी सखी थी, उनके पास आई। (टीकाकारों के अनुसार सरमा विभीषण की पत्नी है और सीता के प्रति श्रद्धावती।) रावण की आज्ञा से रक्षा करती, अनुकम्पावती और दृढ़व्रत वह सरमा सीता की मित्र बन गई थी। धूल में लोटकर उठी, अश्वा-सी मलिन, अचेत-सी सीता को देखकर मृदुभाषिणी सरमा ने सखी-स्नेह से उन्हें आश्वस्त किया, “हे वैदेही, धैर्य धरें, मन में व्यथा न हो। रावण ने जो कहा और आपने जो उत्तर दिया, वह सब मैंने सखी-स्नेह से, निर्जन झाड़ी में छिपकर, रावण का भय छोड़कर सुन लिया। मुझे रावण से भय नहीं।

सरमा ने कहा कि आत्मज्ञानी राम को सोते में मारना सम्भव नहीं, न ही उस पुरुष-व्याघ्र की मृत्यु सम्भव है; वृक्षों से लड़ने वाले वानर भी नहीं मारे जा सकते, क्योंकि वे राम से वैसे ही रक्षित हैं जैसे देव इन्द्र से। उसने कहा कि उसने लक्ष्मण-सहित राम को देखा है, दीर्घ-वृत्त भुजाओं, विशाल वक्ष, प्रतापवान्, धर्मात्मा, अचिन्त्य-बल राम मारे नहीं गए। क्रूर, मायाबली, सर्वभूत-विरोधी रावण ने सीता पर यह माया रची; पर वस्तुतः सौभाग्य उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। राम वानर-सेना सहित समुद्र पार करके दक्षिण तट पर डेरा डाले हैं, और राक्षसों द्वारा ही यह सूचना लाई गई कि राघव समुद्र पार कर आए हैं; इसी पर रावण मन्त्रियों से मन्त्रणा कर रहा है।

तभी सरमा ने युद्ध की तैयारी में जुटी सेना का भैरव शब्द सुना। मधुरभाषिणी सरमा ने सीता से कहा कि यह सन्नाह-जननी (युद्ध की तैयारी सूचित करने वाली) भेरी बज रही है; घण्टों का निर्घोष, रथों की रड़, हिनहिनाते घोड़ों और तूर्यों का स्वर सुनें। मदोन्मत्त हाथी सजाए जा रहे, रथों में घोड़े जोते जा रहे, सहस्रों प्रास-धारी अश्वारोही दिख रहे हैं; राजमार्ग अद्भुत-दर्शन सेनाओं से, शस्त्र-चर्म-वर्म की बहुरंगी प्रभा से भर रहे हैं। उसने कहा कि शोकघ्नी श्री सीता को भजती है और राक्षसों पर भय आ पहुँचा है; कमलपत्र-नेत्र, जितक्रोध, अचिन्त्य-पराक्रम राम समर में रावण को मारकर सीता को पुनः प्राप्त करेंगे, जैसे इन्द्र ने दैत्यों को जीता। लक्ष्मण-सहित राम राक्षसों पर वैसे ही विक्रम दिखाएँगे जैसे विष्णु-सहित इन्द्र ने शत्रुओं पर। उसने कहा कि शत्रु के मारे जाने पर वह सिद्धार्थ सीता को राम की गोद में देखेगी; राम बहुत महीनों से धारण की उनकी एक वेणी शीघ्र खोलेंगे, और सीता पूर्णचन्द्र-सा राम-मुख देखकर शोक-जल त्याग देंगी, जैसे नागिन निर्मोक (केंचुली)। अन्त में सरमा ने सीता को मेरु की परिक्रमा करते सूर्यदेव की शरण लेने को कहा, जो समस्त प्रजा के सुख-दुख के प्रभव हैं।

सार: विभीषण-पत्नी सरमा ने सीता को आश्वस्त किया कि वह मस्तक रावण की माया थी, राम जीवित और अजेय हैं, और युद्ध-तैयारी की भेरियाँ सीता के सौभाग्य तथा राक्षसों के भय का संकेत हैं।

रावण का निश्चय, जो सरमा सीता को बताती है

इस प्रकार सरमा ने रावण के वचन से सन्तप्त सीता को जलते भूमि को वर्षा-जल-सी सींचकर हर्षित किया। फिर सखी का हित चाहती, कालज्ञा, मुसकाकर बोलने वाली सरमा ने समय पर कहा कि वह चाहे तो राम के पास जाकर सीता का सन्देश और कुशल बताकर, प्रच्छन्न-रूप में लौट सकती है, आकाश में बिना आधार उड़ती उसकी गति का अनुगमन वायु या गरुड़ भी नहीं कर सकते। पूर्व-शोक से ग्रस्त सीता ने मधुर, स्निग्ध वाणी में उत्तर दिया कि सरमा आकाश और रसातल तक जाने में समर्थ है, इसलिए वह यह जानना चाहती हैं कि रावण इस समय क्या कर रहा है, मेरे छुटकारे या बन्धन के विषय में जो निश्चय हुआ हो, वह सब बता दे, यही उन पर महान् अनुग्रह होगा। उन्होंने कहा कि मायाबली, क्रूर रावण ने उन्हें मद्यपान-सा मोहित कर दिया है; घोर राक्षसियों से उन्हें सदा भयभीत और तर्जित कराया जाता है, और अशोकवाटिका में रहकर भी वह उद्विग्न और शंकित रहती हैं।

बाष्प-विह्वल सीता का मुख पोंछती सरमा बोली कि यदि यही अभिप्राय है तो वह जाकर शत्रु का मन्तव्य जान आती है। यह कहकर वह रावण के समीप गई और सीता को मुक्त करने या बन्दी रखने सम्बन्धी रावण और उसके मन्त्रियों की वार्ता सुन आई। उस दुरात्मा का निश्चय जानकर वह शीघ्र शुभ अशोकवाटिका लौटी, जहाँ पद्म-रहित लक्ष्मी-सी सीता उसी की प्रतीक्षा कर रही थीं। प्रियभाषिणी सरमा को लौटा देख सीता ने उसे स्नेह से आलिंगन किया, अपना आसन दिया और कहा कि यहाँ सुख से बैठकर उस दुरात्मा रावण का निश्चय यथातथ्य बताए।

काँपती सीता के पूछने पर सरमा ने रावण-मन्त्रणा सब कही, कि रावण की माता कैकसी और एक अति-स्नेही वृद्ध मन्त्री ने उसे सीता-त्याग का दीर्घ उपदेश दिया कि मनुजेन्द्र राम को सत्कारपूर्वक सीता लौटा दी जाए; जनस्थान का अद्भुत कर्म और हनुमान् द्वारा समुद्र-लंघन, सीता-दर्शन और राक्षस-वध ही पर्याप्त नेत्र-उद्घाटन है, कौन मानव ऐसा कर सकता है। पर वृद्ध मन्त्रियों और माता के बहुत समझाने पर भी रावण कृपण के धन-त्याग की भाँति सीता को छोड़ने को तैयार नहीं; उसका निश्चय है कि वह युद्ध में मरकर ही सीता को छोड़ेगा, उससे पहले नहीं। सरमा ने कहा कि यह दृढ़ बुद्धि मृत्यु-लोभ से उपस्थित हुई है; जब तक समस्त राक्षसों और स्वयं के वध से वह समर में परास्त नहीं होता, भय से भी सीता को नहीं छोड़ेगा, राम तीखे बाणों से रावण का वध करके सीता को अयोध्या ले जाएँगे। इसी बीच भेरी-शंख से व्याप्त, धरती कँपाता समस्त वानर-सेनाओं का शब्द सुनाई पड़ा। उसे सुनकर लंका में उपस्थित रावण के भृत्य हतौजस् और दैन्यग्रस्त हो गए, और राजा के दोष से उन्हें कोई कल्याण नहीं दिखा।

सार: सीता की प्रेरणा पर सरमा ने मन्त्रणा सुनकर बताया कि माता और वृद्ध मन्त्री के समझाने पर भी रावण मरते दम तक सीता-त्याग को तैयार नहीं; उसी क्षण वानर-सेना के भैरव नाद ने राक्षसों को हतोत्साह कर दिया।

माल्यवान् का सन्धि-परामर्श

Rama's vast host advances on Lanka amid thunder of conches and war-drums while Ravana pauses, brooding, before his ministers.

शंख-मिश्रित भेरी-घोष से गूँजते उस नाद के संग महाबाहु, परपुरंजय राम लंका की ओर बढ़ चले। उस घोष को सुनकर राक्षसेश्वर रावण मुहूर्त भर ध्यान में स्थित होकर मन्त्रियों की ओर देखने लगा। फिर समस्त सचिवों को सम्बोधित करके, सभा गुँजाते हुए, किसी की निन्दा न करते हुए उसने कहा कि राम का समुद्र-तरण, पराक्रम, बल और पौरुष जो उन्होंने बताया, वह सब उसने सुना; और जानता है कि वे सब युद्ध में सत्य-पराक्रमी हैं जो राम का पराक्रम जानकर मौन, एक-दूसरे को देख रहे हैं।

एक वृद्ध श्वेतदाढ़ी मंत्री सिंहासन पर बैठे बहुभुजी दस सिर वाले रावण को समझाते हुए।

तब रावण के मातामह, अति-महाप्राज्ञ माल्यवान् नामक राक्षस ने उसके वचन सुनकर कहा कि जो राजा चौदह विद्याओं में निष्णात और नीति-अनुगामी होता है, वह चिरकाल ऐश्वर्य भोगता और शत्रुओं को वश में रखता है; समय अनुसार सन्धि करता या विग्रह करता, अपने पक्ष की वृद्धि करता राजा महान् ऐश्वर्य पाता है। हीन या समबल राजा को सन्धि करनी चाहिए; शत्रु की अवहेलना न करे, और ज्येष्ठ (अधिक बलवान्) हो तो ही विग्रह करे। उसने कहा कि उसे राम से सन्धि रुचती है, जिसके लिए राम ने आक्रमण किया है, वह सीता राम को लौटा दी जाए; देवर्षि और गन्धर्व सब राम की जय चाहते हैं, अतः उससे विरोध न करे।

माल्यवान् ने धर्म-अधर्म का सिद्धान्त समझाया, कि ब्रह्मा ने सुरों और असुरों के दो पक्ष रचे, जिनके आश्रय क्रमशः धर्म और अधर्म हैं; धर्म महात्मा अमरों का पक्ष है और अधर्म राक्षसों-असुरों का। सत्ययुग में धर्म अधर्म को ग्रसता है और कलियुग में अधर्म धर्म को। उसने कहा कि लोकों में विचरते हुए रावण ने महान् धर्म का हनन और अधर्म का ग्रहण किया, इसी से धर्म-आश्रयी शत्रु प्रबल हैं; प्रमाद से बढ़ा अधर्म-रूपी अहि अब उन्हें ही ग्रस रहा है, जबकि देवों द्वारा आचरित धर्म देव-पुत्र वानरों के रूप में सुर-पक्ष को बढ़ा रहा है।

उसने कहा कि विषयों में आसक्त, मनमाना करने वाले रावण ने अग्नि-कल्प ऋषियों को महान् उद्वेग पहुँचाया; तपस्या से भावितात्मा वे ऋषि प्रदीप्त अग्नि-से दुर्धर्ष हैं, मुख्य यज्ञों से यजन, विधिवत् अग्नि में हवन और उच्च स्वर में वेदपाठ करके वे राक्षसों को अभिभूत करते हैं, और उनका ब्रह्मघोष सुनकर राक्षस उष्ण-ऋतु के मेघों-से दिशाओं में बिखर जाते हैं; उनके अग्निहोत्र का धूम दसों दिशाओं में फैलकर राक्षसों का तेज हर लेता है। उसने रावण को स्मरण कराया कि उसने देव-दानव-यक्षों से अभय का वर तो माँगा, पर मनुष्य, वानर, ऋक्ष और गोलांगूल, जो दृढ़विक्रम और महाबली हैं, यहाँ आकर गरज रहे हैं।

माल्यवान् ने कहा कि उसने अनेक घोर उत्पात देखे हैं जिनसे समस्त राक्षसों का विनाश दिखता है, कर्कश गर्जन करते भयंकर मेघ लंका पर उष्ण रक्त बरसा रहे; रोते वाहनों की आँखों से अश्रु गिर रहे; धूल से मलिन दिशाएँ कान्तिहीन हैं; मांसभक्षी, शृगाल और गृध्र भैरव चीत्कार करते उद्यानों में जुट रहे; काली-दन्त-पीली स्त्रियाँ स्वप्न में घरों को लूटकर अट्टहास करती हैं; कुत्ते देव-बलि खा जाते, गायों से गधे और नकुलों से चूहे जनमते; बिल्ली-तेन्दुआ, सूकर-कुत्ता, किन्नर-राक्षस-मनुष्य परस्पर मिल जाते; काल-प्रेरित श्वेत-रक्तपाद कपोत राक्षसों के विनाश का संकेत देते उड़ते; गृहों में बैठी सारिकाएँ कलह-कारी पक्षियों से पराजित होकर गिरतीं; पशु-पक्षी सूर्य की ओर रोते; और करालमुख, मुण्ड, कृष्ण-पिंगल काल-पुरुष बार-बार सबके गृहों को निहारता है।

अन्त में माल्यवान् ने कहा कि वे राम को मनुष्य-रूप धारी विष्णु मानते हैं; जिसने समुद्र पर वह परम अद्भुत सेतु बाँधा, वह दृढ़विक्रम राघव केवल मनुष्य नहीं हो सकता; अतः मनुजेन्द्र राम से सन्धि की जाए और भविष्य के लिए हितकर कार्य परिपक्व विचार से किया जाए। यह हितकर वचन कहकर, रावण के मन को परखकर, वह बली माल्यवान् रावण को देखता हुआ मौन हो गया।

सार: मातामह माल्यवान् ने नीति, धर्म-अधर्म और लंका के घोर अपशकुनों का हवाला देकर रावण को राम से सन्धि और सीता-त्याग का परामर्श दिया, और राम को मनुष्य-रूप विष्णु बताकर मौन हो गया।

रावण का माल्यवान्-अवमान और द्वारों की रक्षा-व्यवस्था

काल के वश में आए दुरात्मा दशानन रावण माल्यवान् के हितकर वचन को सह न सका। मुख पर भृकुटि चढ़ाए, क्रोध से नेत्र घुमाते हुए वह बोला कि माल्यवान् हित-बुद्धि से शत्रु-पक्ष में जाकर जो कठोर वचन कह रहा है, वह उसके कानों में नहीं समाते। उसने पूछा कि माल्यवान् किस आधार पर पिता द्वारा त्यागे, वानरों के आश्रित, वन में शरण लिए दीन-मानव राम को बलवान् और सर्वविक्रमों से युक्त, देवों के लिए भी भयंकर मुझ राक्षसेश्वर को हीन मानता है। उसने आशंका जताई कि या तो वीर-द्वेष से, या शत्रु के पक्षपात से, या शत्रु द्वारा उकसाए जाने पर ही उसे ऐसे कठोर वचन कहे गए; अन्यथा कौन शास्त्र-तत्त्वज्ञ पण्डित बिना उकसावे के किसी प्रभुसम्पन्न पदस्थ को कठोर वचन कहता है।

रावण ने कहा कि वन से लाई गई सीता, जो पद्म-रहित लक्ष्मी-सी है, उसे वह राम के भय से क्यों लौटाए। उसने कहा कि कुछ ही दिनों में सुग्रीव-लक्ष्मण सहित राम को कोटि वानरों के बीच उसके द्वारा मारा गया देखें; जिसके सम्मुख देवता भी समर में नहीं ठहरते, वह रावण युद्ध में किससे भय करेगा। उसने अपना स्वभाव बताया कि वह टूट भले जाए पर किसी के आगे झुकेगा नहीं, यह उसकी सहज दुरतिक्रम प्रकृति है। उसने कहा कि यदि राम ने यदृच्छा से समुद्र पर सेतु बाँध भी लिया तो इसमें ऐसा क्या आश्चर्य कि माल्यवान् भयभीत हो; वह सत्य प्रतिज्ञा करता है कि वानर-सेना सहित समुद्र पार आया राम जीवित नहीं लौटेगा।

बहुभुजी दस सिर वाला रावण शस्त्र थामे चबूतरे पर खड़ा, चारों ओर मुकुटधारी राक्षस सेनापति।

रावण को युद्ध के लिए उद्यत और रुष्ट जानकर लज्जित माल्यवान् ने कोई उत्तर न दिया; यथोचित जय-आशीष से राजा को बधाकर, अनुमति पाकर वह अपने निवास लौट गया। फिर रावण ने सचिवों के संग मन्त्रणा और विमर्श करके लंका की रक्षा की व्यवस्था की। उसने पूर्व-द्वार पर राक्षस प्रहस्त को, दक्षिण-द्वार पर महावीर्य महापार्श्व और महोदर को, पश्चिम-द्वार पर अनेक राक्षसों से घिरे महामायावी पुत्र इन्द्रजित् को, और उत्तर-द्वार पर शुक तथा सारण को नियुक्त किया, यह कहते हुए कि वह स्वयं भी वहाँ जाएगा। मध्यम गुल्म (केन्द्रीय मोर्चे) पर उसने महावीर्य-पराक्रम विरूपाक्ष को अनेक राक्षसों के संग बिठाया। इस प्रकार लंका में व्यवस्था करके, काल-प्रेरित वह राक्षस-पुंगव स्वयं को कृतकृत्य-सा मानने लगा। नगर की पुष्कल रक्षा-व्यवस्था का आदेश देकर उसने सचिवों को विदा किया और मन्त्रिगण की जय-आशीष से पूजित होकर अपने समृद्ध, विशाल अन्तःपुर में प्रवेश किया।

सार: रावण ने माल्यवान् के परामर्श को ठुकराकर अपने अहंकारी स्वभाव की घोषणा की, और प्रहस्त-महापार्श्व-महोदर-इन्द्रजित्-शुक-सारण-विरूपाक्ष को द्वारों और केन्द्र पर नियुक्त करके अन्तःपुर लौट गया।

विभीषण द्वारा द्वार-व्यवस्था की सूचना और राम का व्यूह-आदेश

शत्रु-प्रदेश में पहुँचकर एकत्र हुए नरराज राम और कपिराज सुग्रीव, वायुसुत हनुमान्, ऋक्षराज जाम्बवान्, राक्षस विभीषण, वालिपुत्र अंगद, सौमित्रि लक्ष्मण, शरभ, बान्धवों सहित सुषेण, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, कुमुद, नल और पनस, सब परस्पर मन्त्रणा करने लगे। विभीषण ने कहा कि सामने रावण-पालित वह लंकापुरी दिखती है, जो असुर-नाग-गन्धर्व-अमरों के लिए भी दुर्जय है और जहाँ राक्षसेश्वर रावण सदा उपस्थित रहता है; अतः कार्य-सिद्धि को आगे रखकर निर्णय-सहित मन्त्रणा की जाए।

राम-प्रिय करने की इच्छा से कमलपत्र-नेत्र राम से विभीषण ने अग्राम्य, सार्थक वचन कहा कि उसके चार मन्त्री, अनल, पनस, सम्पाति और प्रमति, पक्षी-रूप धारण करके लंका में घुसे और रावण की रक्षा-व्यवस्था अपनी आँखों देखकर लौटे हैं। उसने यथातथ्य बताया कि पूर्व-द्वार पर सेना-सहित प्रहस्त, दक्षिण-द्वार पर महावीर्य महापार्श्व और महोदर, पश्चिम-द्वार पर पट्टिश-असि-धनुष-शूल-मुद्गर धारी अनेक राक्षसों से घिरा रावण-पुत्र इन्द्रजित्, और उत्तर-द्वार पर शस्त्र-धारी सहस्रों राक्षसों के संग अति-संविग्न, मन्त्रज्ञ रावण स्वयं स्थित है। मध्यम गुल्म पर शूल-खड्ग-धनुष धारी बड़े बल और राक्षसों के संग विरूपाक्ष है।

विभीषण ने सेना-संख्या बताई, दस सहस्र हाथी, दस सहस्र रथ, बीस सहस्र घोड़े और एक कोटि से अधिक राक्षस-पदाति; ये निशाचर विक्रान्त, बलवान्, समर में क्रूर और रावण-प्रिय हैं, और इनमें से प्रत्येक नायक के पीछे दस-दस लाख का परिवार खड़ा है। उसने कहा कि इस सूचना से राम को न तो दैन्य करना है और न क्रोध, वह केवल राम को उत्साहित कर रहा है, क्योंकि राम तो वीर्य से देवों को भी निग्रह करने में समर्थ हैं; अतः रावण की भाँति वानर-अनीक को व्यूह में सजाकर राम चतुरंग सेना से घिरे रावण को मथ डालेंगे। उसने राम को यह भी स्मरण कराया कि जब रावण ने कुबेर से युद्ध किया था, तब साठ लाख राक्षस उसके संग निकले थे, जो पराक्रम, वीर्य, तेज और सत्त्व में दुरात्मा रावण के दर्प से ही उसके समान थे।

विभीषण के यह कहने पर राघव ने शत्रुओं के प्रतिघात (आक्रमण) हेतु आदेश दिया कि लंका के पूर्व-द्वार पर वानर-पुंगव नील अनेक वानरों के संग प्रहस्त से लड़े; दक्षिण-द्वार पर वालिपुत्र अंगद बड़ी सेना के संग महापार्श्व और महोदर को रोके-खदेड़े; पश्चिम-द्वार को अप्रमेयात्मा हनुमान् अनेक कपियों के संग निष्पीड़ित करके प्रवेश करें; और स्वयं राम महातेजा लक्ष्मण के संग उत्तर-द्वार पर, जहाँ ससैन्य रावण है, दबाव डालकर प्रवेश करेंगे, क्योंकि वह उस नीच राक्षसेन्द्र के वध पर ही उद्यत हैं। उन्होंने महाबली सुग्रीव, वीर्यवान् जाम्बवान् और राक्षसेन्द्रानुज विभीषण को मध्यम गुल्म पर स्थित रहने को कहा।

राम ने एक संकेत-नियम भी ठहराया कि वानर युद्ध में मनुष्य-रूप कदापि धारण न करें; इस युद्ध में वानर-रूप ही स्वजन की पहचान का चिह्न होगा, और केवल वे सात, स्वयं राम, महौजस् लक्ष्मण, तथा अपने चार मन्त्रियों सहित पाँचवें सखा विभीषण, मनुष्य-रूप में शत्रुओं से लड़ेंगे। इस प्रकार कार्य-सिद्धि हेतु विभीषण से कहकर, सुवेल पर्वत के अति-रमणीय तट को देखकर, मतिमान् प्रभु राम ने सुवेल पर चढ़ने का निश्चय किया; और अपनी महान् सेना से समस्त भूमि को ढककर, शत्रु-वध का संकल्प लेकर प्रहृष्ट-रूप वह महात्मा लंका की ओर बढ़ चले।

सार: गुप्तचर-मन्त्रियों की सूचना पर विभीषण ने रावण की द्वार-रक्षा और सेना-संख्या बताई; राम ने नील-अंगद-हनुमान् को द्वारों पर, स्वयं को रावण-द्वार पर नियुक्त किया, वानर-रूप का संकेत-नियम बनाया, और सुवेल चढ़ने को बढ़े।

सुवेल पर आरोहण और लंका का अवलोकन

सुवेल पर चढ़ने का निश्चय करके, लक्ष्मण से अनुगत राम ने धर्मज्ञ, अनुरक्त, मन्त्रज्ञ और विधिज्ञ निशाचर विभीषण तथा सुग्रीव से कोमल, उत्तम स्वर में कहा कि वे सब सैकड़ों धातुओं से चित्रित इस शैलेन्द्र सुवेल पर चढ़ें और यह रात्रि वहीं बिताएँ; वहाँ से वे रावण का निलय लंका देख सकेंगे, वही रावण जिसने दुर्बुद्धि से उनकी भार्या का अपने मरणान्त के लिए हरण किया। उन्होंने कहा कि उस राक्षसाधम का नाम लेते ही उन्हें रोष होता है, जिसने न धर्म जाना, न वृत्त, न कुल, और नीच बुद्धि से यह गर्हित कर्म किया; उसी नीच के अपराध से वह समस्त राक्षसों का वध देखेंगे। उन्होंने कहा कि काल-पाश में बँधा एक व्यक्ति पाप करता है, पर उसके दुराचरण से समूचा कुल नष्ट हो जाता है।

इस प्रकार रावण के प्रति सक्रोध मन्त्रणा करते हुए राम चित्र-सानु (विचित्र शिखर वाले) सुवेल पर निवास हेतु चढ़े। समाहित, सशर चाप उठाए, विक्रम-रत लक्ष्मण पीछे-पीछे चले। उनके पीछे सामन्त-मन्त्रियों और विभीषण सहित सुग्रीव, हनुमान्, अंगद, नील, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, पनस, कुमुद, हर, यूथप रंभ, जाम्बवान्, सुषेण, महामति ऋषभ, महातेजा दुर्मुख और वानर शतबलि, ये तथा अन्य अनेक शीघ्रगामी, वायुवेग-प्रवण, गिरिचारी वानर सैकड़ों की संख्या में सुवेल पर चढ़े। थोड़े ही समय में सब ओर से पर्वत पर चढ़कर उन्होंने शिखर से आकाश में मानो लटकी हुई वह पुरी देखी। हरि-यूथपों ने श्रेष्ठ द्वारों, उत्तम प्राकार से शोभित, राक्षसों से भरी शुभ लंका देखी, और प्राकार पर पंक्तिबद्ध नील राक्षसों से बनी मानो एक दूसरी दीवार भी देखी।

युद्ध-इच्छुक राक्षसों को देखकर समस्त वानरों ने राम के देखते-देखते विविध नाद किए। तभी संध्या से रँगा सूर्य अस्त हो गया और पूर्णचन्द्र से प्रदीप्त रात्रि आ गई। विभीषण द्वारा हर्षपूर्वक अभिनन्दित और सत्कृत, लक्ष्मण-सहित, यूथप-समूह से युक्त राम सुवेल-पृष्ठ पर यथासुख निवास करने लगे।

सार: राम लक्ष्मण-विभीषण-सुग्रीव और सैकड़ों वानर-नायकों के संग सुवेल पर चढ़े, वहाँ से राक्षसों से भरी लंका देखी, युद्ध-इच्छुक राक्षसों पर नाद किया, और पूर्णचन्द्र-रात्रि शिखर पर बिताई।

वानरों का उपवन-प्रवेश और राम का लंका-दर्शन

राम और लक्ष्मण चट्टानी शिखर से हनुमान तथा एक वानर संग दूर बसी लंका नगरी निहारते हुए।

सुवेल पर वह रात्रि बिताकर वीर वानर-नायकों ने लंका के वन-उपवन निहारे, जो समतल, सौम्य, रमणीय, विशाल और दृष्टि-रमणीय थे, देखकर वे विस्मित हो उठे। चम्पक, अशोक, बकुल, साल और ताल से भरी, तमाल-वनों से ढकी, नागकेसर-पंक्तियों से घिरी लंका सब ओर अमरावती-सी सुशोभित थी, सुपुष्पित हिन्ताल, अर्जुन, नीप और सप्तपर्ण, तथा पुष्प-शिखर वाले, लताओं से लिपटे, विचित्र कुसुमों से युक्त और रक्त-कोमल पल्लवों से ढके तिलक, कर्णिकार और पाटल से सजी। वहाँ के अगम (अचल वृक्ष) सुगन्धित, अति-रमणीय फूल-फल वैसे ही धारण करते थे जैसे मनुष्य आभूषण।

चैत्ररथ-सा और नन्दन-सा वह प्रधान वन, सर्व-ऋतु में रमणीय और षट्पदों (भौंरों) से युक्त, दात्यूह, कोयष्टि, बक और नाचते मयूरों से सुशोभित था; निर्झरों से भरे उस वन में कोकिल-कूजन गूँजता था। नित्य-मत्त पक्षियों से युक्त, भौंरों से आचरित, कोयल-आकुल वृक्ष-खण्डों वाले, भृंगराज-गीत और कुररी-स्वर से गूँजते उन वन-उपवनों में इच्छारूपी हृष्ट-प्रमुदित वीर वानरों ने प्रवेश किया; पुष्प-सम्पर्क से सुरभित, घ्राण-सुखद अनिल बहने लगा। सुग्रीव की अनुमति से अन्य यूथप पताका-सजी लंका की ओर बढ़े, पक्षियों को त्रास देते, मृग-हाथियों को विह्वल करते, अपने नादों से लंका को कँपाते, महावेग से धरती को रौंदते; उनके चरण-घात से उठी धूल सहसा ऊपर तक छा गई। उस शब्द से त्रस्त ऋक्ष, सिंह, महिष, हाथी, मृग और पक्षी दसों दिशाओं में भागे।

त्रिकूट का एक प्रांशु (ऊँचा), आकाश-स्पर्शी शिखर था, सब ओर पुष्पों से ढका, चाँदी-सा चमकता, सौ योजन विस्तृत, निर्मल, चारु-दर्शन, चिकना, श्रीमान् और विशाल, पक्षियों के लिए भी दुष्प्राप्य और मन से भी दुरारोह; उसी शिखर पर रावण-पालित लंका बसी थी। दस योजन चौड़ी और बीस योजन लम्बी वह पुरी ऊँचे, श्वेत-मेघ-से गोपुरों और स्वर्ण-रजत प्राकारों से शोभित थी; प्रासादों और विमानों (सात-मंजिले भवनों) से अति-भूषित लंका मध्यम वैष्णव पद (आकाश) को घेरे मेघों-सी दिखती थी। वहाँ सहस्र स्तम्भों से सजा एक प्रासाद कैलास-शिखर-सा आकाश को छूता-सा दिखता था, राक्षसेन्द्र का वह चैत्य, जो सौ कवचधारी राक्षसों से सदा रक्षित और पुर का भूषण था।

लक्ष्मण के अग्रज, श्रीमान्, लक्ष्मीवान् राम ने वानरों के संग रावण की वह समृद्ध, समृद्धार्था स्वर्ण-पुरी देखी, मनोज्ञ, धातु-चित्रित पर्वतों और उद्यानों से शोभित, नाना पक्षियों से गूँजती, नाना मृगों से सेवित, नाना कुसुमों से सम्पन्न और नाना राक्षसों से बसी। महान् गृहों से सम्बाधित (भरी), त्रिदिव-सी उस नगरी को देखकर वीर्यवान् राम विस्मय को प्राप्त हुए। अपनी महान् सेना के संग उन्होंने वह रत्न-पूर्ण, बहु-संविधान वाली, प्रासाद-मालाओं से अलंकृत, महायन्त्र-कपाटों से युक्त मुख्य-द्वार वाली पुरी का अवलोकन किया।

समझने की कुंजी (स्थान): लंका त्रिकूट पर्वत के एक आकाश-स्पर्शी शिखर पर बसी कही गई है। पाठ में इसके माप दो जगह भिन्न हैं, यहाँ दस योजन चौड़ी, बीस योजन लम्बी, और अन्यत्र सौ योजन चौड़ी, तीस योजन लम्बी। टीकाकार इसे यों मिलाते हैं कि यहाँ का माप केवल “लंका-प्रमुख” (रावण-निवास वाले भीतरी नगर) का है, समूचे विस्तार का नहीं।

सार: वानरों ने सुवेल से उतरकर लंका के पुष्पित वन-उपवनों में हर्ष से प्रवेश किया और कुछ नगरी की ओर बढ़े; राम ने त्रिकूट-शिखर पर बसी, स्वर्ण-रजत प्राकारों और सहस्र-स्तम्भ प्रासाद वाली समृद्ध लंका को विस्मय से निहारा।

सुवेल-शिखर से रावण-दर्शन, और सुग्रीव का द्वन्द्व

राम धनुष संभाले लंका के द्वार पर छत्र तले बैठे रावण को देखते, संग लक्ष्मण और वानर।

तब सुग्रीव और वानर-यूथों सहित राम सुवेल के दो योजन परिमण्डल वाले अग्र-शिखर पर चढ़े। मुहूर्त भर वहीं ठहरकर, दसों दिशाएँ निहारते हुए, विश्वकर्मा द्वारा त्रिकूट के रमणीय शिखर पर रची, रम्य-कानन से शोभित सुन्यस्त लंका देखी। उन्होंने गोपुर-शृंग पर बैठे दुरासद राक्षसेन्द्र रावण को देखा, जो दोनों ओर श्वेत चामरों से बीजित (पंखा झला जाता), विजय-छत्र से शोभित, रक्तचन्दन से लिप्त, रत्न-आभूषणों से भूषित, नील-मेघ-सा, स्वर्ण-वस्त्र में, ऐरावत के दन्ताग्रों से बने व्रणचिह्न वक्ष पर धारण किए, शश-रक्त-वर्ण रक्त-वस्त्र से ढका, और संध्या-आतप से छाई मेघमाला-सा आकाश में दिख रहा था।

वानर-नायकों और स्वयं राघव के देखते-देखते, राक्षसेन्द्र को देखते ही सुग्रीव सहसा उठ खड़े हुए। क्रोध-वेग, सत्त्व और बल से युक्त वे पर्वताग्र से उठकर गोपुर-स्थल पर कूद पड़े। मुहूर्त भर ठहरकर, निर्भय अन्तरात्मा से रावण को देखकर, उस राक्षस को तृण-समान तुच्छ मानकर सुग्रीव ने कठोर वचन कहा, “हे राक्षस, मैं लोकनाथ राम का सखा और दास हूँ; उस पृथ्वीन्द्र के तेज से आज आप मेरे थप्पड़ों से न छूटेंगे।” यह कहकर वह सहसा उछलकर रावण के ऊपर कूद पड़े और उसका विचित्र मुकुट खींचकर भूमि पर गिरा दिया।

द्रुत गति से आते सुग्रीव को देखकर निशाचर रावण बोला कि जब तक आप मेरी दृष्टि से ओझल थे तब तक ही आपकी सुन्दर ग्रीवा थी; अब मेरी दृष्टि में आकर आप ग्रीवा-हीन हो जाएँगे। यह कहकर रावण उठा और भुजाओं से सुग्रीव को पकड़कर भूमि पर पटक दिया; पर गेंद-सा उछलकर सुग्रीव ने भी रावण को भुजाओं से उठाकर भूमि पर दे मारा। दोनों के गात्र पहले परस्पर दबने से स्वेद से भीगे, फिर तीखे नखों से खुँचकर रक्त से लाल हुए, और परस्पर लिपटे निश्चेष्ट खड़े वे शाल्मली और किंशुक के परस्पर लगे वृक्षों-से दिखे। महाबली वे राक्षसेन्द्र और कपिराज थप्पड़ों, मुक्कों, अरत्नि-घात और कराग्र-घातों से असह्य द्वन्द्व करने लगे।

वानरराज सुग्रीव लंका के शिखर पर झपटकर रावण के मुकुट छीनते हुए, नीचे नगर और समुद्र।

गोपुर-वेदी के मध्य चिरकाल तक भिड़कर, एक-दूसरे की देह को बार-बार उछालते-दबाते, उग्रवेग वे दोनों पाद-क्रम से गोपुर-वेदी पर ही लग गए। परस्पर पीड़ित, लिपटी देहों वाले वे प्राकार और परिखा (खाई) के बीच जा गिरे, फिर मुहूर्त भर हाँफते हुए पुनः चरणों पर उठ खड़े हुए। परस्पर आलिंगन करते, संरम्भ, शिक्षा और बल से युक्त, वे भुजा-रूपी रज्जुओं से एक-दूसरे को बाँधते, युद्ध-मार्गों से चतुराई से चलने लगे, मानो दो बिल्लियाँ भक्ष्य के लिए, या नवदन्त शार्दूल-सिंह, या गजेन्द्र के दो बच्चे भिड़े हों। भुजाओं से परस्पर संहत-संवृद्ध होकर दोनों एक साथ धरा पर गिरे, फिर उठकर एक-दूसरे को ललकारते युद्ध-मार्ग में संचरण करने लगे; पर थके नहीं। हाथी-सूँड-सी श्रेष्ठ भुजाओं से एक-दूसरे को रोकते, मतवाले गजों-से वे चिरकाल भिड़कर, परस्पर की पकड़ से बचने को मण्डल-मार्ग में शीघ्रता से घूमने लगे।

परस्पर पहुँचकर, एक-दूसरे के वध को उद्यत वे भक्ष्य के लिए बिल्लियों-से बार-बार गुर्राते रुके। युद्ध-मार्ग में निपुण कपिराज और रावण विचित्र मण्डल, विविध स्थान और गोमूत्रिका-सी टेढ़ी, गत-प्रत्यागत, तिरछी और वक्र गतियाँ रचते, प्रहारों से बचते, परिधावन, अभिद्रवण, आप्लाव, सविग्रह अवस्थान, परावृत्त-अपावृत्त, अपद्रुत-अवप्लुत, ऐसे अनेक युद्ध-दाँव परस्पर खेलने लगे। इसी बीच वानराधिप सुग्रीव ने जाना कि वह राक्षस अब अपना माया-बल आरम्भ करने वाला है; तब जितक्लम (थकान जीते), जय-कान्ति वाले सुग्रीव आकाश में उछल पड़े, और कपिराज द्वारा वंचित रावण वहीं खड़ा रह गया।

संग्राम-कीर्ति प्राप्त, अर्क-सूनु (सूर्य-पुत्र), हरिगण-नाथ सुग्रीव निशाचरपति को श्रम में डालकर अति-विशाल आकाश लाँघते हुए वानर-बल के मध्य राम के पार्श्व में आ पहुँचे। वह कर्म करके, वायु-गति वाले, सम्प्रहृष्ट वे हरीन्द्र वानर-सेना में प्रविष्ट हुए, रघुवर नृप-सूनु राम के युद्ध-हर्ष को बढ़ाते और तरु-मृग-गण-मुख्यों से पूजित होते हुए।

सार: सुवेल-शिखर से राम ने गोपुर पर सज्जित रावण को देखा; क्रोध में सुग्रीव अकस्मात् कूदकर उसका मुकुट गिरा बैठे, चिरकाल मल्ल-युद्ध करके रावण को श्रम में डाला, और माया-प्रयोग से पहले ही उछलकर विजयी होकर राम के पास लौट आए।

सुग्रीव के साहस पर श्रीराम का परामर्श और लंका का घेरा

सुग्रीव के शरीर पर संघर्ष के चिह्न देखकर लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीराम ने उन्हें गाढ़ आलिंगन में भरा और कहा: हे वीर, हमसे विधिवत परामर्श किए बिना ही आपने यह साहसपूर्ण कार्य कर डाला। राजा लोग ऐसे साहस नहीं करते। हे साहसप्रिय वीर, हमें, इस सेना को और यहाँ खड़े विभीषण को संकट में डालकर आपने यह कष्टकारी दुस्साहस किया। हे शत्रुदमन, अब फिर ऐसा कार्य कभी न कीजिए। यदि आपको कुछ हो जाता, तो हे महाबाहो, हमें न सीता से प्रयोजन रहता, न भरत-लक्ष्मण-शत्रुघ्न से, और न अपने प्राणों से ही। हे महेन्द्र और वरुण के समान वीर, आपका पराक्रम जानते हुए भी हमने यह निश्चय कर रखा था कि आपके लौटने से पूर्व ही, रावण को सपुत्र-सबल-सवाहन मारकर, विभीषण को लंका में और भरत को अयोध्या के सिंहासन पर बैठाकर हम अपना शरीर त्याग देंगे।

इस प्रकार कहते श्रीराम से सुग्रीव ने उत्तर दिया: हे राघव, अपनी भार्या के हरने वाले रावण को देखकर और अपना पराक्रम जानते हुए हम कैसे सह जाते? तब अपने इस वचन को नम्रता से स्वीकार करने वाले वीर सुग्रीव की सराहना करके श्रीराम ने लक्ष्मीसम्पन्न लक्ष्मण से कहा: हे लक्ष्मण, स्वच्छ जल और फलयुक्त वनों से युक्त किसी स्थान पर रहकर, इस सेना-समूह को विभाजित कर, व्यूह रचकर हम सावधान रहें। हमें एक भीषण भय उपस्थित दीख रहा है, जो लोक का संहार और भालू-वानर-राक्षसों के श्रेष्ठ वीरों का विनाश सूचित करता है।

श्रीराम ने उत्पात गिनाए: हवाएँ कठोर बह रही हैं, पृथ्वी काँप रही है, पर्वत-शिखर हिल रहे हैं और दिग्गज चिग्घाड़ रहे हैं। माँसभक्षी जन्तुओं-से कठोर स्वर वाले क्रूर मेघ रक्त की बूँदों से मिली हुई वर्षा कर रहे हैं। रक्तचन्दन-सी अति-दारुण सन्ध्या दीख रही है, और सूर्य से यह जलती आग की राशि गिर रही है। दीन और घोर स्वर वाले पशु-पक्षी सूर्य की ओर मुँह करके महान भय उत्पन्न करते हुए चिल्ला रहे हैं। रात में भी कान्तिहीन चन्द्रमा प्रलयकाल-सा ताप दे रहा है और काले-लाल मण्डल से घिरा है। हे लक्ष्मण, सूर्यमण्डल में छोटा, नीरस, अशुभ और रक्तवर्ण परिवेश तथा एक नील चिह्न दीख रहा है; तारे ठीक से नहीं दिखते। यह सब जगत के युगान्त-सा प्रतीत होता है। कौवे, श्येन और गीध नीचे गिर रहे हैं, और सियारिनें अशुभ वाणी बोल रही हैं। ऐसा जान पड़ता है कि वानरों-राक्षसों के फेंके शैल, शूल और खड्गों से ढकी यह भूमि माँस-रक्त के कीचड़ से सन जाएगी। अतः हे लक्ष्मण, सब ओर से वानरों से घिरे होकर हम आज ही शीघ्र, रावण से रक्षित उस दुर्धर्ष लंकापुरी की ओर वेग से बढ़ें।

इस प्रकार कहकर महाबली श्रीराम शीघ्र उस पर्वत-शिखर से उतरे और अपनी, शत्रुओं के लिए दुर्जय सेना का निरीक्षण किया। काल को जानने वाले राघव ने सुग्रीव के साथ कपिराज की उस महती सेना को सन्नद्ध कर, युद्ध के लिए शुभ मुहूर्त में आगे बढ़ने की आज्ञा दी। बड़ी सेना से घिरे, धनुर्धारी श्रीराम लंका की ओर मुख करके आगे चले। उस समय विभीषण, सुग्रीव, हनुमान, ऋक्षराज जाम्बवान, नल, नील और लक्ष्मण उनके पीछे-पीछे चले। पीछे से भालू-वानरों की विशाल सेना महान भूमि को ढककर राघव के पीछे आई। हाथी-समान बलवान वानरों ने सैकड़ों पर्वत-शिखर और बड़े-बड़े वृक्ष हाथों में उठा लिए।

थोड़े ही समय में वे शत्रुदमन भाई राम-लक्ष्मण रावण की उस रमणीय लंका के पास पहुँचे, जो पताकाओं की पंक्तियों से सजी, उद्यान-वनों से शोभित, अद्भुत प्राचीर से घिरी, ऊँचे परकोटों और तोरणों वाली और अत्यन्त दुष्प्राप्य थी। देवताओं के लिए भी दुर्धर्ष उस नगरी को, श्रीराम की आज्ञा से प्रेरित होकर, अपने-अपने स्थान पर डटे रहकर वानरों ने घेर लिया। धनुर्धारी श्रीराम ने अनुज लक्ष्मण समेत पर्वत-शिखर-सी ऊँची लंका के उत्तर द्वार को रोका और घेरने वाली सेना की रक्षा भी की। जहाँ स्वयं रावण स्थित था, उस उत्तर द्वार के पास पहुँचकर दशरथनन्दन श्रीराम ने डेरा डाला; उस भीषण द्वार की रक्षा श्रीराम के अतिरिक्त और कोई नहीं कर सकता था, जो वरुण से रक्षित समुद्र-सा था और चारों ओर आयुधधारी राक्षसों से घिरा था।

समझने की कुंजी (अवधारणा): श्रीराम यहाँ केवल वीर ही नहीं, नीतिज्ञ सेनापति भी हैं। पहले वे सुग्रीव को राजधर्म याद दिलाते हैं (राजा अकेले साहस न करे), फिर उत्पात-शकुनों के आधार पर सेना को व्यूह में बाँटते हैं। वाल्मीकि के युद्ध-वर्णन में यह “नीति पहले, युद्ध बाद में” का क्रम बार-बार मिलता है।

वानर सेना शिलाएं और वृक्ष उठाए लंका की श्वेत प्राचीरों पर चढ़कर स्वर्ण द्वार पर धावा बोलती हुई।

पूर्व द्वार पर वानर-सेनापति नील, मैन्द और द्विविद के साथ खड़े हुए। महाबली अंगद ने ऋषभ, गवाक्ष, गज और गवय के साथ दक्षिण द्वार घेरा। प्रमाथी और प्रघस आदि वीरों के साथ बलवान हनुमान ने पश्चिम द्वार रोका। गरुड़ और पवन-से वेगवान सब वानरश्रेष्ठों के साथ स्वयं सुग्रीव उत्तर और पश्चिम के बीच के मध्यम गुल्म (चौकी) पर स्थित हुए। उस चौकी के राक्षसों को दबाकर छत्तीस करोड़ प्रसिद्ध सेनापति वानर वहीं डट गए जहाँ सुग्रीव थे। श्रीराम की आज्ञा से विभीषण सहित लक्ष्मण ने प्रत्येक द्वार पर आवश्यकतानुसार करोड़ों वानर नियुक्त किए। जाम्बवान के साथ सुषेण विशाल सेना लेकर श्रीराम के पीछे, उनसे थोड़ी दूर, मध्यम चौकी पर खड़े हुए। वृक्ष और शिखर लिए, बाघ-से दाढ़ों वाले वे वानरश्रेष्ठ हर्षित होकर युद्ध की प्रतीक्षा करने लगे।

उन सबकी पूँछें क्रोध से उठी हुई थीं, सबके दाँत और नख ही आयुध थे, सबके नेत्र विकृत और रक्त से सने थे, और सबके मुख क्रोध से विकृत थे। कुछ वानर दस हाथियों के बल वाले थे, कुछ उनसे दस गुना बलवान, और कुछ सहस्र हाथियों के समान पराक्रमी। कुछ ओघबल वाले थे, कुछ उनसे सौ गुना, और कुछ अप्रमेय बल वाले। टिड्डी-दल-सी उन वानर-सेनाओं का वह संगम अद्भुत और विचित्र था। लंका की ओर उछलते वानरों से आकाश मानो भर गया, और परकोटों के नीचे डटे वानरों से लंका के चारों ओर की भूमि ढक गई। एक-एक लाख की सौ सेनाएँ लंका के द्वारों पर पहुँचीं और अन्य चारों ओर युद्ध को बढ़ीं।

समझने की कुंजी (संख्या): “ओघ” वाल्मीकि-गणना की एक विशाल इकाई है (एक करोड़ हाथियों से कहीं ऊपर की संख्या); “अक्षौहिणी” युद्ध-सेना का एक पूर्ण विभाग है (रथ, गज, अश्व, पदाति का निश्चित अनुपात)। यहाँ “सौ अक्षौहिणी” का अर्थ है असंख्य अपार सेना। ये संख्याएँ अतिशयोक्ति-अलंकार हैं, सटीक गणना नहीं; प्रयोजन है सेना की अकल्पनीय विशालता दिखाना।

मेघ-वर्ण और इन्द्र-तुल्य पराक्रमी वानरों से सहसा घिरकर राक्षस विस्मित हुए। समुद्र के तट तोड़ने पर उठने वाले जलघोष-से उस वानर-सेना के बढ़ते स्रोत से त्रिकूट पर्वत पर महान शब्द उठा। उस महाशब्द से प्राचीरों, तोरणों, शैलों और वनों समेत समूची लंका काँप उठी। श्रीराम और लक्ष्मण से रक्षित तथा सुग्रीव से संचालित वह वानर-सेना समस्त सुर-असुरों के लिए भी अत्यन्त दुर्धर्ष हो गई।

सार: श्रीराम सुग्रीव को राजधर्म की सीख देते हैं, अपशकुन पढ़कर सेना को व्यूह में बाँटते हैं, और चारों द्वारों पर सेनापति नियुक्त कर लंका को घेर लेते हैं। नील पूर्व, अंगद दक्षिण, हनुमान पश्चिम और स्वयं श्रीराम-लक्ष्मण उत्तर द्वार सँभालते हैं। अपार वानर-सेना के घेरे से समूची लंका थर्रा उठती है।

अंगद का दूत बनकर रावण के पास जाना

इस प्रकार राक्षसों के वध के लिए अपनी सेना का व्यूह रचकर, मन्त्रियों के साथ बार-बार विचार और निश्चय करके, राजधर्म का स्मरण करते हुए, क्रमयोग (साम-दान-भेद-दण्ड के क्रम) के तत्त्व को जानने वाले श्रीराम ने विभीषण की सम्मति से वालिपुत्र अंगद को बुलाकर कहा: हे सौम्य कपि, आप लंकापुरी को लाँघकर, भय त्यागकर, निर्व्यथ होकर दशग्रीव रावण के पास जाइए और हमारी ओर से उस श्रीभ्रष्ट, ऐश्वर्यहीन और मरने को उद्यत होकर बुद्धि खो बैठे रावण से यह कहिए:

“रे राक्षस, मोह और घमण्ड में पड़कर आपने ऋषियों, देवताओं, गन्धर्वों, अप्सराओं, नागों, यक्षों और मनुष्य-राजाओं के विरुद्ध जो पाप किए हैं, उन पापों का दुष्प्राप्य प्रतिफल का काल अब आ पहुँचा है। निश्चय ही ब्रह्मा के वरदान से उपजा आपका वह घमण्ड चूर हो चुका है। हे राक्षस, अपनी भार्या के हरण से दुर्बल हुए हम, दण्डधारी होकर, आपके दण्डदाता बनकर लंका के द्वार पर डटे हैं। हे राक्षस, युद्ध में स्थिर रहकर और लड़ते-लड़ते प्राण त्यागकर आप देवताओं, महर्षियों और राजर्षियों की गति पाएँगे। रे राक्षसाधम, छल से, माया से जिस बल से आपने सीता को हरा, वह बल अब दिखाइए। यदि आप मिथिलापति-कन्या को लेकर शरण न आएँगे, तो मैं तीक्ष्ण बाणों से इस लोक को राक्षस-रहित कर दूँगा।

“धर्मात्मा राक्षसश्रेष्ठ विभीषण हमारे साथ यहाँ आ पहुँचे हैं; निश्चय ही वे श्रीमान बिना काँटे का यह लंका-ऐश्वर्य प्राप्त करेंगे। मूर्खों को सहायक बनाने वाले, अनात्मज्ञ पापी आप अधर्म से क्षणभर भी राज्य नहीं भोग सकते। हे राक्षस, धैर्य और शौर्य धरकर हमसे युद्ध कीजिए; मेरे बाणों से रण में शान्त (मृत) होकर आप पवित्र हो जाएँगे। हे निशाचर, पक्षी बनकर तीनों लोकों में भी घुस जाएँ, तब भी मेरी दृष्टि के मार्ग में आकर आप जीवित न लौटेंगे। मैं आपसे हितकर वचन कहता हूँ: अपने ही हाथों अपनी और्ध्वदैहिक क्रिया कर लीजिए, क्योंकि आपका श्राद्ध करने को लोक में कोई राक्षस न बचेगा; और लंका को भलीभाँति देख लीजिए, क्योंकि आपका जीवन अब मुझ पर निर्भर है।”

इस प्रकार कहे जाने पर अग्नि-समान तेजस्वी तारापुत्र अंगद आकाश में उछलकर लंका की ओर चले। क्षणभर में रावण-भवन को लाँघकर अंगद ने मन्त्रियों के साथ निश्चिन्त बैठे रावण को देखा। उससे थोड़ी दूर पर सोने के बाजूबन्द पहने, दीप्त अग्नि-समान वानरश्रेष्ठ अंगद उतरे और खड़े हो गए। अपना परिचय देकर उन्होंने श्रीराम का वह सम्पूर्ण उत्तम सन्देश, बिना घटाए-बढ़ाए, मन्त्रियों समेत रावण को सुना दिया।

दूत बने अंगद रावण की स्वर्ण सभा में हाथ उठाकर दस सिर वाले राक्षसराज को ललकारते हुए।

अंगद बोले: मैं कोसलराज अक्लिष्टकर्मा श्रीराम का दूत हूँ, नाम अंगद, वालि का पुत्र; न जाने मेरा नाम कभी आपके कानों तक पहुँचा हो। कौसल्या-आनन्दवर्धन राघव श्रीराम आपसे कहते हैं: रे नृशंस, पुरुष बनिए और बाहर निकलकर हमसे युद्ध कीजिए। मैं आपको मन्त्रियों, पुत्रों, ज्ञातियों और बान्धवों समेत मार डालूँगा; आपके मारे जाने पर तीनों लोक निर्भय हो जाएँगे। देव-दानव-यक्ष-गन्धर्व-नाग-राक्षसों के शत्रु और ऋषियों के काँटे-रूप आपको मैं आज उखाड़ फेंकूँगा। आपके मारे जाने पर विभीषण को ऐश्वर्य मिलेगा, जब तक आप सीता को आदरपूर्वक प्रणाम करके मुझे न लौटा दें।

इस प्रकार वानरश्रेष्ठ अंगद के कठोर वचन कहते ही निशाचरगणों का स्वामी रावण क्रोध के वश हो गया। रोष में आकर उसने बार-बार मन्त्रियों को आदेश दिया: इस दुर्बुद्धि वानर को पकड़कर मार डालो। रावण के वचन सुनकर चार घोर राक्षसों ने दीप्त अग्नि-से तेजस्वी अंगद को पकड़ लिया। राक्षसगण के सामने अपना बल दिखाने के लिए धीर वीर तारापुत्र अंगद ने स्वयं अपने को पकड़वा लिया। दोनों भुजाओं से चिपके पक्षी-से उन चार राक्षसों को लेकर अंगद पर्वत-से ऊँचे प्रासाद की छत पर कूद पड़े। उनके कूदने के वेग से झटका खाकर वे चारों राक्षस रावण के देखते-देखते भूमि पर गिर पड़े।

एक पराक्रमी वानर लंका के स्वर्ण गुम्बद को चूर करता हुआ, राक्षस योद्धा नीचे गिरते हुए।

तब प्रतापी वालिपुत्र अंगद ने रावण के पर्वत-शिखर-से ऊँचे प्रासाद-शिखर पर पैर रखा, और वह शिखर रावण के देखते-देखते वैसे फट गया जैसे प्राचीन काल में वज्र से हिमालय का शिखर फटा था। प्रासाद-शिखर तोड़कर, अपना नाम सुनाकर, महानाद करके अंगद आकाश में उछल गए, और समस्त राक्षसों को व्यथित तथा वानरों को हर्षित करते हुए वानरों के बीच श्रीराम के पास लौट आए। रावण अपने प्रासाद-धर्षण से परम क्रुद्ध हुआ, और अपना विनाश देखकर लम्बी साँसें लेने लगा।

उधर अनेक हर्षित-गर्जते वानरों से घिरे, शत्रु-वध के इच्छुक श्रीराम युद्ध के लिए आगे बढ़े। पर्वत-शिखर-से महावीर्य वानर सुषेण कामरूपी वानरों से घिरे लंका के पास खड़े हुए। सुग्रीव की आज्ञा से दुर्धर्ष वानर (हनुमान) चारों द्वार सँभालते हुए ऐसे विचरने लगे जैसे चन्द्रमा नक्षत्रों के बीच। लंका को घेरे, समुद्र तक फैली सौ अक्षौहिणी वानर-सेना देखकर कुछ राक्षस विस्मित हुए, कुछ भयभीत, और कुछ युद्ध के हर्ष में पड़े। परकोटे और खाई के बीच का सारा स्थान वानरों से भर गया; दीन राक्षसों ने प्राचीर को मानो वानरमय बना देखा। महाभीषण कोलाहल उठने पर भयभीत राक्षस महायुद्ध करने को युगान्त-वायु-से दौड़ पड़े।

समझने की कुंजी (अवधारणा): “क्रमयोग” का अर्थ है साम (समझाना), दान (देना), भेद (फूट डालना) और दण्ड (बल-प्रयोग) इन चार उपायों का क्रमिक प्रयोग। श्रीराम अंगद को दूत भेजना दण्ड से पहले की अन्तिम चेतावनी है। राजनीति के अनुसार युद्ध सर्वथा अन्तिम उपाय है; अंगद का सन्देश इसी नीति का पालन है।

सार: श्रीराम अन्तिम चेतावनी देने अंगद को दूत बनाकर रावण के पास भेजते हैं। अंगद कठोर सन्देश सुनाते हैं; रावण उन्हें पकड़वाना चाहता है, पर अंगद चार राक्षसों को लेकर प्रासाद-शिखर तोड़ देते हैं और सकुशल लौट आते हैं। दोनों ओर युद्ध की तैयारी पूर्ण हो जाती है।

रावण की मन्त्रणा और प्रथम संग्राम का आरम्भ

तब वे राक्षस रावण-भवन में जाकर बोले कि श्रीराम के साथ वानरों ने नगरी घेर ली है। नगरी का घिरना सुनकर क्रुद्ध निशाचर रावण ने रक्षा का प्रबन्ध दुगुना करके प्रासाद पर चढ़कर देखा कि शैल-वन-कानन समेत लंका को युद्ध के इच्छुक असंख्य वानरगणों ने सब ओर से घेर रखा है। वानरों से भूरी हुई भूमि देखकर वह सोचने लगा कि इनका संहार कैसे हो। बहुत देर सोचकर, धैर्य धरकर, बड़ी आँखों वाले रावण ने राघव और वानर-सेना को देखा।

उधर हर्षित श्रीराम सेना समेत आगे बढ़े और सब ओर राक्षसों से रक्षित लंका को देखा। चित्र-ध्वज-पताकाओं वाली लंका देखकर दशरथनन्दन श्रीराम का चित्त सहसा सीता की ओर गया और शोक से संतप्त होकर उन्होंने सोचा: यहीं वह मृगशावक-नयना जनककुमारी मेरे ही कारण शोक से संतप्त, कृश और भूमि पर शयन करती हुई दुःख भोग रही है। राक्षसियों से पीड़ित वैदेही का बार-बार चिन्तन करते हुए धर्मात्मा श्रीराम ने वानरों को शीघ्र शत्रु-वध की आज्ञा दी।

श्रीराम की आज्ञा होते ही वानर एक-दूसरे से बढ़कर आगे जाने को संघर्ष करते हुए सिंहनाद से लंका को गुँजा उठे। सबने यह संकल्प किया कि हम इस लंका को पर्वत-शिखरों से या केवल मुट्ठियों से ही कुचल देंगे। गिरि-शिखर और बड़ी-बड़ी चट्टानें उठाकर तथा भाँति-भाँति के वृक्ष उखाड़कर वानर-यूथपति तैयार खड़े हुए। रावण के देखते-देखते वानर-सेनाएँ भाग-भाग में लंका के परकोटों पर चढ़ने लगीं। ताम्र-मुख, स्वर्ण-कान्ति, राम के लिए प्राण त्यागने को उद्यत वानर साल-वृक्षों और पर्वत-शिखरों को आयुध बनाकर लंका की ओर बढ़े। वृक्षों, पर्वत-चोटियों और मुट्ठियों से उन्होंने असंख्य परकोटों के शिखर और तोरण ढहा दिए। स्वच्छ जल वाली खाइयों को बालू, पर्वत-चोटियों, घास और काठ से वानर पाटने लगे।

“राम जयवन्त हों, महाबली लक्ष्मण जयवन्त हों, राघव से रक्षित राजा सुग्रीव जयवन्त हों।” ऐसा घोष करते कामरूपी वानर गर्जते हुए लंका के परकोटों की ओर दौड़े। सोने के तोरणों को तोड़ते, कैलास-शिखर-से गोपुरों को ढहाते, उछलते-कूदते-गर्जते वे महागज-से वानर लंका की ओर बढ़े। उत्तर-पूर्व कोण में स्थित होकर दस करोड़ विजयाभिलाषी वानरों से घिरे बलवान कुमुद ने पूर्व द्वार घेरा; उनकी सहायता को प्रघस और महाबाहु पनस उनके पास खड़े हुए। दक्षिण-पूर्व में स्थित होकर बीस करोड़ वानरों समेत वीर शतबली ने दक्षिण द्वार घेरा। दक्षिण-पश्चिम में स्थित होकर तारा के पिता बलवान सुषेण ने करोड़ों वानरों के साथ पश्चिम द्वार रोका। उत्तर-पश्चिम में स्थित होकर लक्ष्मण समेत श्रीराम और कपीश्वर सुग्रीव ने उत्तर द्वार घेरा।

Gavaksha with a crore of langurs, Jambavan's bears, and mace-bearing armoured Vibhishana muster around Rama for the assault.

महाकाय और भीमदर्शन गोलांगूल गवाक्ष करोड़ वानरों समेत श्रीराम के पास खड़े हुए; भीमकोप भालुओं के एक करोड़ समेत जाम्बवान का भाई धूम्र, शत्रुनिबर्हण, श्रीराम के पास खड़ा हुआ। गदाधारी विभीषण कवच पहने अपने सावधान मन्त्रियों समेत वहाँ खड़े हुए जहाँ श्रीराम थे। गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन सब ओर दौड़ते हुए वानर-सेना की रक्षा करने लगे।

तब क्रोध से भरे राक्षसेश्वर रावण ने सब सेनाओं के शीघ्र प्रयाण की आज्ञा दी। यह आज्ञा सुनते ही राक्षसों ने सहसा भीषण घोष किया। सोने की छड़ियों से पीटे जाने पर चन्द्र-से श्वेत मुख वाले राक्षसों के नगाड़े सब ओर बज उठे। घोर राक्षसों के मुख की वायु से भरकर लाखों शंख महाघोष करने लगे। उज्ज्वल नील अंगों और रत्नों से सजे, शंखधारी राक्षस बिजली के कवच और बगुलों की पंक्ति वाले मेघों-से शोभित हुए। रावण से प्रेरित होकर हर्षित राक्षस-सेना प्रलयकाल के मेघों से भरे महासमुद्र की लहरों-सी उमड़ पड़ी।

तब वानर-सेना ने सब ओर ऐसा नाद किया जिससे मलय (त्रिकूट) पर्वत के शिखर और गुफाएँ भर गईं। शंख-दुन्दुभि-घोष, सिंहनाद, हाथियों की चिग्घाड़, घोड़ों की हिनहिनाहट, रथों के नेमि-घोष और राक्षसों के मुख-स्वर ने पृथ्वी, अन्तरिक्ष और समुद्र को गुँजा दिया। तभी राक्षसों और वानरों का घोर संग्राम छिड़ गया, जैसे प्राचीन काल में देव-असुरों का। राक्षस जलती गदाओं, शक्तियों, शूलों और फरसों से अपना पराक्रम बखानते हुए सब वानरों को मारने लगे। महाकाय वानर भी वेग से वृक्षों, पर्वत-शिखरों, नखों और दाँतों से राक्षसों को मारने लगे।

“राजा सुग्रीव जयवन्त हों।” यह महाशब्द उठा; और राक्षस “राजा जयवन्त हो, विजयी हो” कहते हुए अपने-अपने नाम बखानने लगे। प्राचीरों पर खड़े भयानक राक्षस भूमि पर खड़े वानरों को भिन्दिपालों और शूलों से बेधने लगे, और अत्यन्त क्रुद्ध वानर आकाश में उछलकर अपनी भुजाओं से प्राचीरस्थ राक्षसों को खींच गिराने लगे। राक्षसों और वानरों का वह घमासान संग्राम माँस-रक्त के कीचड़ से भर गया और किसी अन्य युद्ध से उसकी उपमा न दी जा सकती थी।

सार: रावण नगरी का घेरा देखकर सेना को बाहर भेजता है। दूसरी ओर सीता का स्मरण कर श्रीराम वानरों को आक्रमण की आज्ञा देते हैं। चारों द्वारों पर वानर-सेनापति डट जाते हैं, और राक्षसों-वानरों का माँस-रक्त के कीचड़ से भरा प्रथम घोर संग्राम छिड़ जाता है।

द्वन्द्व-युद्ध: वीरों का भिड़ना और राक्षस-प्रमुखों का वध

शत्रु-सेना के बल को देखकर लड़ते हुए उन महात्मा वानरों और राक्षसों में अत्यन्त दारुण बल-रोष उमड़ पड़ा। सोने के साज वाले अग्निशिखा-से घोड़ों, हाथियों, सूर्य-से दीप्त रथों और मनोहर कवचों पर सवार भयानककर्मा राक्षस-वीर रावण की विजय चाहते हुए दसों दिशाएँ गुँजाते निकले। राम की विजय चाहती वानरों की विशाल सेना भी उस घोरकर्मा राक्षस-सेना पर टूट पड़ी। तब एक-दूसरे पर झपटते राक्षसों और वानरों का द्वन्द्व-युद्ध छिड़ गया।

रावण-पुत्र इन्द्रजित ने वालिपुत्र अंगद से वैसे युद्ध किया जैसे अन्धकासुर ने त्र्यम्बक शिव से। नित्य दुर्धर्ष सम्पाति ने प्रजंघ से, और हनुमान ने जम्बुमाली से युद्ध किया। रावण का अनुज विभीषण तीक्ष्ण-वेग शत्रुघ्न (राक्षस) से भिड़ा। महाबली गज ने तपन से और महातेजस्वी नील ने निकुम्भ से युद्ध किया। वानरेन्द्र सुग्रीव प्रघस से और श्रीमान लक्ष्मण विरूपाक्ष से भिड़े। दुर्धर्ष अग्निकेतु, रश्मिकेतु, सुप्तघ्न और यज्ञकोप श्रीराम से जा मिले। वज्रमुष्टि मैन्द से और अशनिप्रभ द्विविद से भिड़ा। वीर प्रतपन नल से, और धर्मपुत्र बलवान सुषेण विद्युन्माली से लड़े। और भी घोर वानर अनेक राक्षसों से एक साथ युद्ध करते हुए द्वन्द्व में उतरे।

Angada wrests Indrajit's mace and smashes his gold-fitted chariot, horses and driver amid the clashing duels.

वहाँ अत्यन्त तुमुल और रोमांचकारी युद्ध हुआ। वानरों-राक्षसों के शरीरों से बहती रुधिर-नदियाँ केश-रूपी सेवार और शव-रूपी काठ बहाने लगीं। क्रुद्ध इन्द्रजित ने शत्रु-सेना को विदीर्ण करने वाले वीर अंगद को वैसे गदा से मारा जैसे इन्द्र वज्र से। तब वेगवान श्रीमान अंगद ने उसी छीनी हुई गदा से इन्द्रजित का स्वर्ण-जटित रथ, घोड़े और सारथि कुचल डाले। तीन बाणों से बिंधे सम्पाति ने प्रजंघ को अश्वकर्ण-वृक्ष से मार डाला। रथ पर बैठे महाबली जम्बुमाली ने रथ की शक्ति से हनुमान की छाती बेधी; तब हनुमान उसी रथ पर चढ़कर एक ही थप्पड़ से राक्षस समेत उसे चूर कर बैठे।

राम बाण चलाते और वानर वीर वृक्ष-शिलाएं लिए लंका की प्राचीर के आगे राक्षस सेना से लड़ते हुए।

गर्जते घोर प्रतपन ने नल पर धावा बोला, पर नल ने तीक्ष्ण बाणों से बिंधते हुए उसकी आँखें फोड़ डालीं। सुग्रीव ने सेनाओं को मानो निगलते प्रघस को सप्तपर्ण-वृक्ष से मारा। लक्ष्मण ने बाण-वर्षा से दबाकर भीमदर्शन विरूपाक्ष को एक ही बाण से गिराया। अग्निकेतु, रश्मिकेतु, सुप्तघ्न और यज्ञकोप ने श्रीराम को बाणों से बेधा, पर परम क्रुद्ध श्रीराम ने अग्निशिखा-से चार घोर बाणों से उन चारों के सिर काट लिए। मैन्द ने मुक्के से वज्रमुष्टि को रथ-घोड़ों समेत गिराया; जैसे देव-मन्दिर गिरे। निकुम्भ ने सूर्य के समान बाणों से नील को बेधा और हँसा, पर नील ने उसी के रथ-पहिए से निकुम्भ और उसके सारथि के सिर काट डाले, जैसे विष्णु असुरों के। द्विविद ने अशनिप्रभ को गिरि-शिखर से मारा; घायल द्विविद ने भी साल-वृक्ष से अशनिप्रभ को रथ-घोड़ों समेत मार गिराया।

रथ पर बैठे विद्युन्माली ने सोने के बाणों से सुषेण को मारा और बार-बार गरजा। सुषेण ने महान पर्वत-शिखर से उसका रथ चूर कर दिया। तब विद्युन्माली रथ से कूदकर गदा हाथ में लिए भूमि पर खड़ा हुआ, और झपटते सुषेण की छाती पर गदा मारी। उस घोर प्रहार की चिन्ता न करके सुषेण ने वही शिला उसकी छाती पर पटक दी; शिला से कुचली छाती वाला विद्युन्माली मरकर भूमि पर गिर पड़ा। इस प्रकार उन शूर वानरों ने उन शूर राक्षसों को द्वन्द्व में वैसे ही कुचल डाला जैसे देवों ने दैत्यों को।

शक्ति, शूल, तोमर, बाण, टूटे रथ, मरे हाथी-घोड़े, चक्र-धुरी-जुएँ और शव-रहित सिर तथा कटे धड़ों से भरी, सियारों से सेवित वह रणभूमि घोर दीखने लगी; मस्तक-रहित धड़ इधर-उधर उछलने लगे। महीने भर के क्रम में सूर्य अस्त हुआ और प्राणहारिणी रात आ पहुँची; रक्त की गन्ध से मतवाले राक्षस फिर वेग से उस घोर निशायुद्ध में जुट गए।

समझने की कुंजी (अवधारणा): वाल्मीकि द्वन्द्व-युद्ध को जोड़ी-जोड़ी (इन्द्रजित, अंगद, हनुमान, जम्बुमाली, नील, निकुम्भ आदि) में वर्णन करते हैं। यह केवल सूची नहीं; यह दिखाता है कि प्रत्येक वानर-वीर का अपना समतुल्य राक्षस-प्रतिद्वन्द्वी है, और युद्ध संगठित द्वन्द्वों में चलता है, अव्यवस्थित भगदड़ में नहीं।

सार: वानर और राक्षस-वीर जोड़ियों में भिड़ते हैं। अंगद इन्द्रजित का रथ चूर करते हैं; हनुमान जम्बुमाली को, नील निकुम्भ को, श्रीराम चार राक्षसों को, और सुषेण विद्युन्माली को मार गिराते हैं। सूर्यास्त के साथ घोर निशायुद्ध आरम्भ होता है।

रात्रि-युद्ध और इन्द्रजित का राम-लक्ष्मण को नागपाश में बाँधना

लड़ते वानरों-राक्षसों के बीच सूर्य अस्त हो गया और प्राणहारिणी रात फैल गई। तब परस्पर बद्धवैर, विजयाभिलाषी वानरों-राक्षसों का घोर निशायुद्ध पूरे वेग से छिड़ गया। उस भयानक अन्धकार में वानर पूछते थे “क्या आप राक्षस हैं?” और राक्षस पूछते थे “क्या आप वानर हैं?” तभी एक-दूसरे पर प्रहार करते थे। “मारो”, “चीर डालो”, “आगे आओ”, “क्यों भागते हो” जैसा तुमुल शब्द उस सेना में सुनाई पड़ता था। सोने के कवच पहने श्याम-वर्ण राक्षस उस अन्धकार में दीप्त औषधि-वनों वाले पर्वतश्रेष्ठों-से दीखते थे।

उस दुष्पार अन्धकार में क्रोधमूर्च्छित महावेग राक्षस वानरों को खाते हुए सब ओर टूट पड़े। भीमकोप वानर भी उछलकर तीक्ष्ण दाँतों से राक्षसों के स्वर्ण-सज्जित घोड़ों और विषधर-से प्रतीत होते ध्वजों को चीरने लगे। बलवान वानरों ने राक्षस-सेना को क्षुब्ध कर डाला; हाथी, हाथीसवार और ध्वज-पताका-युक्त रथ खींचकर दाँतों से फाड़ डाले। श्रीराम और लक्ष्मण ने विषधर-से बाणों से दृश्य-अदृश्य श्रेष्ठ राक्षसों को मारा। घोड़ों के खुरों से उड़ी और रथ-नेमि से उठी धरती की धूल योद्धाओं के कान-नेत्र भरने लगी, और घोर रुधिर-नदियाँ बहने लगीं।

नगाड़ों, मृदंगों, पणवों, शंखों और रथ-नेमियों का अद्भुत शब्द उठा; मरते-कराहते राक्षसों और घायल वानरों का दारुण आर्तनाद भी उठा। शक्ति-शूल-फरसों से घायल वानरश्रेष्ठ और पर्वत-से मरे कामरूपी राक्षसों से वह रणभूमि शस्त्र-पुष्पों की भेंट-सी, रक्त के कीचड़ से दुर्ज्ञेय और दुर्निवेश हो गई। वानरों-राक्षसों का हरण करने वाली वह घोर रात समस्त प्राणियों की कालरात्रि-सी दुरतिक्रम्य हुई।

उस घोर अन्धकार में हर्षित राक्षस बाण-वर्षा से श्रीराम पर ही टूट पड़े। राघव की ओर क्रोध से दौड़ते उनका शब्द प्रलयकाल के सातों समुद्रों के घोष-सा था। एक निमेष में ही श्रीराम ने छह अग्निशिखा-से बाणों से छह प्रमुख राक्षस (यज्ञशत्रु, महापार्श्व, महोदर, महाकाय वज्रदंष्ट्र और शुक-सारण) मार गिराए। बाण-समूहों से मर्मों में बिंधे ये राक्षस युद्ध से हटकर बचे-खुचे प्राण लेकर निकल भागे। निमेष-मात्र में महारथी श्रीराम ने अग्निशिखा-से बाणों से दिशाएँ और उपदिशाएँ उज्ज्वल कर दीं। जो अन्य वीर राक्षस श्रीराम के सामने खड़े थे, वे पतंगों-से आग में जलकर नष्ट हो गए। स्वर्ण-पुंख बाणों के सब ओर गिरने से रात जुगनुओं से चमकती शरद्-रात्रि-सी विचित्र दीखने लगी।

राक्षसों के नादों और नगाड़ों के घोष से वह पहले ही घोर रात और घोरतर हो उठी, और गुफाओं से भरा त्रिकूट पर्वत मानो उत्तर देने लगा। महाकाय गोलांगूल वानर रात-से श्याम राक्षसों को भुजाओं में कसकर भींच डालते और सियार-गीधों को भक्षण के लिए दे देते। शत्रु-वध को उद्यत अंगद ने निमेष-मात्र में अग्निशिखा-से बाणों से रावणि इन्द्रजित, उसके सारथि और घोड़ों को घायल कर दिया। अश्व-सारथिहीन इन्द्रजित रथ छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गया।

वालिपुत्र के उस कर्म की ऋषियों समेत सब देवताओं ने और राम-लक्ष्मण ने सराहना की। इन्द्रजित का युद्ध-प्रभाव सब प्राणी जानते थे, अतः उस महाबली को अंगद से परास्त देखकर सब प्रसन्न हुए। सुग्रीव-विभीषण समेत वानर “साधु-साधु” पुकारकर हर्ष-नाद करने लगे।

उधर अंगद से परास्त इन्द्रजित ने अत्यन्त भीषण क्रोध किया। अंगद से दुर्बल होकर अदृश्य हुआ, ब्रह्मा से वरदान-प्राप्त वह क्रोधमूर्च्छित रावणि अदृश्य रहकर ही बिजली-से तेजस्वी तीक्ष्ण बाण छोड़ने लगा। क्रुद्ध होकर उसने श्रीराम और लक्ष्मण को सर्प-रूपी घोर बाणों से सब अंगों में बेध डाला। माया से ढककर, सब प्राणियों के लिए अदृश्य, छलयोद्धा वह निशाचर राघव-बन्धुओं को मोहित करते हुए शर-बन्धन में बाँधने लगा। उस क्रुद्ध राक्षस के विषधर-से बाणों से सहसा बिंधे उन दोनों वीरों को देखकर वानर व्यथित हुए।

जब इन्द्रजित प्रकट रूप में उन्हें नहीं जीत सका, तब उस दुरात्मा ने माया का प्रयोग करके दोनों राजपुत्रों को बाँध दिया।

समझने की कुंजी (अवधारणा): परम्परा मानती है कि रात में राक्षसों का बल दुगुना हो जाता है (यह इस सर्ग में वाल्मीकि स्वयं संकेत करते हैं)। इसीलिए निशायुद्ध वानरों के लिए कठिन होता है। इन्द्रजित की “माया” यहाँ अदृश्य होकर युद्ध करना है, जो ब्रह्मा के वरदान से सम्भव हुआ; यह छल-युद्ध है, जिसे राक्षसों का स्वभाव कहा गया है।

सार: घोर निशायुद्ध में श्रीराम छह राक्षस-प्रमुखों को मारते हैं और अंगद इन्द्रजित को परास्त कर देते हैं। पर इन्द्रजित अदृश्य होकर, छलपूर्वक, सर्प-रूपी बाणों के जाल में राम और लक्ष्मण दोनों को बाँध देता है।

शरबन्धन में बँधे राघव-बन्धु और वानरों की निराशा

इन्द्रजित का अता-पता खोजने के लिए अत्यन्त बलवान श्रीराम ने दस वानर-सेनापति नियुक्त किए: सुषेण के दो पुत्र, वानराधिप नील, वालिपुत्र अंगद, वेगवान शरभ, द्विविद, महाबली हनुमान, सानुप्रस्थ, ऋषभ और ऋषभस्कन्ध। भीषण वृक्ष उठाकर हर्षित वे सब वानर दसों दिशाएँ खोजते आकाश में उछले। पर अस्त्रविद्या में निपुण इन्द्रजित ने परमास्त्र (ब्रह्म-अस्त्र) से चार्जित अति-वेगवान बाणों से उन वेगवान वानरों का वेग रोक दिया। नाराचों से क्षत-विक्षत वे वानर इन्द्रजित को अन्धकार में वैसे न देख सके जैसे मेघों से ढके सूर्य को।

नागपाश में बंधे राम और लक्ष्मण रक्तरंजित भूमि पर अचेत पड़े, सर्प लिपटे हुए, पीछे लंका।

समर-विजयी इन्द्रजित ने राम और लक्ष्मण के सर्व-देह-भेदक बाण बार-बार उनके शरीर में गाड़ दिए। सर्प-रूपी बाणों से बिंधे दोनों वीर ऐसे लगे कि शरीर में कोई स्थान बाण-रहित न बचा; उनके घावों से बहुत रुधिर बहा और वे पुष्पित किंशुक-वृक्षों-से प्रकाशित हुए। तब रक्त-नेत्रों वाले, भिन्न अंजनराशि-से इन्द्रजित ने अदृश्य रहकर दोनों भाइयों से कहा: युद्ध करता हुआ मैं अनालक्ष्य हूँ; मुझे इन्द्र भी न देख सकता है, न मेरे पास आ सकता है, फिर आप दोनों की क्या बात! रोष से भरे हुए मैं आप दोनों को, जो बाण-जाल में बँधे हैं, यमलोक भेजे देता हूँ।

ऐसा कहकर तीक्ष्ण बाणों से धर्मज्ञ दोनों भाइयों को बेधकर इन्द्रजित हर्षित होकर गरजा। भिन्न-अंजन-से श्याम उसने अपना विशाल धनुष खींचकर फिर घोर बाण छोड़े, और मर्मों में बाण गाड़ता बार-बार गरजने लगा। निमेष-मात्र में बाण-बन्धन में बँधे वे दोनों ऊपर तक न देख सके। सर्व-अंग बिंधे, बाण-शल्यों से भरे, वे दोनों राजपुत्र इन्द्र-ध्वज की रस्सी कटने पर हिलते-से काँपने लगे। मर्म-भेद से दुर्बल वे दोनों महाधनुर्धर राजपुत्र धरती पर गिर पड़े।

वीर-शय्या पर रुधिर से सने, सर्व-अंग बाणों से ढके वे दोनों वीर अत्यन्त पीड़ित हुए। उनके अँगुलि-भर भी शरीर में कोई स्थान अबिद्ध न रहा, अँगुलियों के अग्रभाग तक कोई अंग अनाहत न बचा। उस कामरूपी क्रूर राक्षस से बिंधे वे दोनों राजपुत्र दो झरनों-से रुधिर बहाने लगे। पहले श्रीराम मर्मों में बिंधकर गिरे, उसी इन्द्रजित से, जिसने प्राचीन काल में इन्द्र को जीता था। तब लक्ष्मण ने बाण-फेंक की दूरी पर गिरे पुरुषर्षभ श्रीराम को देखकर अपने जीवन से ही निराशा कर ली। कमलनयन, शरणागत-वत्सल, रणतोषी अपने भ्राता को भूमि पर पड़ा देखकर लक्ष्मण शोक करने लगे।

नागपाश में बंधे अचेत राम-लक्ष्मण के चारों ओर रोते वानर, एक मुकुटधारी पुरुष शोकाकुल वानर को सांत्वना देता।

वानर भी उन्हें देखकर परम संताप को प्राप्त हुए और शोकातुर होकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से घोर रुदन करने लगे। हनुमान-प्रमुख वे वानर नागपाश में बँधे, वीर-शय्या पर सोए दोनों राजपुत्रों को घेरकर खड़े हो गए और परम विषाद को प्राप्त हुए।

एक उप-कथा: वाल्मीकि “इन्द्रजित” नाम का मूल यहाँ संकेत करते हैं: यह वही रावण-पुत्र है जिसने प्राचीन काल में देवराज इन्द्र को रण में परास्त किया था, इसी से उसका नाम “इन्द्रजित” (इन्द्र को जीतने वाला) पड़ा। उसका असली नाम मेघनाद था; इन्द्र-विजय के बाद यह उपाधि-नाम प्रसिद्ध हुआ। इसी के बल पर वह स्वयं इन्द्र से भी अदृश्य रहकर युद्ध करने का दावा करता है।

सार: अदृश्य इन्द्रजित अनेक प्रकार के तीक्ष्ण बाणों से राम-लक्ष्मण को क्षत-विक्षत कर वीर-शय्या पर गिरा देता है। दोनों भाई रुधिर से सने, बाण-जाल में बँधे, निश्चेष्ट पड़ जाते हैं। वानर शोक से विह्वल होकर उन्हें घेरकर खड़े रह जाते हैं।

विभीषण का सुग्रीव को आश्वासन और इन्द्रजित का विजयी लौटना

तब आकाश और पृथ्वी को देखते वानरों ने बाणों से ढके दोनों भाई राम-लक्ष्मण को देखा। देवराज इन्द्र की भाँति अपना कार्य पूरा करके इन्द्रजित लौट गया, और सुग्रीव समेत विभीषण उस स्थान पर आए। नील, द्विविद, मैन्द, सुषेण, कुमुद और अंगद हनुमान के साथ राघव-बन्धुओं के लिए शोक करने लगे, जो निश्चेष्ट, मन्द-श्वास, रुधिर से सने, बाण-जाल में बिंधे शर-शय्या पर पड़े थे। दो साँपों-से साँस लेते, मन्द-चेष्ट, स्वर्ण-ध्वजों-से रुधिर में डूबे, अश्रुपूर्ण नेत्रों वाले अपने सेनापतियों से घिरे उन दोनों वीरों को देखकर विभीषण समेत सब वानर व्यथित हुए।

आकाश और सब दिशाएँ देखते वानर इन्द्रजित को न देख सके, क्योंकि वह माया से ढका था। पर अपनी माया-दृष्टि से विभीषण ने अपने भतीजे इन्द्रजित को, जो वरदान से अन्तर्हित, तेज-यश-विक्रम से युक्त था, सामने खड़ा देख लिया। अपने कर्म को देखकर परम प्रसन्न इन्द्रजित ने सब राक्षसों को हर्षित करते हुए घोषणा की: दूषण और खर के वधकर्ता वे महाबली राम-लक्ष्मण मेरे बाणों से गिरा दिए गए हैं; अब इन्हें सब देव-असुर-ऋषिगण मिलकर भी इस बाण-बन्धन से नहीं छुड़ा सकते। जिसके कारण मेरे शोकातुर पिता रात भर शय्या तक नहीं छू पाते, और जिसके कारण समूची लंका वर्षा-नदी-सी व्याकुल रहती है, उस मूल-नाशक अनर्थ को मैंने शान्त कर दिया। राम, लक्ष्मण और सब वानरों के पराक्रम शरद् के मेघों-से निष्फल हो गए।

इस प्रकार कहकर इन्द्रजित ने देखते राक्षसों के सामने सब प्रसिद्ध वानर-सेनापतियों पर भी प्रहार किया। नील को नौ बाणों से, मैन्द-द्विविद को तीन-तीन बाणों से बेधा; जाम्बवान की छाती में बाण मारकर वेगवान हनुमान पर दस बाण छोड़े। अमित-पराक्रमी गवाक्ष और शरभ को दो-दो बाणों से, और गोलांगूल-ईश्वर गवाक्ष तथा अंगद को अनेक बाणों से बेधा। इन वानरश्रेष्ठों को अग्निशिखा-से बाणों से बेधकर महासत्त्व इन्द्रजित गरजा, और बाण-समूहों से वानरों को व्यथित-त्रस्त करके हँसकर बोला: हे राक्षसो, देखो, ये दोनों भाई मेरे घोर बाण-बन्धन में सेना के सामने बँधे पड़े हैं। यह सुनकर छल-योद्धा राक्षस परम विस्मित और हर्षित हुए। मेघ-से वे सब गरजे और “राम मारे गए” समझकर इन्द्रजित की पूजा करने लगे। निश्चेष्ट, निःश्वास-रहित दोनों भाइयों को देखकर इन्द्रजित ने उन्हें मरा हुआ समझ लिया, और हर्षित होकर सब राक्षसों को आनन्दित करता विजयी इन्द्रजित लंका में प्रवेश कर गया।

राम-लक्ष्मण के शरीर सब अंगों-उपांगों में बाणों से भरे देखकर सुग्रीव को भय ने घेर लिया। अश्रुपूर्ण मुख, शोक से व्याकुल नेत्रों वाले दीन वानरेन्द्र सुग्रीव से विभीषण ने कहा: हे सुग्रीव, भय छोड़िए, अश्रुओं का वेग रोकिए। युद्ध प्रायः ऐसे ही होते हैं; विजय कभी निश्चित नहीं होती। यदि हमारा भाग्य शेष है तो ये महाबली महात्मा अपनी मूर्च्छा त्यागकर उठ खड़े होंगे। हे वानर, अपने को और मुझ अनाथ को आश्वस्त कीजिए; सत्य और धर्म में अनुरक्तों को मृत्यु का भय नहीं होता।

ऐसा कहकर विभीषण ने जल से भीगे हाथ से सुग्रीव के सुन्दर नेत्र पोंछे, और विद्या से अभिमन्त्रित जल लेकर उनकी आँखें धोईं। बुद्धिमान कपिराज का मुख पोंछकर समयोचित और अभ्रान्त वचन कहा: हे कपिराज, यह विह्वल होने का समय नहीं; इस अवसर पर अति-स्नेह भी मरण की ओर ले जाता है। अतः विह्वलता छोड़कर राम-नेतृत्व वाली इन सेनाओं के हित की चिन्ता कीजिए। अथवा जब तक राम की संज्ञा न लौटे, तब तक उनकी रक्षा कीजिए; होश में आते ही ये दोनों काकुत्स्थ हमारा भय सर्वथा दूर कर देंगे। यह श्रीराम के लिए कुछ नहीं, और न श्रीराम मरने वाले हैं; क्योंकि गत-आयु पुरुषों के लिए दुर्लभ शरीर-कान्ति उन्हें छोड़ नहीं रही।

विभीषण ने आगे कहा: अतः अपने को आश्वस्त कीजिए और अपनी सेना को भी; मैं तब तक सब सेनाओं को फिर खड़ा करता हूँ। भय से फूली आँखों वाले वानर कान-कान में राम-मूर्च्छा की बात फैला रहे हैं; पर मुझे सेना में घूमते और हर्षित होते देखकर वानर इस भय को वैसे ही त्याग दें जैसे पहले भोगी गई माला को। ऐसा कहकर विभीषण ने भागती वानर-सेना को फिर आश्वस्त किया। इस ओर महामायावी इन्द्रजित सब सेनाओं समेत लंका में अपने पिता के पास पहुँचा।

वहाँ रावण के पास जाकर, हाथ जोड़कर, अभिवादन करके उसने प्रिय समाचार सुनाया कि राम-लक्ष्मण मारे जा चुके हैं। शत्रुओं के गिरने का समाचार सुनकर रावण हर्षित होकर राक्षसों के बीच उठ खड़ा हुआ और अपने पुत्र को आलिंगन में भर लिया; प्रसन्न मन से उसका सिर सूँघकर पूछा कि सर्प-रूपी बाणों से बाँधकर वे दोनों कैसे निश्चेष्ट और निष्प्रभ कर दिए गए। यथार्थ सुनकर इन्द्रजित ने सब बता दिया। महारथी पुत्र की वाणी सुनकर हर्ष-वेग से भरे रावण ने दशरथ-पुत्र के कारण उत्पन्न अपना ज्वर (शोक) त्याग दिया और परम हर्ष-भरे वचनों से अपने पुत्र इन्द्रजित का अभिनन्दन किया।

समझने की कुंजी (अवधारणा): विभीषण की यह सान्त्वना वाल्मीकि का एक नीति-वचन है: “युद्ध प्रायः ऐसे ही होते हैं; विजय कभी निश्चित नहीं।” यह विभीषण को केवल पक्ष-त्यागी राक्षस नहीं, धीर और व्यावहारिक मन्त्री दिखाता है, जो भय के क्षण में सेना को सँभालता है।

सार: इन्द्रजित विजय की घोषणा कर वानर-सेनापतियों पर भी प्रहार करता है और राम-लक्ष्मण को मरा मानकर लंका लौट जाता है। भयभीत सुग्रीव को विभीषण आश्वस्त करते हैं कि श्रीराम मरे नहीं, केवल मूर्च्छित हैं। रावण इन्द्रजित का अभिनन्दन करता है।

सीता को पुष्पक से युद्धभूमि का दर्शन

इन्द्रजित के लंका लौटने पर हनुमान, अंगद, नील, सुषेण, कुमुद, नल, गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, जाम्बवान, ऋषभ, स्कन्ध, रम्भ, शतबली और पृथु, ये वानर-भालू-श्रेष्ठ व्यूह बाँधकर, वृक्ष लिए, सब ओर से श्रीराम की रक्षा करने लगे। सब दिशाएँ, तिरछे और ऊपर देखते वानर तृण के हिलने पर भी “राक्षस आ गए” समझ लेते थे।

इन्द्र को जीतने वाले पुत्र इन्द्रजित को विदा करके हर्षित रावण ने सीता की रक्षिका राक्षसियों को बुलाकर कहा: इन्द्रजित ने राम-लक्ष्मण मार डाले हैं, यह वैदेही को सुना दो। उन्हें पुष्पक विमान में बैठाकर रण में मरे हुए दोनों को दिखा दो। जिसके बल पर गर्व करके वह मेरे अधीन नहीं होती, वह उसका पति अनुज समेत रण के मुहाने पर मारा गया। पति-दर्शन की आशा छोड़कर, निर्भय, निरुद्विग्न होकर सब आभूषणों से सजकर सीता अब मेरे अधीन होगी। आज काल के वश हुए राम-लक्ष्मण को देखकर, अन्य कोई गति न पाकर, निराश होकर वह विशाल-नयना स्वयं मेरे पास आ जाएगी।

उस दुरात्मा रावण की आज्ञा सुनकर “बहुत अच्छा” कहकर राक्षसियाँ पुष्पक के पास गईं, और रावण की आज्ञा से उसे लेकर अशोकवाटिका में स्थित मिथिलापति-कन्या के पास पहुँचीं। पति-मरण के समाचार से शोक-पराजित सीता को राक्षसियों ने पुष्पक पर चढ़ाया। फिर त्रिजटा समेत सीता को पुष्पक में बैठाकर राक्षसियाँ उन्हें राम-लक्ष्मण दिखाने चलीं, और रावण ने उन्हें पताका-ध्वज-मालिनी लंका के ऊपर उड़ाया। हर्षित रावण ने लंका में यह भी घोषणा करवा दी कि राघव और लक्ष्मण इन्द्रजित के हाथों रण में मारे गए।

त्रिजटा के साथ विमान से जाती सीता ने वानरों की विशाल सेना को मानो नष्ट देखा। राम-लक्ष्मण के पास अत्यन्त प्रसन्न-मन माँसभक्षी राक्षसों और अति-दुःखी वानरों को खड़ा देखा। फिर शर-शय्या पर पड़े, मूर्च्छित, बाणों से पीड़ित, टूटे कवच और छिटके धनुष वाले, सायकों से सर्व-अंग छिन्न, शर-स्तम्भमय होकर भूमि पर पड़े लक्ष्मण और राम को सीता ने देखा।

शर-शय्या पर पड़े, अग्नि-पुत्रों (स्कन्द-विशाख) से कुमारों-से सोए उन कमलनयन पुरुषर्षभ भाइयों को उस दशा में देखकर दुःखातुर सीता करुण-कातर विलाप करने लगीं। धूल में लोटते अपने पति और लक्ष्मण को देखकर निर्दोष-अंगा, श्यामनयना जनककुमारी रोने लगीं। देव-पुत्रों-से प्रभावशाली उन दोनों भाइयों को देखकर, और उनका मरण आशंका करके, अश्रु-शोक से आहत, दुःखान्विता सीता बोलीं:

समझने की कुंजी (स्थान): “पुष्पक” वह स्वयं-संचालित आकाशयान है जिसे रावण ने कुबेर से छीना था; यह इच्छानुसार चलता और बढ़ता है। यहाँ रावण इसी से सीता को रणभूमि का दर्शन कराता है; यह उसकी क्रूर नीति है: सीता को टूटा हुआ देखकर अपने अधीन करना। पर वही पुष्पक आगे सीता के पक्ष में प्रमाण बन जाता है (त्रिजटा का तर्क)।

सार: रावण सीता को तोड़ने के लिए राक्षसियों के साथ पुष्पक में बैठाकर रणभूमि दिखाता है, जहाँ राम-लक्ष्मण शर-शय्या पर निश्चेष्ट पड़े हैं। उन्हें मरा-सा देखकर सीता करुण विलाप में फूट पड़ती हैं।

सीता का विलाप और त्रिजटा का धैर्य-बँधाना

पति और महाबली लक्ष्मण को मारा हुआ देखकर शोक से कृश सीता करुण विलाप करने लगीं: जिन लक्षण-ज्ञानियों ने मेरे विषय में कहा था कि मैं पुत्रवती और सौभाग्यवती (अविधवा) रहूँगी, राम के मारे जाने पर वे सब आज मिथ्यावादी सिद्ध हुए। जिन ज्ञानियों ने कहा था कि मैं यज्ञ करने वाले और सत्र-अनुष्ठान करने वाले राजा की महिषी और पत्नी रहूँगी, वे आज झूठे हुए। जिन्होंने कहा कि मैं वीर राजाओं की पत्नियों में पूज्या और पति-सम्मानिता रहूँगी, वे भी झूठे हुए। जिन शुभ-भविष्यवक्ता ब्राह्मणों ने मेरे सुनते कहा था कि मैं पति के साथ सुखी रहूँगी, वे भी राम के मारे जाने पर झूठे सिद्ध हुए।

सीता ने अपने शरीर के शुभ-लक्षण गिनाए: मेरे तलवों में कमल के चिह्न हैं, जिनसे कुलस्त्रियाँ राजा-पतियों के साथ साम्राज्य-सिंहासन पर अभिषिक्त होती हैं। जिन अशुभ लक्षणों से दुर्भाग्या स्त्रियाँ वैधव्य पाती हैं, वे मेरे शरीर में नहीं; फिर भी शुभ लक्षण देखती हुई मैं उन्हें अपने लिए निष्फल पाती हूँ। मेरे केश सूक्ष्म, सम और श्याम हैं, भौंहें मिली हुई नहीं, पिंडलियाँ गोल और रोमरहित हैं, दाँत सटे हुए हैं। शंख-नेत्र-हाथ-पैर-गुल्फ-ऊरु सम और मांसल हैं, हाथों की अँगुलियाँ सम, स्निग्ध और गोल नखों वाली हैं। मेरा वर्ण मणि-सा है, अंग-रोम कोमल हैं; बारह अंगों (दस पैर की अँगुलियाँ और दो तलवे) से भूमि छूती हूँ, और लक्षण-ज्ञानियों ने मुझे शुभलक्षणा कहा। जौ के चिह्न से युक्त, छिद्र-रहित, वर्णयुक्त हाथ-पैर और मन्द-स्मित से लक्षण-वेत्ता मुझे शुभ कहते थे; ब्राह्मणों ने कहा था कि मैं पति के साथ साम्राज्य-सिंहासन पर अभिषिक्त होऊँगी। वह सब आज मिथ्या हो गया।

सीता ने आगे विलाप किया: जनस्थान को शोधकर, मेरा समाचार पाकर, अक्षोभ्य समुद्र को लाँघकर दोनों भाई गोखुर-समान तुच्छ इन्द्रजित की माया में मारे गए! क्या राघवों को वारुण, आग्नेय, ऐन्द्र, वायव्य और ब्रह्मशिर अस्त्रों का ज्ञान न था? फिर अन्तिम उपाय में भी उन्होंने इन अस्त्रों का प्रयोग क्यों न किया? वासव-तुल्य मेरे रक्षक राम-लक्ष्मण माया से अदृश्य इन्द्रजित के हाथों मारे गए। राघव की दृष्टि-पथ में आकर तो मन के समान वेगवान शत्रु भी जीवित नहीं लौट सकता। काल का कोई अतिभार नहीं, और कृतान्त भी दुर्जय है, जहाँ राम भ्राता समेत रण में गिर पड़े। मैं राम और महारथी लक्ष्मण के लिए, अपने या अपनी माँ के लिए उतना शोक नहीं करती जितना अपनी तपस्विनी सास कौसल्या के लिए, जो नित्य सोचती हैं कि कब मैं सीता और राघव समेत लक्ष्मण को व्रत पूरा करके लौटा देखूँगी।

विलाप करती सीता से राक्षसी त्रिजटा ने कहा: हे देवी, विषाद न कीजिए, आपके ये पति जीवित हैं। मैं आपको बड़े और सटीक कारण बताती हूँ जिनसे मैं मानती हूँ कि ये दोनों भाई राम-लक्ष्मण अभी जीवित हैं। हे देवी, स्वामी के मारे जाने पर योद्धाओं के मुख न तो क्रोध से भरे होते हैं, न हर्ष से उत्सुक। पर हे वैदेही, यह दिव्य पुष्पक विमान आपको धारण किए हुए है; यदि ये दोनों मर गए होते तो यह आपको (विधवा को) कदापि धारण न करता। जिस सेना का वीर-नायक मर जाता है, वह उत्साह और उद्यम खोकर जल में कर्णधार-रहित नौका-सी इधर-उधर भटकती है। पर यह वानर-सेना न उद्विग्न है, न भ्रान्त; प्रेम से कहती हूँ कि ये दोनों काकुत्स्थ जीवित हैं, इसी से सेना इनकी रक्षा कर रही है।

त्रिजटा ने आगे कहा: हे जनककुमारी, शोक, दुःख और मोह त्यागिए। मैंने पहले कभी झूठ नहीं कहा, न कहूँगी; अपने निर्मल चरित्र और मधुर स्वभाव से आप मेरे मन में बस गई हैं। इन्द्र समेत सब सुर-असुर भी इन्हें रण में नहीं जीत सकते; इन दोनों भाइयों और उनके रक्षकों के मुख-भाव देखकर ही मैंने जाना कि ये जीवित हैं। हे वैदेही, यह बड़ा आश्चर्य देखिए: बाणों से बिंधकर मूर्च्छित होने पर भी इन दोनों की शरीर-कान्ति इन्हें नहीं छोड़ रही। प्रायः गत-प्राण पुरुषों के मुख देखने पर अत्यन्त विकृति आ जाती है। हे जनकात्मजे, आप इन्हें अवश्य जीवित जानिए।

उनकी यह वाणी सुनकर देव-कन्या-सी सीता ने हाथ जोड़कर “ऐसा ही हो” कहा। तब मन-वेग पुष्पक को लौटाकर त्रिजटा ने दीन सीता को फिर लंका में प्रवेश कराया। पुष्पक से उतरकर त्रिजटा समेत सीता राक्षसियों द्वारा फिर अशोकवाटिका में पहुँचाई गईं। बहुत वृक्षों से भरी रावण की उस विहार-भूमि में जाकर, राजपुत्रों का गहरा चिन्तन करके सीता परम विषाद को प्राप्त हुईं।

समझने की कुंजी (अवधारणा): त्रिजटा यहाँ राक्षसी होकर भी सीता की हितैषिणी है। उसके तर्क व्यावहारिक हैं, चमत्कारी नहीं: दिव्य पुष्पक विधवा को नहीं धारण करता; नेता-रहित सेना भटकती है, यह सेना संगठित है; मृतक का मुख विकृत हो जाता है, इनका नहीं। यह वाल्मीकि की वस्तुनिष्ठ शैली है, लक्षण-शास्त्र और लोक-व्यवहार से आशा का तर्क।

सार: सीता अपने शुभ-लक्षणों को मिथ्या मानकर, और सास कौसल्या के लिए, करुण विलाप करती हैं। पर हितैषिणी राक्षसी त्रिजटा वस्तुगत प्रमाणों से सिद्ध करती है कि राम-लक्ष्मण केवल मूर्च्छित हैं, मरे नहीं, और सीता को फिर अशोकवाटिका लौटा लाती है।

होश में आते श्रीराम का लक्ष्मण के लिए विलाप

घोर शर-बन्धन में बँधे, रुधिर से सने, साँपों-से साँस लेते दोनों दशरथ-पुत्रों को घेरकर सुग्रीव समेत सब महाबली वानरश्रेष्ठ शोक में डूबे खड़े थे। इसी बीच, बाणों से बँधे होने पर भी अपनी स्थिरता और सत्त्व के बल पर वीर्यवान श्रीराम होश में आ गए। तब रुधिर से सने, गाढ़ बँधे, दीनमुख अपने भ्राता लक्ष्मण को देखकर आतुर श्रीराम विलाप करने लगे:

श्रीराम बोले: सीता के मिल जाने या जीवित रहने से भी मुझे क्या प्रयोजन, जब आज मैं अपने भ्राता को रण में परास्त, शयन करता देख रहा हूँ? मृत्युलोक में खोजने पर सीता-सी नारी तो मिल सकती है, पर लक्ष्मण-सा सहायक और समरशील भ्राता नहीं मिलेगा। यदि सुमित्रानन्दन लक्ष्मण पंचत्व को प्राप्त हो गए, तो वानरों के देखते-देखते मैं अपने प्राण त्याग दूँगा। माता कौसल्या से क्या कहूँगा, कैकेयी से क्या? पुत्र-दर्शन की लालसा में काँपती, कुररी-सी रोती, पुत्र-वियुक्त माता सुमित्रा को कैसे आश्वस्त करूँगा, यदि लक्ष्मण के बिना लौटूँगा? शत्रुघ्न और यशस्वी भरत से कैसे कहूँगा कि जो मेरे साथ वन आया, उसके बिना मैं लौट आया? माता सुमित्रा का उपालम्भ मैं सह न सकूँगा; इसलिए यहीं अपना शरीर त्याग दूँगा, क्योंकि अब जीने की इच्छा नहीं।

श्रीराम ने आत्म-धिक्कार किया: धिक्कार है मुझ दुष्कृतकर्मा अनार्य को, जिसके कारण यह लक्ष्मण शर-शय्या पर गत-प्राण-से पड़ा है। हे लक्ष्मण, आप नित्य विषण्ण मुझे आश्वस्त करते थे, पर आज प्राण-से जाते हुए आर्त मुझसे बोल भी नहीं पाते। जिस भूमि पर आज आपने अनेक राक्षस मारे, उसी पर शूर होकर भी आप धीरे-धीरे बिंधकर पड़े हैं। रुधिर से सने इस शर-शय्या पर शर-मय होकर आप अस्त होते सूर्य-से दीखते हैं। बाण-भिन्न मर्म से आप बोल नहीं पाते, पर न बोलते हुए भी आपकी दृष्टि की लालिमा आपकी पीड़ा प्रकट कर रही है। जैसे यह महाद्युति लक्ष्मण वन जाते मेरा अनुगमन करते थे, वैसे ही मैं भी इन्हें यमलोक तक अनुगमन करूँगा। जो सदा इष्ट-बन्धु-प्रिय और मेरे अनुव्रत रहे, वे मुझ अनार्य के दुर्नयों से आज इस दशा को पहुँचे। एक बार भी लक्ष्मण से अति-रुष्ट होकर कोई कठोर या अप्रिय वचन कहा हो, यह मुझे स्मरण नहीं। जो एक ही प्रहार में पाँच सौ बाण छोड़ते थे, वे अस्त्र-विद्या में कार्तवीर्य से भी बढ़कर थे; जो इन्द्र के अस्त्रों को भी अस्त्रों से काट सकते थे, वे महामूल्य शय्या के योग्य लक्ष्मण आज नंगी भूमि पर मारे पड़े हैं।

श्रीराम ने सुग्रीव को विदा देना चाहा: हे सुग्रीव, मेरे द्वारा विभीषण को राक्षस-राज न बनाया जा सका, यह मिथ्या-प्रलाप मुझे निश्चय ही जलाएगा। हे सुग्रीव, इसी क्षण आप यहाँ से लौट जाइए; मुझसे रहित जानकर रावण आप पर भी आक्रमण कर देगा, हे राजन्। अंगद को आगे करके, सेना और परिच्छद समेत, नल-नील के साथ समुद्र पार कर लीजिए। आपने रण में वह महान कर्म किया जो दूसरों के लिए दुष्कर था; मैं जाम्बवान और गोलांगूल-अधिप गवाक्ष से भी सन्तुष्ट हूँ। अंगद, मैन्द, द्विविद के कर्म, और केसरी-सम्पाति का घोर युद्ध भी हुआ। गवय, गवाक्ष, शरभ, गज और अन्य वानरों ने मेरे लिए प्राण त्यागकर युद्ध किया। मनुष्यों से दैव को अतिक्रम नहीं किया जा सकता, हे सुग्रीव। मित्र या सुहृद् जो कर सकता था, वह सब हे धर्मभीरु सुग्रीव, आपने किया; हे वानरश्रेष्ठो, मित्र-कार्य आप सबने पूरा किया। मेरी अनुज्ञा से अब आप सब यथेष्ट चले जाइए। उनका यह विलाप सुनकर सब वानरों ने श्याम नेत्रों से अश्रु बहाए।

इसी बीच विभीषण सब सेनाओं को व्यवस्थित करके गदा हाथ में लिए शीघ्र वहाँ आए जहाँ राघव थे। नीलांजन-से श्याम विभीषण को वेग से आते देखकर इन्द्रजित समझकर सब वानर भाग खड़े हुए।

सार: होश में आने पर श्रीराम सीता या अपने प्राणों से अधिक भ्राता लक्ष्मण के लिए विलाप करते हैं, माता सुमित्रा के उपालम्भ की कल्पना से व्याकुल होकर सुग्रीव को सेना सहित लौट जाने को कहते हैं। तभी गदाधारी विभीषण आते दिखते हैं, और श्याम-वर्ण होने से वानर उन्हें इन्द्रजित समझकर भाग पड़ते हैं।

गरुड़ का आगमन और राम-लक्ष्मण की बन्धन-मुक्ति

तब महातेजस्वी महाबली कपिराज सुग्रीव ने पूछा: यह सेना समुद्र में बवण्डर में फँसी नौका-सी क्यों व्यथित है? सुग्रीव के वचन सुनकर वालिपुत्र अंगद बोले: क्या आप दशरथ-पुत्र राम और महारथी लक्ष्मण को नहीं देखते, जो बाण-जाल से ढके, रुधिर से सने शर-शय्या पर पड़े हैं? तब वानरेन्द्र सुग्रीव ने पुत्र अंगद से कहा: मैं इस वानर-भगदड़ को बिना किसी कारण के नहीं मानता; राम-लक्ष्मण के बन्धन के सिवा भी कोई भय अवश्य आगे है। ये वानर विषण्ण-मुख, भय से फूली आँखों वाले, शस्त्र छोड़कर सब दिशाओं में भाग रहे हैं; एक-दूसरे से लज्जित नहीं, पीछे नहीं देखते, गिरे को लाँघते और एक-दूसरे को खींचते भागे जा रहे हैं।

इसी बीच गदाधारी वीर विभीषण आ पहुँचे और जय-आशीर्वाद से सुग्रीव और राघव को बधाए। वानरों में भय फैलाने वाले विभीषण को देखकर सुग्रीव ने पास खड़े महात्मा जाम्बवान से कहा: यह विभीषण आ पहुँचे हैं, जिन्हें इन्द्रजित-पुत्र समझकर वानरश्रेष्ठ अत्यन्त त्रास से भाग रहे हैं। शीघ्र इन अत्यन्त भयभीत, अनेक दिशाओं में भागे वानरों को रोककर बताइए कि यह विभीषण आए हैं, इन्द्रजित नहीं। सुग्रीव के कहने पर ऋक्षराज जाम्बवान ने भागते वानरों को बुलाकर आश्वस्त किया; जाम्बवान का वचन सुनकर और विभीषण को पहचानकर वानर भय छोड़कर लौट आए।

राम और लक्ष्मण के बाणों से ढके शरीर देखकर धर्मात्मा विभीषण व्यथित हुए, और जल से भीगे हाथ से उनकी आँखें पोंछकर शोक-पीड़ित मन से रोने और विलाप करने लगे: ये दोनों सत्त्वसम्पन्न, विक्रान्त, युद्धप्रिय राजपुत्र छल-योद्धा राक्षसों के हाथों इस दशा को पहुँचा दिए गए! मेरे दुष्ट भतीजे, अपने पिता के कुपुत्र, दुरात्मा इन्द्रजित ने राक्षस-स्वभाव की कुटिल बुद्धि से इन ऋजु-पराक्रमी वीरों को छल लिया। बाणों से बिंधे, रुधिर से सने, ये दोनों भूमि पर साही-से सोए हैं। जिनके पराक्रम के सहारे मैंने लंका के सिंहासन की आशा की थी, वे ही ये पुरुषश्रेष्ठ देह-नाश के लिए मानो सोए हैं। राज्य की मेरी आशा निष्फल हो गई; जीते-जी भी मैं मरा-सा हूँ, और शत्रु रावण को उसके पुत्र ने सकाम कर दिया।

इस प्रकार विलाप करते विभीषण को आलिंगन में भरकर सत्त्वसम्पन्न कपिराज सुग्रीव ने कहा: हे धर्मज्ञ, आप लंका का राज्य अवश्य पाएँगे, इसमें संदेह नहीं; रावण और इन्द्रजित अपनी कामना पूरी न कर सकेंगे। मूर्च्छा त्यागकर गरुड़ पर आरूढ़ इन्द्र-तुल्य ये दोनों राम-लक्ष्मण सगण रावण को रण में मार डालेंगे। इस प्रकार विभीषण को आश्वस्त करके सुग्रीव ने पास खड़े श्वशुर सुषेण से कहा: होश में आते ही शूर वानरों के साथ इन शत्रुदमन भाइयों को लेकर किष्किन्धा चले जाइए; मैं रावण को सपुत्र-सबान्धव मारकर सीता को वैसे ही लौटा लाऊँगा जैसे इन्द्र ने खोई हुई श्री।

एक उप-कथा: सुग्रीव की बात सुनकर सुषेण ने प्राचीन देव-असुर महायुद्ध का स्मरण कराते हुए कहा: उस युद्ध में दानव माया से छिपकर बार-बार देवताओं को घायल करते थे, चाहे वे शस्त्र-विद्या में निपुण ही क्यों न हों। तब घायल, मूर्च्छित और गत-प्राण देवताओं को देवगुरु बृहस्पति ने मन्त्रयुक्त विद्याओं और औषधियों से चंगा किया। वे ही दिव्य औषधियाँ (मृत को जिलाने वाली “संजीवकरणी” और शल्य निकालने वाली “विशल्या”) आज भी क्षीरसागर के तट पर चन्द्र और द्रोण नामक दो पर्वतों पर हैं, जहाँ अमृत-मन्थन हुआ था। उन्हें देवताओं ने वहीं रखा था। सम्पाति-पनस आदि वानर उन्हें पहचानते हैं; उन्हें लाने को वायुपुत्र हनुमान वहाँ जाएँ।

इसी बीच बिजली-युक्त मेघों समेत एक वायु उठी जिसने समुद्र-जल मथकर पर्वतों को मानो हिला दिया। पंखों की फटकार से उठी उस महावायु से सब द्वीप के महावृक्ष शाखाएँ टूटकर खारे जल में गिर पड़े; भुजंग त्रस्त हो उठे और जलजन्तु शीघ्र समुद्र में समा गए। तब क्षणभर में सब वानरों ने वासव-तुल्य महाबली, जलती आग-से तेजस्वी वैनतेय गरुड़ को आते देखा। उन्हें आते देख वे नाग, जो बाण-रूप होकर दोनों पुरुषों को बाँधे थे, भाग खड़े हुए।

तब सुपर्ण गरुड़ ने दोनों काकुत्स्थों को छूकर अभिनन्दन किया, और दोनों हाथों से उनके चन्द्र-से मुख सहलाए। गरुड़ के स्पर्श से उनके घाव भर गए और शरीर तुरन्त उज्ज्वल-स्निग्ध हो गए। उनका तेज, वीर्य, बल, ओज, उत्साह, प्रदर्शन-शक्ति, बुद्धि और स्मृति दुगुनी हो गई। दोनों को उठाकर महातेजस्वी गरुड़ ने हर्षित होकर आलिंगन किया, और श्रीराम बोले: आपकी कृपा से हम इन्द्रजित से उपजे महान संकट को उपाय से पार कर गए और शीघ्र फिर बलवान हो गए। पिता दशरथ या पितामह अज से मिलने पर जैसा हर्ष होता, वैसा ही हृदय आपसे मिलकर प्रसन्न हो रहा है। आप कौन हैं, जो रूपसम्पन्न, दिव्य माला-अनुलेप-धारी, निर्मल वस्त्र और दिव्य आभूषणों से सजे हैं?

हर्ष से व्याकुल नेत्रों वाले श्रीराम से प्रीतिमन पतत्रिराज गरुड़ ने उत्तर दिया: हे काकुत्स्थ, मैं आपका सखा, प्रिय और बाहर विचरता आपका प्राण-स्वरूप गरुत्मान हूँ; आप दोनों की सहायता के लिए यहाँ आया हूँ। महावीर्य असुर, महाबली दानव, अथवा इन्द्र को आगे करके गन्धर्व-सहित देवता भी इस घोर बाण-बन्धन को न खोल सकते, जिसे क्रूरकर्मा इन्द्रजित ने माया-बल से रचा था। ये कद्रू-पुत्र, तीक्ष्ण-दाढ़ विषधर नाग ही राक्षस-माया से बाण-रूप होकर आपको बाँधे थे। हे सत्यपराक्रमी धर्मज्ञ राम, आप समर में शत्रुघाती अनुज लक्ष्मण के साथ धन्य हैं। यह वृत्तान्त सुनकर आपस के स्नेह से, सख्य निभाते हुए, मैं सहसा यहाँ चला आया। आप दोनों इस घोर बाण-बन्धन से मुक्त हुए; अब आप सदा सावधान रहिए, क्योंकि सब राक्षस स्वभाव से ही छल-युद्ध करते हैं, जबकि शुद्ध-हृदय शूरों का बल उनकी सरलता है। इसी उपमान से, राक्षसों पर रणभूमि में कभी विश्वास न कीजिए, क्योंकि राक्षस सदा कुटिल होते हैं।

ऐसा कहकर महाबली सुपर्ण गरुड़ ने श्रीराम को स्नेह से आलिंगन कर विदा माँगी: हे सखा राघव, हे धर्मज्ञ, शत्रुओं पर भी वत्सल! मैं अनुज्ञा चाहता हूँ; अब सुखपूर्वक जाऊँगा। हमारी मित्रता के विषय में आप कौतूहल न कीजिए; रण में कृतकर्म होने पर, हे वीर, आप इस मित्रता का रहस्य जान जाएँगे। बाल-वृद्ध को ही शेष छोड़कर बाण-तरंगों से लंका को खाली करके, शत्रु रावण को मारकर, आप सीता को अवश्य पा लेंगे। ऐसा कहकर शीघ्रवेग सुपर्ण गरुड़ ने श्रीराम को नीरोग करके, वानरों के बीच प्रदक्षिणा और आलिंगन करके, आकाश में पवन-से उड़ान भरी।

राम-लक्ष्मण को नीरोग देखकर वानर-यूथपति सिंहनाद करने और पूँछें पटकने लगे; नगाड़े-मृदंग बजाए, शंख फूँके और पहले-सी किलकारियाँ करने लगे। पर्वतयोद्धा वानर विविध वृक्ष उखाड़कर, फुफकारते हुए, लाखों की संख्या में युद्ध को उद्यत खड़े हो गए, और घोर नाद से निशाचरों को डराते हुए लंका के द्वारों की ओर बढ़े। ग्रीष्म के अन्त में मध्यरात्रि गरजते मेघों-से वानर-यूथपतियों का अत्यन्त भीषण तुमुल घोष उठा।

समझने की कुंजी (अवधारणा): इन्द्रजित के बाण वस्तुतः नाग (सर्प) थे, जो माया से बाण-रूप बने थे। गरुड़ सर्पों के स्वाभाविक शत्रु हैं; उनके आते ही नाग भाग जाते हैं और बन्धन खुल जाता है। वाल्मीकि गरुड़ को श्रीराम का “सखा और बाहर विचरता प्राण” कहलाते हैं; यह बाद की परम्परा के विष्णु-गरुड़ सम्बन्ध का बीज है, पर यहाँ इसे मित्रता-रूप में, रहस्य रखकर कहा गया है।

सार: सुग्रीव और सुषेण औषधि-पर्वत मँगाने की योजना बनाते हैं, पर इससे पहले ही गरुड़ आते हैं। इन्द्रजित के बाण वस्तुतः नाग थे; गरुड़ के स्पर्श से राम-लक्ष्मण के घाव भर जाते हैं और बल दुगुना हो जाता है। गरुड़ राक्षसों से सतर्क रहने की चेतावनी देकर लौट जाते हैं, और हर्षित वानर फिर युद्ध को उमड़ पड़ते हैं।

रावण का धूम्राक्ष को भेजना और अपशकुन

राक्षसों के साथ गरजते उन महौजस्वी वानरों का तुमुल शब्द रावण ने सुना। स्निग्ध-गम्भीर घोष वाले उस अत्यन्त उच्च नाद को सुनकर रावण ने अपने मन्त्रियों के बीच कहा: इन सब वानरों के इस महान हर्ष का कारण शीघ्र जाना जाए, जो शोक के समय में उत्पन्न हुआ है। गरजते मेघों-से असंख्य हर्षित वानरों के इस महानाद से स्पष्ट है कि इनका हर्ष बड़ा है, और इसी से खारा समुद्र भी क्षुब्ध हो उठा है। पर जब तीक्ष्ण बाणों से बँधे राम-लक्ष्मण पड़े हैं, तब यह महानाद मेरे मन में आशंका उत्पन्न करता है कि कहीं वे दोनों बन्धन से मुक्त तो नहीं हो गए।

ऐसा कहकर रावण ने पास खड़े राक्षसों से कहा। आज्ञा पाकर वे राक्षस कुछ खिन्न मन से प्राचीर पर चढ़े और महात्मा सुग्रीव से रक्षित सेना देखी। घोर बाण-बन्धन से मुक्त, सक्रिय, महाभाग राघव-बन्धुओं को देखकर सब राक्षस विषण्ण हुए। भयभीत-हृदय वे विवर्ण घोर राक्षस प्राचीर से उतरकर रावण के पास आए और दीनमुख होकर सब अप्रिय समाचार ज्यों-का-त्यों सुना दिया: जो दोनों भाई राम-लक्ष्मण इन्द्रजित के बाण-बन्धन से निष्प्रकम्प-भुज बाँध दिए गए थे, वे पाश तोड़ते गजेन्द्रों-से रणभूमि में बन्धन-मुक्त दीख रहे हैं।

उनका वचन सुनकर महाबली रावण चिन्ता-शोक से ग्रस्त होकर विवर्ण-मुख हो गया, और साँप-सा साँस लेकर बोला: ब्रह्मा के वरदान-प्राप्त, अमोघ, सूर्य-से दीप्त, आशीविष-से घोर बाणों से इन्द्रजित ने जिन्हें युद्ध में दृढ़ बाँधा था, यदि मेरे वे शत्रु अस्त्र-बन्धन से भी छूट गए, तो मैं अपनी सारी सेना को संशय में देखता हूँ। निश्चय ही मेरे आग-से तेजस्वी वे बाण निष्फल हो गए, जिनसे रण में शत्रुओं के प्राण लिए गए थे।

ऐसा कहकर क्रुद्ध, साँप-सा फुफकारता रावण राक्षसों के बीच धूम्राक्ष नामक राक्षस से बोला: हे भीमविक्रम, महान सेना लेकर आप वानरों समेत राम का वध करने शीघ्र निकलिए। ऐसा कहे जाने पर धूम्राक्ष ने रावण की प्रदक्षिणा की और शीघ्र राजभवन से निकला। द्वार पर निकलकर उसने सेनापति से कहा: सेना को शीघ्र तैयार कीजिए; युद्ध-इच्छुक को विलम्ब का क्या काम? सेनापति ने रावण की आज्ञा से तुरन्त सेना सजाई। घण्टियाँ बाँधे, घोर-रूप बलवान राक्षस गरजते हुए हर्षित होकर धूम्राक्ष को घेर खड़े हुए।

गदा, पट्टिश, लोहे के डण्डे, मूसल, परिघ, भिन्दिपाल, भाले, पाश और फरसे लिए घोर राक्षस मेघों-से गरजते निकले। कवच पहने अन्य राक्षस-व्याघ्र ध्वज-पताका से सजे, सोने की जाली से ढके रथों, भाँति-भाँति के मुख वाले गधों, अति-वेगवान घोड़ों और मद से उन्मत्त हाथियों पर सवार होकर दुरासद व्याघ्रों-से निकले। गधों-से जुते, गधे-से स्वर वाले दिव्य रथ पर भेड़िया-सिंह-मुख वाले गधे जुते थे; उस पर धूम्राक्ष चढ़ा। पर निकलते ही अपशकुन हुए: आकाश से उल्काएँ गिरीं, अग्नि-ज्वाला उगलती सियारिनें चीखीं, धूम्राक्ष के रथ-शीर्ष पर एक अत्यन्त भीषण गीध बैठ गया, ध्वज-अग्र पर शव-भक्षी पक्षी आ बैठे, और एक रुधिर-सना श्वेत धड़ उसके सामने भूमि पर गिरकर विस्वर शब्द करने लगा। मेघों ने रक्त बरसाया, पृथ्वी काँपी, वज्र-समान शब्द से प्रतिकूल वायु बही, और अन्धकार से ढकी दिशाएँ दिखाई न पड़ीं।

इन भयावह उत्पातों को देखकर धूम्राक्ष व्यथित हुआ और उसके आगे चलते सब राक्षस मूर्च्छित हुए। पर बलवान धूम्राक्ष अनेक राक्षसों से घिरकर, युद्ध को उत्सुक, बाहर निकलकर श्रीराम की भुजाओं से रक्षित, प्रलयकाल के महासमुद्र-सी अपार वानर-सेना को देखने लगा।

सार: राम-लक्ष्मण की बन्धन-मुक्ति का समाचार सुनकर रावण व्यथित होता है और धूम्राक्ष को सेना के साथ भेजता है। धूम्राक्ष के निकलते ही भीषण अपशकुन होते हैं, फिर भी वह पश्चिम द्वार की ओर वानर-सेना से भिड़ने बढ़ता है, जहाँ हनुमान खड़े हैं।

हनुमान के हाथों धूम्राक्ष का वध

भीमविक्रम राक्षस धूम्राक्ष को निकलते देखकर युद्ध-इच्छुक हर्षित वानर गरज उठे। तब वानरों-राक्षसों का अत्यन्त तुमुल युद्ध छिड़ा, जिसमें एक-दूसरे को घोर वृक्षों, शूलों और मुद्गरों से मारने लगे। राक्षसों ने वानरों को सब ओर से काट डाला, और वानरों ने राक्षसों को वृक्षों से भूमि पर बिछा दिया। क्रुद्ध राक्षस घोर, ऋजुगामी, कंकपत्र (गीध-पंख वाले) तीक्ष्ण बाणों से वानरों को बेधते रहे। गदा, पट्टिश, मुद्गर, परिघ और त्रिशूलों से विदीर्ण होते हुए भी महाबली वानरों ने अमर्ष से उपजे उत्साह से अभय-से कर्म किए।

बाणों से बिंधे, शूलों से देह-भिन्न वानर-सेनापति वृक्ष और शिलाएँ उठा लाए; पर्वत-से हाथियों और घोड़ों को सवारों समेत शिखरों से कुचल डाला। उछल-उछलकर भीमविक्रम वानर राक्षसों को मसलते, उनके मुख तीक्ष्ण नखों से चीरते, और अपने नाम बखानते रहे। विषण्ण-मुख, बिखरे केश, रक्त की गन्ध से मूर्च्छित राक्षस भूमि पर गिर पड़े। कुछ राक्षस मथे गए, कुछ रक्त उगलने लगे, कुछ पार्श्व में चीरे गए, कुछ वृक्षों से ढेर किए गए, कुछ शिलाओं से चूर्ण हुए, और कुछ दाँतों से चीरे गए। टूटे ध्वज-खड्ग-रथों से कुछ राक्षस व्यथित हुए। वज्र-स्पर्श-सी हथेलियों, मुक्कों, चरणों, दाँतों और वृक्षों से वानरों ने उन्हें कुचल डाला।

अपनी सेना को भागते देखकर राक्षसश्रेष्ठ धूम्राक्ष क्रोध से बाण-वर्षा द्वारा युद्ध-इच्छुक वानरों का संहार करने लगा। प्रासों से कुछ वानर रुधिर बहाने लगे, मुद्गरों से कुछ गिरे, परिघों-भिन्दिपालों से कुछ विदीर्ण हुए, पट्टिशों से मथे जाकर कुछ गत-प्राण हुए। राक्षसों से युद्ध में कुछ वानर रुधिर-स्नात होकर मरे, कुछ भगाए गए। यह तुमुल महायुद्ध शस्त्र-बहुल, शिला-वृक्ष-संकुल और भयानक था। धनुष की डोरी की मधुर झंकार वीणा-सी, घोड़ों की हिनहिनाहट ताल-सी, और हाथियों की चिग्घाड़ गान-सी होकर वह युद्ध मानो एक गन्धर्व-संगीत-सा बज उठा।

धनुर्धारी धूम्राक्ष रण के मुहाने पर हँसते-हँसते बाण-वर्षा से वानरों को सब दिशाओं में तितर-बितर करने लगा। धूम्राक्ष से पीड़ित अपनी सेना देखकर क्रुद्ध मारुति हनुमान विशाल शिला लिए उसकी ओर बढ़े। क्रोध से दुगुनी रक्त-आँखों वाले, पिता-तुल्य पराक्रमी हनुमान ने वह शिला धूम्राक्ष के रथ पर पटक दी। शिला आती देख धूम्राक्ष घबराकर गदा उठाए वेग से रथ से कूदकर भूमि पर खड़ा हुआ; और वह शिला उसके रथ को चक्र-धुरी-घोड़े-ध्वज-धनुष समेत चूर करके भूमि पर लुढ़क गई।

रथ तोड़कर मारुतात्मज हनुमान स्कन्ध-शाखाओं समेत वृक्षों से राक्षसों का संहार करने लगे; भिन्न-शिर राक्षस रुधिर से सने और वृक्षों से मथे भूमि पर गिरे। राक्षस-सेना को भगाकर हनुमान गिरि-शिखर लेकर धूम्राक्ष की ओर दौड़े। झपटते हनुमान को देखकर वीर्यवान धूम्राक्ष गदा उठाए गरजकर उन पर टूटा, और क्रोध से बहुत-काँटों वाली वह गदा हनुमान के मस्तक पर दे मारी। उस घोर प्रहार की चिन्ता न करके मारुत-बल हनुमान ने वह गिरि-शिखर धूम्राक्ष के सिर के बीच पटक दिया। शिखर से आहत, सर्व-अंग चूर हुआ वह सहसा टूटे पर्वत-सा भूमि पर गिर पड़ा। धूम्राक्ष को मरा देखकर बचे-खुचे राक्षस, वानरों से पिटते हुए, त्रस्त होकर लंका में जा घुसे। शत्रुओं को मारकर, रुधिर-नदियाँ बहाकर, श्रम से थके महात्मा पवनपुत्र हनुमान वानरों से सत्कृत होकर हर्षित हुए।

सार: घोर युद्ध में धूम्राक्ष वानरों को बाण-वर्षा से पीड़ित करता है, पर हनुमान पहले शिला से उसका रथ चूर करते हैं, फिर गदा-प्रहार सहकर गिरि-शिखर से उसका सिर कुचलकर वध कर देते हैं। बचे राक्षस लंका भाग जाते हैं।

रावण का वज्रदंष्ट्र को भेजना और अंगद से युद्ध

धूम्राक्ष को मरा सुनकर राक्षसेश्वर रावण महान क्रोध से भरकर साँप-सा फुफकारने लगा। लम्बी-उष्ण साँस छोड़ते, क्रोध से कलुषित होकर उसने क्रूर महाबली वज्रदंष्ट्र से कहा: हे वीर, जा, राक्षसों से घिरकर निकल, और वानरों समेत दशरथ-पुत्र राम तथा सुग्रीव को मार डाल। “बहुत अच्छा” कहकर मायावी राक्षसेश्वर वज्रदंष्ट्र बहुत सेनाओं से घिरकर शीघ्र निकला। हाथी-घोड़े-गधे-ऊँटों से युक्त, सावधान, पताका-ध्वज से चित्रित अनेक सेनापतियों से सुसज्जित वह विचित्र कवच पहने धनुष लिए तुरन्त निकला।

विचित्र कंकण-मुकुट से विभूषित, पताका-अलंकृत, तप्त-स्वर्ण-जटित दीप्त रथ की प्रदक्षिणा करके सेनापति उस पर चढ़ा। दुधारी खड्ग, विचित्र लोहदण्ड, चिकने मूसल, गोफन, धनुष, भाले, पट्टिश, खड्ग, चक्र, गदा और तीक्ष्ण फरसे लिए भाँति-भाँति के पदाति शस्त्र हाथ में लिए निकले। विचित्र वस्त्र पहने दीप्त राक्षस-वीर शोभित हुए; मद से उन्मत्त, चलते पर्वत-से हाथी भी निकले। तोमर-अंकुश लिए महावत हाथियों पर चढ़े थे; अन्य शूर सवारों वाले लक्षणयुक्त महाबली घोड़े भी युद्ध में उतरे। वह सारी राक्षस-सेना वर्षाकाल के बिजली-समेत गरजते मेघों-सी शोभित हुई।

जहाँ वानर-यूथपति अंगद थे, उस दक्षिण द्वार से सेना निकली; निकलते ही अशुभ हुआ: निर्मेघ आकाश से तीव्र उल्काएँ गिरीं, अग्नि-ज्वाला उगलती सियारिनें चीखीं, घोर पशु राक्षसों का विनाश सूचित करने लगे, और बढ़ते योद्धा भूमि पर लड़खड़ाने लगे। इन उत्पातों की चिन्ता न करके तेजस्वी वज्रदंष्ट्र धैर्य धरकर युद्ध को उत्सुक निकला। उन्हें वेग से आते देखकर विजय-दर्प से भरे वानर महानाद करके दिशाएँ गुँजाने लगे।

तब घोर-भीमरूप, परस्पर-वध-इच्छुक वानरों और राक्षसों का तुमुल युद्ध छिड़ गया। महोत्साह से दौड़ते वे, देह और गर्दन कटी, सर्व-अंग रुधिर में सने भूमि पर गिरते रहे। परिघ-समान भुजाओं वाले, समर में पीठ न दिखाने वाले शूर एक-दूसरे पर भाँति-भाँति के शस्त्र फेंकते। वृक्षों, शिलाओं और शस्त्रों का हृदय-भेदी घोर शब्द सुनाई पड़ता रहा; रथ-नेमि, धनुष, शंख-भेरी-मृदंग का तुमुल स्वर उठा। कुछ शस्त्र छोड़कर बाहु-युद्ध करने लगे; हथेली, चरण, मुक्के, वृक्ष और घुटनों से कुछ राक्षस मारे गए, कुछ शिलाओं से चूर्ण हुए।

वज्रदंष्ट्र बाणों से वानरों को त्रास देता हुआ, लोक-संहार में पाशधारी अन्तक-सा रणभूमि में विचरने लगा। अस्त्र-विद्या-निपुण, नाना शस्त्रधारी क्रुद्ध राक्षस वानर-सेनाओं को मारने लगे। यह देखकर धृष्ट वालिपुत्र अंगद ने क्रोध से दुगुने आवेश में संवर्तक अग्नि-से उन सब राक्षसों का संहार आरम्भ कर दिया। क्रोध से रक्त-नेत्र अंगद वृक्ष उठाकर सिंह-से क्षुद्र पशुओं-से उन राक्षसगणों से घोर युद्ध करने लगे; अंगद से आहत भीमविक्रम राक्षस कटे वृक्षों-से शिर-भिन्न होकर गिरे। रथ-ध्वज-घोड़े और वानर-राक्षसों के शवों तथा रुधिर-स्रोत से ढकी भूमि भयानक दीखने लगी; हार-कंकण-वस्त्र-शस्त्रों से सजी वह रणभूमि शरद्-रात्रि-सी शोभित हुई। अंगद के वेग से वह विशाल राक्षस-सेना पवन से हिलते मेघ-सी काँप उठी।

सार: रावण क्रुद्ध होकर वज्रदंष्ट्र को विशाल सेना के साथ दक्षिण द्वार भेजता है, जहाँ अंगद डटे हैं। फिर अपशकुनों के बीच घोर युद्ध छिड़ता है; अंगद क्रोध से राक्षस-सेना का संहार कर डालते हैं और वज्रदंष्ट्र की सेना थर्रा उठती है।

अंगद के हाथों वज्रदंष्ट्र का वध

अपनी सेना के संहार और अंगद के बल को देखकर महाबली वज्रदंष्ट्र क्रोध से भर गया। इन्द्र के वज्र-सा दीप्त घोर धनुष खींचकर उसने बाण-वर्षा से वानर-सेनाओं को ढक दिया। रथों पर बैठे नाना शस्त्रधारी अन्य प्रमुख राक्षस भी डटकर लड़ने लगे। सब ओर एकत्र वानरश्रेष्ठ शिला हाथ में लिए लड़ने लगे। उस घोर युद्ध में राक्षसों ने वानर-प्रमुखों पर हजारों शस्त्र बरसाए, और मद-गज-से वानरों ने राक्षसों पर पहाड़ियाँ, वृक्ष और विशाल शिलाएँ बरसाईं।

समर में पीठ न दिखाने वाले शूर वानरों और राक्षसगणों का घोर युद्ध छिड़ा। कुछ शिर-भिन्न, कुछ हाथ-पैर कटे, शस्त्रों से देह-भिन्न होकर रुधिर में सने वानर-राक्षस भूमि पर पड़े; कंक-गीध-कौवे और सियार-समूह उन पर टूट पड़े। कायरों को भय देते मस्तक-रहित धड़ उछलने लगे; भुजा-हाथ-शिर कटे और देह-छिन्न राक्षस भूमि पर पड़े। वानर-सेना से मारे जाते भयभीत राक्षसों को देखकर प्रतापी वज्रदंष्ट्र क्रोध से रक्त-नेत्र होकर धनुष लिए वानर-सेना में घुसा और कंकपत्र, ऋजुगामी बाणों से वानरों को विदीर्ण करने लगा; एक साथ सात-आठ-नौ-पाँच वानर बेधने लगा। त्रस्त वानर, बाणों से देह-छिन्न, अंगद की शरण में वैसे दौड़े जैसे प्रजा प्रजापति की।

वानरगणों को भग्न देखकर वालिपुत्र अंगद ने क्रोध से उस वज्रदंष्ट्र की ओर देखा। दोनों परम क्रुद्ध होकर सिंह और मद-गज-से एक-दूसरे पर टूट पड़े। तब वज्रदंष्ट्र ने एक लाख अग्निशिखा-से बाणों से महाबली वालिपुत्र अंगद को मर्मों में बेध डाला। रुधिर-स्नात अंगद ने भीमपराक्रम से वृक्ष उखाड़कर वज्रदंष्ट्र पर फेंका; पर अभ्रान्त राक्षस ने उसे टुकड़े-टुकड़े कर दिया। तब अंगद ने विशाल शैल उखाड़कर फेंका और गरजे; आती शिला देखकर वीर्यवान राक्षस रथ से कूदकर गदा लिए भूमि पर खड़ा हुआ, और वह शिला रथ को चक्र-धुरी-घोड़े समेत चूर कर गई। तब अंगद ने वृक्षों से भरा दूसरा शिखर उठाकर वज्रदंष्ट्र के सिर पर पटका; रुधिर उगलता वह मूर्च्छित होकर गदा छाती से लगाए साँस लेने लगा।

होश आने पर परम क्रुद्ध राक्षस ने खड़े अंगद की छाती में गदा मारी; तब गदा छोड़कर दोनों बाहु-युद्ध करने लगे और एक-दूसरे को मारने लगे। प्रहारों से थके, रुधिर उगलते दोनों मंगल-बुध-से रक्त-वर्ण शोभित हुए। तब अंगद ने वृक्ष उखाड़ा, और राक्षस ने बैल के चर्म की ढाल तथा किंकिणी-जाल से सजा विशाल खड्ग लिया। दोनों विचित्र-रुचिर मार्गों से घूम-घूमकर, जय-इच्छुक होकर, गरजते हुए परस्पर प्रहार करने लगे; घावों से बहते रुधिर से पुष्पित किंशुक-से शोभित हुए। थककर दोनों घुटनों के बल भूमि पर बैठ गए; पर निमेष-मात्र में कपिकुंजर अंगद दण्ड से आहत साँप-से, दीप्त-नेत्र होकर उठ खड़े हुए, और निर्मल-सुधौत खड्ग से रुधिर-स्नात वज्रदंष्ट्र का विशाल सिर काट डाला। रुधिर से सने उस राक्षस का घूमती आँखों वाला शुभ सिर खड्ग से कटकर, भूमि पर गिरकर दो टुकड़े हो गया।

वज्रदंष्ट्र को मरा देखकर भय-मोहित राक्षस, वानरों से पिटते हुए, विषण्ण-मुख, लज्जा से कुछ झुके सिर, दीन होकर लंका की ओर भाग गए। उसे मारकर, सेना के बीच पूजित, इन्द्र-समान महाबली वालिपुत्र अंगद, देवों से घिरे सहस्रनेत्र इन्द्र-से, हर्ष को प्राप्त हुए।

सार: अंगद और वज्रदंष्ट्र का लम्बा द्वन्द्व बाण, शिला, गदा, बाहु और अन्ततः खड्ग तक पहुँचता है; अंगद रुधिर से सने वज्रदंष्ट्र का सिर खड्ग से काट डालते हैं। राक्षस भयभीत होकर लंका भाग जाते हैं और अंगद इन्द्र-से सम्मानित होते हैं।

रावण का अकम्पन को भेजना और अन्धकार-युद्ध

वज्रदंष्ट्र को अंगद के हाथों मरा सुनकर रावण ने हाथ जोड़े खड़े सेनापति से कहा: सब शस्त्र-अस्त्रों में निपुण अकम्पन को आगे करके भीमविक्रम दुर्धर्ष राक्षस शीघ्र निकलें। यह शास्ता, गोप्ता और सेनानायक है, युद्ध में श्रेष्ठ, सदा मेरे हित का इच्छुक और समरप्रिय है। यह राम-लक्ष्मण और महाबली सुग्रीव को जीतेगा, और अन्य घोर वानरों को भी मारेगा, इसमें संदेह नहीं।

रावण की आज्ञा पाकर लघु-पराक्रमी महाबली सेनापति ने सेना भेजी। तब नाना शस्त्रधारी, भीमाक्ष, भीमदर्शन प्रमुख राक्षस सेनापति की प्रेरणा से निकल पड़े। तप्त-स्वर्ण से सजे विशाल रथ पर मेघ-वर्ण, मेघ-समान, मेघ-गर्जन-से महास्वर वाला अकम्पन घोर राक्षसों से घिरकर निकला; महायुद्ध में देवता भी जिसे कँपा न सकें, इसी से उसका नाम अकम्पन था। युद्ध-इच्छुक से दौड़ते उसके रथ के घोड़ों के मन में सहसा दीनता आ गई, उसकी बायीं आँख फड़की, मुख का वर्ण फीका पड़ा और स्वर गद्गद हो गया; सुदिन में दुर्दिन और रूखी वायु हो गई, और सब पशु-पक्षी क्रूर-भयावह बोली बोलने लगे।

इन उत्पातों की चिन्ता न करके सिंह-से कन्धों और बाघ-से पराक्रम वाला अकम्पन रणभूमि की ओर निकला। उसके राक्षसों समेत निकलते ही समुद्र को मानो क्षुब्ध करता महानाद उठा, जिससे विशाल वानर-सेना भयभीत हुई। वृक्ष-शैल-प्रहार से युद्ध को उद्यत वानरों और राक्षसों का घोर रौद्र युद्ध छिड़ गया; राम और रावण के लिए देह त्यागने को उद्यत वे सब अतिबल शूर पर्वत-से थे। एक-दूसरे को मारने की इच्छा से क्रोध में गरजते उनके घोष से धरती-आकाश गूँज उठे, और परस्पर उठी अरुण-वर्ण घोर धूल ने दसों दिशाएँ ढक लीं। उस रेशम-सी श्वेत धूल से ढके प्राणी रणभूमि में दीखते न थे; न ध्वज, न पताका, न ढाल, न घोड़ा, न शस्त्र, न रथ दिखता था। अन्धकार में वानर वानरों को और राक्षस राक्षसों को भी मारने लगे; अपने-परायों को मारकर वानर-राक्षसों ने भूमि को रुधिर से सींचकर कीचड़ कर दिया, और रुधिर से धूल बैठ गई, भूमि शवों से ढक गई।

वृक्ष, शक्ति, गदा, प्रास, शिला, परिघ और तोमरों से वे एक-दूसरे को कुचलने लगे। परिघ-समान भुजाओं से लड़ते भीमकर्मा वानरों ने पर्वत-से राक्षसों को मारा, और प्रास-तोमर लिए क्रुद्ध राक्षसों ने घोर शस्त्रों से वानरों को विदीर्ण किया। क्रुद्ध सेनापति अकम्पन उन सब भीमविक्रम राक्षसों को उत्साहित करता रहा। वानरों ने भी महावृक्षों और महाशिलाओं से, शस्त्र छीनकर, राक्षसों को विदीर्ण किया। तभी वीर वानर कुमुद, नल, मैन्द और द्विविद क्रुद्ध होकर उत्तम वेग से लीलापूर्वक नाना शस्त्रधारी राक्षसों का संहार करने लगे और उन्हें वृक्षों से मथ डाला।

समझने की कुंजी (अवधारणा): “अकम्पन” नाम का अर्थ है “जो कँपाया न जा सके।” वाल्मीकि बार-बार ऐसी नाम-व्युत्पत्तियाँ देते हैं (इन्द्रजित = इन्द्र-विजेता, अकम्पन = अकम्प)। यहाँ धूल से ढका अन्धकार-युद्ध वाल्मीकि का यथार्थवादी स्पर्श है: इतनी धूल कि अपने-पराये का भेद मिट जाता है और योद्धा अपनों को ही मार बैठते हैं।

सार: रावण अकम्पन को सेनापति बनाकर भेजता है। निकलते ही अपशकुन होते हैं। धूल से ढके घोर अन्धकार-युद्ध में अपने-पराये का भेद मिट जाता है; कुमुद, नल, मैन्द और द्विविद राक्षसों का भारी संहार करते हैं।

हनुमान के हाथों अकम्पन का वध

वानरश्रेष्ठों का वह महान कर्म देखकर अकम्पन को रण में तीव्र क्रोध आया। क्रोध से मूर्च्छित-रूप, अपना उत्तम धनुष कँपाता वह शत्रुओं का कर्म देखकर सारथि से बोला: हे सारथि, शीघ्र मेरा रथ वहीं ले चल जहाँ ये बलवान वानर बहुत राक्षसों को मार रहे हैं। ये बलवान और भीमकोप वानर वृक्ष-शैल लिए मेरे सामने डटे हैं। समर-श्लाघी इन्हें मैं मारना चाहता हूँ; इन्होंने राक्षसों की सारी सेना मसल डाली है।

तब रथिश्रेष्ठ अकम्पन तीव्र घोड़ों वाले रथ से दूर से ही बाण-जाल से वानरों पर टूट पड़ा। वानर खड़े न रह सके, युद्ध की तो बात ही क्या; अकम्पन के बाणों से भग्न होकर सब भागने लगे। बाणों से पीछा किए जाते अपने कुटुम्बीजनों को मृत्यु के वश देखकर महाबली हनुमान अकम्पन के पास पहुँचे। उस महावानर को देखकर कुमुद, नल आदि वानरश्रेष्ठ फिर एकत्र होकर, बलवान का सहारा पाकर, हर्षित होकर उन्हें घेर खड़े हुए।

अकम्पन ने पर्वत-से खड़े हनुमान पर महेन्द्र की वर्षा-धारा-सी बाण-वर्षा की। पर अपने शरीर पर पड़ती बाण-वर्षा की चिन्ता न करके हनुमान ने अकम्पन के वध पर मन लगाया। महातेजस्वी मारुतात्मज हनुमान हँसकर, धरती मानो हिलाते हुए, उस राक्षस की ओर दौड़े; गरजते-तेज से दीप्त उनका रूप जलती आग-सा दुर्धर्ष हो उठा। अपने को निरायुध जानकर क्रोध से हनुमान ने एक शैल उखाड़ा, एक हाथ से उठाकर, महानाद करके वीर्यवान हनुमान ने उसे घुमाया, और इन्द्र के नमुचि-वध-से अकम्पन की ओर दौड़े। पर अकम्पन ने आकाश में उठे उस पर्वत-शिखर को दूर से ही अर्धचन्द्र महाबाणों से चीर डाला। आकाश में राक्षस के बाणों से विदीर्ण-बिखरे उस शिखर को गिरा देखकर हनुमान क्रोध से मूर्च्छित हो उठे।

रोष-दर्प से भरे हनुमान ने महागिरि-से ऊँचे एक अश्वकर्ण वृक्ष को शीघ्र उखाड़ा, और परम प्रीति से उसे घुमाते हुए महावेग से दौड़कर चरणों से धरती फाड़ते, वृक्षों को तोड़ते आगे बढ़े। बुद्धिमान हनुमान ने हाथीसवार हाथियों, रथसवार रथियों और पदाति राक्षसों को मारा। वृक्ष-धारी, अन्तक-से प्राणहारी क्रुद्ध हनुमान को देखकर राक्षस भागने लगे। हनुमान को क्रुद्ध, झपटते देखकर वीर अकम्पन क्षुब्ध होकर गरजा, और देह-दारक चौदह तीक्ष्ण बाणों से महावीर्य हनुमान को बेध डाला। नाराचों और शक्तियों से बिंधे वीर हनुमान वृक्षों से ढके पर्वत-से दीखने लगे; महाकाय महाबली हनुमान पुष्पित अशोक-से और निर्धूम अग्नि-से शोभित हुए।

तब दूसरा वृक्ष उखाड़कर उत्तम वेग से हनुमान ने शीघ्र राक्षसेन्द्र अकम्पन के सिर पर मारा; उस महात्मा वानरेन्द्र के क्रोध-भरे वृक्ष-प्रहार से वह राक्षस अकम्पन गिरकर मर गया। अकम्पन को भूमि पर मरा देखकर सब राक्षस भूकम्प में हिलते वृक्षों-से व्यथित हो उठे। शस्त्र छोड़कर परास्त राक्षस त्रास से, वानरों से पिटते हुए, लंका की ओर भागे; बिखरे केश, सम्भ्रान्त, भग्न-गर्व, भय के पसीने से सने वे बार-बार पीछे देखते भागे। एक-दूसरे को कुचलते भय से नगर में घुस गए।

राक्षसों के लंका में घुस जाने पर सब महाबली वानर एकत्र होकर हनुमान की पूजा करने लगे; और सत्त्वसम्पन्न हनुमान ने भी मित्र-दृष्टि, वचन और भाव से यथायोग्य सबका सम्मान किया। विजय-दर्प से भरे वानर पूरी शक्ति से गरजे और अभी जीवित राक्षसों को फिर खींचने लगे। जैसे विष्णु ने सेना के अग्रभाग में महाबली असुरों को मारकर वीर-शोभा पाई थी, वैसे ही राक्षसों को मारकर महाकपि हनुमान ने वीर-शोभा प्राप्त की। उस समय देवगणों ने, स्वयं श्रीराम, महाबली लक्ष्मण, सुग्रीव-प्रमुख वानरों और महाबली विभीषण ने हनुमान का सम्मान किया।

सार: बाण-वर्षा से वानरों को भगाते अकम्पन के सामने हनुमान आते हैं; पहले वृक्ष-शिखर के प्रयोग, फिर अश्वकर्ण-वृक्ष से अन्ततः उसके सिर पर प्रहार कर उसे मार गिराते हैं। राक्षस भागकर लंका लौट जाते हैं और देवता-राम-वानर सब हनुमान का सम्मान करते हैं।

रावण का प्रहस्त को भेजना और उसका सेना-प्रस्थान

अकम्पन-वध सुनकर क्रुद्ध, कुछ दीनमुख राक्षसेश्वर रावण ने अपने मन्त्रियों की ओर देखा। क्षणभर सोचकर, मन्त्रियों से विचार करके, राक्षसाधिप रावण पूर्वाह्न में सब गुल्मों के निरीक्षण को लंका-नगरी में घूमा। राक्षसगणों से रक्षित, अनेक चौकियों से घिरी, पताका-ध्वज-मालिनी नगरी को देखकर, नगरी का घिरना देखकर, रावण ने अपने हितैषी और युद्ध-कुशल प्रहस्त से कहा: सहसा घिरी और पीड़ित इस नगरी का, हे युद्धविशारद, अन्य के युद्ध से मुझे कोई उद्धार नहीं दीखता। यह भार या तो मैं उठाऊँ, या कुम्भकर्ण, या आप मेरे सेनापति, या इन्द्रजित, या निकुम्भ। अतः आप शीघ्र इस सेना को लेकर, उसका भार सँभालकर, विजय के लिए वहाँ निकलिए जहाँ सब वानर एकत्र हैं। आपके निकलते ही गरजते राक्षसेन्द्रों का नाद सुनकर वानर-सेना भाग खड़ी होगी। चपल, अविनीत और चल-चित्त वानर आपकी गर्जना वैसे न सहेंगे जैसे हाथी सिंह-गर्जना। सेना के भागने पर निराश्रय राम लक्ष्मण समेत आपके वश में आ जाएँगे। निःसंशय संकट में मरना श्रेय है, बिना जोखिम के सहज मृत्यु नहीं; जो हमारे हित में, प्रिय हो या अप्रिय, आप ठीक समझें वह बताइए।

रावण के ऐसा कहने पर सेनापति प्रहस्त ने, मानो उशना (शुक्राचार्य) असुरेन्द्र बलि से कहते हों, राक्षसेन्द्र से कहा: हे राजन्, यह विषय पहले हम कुशल मन्त्रियों के साथ विचार चुके हैं; परस्पर के मत देखकर हमारे बीच विवाद भी हुआ था। मेरा दृढ़ मत था कि सीता लौटाने में ही हमारा श्रेय है; न लौटाने पर युद्ध ही दीखता था, और युद्ध ठीक वैसा ही आ पड़ा। आपने मुझे सदा दान, मान और भाँति-भाँति की मधुर वाणी से सम्मानित किया; फिर समय पर मैं आपका हित क्यों न करूँ? मुझे न प्राण की रक्षा है, न पुत्र-स्त्री-धन की; आप देखिए, मैं आपके लिए रण में अपना जीवन आहुति देने को तैयार हूँ।

स्वामी रावण से यह कहकर प्रहस्त ने सामने खड़े सेनापतियों से कहा: मेरे लिए शीघ्र राक्षसों की महाबल सेना जुटाओ; आज मेरे बाणों के वेग से रण में मारे गए वानरों के माँस से माँसभक्षी पक्षी तृप्त हों। उसका वचन सुनकर महाबली सेनापतियों ने रावण-भवन के पास सेना सजाई। क्षणभर में नाना भीषण शस्त्रधारी, गज-से राक्षस-वीरों से लंका भर गई। अग्निदेव को तृप्त करते और ब्राह्मणों को नमस्कार करते राक्षसों के बीच घी की सुगन्ध वाली वायु बही। संग्राम को तैयार हर्षित राक्षसों ने अभिमन्त्रित विविध मालाएँ धारण कीं; धनुष-कवच लिए, वेग से उछलकर वे रावण को देखकर प्रहस्त को घेर खड़े हुए।

राजा से विदा लेकर, भैरव नगाड़े बजवाकर प्रहस्त उस उत्तम रथ पर चढ़ा, जो महाजलद-सा गरजता, चन्द्र-सूर्य-सा दीप्त, सर्प-ध्वज से दुर्धर्ष, सुन्दर वरूथ (कवच) और स्वर्ण-जाल से सजा, श्री से मानो हँसता-सा था। रावण की आज्ञा पाकर प्रहस्त उस रथ पर चढ़कर विशाल सेना से घिरकर शीघ्र लंका से निकला। तब पर्जन्य-से दुन्दुभि-घोष, वाद्यों का नाद और शंख-शब्द पृथ्वी मानो भरते हुए सुनाई पड़े। भीमरूप महाकाय राक्षस घोर स्वर निकालते आगे चले; नरान्तक, कुम्भहनु, महानाद और समुन्नत, प्रहस्त के ये चार सचिव, उसे घेरकर निकले। हाथी-यूथ-से उस महान सेना से घिरकर वह पूर्व द्वार से निकला; समुद्र-सी अपार सेना से घिरा क्रुद्ध प्रहस्त कालान्तक यम-सा निकला।

उसके निकलते समय राक्षसों के घोष से लंका के सब प्राणी विकृत स्वर में चीख उठे; माँस-रक्त-भक्षी पक्षी आकाश में मँडराकर रथ पर अपसव्य (वाम) मण्डल बाँधने लगे। अपशकुन हुए: सियारिनें अग्नि उगलती चीखीं, आकाश से उल्का गिरी, रूखी वायु बही, ग्रह परस्पर भिड़े और मलिन दीखे, गधे-से गरजते मेघों ने प्रहस्त के रथ और आगे चलते राक्षसों पर रक्त बरसाया; ध्वज-अग्र पर दक्षिणमुख गीध बैठा, सारथि के हाथ से चाबुक बार-बार गिरा, उसका दुर्लभ निर्याण-तेज क्षणभर में बुझ गया और समतल भूमि पर भी घोड़े लड़खड़ाए। प्रसिद्ध गुण-पौरुष वाले उस प्रहस्त को निकलते देखकर नाना शस्त्रधारी वानर-सेना उससे भिड़ने आगे बढ़ी। वृक्ष उखाड़ते, भारी शिलाएँ उठाते वानरों का अत्यन्त तुमुल घोष उठा। गरजते राक्षसों और वानरों के नाद से दोनों सेनाएँ हर्षित हुईं। फिर दुर्बुद्धि प्रहस्त, बढ़ते वेग वाली उस वानर-सेना में पतंगे-से आग में, विजय के लिए घुसने लगा।

समझने की कुंजी (अवधारणा): प्रहस्त रावण का प्रधान सेनापति और पुराना नीति-सलाहकार है; वह स्वयं स्वीकारता है कि उसने सीता लौटाने की सलाह दी थी, पर अब स्वामिभक्ति से प्राण देने को तैयार है। उशना (शुक्राचार्य) और बलि का उपमान यह दिखाता है कि प्रहस्त रावण का गुरु-तुल्य मन्त्री है। यह राक्षस-पक्ष में भी कर्तव्य-निष्ठा का चित्र है।

सार: रावण अपने प्रधान सेनापति प्रहस्त को विशाल सेना के साथ भेजता है। प्रहस्त, जिसने पहले सीता लौटाने की सलाह दी थी, अब स्वामिभक्ति से प्राण देने को तैयार होकर नरान्तक आदि चार सचिवों समेत पूर्व द्वार से निकलता है; घोर अपशकुनों के बीच वह वानर-सेना में घुसता है।

नील के हाथों प्रहस्त का वध

रण को उद्यत प्रहस्त को निकलते देखकर शत्रुदमन श्रीराम ने मुस्कुराकर विभीषण से पूछा: यह महाकाय, बड़ी सेना से घिरा, महावेग से आता कौन है? इसका रूप, बल और पौरुष कैसा है? हे महाबाहो, इस वीर्यवान निशाचर को बताइए। राघव के वचन सुनकर विभीषण ने उत्तर दिया: यह रावण का सेनापति प्रहस्त नामक राक्षस है; लंका में राक्षसेन्द्र की एक-तिहाई सेना समेट कर यह बढ़ा है। यह वीर्यवान, अस्त्र-विशारद, शूर और सुप्रसिद्ध पराक्रमी है।

तब निकलते भीम-पराक्रमी, गरजते महाकाय, राक्षसों से घिरे प्रहस्त को महाबली वानर-सेना ने देखा; उनमें हलचल मच गई और वे प्रहस्त के सामने गरज उठे। खड्ग, शक्ति, ऋष्टि, शूल, बाण, मूसल, गदा, परिघ, प्रास और नाना फरसे लिए वानरों की ओर झपटते जय-इच्छुक राक्षसों के विचित्र धनुष शोभित हुए। युद्ध को आतुर वानरों ने पुष्पित वृक्ष, पर्वत-शिखर और विशाल-दीर्घ शिलाएँ उठा लीं। आमने-सामने आकर वानरों-राक्षसों का महायुद्ध छिड़ा; दोनों एक-दूसरे पर पत्थर और बाण-वर्षा करने लगे।

युद्ध में बहुत राक्षसों ने बहुत वानर-प्रमुखों को, और बहुत वानरों ने बहुत राक्षसों को मारा। कुछ वानर शूलों से मथे गए, कुछ परम-शस्त्रों से, कुछ परिघों से आहत, कुछ फरसों से कटे। कुछ प्राण-श्वास खोकर भूमि पर गिरे, कुछ बाण-संधान से बेधे जाकर हृदय-भिन्न हुए, कुछ खड्गों से दो टुकड़े होकर फड़कते गिरे, कुछ शूर राक्षसों से पार्श्व में चीरे गए। क्रुद्ध वानरों ने राक्षस-समूहों को वृक्षों-शिखरों से सब ओर भूमि पर कुचला; वज्र-स्पर्श-सी हथेलियों-मुक्कों से आहत राक्षस दाँत-आँखें टूटने से मुख से रक्त उगलने लगे। वानर-राक्षस आर्तनाद और सिंहनाद करते रहे, और घोर तुमुल शब्द उठा। वीर-मार्ग के अनुगामी, विकृत-मुख क्रूर वानर-राक्षस अभय-से कर्म करने लगे।

नरान्तक, कुम्भहनु, महानाद और समुन्नत, प्रहस्त के ये चारों सचिव, वानरों को मारने लगे। इनमें से वेग से दौड़ते-मारते नरान्तक को द्विविद ने एक गिरि-शिखर से मार गिराया। विशाल वृक्ष लिए उठकर वानर दुर्मुख ने शीघ्रहस्त समुन्नत को कुचल डाला। तेजस्वी जाम्बवान ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर महाशिला उठाकर महानाद की छाती पर पटकी। वीर्यवान कुम्भहनु ने तार से भिड़कर युद्ध किया, और तार ने महान वृक्ष से उसके प्राण ले लिए।

उस कर्म को न सहकर रथारूढ़ धनुर्धारी प्रहस्त ने वानरों का घोर संहार किया। युद्ध-दुर्मद वह क्रुद्ध राक्षस महान बाण-स्रोत से वानरों को पीड़ित करने लगा। वानर-राक्षसों के शवों के ढेरों से भरी भूमि घोर पर्वतों से ढकी-सी दीखी; रुधिर के स्रोत से ढकी वह भूमि वैशाख में पुष्पित पलाश-वृक्षों से सजी-सी चमकी।

एक उप-कथा: वाल्मीकि उस रणभूमि को एक नदी के रूपक में सुनाते हैं: मारे वीरों के ढेर उसके तट हैं, टूटे शस्त्र किनारे के विशाल वृक्ष, रुधिर का स्रोत उसका जल, यकृत-प्लीहा महाकीचड़, बिखरी आँतें सेवार, कटे धड़-सिर मछलियाँ, अंगों के टुकड़े तट की घास, गीध हंस, कंक बगुले, मेद का फेन, और घायलों के कराहना उसका कलकल। यह यम-सागर की ओर बहती, कायरों के लिए दुस्तर नदी थी। राक्षस और वानरश्रेष्ठ उस दुस्तर रण-नदी को वैसे ही पार कर गए जैसे वर्षा के अन्त में सुगम हुई, हंस-सारस से सेवित नदी को गजयूथपति।

तब नील ने रथ पर बैठे, बाण-स्रोत छोड़ते, वानरों को नष्ट करते प्रहस्त को देखा, और वेग से उसकी सेना को आकाश में मेघ-राशि-से उड़ाते हुए विदीर्ण करने लगा। उसे झपटते देखकर सेनापति प्रहस्त सूर्य-से दीप्त रथ से नील पर ही दौड़ा। धनुर्धरों में श्रेष्ठ प्रहस्त धनुष खींचकर नील पर बाण छोड़ने लगा; नील को बेधकर वे बाण वेग से क्रुद्ध सर्पों-से धरती में समा गए। बाणों से बिंधे महाबली नील ने वृक्ष उखाड़कर झपटते दुर्धर्ष प्रहस्त को मारा। नील से आहत क्रुद्ध प्रहस्त बाण-वर्षा करने लगा। उस दुरात्मा के बाण-समूह न रोक पाने पर नील ने, जैसे बैल शरद्-वर्षा को आँखें मूँदकर सहता है, वैसे ही आँखें मूँदकर वे दुस्सह बाण सहे; और महान साल-वृक्ष से नील ने प्रहस्त के घोड़े मार डाले।

रोष में आकर नील ने उस दुरात्मा का धनुष तोड़ डाला और बार-बार गरजा। धनुष-हीन होकर प्रहस्त रथ से कूदकर घोर मूसल लेकर नील की ओर दौड़ा। जातवैर, तरस्वी दोनों सेनापति रुधिर-स्नात मद-गजों-से खड़े हुए, तीक्ष्ण दाँतों से एक-दूसरे को चीरते सिंह-गज-से दीखे और सिंह-गज-से व्यवहार करते रहे। विक्रान्त, समर में पीठ न दिखाने वाले वे दोनों वीर वृत्र-इन्द्र-से यश पाने को उत्सुक थे। तब प्रहस्त ने नील के ललाट पर मूसल मारा, जिससे रक्त बहने लगा; पर रुधिर से सने नील ने एक महावृक्ष उठाकर क्रुद्ध होकर प्रहस्त की छाती पर दे मारा।

उस प्रहार की चिन्ता न करके बलवान प्रहस्त महान मूसल लिए नील पर दौड़ा। महावेग नील ने उसे आता देख एक महाशिला उठाई, और मूसल-योद्धा प्रहस्त के सिर पर शीघ्र वह शिला पटक दी। नील की फेंकी वह घोर महाशिला प्रहस्त के सिर को अनेक टुकड़ों में फोड़ गई; प्राण, श्री, सत्त्व और इन्द्रियों के जाने पर वह कटी जड़ वाले वृक्ष-सा सहसा भूमि पर गिर पड़ा। उसके भिन्न सिर और शरीर से पर्वत-झरने-सा रुधिर बहा। नील के हाथों प्रहस्त के मारे जाने पर वह अकम्प्य महाबली राक्षस-सेना अप्रसन्न होकर लंका लौट गई। सेनापति के मारे जाने पर वे टूटे बाँध के जल-से ठहर न सके, और तीव्र शोक-सागर में डूबकर मानो विसंज्ञ हो गए। निरुद्यम होकर वे रावण-भवन जाकर चिन्ता से अवाक् हो गए। विजयी महाबली नील राम-लक्ष्मण से मिलकर, अपने सुकृत कर्म के लिए प्रशंसित होकर परम हर्षित हुए।

सार: प्रहस्त के चार सचिव द्विविद, दुर्मुख, जाम्बवान और तार के हाथों मारे जाते हैं। फिर बाण-वर्षा करते प्रहस्त से नील का घोर द्वन्द्व होता है; नील पहले उसके घोड़े-धनुष नष्ट करते हैं, फिर मूसल-प्रहार सहकर महाशिला से प्रहस्त का सिर फोड़ डालते हैं। सेनापति-वध से राक्षस-सेना भग्न होकर लंका लौट जाती है।

रावण का स्वयं रणभूमि में आना और श्रीराम से प्रथम पराजय

वानरश्रेष्ठ नील के हाथों सेनापति प्रहस्त के मारे जाने पर भीमायुध, समुद्र-वेग-सी रावण की सेना भाग खड़ी हुई। बचे राक्षसों ने रावण के पास जाकर बताया कि अग्निपुत्र नील के हाथों सेनापति प्रहस्त मारा गया। उनका वचन सुनकर राक्षसाधिप क्रोध के वश हो गया। प्रहस्त के वध से शोक-ग्रस्त, क्रोधार्दित रावण ने, मानो इन्द्र देव-सेनापतियों से कहते हों, राक्षस-यूथपतियों से कहा: जिसने इन्द्र की सेना को मसलने वाले मेरे सेनापति को अनुयायियों और हाथियों समेत मार डाला, उस शत्रु की अवज्ञा न की जाए। अतः शत्रु-नाश और विजय के लिए मैं स्वयं, बिना विचार किए, उस अद्भुत रण-शीर्ष पर जाऊँगा। आज वानर-सेना और लक्ष्मण समेत राम को मैं दीप्त अग्नियों से वन-सा बाण-स्रोत से जला दूँगा; आज वानरों के रक्त से पृथ्वी को तृप्त करूँगा।

ऐसा कहकर इन्द्र-शत्रु रावण ने उत्तम-घोड़ों से जुते, स्वर्ण-ढाँचे से दीप्त, अग्नि-से जलते रथ पर आरोहण किया। शंख-भेरी-पणव-घोष, करताल, हुंकार और सिंहनाद तथा पुण्य स्तुतियों से सम्मानित होकर वह राक्षसराज निकला। पर्वत-मेघ-से रूप, अग्नि-से दीप्त नेत्र, माँसभक्षी राक्षसों से घिरा वह राक्षसराज भूतों से घिरे रुद्र-सा शोभित हुआ। महौजस्वी रावण सहसा लंका से निकलकर वृक्ष-शिला-हस्त, समुद्र-सी गरजती, मेघ-सी थर्राती उग्र वानर-सेना के सामने पहुँचा।

अति-प्रचण्ड राक्षस-सेना देखकर भुजगेन्द्र-सी भुजाओं वाले, सेना-अनुगत, पृथु-श्री श्रीराम ने शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ विभीषण से पूछा: नाना पताका-ध्वज-छत्रों से युक्त, प्रास-असि-शूल-शस्त्रों से सजी, अभीरु सैनिकों और महेन्द्र-से हाथियों वाली यह अक्षोभ्य सेना किसकी है? विभीषण ने एक-एक प्रमुख का परिचय दिया: नूतन सूर्य-से ताम्र-मुख, हाथी पर चढ़ा वह वीर अकम्पन है। सिंह-ध्वज, इन्द्र-धनुष-से धनुष कँपाता, उग्र दाँतों से हाथी-सा रथारूढ़ वरदान-प्रधान वह इन्द्रजित है। विन्ध्य-अस्ताचल-महेन्द्र-से महाकाय, अतुल धनुष खींचता रथी अतिकाय है। नूतन सूर्य-से ताम्र-नेत्र, हाथी पर चढ़ा, घण्टा-घोष-से चिग्घाड़ता वह महोदर है। स्वर्ण-जटित घोड़े पर सन्ध्या-मेघ-गिरि-से, प्रास उठाए, वज्र-से वेगवान वह पिशाच है। तीक्ष्ण शूल लिए, चन्द्र-से उज्ज्वल वृषभेन्द्र पर चढ़ा वह यशस्वी त्रिशिरा है। मेघ-से रूप, चौड़ी छाती, वासुकि-ध्वज, धनुष खींचता वह कुम्भ है। स्वर्ण-वज्र-जटित, दीप्त-सधूम परिघ लिए राक्षस-सेना का केतु-स्वरूप अद्भुत-घोरकर्मा वह निकुम्भ है। चाप-असि-बाण-युक्त, पताकाधारी, अग्नि-से दीप्त रथ पर बैठा नगशृंगयोधी वह नरान्तक है। बाघ-ऊँट-गज-मृग-अश्व-मुख वाले विकृत-नेत्र भूतों से घिरा, चन्द्र-से श्वेत छत्र वाला, सुर-दर्प-हन्ता वह स्वयं राक्षसाधिप है। मुकुट और झूलते कुण्डल पहने, हिमालय-विन्ध्य-से भीमकाय, महेन्द्र-यम का दर्प चूर करने वाला वह सूर्य-सा दीप्त राक्षसेश्वर है।

तब शत्रुदमन श्रीराम ने विभीषण से कहा: अहो, दीप्त-महातेजस्वी राक्षसेश्वर रावण! सूर्य-सा दुष्प्रेक्ष्य रावण किरणों से चमक रहा है; तेज से ढका इसका रूप मैं स्पष्ट नहीं देख पाता। देव-दानव-वीरों का शरीर भी ऐसा नहीं होता जैसा यह राक्षसेन्द्र का शरीर शोभित है। इसके योद्धा सब पर्वत-से, पर्वत-योद्धा, दीप्त शस्त्रधारी हैं। भूतों से घिरा यह रावण घोर-रूप क्रूर भूतों से घिरे अन्तक-सा दीखता है। सौभाग्य से आज यह पापात्मा मेरी दृष्टि के मार्ग में आ गया; आज मैं सीता-हरण से उपजा अपना क्रोध मुक्त करूँगा। ऐसा कहकर वीर्यवान श्रीराम धनुष और उत्तम बाण लेकर, लक्ष्मण को अनुगामी बनाकर खड़े हुए।

तब महाबली रावण ने पास आए राक्षसों से कहा: निःशंक होकर, मुख्य द्वारों, गृहों और गोपुरों पर सुख से डटे रहो; मेरे यहाँ आने से नगरी सूनी जानकर, यह छिद्र पाकर कहीं वानर एकत्र होकर इस दुष्प्रसह नगरी को मथकर सहसा ध्वस्त न कर दें। मन्त्रियों और राक्षसों को यथानियोग विदा करके रावण, बड़े महासमुद्र को चीरते महामत्स्य-सा, वानर-सागर को विदीर्ण करने लगा। दीप्त धनुष-बाण लिए राक्षसेन्द्र को रण में सहसा आते देखकर वानरराज सुग्रीव महान पर्वत-शिखर उखाड़कर उसकी ओर दौड़े; पर रावण ने स्वर्ण-पुंख बाणों से वह शिखर बीच में ही चीर डाला। फिर रावण ने महासर्प-सा, अन्तक-सा घोर बाण धनुष पर सन्धान कर, सुग्रीव की ओर वज्र-अशनि-सा वेगवान छोड़ा। रावण-भुज से छूटा वह बाण सुग्रीव के पास पहुँचकर उन्हें वैसे बेध गया जैसे कार्तिकेय की उग्र शक्ति ने क्रौंच पर्वत को। बाण से आहत मूर्च्छित सुग्रीव कूजते हुए भूमि पर गिर पड़े, और भूमि पर गिरे विसंज्ञ देखकर हर्षित राक्षस गरजे।

तब गवाक्ष, गवय, सुषेण, ऋषभ, ज्योतिर्मुख और नल, ये महाकाय वानर, शैल उखाड़कर राक्षसेन्द्र की ओर दौड़े; पर तीक्ष्ण बाणों से रावण ने उनके प्रहार निष्फल कर दिए और सोने-से चित्रित पुंख वाले बाणों से उन वानरेन्द्रों को बेध डाला। बाणों से बिंधे महाकाय वीर वानर भूमि पर गिरे, और रावण ने उस घोर वानर-सेना को बाण-जाल से ढक दिया। बाणों से पीड़ित, गिरते वे वीर भय के शल्य से बिंधकर शरण्य श्रीराम की शरण में दौड़े। तब महात्मा श्रीराम धनुष लेकर सहसा आगे बढ़े; पर लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर निवेदन किया: हे आर्य, इस दुरात्मा के वध में मैं समर्थ हूँ; हे प्रभो, मुझे आज्ञा दीजिए, मैं ही इसे मार डालूँगा।

श्रीराम ने कहा: हे लक्ष्मण, जाओ और प्रयत्न-तत्पर होकर युद्ध करो। रावण महावीर्य और रण में अद्भुत-पराक्रमी है; क्रुद्ध होने पर तीनों लोकों के लिए भी दुष्प्रसह है। इसके छिद्र खोजो और अपने छिद्रों की रक्षा करो; आँख और धनुष से सावधान होकर अपनी रक्षा करो। राघव की यह सीख सुनकर, उन्हें आलिंगन-पूजन-अभिवादन करके सौमित्रि लक्ष्मण युद्ध को चले।

हाथी-सूँड़-सी भुजाओं वाले, भीम दीप्त धनुष उठाए रावण को, बाण-वर्षा से वानरों को देह-छिन्न करते देखकर, महातेजस्वी मारुति हनुमान बाण-जाल रोककर रावण की ओर दौड़े। उसके रथ के पास पहुँचकर, दाहिनी भुजा उठाकर, रावण को त्रास देते हुए बुद्धिमान हनुमान बोले: देव-दानव-गन्धर्व-यक्ष-राक्षसों से आपको अवध्यता का वर मिला है, पर वानरों से आपको भय है। मेरा यह उठा हुआ पाँच-शाखाओं (अँगुलियों) वाला दाहिना हाथ चिरकाल से आपके शरीर में बसे भूतात्मा (जीव) को बाहर निकाल देगा।

हनुमान का वचन सुनकर भीमविक्रम रावण रक्त-नेत्र होकर बोला: निःशंक होकर शीघ्र प्रहार कीजिए और स्थिर कीर्ति पा लीजिए; आपका पराक्रम जानकर फिर मैं आपको नष्ट कर दूँगा। हनुमान ने कहा: स्मरण कीजिए, आपके पुत्र अक्ष को मैंने पहले ही मार डाला था। यह सुनकर महातेजस्वी रावण ने हथेली से पवनपुत्र की छाती पर प्रहार किया; आहत हनुमान बार-बार डगमगाए, पर क्षणभर में धैर्य धरकर महामति तेजस्वी हनुमान स्थिर हो गए, और क्रुद्ध होकर हथेली से ही उस देव-शत्रु पर प्रहार किया। महात्मा वानर के थप्पड़ से दशग्रीव रावण भूकम्प में हिलते पर्वत-सा झकझोरा गया। रावण को थप्पड़ से आहत देखकर ऋषि, वानर, सिद्ध, देव और असुर हर्ष-नाद कर उठे। साँस सँभालकर उत्साही रावण बोला: हे वानर, शाबाश! आप वीर्य में मेरे श्लाघनीय शत्रु हैं। हनुमान ने उत्तर दिया: हे रावण, धिक्कार है मेरे वीर्य को, जो आप अब भी जीवित हैं; एक बार और प्रहार कीजिए, रे दुर्बुद्धि, क्या बखानते हैं? तब मेरी मुट्ठी आपको यमलोक भेज देगी।

हनुमान के वचन से रावण का क्रोध प्रज्वलित हो उठा; रक्त-नेत्र रावण ने यत्न से दाहिनी मुट्ठी बाँधकर वेग से हनुमान की छाती पर मारी। चौड़ी छाती में आहत हनुमान बार-बार डगमगाए। हनुमान को विह्वल देखकर अतिरथी रावण नील की ओर बढ़ा। बाण-स्रोत से आहत वानर-सेनापति नील ने एक हाथ से शैल-शिखर उठाकर राक्षसाधिप पर फेंका; पर महातेजस्वी रावण ने सात तीक्ष्ण बाणों से वह शिखर चूर कर दिया। तब विश्राम पाए महामना हनुमान ने युद्ध-इच्छुक होकर रोष से कहा: हे रावण, नील से लड़ते हुए आपका अन्य पर झपटना उचित नहीं। शिखर चूर देखकर परवीरहन्ता नील संवर्तक अग्नि-सा क्रोध से जल उठा।

नील अश्वकर्ण, साल, पुष्पित आम और नाना वृक्ष फेंकने लगा; पर रावण उन्हें काटकर घोर बाण-वर्षा से अग्निपुत्र नील को ढकने लगा। मेघ से ढके महापर्वत-से नील ने अपना रूप छोटा करके रावण के ध्वज-अग्र पर छलाँग लगाई। ध्वज-अग्र पर बैठे नील को देखकर रावण क्रोध से जल उठा, और नील ध्वज-अग्र, धनुष-अग्र, मुकुट-अग्र पर कूदते-गरजते दीखे; लक्ष्मण, हनुमान और श्रीराम भी उसकी इस लाघव-क्रीड़ा से अति-विस्मित हुए। कपि के लाघव से विस्मित रावण ने दीप्त अद्भुत आग्नेय अस्त्र मँगाया। नील-लाघव से रावण को घबराया देखकर लब्ध-लक्ष्य वानर हर्ष से चीख उठे। ध्वज-शीर्ष पर बैठे नील को देखकर रावण ने आग्नेय अस्त्र से युक्त बाण लेकर कहा: हे कपि, आप उत्तम माया और लाघव से युक्त हैं; यदि सामर्थ्य हो तो प्राण बचा लीजिए। आप चाहे जितने अपने रूप बना लें, तब भी अस्त्र-युक्त मेरा छोड़ा बाण आपको प्राणों से वियुक्त कर देगा। ऐसा कहकर रावण ने नील को अस्त्र-युक्त बाण से मारा; आग्नेय बाण से छाती में आहत निर्दह्यमान नील सहसा भूमि पर गिर पड़े, पर पिता अग्नि के माहात्म्य और अपने तेज से वे केवल घुटनों के बल गिरे, प्राणों से वियुक्त न हुए।

नील को विसंज्ञ देखकर रण-उत्सुक दशग्रीव रावण मेघ-घोष रथ से लक्ष्मण की ओर दौड़ा। दीप्त होकर खड़े होकर उसने धनुष टंकारा। उसे ललकारते देखकर अविस्मित लक्ष्मण ने कहा: हे निशाचरेन्द्र, आज मुझसे लड़िए; वानरों से युद्ध आपके योग्य नहीं। लक्ष्मण की प्रतिपूर्ण घोष-वाणी और उग्र ज्या-शब्द सुनकर रावण क्रुद्ध होकर बोला: हे राघव, सौभाग्य से आप मेरी दृष्टि में आए; अब मेरे बाण-जाल से पीड़ित होकर इसी क्षण यमलोक जाएँगे। लक्ष्मण ने उत्तर दिया: हे पापिष्ठ, महाप्रभाव वाले गरजते नहीं; आप व्यर्थ बखानते हैं। हे राक्षसेन्द्र, मैं आपका बल-प्रताप-पराक्रम जानता हूँ; बाण-धनुष लिए मैं खड़ा हूँ, आइए, व्यर्थ बखान से क्या लाभ?

क्रुद्ध रावण ने सुन्दर पुंख वाले सात बाण छोड़े, पर लक्ष्मण ने स्वर्ण-पुंख तीक्ष्ण बाणों से उन्हें काट डाला। कटे साँपों-से बाण देखकर क्रुद्ध रावण ने और तीक्ष्ण बाण छोड़े; लक्ष्मण ने क्षुर, अर्धचन्द्र, उत्तम कर्णि और भल्ल बाणों से उन्हें भी काटकर निर्भय रहे। बाण-जाल निष्फल देखकर रावण लक्ष्मण के लाघव पर विस्मित होकर फिर तीक्ष्ण बाण छोड़ने लगा; इन्द्र-तुल्य लक्ष्मण ने भी जलती बिजली-से वेगवान बाण धनुष पर सन्धान कर रावण-वध को छोड़े। उस छिन्न-धनुष राक्षसेन्द्र को लक्ष्मण ने तीन बाणों से मारा; बाणों से आहत रावण मूर्च्छित होकर कठिनाई से होश में आया।

तब क्रुद्ध रावण ने स्वयम्भू ब्रह्मा की दी हुई, प्रलयाग्नि-शिखा-सी दीप्त शक्ति लक्ष्मण की छाती में मारी। ब्रह्मा की उस शक्ति से छाती में आहत होकर भी सौमित्रि लक्ष्मण ने अपने को विष्णु का अमीमांस्य (अचिन्त्य) अंश स्मरण किया। तब देव-कण्टक रावण दानव-दर्प-हन्ता लक्ष्मण को भुजाओं से दबाकर भी उठा न सका, जिन भुजाओं से हिमालय, मन्दर, मेरु, अथवा देवसहित तीनों लोक भी उठाए जा सकते थे, उन्हीं भुजाओं से भरतानुज लक्ष्मण न उठ सके।

तब क्रुद्ध वायुपुत्र हनुमान रावण की ओर दौड़े और वज्र-से मुक्के से उसकी छाती पर प्रहार किया; उस मुक्के से राक्षसेश्वर रावण घुटनों के बल भूमि पर गिरा, डगमगाया और मूर्च्छित हो गया। मुख, नेत्र और कानों से बहुत रुधिर बहा; घूमता-निश्चेष्ट वह रथ के पिछले भाग में बैठ गया, विसंज्ञ-मूर्च्छित होकर स्थान भी न पा सका। भीमविक्रम रावण को रण में विसंज्ञ देखकर ऋषि, वानर, देव-असुर हर्ष-नाद कर उठे। तब तेजस्वी हनुमान ने रावण से आहत लक्ष्मण को भुजाओं में भरकर राघव के पास पहुँचाया; वायुपुत्र के परम स्नेह-भक्ति से शत्रुओं के लिए अकम्प्य लक्ष्मण उनके लिए हल्के हो गए। तभी वह शक्ति युद्ध-पराजित लक्ष्मण को छोड़कर रावण के रथ में अपने स्थान लौट गई। होश में आते महातेजस्वी रावण ने भी तीक्ष्ण बाण और महाधनुष उठा लिए; और लक्ष्मण भी विष्णु का अमीमांस्य अंश स्मरण करके आश्वस्त, विशल्य (शल्य-रहित) हो गए।

वानरों की महासेना के मार-गिराए जाने और महावीरों के पतन को देखकर श्रीराम रावण की ओर बढ़े। हनुमान ने पास आकर कहा: हे प्रभो, जैसे विष्णु ने गरुड़ पर चढ़कर देव-शत्रु को दण्डित किया था, वैसे ही आप मेरी पीठ पर चढ़कर इस राक्षस को शासित कीजिए। यह सुनकर श्रीराम सहसा महाकपि हनुमान की पीठ पर चढ़े और रण में रथारूढ़ रावण को देखा। उसे देखकर महातेजस्वी श्रीराम, चक्र उठाए क्रुद्ध विष्णु-से बलिपुत्र की ओर, रावण की ओर दौड़े। वज्र-निष्पेष-से कठोर तीव्र ज्या-शब्द करते हुए गम्भीर वाणी में श्रीराम ने राक्षसेन्द्र से कहा: ठहरिए, ठहरिए! मुझे ऐसा अप्रिय करके, हे राक्षस-व्याघ्र, कहाँ जाकर आप मुक्ति पाएँगे? इन्द्र-यम-सूर्य, ब्रह्मा-अग्नि-शिव की शरण जाएँ, या दसों दिशाओं में भागें, तब भी आज मुझसे छूट न पाएँगे। जिस लक्ष्मण को आज आपने शक्ति से आहत कर मूर्च्छित किया, मेरे पास आकर वही आपका, आपके पुत्र-पौत्रों समेत मृत्यु बनेगा। इसी मुझ शत्रु ने जनस्थान में उत्तम-अस्त्रधारी, अद्भुतदर्शन चौदह हजार राक्षसों का संहार किया था।

राघव के वचन सुनकर महाबली रावण ने श्रीराम को रण में पीठ पर धारण करते महावेग वायुपुत्र हनुमान को प्रलयाग्नि-शिखा-से दीप्त बाणों से मारा। पर रावण के बाणों से आहत होने पर भी स्वभाव-तेजस्वी हनुमान का तेज और बढ़ गया। हनुमान को रावण से आहत देखकर महातेजस्वी श्रीराम क्रोध के वश हुए, और रावण के पास आकर उसका रथ, चक्र, घोड़े, ध्वज, छत्र, महापताका, सारथि, अशनि-शूल-खड्ग समेत तीक्ष्ण बाण-अग्रों से चूर कर दिया। फिर वज्र-अशनि-सा दीप्त बाण से इन्द्र-शत्रु रावण की चौड़ी-सुन्दर छाती पर वैसा प्रहार किया जैसे इन्द्र वज्र से मेरु पर। इन्द्र के वज्र या अशनि के प्रहार से भी न डगमगाने वाला, न क्षुब्ध होने वाला राजा रावण श्रीराम के बाण से आहत होकर अत्यन्त आर्त होकर डगमगाया और धनुष गिरा बैठा। उसे विह्वल देखकर महात्मा श्रीराम ने एक दीप्त अर्धचन्द्र बाण उठाकर सहसा रावण का सूर्य-वर्ण मुकुट काट डाला।

तब विष-रहित साँप-से, कान्ति-हीन सूर्य-से, श्रीहीन, कटे मुकुट वाले राक्षसेन्द्र से श्रीराम ने कहा: हे राक्षस, आपने महान भीषण कर्म किया और मेरे प्रवीर सैनिक मारे; इससे थका जानकर मैं आज बाणों से आपको मृत्यु के वश नहीं करता। हे रात्रिचर-राज, रण से पीड़ित आप अब लंका में लौट जाइए; विश्राम करके, रथ-धनुष लेकर फिर निकलिए, तब रथ में बैठे आप मेरा बल देखेंगे। ऐसा सान्त्वना पाकर वह राजा, जिसका दर्प-हर्ष चूर हुआ, धनुष कटा, घोड़े-सारथि मरे, महामुकुट टूटा और जो बाणों से बिंधा था, सहसा लंका में लौट गया। उस इन्द्र-शत्रु, देव-दानव-शत्रु महाबली रावण के लौट जाने पर श्रीराम ने लक्ष्मण के साथ महायुद्ध के मुहाने पर वानरों के शरीरों से बाण निकाल दिए। उस देवराज-शत्रु के परास्त होने पर देव, दिक्पाल, समुद्र, ऋषि, महानाग और भूमि-जल के प्राणी सब हर्षित हुए।

समझने की कुंजी (अवधारणा): इस सर्ग में श्रीराम रावण को मारते नहीं, मुकुट काटकर अपमानित कर लौटा देते हैं। यह वाल्मीकि का सुविचारित संयम है: रावण थका हुआ है, और शूर पर थके शत्रु को नहीं मारते। “विश्राम करके फिर आइए” कहना युद्ध-धर्म (क्षात्र-मर्यादा) है, करुणा-प्रदर्शन नहीं। लक्ष्मण और श्रीराम का अपने को “विष्णु का अचिन्त्य अंश” स्मरण करना यहाँ संक्षिप्त संकेत-मात्र है; वाल्मीकि इसे विस्तार नहीं देते।

सार: प्रहस्त-वध से क्रुद्ध रावण स्वयं रणभूमि में आता है, सुग्रीव-नील समेत कई वानरों और हनुमान-लक्ष्मण को आहत करता है, ब्रह्म-शक्ति से लक्ष्मण को मूर्च्छित कर देता है। हनुमान की पीठ पर चढ़कर श्रीराम रावण का रथ, धनुष, घोड़े, सारथि और मुकुट काट डालते हैं; पर थके रावण को न मारकर, “विश्राम करके फिर आइए” कहकर लज्जित लौटा देते हैं। रावण की प्रथम पराजय पर सब लोक हर्षित होते हैं।

मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, युद्धकाण्ड (गीता प्रेस गोरखपुर)।