
गृध्रराज सम्पाति की बात अभी पूरी ही हुई थी कि उनके दोनों पार्श्वों (बगलों) में सुन्दर पंखों की एक जोड़ी फूट निकली। वानरों के सामने, उन्हीं की आँखों के आगे, वह पुराना, झुलसा हुआ शरीर फिर से उड़ने योग्य हो उठा। जिस पक्षीराज ने रावण का पता और सीता की दिशा बताकर इन थके-हारे वानरों में प्राण फूँक दिए थे, उसी के अपने पंख लौट आए। यह वह घड़ी थी जब निराशा का अन्धकार छँटकर साहस का प्रकाश उभरा, और जब दक्षिण-समुद्र के तट पर खड़े वानरों के सामने वह अथाह जल फैल गया जिसे लाँघना आकाश को लाँघने जैसा जान पड़ता था।
सम्पाति के पंख लौट आए, और वानर दक्षिण को चले
सम्पाति वानरों से कह रहे थे कि किस प्रकार ऋषि निशाकर (वह तपस्वी जिनके आश्रय में सम्पाति ने अपने जले पंखों के साथ वर्षों काटे) उन्हें प्रशस्त वचनों से सान्त्वना देकर, अनुमति लेकर अपने आश्रम लौट गए थे। उन्होंने कहा कि उस घटना को आज तक आठ हज़ार से अधिक वर्ष बीत गए (टीकाकारों ने मूल के “वर्ष-शत” को असंख्य अर्थ में लेकर, सम्पाति के पहले कथन से संगति बैठाने के लिए यह संख्या निकाली)। उन्होंने कहा, “ऋषि के वचन हृदय में धारण करके हम उस पूर्वकथित देश और काल की प्रतीक्षा में रहे।”

सम्पाति ने आगे कहा, “निशाकर मुनि अपनी आयु का अन्त पाकर स्वर्ग सिधार गए, तब अनेक सन्देहों से घिरकर सन्ताप हम पर छाने लगा। आत्महत्या का जो विचार बीच-बीच में हमारे मन में उठता, उसे हम मुनि के वचन स्मरण करके लौटा देते। प्राणों की रक्षा का जो दृढ़-निश्चय उन्होंने हमारे भीतर जगाया था, वह हमारे दुख को वैसे ही हर लेता जैसे अग्नि की प्रज्वलित शिखा अन्धकार को। दुरात्मा रावण के पराक्रम को जानकर हमने अपने पुत्र (सुपार्श्व) को उलाहना भी दिया था कि उसने सीता को क्यों न छुड़ाया। सीता का करुण क्रन्दन सुनकर, और दोनों राजकुमारों (श्रीराम और लक्ष्मण) के सीता-वियोग को जानकर भी, हमारे पुत्र ने वह कार्य न किया जो हमें प्रिय होता, अर्थात् सीता को छुड़ाने का पूरा प्रयत्न, यद्यपि वह समर्थ था और सम्राट दशरथ के प्रति हमारे स्नेह को देखते हुए उसे यह करना चाहिए था।”
इसी प्रकार सम्पाति वनवासी वानरों से बातें कर रहे थे कि उन्हीं वानरों के सम्मुख उनके पार्श्वों में दो नवीन पंख प्रकट हो गए। रक्तवर्ण के नवांकुरित पंखों से ढका अपना शरीर देखकर सम्पाति को अतुलनीय हर्ष हुआ, और उन्होंने वानरों से कहा, “अमित-तेजस्वी राजर्षि निशाकर के अनुग्रह से, हमारे जो पंख सूर्य की किरणों से पूर्णतः जल गए थे, वे फिर नए सिरे से उग आए हैं। आज हम अपने भीतर वही पराक्रम, बल और तेज पाते हैं जो हमारी युवावस्था में था। सीता का पता लगाने में पूरा यत्न कीजिए; आप अवश्य सीता को खोज लेंगे।”
“पंखों की यह पुनः-प्राप्ति आपकी सिद्धि का प्रमाण है,” यह कहकर पक्षियों में श्रेष्ठ सम्पाति, यह देखने के लिए कि पक्षी किस प्रकार उड़ता है, पर्वत-शिखर से आकाश में उड़ चले। उनके ये वचन सुनकर वानर-श्रेष्ठों का मन परम प्रसन्न हो उठा, और वे अपने पराक्रम पर आश्रित अपनी सिद्धि के प्रति आशावान हो गए।
वायु के समान वेग वाले, अपना खोया पौरुष फिर से पाए हुए वे वानरयूथपति (वानर-समूहों के नायक) जनकनन्दिनी सीता को खोजने को उत्सुक होकर दक्षिण दिशा की ओर बढ़े, उसी दिशा की ओर जिसमें अभिजित् नक्षत्र (ज्योतिषियों ने जिसे विजय से जोड़ा है) सर्वप्रथम उदित होता है।
सार: सम्पाति की कृतज्ञता-भरी कथा अभी समाप्त ही हुई थी कि उनके जले पंख फिर उग आए; यह शुभ-शकुन सिद्धि का प्रमाण बना, और वायु-वेग वाले वानर अभिजित्-नक्षत्र की दिशा में, अर्थात् दक्षिण की ओर सीता की खोज में बढ़ चले।
समुद्र के सामने वानरों का अवसाद, और अंगद का आह्वान
गृध्रराज से सीता का पता पाकर सिंह के समान पराक्रमी वानर, सब एक साथ, पूरी ऊँचाई पर उछलते हुए, प्रीति से भरकर सिंह-गर्जना करने लगे। सम्पाति के वचन सुनकर हर्षित वे वानर, सीता-दर्शन के अभिलाषी, उस समुद्र की ओर चले जो रावण के निवास तक का मार्ग था।

उस प्रदेश में, अर्थात् समुद्र-तट पर, पहुँचकर भयंकर पराक्रम वाले वानरों ने वह समुद्र देखा जिसमें समस्त विशाल नक्षत्र-मण्डल का पूरा प्रतिबिम्ब ठहरा हुआ था। दक्षिण-समुद्र (वह जलराशि जो भारत के दक्षिण फैली है) के उत्तरी छोर पर ठीक से पहुँचकर असाधारण बलशाली वानर-वीर वहीं ठहर गए। वह समुद्र कहीं ऐसा जान पड़ता था मानो गहरी निद्रा में सोया हो, कहीं ऐसा मानो क्रीड़ा कर रहा हो, और कहीं पर्वतों जितनी ऊँची जलराशियों से ढका था। पाताल (नीचे की सातवीं अधोलोक-भूमि) में बसने वाले दानवेन्द्रों से वह भरा था और रोंगटे खड़े कर देने वाला था; उसे देखकर वानर-गजेन्द्र (हाथियों के समान विशाल वानर) अवसाद में डूब गए।
आकाश के समान दुर्लंघ्य उस समुद्र को देखकर सभी वानर एक साथ खिन्न हो उठे और एक स्वर में बोले, “अब हमारा कार्य कैसे सिद्ध होगा?” समुद्र के निरीक्षण से अपनी सारी सेना को विषादग्रस्त और भय से पीड़ित देखकर, वानरों में श्रेष्ठ अंगद ने उन्हें इस प्रकार आश्वासन दिया।
“मन को विषाद के वश में न होने दीजिए; विषाद परम हानिकारक है। वह मनुष्य को वैसे ही नष्ट कर देता है जैसे क्रुद्ध सर्प किसी शिशु को। जो पुरुष पराक्रम का अवसर उपस्थित होने पर विषाद के वश हो जाता है, तेज से हीन उस पुरुष का पुरुषार्थ फल नहीं देता।” वह रात बीत जाने पर अंगद ने वानरों तथा वृद्ध हरि-नायकों के साथ बैठकर फिर से मन्त्रणा की। अंगद को चारों ओर से घेरे वह वानर-सेना ऐसी शोभा पा रही थी जैसे इन्द्र को घेरे मरुद्गणों (वायु-देवताओं) की सेना। वालिपुत्र अंगद और हनुमान को छोड़कर उस वानर-सेना को थामकर रोक सकने वाला और कौन था?

उन वृद्ध वानरों तथा समस्त सेना का सम्मान करते हुए शत्रुओं का दमन करने वाले श्रीमान अंगद ने ये अर्थपूर्ण वचन कहे, “इस समय कौन महातेजस्वी वानर समुद्र को लाँघेगा? कौन सत्यप्रतिज्ञ, शत्रुदमन सुग्रीव को उनकी प्रतिज्ञा में सच्चा सिद्ध करेगा? कौन वीर सौ योजन (अथवा आठ सौ मील) की दूरी लाँघ सकेगा? और कौन इन समस्त यूथपतियों को इस महान भय से, अर्थात् सुग्रीव के कोप के भय से, मुक्त करेगा? किसकी कृपा से हम कृतकार्य और सुखी होकर यहाँ से लौटकर अपनी पत्नी, पुत्रों और घर को देख सकेंगे? किसकी कृपा से महाबली श्रीराम और लक्ष्मण से तथा वानरराज सुग्रीव से प्रसन्न होकर मिल सकेंगे? यदि आप में से कोई वानर समुद्र लाँघने में समर्थ है, तो वह इसी स्थान पर शीघ्र हमें एक पवित्र वर-स्वरूप प्रतिज्ञा देकर हमारा भय दूर करे।”
अंगद के ये वचन सुनकर किसी ने कुछ न कहा। वह समस्त वानर-वाहिनी (सेना) वहाँ मानो स्तब्ध, निश्चल खड़ी रह गई। वानरों में श्रेष्ठ अंगद ने फिर उन वानरों से कहा, “आप सब बलवानों में अग्रगण्य और अटल पराक्रम वाले हैं। निष्कलंक कुल में उत्पन्न, अपने पराक्रम के लिए राजसभा में बार-बार सम्मानित हुए हैं। आप में से किसी की गति में कभी कोई बाधा नहीं रही। इसलिए, हे वानर-श्रेष्ठगण, बताइए कि कौन कितनी दूर तक छलाँग लगा सकता है?”
सार: रावण-निवास तक के मार्ग-स्वरूप अथाह दक्षिण-समुद्र को देखकर वानर-सेना अवसाद और भय में डूब गई; अंगद ने विषाद की हानि समझाते हुए सबको ललकारा कि कौन सौ योजन लाँघकर सुग्रीव की प्रतिज्ञा सच्ची करेगा। सब मौन रहे, तब अंगद ने फिर पूछा कि प्रत्येक अपनी छलाँग की सामर्थ्य बताए।
हर वानर अपनी छलाँग की माप बताता है, और जाम्बवान की दुविधा
अंगद के वचन सुनकर सब वानर-श्रेष्ठों ने क्रमशः अपनी-अपनी छलाँग की सामर्थ्य उस स्थान पर बतायी। ये नायक थे: गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, और उसी प्रकार द्विविद, सुषेण तथा जाम्बवान। एक-एक करके उन्होंने अपनी गति बतायी।

गज ने कहा, “हम दस योजन (अस्सी मील) तक छलाँग लगा सकते हैं।” गवाक्ष ने कहा, “हम बीस योजन (एक सौ साठ मील) की दूरी लाँघ सकेंगे।” वानर शरभ ने उन वानरों से कहा, “हे वानरगण, हम एक ही छलाँग में तीस योजन (दो सौ चालीस मील) जाएँगे।” वानर ऋषभ ने उस स्थान पर वानरों से कहा, “हम एक छलाँग में चालीस योजन (तीन सौ बीस मील) जाएँगे; इसमें सन्देह नहीं।” गन्धमादन ने वानरों से कहा, “हम तो एक छलाँग में पचास योजन (चार सौ मील) पार करेंगे; इसमें सन्देह नहीं।”
वानर मैन्द ने वहाँ वानरों से कहा, “हम अधिक से अधिक साठ योजन (चार सौ अस्सी मील) तक छलाँग लगा सकते हैं।” महातेजस्वी द्विविद ने तब उस अवसर पर कहा, “हम सत्तर योजन (पाँच सौ साठ मील) पार करेंगे; इसमें सन्देह नहीं।” महातेजस्वी, सत्त्वशील, कपिश्रेष्ठ सुषेण ने कहा, “हम दृढ़ता से घोषणा करते हैं कि हम अस्सी योजन (छह सौ चालीस मील) लाँघ सकते हैं।”
उन सबको इस प्रकार बोलते देख, सबका सम्मान करके, उन सब में आयु में जो ज्येष्ठतम थे, उन जाम्बवान ने तब इस प्रकार निवेदन किया, “पूर्वकाल में हम में भी कुछ गति-पराक्रम था। अब तो हम आयु के अन्तिम छोर पर पहुँच गए हैं। फिर भी ऐसी स्थिति में इस कार्य की उपेक्षा सम्भव नहीं, जिसके लिए कपिराज सुग्रीव और श्रीराम भी दृढ़-निश्चयी हैं। इस समय हमारी जो गति है, उसे सुनिए: हम निश्चय ही एक छलाँग में नब्बे योजन (सात सौ बीस मील) पार करेंगे; इसमें सन्देह नहीं।”
फिर जाम्बवान ने उन सब वानर-श्रेष्ठों से यह कहा, “निश्चय ही पहले गति में हमारा पराक्रम केवल इतना ही न था। राजा बलि (विरोचन-पुत्र) के उस प्रसिद्ध यज्ञ में, जब सर्वव्यापी, सनातन भगवान त्रिविक्रम (जिन्होंने तीन डगों में समस्त ब्रह्माण्ड नाप लिया था) अपने पग बढ़ा रहे थे, तब हमने उनकी प्रदक्षिणा की थी। हम वही अब वृद्ध हो गए, छलाँग में मन्द पड़ गए; युवावस्था में हमारा बल अप्रतिम और परम था। अब तो आज स्वयं की गति से इतना ही सम्भव है, और इतनी सामर्थ्य से इस कार्य की सिद्धि नहीं होगी।”
जाम्बवान का सम्मान करते हुए तब बुद्धिमान महाकपि अंगद ने उदार अर्थ वाला यह उत्तर दिया, “हम यह सौ बड़े योजन (आठ सौ मील) अवश्य पार कर लेंगे, किन्तु लौटने की शक्ति रहेगी या नहीं, यह निश्चित नहीं।” वाक्य-कुशल जाम्बवान ने वानर-श्रेष्ठ अंगद से कहा, “हे हरि और ऋक्षों (वानरों और भालुओं) में रत्न, आपकी गति-शक्ति हम जानते हैं। आप भले ही सौ या हज़ार योजन तक छलाँग लगाकर लौट आएँ, किन्तु निश्चय ही यह नियम के विरुद्ध है। हे प्रिय अंगद, जो स्वामी किसी अभियान पर भेजता या निर्देश देता है, वह किसी भी प्रकार स्वयं भेजे या निर्देशित किए जाने योग्य नहीं होता। हे वानर-रत्न, इसके विपरीत, हम सब आपके द्वारा भेजे जाने योग्य हैं।”
एक उप-कथा: जाम्बवान की त्रिविक्रम-प्रदक्षिणा वामन-अवतार का स्मरण है। दैत्यराज बलि के यज्ञ में भगवान विष्णु ने वामन रूप में तीन पग भूमि माँगकर दो ही डगों में पृथ्वी और स्वर्ग नाप लिए और तीसरा पग बलि के सिर पर रखा। तब वे विराट त्रिविक्रम-रूप में थे; उसी प्रदक्षिणा को जाम्बवान अपने अति-दीर्घ आयु और प्राचीन बल के प्रमाण-रूप में सुना रहे हैं। यह प्रसंग आगे (सर्ग 66) में और विस्तार से लौटेगा।
जाम्बवान ने आगे कहा, “हे शत्रुदमन, आप तो अपने स्वामी-भाव में स्थित होने के कारण हमारे लिए कुलवधू के समान रक्षणीय हैं; सेना का स्वामी कुलगृहिणी के समान रक्षणीय होता है, यही नियम है। हे शत्रुदमन, इसके अतिरिक्त आप ही इस कार्य के, अर्थात् सीता-खोज के, मूल हैं। हे प्रिय, इसीलिए आप सदा कुलवधू के समान रक्षित रहने योग्य हैं। कार्य का मूल सावधानी से रक्षित रखना चाहिए; यही कार्य के मर्मज्ञों की नीति है। मूल के बने रहने पर ही समस्त गुण फलते हैं। इसलिए, हे सत्य-पराक्रमी, आप ही इस कार्य के साधन हैं और इसकी कुंजी हैं, क्योंकि आप बुद्धि और पराक्रम से समृद्ध हैं। हे कपिश्रेष्ठ, आप हमारे गुरु और गुरु-पुत्र दोनों हैं; आपका आश्रय लेकर ही हम अर्थ-सिद्धि में समर्थ होंगे।”
इन वचनों को कहने वाले महाप्राज्ञ जाम्बवान को महाकपि वालिपुत्र अंगद ने यह उत्तर दिया, “हे वीर, आपके उस कार्य का तनिक भी अंश नहीं छोड़ा जाएगा। हम अभी उसको प्रेरित करते हैं जो हमारा कार्य अवश्य सिद्ध करेगा। यदि हम न जाएँ और कोई अन्य वानर-श्रेष्ठ भी न जाए, तो निश्चय ही हमें फिर आमरण-अनशन (प्रायोपवेशन) करना पड़ेगा। उस बुद्धिमान कपिराज सुग्रीव का सन्देश पूरा किए बिना, वहाँ (किष्किन्धा) जाकर भी हमें प्राणों की रक्षा का कोई उपाय नहीं दीखता। वह कपीश्वर सुग्रीव प्रसन्न होने और अत्यन्त क्रुद्ध होने, दोनों में पूर्ण समर्थ हैं; उनका सन्देश उल्लंघकर जाने पर विनाश ही होगा। इसलिए इस कार्य की गति अन्यथा न हो, यह उपाय आप ही, जो हर सत्य के ज्ञाता हैं, सोचने योग्य हैं।”

अंगद के इन वचनों के उत्तर में उस अवसर पर प्रसिद्ध, वीर, वानरों और भालुओं में रत्न जाम्बवान ने अंगद से यह उत्तम वचन कहा, “हे वीर, आपके उस कार्य का कुछ भी नहीं छोड़ा जाएगा। हम उसी को प्रेरित करते हैं जो यह कार्य सिद्ध करेगा।” तब वानरों और भालुओं में अग्रगण्य वीर जाम्बवान ने उस वानर-प्रवीर हनुमान को ही प्रेरित किया, जो एकान्त में अलग बैठे सुख से विश्राम कर रहे थे।
सार: गज से लेकर सुषेण तक प्रत्येक ने दस से अस्सी योजन तक की बढ़ती छलाँग बतायी; जाम्बवान नब्बे, और अंगद पूरे सौ योजन जा सकते हैं पर लौटने की निश्चयता नहीं। जाम्बवान ने नीति बतायी कि स्वामी और कार्य का मूल स्वयं अभियान पर नहीं जाता, और अन्ततः एकान्त में बैठे हनुमान की ओर मुड़े।
समझने की कुंजी (योजन का आधुनिक समतुल्य): मूल में एक योजन को टीका आठ मील के बराबर मानती है। इस गणना से दस योजन = अस्सी मील, सौ योजन = आठ सौ मील। समुद्र की चौड़ाई सौ योजन (आठ सौ मील) बतायी गई है, और इसीलिए केवल वही वानर पार जा सकता है जो सौ योजन एक ही छलाँग में लाँघ सके।
जाम्बवान हनुमान को उनका जन्म और वरदान स्मरण कराते हैं
अनेक लाख वानरों की उस विषादग्रस्त वाहिनी को देखकर जाम्बवान ने हनुमान से इस प्रकार कहा, “हे वानर-राज्य के वीर, हे समस्त शास्त्रों के ज्ञाताओं में रत्न, एकान्त में चुपचाप बैठकर, हे हनुमान, आप कुछ क्यों नहीं कहते? हे हनुमान, आप तो वानरराज सुग्रीव के समान हैं, और तेज तथा बल में श्रीराम और लक्ष्मण के भी समकक्ष हैं। हे हरिश्रेष्ठ, बल, बुद्धि, तेज और सत्त्व आपको समस्त प्राणियों से विशिष्ट बनाते हैं।
“अरिष्टनेमि (कश्यप) के पुत्र, विनता से उत्पन्न महाबली गरुड़ की भाँति आप विख्यात हैं, और समस्त पक्षियों में श्रेष्ठ हैं। महाबाहु, महाबली वह गरुड़ पक्षी समुद्र से विशाल सर्पों को उठाते हुए हमने अनेक बार देखा है। उसके पंखों में जो बल है और आपकी भुजाओं का जो बल-पराक्रम है, वे समान हैं; आपका पराक्रम और वेग भी उससे किसी प्रकार कम नहीं। तब आप अपने को इस साहसिक कार्य के लिए तैयार क्यों नहीं करते?”
जाम्बवान ने हनुमान का जन्म-वृत्तान्त सुनाया, “अप्सराओं में श्रेष्ठ, विख्यात पुञ्जिकस्थला नाम की एक अप्सरा थी। एक ऋषि के शाप से वह महात्मा कुञ्जर नामक वानर-प्रमुख की पुत्री होकर जन्मी और अञ्जना नाम से विख्यात हुई। वह वानर केसरी की पत्नी हुई, तीनों लोकों में प्रसिद्ध और रूप में पृथ्वी पर अनुपम थी। यद्यपि वानर-रूप में रहती थी, इच्छानुसार रूप बदल सकती थी। एक बार मानव-रूप धारणकर, रूप और यौवन से शोभायमान, विचित्र पुष्प-आभूषणों से सजी, रेशमी वस्त्र पहने अञ्जना वर्षा-काल के मेघ-समान एक पर्वत-शिखर पर विचर रही थी।
“पर्वत-शिखर पर खड़ी उस विशाल-नयना के पीत, रक्त-किनारी वाले शुभ वस्त्र को वायु-देव ने धीरे-से हटा दिया। तब उन्होंने उसकी गोल, सुगठित जंघाएँ, सघन उभरे स्तन तथा सुन्दर, मनोहर मुख देखे। विस्तीर्ण कटि, क्षीण कमर और सर्वांग-सुन्दर उस यशस्विनी को देखते ही वायु-देव कामवश हो गए। मन्मथ (कामदेव) से सर्वांग आविष्ट, आत्म-विस्मृत होकर मारुत ने अपनी दीर्घ भुजाओं से उस अनिन्द्य सुन्दरी को आलिंगन में भर लिया।” यह वर्णन मूल वाल्मीकि के अद्भुत-रस में है; इसमें कल्पित इन्द्रिय-अन्तरंगता न जोड़ी जाए, केवल यही कहा जाए जो ऋषि ने कहा।
जाम्बवान ने आगे कहा, “तब उसी क्षण घबराकर उस सुव्रता अञ्जना ने कहा, ‘मेरे इस एक-पति-व्रत को कौन भंग करना चाहता है?’ अञ्जना का यह वचन सुनकर वायु-देव ने उत्तर दिया, ‘हे सुश्रोणि, हम आपका कुछ अहित नहीं कर रहे; आपके मन में कोई भय न हो। हे यशस्विनी, आपका आलिंगन करके हम मन से आप में प्रविष्ट हुए हैं; इससे आपको एक ऐसा पुत्र होगा जो बलवान और बुद्धि-सम्पन्न होगा। महान सत्त्व, महान तेज, महान बल और पराक्रम से युक्त वह कूदने और छलाँग लगाने में हमारे समान होगा।’
“इन वचनों से सन्तुष्ट होकर, हे महाकपि, हे महाबाहु, हे वानर-श्रेष्ठ, आपकी माता ने एक गुफा में आपको जन्म दिया। एक विशाल वन में नवजात आपने उदित होते सूर्य को देखा, और उसे फल समझकर पाने की इच्छा से, हे महाकपि, आप आकाश में उछल पड़े। तीन हज़ार योजन से अधिक ऊँचाई तक उड़कर भी आप सूर्य के तेज से लौट दिए गए, फिर भी विषाद को प्राप्त न हुए।
समझने की कुंजी (तीन हज़ार योजन): मूल में “शतानि त्रीणि योजनानाम्” है। टीकाकारों ने अंकों को उलटे क्रम में पढ़ने के नियम (अंकानां वामतो गतिः) से इसे तीन हज़ार से अधिक माना, ताकि उत्तरकाण्ड के उस कथन से संगति बैठे जहाँ हनुमान का अनेक हज़ार योजन उड़ना कहा गया है।
“आपको शीघ्र ही आकाश में उठते देखकर, क्रोध से भरे इन्द्र ने आप पर वज्र फेंका और आपको पर्वत-शिखर पर पटक दिया, जिससे आपकी बाईं हनु (ठोड़ी) टूट गई। उसी समय से आपका नाम ‘हनुमान’ (टूटी हनु वाला) प्रसिद्ध हुआ। आपको आहत देखकर गन्ध-वहन करने वाले वायु-देव स्वयं अत्यन्त क्रुद्ध हो गए और प्रभञ्जन वायु ने तीनों लोकों में बहना बन्द कर दिया। वायु के अभाव में तीनों लोक क्षुब्ध हो उठे, और सब देवता घबरा गए; भुवनेश्वर ब्रह्मा आदि क्रुद्ध वायु-देव को मनाने लगे।
“वायु-देव के प्रसन्न होने पर, हे प्रिय, हे सत्य-पराक्रमी, ब्रह्मा ने आपको यह वर दिया कि आप युद्ध में किसी शस्त्र से वध्य न होंगे। वज्र-प्रहार और पर्वत-शिखर पर पटके जाने पर भी आपको दुख से मुक्त देखकर, प्रसन्न-हृदय सहस्र-नेत्र इन्द्र ने भी आपको यह उत्तम वर दिया कि हे प्रभो, मृत्यु आपको तभी आएगी जब आप स्वयं मरना चाहेंगे। इस प्रकार आप एक ओर केसरी के क्षेत्रज पुत्र हैं और भयंकर पराक्रम वाले हैं; दूसरी ओर वायु-देव के औरस पुत्र होने से तेज में उनके समान हैं, और छलाँग में भी उनके समान हैं।
“हमारी जीवन-शक्ति अब प्रायः समाप्त है; इस समय आप ही हम में दक्षता और पराक्रम से सम्पन्न, मानो दूसरे वानरराज सुग्रीव हैं। त्रिविक्रम-अवतार के अवतरण के समय, हे प्रिय, हमने पर्वतों, वनों और कानन-सहित समस्त पृथ्वी की इक्कीस बार प्रदक्षिणा की थी। तब देवताओं की आज्ञा से वे ओषधियाँ भी हमने अकेले एकत्र की थीं जिनसे क्षीर-सागर मथकर अमृत निकाला गया, क्योंकि उस समय हम में असाधारण बल था। अब हम वृद्ध और पराक्रम-हीन हो गए हैं; इस समय आप ही समस्त गुणों से युक्त हैं।
“इसलिए, हे पराक्रमी, अपना अपार बल प्रकट कीजिए, क्योंकि आप वानरों में श्रेष्ठ हैं; समस्त वानर-वाहिनी आपका पराक्रम देखने को उत्सुक है। हे हनुमान, उठिए, हे वानर-व्याघ्र, इस महासागर को लाँघिए; क्योंकि समस्त प्राणियों में, हे हनुमान, आपकी गति परम है। समस्त वानर विषादग्रस्त हैं, हे हनुमान, आप उनकी उपेक्षा क्यों करते हैं? हे महावेग, अपना पराक्रम वैसे ही प्रकट कीजिए जैसे भगवान विष्णु ने त्रिविक्रम-अवतार में ब्रह्माण्ड नापने को तीन डग भरे।”
वानरों में अग्रगण्य जाम्बवान से इस प्रकार प्रेरित होकर, और अपनी पराक्रम-शक्ति के प्रति आश्वस्त वायु-पुत्र कपि-श्रेष्ठ हनुमान ने उसी क्षण अपना शरीर बढ़ाया, और उस वानर-वीरों की सेना को अत्यन्त हर्ष से भर दिया।
सार: जाम्बवान ने हनुमान को गरुड़-तुल्य बताकर उनका जन्म सुनाया: अञ्जना से वायु-देव का संकल्प, सूर्य को फल समझकर शिशु हनुमान का उछलना, इन्द्र के वज्र से हनु-भंग और ‘हनुमान’ नाम, तथा ब्रह्मा (अशस्त्र-वध्यता) और इन्द्र (इच्छा-मृत्यु) के वरदान। यह सुनकर हनुमान ने अपना शरीर बढ़ाया और सेना हर्षित हो उठी।
हनुमान का विराट रूप और महेन्द्र-पर्वत पर आरोहण
हनुमान को सौ योजन लाँघने के लिए अपना शरीर बढ़ाते और वेग से भरते देख, वानर शोक त्यागकर, हर्ष से भरकर सिंह-गर्जना करने लगे और महाबली हनुमान की स्तुति करने लगे। परम हर्षित और विस्मित वे वानर उन्हें चारों ओर से वैसे देख रहे थे जैसे त्रिविक्रम का संकल्प करते हुए भगवान नारायण (विष्णु) को समस्त प्रजाएँ देखती हैं।
स्तुति किए जाते हुए महाबली हनुमान का शरीर बढ़ता गया, और हर्ष से अपनी पूँछ घुमाते हुए उन्होंने अपना सहज बल स्मरण किया। आयु में बड़े वानर-श्रेष्ठों द्वारा स्तुति किए जाते और तेज से भरते हुए उनका रूप अनुपम हो उठा। जैसे विशाल पर्वत-गुफा में सिंह अपने अंग फैलाता है, वैसे ही वायु-पुत्र हनुमान अब अंगड़ाई लेकर रूप बढ़ाने लगे। जम्हाई लेते उस बुद्धिमान हनुमान का मुख प्रज्वलित भट्ठी अथवा धूम-रहित अग्नि के समान देदीप्यमान दीख रहा था।
वानरों के मध्य से उठकर, हर्ष से रोमांचित, वृद्ध वानरों को प्रणाम करके हनुमान ने यह कहा, “अग्नि के मित्र, पर्वत-शिखरों को तोड़ने वाले, आकाश में विचरण करने वाले वायु-देव बलवान और अपरिमेय हैं। उस शीघ्र-वेग, शीघ्र-गामी महात्मा वायु-देव के औरस पुत्र हम हैं, और छलाँग में उनके समान हैं। आकाश को छूते-से विस्तीर्ण मेरु-पर्वत की हम बिना रुके सहस्र बार परिक्रमा कर सकते हैं। अपनी भुजाओं के वेग से समुद्र को धकेलकर हम पर्वतों, नदियों और सरोवरों-सहित समस्त लोक को जल-मग्न कर सकते हैं। हमारी जंघाओं और पिंडलियों के वेग से क्षुब्ध होकर वरुणालय समुद्र, अपने विशाल ग्राहों (मगरमच्छों) को सतह पर उठाते हुए, उमड़ पड़ेगा।
“सर्पों का भक्षण करने वाले, पक्षियों से सेवित गरुड़ (विनता-पुत्र) की भी, जब वह आकाश में उड़ रहा हो, हम सहस्र बार प्रदक्षिणा कर सकते हैं। पूर्व-पर्वत से उदित, अपने किरण-मण्डल से जाज्वल्यमान सूर्य को पश्चिम में अस्त होने से पूर्व ही हम जा पकड़ सकते हैं। फिर पृथ्वी को छुए बिना, उसी महान भयंकर वेग से, हे वानर-श्रेष्ठगण, हम सूर्य के अस्त होने से पहले लौट भी सकते हैं। आकाश में विचरण करने वाले समस्त ज्योतिर्मण्डलों को दौड़ में पीछे छोड़ सकते हैं, समुद्रों को सुखा सकते हैं और पृथ्वी को विदीर्ण कर सकते हैं। छलाँग लगाते हुए पर्वतों को चूर्ण कर सकते हैं; वेग से उछलकर महासागर का अन्त पा सकते हैं।
“लताओं और वृक्षों के नाना प्रकार के पुष्प आज आकाश में छलाँग लगाते हुए मेरे पीछे-पीछे चलेंगे। आकाश में मेरा मार्ग आकाशगंगा (स्वाति-मार्ग) के समान होगा। समस्त प्राणी मुझे भयंकर आकाश में उछलते, उड़ते और फिर उतरते देखेंगे; हे वानरगण, महामेरु-समान मुझे आकाश को ढकते और मानो निगलते हुए आप देखेंगे। एकाग्र मन से छलाँग लगाते हुए मैं मेघों को बिखेर दूँगा, पर्वतों को कँपा दूँगा और समुद्र को सुखा दूँगा। ऐसी सामर्थ्य या तो गरुड़ में है, या मेरे जनक वायु-देव में, या मुझ में। सुपर्ण-राज गरुड़ और महाबली वायु-देव को छोड़कर, उस प्राणी को मैं नहीं देखता जो मेरी छलाँग का अनुगमन कर सके।
“पलक झपकते ही, बादल से छूटी बिजली की भाँति, मैं सहसा निरालम्ब आकाश को आच्छादित कर लूँगा। समुद्र लाँघते समय मेरा रूप वैसा ही होगा जैसा त्रिविक्रम-अवतार में तीन डग भरते भगवान विष्णु का था। बुद्धि से मैं देख पाता हूँ, और मेरा मन तथा चेष्टा भी यही संकेत करते हैं कि मैं वैदेही सीता को देख सकूँगा; इसलिए, हे वानरगण, हर्षित होइए। वेग में वायु-देव के और जवन (फुर्ती) में गरुड़ के समान, मेरी धारणा है कि मैं एक छलाँग में दस हज़ार योजन (अस्सी हज़ार मील) तक जा सकता हूँ। पराक्रम दिखाकर मैं वज्रधारी इन्द्र अथवा स्वयम्भू ब्रह्मा के हाथों से भी अमृत बलपूर्वक यहाँ ले आ सकता हूँ। मेरी धारणा है कि मैं लंका को भी उखाड़कर ले जा सकता हूँ।”
इस प्रकार गर्जना करते उस अमित-प्रभ वानर-श्रेष्ठ को वहाँ एकत्र हर्षित और विस्मित वानर देखते रहे। हनुमान के ये ज्ञातिजनों (अपने जनों) का शोक दूर करने वाले वचन सुनकर, परम हर्षित वानर-भालुओं के नायक जाम्बवान ने कहा, “हे वीर, हे केसरी-पुत्र, हे वेगवान वायु-पुत्र, हे प्रिय, आपने अपने ज्ञातिजनों का विपुल शोक दूर कर दिया। आपके कल्याण की कामना करने वाले एकत्र कपि-मुख्य, एकाग्र-मन से आपकी अर्थ-सिद्धि के लिए मंगल-पाठ करेंगे। ऋषियों के प्रसाद से, वृद्ध वानरों की सम्मति से, और गुरुजनों के अनुग्रह से आप सहज ही महासागर लाँघ जाइए। आपके लौटने तक हम एक पैर पर खड़े रहेंगे; क्योंकि समस्त वनवासी वानरों के प्राण आप पर ही टिके हैं।”
तब वानरों में व्याघ्र-समान हनुमान ने उन वानरों से कहा, “छलाँग लगाते समय जो वेग मैं डालूँगा, उसे लोक में कोई धारण न कर सकेगा। शिला-समूह से शोभित उस महेन्द्र-पर्वत के ये शिखर दृढ़ और विशाल हैं। नाना वृक्षों से बिखरे, धातु-निक्षेपों से सुशोभित महेन्द्र-पर्वत के ये विशाल शिखर, जिन पर मैं अपना वेग डालूँगा, निःसन्देह मेरे उस वेग को धारण कर लेंगे जब मैं यहाँ से सौ योजन (आठ सौ मील) की छलाँग लगाऊँगा।” तब वायु-तुल्य उस वायु-पुत्र हरि-श्रेष्ठ, शत्रु-मर्दन हनुमान ने पर्वतों में श्रेष्ठ महेन्द्र पर आरोहण किया, जो वृक्षों से झरे पुष्पों से बिछा था, लताओं और उन पर खिले फूलों से सघन था, सदा फूल-फल से लदे वृक्षों से ढका था, सिंह और व्याघ्रों से युक्त था, मद-मत्त हाथियों से सेवित, मतवाले पक्षी-समूहों के कलरव से गुंजायमान, झरनों से भरा, और हरी घास के मैदानों में विचरते हिरणों से शोभित था।
विशाल शिखरों से ऊँचे उठे उस महेन्द्र-पर्वत पर, महेन्द्र-समान पराक्रमी महाबली हरिश्रेष्ठ हनुमान विचरण करने लगे। उस महात्मा के दोनों पैरों से दबा वह विशाल पर्वत वैसे चीत्कार कर उठा (अपने प्राणियों के रूप में) जैसे सिंह से आहत मद-मत्त विशाल हाथी। उसकी शिला-राशियाँ टूट-बिखर गईं और उसने नए जल-स्रोत छोड़े; उस पर बसे हिरण और हाथी भयभीत हो उठे और विशाल वृक्ष प्रचण्ड वेग से हिल उठे। उसके विशाल शिखर मद्यपान और सहवास में अति-आसक्त गन्धर्व-युगलों से, उड़ते पक्षियों से, और विद्याधरों (आकाशचारी कलाकारों) के समूहों से रिक्त होने लगे; वहाँ रहने वाले विशाल सर्प बिलों में छिप गए और शिखरों से शिलाएँ गिरने लगीं।
आधे-बाहर निकले, फुफकारते उन सर्पों से वह पर्वत उस समय मानो ध्वजाओं से सज्जित दीख रहा था। भय से व्याकुल ऋषियों द्वारा त्यागा गया वह शिला-समूह उस समय वैसा निराश्रित दीखता था जैसे विशाल वन में अपने सार्थ (साथी-दल) से बिछुड़ा कोई पथिक। तब वेगवान, वेग में ही चित्त लगाए, मनस्वी, महानुभाव, परवीर-हन्ता वानर-प्रवीर हनुमान अपना मन एकाग्र करके मन ही मन लंका को चल पड़े।
सार: हनुमान ने विराट रूप धारणकर अपनी अपार सामर्थ्य की गर्जना की: मेरु की परिक्रमा, सूर्य को जा पकड़ना, समुद्र-शोषण, दस हज़ार योजन की छलाँग, और सीता-दर्शन का दृढ़ विश्वास। जाम्बवान के आशीर्वाद और मंगल-कामना के साथ उन्होंने महेन्द्र-पर्वत पर चढ़कर, सम्पूर्ण पर्वत को कँपाते हुए, मन ही मन लंका की ओर प्रस्थान का संकल्प कर लिया।
मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, किष्किन्धाकाण्ड (गीता प्रेस गोरखपुर)।