
मय दानव वासुदेव के सामने अर्जुन के निकट हाथ जोड़कर खड़ा हुआ और मीठे वचनों में बार-बार बोला कि कुन्ती के पुत्र, आपने हमें उस क्रोध में उमड़ते हुए कृष्ण से और हमें भस्म कर देने को आतुर पावक (अग्नि) से बचाया है, अब कहिए कि हम आपकी क्या सेवा करें। अर्जुन ने उत्तर दिया कि हे महान असुर, आपने यह प्रस्ताव रखकर ही सब कुछ कर दिया, आप कल्याण के पात्र हैं, जहाँ इच्छा हो वहाँ सुख से जाइए, हम पर प्रसन्न रहिए जैसे हम आप पर प्रसन्न हैं। पर मय का मन यों ही न माना। उसने कहा कि वह दानवों में विश्वकर्मा है, परम कलाकार है, और कुछ रचकर ही रहेगा। तब अर्जुन ने कहा कि यदि आप अपने को मृत्यु के मुख से बचा हुआ मानते हैं तो भी हम आपसे अपने लिए कुछ नहीं करवाएँगे, किन्तु आपकी इच्छा भी न तोड़ेंगे; आप कृष्ण के लिए कुछ कीजिए, वही हमारी सेवा का पर्याप्त बदला होगा। मय के आग्रह पर कृष्ण ने एक क्षण विचार किया और फिर आज्ञा दी कि यदि दिति-पुत्र, आप सचमुच धर्मराज युधिष्ठिर का भला करना चाहते हैं तो ऐसी एक सभा (राजसभा-भवन) रचिए जिसकी नकल मनुष्यलोक के लोग ध्यान से बैठकर देखकर भी न कर सकें, और जिसमें देव, असुर और मनुष्य तीनों की रचना-कला एक साथ दिखे। यह सुनकर मय अत्यन्त प्रसन्न हुआ।
मय की अद्भुत सभा का निर्माण
कृष्ण और पार्थ ने राजा युधिष्ठिर को सब बात बताकर मय का परिचय कराया। युधिष्ठिर ने मय का सम्मानपूर्वक स्वागत किया और मय ने वह सम्मान बड़ा मानकर स्वीकार किया। उस महान दिति-पुत्र ने पाण्डवों को दानव वृषपर्वा की कथा सुनाई, फिर कुछ विश्राम करके बहुत सोच-विचार के बाद भवन रचने में जुट गया। शुभ दिन पर नींव के मांगलिक कर्म करके, हज़ारों वेदपाठी ब्राह्मणों को दूध-भात और भाँति-भाँति की भेंटों से तृप्त करके, उसने पाँच हज़ार हाथ चौकोर भूमि नापी, जो हर ऋतु के अनुकूल भवन के लिए उपयुक्त थी।

कुछ समय खाण्डवप्रस्थ में सुखपूर्वक रहकर जनार्दन (कृष्ण) एक दिन अपने पिता के दर्शन को द्वारका जाने को उत्सुक हुए। उन्होंने युधिष्ठिर और कुन्ती को प्रणाम किया, अपनी बहन सुभद्रा से स्नेहपूर्ण वचन कहे, द्रौपदी और पुरोहित धौम्य से विदा ली, और स्नान कर गरुड़-ध्वजवाले स्वर्ण-रथ पर सवार होकर शैव्य और सुग्रीव नामक घोड़े जोतकर शुभ मुहूर्त में निकल पड़े। युधिष्ठिर स्वयं रथ की रास थामकर साथ चले, अर्जुन सोने के दण्डवाली श्वेत चँवर डुलाते रहे, और भीम तथा नकुल-सहदेव पीछे-पीछे चले। आधा योजन (लगभग दो मील) जाकर कृष्ण ने उन्हें रोका, युधिष्ठिर के चरण छुए, और युधिष्ठिर ने उन्हें उठाकर उनका मस्तक सूँघा और विदा दी। पाण्डव तब तक कृष्ण को निहारते रहे जब तक वे दृष्टि से ओझल न हो गए, और मन से ओझल होने पर भी पीछा करता रहा। कृष्ण सात्यकि और सारथि दारुक के साथ गरुड़-वेग से द्वारका पहुँचे और उग्रसेन आदि यादवों से पूजित होकर, वृद्ध पिता-माता और बलदेव को प्रणाम करके रुक्मिणी के भवन में गए।
समझने की कुंजी (स्थान): खाण्डवप्रस्थ और इन्द्रप्रस्थ एक ही नगर के नाम हैं, पाण्डवों की राजधानी, जिसे खाण्डव वन जलाकर बसाया गया था (आज की दिल्ली के आसपास माना जाता है)। द्वारका (द्वारवती) कृष्ण की समुद्रतटीय नगरी है (आज के गुजरात में)।
मय दानव अर्जुन से बोला कि वह अनुमति लेकर थोड़ी देर को जाता है पर शीघ्र लौटेगा। उसने बताया कि कैलास के उत्तर मैनाक पर्वत के पास, बिन्दु सरोवर के तट पर, जहाँ दानवों ने यज्ञ किया था, उसने रत्नों और मणियों से बना बहुमूल्य सामान इकट्ठा करके वृषपर्वा के भवन में रखा था; यदि वह अब भी वहाँ हो तो वह उसे ले आएगा। वहीं एक भयानक गदा भी रखी है जो लाख गदाओं के बराबर बल रखती है, और जो भीम के लिए वैसी ही उपयुक्त है जैसा अर्जुन के लिए गाण्डीव। वहाँ वरुण से आया हुआ देवदत्त नामक एक महाशंख भी है। यह सब वह उन्हें देगा। यों कहकर मय पूर्वोत्तर दिशा को चला गया, और बिन्दु सरोवर से वह गदा, शंख तथा वृषपर्वा का सारा स्फटिक-धन ले आया, जिसकी रक्षा यक्ष और राक्षस करते थे।

उन्हीं वस्तुओं से मय ने एक अनुपम भवन रचा, जो स्वर्ण के स्तम्भों से युक्त और पाँच हज़ार हाथ क्षेत्रफल का था। वह अग्नि, सूर्य या सोम के समान दीप्तिमान था, और अपनी आभा से मानो सूर्य की किरणों को भी मलिन कर देता था। आठ हज़ार किंकर नामक राक्षस, जो उग्र, विशालकाय, ताम्र-नेत्र और तीर-से कानोंवाले थे, आकाश में विचरण करते हुए उस भवन की रक्षा करते थे। भीतर मय ने एक ऐसी अद्भुत बावड़ी बनाई जिसमें श्याम मणियों के पत्तोंवाले और रत्नों की डंडियोंवाले कमल खिले थे, सोने के कछुए और मछलियाँ थीं, जल निर्मल और बिना कीचड़ का था, और किनारे मोती जड़े संगमरमर के थे। उस बावड़ी को इतना सुन्दर देखकर अनेक राजा उसे स्थल समझकर खुली आँखों उसमें जा गिरे। मय ने यह विशाल सभा चौदह महीनों में पूरी करके युधिष्ठिर को इसके सम्पन्न होने की सूचना दी।
सार: मय दानव ने, अग्नि और कृष्ण से बचाए जाने के कृतज्ञता-भाव में, बिन्दु सरोवर का दिव्य धन लाकर पाण्डवों के लिए चौदह महीनों में एक ऐसी सभा रची जिसमें देव-असुर-मानव तीनों की कला मिली हुई थी; भीम को महागदा और अर्जुन को देवदत्त शंख भी मिला।
सभा में ऋषि और राजागण
राजा युधिष्ठिर ने उस सभा में प्रवेश से पहले दस हज़ार ब्राह्मणों को घी-शहद, फल-मूल और भाँति-भाँति के भोजन से तृप्त किया और प्रत्येक को सहस्र-सहस्र गौएँ दान कीं। तृप्त ब्राह्मणों की ‘कैसा शुभ दिन है!’ की ध्वनि मानो स्वर्ग तक पहुँच गई। फिर मल्ल, नट, सूत और बन्दीजन अपनी कला दिखाकर धर्मपुत्र को प्रसन्न करने लगे। उस सभा में पाण्डवों के साथ अनेक देशों से आए ऋषि और राजा बैठे। ऋषियों में असित, देवल, सत्य, मार्कण्डेय, कृष्ण-द्वैपायन (व्यास), शुक, जैमिनि, पैल और व्यास के शिष्य (हम स्वयं), याज्ञवल्क्य, लोमहर्षण और उनके पुत्र, धौम्य आदि अनेक वेद-वेदांग के ज्ञाता मुनि युधिष्ठिर की सेवा में रहे।
क्षत्रियों में उग्रसेन, क्षेमक, काम्बोज का राजा कमठ, यवनों को कँपा देनेवाला कम्पन, मद्रों का राजा, किरातों का राजा पुलिन्द, अंग और वंग के राजा, मगध का राजा जयसेन, चेकितान, करूष के राजा शिशुपाल अपने पुत्र सहित, तथा वृष्णिवंश के युवक अहूक, विप्रथु, अक्रूर, कृतवर्मा और सिनि-पुत्र सात्यकि आदि उपस्थित थे। अर्जुन के पास धनुर्विद्या सीखे राजकुमार, और प्रद्युम्न, साम्ब, यौधेय (सात्यकि-पुत्र), अनिरुद्ध आदि वृष्णिवंशी भी युधिष्ठिर की सेवा में रहे। अर्जुन का मित्र गन्धर्व तुम्बुरु, चित्रसेन और अनेक गन्धर्व-अप्सराएँ अपने मधुर गान से सभा को आनन्दित करते रहे, जैसे स्वर्ग में देवगण ब्रह्मा की सेवा करते हैं।
समझने की कुंजी (अवधारणा): ‘सभा’ केवल एक भवन नहीं, राजा का प्रभुत्व-केन्द्र है, जहाँ ऋषि, राजा, कलाकार और दूत आकर बैठते हैं। ऐसी सभा का होना ही सम्राट-पद की ओर पहला संकेत था।
नारद का आगमन और राजधर्म का प्रश्नोत्तर

जब पाण्डव गन्धर्वों के साथ सभा में बैठे थे, तभी वेद-उपनिषद के ज्ञाता, इतिहास-पुराण में निपुण, न्याय और नीति में पारंगत देवर्षि नारद वहाँ पधारे। वे परीजात, रैवत, सौम्य और सुमुख के साथ मन के वेग से आए। युधिष्ठिर ने भाइयों सहित उठकर उन्हें अर्घ्य, आसन, गौ और रत्न देकर सत्कार किया। नारद ने तृप्त होकर युधिष्ठिर से राजधर्म पर अनेक प्रश्न पूछे। उन्होंने पूछा कि क्या आपकी कमाई उचित कार्यों पर लगती है, क्या आप धर्म, अर्थ और काम में समय का उचित बँटवारा करते हैं, और क्या आप कभी अर्थ के लिए धर्म की या काम के लिए धर्म-अर्थ दोनों की हानि नहीं करते।
नारद ने राजा के सात प्रमुख अधिकारियों (दुर्ग-रक्षक, सेनापति, मुख्य न्यायाधीश, अन्तःकक्ष के सेनानायक, पुरोहित, मुख्य वैद्य और मुख्य ज्योतिषी) के विषय में, गुप्तचरों की गोपनीयता, मित्र-शत्रु-तटस्थ की पहचान, और मन्त्रणा गुप्त रखने के विषय में पूछा। उन्होंने पूछा कि क्या सैनिकों को नियत भत्ता और वेतन समय पर मिलता है, क्योंकि वेतन का बकाया और रसद की अनियमितता सेना को विद्रोह की ओर ले जाती है, जिसे विद्वान परम घोर अनर्थों में गिनते हैं। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या आप उन वीरों की स्त्रियों और बच्चों का पालन करते हैं जिन्होंने आपके लिए प्राण दिए, और क्या आप दीन-दुखियों के लिए माता-पिता के समान हैं।
नारद ने कृषि के विषय में पूछा कि क्या राज्य में जगह-जगह तालाब और सरोवर बने हैं ताकि खेती केवल वर्षा पर निर्भर न रहे, क्या किसानों को बीज या भोजन की कमी तो नहीं, और क्या आप उन्हें ऋण देते समय प्रति सौ पर केवल एक चौथाई अधिक लेते हैं। उन्होंने राजा के चौदह दोषों (नास्तिकता, असत्य, क्रोध, असावधानी, टालमटोल, बुद्धिमानों से दूरी, आलस्य, चंचल मन, एक ही व्यक्ति से मन्त्रणा, नीति-अनभिज्ञ से सलाह, निश्चित योजना का त्याग, मन्त्रणा-भेद, लाभकारी कार्य की अपूर्ति, और बिना विचारे काम करना) से बचने का परामर्श दिया, क्योंकि इन्हीं से सिंहासन पर दृढ़ राजा भी नष्ट होते हैं।
अन्त में नारद ने पूछा कि क्या आपके वेद-अध्ययन, धन, पत्नी और शास्त्र-ज्ञान सफल हुए हैं। युधिष्ठिर ने पूछा कि ये किस प्रकार फलते हैं। ऋषि ने उत्तर दिया कि जो वेद पढ़कर अग्निहोत्र आदि यज्ञ करता है तभी वेद फलते हैं; जो धन का स्वयं उपभोग करता है और दान देता है तभी धन फलता है; पत्नी तब फलती है जब वह उपयोगी हो और सन्तान दे; और शास्त्र-ज्ञान तब फलता है जब उससे विनय और सदाचार उत्पन्न हो। युधिष्ठिर ने मस्तक झुकाकर कहा कि ऋषि की शिक्षा से उनकी बुद्धि विस्तृत हुई, और वे यथाशक्ति इन सबका पालन करेंगे।
सार: नारद ने युधिष्ठिर से राजधर्म पर विस्तृत प्रश्न पूछकर एक आदर्श राजा का सम्पूर्ण आचरण-शास्त्र उद्घाटित किया, और यही प्रसंग आगे राजसूय यज्ञ की प्रेरणा का बीज बना।
देवसभाओं का वर्णन और पाण्डु का संदेश
तदनन्तर युधिष्ठिर ने नारद से पूछा कि क्या उन्होंने कभी इस सभा-जैसी या इससे श्रेष्ठ कोई सभा देखी है। नारद ने मुस्कुराकर कहा कि मनुष्यों में रत्नों की ऐसी सभा उन्होंने न देखी न सुनी, किन्तु वे उन्हें यम, वरुण, इन्द्र, कुबेर और ब्रह्मा की सभाओं का वर्णन सुनाएँगे। उन्होंने इन्द्र की पुष्करमालिनी सभा का, यम की दीप्तिमान सभा का जिसमें ययाति, नहुष, पुरु, मान्धाता, भगीरथ, राम (दशरथ-पुत्र), जमदग्नि-पुत्र राम आदि अनेक राजर्षि बसते हैं, वरुण की जलमध्य श्वेत सभा का जिसमें वासुकि-तक्षक आदि नाग और समस्त नदियाँ रहती हैं, कुबेर की सभा का जिसमें यक्ष-गन्धर्व और स्वयं उमापति महादेव आते हैं, और अन्त में ब्रह्मा की उस अवर्णनीय सभा का वर्णन किया जिसका रूप क्षण-क्षण बदलता है।
युधिष्ठिर ने पूछा कि यम की सभा में तो प्रायः सभी राजा दिखते हैं, पर इन्द्र की सभा में केवल एक ही राजा, राजर्षि हरिश्चन्द्र, का नाम क्यों लिया गया, और उन्होंने ऐसा कौन-सा कर्म किया। नारद ने बताया कि हरिश्चन्द्र समस्त पृथ्वी का सम्राट था, उसने सात द्वीपोंवाली पृथ्वी को जीतकर राजसूय यज्ञ किया, और याचकों को उनकी माँग से पाँच गुना धन दिया, इसी से वह सहस्रों राजाओं से अधिक देदीप्यमान हुआ और इन्द्र के समान पद पाया। नारद ने कहा कि जो राजा राजसूय करते हैं वे इन्द्रलोक में आनन्द भोगते हैं, और जो रणभूमि में पीठ न दिखाकर प्राण त्यागते हैं वे भी वहीं पहुँचते हैं।
फिर नारद ने युधिष्ठिर के पिता पाण्डु का संदेश सुनाया। पाण्डु ने हरिश्चन्द्र का सौभाग्य देखकर, और यह जानकर कि नारद मनुष्यलोक जा रहे हैं, कहलवाया था कि युधिष्ठिर समस्त पृथ्वी जीत सकता है क्योंकि उसके सब भाई आज्ञाकारी हैं; वह राजसूय यज्ञ करे, जिससे पाण्डु भी हरिश्चन्द्र के समान इन्द्रलोक पहुँच सके। पर नारद ने सावधान भी किया कि यह यज्ञ अनेक विघ्नों से भरा है; ब्रह्मराक्षस नामक राक्षस यज्ञों में बाधा डालने को छिद्र खोजते हैं, और ऐसे यज्ञ के आरम्भ पर क्षत्रियों का संहार करनेवाला युद्ध तक छिड़ सकता है। यों कहकर नारद उन ऋषियों सहित चले गए जिनके साथ आए थे, और युधिष्ठिर भाइयों सहित उस श्रेष्ठ यज्ञ राजसूय पर विचार करने लगे।
समझने की कुंजी (अवधारणा): राजसूय यज्ञ वह महायज्ञ है जिसके अन्त में करनेवाला सम्राट-पद पर प्रतिष्ठित होता है और सब यज्ञों का फल पाता है। इसके लिए शर्त यह थी कि समस्त राजा या तो कर दें या वश में आएँ। पाण्डु का इन्द्रलोक-संदेश और नारद की चेतावनी, दोनों ही इस यज्ञ को मोक्ष-कामना और महाविनाश के सन्धि-बिन्दु पर खड़ा कर देते हैं।
युधिष्ठिर की चिन्ता और कृष्ण से परामर्श
नारद के वचन सुनकर युधिष्ठिर गहरी साँसें भरने लगे; राजसूय का विचार उन्हें चैन न लेने देता था। उन्होंने मन्त्रियों और भाइयों से बार-बार इस पर विमर्श किया। मन्त्रियों ने एक स्वर से कहा कि वे सम्राट-पद के योग्य हैं और इस यज्ञ का समय आ गया है। किन्तु धर्मशील युधिष्ठिर ने अपनी प्रजा के हित को सर्वोपरि रखा। उनका शासन इतना न्यायपूर्ण था कि राज्य में कोई शत्रुभाव न रखता, इसी से वे ‘अजातशत्रु’ कहलाए। भीम सब पर न्याय से शासन करते, अर्जुन बाहरी शत्रुओं से प्रजा की रक्षा करते, सहदेव निष्पक्ष न्याय करते और नकुल विनम्रता से व्यवहार करते। वर्षा पर्याप्त होती, राज्य समृद्ध होता, और जीते हुए राजा तक उन्हें पिता-माता से अधिक प्रिय मानते।
युधिष्ठिर ने धौम्य, द्वैपायन, ऋत्विजों और मन्त्रियों से फिर परामर्श किया, पर अकेले अपने ही निश्चय पर यज्ञ आरम्भ करना उचित न समझा। उन्होंने सोचा कि इस विषय में निर्णायक केवल कृष्ण हैं, जो अमित तेजस्वी हैं और जिनके लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं। उन्होंने एक दूत द्वारका भेजा, और कृष्ण इन्द्रसेन के साथ शीघ्र इन्द्रप्रस्थ पधारे। युधिष्ठिर ने उन्हें सब बात बताकर कहा कि कुछ मन्त्री मित्रता से कठिनाई नहीं देखते, कुछ स्वार्थ से केवल प्रिय कहते हैं, पर कृष्ण इन सब विचारों से परे हैं क्योंकि उन्होंने काम और क्रोध दोनों को जीता है; अतः वे ही बताएँ कि जगत के लिए क्या हितकर है।
कृष्ण का उत्तर: जरासन्ध की बाधा

कृष्ण ने कहा कि युधिष्ठिर राजसूय के सब गुणों से सम्पन्न हैं, फिर भी एक बात कहनी है। आज के क्षत्रिय उन क्षत्रियों से हीन हैं जिनका जमदग्नि-पुत्र राम ने संहार किया था। सब राजवंश अपने को ऐल और इक्ष्वाकु का वंशज कहते हैं, पर इस समय मगध का राजा जरासन्ध सब राजाओं के सिर पर चढ़ बैठा है। चेदिराज शिशुपाल उसका सेनापति बन गया है; करूष का राजा वक्र, हंस और डिम्भक नामक दो परम बली, दन्तवक्र, करूष, मेघवाहन आदि उसके पास हैं; पश्चिम को वरुण-सा शासित करनेवाला यवनराज भगदत्त, जो पाण्डु का पुराना मित्र है, भी जरासन्ध के सामने सिर झुका चुका है, यद्यपि वह हृदय में युधिष्ठिर को पुत्रवत मानता है। केवल मातुल पुरुजित ही स्नेह से उनकी ओर है।
कृष्ण ने आगे बताया कि चेदियों में जन्मा वह दुष्ट (शिशुपाल), जो अपने को दिव्य पुरुष बताता और कृष्ण के चिह्न धारण करता है, तथा पौण्ड्रक-वासुदेव कहलानेवाला वंगराज भी जरासन्ध के पक्ष में हैं। जरासन्ध के भय से भोजवंश की अठारह शाखाएँ, शूरसेन, भद्रक, सालव, कुन्ती आदि पश्चिम भागे; मत्स्य और संन्यस्तपाद दक्षिण भागे; और सब पांचाल इधर-उधर बिखर गए। कृष्ण ने यादवों का इतिहास सुनाया कि किस प्रकार कंस ने जरासन्ध की दो पुत्रियों अस्ति और प्राप्ति से विवाह करके यादवों को सताया, और कैसे राम (बलराम) की सहायता से कृष्ण ने कंस और सुनामा को मारा। उसके बाद ससुर जरासन्ध ने युद्ध छेड़ा।
कृष्ण ने स्पष्ट किया कि अठारह यादव-शाखाओं ने सोचा कि उत्तम अस्त्रों से निरन्तर प्रहार करने पर भी तीन सौ वर्षों में जरासन्ध का कुछ न बिगाड़ा जा सकेगा, क्योंकि उसके दो मित्र हंस और डिम्भक अस्त्रों से अवध्य थे। इसी से वे मथुरा छोड़कर पश्चिम में रैवतक पर्वत के पास कुशस्थली (द्वारका) में जा बसे, जिसका दुर्ग देवताओं के लिए भी अभेद्य बना लिया। कृष्ण ने यह भी बताया कि जरासन्ध रुद्र को सौ राजाओं की बलि चढ़ाने के संकल्प से राजाओं को जीतकर अपने गिरिव्रज दुर्ग में बन्दी बना रहा है; अब तक छियासी राजा बन्दी हैं, केवल चौदह की कमी है। अतः जब तक जरासन्ध जीवित है, राजसूय सम्भव नहीं; उसका वध और बन्दी राजाओं की मुक्ति इस यज्ञ की पूर्व-शर्त है।
एक उप-कथा: मथुरा से छेड़ी गई शत्रुता का एक विचित्र अध्याय यों समाप्त हुआ था। राम (बलराम) ने अठारह दिन के युद्ध में हंस नामक एक राजा को मारा। यह सुनकर डिम्भक ने समझा कि वह हंस के बिना नहीं जी सकता और यमुना में कूदकर प्राण दे दिए। फिर हंस (जरासन्ध का सेनापति) ने डिम्भक की मृत्यु सुनी तो वह भी यमुना में कूद गया। दोनों मित्रों के मरने पर जरासन्ध रिक्त हृदय से अपने राज्य लौट आया था।
जरासन्ध की कथा: मय-निर्मित नहीं, जरा-निर्मित
युधिष्ठिर ने पूछा कि यह जरासन्ध कौन है और उसका ऐसा तेज क्यों है कि कृष्ण को छूकर भी वह अग्नि-स्पर्श किए कीट-सा भस्म न हुआ। कृष्ण ने उसकी जन्म-कथा सुनाई। मगधराज बृहद्रथ, जिसके पास तीन अक्षौहिणी सेना थी, ने काशिराज की दो जुड़वाँ कन्याओं से विवाह किया और गुप्त रूप से प्रतिज्ञा की कि वह दोनों को समान प्रेम देगा। पर बहुत यत्नों के बाद भी उसे पुत्र न हुआ। एक दिन उसने सुना कि गौतमवंशी काक्षीवत के पुत्र, महातपस्वी चण्डकौशिक, घूमते हुए उसकी नगरी में आम के वृक्ष की छाया में बैठे हैं।
राजा अपनी दोनों रानियों सहित मुनि के पास गया और रत्नों से उन्हें तृप्त किया। मुनि ने वर माँगने को कहा, पर राजा ने अश्रुपूर्ण होकर कहा कि वह पुत्रहीन है, राज्य छोड़कर वन जाना चाहता है, वर से क्या करेगा। तब मुनि ने ध्यान लगाया, और उसी क्षण उनकी गोद में एक रसीला आम गिरा जिसे किसी पक्षी की चोंच ने न छुआ था। मुनि ने उस फल पर मन्त्र पढ़कर राजा को दिया और कहा कि आप लौट जाइए, आपकी कामना पूरी होगी। राजा ने अपनी पूर्व-प्रतिज्ञा स्मरण करके वह एक फल दोनों रानियों को दे दिया, और दोनों ने उसके दो भाग करके खा लिए। फल खाने से दोनों ने गर्भ धारण किया।
समय आने पर प्रत्येक रानी ने एक-एक खण्ड शरीर जना, जिसमें एक आँख, एक भुजा, एक पैर, आधा पेट और आधा मुख था। डरकर दोनों बहनों ने वे जीवित खण्ड त्याग दिए, और धायों ने उन्हें पिछले द्वार से निकालकर एक चौराहे पर फेंक दिया। तभी जरा नामक एक राक्षसी, जो मांस-रक्त पर जीती थी, वहाँ आई और ले जाने की सुविधा के लिए उसने दोनों खण्ड जोड़ दिए। जुड़ते ही वे एक सुदृढ़ बालक बन गए, जिसका शरीर वज्र-सा कठोर था। राक्षसी उसे उठा न सकी, और बालक ने मुट्ठियाँ मुँह में डालकर मेघ-सी गर्जना की। शब्द सुनकर राजा और रानियाँ दौड़े आए।
राक्षसी ने सोचा कि वह ऐसे पुत्रकामी राजा के राज्य में बसती है, अतः इस बालक को मारना उचित नहीं। उसने मानव-रूप धरकर राजा से कहा कि यह आपका ही पुत्र है, ब्राह्मण के वर से दोनों रानियों से उत्पन्न, धायों द्वारा त्यागा हुआ, जिसे उसने जोड़कर बचाया। राजा ने पूछा कि वह कौन है, तो उसने बताया कि वह गृहदेवी जरा है, जिसका चित्र घरों की दीवारों पर बालकों के बीच बनाया जाता है और जिसकी पूजा से घर में समृद्धि रहती है। राजा के घर पूजित होने के कारण उसने यह उपकार किया। यों कहकर जरा अन्तर्धान हो गई। बालक ‘जरा द्वारा जोड़ा गया’ होने से ‘जरासन्ध’ कहलाया।
कुछ काल बाद चण्डकौशिक फिर मगध आए। बृहद्रथ ने उन्हें सपरिवार राज्य और पुत्र समर्पित किया। ऋषि ने प्रसन्न होकर भविष्यवाणी की कि यह पुत्र अद्वितीय बली होगा, देवताओं के अस्त्र भी उसे पीड़ा न देंगे, वह समस्त राजाओं का तेज हर लेगा जैसे सूर्य ज्योतियों का, और साक्षात रुद्र (हर) के दर्शन करेगा। यों कहकर ऋषि चले गए। बृहद्रथ ने जरासन्ध को सिंहासन पर बैठाकर, दोनों पत्नियों सहित वन को प्रस्थान किया और अन्ततः स्वर्ग गए। कंस-वध के बाद जब कृष्ण से वैर बढ़ा, तो जरासन्ध ने गिरिव्रज से एक गदा निन्यानबे बार घुमाकर मथुरा की ओर फेंकी, जो मथुरा से निन्यानबे योजन दूर गिरी; वह स्थान आज भी गदावसान कहलाता है।
समझने की कुंजी (वंश): जरासन्ध मगधराज बृहद्रथ का पुत्र है, जो दो आधे-शरीरों के जुड़ने से बना। उसकी अवध्यता वस्तुतः एक ‘जोड़’ है, और यही उसकी मृत्यु का सूत्र भी बनेगा, क्योंकि जो जोड़ा गया है, वही तोड़ा भी जा सकता है।
सार: जरासन्ध की उत्पत्ति-कथा बताती है कि उसका अप्रतिम बल वरदान-जनित है और उसकी देह ‘जोड़’ से बनी है; कृष्ण इस रहस्य को जानते हैं, इसीलिए वे उसका वध अस्त्र से नहीं, मल्लयुद्ध में देह को चीरकर कराना चाहते हैं।
भीम, अर्जुन और कृष्ण का निश्चय

युधिष्ठिर इस पर सशंकित हुए कि भीम, अर्जुन और कृष्ण, जो उनके मानो नेत्र और मन हैं, को वे जरासन्ध के विरुद्ध कैसे भेजें। उन्होंने कहा कि यम भी जरासन्ध की सेना को नहीं जीत सकता, अतः यह कार्य न करना ही श्रेयस्कर है। तब भीम ने कहा कि कृष्ण में नीति है, उनमें स्वयं बल है, और अर्जुन में विजय है; इन तीन यज्ञाग्नियों के समान वे मगधराज का वध सम्पन्न करेंगे। कृष्ण ने भी समझाया कि बल, रक्षा, धर्म, समृद्धि और नीति, इन सब गुणों से युधिष्ठिर सम्राट-पद के अधिकारी हैं, और जरासन्ध ने छियासी राजा बन्दी कर लिए हैं; चौदह और मिलते ही वह अपना क्रूर कर्म आरम्भ करेगा, अतः जो उसे रोकेगा वही यश पाएगा।
अर्जुन ने भी अपना मत दिया कि उन्होंने धनुष, अस्त्र, ऊर्जा, मित्र और यश पा लिया है, पर बल से बढ़कर कुछ नहीं; वीरतापूर्ण कुल में जन्मा वीरहीन पुरुष आदर के योग्य नहीं। यदि यज्ञ के लिए वे जरासन्ध को मारकर बन्दी राजाओं को छुड़ा सकें तो इससे ऊँचा कर्म कोई नहीं, और न करने पर जगत उन्हें अक्षम समझेगा। कृष्ण ने जोड़ा कि मृत्यु कब आएगी, रात में या दिन में, यह कोई नहीं जानता, और युद्ध से विमुख होकर अमरता किसी ने नहीं पाई; अतः यदि वे गुप्त रूप से शत्रु के घर में प्रवेश करके उससे भिड़ें तो निन्दा न होगी। उन्हें जरासन्ध का विनाश सामने दिखता है।
मगध की यात्रा और गिरिव्रज में प्रवेश

युधिष्ठिर ने प्रसन्न होकर कृष्ण को भीम और अर्जुन सौंप दिए, यह कहते हुए कि कृष्ण ही पाण्डवों के स्वामी हैं और वे सब उनके अधीन हैं; कृष्ण के नेतृत्व में वे जरासन्ध को पहले से ही मरा हुआ मानते हैं। उन्होंने व्यवस्था दी कि अर्जुन कृष्ण के पीछे चले और भीम अर्जुन के पीछे, क्योंकि नेतृत्व में ही सेना का बल है। तीनों स्नातक ब्राह्मणों का वेश धरकर निकल पड़े, और कुरुजांगल पार करके, गण्डकी, सदानीरा (करतोया), सरयू आदि नदियाँ लाँघते हुए पूर्वी कोसल, मिथिला और गंगा-शोण पार करके मगध की ओर पूर्व बढ़े। गोरथ पर्वत पर पहुँचकर उन्होंने गौओं, धन और जल से भरी मगध-नगरी देखी।
कृष्ण ने अर्जुन को गिरिव्रज की शोभा दिखाई, जिसे वैहार, वराह, वृषभ, ऋषिगिरि और चैत्यक, इन पाँच ऊँची चोटियोंवाले पर्वत मानो मिलकर रक्षा कर रहे थे। नगर-द्वार पर पहुँचकर वे भीतर न जाकर उस ऊँचे चैत्यक शिखर को ही चीरने लगे, जो बृहद्रथवंश और मगधवासियों द्वारा पूजित था और जहाँ ऋषभ नामक राक्षस के चर्म से बने तीन नगाड़े रखे थे जिनकी ध्वनि एक बार बजने पर महीने भर गूँजती थी। उस शिखर को तोड़कर, मानो उन्होंने शत्रु के सिर पर पैर रख दिया हो, वे आनन्दित होकर नगर में घुसे और पुष्प-विक्रेताओं से बलपूर्वक माला छीनकर, रंगीन वस्त्र और कुण्डल पहनकर जरासन्ध के भवन में पहुँचे, जैसे हिमालयी सिंह गोशाला की ओर बढ़ें।

जरासन्ध ने उठकर पाद्य, अर्घ्य और गौ-दान से उनका स्वागत किया और ‘स्वागत है’ कहा। पर पार्थ और भीम मौन रहे; कृष्ण ने कहा कि ये दोनों व्रत में हैं, अतः अर्धरात्रि तक नहीं बोलेंगे, उसके बाद बात करेंगे। राजा ने उन्हें यज्ञशाला में ठहराकर अर्धरात्रि में आकर देखा कि उसके अतिथि ब्राह्मण-वेश में हैं पर माला और चन्दन से सजे हैं और हाथों पर धनुष की प्रत्यंचा के चिह्न हैं। उसने पूछा कि वे कौन हैं जो असमय फूल-चन्दन धारण किए और क्षत्रिय-तेज लिए ब्राह्मण कहलाते हैं, और किस कारण उन्होंने चैत्यक शिखर तोड़कर अनुचित द्वार से प्रवेश किया और उसका सत्कार स्वीकार न किया।
कृष्ण ने शान्त गम्भीर स्वर में उत्तर दिया कि स्नातक-व्रत ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों धारण कर सकते हैं; क्षत्रिय अपना तेज भुजाओं से प्रकट करता है, वाणी से नहीं। शत्रु के घर में अनुचित द्वार से और मित्र के घर में उचित द्वार से प्रवेश करना नियम है, और कार्यसिद्धि के लिए शत्रु के घर में पहुँचकर उसका सत्कार स्वीकार न करना उनका शाश्वत व्रत है। जरासन्ध ने कहा कि उसने कभी उनका अनिष्ट नहीं किया, फिर वे उसे शत्रु क्यों मानते हैं। तब कृष्ण ने प्रकट किया कि वे ब्राह्मण नहीं, वे हृषीकेश (सौरि) हैं और ये दोनों पाण्डुपुत्र हैं; जरासन्ध ने जो राजाओं को बन्दी करके रुद्र को बलि चढ़ाने का पाप किया है, उसी से उसका वध करने वे आए हैं। या तो वह सब राजाओं को मुक्त करे, या यमलोक जाए।
जरासन्ध ने उत्तर दिया कि वह किसी राजा को बिना जीते बन्दी नहीं करता, और क्षत्रिय का धर्म ही है कि पराक्रम से दूसरों को वश में करके दास बनाए; देवता को बलि चढ़ाने के संकल्प से एकत्र किए राजाओं को वह भय से नहीं छोड़ेगा। उसने सेना के विरुद्ध सेना, या एक, दो, तीन के विरुद्ध, एक साथ या अलग-अलग, युद्ध को स्वीकार किया। यों कहकर उसने अपने पुत्र सहदेव को सिंहासन पर बैठाया और युद्ध की तैयारी की। कृष्ण ने, ब्रह्मा की आज्ञा और इस विधान को स्मरण करते हुए कि जरासन्ध भीम के हाथों ही मरेगा, यादवों के हाथों नहीं, स्वयं उसका वध करना न चाहा।
समझने की कुंजी (नैतिकता): यहाँ महाभारत की नैतिक जटिलता खुलकर सामने है। कृष्ण, भीम और अर्जुन छल से, अनुचित द्वार से, ब्राह्मण-वेश में शत्रु के घर घुसते हैं और उसका सत्कार ठुकराते हैं। कृष्ण इसे ‘शत्रु के घर का नियम’ कहकर उचित ठहराते हैं, पर जरासन्ध का यह कहना कि वह क्षत्रिय-धर्म से ही बन्दी बनाता है, अपने स्थान पर ठोस तर्क है। कथा इस तनाव को मिटाती नहीं, बनाए रखती है।
भीम के हाथों जरासन्ध-वध

कृष्ण ने पूछा कि तीनों में किससे जरासन्ध युद्ध करना चाहता है, और मगधराज ने भीम को चुना। पुरोहित गोरोचन, माला और मूर्च्छा हरनेवाली औषधियाँ लेकर आया। जरासन्ध मुकुट उतारकर, केश बाँधकर, समुद्र-सा उमड़ता हुआ खड़ा हुआ और बोला कि वह भीम से लड़ेगा, क्योंकि श्रेष्ठ से हारना ही अच्छा है। दोनों वीर बाहुओं को ही अस्त्र बनाकर भिड़ गए, एक-दूसरे की भुजाएँ और टाँगें पकड़कर, बगलें बजाते, गर्दन-से-गर्दन और मस्तक-से-मस्तक भिड़ाते, बिजली-सी चिनगारियाँ छुड़ाते, दो उन्मत्त हाथियों की भाँति। उन्होंने पृष्ठभंग, सम्पूर्ण-मूर्च्छा और पूर्ण-कुम्भ जैसे मल्लयुद्ध के दाँव दिखाए, और एक-दूसरे के अंगों को रेशे की भाँति मरोड़ने लगे।
नगर के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्रियाँ और वृद्ध, सब यह युद्ध देखने उमड़े और इतनी भीड़ हुई कि शरीर-से-शरीर सटे, बीच कोई स्थान न रहा। बगलों की ताल और गर्दन-टाँगें खींचने की ध्वनि मेघ-गर्जन या गिरते पर्वतों-सी गूँजती। यह युद्ध कार्तिक मास की प्रतिपदा से आरम्भ होकर बिना अन्न और विश्राम के दिन-रात चलता रहा, और तेरहवें चन्द्र-दिन तक चला। चौदहवीं की रात जरासन्ध थककर शिथिल पड़ने लगा। तब कृष्ण ने भीम को सावधान किया कि थके शत्रु को अधिक दबाना नहीं चाहिए, अन्यथा वह मर भी सकता है; अतः वे केवल उतना ही बल लगाएँ जितना शत्रु में शेष है।

भीम ने कृष्ण के संकेत से जरासन्ध की दशा समझ ली और उसका प्राण हरने का निश्चय किया। कृष्ण ने उन्हें उत्साहित किया कि वे आज जरासन्ध पर वह बल प्रकट करें जो उन्हें पवन-देव से मिला है। तब भीम ने उस बलशाली जरासन्ध को आकाश में उठाकर सौ बार घुमाया, फिर घुटना उसकी रीढ़ पर टेककर उसकी देह को बीच से चीर दिया, और भयानक गर्जना की। जरासन्ध की मृत्यु-ध्वनि और भीम की गर्जना मिलकर ऐसी हुई कि हर प्राणी का हृदय काँप उठा; मगध-स्त्रियों के समय से पहले प्रसव हो गए, और लोगों ने समझा कि हिमवान गिर रहा है या पृथ्वी फट रही है।
उन्होंने जरासन्ध की निष्प्राण देह को महल-द्वार पर सोते-सी छोड़ा और नगर से बाहर निकले। कृष्ण ने जरासन्ध का ध्वजयुक्त रथ तैयार कराया, भीम और अर्जुन को उसमें बैठाया, और भीतर जाकर बन्दी राजाओं को मुक्त किया। उन राजाओं ने कृष्ण को रत्न भेंट किए और कहा कि सौभाग्य से उन्होंने उन्हें जरासन्ध के दुर्ग-रूपी शोक-कीचड़ से उबारा। कृष्ण ने वह दिव्य रथ ग्रहण किया जिस पर इन्द्र ने पुरातन काल में निन्यानबे असुरों का वध किया था, और जिसका ध्वज बिना सहारे टिका रहता और एक योजन दूर से दिखता था। कृष्ण के स्मरण करते ही गरुड़ उस रथ के ध्वज पर आ बैठे और रथ की दीप्ति दुगुनी हो गई।

कृष्ण ने मुक्त राजाओं को आश्वासन देकर बताया कि युधिष्ठिर राजसूय करना चाहते हैं; वे उनकी सहायता करें। राजाओं ने ‘तथास्तु’ कहकर स्वीकार किया और रत्न भेंट किए, जिनमें से कृष्ण ने स्नेहवश एक भाग लिया। फिर जरासन्ध के पुत्र सहदेव ने भयभीत होकर भेंट लाकर कृष्ण की पूजा की, और कृष्ण ने उसे वहीं मगध के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दिया। तदनन्तर तीनों इन्द्रप्रस्थ लौटे, और कृष्ण ने प्रसन्न होकर युधिष्ठिर से कहा कि सौभाग्य से जरासन्ध भीम के हाथों मारा गया और बन्दी राजा मुक्त हो गए, भीम और अर्जुन निरापद लौट आए। युधिष्ठिर ने कृष्ण की पूजा की और भाइयों को हर्ष से गले लगाया। मुक्त राजाओं को यथायोग्य सत्कार के साथ विदा करके, और कृष्ण को द्वारका भेजकर, पाण्डव सुखपूर्वक रहने लगे, और इस विजय से उनका यश और बढ़ा।
समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक-समतुल्य): यह मल्लयुद्ध कार्तिक प्रतिपदा से चौदहवीं तिथि तक, लगभग चौदह दिन-रात बिना रुके चला (आधुनिक दृष्टि से दो सप्ताह से कम); भीम ने जरासन्ध को सौ बार घुमाया, और जरासन्ध के दुर्ग में छियासी राजा बन्दी थे, सौ की बलि-संकल्प में केवल चौदह कम।
सार: भीम ने चौदह दिन के मल्लयुद्ध के बाद कृष्ण के संकेत पर जरासन्ध को घुमाकर, घुटने से उसकी ‘जुड़ी’ देह को चीरकर मारा; बन्दी राजा मुक्त हुए, सहदेव मगध-सिंहासन पर बैठा, और राजसूय का मार्ग खुल गया।
दिग्विजय और राजसूय का आरम्भ
इसके बाद चारों भाई दिग्विजय को निकले। अर्जुन ने उत्तर दिशा जीती, भीम ने पूर्व, सहदेव ने दक्षिण और नकुल ने पश्चिम। अर्जुन ने प्राग्ज्योतिष के राजा भगदत्त को, जो पाण्डु का मित्र था, युद्ध के बाद वश में किया; भगदत्त ने स्नेह से कहा कि जैसे युधिष्ठिर उसे प्रिय हैं वैसे ही अर्जुन भी, और वह सब करेगा। अर्जुन ने पर्वतीय राजाओं, उलूक के राजा बृहन्त, सेनबिन्दु, कश्मीर, त्रिगर्त, दरद, काम्बोज और ऋषिकों तक को जीतकर कर वसूला, और ऋषिकों से तोते-सी छातीवाले और मोर-से रंगवाले दिव्य अश्व लिए। इसी प्रकार शेष तीन भाइयों ने भी अपनी-अपनी दिशाएँ जीतीं, और राज्य अपार धन से भर गया।

दिग्विजय के बाद राजसूय यज्ञ आरम्भ हुआ। समस्त दिशाओं के राजा, कर और भेंट लेकर इन्द्रप्रस्थ आए। यज्ञ की समाप्ति-वेला में भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा कि प्रत्येक राजा को यथायोग्य अर्घ्य दिया जाए, और जो उपस्थित जनों में परम (श्रेष्ठ) हो उसे पहला अर्घ्य दिया जाए। युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म ने अपनी बुद्धि से निश्चय किया कि पृथ्वी पर सब में परम कृष्ण ही हैं, क्योंकि उनके तेज, बल और पराक्रम से यह यज्ञशाला वैसे ही प्रकाशित है जैसे सूर्य से सूर्यहीन प्रदेश। भीष्म की आज्ञा से सहदेव ने उत्तम सामग्रीवाला प्रथम अर्घ्य कृष्ण को अर्पित किया, और कृष्ण ने विधिपूर्वक उसे स्वीकार किया।
एक उप-कथा: इसी सभा में देवर्षि नारद भी विस्मय और भय से बैठे थे, क्योंकि वे जानते थे कि नारायण-स्वरूप हरि मनुष्य-रूप में यदुवंश में जन्मे हैं और स्वयं स्वयम्भू ही पृथ्वी से क्षत्रियों के इस विशाल समूह का हरण करने को उद्यत हैं। उनकी दृष्टि में यह अर्घ्य-प्रसंग आगे आनेवाले महासंहार का सूक्ष्म सूत्रपात था।
शिशुपाल का विरोध

चेदिराज शिशुपाल यह सम्मान सह न सका। उसने भरी सभा में भीष्म और युधिष्ठिर की निन्दा करते हुए कहा कि इन सब तेजस्वी राजाओं के बीच कृष्ण राजवत् अर्घ्य के योग्य नहीं। उसने गिनाया कि जब वहाँ द्रोण, द्वैपायन (व्यास), इच्छामृत्यु भीष्म, अश्वत्थामा, राजाओं में राजा दुर्योधन, कृप, द्रुम, भीष्मक, पाण्ड्य, रुक्मी, एकलव्य, मद्रराज शल्य और अपने ही बल से सब राजाओं को जीतनेवाला कर्ण उपस्थित हैं, तब कृष्ण को, जो न ऋत्विज है, न आचार्य, न राजा, प्रथम अर्घ्य क्यों दिया गया। उसने कहा कि यह राजाओं का अपमान है, और जैसे कुत्ता एकान्त में घी चाट लेता है वैसे ही कृष्ण ने अयोग्य पूजा स्वीकार की। यों कहकर वह आसन से उठकर कुछ राजाओं सहित सभा से बाहर निकल गया।
युधिष्ठिर ने पीछे जाकर मधुर वचनों में उसे समझाया कि उसका कहना उचित नहीं और भीष्म-जैसे धर्मज्ञ को धर्म से अनभिज्ञ कहना पाप है। भीष्म ने कहा कि जो कृष्ण की पूजा का अनुमोदन न करे वह सान्त्वना के योग्य नहीं; इस सभा में एक भी ऐसा राजा नहीं जो सात्वत-पुत्र कृष्ण के तेज से युद्ध में पराजित न हुआ हो; अतः वे कृष्ण को परम और ज्येष्ठ मानकर पूजते हैं। भीष्म ने कृष्ण के अनगिनत गुण गिनाकर कहा कि उदारता, वेद-ज्ञान, वीरता, विनय, सौन्दर्य और ऐश्वर्य, सब अच्युत में सदा निवास करते हैं, और यह सम्पूर्ण जगत उन्हीं से उत्पन्न होकर उन्हीं में लीन होता है।
तब सहदेव ने अपना चरण उठाकर ललकारा कि यदि किसी राजा को कृष्ण की पूजा सहन न हो तो उसके सिर पर वह यह चरण रखता है, और जिसमें सामर्थ्य हो वह उत्तर दे। पर किसी भी बुद्धिमान, अभिमानी और बली राजा ने कुछ न कहा, और सहदेव के सिर पर पुष्प-वर्षा हुई तथा ‘साधु, साधु’ की आकाशवाणी हुई। कृष्णमृगचर्मधारी नारद ने भी कहा कि जो कमलनयन कृष्ण की पूजा नहीं करते उन्हें चलते-फिरते मृतक समझना चाहिए और किसी अवसर पर उनसे बात नहीं करनी चाहिए।
शिशुपाल (सुनीथ) ने ताम्र-नेत्रों से क्रोधित होकर राजाओं को उभाड़ा कि जब वह नेता रूप में उपस्थित है तब वे किस सोच में हैं; आइए, वृष्णियों और पाण्डवों के विरुद्ध पंक्तिबद्ध होकर खड़े हों। उसने यज्ञ की पूर्णता रोकने की मन्त्रणा की, और अनेक राजाओं के मुख क्रोध से पीले पड़ गए। कृष्ण ने समझ लिया कि राजाओं का यह सागर तरंगित होकर भयानक प्रहार को उद्यत है।
भीष्म का उत्तर और शिशुपाल की जन्म-कथा
युधिष्ठिर ने भीष्म से पूछा कि क्रोध से उमड़े इस राजा-समुद्र के सामने वे क्या करें कि यज्ञ में विघ्न न पड़े और प्रजा को हानि न हो। भीष्म ने कहा कि वे न डरें; क्या कुत्ता सिंह को मार सकता है। ये राजा सोते सिंह (कृष्ण) के सामने भौंकते कुत्तों-जैसे हैं; जब तक सिंह जागे नहीं, चेदिराज इन्हें सिंह-सा प्रतीत कराता है। भीष्म ने कहा कि वस्तुतः विष्णु इस शिशुपाल में स्थित अपने ही तेज को वापस लेना चाहते हैं, इसी से इसकी और इन राजाओं की बुद्धि विकृत हो गई है।
यह सुनकर शिशुपाल ने भीष्म को कठोर वचन कहे, उन्हें वृद्ध और कुलकलंक बताया, और कहा कि ब्रह्मचर्य में रहते हुए ऐसी अधर्म-भरी सलाह देना उन्हीं को शोभा देता है। उसने पूतना-वध, बछड़े और गाड़ी के उलटने, और गोवर्धन उठाने जैसे कृष्ण के कर्मों का उपहास किया और कहा कि जिसका अन्न खाया उसी कंस को मारना अधर्म है। उसने भीष्म पर तीखा प्रहार किया कि अम्बा को, जो किसी और पर मन रख चुकी थी, बलपूर्वक हरने और भाई विचित्रवीर्य की विधवाओं पर दूसरे से सन्तान उत्पन्न कराने जैसे प्रसंगों में भीष्म का धर्म कहाँ था। उसने एक बूढ़े हंस की कथा सुनाई जो धर्म का उपदेश देता पर दूसरों के अण्डे खा जाता था और अन्ततः पक्षियों ने उसे मार डाला, और कहा कि भीष्म की दशा भी वैसी ही है।
शिशुपाल के कठोर वचनों से भीमसेन क्रोध से जल उठे, उनके कमल-से नेत्र और लाल हो गए, और भौंहों पर त्रिवली पड़ गई। जैसे ही वे झपटने को हुए, भीष्म ने उन्हें वैसे ही थाम लिया जैसे महादेव ने महासेन (कार्तिकेय) को। शिशुपाल फिर भी न काँपा, बल्कि हँसकर बोला कि भीम को छोड़ दीजिए, सब राजा देखें कि वह मेरे पराक्रम से कीट-सा भस्म होता है। तब भीष्म ने भीम को शिशुपाल की जन्म-कथा सुनाई।

भीष्म ने बताया कि शिशुपाल चेदिराज के वंश में तीन आँखों और चार भुजाओं के साथ जन्मा और जन्मते ही गधे-सा रेंका। भयभीत माता-पिता उसे त्यागने को हुए, पर एक आकाशवाणी ने कहा कि यह बालक भाग्यवान और बली होगा, इसकी मृत्यु का समय अभी नहीं आया, और इसका वध करनेवाला भी जन्म ले चुका है। माता के पूछने पर वाणी ने बताया कि जिसकी गोद में रखे जाने पर इसकी अतिरिक्त भुजाएँ पंचमुखी सर्पों-सी गिर पड़ें और मस्तक का तीसरा नेत्र लुप्त हो जाए, वही इसका वध करेगा। अनेक राजाओं की गोद में रखे जाने पर भी ऐसा न हुआ। जब बलराम और कृष्ण अपनी बुआ (चेदि-रानी) से मिलने आए और रानी ने बालक को कृष्ण की गोद में रखा, तो अतिरिक्त भुजाएँ गिर पड़ीं और तीसरा नेत्र लुप्त हो गया। भयभीत रानी ने कृष्ण से वर माँगा कि वे शिशुपाल के अपराध क्षमा करें, और कृष्ण ने वचन दिया कि वध-योग्य होने पर भी वे उसके सौ अपराध क्षमा करेंगे।
समझने की कुंजी (वंश): शिशुपाल चेदि का राजा और कृष्ण की बुआ का पुत्र है, अर्थात कृष्ण का फुफेरा भाई। यही सम्बन्ध रानी के वर-माँगने का आधार बना, जिससे कृष्ण ने सौ अपराध क्षमा करने का वचन दिया, और यही गिनती उसकी मृत्यु की घड़ी तय करती है।
कृष्ण के हाथों शिशुपाल का अन्त
भीष्म ने भीम को रोककर कहा कि शिशुपाल जो ललकार रहा है वह वस्तुतः उसका अपना संकल्प नहीं, यह कृष्ण की ही इच्छा है; यह राजा हरि के तेज का अंश है और भगवान उस अंश को वापस लेना चाहते हैं। शिशुपाल यह सहन न कर सका और और भी कठोर वचन कहे, भीष्म पर हंस और भुलिंगा पक्षी की उपमाएँ कसीं, और दरद, कर्ण, द्रोण, अश्वत्थामा, दुर्योधन, जयद्रथ, कृप, रुक्मी आदि अनेक राजाओं की प्रशंसा करके पूछा कि भीष्म इन्हें छोड़कर केवल कृष्ण की स्तुति क्यों करते हैं। भीष्म ने शान्ति से उत्तर दिया कि वे इन राजाओं को तिनके के बराबर भी नहीं मानते। इस पर अनेक राजा क्रोध से भड़क उठे और भीष्म को घास-फूस की आग में जलाने की धमकी देने लगे, पर भीष्म ने सबके सिर पर पाँव रखकर कहा कि जिसे शीघ्र मरना हो वह चक्र-गदाधारी कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारे।

तब शिशुपाल ने वासुदेव को ही ललकारा कि आइए, वह आज उन्हें सब पाण्डवों सहित मार डालेगा, क्योंकि जिन्होंने इन राजाओं को छोड़कर उन-जैसे अराजा की पूजा की वे भी वध के योग्य हैं। तब कृष्ण ने मृदु स्वर में सब राजाओं के सामने शिशुपाल के अपराध गिनाए कि किस प्रकार उसने प्राग्ज्योतिष-यात्रा के समय द्वारका जलाई, रैवतक पर्वत पर क्रीड़ारत भोजराज के सेवकों का वध करके बन्दी बनाया, कृष्ण के पिता के अश्वमेध का यज्ञीय अश्व चुराया, अक्रूर की पत्नी का सौवीर-मार्ग में अपहरण किया, और करूषराज के वेश में विशाला की राजकुमारी भद्रा का हरण किया। कृष्ण ने कहा कि उन्होंने बुआ के स्नेहवश यह सब सहा, पर अब, सब राजाओं के सामने, उसके पाप पूरे हो गए।
शिशुपाल ने हँसकर कहा कि कृष्ण को भरी सभा में यह कहते लज्जा नहीं आती कि रुक्मिणी को उसने (शिशुपाल ने) चाहा था; कौन ऐसा पुरुष होगा जो अपनी पत्नी को दूसरे की वाग्दत्ता कहे; कृष्ण चाहें तो क्षमा करें, न चाहें तो न करें, उनके क्रोध या मैत्री से उसका क्या बिगड़ेगा। यह सुनते ही कृष्ण ने असुरों के अभिमान को नष्ट करनेवाले अपने चक्र का स्मरण किया, और चक्र हाथ में आते ही उन्होंने उच्च स्वर में कहा कि सुनिए, हे राजाओ, अब तक यह क्यों क्षमा किया जाता रहा। उसकी माता के माँगने पर सौ अपराध क्षमा करने का वचन था; वह गिनती अब पूरी हो गई, अतः वे इसे सबके सामने वध करेंगे। यों कहकर क्रोध में उन्होंने चक्र से चेदिराज का सिर काट दिया, और वह वज्र-आहत पर्वत-सा गिर पड़ा।

तब सब राजाओं ने देखा कि चेदिराज की देह से सूर्य-सा एक प्रचण्ड तेज निकला, जिसने कमलनयन कृष्ण की वन्दना करके उनकी देह में प्रवेश किया, और सब इसे विस्मय से देखते रहे। आकाश निर्मेघ होकर भी जल बरसाने लगा, उल्कापात हुआ और पृथ्वी काँपी। कुछ राजा मौन कृष्ण को निहारते रहे, कुछ क्रोध से हाथ मलते रहे, कुछ ने एकान्त में कृष्ण की प्रशंसा की। महर्षियों ने प्रसन्न होकर केशव की स्तुति की। युधिष्ठिर ने भाइयों को आज्ञा दी कि दमघोष-पुत्र शिशुपाल का अन्त्येष्टि-कर्म आदरपूर्वक करें, और सब राजाओं सहित उन्होंने शिशुपाल के पुत्र को चेदि-सिंहासन पर बैठाया।
समझने की कुंजी (नैतिकता): शिशुपाल के अपराध सचमुच घोर थे, पर इस प्रसंग की जटिलता यह है कि कृष्ण अपने ही फुफेरे भाई को, अपनी ही बुआ को दिए वचन की सौ-अपराध की गिनती पूरी होने पर, भरी राजसभा में चक्र से मार देते हैं। कथा न तो शिशुपाल को निर्दोष बनाती है, न कृष्ण के इस कठोर निर्णय को सरल। तेज का देह में लौटना यह संकेत देता है कि यह वध एक गूढ़ दैवी लीला का अंग भी है।
यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हुआ। कृष्ण ने शार्ङ्ग धनुष, चक्र और गदा से उसकी रक्षा अन्त तक की। स्नान के बाद युधिष्ठिर के पास आकर समस्त क्षत्रिय राजाओं ने कहा कि सौभाग्य से वे सम्राट-पद को प्राप्त हुए और उन्होंने अपने सम्पूर्ण वंश का यश फैलाया; अब वे अपने-अपने राज्य लौटना चाहते हैं। युधिष्ठिर ने सबको यथायोग्य सत्कार के साथ विदा किया, और कृष्ण भी, बुआ कुन्ती तथा द्रौपदी-सुभद्रा से विदा लेकर, दारुक के लाए गरुड़-ध्वज रथ पर द्वारका को प्रस्थान कर गए। उन्होंने जाते समय युधिष्ठिर से कहा कि वे सावधानी और धैर्य से प्रजा का पालन करें और मेघ, विशाल वृक्ष तथा सहस्राक्ष इन्द्र की भाँति अपने सम्बन्धियों के आश्रय बनें। केवल दुर्योधन और शकुनि उस दिव्य सभा-भवन में रहते रह गए।
सार: सौ अपराध पूरे होने पर कृष्ण ने भरी सभा में चक्र से शिशुपाल का सिर काटा; उसकी देह से निकला तेज कृष्ण में समा गया, राजसूय यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हुआ, और युधिष्ठिर सम्राट-पद पर प्रतिष्ठित हुए। पीछे रह गए दुर्योधन और शकुनि, जिनकी ईर्ष्या आगे की कथा का बीज है।
मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), सभा पर्व; गीता प्रेस गोरखपुर परम्परा।