Lulla Family

भगीरथ और गंगावतरण

कथा 62 · भागवतम् की कथाएँ

भगीरथ और गंगावतरण

The River He Brought Down for the Dead
स्कन्ध 9, अध्याय 8-9

परीक्षित् कुछ देर उस बहती गंगा को देखते रहे, फिर मुनिवर शुकदेव की ओर मुड़े।

”भगवन्,” उन्होंने कहा, ”मैं इन सात दिनों से इसी गंगा के किनारे बैठा हूँ। मेरे पूर्वज इसी के जल से तर्पण करते आए, और मेरे जाने के बाद भी लोग यहीं आकर अपने पितरों को जल देंगे। मुझे यह जानने की इच्छा है, मुनिवर, कि यह नदी पृथ्वी पर आई कैसे? और एक बात और मुझे बेचैन करती है। क्या एक मनुष्य के पुण्य से उसके बहुत पहले मर चुके पुरखों का भी कुछ भला हो सकता है? या जो चला गया, वह चला ही गया?”

शुकदेव ने धीरे से सिर हिलाया। ”राजन्, आप जिस जल पर बैठे हैं, उसकी पूरी कथा एक ऐसे ही प्रश्न से शुरू होती है। एक राजा थे, भगीरथ। उन्होंने यह नदी अपने लिए नहीं, अपने उन पुरखों के लिए माँगी जिन्हें उन्होंने कभी देखा तक न था। सुनिए, बात उनसे भी कई पीढ़ी पहले की है।”


इक्ष्वाकु के वंश में एक राजा हुए, सगर। उनके जन्म की कथा भी कड़वी है। उनके पिता बाहुक की मृत्यु के बाद उनकी माता पर सौतों ने भोजन के साथ गर अर्थात् विष दे दिया था। पर विष का उस गर्भ पर कोई असर न हुआ, और बालक उस गर के साथ ही पैदा हुआ, इसी से नाम पड़ा सगर। वही सगर आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट् हुए।

सगर के साठ हज़ार पुत्र थे। इतने कि गिनती सुनकर ही मन थक जाए। राजा ने अपने गुरु और्व के उपदेश के अनुसार अश्वमेध यज्ञ का संकल्प किया, और विधि के अनुसार यज्ञ का घोड़ा छोड़ दिया गया। वह घोड़ा जहाँ-जहाँ बेरोक जाता, वह भूमि सगर की मानी जाती।

देवराज इन्द्र को यह सहन न हुआ। उन्होंने चुपके से वह घोड़ा चुरा लिया।

Painterly classical-Indian color illustration: King Sagara's vast army of sixty thousand proud young princes furiously digging up the earth with spades and bare hands across a cracked plain, gouging a deep gigantic trench that fills with seawater to form the ocean; rich earth-browns, churned soil, glinting water rushing in, muscular figures with arrogant expressions, dust and turned clods, expansive horizon.

उधर यज्ञ-शाला में घोड़ा न मिला तो हलचल मच गई। महारानी सुमति के गर्भ से उत्पन्न वे साठ हज़ार राजकुमार अपने पिता की आज्ञा से घोड़े को ढूँढ़ने निकले। उन्होंने सारी पृथ्वी छान डाली। जहाँ कहीं घोड़ा न मिला, वहाँ बड़े घमण्ड से उन्होंने ज़मीन को खोद डाला। फावड़ों से, हाथों से, अपने बल के अहंकार से उन्होंने धरती का कोना-कोना उधेड़ दिया। पृथ्वी की छाती पर इतना गहरा खोदा कि वहाँ समुद्र भर गया, जिसे आज भी लोग सागर कहते हैं, उन्हीं सगर के पुत्रों के नाम पर।

खोदते-खोदते आख़िर वे पूर्व और उत्तर के उस कोने तक पहुँचे जहाँ घोड़ा खड़ा था। और घोड़े के पास बैठे थे, आँखें मूँदे, निश्चल, कपिल मुनि।

Painterly classical-Indian color illustration: the sixty thousand armed princes, faces twisted with rage and shouting accusations, lunging with raised swords and weapons toward the serene sage Kapila Muni who sits cross-legged in deep meditation with closed eyes beside the recovered sacrificial horse; the calm radiant ascetic contrasted against the storm of attackers, the white yajna horse nearby, jewel-toned palette, tension of violence about to break against stillness.

राजकुमारों ने घोड़ा देखा और उनके भीतर का सारा अहंकार उबल पड़ा। ”यही है वह चोर,” वे चिल्लाए। ”देखो तो, हमारा घोड़ा चुराकर बैठ गया, और अब साधु का स्वाँग रचकर आँखें मूँदे पड़ा है। मार डालो इसे, मार डालो।” शस्त्र उठाकर वे साठ हज़ार उस एक मौन बैठे मुनि की ओर झपटे।

परीक्षित्, यहाँ ध्यान देने की बात है। कपिल मुनि ने आँखें खोलीं। बस इतना ही। न कोई शाप, न कोई क्रोध का शब्द।

पर इन्द्र पहले ही उन राजकुमारों की बुद्धि हर चुके थे। अपने ही अहंकार की, अपने ही दुर्व्यवहार की जो आग उनके भीतर सुलग रही थी, वह उन्हीं के शरीरों से फूट निकली, और क्षण भर में वे साठ हज़ार के साठ हज़ार जलकर राख हो गए।

कोई यह न समझे कि एक मुनि के क्रोध ने उन्हें भस्म किया। कपिल तो शुद्ध सत्त्व के परम आश्रय थे, स्वयं भगवान् के अवतार। उनका शरीर तो जगत् को पवित्र करता है। उस शान्त, समाधिस्थ पुरुष में रोषरूप तमोगुण की कल्पना भी कैसे हो सकती है? भला, कभी पृथ्वी की धूल का आकाश से कोई बैर हुआ है? जो जला, वह उन कुमारों का अपना मद था।

सगर की एक और पत्नी थीं, केशिनी। उनके पुत्र का नाम था असमंजस, और असमंजस के पुत्र का नाम अंशुमान्। अंशुमान् अपने दादा सगर की सेवा में लगे रहते थे।

जब वे साठ हज़ार राजकुमार लौटे ही नहीं, तब राजा सगर ने अंशुमान् को घोड़ा ढूँढ़ने भेजा। अंशुमान् अपने चाचाओं के खोदे हुए उसी समुद्र के किनारे-किनारे चले। मीलों राख। जहाँ कभी साठ हज़ार बलवान युवक चलते थे, वहाँ अब बस सूखी, धूसर राख की ढेरियाँ पड़ी थीं, हवा में हल्की-सी उड़ती हुई। उसी राख के पास घोड़ा खड़ा था, और पास ही कपिल मुनि।

Painterly classical-Indian color illustration: the gentle prince Anshuman bowing in humility, prostrate at the feet of the seated luminous sage Kapila Muni with folded hands and a devotional expression, praising him; mounds of grey ash from the burned princes scattered along the shore of the newly formed sea, the sacrificial horse standing beside the sage, soft golden light, warm reverent mood, sea visible in the background.

अंशुमान् का हृदय उदार था। वे क्रोध से नहीं, विनय से झुके। मुनि के चरणों में प्रणाम किया और हाथ जोड़कर एकाग्र मन से उनकी स्तुति करने लगे, उन्हें अजन्मा, ज्ञानघन, सबके आत्मा के रूप में पहचानते हुए। बोले, ”प्रभो, आप अजन्मा हैं, ब्रह्मा से भी परे। बड़े-बड़े योगी समाधि लगाकर भी आपको नहीं पा पाते, फिर हम-जैसे अज्ञानी जीव आपको कैसे जानें? आप एकरस ज्ञानघन हैं। आज आपके दर्शन से मेरे मोह की वह दृढ़ फाँसी कट गई, जो कामना, कर्म और इन्द्रियों को जीवन देती है।”

कपिल प्रसन्न हुए। बोले, ”बेटा, यह घोड़ा आपके पितामह का यज्ञपशु है। इसे ले जाइए। और सुनिए, आपके जो चाचा यहाँ जलकर राख हुए हैं, उनका उद्धार केवल गंगाजल से ही होगा, और कोई उपाय नहीं।”

अंशुमान् घोड़ा लेकर लौटे, और सगर का अधूरा यज्ञ पूरा हुआ। पर वह वाक्य उस घराने में एक अनबुझे ऋण की तरह रह गया, पीढ़ी-दर-पीढ़ी सौंपा जाता हुआ, केवल गंगाजल से ही उद्धार होगा।

राजा सगर ने अंशुमान् को राज्य का भार सौंप दिया, और स्वयं विषयों से निःस्पृह, बन्धन-मुक्त होकर और्व मुनि के बताए मार्ग से परमपद को प्राप्त हुए। अंशुमान् ने राज किया, और फिर गंगा को धरती पर लाने की कामना से बहुत वर्षों तक घोर तप किया। पर वह दिन उन्हें न मिला। समय आया, और वे चल बसे। उनके पुत्र दिलीप ने वही तप किया, उसी कामना से। दिलीप को भी सफलता न मिली, समय पर उनकी भी मृत्यु हो गई। दो पीढ़ियाँ उस एक राख के लिए तपती रहीं और खाली हाथ चली गईं।

फिर दिलीप के पुत्र भगीरथ आए।

दो पीढ़ियों का अधूरा तप

भगीरथ ने वह तप किया जो उनके पिता और दादा से न हो सका था। राज-पाट, सुख, नींद, सब एक ओर रख दिया। उन्होंने जान लिया था कि यह काम बल का नहीं, याचना का है। साठ हज़ार पुरखे जिस अहंकार से बल आज़माकर राख हुए थे, उसी घराने का यह वंशज अब बल छोड़कर, सिर झुकाकर खड़ा था।

Painterly classical-Indian color illustration: King Bhagiratha standing in austere tapasya, head bowed in humble petition (not force), as the radiant river-goddess Ganga manifests before him as a luminous divine woman crowned with flowing water, appearing to grant a boon; ascetic forest setting, blue-white watery glow around the goddess, devotional jewel tones, the king's posture of surrender and yearning.

वर्षों बीते। और एक दिन, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं भगवती गंगा प्रकट हुईं।

”मैं आपको वर देने आई हूँ,” उन्होंने कहा।

भगीरथ ने बड़ी नम्रता से अपना मन खोला, ”देवि, आप मर्त्यलोक में चलिए। मेरे पुरखे वहाँ राख बने पड़े हैं, उन्हें आपके स्पर्श की प्रतीक्षा है।”

गंगा एक पल मौन रहीं। फिर उन्होंने जो कहा, उसमें वर के साथ एक चेतावनी भी थी।

”भगीरथ, जिस वेग से मैं स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरूँगी, उसे धारण करने वाला कोई होना चाहिए। ऐसा न हुआ तो मैं पृथ्वी को फोड़कर सीधे रसातल में चली जाऊँगी। और एक बात और। लोग मुझमें आकर अपने पाप धोएँगे। वह सारा पाप फिर मैं कहाँ ले जाऊँगी, किसमें धोऊँगी? इस पर आप स्वयं विचार कर लीजिए।”

यह कोई साधारण प्रश्न न था। नदी डर नहीं रही थी; वह पूछ रही थी कि जो मैल मुझमें छोड़ा जाएगा, उसका भार कौन उठाएगा। भगीरथ समझ गए कि एक धारा को रोक लेना ही काफ़ी नहीं, उसके भीतर पड़े संसार के मैल को भी कोई पचाने वाला चाहिए।

उन्होंने कहा, ”देवि, जो साधु संसार से उपरत हैं, अपने-आप में शान्त हैं, ब्रह्मनिष्ठ हैं और लोक को पवित्र करते फिरते हैं, वे ही अपने अंगों के स्पर्श से आपके भीतर का सारा पाप सोख लेंगे। क्योंकि उनके हृदय में तो स्वयं वे भगवान् बसते हैं जो सब पापों के नाशक हैं। नदी का मैल मनुष्य छोड़ेगा, और सन्त उसे हर लेंगे।”

”और मेरा वेग?” गंगा ने पूछा।

”उसे रुद्रदेव धारण करेंगे,” भगीरथ ने कहा। ”समस्त प्राणियों के आत्मा वही हैं। जैसे साड़ी एक-एक सूत में बुनी होती है, वैसे ही यह सारा विश्व उन्हीं शंकर में ओत-प्रोत है। उनके सिवा आपका वेग और कौन सँभालेगा?”

जटाओं में बँधी धारा

तब भगीरथ ने फिर तपस्या की, इस बार भगवान् शंकर को प्रसन्न करने के लिए। थोड़े ही दिनों में महादेव प्रसन्न हो गए। वे तो सम्पूर्ण विश्व के हितैषी हैं। राजा की बात उन्होंने एक ही शब्द में स्वीकार कर ली, ”तथास्तु।”

Painterly classical-Indian color illustration: Lord Shiva standing firm and serene, catching the entire thundering torrent of Ganga falling from the heavens upon his head, the whole river vanishing into his vast tangle of matted locks (jata) without any cataclysm or noise; crescent moon and rudraksha on Shiva, ash-pale skin, the white river coiling into his hair, cosmic sky above, controlled cascade, deep blues and silver-white water, awe and calm.

और फिर वह घड़ी आई। आकाश से गंगा अपने पूरे वेग के साथ गिरीं, इतने वेग से कि गिरतीं तो धरती को चीरकर पार निकल जातीं। पर शिव बीच में खड़े थे। उन्होंने सावधान होकर उस सारी धारा को अपने सिर पर, अपनी जटाओं के जंगल में थाम लिया। एक नदी पूरी की पूरी उन उलझी हुई जटाओं में समा गई, और कहीं कोई शोर न हुआ, कोई प्रलय न हुआ।

उस जल का स्वभाव ही बदल गया। भगवान् के चरणों से निकली वह धारा अब शिव की जटाओं से होकर बहती, इसी से उसका जल और भी पवित्र हो उठा।

भगीरथ नीचे प्रतीक्षा में खड़े थे। शिव ने अपनी एक लट खोली, और गंगा की एक पतली, सँभली हुई धारा पृथ्वी पर उतरी, उतने ही वेग में जितना धरती सह सके।

राख तक पहुँचता जल

अब भगीरथ अपने रथ पर आगे-आगे चले, और गंगा पीछे-पीछे।

यह वह दृश्य था जिसके लिए तीन पीढ़ियाँ तपी थीं। एक राजा अपने रथ पर, वायु के समान वेग से, उस रास्ते पर बढ़ता जा रहा था जो उसके पुरखों की राख तक जाता था। और उसके पीछे-पीछे गंगा दौड़ी चली आ रही थीं। जिस-जिस देश से वे गुज़रतीं, वही पवित्र हो जाता।

वे उसी समुद्र के किनारे, गंगासागर-संगम पर पहुँचे जहाँ कभी साठ हज़ार बलवान युवक खोदते-खोदते राख हो गए थे। वहीं वे राख की ढेरियाँ अब भी पड़ी थीं।

Painterly classical-Indian color illustration: at the Ganga-Sagara confluence by the sea, the descended waters of Ganga flowing forward and submerging the grey mounds of the sixty thousand princes' ashes; Bhagiratha standing on the shore beside his chariot watching, the released souls rising toward heaven as luminous forms over the water touched by the river; serene redemptive mood, golden uplifting light, blue river meeting the ocean, no mantras or ritual fire, only the touch of sacred water.

गंगा का जल आगे बढ़ा और उन ढेरियों को अपने जल में डुबा लिया।

बस इतना। न कोई मन्त्र, न कोई बड़ा अनुष्ठान। केवल जल का स्पर्श।

परीक्षित्, सगर के वे पुत्र ब्राह्मण के तिरस्कार के कारण भस्म हुए थे, उनके उद्धार का कोई उपाय बचा ही न था। फिर भी, केवल उनके शरीर की राख से गंगाजल का स्पर्श हो जाने मात्र से वे स्वर्ग को चले गए। पाप की वह आग जो उन्हें राख कर गई थी, वह जल की एक छुअन से बुझ गई।

तीन पीढ़ियों की प्रतीक्षा एक पल में फलित हुई। भगीरथ उस किनारे पर खड़े रहे, और देखते रहे, उस जल को जो अब उनके पीछे से आकर आगे, समुद्र की ओर बहता जा रहा था। उनका ऋण चुक गया था।


शुकदेव चुप हुए। गंगा की लहरें ठीक उनके सामने तट से टकरा रही थीं, वही जल, उसी कथा का।

परीक्षित् कुछ देर उस धारा को देखते रहे। फिर धीरे से बोले, ”भगवन्, तो जिनका उद्धार असम्भव लगता था, जो राख होकर हवा में उड़ चुके थे, उन्हें भी एक वंशज की पुकार खींच लाई। मैं इसी जल के किनारे बैठा हूँ, और अब समझता हूँ कि मैं अकेला नहीं बैठा।”

”हाँ, राजन्,” शुकदेव ने कहा। ”भगीरथ ने यह नदी अपने भोग के लिए नहीं माँगी। उन्होंने उनके लिए माँगी जो कभी उन्हें धन्यवाद भी न दे सकेंगे। इसी निःस्वार्थ पुकार में उसका बल था। और यह जल जो उन साठ हज़ार को तार गया, वह आज भी श्रद्धा से इसे सेवने वालों को वैसे ही तारता है। उन भस्म हुए पुरखों की तो बात ही क्या, जो जीते-जी, नियम और श्रद्धा के साथ इसका आश्रय लेते हैं, उनके विषय में तो कहना ही क्या।”

परीक्षित् ने गंगा की ओर देखा। दूर, बीच धारा में, सूरज का एक टुकड़ा जल पर तैर रहा था, और हल्के-हल्के काँपता हुआ नीचे की ओर, समुद्र की ओर बहता जा रहा था।

मन्थन

भगीरथ की कथा में एक चुप्पी छिपी है जिसे हम अक्सर सुनते नहीं। साठ हज़ार युवक अपने बल के भरोसे, अपने अहंकार के साथ एक मौन बैठे मुनि पर झपटे, और अपनी ही भीतरी आग से जल गए। उन्हें किसी ने नहीं मारा। वे अपने ही मद की चिनगारी थे।

और उद्धार उसी घराने के एक ऐसे आदमी से आया जिसने ठीक उल्टा रास्ता लिया। भगीरथ ने बल नहीं, याचना चुनी। खोदना नहीं, झुकना चुना। जो काम साठ हज़ार फावड़े न कर सके, वह एक झुके हुए सिर ने कर दिखाया।

गंगा का वह प्रश्न भी याद रखने योग्य है, कि मुझमें छोड़े गए पाप को कौन सोखेगा। पवित्र होने का अर्थ मैल को बहा देना भर नहीं; किसी को उसे पचाना भी पड़ता है। सन्त वही करते हैं, और इसी से वे लोक को पावन करते हैं।

‘भगीरथ-प्रयत्न’ मुहावरा यहीं से आया। पर असली भगीरथ-प्रयत्न खुदाई नहीं था। वह तो उनके चाचाओं ने की थी। असली प्रयत्न था, तीन पीढ़ियों का धैर्य, और दूसरों के लिए, उनके लिए जो लौटकर कभी देख भी न सकेंगे, अपना सब कुछ झोंक देना।

साहित्यिक-संदर्भ

सगर के पुत्रों की भस्म-कथा और कपिल-दर्शन श्रीमद्भागवत के नवम स्कन्ध, अध्याय 8 में आते हैं, और भगीरथ की तपस्या तथा गंगावतरण अध्याय 9 में। भागवत इस प्रसंग को संक्षेप में कहता है, और एक बात पर ज़ोर देता है कि कपिल के समाधिस्थ रूप में क्रोध की कल्पना भी असंगत है (9.8.13)। गंगा का वह जल, जिस पर शुकदेव यह कथा परीक्षित् को सुना रहे हैं, वही इस अध्याय की धारा है।