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तीन अनजन्मे राजकुमार: धात्री की असम्भव कथा

कथा · 26

तीन अनजन्मे राजकुमार: धात्री की असम्भव कथा

एक बालक ने अपनी धात्री से मन बहलाने वाली कथा सुनाने को कहा। धात्री ने ऐसी दुनिया रची जिसमें तीन राजकुमार थे, जबकि दो कभी जन्मे ही नहीं थे और तीसरा गर्भ में आया ही नहीं था। आगे की हर घटना उसी सहज विश्वास के साथ घटती है। श्रीवसिष्ठ इसी कथा से दिखाते हैं कि संकल्प अपने भीतर एक पूरा संसार खड़ा कर सकता है और मन उसे बिना जाँच के स्वीकार भी कर लेता है।

बालक का अनुरोध

श्रीराम ने श्रीवसिष्ठ से पूछा, “मुनिश्रेष्ठ, आपने बालक की जिस कथा का उल्लेख किया, वह कैसी है? कृपा करके उसका क्रम समझाइए।”

श्रीवसिष्ठ ने कहा, “राम, एक विचारहीन बालक ने अपनी धात्री से कहा कि कोई ऐसी कथा सुनाइए जिससे उसका मन बहल जाए। धात्री ने सरल और कोमल शब्दों में कथा आरम्भ की।”

धात्री बालक को तीन अनुत्पन्न राजकुमारों की असम्भव कथा सुनाते हुए

उसकी पहली पंक्ति में ही सामान्य तर्क पीछे छूट गया। कहीं एक अत्यन्त असत् नगर था। उस विस्तृत शून्य नगर में तीन बड़े सुन्दर राजकुमार रहते थे। वे मनस्वी, धार्मिक और शौर्यसम्पन्न थे। उनमें से दो कभी जन्मे ही नहीं थे और तीसरा अपनी माता के गर्भ में भी स्थित नहीं हुआ था। धात्री ने उनके गुणों का वर्णन उसी निश्चय से किया, जैसे वे सामने उपस्थित हों। बालक ने भी कोई आपत्ति नहीं की। उसने कथा की पहली असम्भव बात स्वीकार कर ली, इसलिए आगे आने वाला पूरा जगत उसके मन में स्थान पाने लगा।

कुछ समय बाद उन राजकुमारों के बन्धु-बान्धव मर गए। दुर्भिक्ष से उनके नगरवासियों के मुख मलिन हो गए थे। तीनों ने किसी अधिक उत्तम नगर की खोज में अपना शून्य नगर छोड़ दिया। वे साथ-साथ इस प्रकार निकले जैसे आकाश में बुध, शुक्र और शनैश्चर एक-दूसरे के समीप चल रहे हों। उनकी यात्रा का आरम्भ भी ऐसे नगर से हुआ था जिसका अस्तित्व नहीं था, और उनकी मंजिल वह नगर था जो अभी मिला तक नहीं था।

तपते मार्ग पर

तीनों राजकुमारों के अंग शिरीष के फूल की तरह सुकुमार थे। पीछे से पड़ती धूप ने उन्हें व्याकुल कर दिया। ग्रीष्म के ताप में पत्तियाँ जिस तरह मुरझा जाती हैं, वैसे ही वे मार्ग में थकने लगे। तपती बालू से उनके चरण जल गए। अपने झुंड से बिछुड़े मृगों की तरह वे “हा तात” कहते हुए शोक करने लगे। कुश के नुकीले अग्रभाग उनके पैरों में चुभ गए, प्रचण्ड ताप से अंगों के जोड़ शिथिल हो गए और उड़ती धूल से उनका शरीर धूसर हो गया।

लम्बी यात्रा के बाद उन्हें मार्ग में तीन वृक्ष दिखाई दिए। वे फूलों की मंजरियों से भरे थे, फल और पल्लवों से अलंकृत थे, और मृग-पक्षियों को आश्रय देते थे। उन तीनों में दो वृक्ष कभी उत्पन्न ही नहीं हुए थे। तीसरा ऐसा था जिस पर सरलता से चढ़ा जा सकता था, पर उसका बीज भी कभी बोया नहीं गया था।

बहुत थके हुए राजकुमार एक वृक्ष के नीचे ठहर गए। धात्री ने उनकी विश्रान्ति की तुलना स्वर्ग के पारिजात के नीचे बैठे इन्द्र, वायु और यम से की। राजकुमारों ने अमृत जैसे स्वाद वाले फल खाए, उनका रस पिया और गुलुच्छ लता के फूलों से माला बनाई। वहाँ देर तक विश्राम करने के बाद वे फिर चल पड़े। कथा में वृक्षों का जन्म असम्भव था, फिर भी उनकी छाया, फल, रस और फूल सभी सहज उपलब्ध थे। बालक के लिए उस समय इतना ही पर्याप्त था कि धात्री उन्हें कथा में उपस्थित कह रही थी।

जलहीन नदियों में स्नान

दोपहर के समय राजकुमार तीन नदियों के पास पहुँचे। वे लहरों से चंचल और मुखर बताई गईं। उनमें एक नदी पूरी तरह सूखी थी। शेष दो में भी तनिक जल नहीं था, जैसे अन्धे नेत्रों में देखने की शक्ति नहीं होती।

राजकुमारों ने उसी अत्यन्त सूखी नदी में बड़े प्रेम से स्नान किया। धात्री ने कहा कि वे ऐसे उतरे जैसे गर्मी से पीड़ित ब्रह्मा, विष्णु और महेश गंगा में स्नान कर रहे हों। उन्होंने बहुत देर तक जलक्रीड़ा की, दूध के समान स्वच्छ जल पिया और प्रसन्न मन से आगे बढ़े। नदी का सूखा होना, उसमें लहरें उठना, स्नान करना और जल पीना एक ही वर्णन में साथ बने रहे। कथा सुनते बालक ने इनमें किसी संगति की माँग नहीं की। एक संकल्प ने दूसरा दृश्य उत्पन्न किया और मन उसके साथ चलता गया।

सन्ध्या निकट आई। सूर्य अस्ताचल की ओर झुक रहे थे, तभी राजकुमारों को पर्वत जितना ऊँचा एक नगर दिखाई दिया। उस नगर की नयी रचना भविष्य में होने वाली थी। वह अभी बना नहीं था, फिर भी ऊपर पताकाएँ फैली थीं, नीचे कमल के तालाब भरे थे और नीले आकाश जैसे सुन्दर जलाशय दिखाई देते थे। नागरिकों के समूह गा रहे थे। उनके स्वरों का आरोह-अवरोह दूर तक सुनाई देता था।

भविष्य में बनने वाला नगर

नगर में तीन रमणीय भवन थे। मणि और सुवर्ण से बने वे घर हिमालय के शिखरों जैसे विशाल दिखाई देते थे। उनमें दो भवन कभी बनाए ही नहीं गए थे। तीसरे भवन की दीवारें नहीं थीं। तीनों राजकुमार उसी दीवाररहित भवन में प्रविष्ट हुए, बैठ गए और वहाँ विहार करने लगे।

उन्हें तपे हुए सोने से बनी तीन बटलोइयाँ मिलीं। दो बटलोइयाँ टूटकर दो-दो टुकड़ों में बँट चुकी थीं। तीसरी चूर-चूर हो गई थी। राजकुमारों ने साबुत बर्तन खोजने के स्थान पर उसी चूर्णरूप बटलोई को चुन लिया। धात्री उन्हें महाबुद्धिमान कहती रही और कथा अपने असम्भव विधान के अनुसार आगे बढ़ती रही।

वे बहुत भोजन करने वाले थे। उन्होंने उस चूर हुई बटलोई में निन्यानबे द्रोण चावल पकाए, अर्थात सौ से ठीक एक कम द्रोण। मात्रा का विशाल होना भी कथा की असंगतियों के बीच अपने पूरे भार के साथ उपस्थित है।

भोजन तैयार होने पर राजकुमारों ने तीन ब्राह्मणों को निमन्त्रित किया। उनमें दो देहरहित थे और तीसरे का मुख ही नहीं था। जिस ब्राह्मण का मुख नहीं था, उसने सौ द्रोण अन्न खा लिया। उसके भोजन के बाद जो बचा, उसे तीनों राजकुमारों ने खाया और उन्हें बड़ी तृप्ति हुई। चूर बटलोई में पके निन्यानबे द्रोण चावल में से मुखहीन अतिथि ने सौ द्रोण खाए, फिर भी राजकुमारों के लिए अन्न शेष रहा। धात्री की असम्भव गणना भी बालक के मन में सहज चलती रही।

धात्री ने कहा, “पुत्र, वे तीनों राजकुमार उस भावी नगर में आज भी सुख और शान्ति से रहते हैं और मृगया में क्रीड़ा करते हैं। मैंने यह सुन्दर आख्यायिका तुमसे कही है। इसे हृदय में रखोगे तो पण्डित हो जाओगे।”

बालक को कथा सुनकर बड़ा आनन्द हुआ। उसने राजकुमारों के जन्म, वृक्षों के बीज, नदियों के जल, नगर के निर्माण, भवनों की दीवारों, बटलोई की दशा या भोजन की मात्रा पर कोई प्रश्न नहीं उठाया। कथा की वाणी ने जिन वस्तुओं को क्रमशः सामने रखा, बालक का चित्त उन्हें ग्रहण करता गया।

श्रीवसिष्ठ का संकेत

श्रीवसिष्ठ ने श्रीराम से कहा कि बालकाख्यायिका चित्त की रचना समझाने के लिए सुनाई गई है। धात्री की कथा में प्रत्येक अगली बात पहले से निकले संकल्प को और दृढ़ करती है। राजकुमार मान लिए गए तो उनका नगर, यात्रा, थकान और विश्राम भी सम्भव जान पड़ा। वृक्ष मान लिए गए तो उनके फल और छाया स्वीकार हो गए। नदी का नाम आया तो सूखेपन के भीतर भी स्नान, जलक्रीड़ा और जलपान चल पड़ा। भविष्य के नगर ने भवन, नागरिक और गीत प्राप्त कर लिए।

चित्त के विकल्प भी इसी प्रकार एक-दूसरे को सहारा देते हैं। कोई धारणा बार-बार दोहराई जाए तो उसके भीतर संबंधों का विस्तृत जाल बनने लगता है। फिर मन उस जाल के प्रत्येक अंश को दूसरे अंश से प्रमाणित करता है। बालक के सामने धात्री की कथा कुछ ही क्षणों में अपना सम्पूर्ण भूगोल, समय, समाज और व्यवहार रच देती है। श्रीवसिष्ठ जगत की प्रतीति को इसी संकल्प-विस्तार का उदाहरण कहते हैं।

उन्होंने आकाश, पृथ्वी, वायु, पर्वत, नदियों और दिशाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि चित्त के संकल्प में ये सब स्वप्न की भाँति विकसित होते हैं। जैसे भावी नगर में तीन राजकुमार, तीन नदियाँ और अन्य रचनाएँ प्रकट हुईं, वैसे ही जगत की स्थिति संकल्प में दृढ़ होती है। समुद्र अपने ही जल में तरंगों के रूप में स्पन्दित होता है। उसी प्रकार संकल्प अपने आधार से अलग कोई दूसरा पदार्थ पाए बिना अनेक विकल्पों के रूप में फैलता है।

श्रीवसिष्ठ ने इस विस्तार के आरम्भ को एक संकल्प से जोड़ा। दिन निकलने पर लोगों के विविध व्यवहार बढ़ते जाते हैं और पूरा दिन सक्रिय दिखाई देने लगता है। उसी तरह मूल संकल्प से नाम, रूप, संबंध, आकर्षण, भय, बन्धन और मुक्ति की अनेक कल्पनाएँ विकसित होती हैं। प्रत्येक नया विकल्प पहले से स्वीकृत संसार को और विश्वसनीय बनाता है।

अन्त में उन्होंने श्रीराम को संकल्प के परित्याग और निर्विकल्प आत्मज्ञान में स्थित होने का उपदेश दिया। यहाँ परित्याग उस मानसिक आग्रह की परीक्षा है जो अपनी ही रचना को स्वतन्त्र और अन्तिम सत्य मान लेता है। उस आग्रह का परीक्षण होने पर संकल्प का जाल शिथिल होता है और चित्त को अपने आधार की ओर लौटने का अवसर मिलता है।

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