कथा · 27
विन्ध्यगिरि का गजराज और अज्ञान का गर्त
एक बलशाली गजराज तीन दिन से पड़ी लोहे की जंजीरें तोड़ देता है और उस महावत को जीवित छोड़ देता है, जिसने उसे घोर पीड़ा दी थी। वही महावत लौटकर उससे भी गहरा जाल रचता है। कुम्भ इस दृष्टान्त के सहारे राजा शिखिध्वज को समझाते हैं कि बाहरी त्याग के भीतर भी एक सूक्ष्म बन्धन छिपा रह सकता है।
कुम्भ ने दृष्टान्त आरम्भ किया
राजा शिखिध्वज सिंहासन, वैभव और राजमहल छोड़कर वन में तपस्वी का जीवन बिता रहे थे। उनकी पत्नी चूड़ा आत्मतत्त्व का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त कर चुकी थीं, किन्तु राजा उनके उपदेश को ग्रहण नहीं कर पाए थे। पत्नी के प्रति परिचय और अपनी पूर्वधारणाएँ उनके विवेक के बीच आ जाती थीं।
इसलिए चूड़ा ने कुम्भ नामक तेजस्वी युवा ब्राह्मण का रूप धारण किया। राजा ने उन्हें किसी दिव्य अतिथि की तरह देखा और उसी शिक्षा को आदर से सुनने लगे, जो महल में उनके सामने कई बार रखी जा चुकी थी।
कुम्भ इससे पहले वास्तविक चिन्तामणि और काँच की चमकती हुई नक़ल का दृष्टान्त सुना चुके थे। अब शिखिध्वज अपने बन्धन का अर्थ और गहराई से जानना चाहते थे।
कुम्भ ने कहा, “राजन्, विन्ध्यगिरि के वन में रहने वाले एक गजराज की कथा सुनिए। वह बड़े-बड़े यूथपतियों पर भी शासन करता था। उसकी शक्ति असाधारण थी, फिर भी एक ऐसा शत्रु उसे वश में किए हुए था, जिसे वह पूरी तरह पहचान नहीं पाया।”

तीन दिन की लौह-जंजीरें
वह गजराज विशाल था। उसके दो श्वेत दाँत लम्बे, चमकीले और तीक्ष्ण थे। एक महावत ने उसे पकड़कर चारों ओर से लोहे की जंजीरों में बाँध दिया था। वह उसके गण्डस्थलों पर शस्त्रों से प्रहार करता और उसे निरन्तर कष्ट देता था।
तीन दिन तक गजराज उसी दशा में रहा। जरा-सी गति पर भी लोहे की कड़ियाँ उसके शरीर को खींचतीं। बड़े-बड़े हाथियों का स्वामी अपनी जंजीरों की सीमा में सिमट गया था।
अन्ततः उसने दोनों दाँत बन्धनों में अड़ा दिए। दो मुहूर्त, अर्थात चार घड़ी तक, वह पूरी शक्ति से लोहे को खींचता रहा। एक-एक करके कड़ियाँ खुल गईं। जंजीरें भूमि पर गिर पड़ीं और उसकी गर्जना वन में फैल गई।
महावत कुछ दूर से यह सब देख रहा था। गजराज को मुक्त होते देखकर वह उसके मार्ग के पास एक ताड़-वृक्ष पर चढ़ गया। हाथ में अंकुश लेकर वह ऊपर बैठा रहा और हाथी के नीचे आते ही उसके मस्तक पर कूदने का प्रयत्न किया।
उसका लक्ष्य चूक गया। वह गजराज के सामने भूमि पर आ गिरा। उसके प्राण बचे रहे, पर उस समय वह अपने ही बन्दी के चरणों के नीचे पूर्णतः असहाय था।
गजराज एक पग में उसका अन्त कर सकता था। उसी मनुष्य ने उसे बाँधा था, उसी ने उसके गण्डस्थलों को घायल किया था। फिर भी उस विशाल प्राणी के भीतर करुणा जाग उठी। उसने गिरे हुए शत्रु को नहीं कुचला और वन की गहराई की ओर चला गया।
उस क्षण उसकी स्वतन्त्रता पूरी दिखाई देती थी। जंजीरें पीछे छूट चुकी थीं, महावत भूमि पर पड़ा था और सामने खुला हुआ वन था।
महावत ने नया बन्धन बनाया
कुछ समय बाद महावत उठ खड़ा हुआ। गजराज की करुणा ने उसके भीतर कृतज्ञता नहीं जगाई। अपना बन्दी खो देने के क्रोध में वह उसकी खोज करने लगा।
वन विशाल था और गजराज बहुत दूर निकल चुका था। लम्बे समय के बाद महावत ने उसे एक वृक्ष के नीचे विश्राम करते देखा। अब वह जंजीर लेकर सामने नहीं आया। बल का उपाय विफल हो चुका था, इसलिए उसने छल का सहारा लिया।
गजराज के विश्राम-स्थान के पास उसने एक गहरा, गोल गर्त खोदा। उसके मुँह को कोमल लताओं और ताज़ी हरियाली से ढक दिया। ऊपर से भूमि सहज, सुन्दर और समतल दिखाई देती थी। नीचे की रिक्तता का कोई संकेत नहीं था।
महावत दूर हटकर प्रतीक्षा करने लगा।
कुछ दिनों बाद गजराज घूमता हुआ उसी स्थान पर पहुँचा। उसके भार से लताएँ टूट गईं और वह गर्त में जा गिरा। खड़ी दीवारों के बीच उसके दाँतों को वह आधार नहीं मिला, जो लौह-जंजीरों के विरुद्ध मिला था।
महावत सामने आया और उसने गजराज को फिर दृढ़ता से बाँध दिया। अब हाथी उस गहरे गर्त में पड़ा कष्ट सहता रहा। लोहे को तोड़ने की सामर्थ्य उसमें थी, किन्तु उसने उस शत्रु को जीवित छोड़ दिया था, जो उसकी शक्ति को नए जाल में बदलना जानता था।
कुम्भ कुछ क्षण मौन रहे। शिखिध्वज के सामने वह दृश्य ठहरा रहा: एक महान गजराज गहरे गर्त में पड़ा है और वही महावत फिर उसका स्वामी बना हुआ है, जिसे उसने दया करके छोड़ दिया था।
“आप ही वह गजराज हैं”
शिखिध्वज ने पूछा, “यह गजराज कौन है? महावत किसका संकेत है, और जंजीरों तथा गर्त का क्या अर्थ है?”
कुम्भ ने स्पष्ट उत्तर दिया, “राजन्, आप ही वह गजराज हैं।”
राजा चुपचाप सुनते रहे।
“उसके दो श्वेत दाँत आपका वैराग्य और विवेक हैं। वैराग्य ने आपको राजसुख से विरत होने की शक्ति दी। विवेक ने दिखाया कि धन, पद और इन्द्रिय-सुख स्थायी शान्ति नहीं दे सकते। ये दोनों शक्तियाँ वास्तविक हैं। जैसे गजराज के दाँतों में सामर्थ्य थी, वैसे ही आपको महल से वन तक लाने वाली अन्तर्दृष्टि भी सार्थक थी।”
लोहे की जंजीर आशा और तृष्णा थी। मन भीतर से यह मानता था कि किसी वस्तु, सुख या प्रतिष्ठा के मिल जाने पर पूर्णता प्राप्त होगी। राज्य और भोगों का परित्याग करके शिखिध्वज ने उस जंजीर का बड़ा भाग तोड़ दिया था।
कुम्भ ने आगे कहा, “महावत अज्ञान है। अपने मन और आत्मस्वरूप को यथार्थ न जानना ही वह शक्ति है, जो बन्धन को चलाती है। जब महावत गजराज के सामने गिरा, तब बन्धन का कारण निर्बल होकर सामने पड़ा था। हाथी ने उसे छोड़ दिया और आगे बढ़ गया।”
राजमहल से निकलने पर शिखिध्वज के आसपास वे वस्तुएँ नहीं रहीं, जिनके सहारे उनका मन अपनी पहचान बनाता था। पहचान बनाने वाली प्रवृत्ति फिर भी बची रही। अब वही मन कहता था, “मैंने महान त्याग किया है। मैं कठोर तप करता हूँ। इस कठिन जीवन से मुझे मुक्ति मिलेगी।” इच्छा ने केवल अपना रूप बदल लिया था।
राजा ने उस मन की जाँच नहीं की, जो अपने त्याग का स्वामी बना बैठा था। यही अज्ञान पुनः उठ खड़ा हुआ और उसने नए जीवन के अनुकूल नया बन्धन तैयार कर लिया।
लताओं से ढका गर्त
कुम्भ ने फिर गर्त का अर्थ समझाया। वह ज्ञान के बिना की जाने वाली कठोर और कष्टदायक तपस्या थी। उसे ढकने वाली कोमल लताएँ तपस्वी जीवन के वास्तविक गुणों का संकेत थीं: संयम, एकान्त, सरलता, धैर्य और साधु-संगति।
ये गुण आत्मविचार में सहायक हो सकते थे। कठिनाई को ही उपलब्धि मान लिया जाए तो यही गुण भूल को ढक भी सकते थे। उनकी हरियाली के कारण गर्त सुरक्षित भूमि जैसा दिखाई देता था।
शिखिध्वज का वनवास निष्कपट था। उन्होंने असुविधा स्वीकार की, दिनचर्या सँभाली, पूजा की, इन्द्रियों को अनुशासित किया और पुराने भोगों से दूरी बनाई। कुम्भ ने इन प्रयत्नों को व्यर्थ नहीं कहा। उन्हीं से कई संस्कार क्षीण हुए और राजा में सुनने की पात्रता आई। फिर भी उन गुणों से गर्त समतल भूमि नहीं बन गया।
राजा ने कष्ट को ऐसा अर्थ दे दिया था, जो कष्ट में अपने आप नहीं होता। एकान्त विक्षेप घटा सकता है, किन्तु केवल उससे आत्मज्ञान प्रकट नहीं होता। तपस्या इच्छा की तीव्रता कम कर सकती है, पर “मैं असाधारण त्यागी हूँ” की धारणा को और पुष्ट भी कर सकती है। साधु-संगति विवेक को पोषण देती है, फिर भी अलग साधक की मूल मान्यता को ज्यों का त्यों छोड़ सकती है।
तप के थोड़े-से सद्गुण लताएँ थे। छिपी हुई गहराई यह विश्वास था कि शरीर और मन को पीड़ा देकर मुक्ति बनाई जा सकती है।
कुम्भ ने कहा, “यह पृथ्वी विन्ध्यगिरि है। आपकी बुद्धि की सामर्थ्य वही गजराज है। आशा और तृष्णा उसकी लौह-जंजीर हैं। अज्ञान महावत है। आपने राज्य छोड़कर लोहे को तोड़ दिया, पर उस मन का त्याग नहीं किया, जिसके द्वारा अज्ञान अपना काम करता है। कठोर तपस्या के गर्त में उतरकर आपने उसे स्वतन्त्रता समझ लिया।”
जो त्याग अभी शेष था
इस दृष्टान्त का आशय यह नहीं था कि शिखिध्वज महल लौट जाएँ या वन में बिताए वर्षों को निष्फल मान लें। कथा उन्हें उस स्थान को पहचानने के लिए कह रही थी, जहाँ बन्धन वास्तव में टिकता है।
कोई वस्तु अपने आप उन्हें कैद नहीं कर सकती थी। सिंहासन, पर्णकुटी, रेशमी वस्त्र और वल्कल का प्रभाव उन अर्थों से बनता था, जो मन उन्हें देता है। “मैं” और “मेरा” से जुड़कर वही अर्थ जंजीर बनते थे। त्याग के साथ वही दावा जुड़ जाए तो वह गर्त बन जाता था।
अब जिस त्याग की आवश्यकता थी, वह उस मन का त्याग था जो स्वयं को राजा या तपस्वी, सफल या असफल, बँधा हुआ या मुक्ति के निकट मानकर नापता रहता है। इसका अर्थ विचारों के प्रति हिंसा नहीं था। ऐसा स्पष्ट ज्ञान चाहिए था, जिसमें विचारों के काल्पनिक स्वामी का आधार ही न रहे।
शिखिध्वज मालव से बहुत दूर आ चुके थे। इस दूरी ने उनके कर्तव्य, भोजन, वस्त्र और दिनचर्या बदल दी थी। कुम्भ की कथा उन्हें उस स्थान तक ले आई, जहाँ उनकी यात्रा अभी नहीं पहुँची थी।
गजराज की शक्ति कभी सन्देह में नहीं थी। वह अपने शत्रु को पूरी तरह नहीं पहचान पाया था। इसी प्रकार शिखिध्वज के भीतर वैराग्य और विवेक दोनों मौजूद थे। कुम्भ अब इन दोनों को उस अज्ञान की ओर मोड़ रहे थे, जो उनके सबसे बड़े त्याग के बाद भी बचा रह गया था।