कथा · 28
मूर्ख हाथी: आज़ादी के बाद भी पिंजरा
हाथी अपनी पूरी ताक़त से गड्ढे से निकल आया। कुछ दिन बाद ख़ुद ही उसी गड्ढे में लौट गया। आदत बंधन से ज़्यादा गहरी थी।
एक वन में एक बूढ़ा जंगली हाथी रहता था। बहुत बड़ा। बहुत ताक़तवर। उसकी सूँड से पूरा पेड़ उखड़ जाता।
शिकारियों ने उसे फँसाने की योजना बनाई। एक बड़ा गड्ढा खोदा। ऊपर पत्तियाँ बिछा दीं। नीचे बाँस की नुकीली खूँटियाँ रखीं।
हाथी को कुछ पता नहीं था। वो हमेशा उसी रास्ते से जाता था। एक दिन पाँव रखा – और गड्ढे में गिर गया। गड्ढा गहरा था। बाँस की खूँटियाँ उसे चुभीं।
शिकारी आए। उन्होंने सोचा, “अब फँस गया। निकल नहीं पाएगा।”
मगर हाथी ने हार नहीं मानी। उसने अपनी पूरी ताक़त लगाई। बाँस की खूँटियाँ उसे चुभीं, ख़ून बहा, मगर वो धकेलता रहा। मिट्टी ढहाता रहा। एक तरफ़ की दीवार गिरी। हाथी ने पाँव रखा। बाहर निकल आया।
शिकारी हैरान। ऐसे कभी नहीं होता। मगर हाथी का जुनून था।
हाथी जंगल में चला गया। ज़ख्म धीरे-धीरे भरे।
एक हफ़्ते बाद कुछ अजीब हुआ।
हाथी फिर उसी रास्ते से गुज़रा। उसकी आदत थी। उसका मन कहता, “यह मेरा रास्ता है।”
और वो फिर उसी गड्ढे के पास आ गया। शिकारियों ने गड्ढे में फिर खूँटियाँ लगा दी थीं। पत्तियाँ बिछा दी थीं।
हाथी रुका। थोड़ी देर सूँघा। मगर उसकी आदत भारी थी। उसने पाँव रखा।
फिर गिर गया। फिर चुभीं खूँटियाँ। फिर ख़ून।
इस बार उसने सोचा, “ओह, यह तो वही गड्ढा है। मैं फिर फँस गया।” मगर उसने ताक़त नहीं लगाई। उसने सोचा, “मैं इसमें पहले फँसा था। निकलना मुश्किल होगा।”
उसकी अपनी बात ने उसे रोक दिया। वो बैठ गया गड्ढे में।
एक ऋषि पास से गुज़र रहे थे। उन्होंने हाथी को देखा। आँखें मूँदीं, ध्यान दिया, हाथी के मन को पढ़ा।
ऋषि ने पत्थर उठाए। हाथी की ओर फेंके। हाथी डरा। उठा। ताक़त लगाई। फिर बाहर निकल आया।
ऋषि ने पत्थरों से उसका रास्ता रोका। दूसरी दिशा में मोड़ा। एक नया रास्ता उसे दिखाया।
हाथी ने नया रास्ता पकड़ा। फिर गड्ढे की ओर कभी नहीं मुड़ा।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, हम सब इस हाथी की तरह हैं। एक बार जब हम किसी बंधन से निकलते हैं, तो ख़ुश होते हैं। मगर मन की आदतें बंधन से ज़्यादा भारी होती हैं। वो हमें वहीं वापस ले आती हैं। हमें उसी पुराने दुख के पास, उसी पुराने डर के पास।
“मुक्ति केवल बंधन से निकलने में नहीं है। वो आदतों को बदलने में है। जब तक नया रास्ता नहीं बनेगा, पुराना रास्ता खींचता रहेगा।
“और कभी-कभी हमें कोई पत्थर फेंकने वाला चाहिए, जो हमें आदत के गड्ढे से बाहर निकाले। उस ऋषि की तरह।”
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