कथा · 02
कर्कटी: सूई से ज्ञान तक
हिमालय की एक राक्षसी ने माँगा था सूई जैसा सूक्ष्म रूप, ताकि भीतर घुस-घुस कर खा सके। उसी सूक्ष्मता में उसे ज्ञान मिल गया। फिर एक रात उसने एक राजा और उसके मंत्री से सात प्रश्न पूछे।
सरयू पर बादल थे, हलके, पर पीछे पहाड़ों की दिशा से धीरे-धीरे इकट्ठा होते हुए। हवा में बारिश की एक प्रतीक्षा थी, उस तरह की प्रतीक्षा जो भीतर भी कुछ खींचती है।
राम कुछ देर से एक ही पत्थर पर बैठे थे। उन्होंने वसिष्ठ की ओर देखा – “गुरुदेव, क्या भूख और इच्छा एक ही चीज़ हैं?”
वसिष्ठ बोले – “क्यों पूछ रहे हो, राम?”

“आज सुबह जब मैं भोजन करने बैठा, तो मुझे लगा कि मेरी भूख सिर्फ़ देह की भूख नहीं है। मेरे भीतर कुछ और भी है जो भूखा है, पर वो क्या है, यह मुझे पता नहीं। और जब मैं भोजन कर लेता हूँ, तो देह की भूख तो शान्त हो जाती है, पर वो दूसरा भूखा रह जाता है। क्या वो भी कभी शान्त होगा?”
वसिष्ठ ने पहाड़ों की दिशा में देखकर कहा – “राम, बहुत बरस पहले इन पहाड़ों में एक राक्षसी रहती थी, जिसका नाम कर्कटी था। उसकी भूख इतनी बड़ी थी कि उसके सामने तुम्हारी और मेरी सारी भूखें छोटी पड़ जातीं। पर उसकी कथा सिर्फ़ भूख की कथा नहीं है, यह उस बदलाव की कथा है जब एक राक्षसी ने अपनी भूख को एक प्रश्न में बदल दिया। और प्रश्न में बदली हुई भूख ख़त्म हो जाती है, जबकि बाक़ी हर भूख बढ़ती ही जाती है।”

“दूर के पहाड़ों में, हिमालय के एक ऊँचे शिखर पर,” वसिष्ठ ने कहना शुरू किया, “कर्कटी रहती थी। केकड़े जैसा उसका नाम, और शायद केकड़े जैसा ही उसका स्वभाव। जो कुछ भी उसके पास से गुज़रता, वो उसे पकड़ लेती थी, पर पकड़ने से उसे कोई शान्ति नहीं मिलती थी।”
पहाड़ की राक्षसी
कर्कटी का देह बहुत बड़ा था। वो खड़ी होती तो उसकी छाया कई पेड़ों को एक साथ ढक लेती थी। उसके हाथ-पैर पतले नहीं थे, पर इतने लम्बे थे कि वो बैठी हुई भी पास के पेड़ की चोटी छू सकती थी। उसके बाल काले थे, उलझे हुए, और हवा में हमेशा हिलते रहते थे। उसकी आँखें पीली थीं, बिल्ली जैसी, और अँधेरे में चमकती थीं।
उसके देह पर कोई कपड़ा नहीं था। उसकी ख़ाल मोटी थी, गहरे रंग की, धूप-छाँव में बदलती हुई। उसके पैरों के तलवे पहाड़ की पत्थर-भूमि पर चलने से चौड़े और कठोर हो गए थे। उसके दाँत लम्बे थे, बाहर निकले हुए, और कान भी बड़े, सिर के दोनों ओर।
पर असली बात उसका देह नहीं था। असली बात उसका पेट था।
उसके पेट में एक भूख रहती थी जो कभी ख़त्म नहीं होती। वो जो भी खाती, उसे लगता कि कुछ कमी रह गई है।

एक बार उसने ज़मीन पर बैठकर एक पूरा हाथी खा लिया था। हाथी बहुत बड़ा था, पर कर्कटी के लिए वो एक कौर जैसा था। उसने हड्डियाँ चबाईं, चमड़ी चबाई, हाथी के अन्दर का सब कुछ ख़त्म कर दिया।
हाथी के ख़त्म होने पर उसने पास के एक पेड़ की पत्तियाँ चबा लीं, फिर ज़मीन की मिट्टी मुँह में डाली। फिर भी पेट के भीतर वही पुराना खालीपन बैठा रहा।

वो रात को आकाश की ओर देखती। चाँद आधा था। उसने सोचा, अगर मैं चाँद तक पहुँच पाऊँ, तो शायद उसे खाकर पेट भर जाए। पर चाँद बहुत ऊँचा था।
वो रोई नहीं, क्योंकि राक्षसी रोती नहीं। पर उसकी आँखें कुछ नम हुईं। उसके भीतर एक ऐसा क्रोध उठा जिसकी कोई दिशा नहीं थी, बस एक आम क्रोध जो हर चीज़ की ओर था और किसी एक चीज़ की ओर नहीं था।
कर्कटी अकेली थी। राक्षस-कुल में और भी थे, पर वो उससे दूर रहते। एक बार उसके भाई ने पूछा था – “बहन, क्या तू कभी खाना बन्द करेगी?” कर्कटी ने जवाब में अपने भाई को पकड़कर खा लिया था।
वो उस दिन से और भी अकेली हो गई। उसके परिवार ने उसे डर के साथ देखा, और फिर धीरे-धीरे चले गए, दूसरे पहाड़ों पर, दूसरे जंगलों में। कर्कटी अकेली रह गई, और अकेलापन उसे और भी भूखा बनाता गया।
विशूचिका बनना
एक रात उसके भीतर एक विचार आया। अगर देह छोटा हो जाए, तो शायद मैं हर जगह जा सकूँ, हर इंसान के भीतर, हर पेट के भीतर, हर सोच के भीतर, और तब मैं पूरे संसार को खा सकूँगी।

यह विचार उसे बहुत अच्छा लगा। इसमें एक रास्ता था, एक उम्मीद थी। वो पहाड़ की चोटी पर बैठ गई, पाँव क्रॉस किए, आँखें बन्द कीं, और तप शुरू कर दिया।
पहले कई दिनों तक उसका मन भागता रहा। पुरानी भूख याद आती, पुराने शिकार याद आते। बीच-बीच में उसे लगता कि अगर वो तुरन्त उठकर पहाड़ नीचे उतर जाए, तो किसी बूढ़े को या किसी अकेले राही को पकड़ सकती है। पर हर बार वो रुकती, पाँव क्रॉस किए रहती, आँखें बन्द किए रहती।
धीरे-धीरे उसका मन शान्त हुआ। पूरी तरह शान्त नहीं, पर वो विचार बहुत स्पष्ट हो गया। मुझे विशूचिका बनना है, मुझे सूची बनना है, बहुत बारीक, इतनी छोटी कि मैं हर पेट में जा सकूँ, हर साँस में बैठ सकूँ। फिर मैं उन्हें भीतर से खाऊँगी।
एक हज़ार बरस उसने तप किया। पहाड़ की चोटी पर बर्फ़ गिरी, पिघली, फिर गिरी। ऋतुएँ बदलीं। पक्षी आए और गए। पास के देवदार के पेड़ बूढ़े होकर गिरे, और नए पेड़ उगे।
कर्कटी बैठी रही। उसके देह पर बर्फ़ जमती, फिर पिघलती। बारिश आती, पानी उस पर ठहरता, फिर सूख जाता। उसके बालों में पक्षियों ने कई बार घोंसले बनाने की कोशिश की, पर उसे देखकर डर जाते और चले जाते।
एक दिन ब्रह्मा प्रकट हुए।
वो उसके सामने खड़े थे, पुराने ब्रह्मा, चार सिर, और उम्र का कोई नाप नहीं।
“कर्कटी।”
कर्कटी ने आँख खोली और ब्रह्मा को देखा। उसकी पीली आँखें ब्रह्मा को देखकर एक पल को मुलायम हो गईं।
“भगवन्।”
“तेरी तपस्या से मैं प्रसन्न हूँ। माँग, क्या चाहिए?”
कर्कटी ने अपनी जीभ अपने होंठ पर फिराई – “मुझे विशूचिका बनना है, सूची बनना है, इतनी बारीक कि मैं हर देह के भीतर जा सकूँ।”

ब्रह्मा ने उसे देर तक देखा, फिर बोले – “पुत्री, यह वर देने में मुझे संकोच है, पर तपस्या का फल देना है, तो दूँगा। एक शर्त है।”
“बोलिए।”
“तू सूची बनकर हर देह में जा सकती है, उन देहों को बीमारी से भर सकती है। पर एक नियम है। जो लोग धार्मिक हैं, जो सही ढंग से खाते हैं, जो सही ढंग से रहते हैं, उनके पास तू नहीं जा सकती। केवल अधर्मियों के पास, केवल उनके पास जो ख़ुद अपने देह को भीतर से ख़राब करते हैं।”
कर्कटी ने सोचकर पूछा – “भगवन्, अधर्मी ज़्यादा हैं या धर्मी?”
ब्रह्मा बोले – “पुत्री, यह तू ख़ुद जान।”
और ब्रह्मा चले गए।
हज़ारों पेट

कर्कटी ने अपना देह छोड़ा। वो छोटी होती गई, इतनी छोटी कि एक तीली से भी पतली, और फिर हवा में बह गई।
विशूचिका। सूची।
वो किसी आदमी की साँस के साथ उसके भीतर गई। वह आदमी एक नगर का बूढ़ा था, जो रात को सही समय नहीं सोता था, जो ख़राब भोजन करता था, जो शराब पीता था। उसने कई बरस से अपने देह को अपने ही ख़िलाफ़ एक लड़ाई बना रखा था।
कर्कटी उसके पेट में गई, फिर उसकी आँतों में, फिर उसके ख़ून में। आदमी रात भर रोता रहा, उसके पेट में मरोड़ उठी, आँतों में आग लगी, और सुबह वो मर गया।
कर्कटी हँसी। वो उसके देह से निकली, हवा में बही, और अगले आदमी के पास चली गई।
बहुत बरस उसने ऐसे ही बिताए।
एक नगर, फिर दूसरा, फिर तीसरा।
वो लाखों लोगों के भीतर गई, उसने उन्हें मारा, उनके पेट से उनकी ज़िन्दगी निकाली। हर देह एक कहानी थी, और उसके पास इतनी कहानियाँ इकट्ठा हो गई थीं कि उन्हें गिनना सम्भव नहीं था।
एक रात वो एक बूढ़ी स्त्री के भीतर थी।
बूढ़ी का देह बहुत कमज़ोर था। उसके पास एक छोटा बच्चा था, उसका पोता, जो उसकी गोद में सो रहा था।

कर्कटी ने बूढ़ी को खाना शुरू किया। बूढ़ी ने एक बार बच्चे को देखा। उसकी आँखों में आँसू नहीं आए, क्योंकि वो बहुत बूढ़ी थी। पर उसने बच्चे को धीरे से एक तकिए पर रखा, और अपना एक हाथ बच्चे की पीठ पर रख दिया।
फिर वो मर गई। बच्चा सोता रहा, उसे कुछ पता नहीं था। कर्कटी निकल गई।
पर इस बार उसके भीतर कुछ अजीब हुआ। वो हवा में रुक गई। उसने बच्चे को देखा, जो सो रहा था और जिसे पता नहीं था कि उसकी दादी अब नहीं है।
कर्कटी ने पहली बार सोचा, मैंने यह क्या किया? यह सोच नई थी, पहले कभी नहीं आई थी।
एक रात
एक रात कर्कटी एक नगर में पहुँची। नगर सोया हुआ था, और वो सूची के रूप में हवा में तैर रही थी।
एक घर में एक बूढ़ा था, जिसने रात भर शराब पी थी। उसका देह कमज़ोर था और आँतें ख़राब।
कर्कटी उसकी साँस के साथ भीतर गई, पहले गले में, फिर छाती में, फिर पेट में।
पेट में अराजकता थी, अधपका खाना, शराब, और पुराने ज़ख़्म। कर्कटी ने इन सब के बीच अपना घर बना लिया।
बूढ़ा रात भर तड़पा, उसके पेट में जैसे आग लगी हो। वो उठा, पानी पीया, पर पानी ने कुछ नहीं किया।
बूढ़े की पत्नी सोई थी। उसने पति की आह सुनी।
“क्या हुआ?”
“पेट में दर्द।”
“क्या खाऊँ?”
“नहीं। बस सो जा।”
पत्नी फिर सो गई। बूढ़ा रात भर तड़पता रहा।
कर्कटी ने उसके दर्द को देखा, और उसे अजीब लगा कि इस दर्द से आनन्द नहीं आ रहा। पहले उसे आता था, पर इस रात कुछ अलग था।
उसने सोचा, मुझे क्यों अच्छा नहीं लग रहा? पर जवाब नहीं मिला।
सुबह बूढ़ा मर गया। उसकी पत्नी जागी और पति को मरा देखा।
उसने एक धीमी आवाज़ दी, पर रोई नहीं। बहुत बरस की पत्नी थी। बस बैठी रही।
फिर पड़ोसी और बच्चे आए, और अंतिम संस्कार की तैयारी होने लगी।
कर्कटी ने यह सब देर तक देखा। जब बूढ़े को जलाया गया, तो पत्नी आख़िर रोई, बहुत देर तक, और बच्चे ने उसे सम्हाला।
कर्कटी ने पत्नी के चेहरे को देखा, और उसके भीतर एक नई हलचल उठी, कुछ ऐसा जो उसने पहले कभी नहीं जाना था। करुणा।
कर्कटी हवा में हिली। उसने सोचा, यह क्या है? पर जवाब नहीं मिला।
कर्कटी उस नगर से बाहर निकल आई और बहुत दिन तक बिना किसी पेट में जाए भटकती रही।
ख़ाली
वो अगले आदमी के पास गई, पर कुछ बदल गया था। जब उसने उस आदमी को खाना शुरू किया, तो उसके भीतर वो पुराना सुख नहीं आया।
वो अगले के पास गई, फिर अगले के। हर बार वो खाती, हर बार वो मारती, पर भीतर वही पुराने पेट का ख़ालीपन बना रहता।
कर्कटी रुकी। वो एक नदी के पास बैठी। वो अब अपने पुराने विशाल देह में थी, बारीक नहीं, पर उसकी आँखें अलग थीं।
उसने अपने पेट को छुआ – “क्या तुम कभी भरोगे?” पेट ने कोई जवाब नहीं दिया। “मैंने इतना खाया, फिर भी?” पेट ने कोई जवाब नहीं दिया।
कर्कटी ने देर तक सोचा। शायद यह भूख पेट की नहीं है। शायद यह भूख कहीं और से आती है। शायद मैं ग़लत जगह से जवाब ढूँढ रही हूँ।
उसके भीतर एक नया दर्द उठा। उसे उस पुरानी बूढ़ी का चेहरा याद आया, उसका बच्चा, और बच्चे की पीठ पर बूढ़ी का हाथ।
कर्कटी ने पहली बार रोने की कोशिश की, पर वो रोई नहीं, क्योंकि राक्षसी रोना नहीं जानती थी। बस उसके भीतर एक आँधी सी उठी और बैठ गई।
दूसरा तप
उसने एक बार फिर तपस्या शुरू की।
इस बार उसने ब्रह्मा को नहीं पुकारा, किसी को नहीं पुकारा। वो बस पाँव क्रॉस करके बैठ गई और अपने भीतर देखने लगी।
पहले उसे अपना पुराना क्रोध दिखा। उसने उसे देखकर पूछा, क्रोध, तू कहाँ से आता है? क्रोध ने जवाब नहीं दिया, पर वो धीरे-धीरे कम होता गया, क्योंकि देखा गया क्रोध छोटा हो जाता है।
फिर उसे अपनी भूख दिखी। उसने भूख को देखकर पूछा, भूख, तू क्या है? भूख ने जवाब नहीं दिया, पर वो भी धीरे-धीरे बदलती गई, पेट की भूख से कुछ और होती गई।
फिर उसे अपना अकेलापन दिखा। उसने अकेलेपन को देखकर पूछा, अकेलापन, तू कहाँ से आया? अकेलेपन ने जवाब नहीं दिया, पर वो भी बदल गया।
फिर उसे एक नया भाव दिखा। करुणा। यह पहले उसके भीतर नहीं था। शायद बूढ़ी की मौत से आया था, शायद बच्चे की पीठ पर रखे हाथ से, शायद हज़ारों मौतों के इकट्ठा भार से।
कर्कटी ने करुणा को देखा। करुणा ने उसे देखा।
बहुत बरस वो अपने भीतर ही देखती रही।
एक दिन उसके भीतर एक प्रश्न उठा। मैं कौन हूँ? यह प्रश्न इतना सीधा था कि वो हँस पड़ी, फिर हँसी रुक गई।
मैं राक्षसी हूँ, कर्कटी। पर कौन है यह कर्कटी? क्या यह देह कर्कटी है? पर यह देह तो कई बार बदला है, बारीक हुआ, बड़ा हुआ, फिर बारीक हुआ, फिर बड़ा। तो जो बदलता है, वो मैं नहीं।
क्या यह भूख कर्कटी है? पर भूख तो आती है, जाती है। जो आता-जाता है, वो मैं नहीं। क्या यह क्रोध कर्कटी है? पर क्रोध भी आता-जाता है, तो वो भी मैं नहीं। और यह करुणा? यह नई है, पर यह भी आती-जाती है।
तो मैं क्या हूँ?

कर्कटी पहली बार रुकी। उसके भीतर एक प्रकाश था, बहुत छोटा, बहुत पुराना, जो हर बदलाव के बीच में था पर बदलता नहीं था, जो हर भूख के बीच में था पर भूखा नहीं था, जो हर क्रोध के बीच में था पर क्रोधी नहीं था, जो करुणा से पहले था और रहेगा।
कर्कटी ने उस प्रकाश को देखा। प्रकाश ने उसे देखा।
जब वो उठीं, तो वो वही कर्कटी नहीं थीं। देह वही था, पीली आँखें वही थीं, उलझे हुए बाल वही थे। पर भीतर कुछ और था, एक ऐसी शान्ति जो उन्होंने पहले नहीं जानी थी। उनका पेट अब भी कभी-कभी कुछ माँगता था, पर वो उसे सुनकर अब हँस देती थीं।
उन्होंने सोचा, अब मुझे एक काम करना है। मैं अब किसी को नहीं मारूँगी, पर मैं भूखी भी हूँ। यह देह बड़ा है, इसे भोजन चाहिए। तो मैं उसी से माँगूँगी जो मुझे यह बताए कि क्या खाऊँ।
वो पहाड़ से नीचे उतरीं।
राजा और मन्त्री
नीचे एक छोटा सा राज्य था। राज्य का नाम कथा में नहीं आता, पर वो कोई बड़ा राज्य नहीं था, एक मध्यम राज्य था, एक राजा, एक मन्त्री, एक नगर और कुछ गाँव।
राजा का नाम भी कथा में नहीं आता, न मन्त्री का, क्योंकि यह नामों की कथा नहीं है। यह उस बात की कथा है जो उनके बीच घटी।
राजा रात को कभी-कभी अकेले निकलते थे, बिना पहरेदारों के, बस अपने मन्त्री के साथ।
वो जंगल के किनारे जाते, वहाँ बैठते, कुछ बात करते, फिर लौट आते। यह उनकी पुरानी आदत थी। बात बहुत बड़ी नहीं होती थी, राज्य की बातें, प्रजा की बातें, और कभी-कभी दर्शन की बातें।
मन्त्री राजा के बचपन के साथी थे, एक ही गुरुकुल में दोनों पले थे। एक राजा बन गया, एक मन्त्री, पर दोनों के बीच की बात हमेशा बच्चों की तरह रही।
उस रात जब कर्कटी पहाड़ से उतरीं, तो राजा और मन्त्री जंगल के किनारे बैठे थे। मन्त्री ने एक बात कही थी – “महाराज, क्या आप कभी सोचते हैं कि हम क्या हैं?”
राजा बोले – “मन्त्री, यह बात आज क्यों?”
“बस। एक रात है, तारे ऊपर हैं, और मुझे लगता है कि अगर हम यह न पूछें, तो हम बहुत कुछ खो रहे हैं।”
तभी कर्कटी वहाँ पहुँचीं।
कर्कटी ने उन्हें देखा।
उनका देह बहुत बड़ा था। जब वो राजा और मन्त्री के बीच खड़ी हुईं, तो उनके सिर पर उसकी छाया पड़ी। पर वो दोनों डरे नहीं, उन्होंने ऊपर देखा।
राजा ने सिर थोड़ा झुकाकर कहा – “माँ।”
कर्कटी ने हैरानी से उन्हें देखा – “तुम मुझे माँ क्यों कह रहे हो? मैं राक्षसी हूँ, मैं तुम्हें खा सकती हूँ।”
राजा बोले – “माँ, अगर आप मुझे खाने आई होतीं, तो मैं अब तक खाया जा चुका होता। आप कुछ और चाहती हैं। बताइए, क्या?”
कर्कटी कुछ देर चुप रहीं। मन्त्री ने राजा की ओर देखकर कहा – “महाराज, मुझे लगता है माँ कुछ पूछना चाहती हैं।”
कर्कटी ने मन्त्री को, फिर राजा को देखा – “हाँ। पूछना चाहती हूँ।”
“बैठिए, माँ।”
कर्कटी बैठीं। बैठने पर भी उनका देह राजा और मन्त्री से बहुत बड़ा था, पर अब उनकी आँखें एक स्तर पर थीं।
“बोलिए।”

कर्कटी ने अपने भीतर के पुराने प्रश्न को टटोला, फिर एक प्रश्न चुना – “मैं एक प्रश्न पूछती हूँ। अगर तुम जवाब दो, तो मैं तुम्हें नहीं खाऊँगी। अगर तुम जवाब न दो, तो मैं तुम्हें खाऊँगी।”
राजा बोले – “पूछिए।”
प्रश्न
“कौन है वो जो हर साँस के पीछे है, पर साँस नहीं है? जो हर विचार के पीछे है, पर विचार नहीं है? जो हर भूख के पीछे है, पर भूखा नहीं है?”
राजा ने मन्त्री को देखा, मन्त्री ने राजा को।
राजा बोले – “माँ, वो है चेतना, आत्मा, जो हर अनुभव का साक्षी है, पर अनुभव नहीं है। जो हर रूप के पीछे का निराकार है। उसे कोई पकड़ नहीं सकता, क्योंकि वो ख़ुद हर पकड़ने वाले के भीतर है।”
कर्कटी बोलीं – “दूसरा प्रश्न।”
“अगर हर भूख के पीछे चेतना है, और चेतना ख़ुद भूखी नहीं है, तो भूख कहाँ से आती है?”
मन्त्री ने जवाब दिया – “माँ, भूख देह की है, और देह चेतना का एक रूप है। चेतना जब अपने एक देह में फैलती है, तो वो देह की भूख को भी जानती है, पर वो ख़ुद भूख नहीं है। जब तक हम चेतना को देह समझते रहते हैं, तब तक भूख हमें परेशान करती है। जिस क्षण हम चेतना को चेतना समझते हैं, भूख तो रहती है, पर वो हमें परेशान नहीं करती।”
कर्कटी बोलीं – “तीसरा प्रश्न।”
“मैंने हज़ारों लोगों को खाया, मेरी भूख फिर भी नहीं भरी। क्यों?”
राजा ने धीरे से कहा – “माँ, क्योंकि देह की भूख कितनी भी हो, वो दूसरी देह से नहीं भर सकती। यह तो आपका अपना भीतर है जो भूखा है, और भीतर का भूखा तब भरता है जब आप उसे पहचानती हैं। आप पहचान चुकी हैं, इसी कारण आप यह प्रश्न पूछ रही हैं। जो अब तक नहीं पहचानता, वो ऐसे प्रश्न नहीं पूछता।”
कर्कटी कुछ देर चुप रहीं, फिर बोलीं – “चौथा प्रश्न।”
“अगर मैं ख़ुद चेतना हूँ, तो मैं इतने बरस यह क्यों नहीं जानती थी?”
मन्त्री बोले – “माँ, चेतना अपने आप को तब तक नहीं देखती, जब तक वो किसी ऐसी जगह में रहती है जहाँ देखना आसान न हो। आप राक्षसी थीं, और राक्षसी होने में बहुत सी ऐसी बातें हैं जो ज्ञान से दूर रखती हैं। पर एक बार जब आपने अपने भीतर देखा, तब चेतना ने ख़ुद को पहचान लिया। यह बात देर से होती है, राक्षसी हो या ब्राह्मण, पर होती ज़रूर है।”
कर्कटी बोलीं – “पाँचवाँ।”
“अगर मैंने इतने लोगों को मारा, तो क्या मुझे उसकी सज़ा मिलेगी?”
राजा और मन्त्री ने एक-दूसरे को देखा। मन्त्री बोले – “माँ, सज़ा और कर्म का सम्बन्ध है। आपने जो किया, वो आपकी देह की भूख से किया, पर अब आप उस भूख से अलग हैं, अब वो आप नहीं हैं। तो सज़ा भी आप नहीं उठाएँगी।
“पर यह बात आसान नहीं है, क्योंकि देह वही है, और कर्म का बँधन देह से भी होता है।
“एक बात कह दूँ। हर जीव जिसे आपने मारा था, उन सब के लिए अब आप एक काम कर सकती हैं, एक प्रार्थना, एक छोटा यज्ञ। यह आपके पुराने कर्म को हलका करेगा, पर पूरी तरह नहीं। बाक़ी आपको अपने अब के देह में सहना होगा।”
कर्कटी बोलीं – “छठा।”
“अब मैं क्या खाऊँ?”
राजा बोले – “माँ, यह सबसे अच्छा प्रश्न है। आप अब उन्हें खाइए जिन्हें खाना धर्म-संगत हो। पहाड़ों में पशु हैं जो स्वाभाविक रूप से मरते हैं, उन्हें खाइए। जंगलों में पेड़ हैं, फल हैं, कन्द हैं, उन्हें खाइए। जब किसी मनुष्य की देह स्वाभाविक मृत्यु से जाए, तो वो शव बेकार है, अगर आप चाहें तो वो भी ले सकती हैं, धर्म के अनुसार। पर जिसका वध आपकी इच्छा से हो, उसे न खाइए। यह नियम है।”
कर्कटी बोलीं – “सातवाँ।”
“क्या आप दोनों मेरे साथ रहेंगे, थोड़ी देर के लिए?”
राजा और मन्त्री ने एक-दूसरे को देखा, फिर बोले – “माँ, हमें राज्य चलाना है, हम रोज़ नहीं रह सकते। पर आप जब चाहें, हमारे पास आ सकती हैं। और यदि आप यहाँ पहाड़ों में रहें, तो हम कभी-कभी मिलने आ सकते हैं।”
कर्कटी बोलीं – “मैं यहीं रहूँगी।”
“और एक बात, माँ।”
“क्या?”
“अगर आप कभी हमारे राज्य में आएँ, तो हमारी प्रजा को न डराइएगा। आप बहुत बड़ी हैं, वो आपको देखकर डरेंगे।”
कर्कटी बोलीं – “मैं अपना देह छोटा कर सकती हूँ। मैंने एक हज़ार बरस का तप किया था इसी के लिए। आपके राज्य में आऊँगी तो छोटी होकर आऊँगी।”
राजा बोले – “माँ, धन्यवाद।”
राजा और मन्त्री लौटे। कर्कटी पहाड़ पर लौटीं। पर पहाड़ अब अलग था, हवा अलग थी, और उनके भीतर वो पुराना खालीपन नहीं था।
और प्रश्न
कुछ महीने बाद राजा और मन्त्री वापस आए। कर्कटी पहाड़ की चोटी पर बैठी थीं, और वो दोनों उनके पास पहुँचे।
“माँ।”
“राजा। मन्त्री।”
“हम और प्रश्न लाए हैं।”
कर्कटी बोलीं – “बोलिए।”
राजा बोले – “माँ, मेरे राज्य में एक समस्या है। मेरी प्रजा बहुत क्रोधी है, आपस में लड़ती है। मैंने कई बार बात की, समझाया, पर बात बैठती नहीं।”
कर्कटी बोलीं – “राजा, मुझ से क्या चाहते हो?”
“माँ, आपने भीतर देखा है, आप कुछ बताइए।”
कर्कटी बोलीं – “राजा, क्रोध एक रूप है। उसके पीछे एक डर होता है, डर के पीछे एक खालीपन, और खालीपन के पीछे चेतना।
“अगर आपकी प्रजा क्रोधी है, तो उसमें कोई बड़ी कमी है। उस कमी को सम्बोधित करिए, क्रोध को नहीं।”
मन्त्री बोले – “माँ, कैसे?”
“मन्त्री, हर एक के पास अपना रास्ता है, पर कुछ साधारण बातें हैं। उन्हें भोजन दीजिए, अगर भूखे हैं। उन्हें घर दीजिए, अगर बेघर हैं। उन्हें प्रेम दीजिए, अगर अकेले हैं। क्रोध तब कम होगा।”
राजा बोले – “माँ, और एक प्रश्न।”
“बोलिए।”
“माँ, मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं अच्छा राजा हूँ?”
कर्कटी बोलीं – “राजा, यह प्रश्न ही जवाब है।”
“मतलब?”
“मतलब, जो राजा यह प्रश्न पूछता है, वो अच्छा होने की राह पर है। बुरे राजा यह प्रश्न नहीं पूछते।”
मन्त्री ने भी एक प्रश्न पूछा – “माँ, मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं अच्छा मन्त्री हूँ?”
कर्कटी बोलीं – “मन्त्री, अगर आप अपने राजा को सच बता रहे हैं, चाहे राजा को अच्छा लगे या न लगे, तो आप अच्छे हैं।
“अगर आप राजा को वही बता रहे हैं जो वो सुनना चाहता है, तो आप ख़राब हैं।”
मन्त्री ने सिर झुकाया।
राजा ने एक और प्रश्न पूछा – “माँ, क्या मेरे राज्य में मेरे जैसा कोई एक दिन आएगा? कोई जो मुझ से बेहतर हो?”
कर्कटी बोलीं – “राजा, हाँ। यह नियम है। हर पीढ़ी में पहले से बेहतर कोई आता है। यह न आए, तो मनुष्य आगे नहीं बढ़ता।
“पर एक बात।”
“क्या?”
“अगर आपका बेटा या नाती आप से बेहतर हो, तो ख़ुश होइए। उन्हें छोटा मत समझिए। अपनी कुर्सी पकड़कर मत रखिए।”
राजा ने सिर झुकाकर कहा – “माँ, यह सब मुझे बहुत कुछ सिखा रहा है।”
“राजा, मैं नहीं सिखा रही। आप ख़ुद सीख रहे हैं। मैं तो बस आपके सामने एक आइना हूँ।”
तीनों कुछ देर चुप रहे।
मन्त्री ने एक और प्रश्न पूछा – “माँ, अन्तिम प्रश्न।”
“बोलिए।”
“क्या आप कभी हम से बढ़कर हुई थीं?”
कर्कटी बोलीं – “मन्त्री, क्या मतलब?”
“मतलब, आप कभी राक्षसी थीं, फिर तपस्विनी, फिर योगिनी। आपने सब कुछ देखा है। क्या आप हम से बढ़कर हैं?”
कर्कटी कुछ देर चुप रहीं, फिर बोलीं – “मन्त्री, हम तीनों एक हैं।”
“कैसे?”
“मतलब, हमारी देह अलग है। मेरा देह बड़ा, आप दोनों का छोटा। मेरा अनुभव अलग, आप दोनों का अलग।
“पर हमारे भीतर एक ही चेतना है, और चेतना के लिए बड़ा और छोटा कोई नहीं।
“तो हम बराबर हैं।”
राजा और मन्त्री ने सिर झुकाए।
और शिष्य
कर्कटी के पास धीरे-धीरे लोग आने लगे। पहले कुछ साधक, जिन्होंने सुना कि एक राक्षसी पहाड़ पर बैठी है जो बात करती है। कुछ डरते, कुछ नहीं।
एक दिन एक युवक आया, जिसकी आँखों में एक प्यास थी।
“माँ, मुझे एक प्रश्न पूछना है।”
“पूछो।”
“माँ, मेरे भीतर एक भूख है, पर यह देह की भूख नहीं, कुछ और है।”
कर्कटी बोलीं – “बेटा, यह वही भूख है जो मेरे भीतर थी।”
“फिर?”
“फिर मैंने उसे भीतर देखा, तब वो बदल गई।”
“कैसे देखूँ?”
कर्कटी ने युवक को आसन दिखाया – “बैठ। आँखें बन्द कर। अब अपनी भूख को देख। उसे हटाने की कोशिश मत कर, बस देख।”
युवक बैठा और उसने आँखें बन्द कीं।
युवक ने देर तक कोशिश की, फिर आँखें खोलीं।
“माँ, मैंने देखा।”
“क्या देखा?”
“भूख। उसके पीछे एक खाली। खाली के पीछे एक डर। डर के पीछे…”
“बोलो।”
युवक एक क्षण ठहरकर बोला – “माँ, उसके पीछे कुछ नहीं।”
“और?”
“और उस कुछ नहीं में कुछ है।”
कर्कटी बोलीं – “बेटा, तुम पास आ रहे हो।”
युवक ने सिर झुकाकर कहा – “माँ, मैं और आऊँगा।”
“आ।”
युवक बहुत बार आया, बहुत बरस तक।
एक दिन वो आया, और उसकी आँखों में अब वो पुरानी प्यास नहीं थी।
“माँ, मुझे मिल गया।”
“क्या?”
“वो जो हर भूख के पीछे है।”
कर्कटी बोलीं – “बेटा, मैंने तुम्हें कुछ नहीं सिखाया।”
“माँ, आपने मुझे सिखाया कि भूख को देखना है। बस।”
“बस यही, और कुछ नहीं।”
युवक ने प्रणाम किया और चला गया।
बहुत और शिष्य आए, बहुत बरस तक। कर्कटी ने हर एक को वही बात सिखाई – “देखो। मत लड़ो। देखो।”
एक भूखी आँख
एक दिन एक स्त्री कर्कटी के पास आई। वो बहुत पतली थी, और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
“माँ, मुझे एक बात बतानी है।”
“बोलो।”
“माँ, मैं ख़ुद को नहीं रोक पाती।”
“किस से?”
“खाने से।”
कर्कटी बोलीं – “बैठो, बेटी। बताओ।”
स्त्री बैठी और एक उदास हँसी हँसकर बोली – “माँ, मैं हर रोज़ बहुत खाती हूँ, पर पेट कभी नहीं भरता।
“मेरे पति परेशान हैं, मेरे बच्चे डरे हुए हैं, मेरे पड़ोसी मुझ पर हँसते हैं।
“मैं ख़ुद को रोकती हूँ, पर रोक नहीं पाती।”
कर्कटी ने अपना हाथ बढ़ाकर स्त्री के कन्धे पर रखा – “बेटी, मुझे यह बहुत अच्छी तरह समझ आता है।”
“क्यों?”
“बेटी, मैं ख़ुद वही थी।”
स्त्री चौंकी – “माँ?”
“हाँ। मेरी भूख बहुत बड़ी थी। मैं पूरा हाथी खा जाती थी, फिर भी पेट खाली रहता।”
स्त्री बोली – “माँ, फिर कैसे ठीक हुईं?”
कर्कटी बोलीं – “बेटी, सुनो। यह सीधा रास्ता नहीं है, इसमें बहुत बरस लगते हैं।”
“बोलिए।”
“बेटी, पहले एक बात समझो। तुम्हारी भूख देह की नहीं है।”
“पर मुझे तो देह की ही लगती है।”
“लगती है, पर असल में नहीं।”
“फिर किस की है?”
कर्कटी बोलीं – “बेटी, तुम्हारी भूख तुम्हारे भीतर के एक खाली की है।”
“खाली?”
“हाँ।”
स्त्री बोली – “माँ, मुझे यह बात समझ नहीं बैठती।”
“बेटी, यह समय के साथ बैठेगी। पहले एक काम करो।”
“क्या?”
“बेटी, अगली बार जब तुम्हें भूख लगे, तो एक पल को रुको। फिर अपने भीतर देखो। क्या तुम्हारी देह को भूख है, या तुम्हारे भीतर कोई और चीज़ खाली है?”
स्त्री बोली – “मैं कोशिश करूँगी।”
“बेटी, और एक बात।”
“क्या?”
“अगर इस कोशिश में तुम्हें मेरी ज़रूरत हो, तो आ जाना। मैं यहाँ हूँ।”
स्त्री ने प्रणाम किया और चली गई।
कुछ हफ़्तों बाद वो लौटी।
“माँ, मैंने कोशिश की।”
“क्या मिला?”
स्त्री कुछ देर ठहरकर बोली – “माँ, मुझे एक बात मालूम हुई।”
“बोलो।”
“माँ, मेरे भीतर एक खाली है, बहुत बड़ी, बहुत बरस की।
“मेरी माँ बहुत पहले गईं, मेरे पिता बहुत पहले गए, मेरा एक बच्चा एक बीमारी से गया।
“ये सब मेरे भीतर एक खाली बनाते हैं।
“और मैं खाने से उस खाली को भरने की कोशिश करती हूँ।
“पर भोजन उस खाली को भर नहीं सकता।”
कर्कटी बोलीं – “बेटी, तुमने जान लिया।”
“माँ, अब क्या करूँ?”
कर्कटी बोलीं – “बेटी, इस खाली को छुओ।”
“छुऊँ?”
“हाँ। बैठो उस खाली के साथ। उसे भगाओ मत, उसे भरने की कोशिश मत करो, बस उसके साथ बैठो।”
स्त्री बोली – “माँ, यह कठिन है।”
“बहुत।”
“पर मैं करूँगी।”
स्त्री बहुत बार आई, बहुत महीनों तक।
एक दिन वो आई, उसका देह अब साधारण था और खाने पर नियन्त्रण।
“माँ, मुझे मिल गया।”
“क्या?”
“मेरी खाली अब छोटी है।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैंने उसके साथ बैठना सीखा। और बैठते-बैठते उसमें कुछ बढ़ने लगा।”
“क्या बढ़ा?”
स्त्री बोली – “माँ, मुझे पता नहीं, पर कुछ बढ़ा। शायद वही स्थिर सी चेतना जो आपने बताई थी।”
कर्कटी बोलीं – “बेटी, यही है। यह बढ़ती जाएगी।”
स्त्री ने प्रणाम किया – “माँ, धन्यवाद।”
“बेटी, धन्यवाद की क्या ज़रूरत। तुमने ख़ुद किया।”
और स्त्री चली गई।
कर्कटी को बहुत बरस पहले की अपनी कथा याद आई। बहुत समान थी।
योगिनी
बहुत बरस बीत गए।
कर्कटी ने वहाँ अपने लिए एक स्थान बना लिया। उन्होंने स्वाभाविक मृत्यु से मरे जीवों को खाया, कन्द खाए, पेड़ों के फल खाए।

उनका देह अब भी बड़ा था, उनकी आँखें अब भी पीली थीं, पर उनके भीतर कुछ ऐसी शान्ति थी कि जंगल के जानवर उनसे डरते नहीं थे। हिरण उनके पास आकर पानी पी जाते, पंछी उनके बालों पर बैठ जाते।
राजा और मन्त्री बीच-बीच में आते। तीनों बैठते, पुराने प्रश्न पूछे जाते, नए जवाब आते, फिर वो लौट जाते।
एक दिन कर्कटी ने मन्त्री से पूछा – “मन्त्री, मेरा यह नया जीवन क्या है? यह तपस्या है? यह योग है? इसका कोई नाम है?”
मन्त्री बोले – “माँ, इसका नाम योगिनी का जीवन है। आप अब योगिनी हो चुकी हैं।”
कर्कटी कुछ देर चुप रहीं, फिर बोलीं – “मन्त्री, एक बात।”
“बोलिए।”
“मेरे लिए सबसे कठिन क्या रहा?”
मन्त्री बोले – “माँ, आप ही बताइए।”
कर्कटी ने एक गहरी साँस ली – “मन्त्री, सबसे कठिन था उस बूढ़ी का चेहरा भूलना।”
“कौन सी बूढ़ी?”
“जिसे मैंने एक रात एक नगर में खाया था। उसके पास उसका बच्चा सो रहा था।
“बूढ़ी ने आख़िरी क्षण में बच्चे की पीठ पर हाथ रखा था, फिर वो चली गई।
“वो पल मेरे भीतर बहुत बरस तक रहा।”
मन्त्री बोले – “माँ, यह आपने पहले नहीं बताया।”
“नहीं। यह बहुत भीतर की बात है।”
राजा ने धीरे से कहा – “माँ, क्या आपने बूढ़ी से मन में क्षमा माँगी?”
कर्कटी बोलीं – “हाँ।”
“और बूढ़ी ने सुना?”
“शायद। मुझे ऐसा लगा।”
मन्त्री ने कुछ देर सोचकर कहा – “माँ, यह बात इससे भी बड़ी है।”
“क्या?”
“माँ, यह बात कि एक राक्षसी ने अपने भीतर करुणा ढूँढी, और एक पुरानी पीड़ा को क्षमा से सम्बोधित किया।
“यह बहुत बड़ी बात है।”
कर्कटी बोलीं – “मन्त्री, हो सकता है।”
अन्तिम वर्ष
कर्कटी बोलीं – “पर मैं तो राक्षसी थी।”
“माँ, राक्षसी हो सकती हैं, पर अगर भीतर का प्रकाश पहचान लें, तो वो प्रकाश आपकी देह को नहीं पूछता। प्रकाश को राक्षसी या ब्राह्मण से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। उसे बस उस आँख से फ़र्क़ पड़ता है जो उसे पहचाने।”
कर्कटी ने धीरे से सिर हिलाया।
एक रात कर्कटी एक नदी के किनारे बैठी थीं। उन्हें वो बूढ़ी फिर याद आई, उसका बच्चा, और बच्चे की पीठ पर बूढ़ी का हाथ।
कर्कटी ने अब रोने की कोशिश की, और इस बार वो रोईं, बहुत देर तक।
जब वो रुकीं, तो उन्हें भीतर एक हलकापन महसूस हुआ। उन्होंने अपने भीतर कहा – “बूढ़ी, मुझे क्षमा करिए।” कोई जवाब नहीं आया, पर कर्कटी को लगा कि बूढ़ी ने सुन लिया।
बहुत बरस वो वैसे ही रहीं। एक दिन उनका देह बहुत हलका हो चुका था, लगभग पारदर्शी सा, और हवा में मिलने लगा था।
राजा अब बूढ़े हो चुके थे, मन्त्री भी, पर वो अब भी आते थे। एक दिन वो आए, और कर्कटी अब नहीं थीं। बस उनकी जगह पर एक हलकी हवा थी, एक हलकी सुगन्ध।
राजा ने मन्त्री से कहा – “माँ चली गईं?”
“शायद।”
“पर मुझे लगता है वो अब भी यहीं हैं।”
मन्त्री बोले – “शायद।”
दोनों देर तक बैठे रहे, फिर लौट गए।
लौटते समय राजा रुककर बोले – “मन्त्री, मुझे एक बात बतानी है।”
“बोलिए।”
“मन्त्री, हमने माँ से बहुत कुछ सीखा, पर एक बात मैं अब कह सकता हूँ।”
“क्या?”
“माँ ने हम से भी कुछ सीखा।”
मन्त्री बोले – “महाराज, यह बात तो माँ ने ख़ुद कही थी, कि हम तीनों एक हैं।”
“हाँ। पर इस बात का अर्थ अब मुझे समझ आ रहा है।”
राजा ने एक पल को आसमान देखा – “मन्त्री, हर सच्चा गुरु अपने शिष्य से भी सीखता है। यह नियम है।”
मन्त्री ने सिर हिलाया।
दोनों ने राज्य में लौटकर एक नया नियम बनाया, कि राज्य में कोई भी राक्षस-वर्ग का व्यक्ति, अगर वो धर्म का पालन करे, तो उसे पूरे अधिकार मिलें।
यह नियम बहुत बरस तक चला, और राक्षस-वर्ग के बहुत से लोग सम्मानजनक जीवन जीने लगे।
राजा और मन्त्री बहुत बरस बाद चले गए, पर उनका नियम बना रहा।
बहुत पीढ़ियों बाद, एक छोटी सी पाठशाला में, एक ऋषि ने इस कथा को सुनाया। बच्चों ने सुना, और एक बच्चे ने पूछा – “गुरुदेव, क्या यह सच में हुआ था?”
ऋषि बोले – “बेटा, असली प्रश्न यह नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या तुम्हारे भीतर एक कर्कटी है।”
“मुझ में?”
“हाँ। हर एक में। बस उसका रूप अलग है।”
बच्चा रात भर इस पर सोचता रहा।
सुबह जब वो जागा, उसकी आँखों में कुछ अलग था। उसकी माँ ने ध्यान दिया।
“बेटा, क्या हुआ?”
“माँ, कुछ नहीं। पर मुझे एक बात समझ आ रही है।”
“क्या?”
“माँ, मेरे भीतर एक भूख है, यह भोजन की नहीं।”
माँ ने ठहरकर पूछा – “बेटा, यह कौन सी भूख?”
“पता नहीं। पर मैंने अब उसे देखना सीख लिया है।”
माँ हँसी – “बेटा, तू बहुत छोटा है, और यह बात समझ रहा है।”
“माँ, ऋषि ने कहा था, हर एक में एक कर्कटी है।”
माँ ने देर तक सिर हिलाया।
कथा यूँ ही चलती गई।
राम ने पानी की ओर देखकर कहा – “गुरुदेव, मेरे भीतर भी?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हर एक के भीतर। तुम भी जान चुके हो।”
राम बहुत देर तक चुप रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, तो जो भूख मेरे भीतर है, वो…”

“वो अपने आप में बुरी नहीं है। वो एक प्रश्न है, और उसका जवाब बाहर से नहीं आएगा। चाहे तुम कितना भी खा लो, चाहे कितना भी पा लो, वो भूख रहेगी, क्योंकि वो भूख तुम्हारे भीतर के उस प्रकाश की है जो तुमसे पूछ रहा है, मुझे पहचानो। जिस दिन तुम उसे पहचानोगे, उस दिन भूख रहेगी पर तुम्हें परेशान नहीं करेगी। तुम भोजन करोगे, पर भोजन तुम्हें नहीं चलाएगा।”
राम ने पूछा – “और कर्कटी का आगे क्या हुआ?”
“वो अब भी उसी पहाड़ पर हैं, पर अब उन्हें कोई नहीं देख पाता। उनका देह बहुत हलका हो गया है, हवा जैसा। तुम किसी पहाड़ पर जाओ, और अगर हवा में कुछ हलका सा कम्पन हो, तो शायद वो कर्कटी हों।”
राम ने पहाड़ों की दिशा में देखा। बादल अब और गहरे हो चुके थे, और बारिश की एक छींट पानी पर गिरी।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 3.68-83 पर आधारित है। कर्कटी का विशूचिका और सूची रूप धारण करना, और फिर उसी देह को त्यागकर अपनी मूल पहचान की खोज में लौटना, इच्छा से प्रश्न की ओर यात्रा का प्रतीक है। राजा और मन्त्री के संवाद में जो दार्शनिक प्रश्नोत्तर हैं, वो उपनिषदीय शैली के निकट हैं। स्वामी वेंकटेशानन्द के अनुवाद में इस कथा का विस्तृत वर्णन है। कर्कटी की कथा शास्त्र की उन कथाओं में से है जो बताती हैं कि ज्ञान का जन्म-कुल से कोई सम्बन्ध नहीं।
दर्शन-दृष्टि
कर्कटी एक राक्षसी है जिसकी भूख अपार है। वो तप करके सूचि-रूप लेती है, मनुष्यों के भीतर घुसकर उन्हें बीमारी से मारती है, पेट भरती है। पर पेट भरता नहीं। तब वो दूसरा तप करती है, अपने मूल रूप में लौटती है, और एक राजा और मन्त्री से प्रश्न पूछकर, उनके उत्तरों से अपने भीतर के रिक्त को पहचानती है। कथा यह कहती है कि भूख का इलाज भोजन नहीं, जिज्ञासा है। आहार से पेट भरता है, प्रश्न से चेतना भरती है।
आधुनिक मनोविज्ञान में सिग्मण्ड फ़्रॉयड (Sigmund Freud, 1856-1939) ने अपनी Beyond the Pleasure Principle (1920) में दिखाया कि कुछ मानसिक भूखें अपने विषय से कभी सन्तुष्ट नहीं होतीं, वो दोहराव में फँसी रहती हैं। कर्कटी की भूख यही है, बार-बार एक ही चक्र। मुक्ति तब आती है जब वो भूख के विषय को नहीं, भूख के मूल को पकड़ती है। फ़्रॉयड के पास इसका हल नहीं था, कर्कटी की कथा के पास है।