कथा · 3
कर्कटी: भूख से आत्मविचार और मङ्गला देवी तक
हिमालय की एक विकराल राक्षसी अपनी भूख मिटाने के लिए पहले रोग और सुई बनती है, फिर उसी चुनाव की संकीर्णता से व्याकुल होकर तप और आत्मविचार की ओर लौटती है। किरात-राजा विक्रम और उनके मंत्री के साथ उसका रात्रिकालीन संवाद बहत्तर प्रश्नों में फैलता है। यह कथा देह, वासना, विवेक और चैतन्य की कठिन गाँठों को पूरे विस्तार से खोलती है।
काजल के पर्वत-सी भूख
वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा कि हिमालय के उत्तर की ओर एक राक्षसी रहती थी। उसका नाम कर्कटी था और उसके दो दूसरे नाम भी प्रचलित थे, विसूचिका और अन्यायबाधिका। वह इतनी काली थी कि दूर से काजल का पर्वत जान पड़ती। नीले मेघ उसके वस्त्र जैसे लगते, केश अन्धकार की परतों की तरह ऊपर उठे रहते और अग्नि के समान चमकती आँखें उसके विशाल मुख को और भयानक बना देतीं। उसके अंगों का फैलाव पृथ्वी और आकाश के बीच की जगह को भरता हुआ दिखाई देता था। उस विराट आकार के भीतर भूख उससे भी बड़ी थी। जितना मिलता, उससे जठराग्नि का वेग कुछ देर के लिए भी शान्त नहीं होता।
उसने एक दिन सोचा कि यदि जम्बूद्वीप के सभी प्राणियों को लगातार निगल लिया जाए, तभी शायद यह भूख थमे। इच्छा उठते ही उसे अपनी सीमा भी समझ में आ गई। संसार के सभी लोग असहाय नहीं थे। कितने ही मनुष्य मन्त्र, औषधि, तप, दान, देवपूजा, सदाचार और अपने अर्जित पुण्य से सुरक्षित थे। किसी एक हिंसक झपट्टे में सबको वश में करना सम्भव न था। कर्कटी ने इस बाधा को अपनी इच्छा की अशुद्धि समझकर नहीं छोड़ा। उसने पहले यह निश्चय किया कि तप से ऐसी शक्ति माँगी जाए जो रक्षा के इन घेरों के भीतर भी पहुँच सके।
यहाँ कथा कर्कटी की भूख को साधारण शारीरिक आवश्यकता की तरह प्रस्तुत नहीं करती। वह लालसा इतनी फैल चुकी है कि पूरा द्वीप भी उसके लिए सम्भावित आहार बन जाता है। फिर भी उसी मन में गणना चल रही है। वह प्रतिरोध को पहचानती है, उपाय खोजती है और अपने संकल्प को तप का रूप देती है। तप की शक्ति अपने आप किसी इच्छा को सात्त्विक नहीं बना देती। मन जिस दिशा में दृढ़ होता है, तप उसी दिशा की क्षमता बढ़ा सकता है। कर्कटी के पहले निर्णय में यही संकट सामने आता है।
वह हिमालय के ऐसे शिखर पर पहुँची जहाँ साधारण प्राणियों का जाना कठिन था। स्नान करके एक पैर पर खड़ी हो गई। दिन, पक्ष, मास और ऋतुएँ बीतती रहीं। हिम की शीतलता, सूर्य की तपिश और धूल भरी हवा ने उसके शरीर को सुखाया, फिर भी उसका आसन नहीं बदला। स्थिर आँखें बिजली की दो रेखाओं जैसी थीं और ऊपर उठे केशों के साथ उसका काला शरीर मानो आकाश को निगलने के लिए ही खड़ा हो। इस प्रकार एक हजार वर्ष बीते। तब ब्रह्मा उसके सामने प्रकट हुए।

दो सूचियों का वर
ब्रह्मा ने कहा कि उसकी कठिन तपस्या पूर्ण हुई है और वह अपना वर माँग सकती है। कर्कटी ने मन ही मन अपनी भूख के लिए सबसे कारगर रूप चुना। उसने निवेदन किया कि वह एक साथ रोगरूप जीवित सूचिका और लोहे की सूचिका हो जाए। सुगन्ध जैसे साँस के साथ भीतर चली जाती है, वैसे ही वह प्राणियों के शरीर में प्रवेश करना चाहती थी। उसकी कल्पना थी कि सूक्ष्म होकर हृदय तक पहुँच सकेगी और जिन असंख्य जीवों तक विशाल देह नहीं पहुँच पाती, उन्हें भीतर से ग्रस लेगी।
ब्रह्मा ने वर दे दिया, पर उसके साथ मर्यादा भी रखी। कर्कटी विसूचिका बनकर उन लोगों को पीड़ा पहुँचा सकेगी जिनका आहार और विहार असंगत है, जिनका आचरण मर्यादाहीन है या जो दूषित स्थानों में रहते हैं। यह प्राचीन रोग-दृष्टि नैतिक और शारीरिक विकार को एक साथ देखती है, इसलिए इसे वर्तमान चिकित्सा का विधान समझना उचित नहीं। सदाचारियों और उपचार के योग्य लोगों की रक्षा के लिए ब्रह्मा ने एक मन्त्र तथा उससे जुड़ी शुद्धि, ध्यान और मार्जन की विधि बताई। उपचार करने वाला साधक एकाग्र होकर रोगी को चन्द्रमा की शीतल, अमृतमयी ज्योति में स्थित देखता और रोगशक्ति को हिमालय लौट जाने की आज्ञा देता।

कर्कटी का दूसरा नाम अन्यायबाधिका इसी मर्यादा से अर्थ पाता है। वह अन्यायपूर्ण मार्ग पर चलने वाले को बाधित करने वाली शक्ति कही गई। फिर भी कथा उसके हिंसक संकल्प को किसी सरल न्याय में नहीं बदलती। वर माँगने वाली चेतना अभी भूख और हानि की वासना से भरी है। ब्रह्मा की सीमा उस वासना पर लगाई गई बाहरी रोक है। भीतर का परिवर्तन बहुत बाद में, कर्कटी के अपने अनुभव और विचार से आएगा।
वर के प्रभाव से उसका पर्वताकार शरीर सिकुड़ने लगा। पहले वह मेघ जितनी हुई, फिर वृक्ष की शाखा जितनी। उसके बाद मनुष्य के आकार में आई, एक हाथ भर रह गई, फिर एक बित्ता, एक अँगुल और उड़द की फली के बराबर। अन्त में वह रेशमी वस्त्र सीने योग्य महीन सुई हो गई। विशाल मुख, लम्बी भुजाएँ और बादलों को छूती देह एक ऐसे नुकीले रूप में समा गई जिसे देखने के लिए आँखें सिकोड़नी पड़ें।

इस सूक्ष्म अस्तित्व के दो पहलू थे। लौहसूची दिखाई पड़ सकती थी, हाथ में पकड़ी जा सकती थी और कपड़े के तन्तु भेद सकती थी। जीवसूची अलक्षित थी। वह वायु और प्राण के मार्ग से चलती, देह में प्रवेश करती और रोग की शक्ति बनती। दोनों एक-दूसरे का आश्रय थीं। भौतिक सुई कभी किसी गृहस्थ के हाथ में रहती, कभी धूल में गिरती और कभी वस्त्र या दीवार की दरार में खो जाती। जीवसूची साँस, नाड़ी और हृदय के रास्तों में घूमती। इस प्रकार कर्कटी ने बाहरी विशालता के बदले पहुँच की सूक्ष्मता पा ली।
वह दूषित जल, अस्वच्छ वस्त्र, धूल, क्षीण देह, अव्यवस्थित आहार और रोगग्रस्त स्थानों में अपना अवसर खोजती। किसी शरीर में व्याधि बनती, किसी मन में दुर्बुद्धि के रूप में ठहरती और कहीं मन्त्र, औषधि, तप या पुण्य उपाय से बाहर कर दी जाती। रोग के मार्ग और सुई के व्यवहार एक ही रूपक में जुड़ गए। सूक्ष्म हानि कितने साधारण द्वारों से भीतर आ सकती है, यह कर्कटी के हर प्रवेश में दिखाई देता था। लोहे की सुई का अपना जीवन भी पराधीन था। कोई उसे कपड़ा सीने में लगाता, कोई धुएँ से भरे कोने में छोड़ देता, कोई मार्ग में गिरा देता।
कर्कटी को आरम्भ में अपनी चतुराई पर गर्व था। उसे लगता कि विशाल देह जिन दरवाज़ों से नहीं जा सकती थी, वहाँ उसका यह रूप आसानी से पहुँच रहा है। कुछ रक्त-बिन्दु मिल जाते, किसी वेधन से शरीर पीड़ित होता और उसकी पुरानी हिंसक वृत्ति को क्षणिक तुष्टि मिलती। शीघ्र ही वर की विडम्बना सामने आई। संसार को खाने चली कर्कटी के पास अब पेट ही नहीं था। एक बूँद से अधिक उसमें समाता नहीं, और तृप्ति की जिस व्यापकता की उसने कल्पना की थी उसका साधन स्वयं अत्यन्त संकीर्ण हो गया था।
सूक्ष्म देह का पश्चात्ताप
बहुत समय तक घूमने के बाद कर्कटी ने अपने चुनाव पर विचार किया। वह कहती है कि उसका आकार इतना छोटा है कि एक ग्रास भी नहीं समा सकता। कभी कीचड़ में धँस जाती है, कभी पैरों और खुरों के नीचे दबती है, कभी जंग खाती है और कभी किसी दूसरे की इच्छा पर चलती है। न अपना ठिकाना है, न स्वतन्त्र गति। जिस शरीर से वह दिशाओं को ढँक सकती थी, उसे उसने अपने ही संकल्प से खो दिया। जिस भूख के लिए सूचिका बनी, उस भूख का भोग करने योग्य जिह्वा और उदर भी शेष नहीं रहे।
पश्चात्ताप में वह अपने पुराने शरीर को स्मरण करती है। मेघों जैसी भुजाएँ, पर्वतों पर पड़ते चरण, गर्त जैसा मुख और आकाश छूती आकृति अब उसे अनमोल जान पड़ते हैं। उस स्मृति में पुरानी हिंसक रुचि भी बची हुई थी। वह फिर बड़े ग्रास, रक्त और निद्रा की कल्पना करती है। फिर भी पहली बार उसे स्पष्ट दिखता है कि अविवेक से लिया गया वर अपनी सफलता में भी विफल हो सकता है। इच्छा पूरी होने के बावजूद उसका प्रयोजन अधूरा रहा।
उसने अपने दुख का कारण बाहरी परिस्थिति को भर नहीं माना। स्वीकार किया कि यह नाटक उसने स्वयं रचा है। मन पहले किसी संकीर्ण धारणा को बुद्धिमानी समझता है, फिर उसी से अनर्थ की पूरी परम्परा फैल जाती है। विशाल अस्तित्व छोड़कर मिली पहुँच की कीमत अनुभव की क्षमता थी। यह पहचान दूसरी तपस्या का आरम्भ बनी। इस बार उसने लोगों को मारने की योजना मन से अलग की और पूर्व देह पाने के लिए उसी हिमालय की ओर चल पड़ी।
जीवसूची ने एक गीध के शरीर में प्राण के मार्ग से प्रवेश किया और उसे उस निर्जन शिखर तक ले गई। वहाँ गीध ने लौहसूची को भूमि पर रख दिया। जीवसूची लौहसूची में टिक गई और कर्कटी नुकीले अग्रभाग पर सीधी खड़ी हो गई। सूक्ष्म देह में एक पैर पर खड़े होने का अर्थ भी संकल्प से बनाया गया था। उसने दृष्टि को विषयों से हटाया, मुख ऊपर रखा और अन्न के छोटे से छोटे कण को भी ग्रहण करने से इनकार कर दिया।
सात हजार वर्ष का दूसरा तप
पर्वत का वह प्रदेश वनस्पति और जीवों से लगभग रिक्त था। धूप सीधी पड़ती, धूल का आवरण उठता और हवा तीखी चलती। सूर्य की पतली किरण उसके छिद्र से निकलती तो दूसरी सुई जैसी लगती; पीछे पड़ती छाया तीसरी सुई का आकार बनाती। वृक्ष और लताएँ सुगन्धित वायु तथा पराग उसके पास लाते, लेकिन उसने कुछ नहीं लिया। इन्द्र के भेजे मांसकण तक उसके मुख में आए और लौट गए। वर्षा ने उसे ढँका, आँधी ने उड़ाने की कोशिश की, वनाग्नि ने तपाया, ओलों और बिजली ने आघात किया। उसकी एकाग्रता बनी रही।
यह दूसरा तप सात हजार वर्ष चला। उसकी उष्णता से लोक व्याकुल होने लगे। इन्द्र ने नारद से पूछा कि यह तीव्र तप किसका है। नारद ने कर्कटी की सूचिका बनने से लेकर पश्चात्ताप और हिमालय लौटने तक की कथा सुनाई। इन्द्र ने वायु को जाँचने भेजा। वायु ने द्वीपों, समुद्रों और पर्वतों के ऊपर से खोजते हुए अन्ततः हिमालय के उत्तरी शिखर पर उस अत्यन्त छोटी तपस्विनी को देखा। रूप सुई भर था, पर तप का प्रभाव सारे जगत तक पहुँच रहा था। वायु उसे प्रणाम करके लौटा और ब्रह्मा से उसके विषय में निवेदन किया गया।
लम्बी एकाग्रता के बीच कर्कटी ने अपने स्वरूप का विचार किया। बाहरी व्यापार थमने पर उसने पूछा कि सूचिका, राक्षसी, भूख और स्मृति का अनुभव किसमें उठता है। देह लगातार बदली थी, लेकिन प्रत्येक रूप को जानने वाली संवेदना बनी रही। इस विचार से उसका मन निर्मल हुआ और आत्मबोध उदित हुआ। अब पूर्व देह की प्राप्ति भी उसके लिए अनिवार्य सुख नहीं थी। वह अपने भीतर पूर्णता और शान्ति का अनुभव करने लगी।
बोध होने के एक हजार वर्ष बाद ब्रह्मा फिर आए। उन्होंने वर माँगने को कहा। कर्कटी चुप रही। सूचिका की कर्मेन्द्रियाँ नहीं थीं, पर उसके मौन का गहरा कारण था। मन में उसने कहा कि सन्देह कट चुके हैं, जो जानना था वह जान लिया है और अब किसी वस्तु की अपेक्षा नहीं। अपने संकल्प से उठे अविवेक को आत्मविचार ने शान्त कर दिया था। इष्ट और अनिष्ट दोनों का आग्रह ढीला पड़ चुका था।
ब्रह्मा ने उत्तर दिया कि नियति के शेष संस्कार अभी कुछ देहगत अनुभव चाहते हैं। उनके अनुसार कर्कटी फिर स्थूल शरीर धारण करेगी, कुछ समय जगत में रहेगी और विवेक के साथ व्यवहार करेगी। उसका लौटना शेष संस्कारों के भोग और विवेकपूर्ण व्यवहार के लिए था। अब वह जीवन्मुक्त भाव में रहकर न्याय का विचार करेगी और मनमाने ढंग से किसी को पीड़ा नहीं देगी। कर्कटी ने यह विधान स्वीकार किया। उसने मन में पुराने शरीर का स्मरण किया और रूप फिर फैलने लगा।
पहले वह एक बित्ता हुई, फिर एक हाथ, उसके बाद शाखा और मेघ के आकार तक बढ़ी। शीघ्र ही पुराने पर्वताकार अंग लौट आए। इन्द्रियाँ और क्रियाशक्तियाँ भी संकल्प के साथ प्रकट हुईं। विशाल देह पाकर उसने तुरन्त आहार नहीं खोजा। हिमालय के शिखर पर पद्मासन लगाकर आत्मध्यान में बैठ गई। छः मास बाद समाधि से उठी तो शरीर की भूख फिर उपस्थित थी। ज्ञान ने देहधर्म मिटाया नहीं था, पर उसके प्रति कर्कटी का सम्बन्ध बदल चुका था।

उसने विचार किया कि अन्याय से प्राप्त भोजन विष के समान है। यदि उचित आहार न मिले तो देह चली जाए, इससे उसके आत्मस्वरूप की न वृद्धि होगी, न हानि। उसी समय वायु की वाणी सुनाई दी। वायु ने कहा कि वह अज्ञानियों के पास जाए, उन्हें ज्ञान से जगाने का प्रयत्न करे और गुणी मनुष्यों की रक्षा करे। जो समझाने पर भी अपने विनाशकारी आचरण से न हटे, उसके साथ उस युग की न्याय-कल्पना के अनुसार व्यवहार करे। कर्कटी ने इस निर्देश को स्वीकार किया और हिमालय से नीचे किरातों के प्रदेश की ओर चली।
अँधेरी रात में विक्रम
किरात-देश सम्पन्न था। वहाँ अन्न, पशु, कन्द-मूल, औषधियाँ, वन्य जीव और जल पर्याप्त था। जब कर्कटी वहाँ पहुँची, रात बहुत घनी थी। आकाश में तारों की थोड़ी ज्योति थी, पर वन और पर्वत पर अन्धकार की परतें जमी थीं। कहीं घरों के झरोखों से दीपक की पतली रेखाएँ बाहर आतीं, कहीं दूर वनाग्नि चमकती। गाँवों के बाहर चोरों से घिरे लोगों की आवाज़ें सुनाई देतीं और जंगल में हिंसक पशु घूम रहे थे।
उसी रात किरातों के राजा विक्रम अपने मंत्री के साथ नगर से बाहर निकले थे। दोनों ने हथियार धारण किए थे और दस्युओं तथा दूसरे अपराधियों की खोज में रात्रिचर्या कर रहे थे। राजा का विचार था कि शासन का दायित्व महल में बैठकर पूरा नहीं होता। जिस समय प्रजा सो रही हो, उस समय भी उसके मार्ग, सीमा और बस्तियों की रक्षा देखनी चाहिए। उनके राज्य में विसूचिका और हृदयशूल का प्रकोप भी था, इसलिए रात की यह यात्रा सुरक्षा और रोग, दोनों से जुड़ी चिन्ता के बीच हो रही थी।
कर्कटी ने उन्हें देखा तो पहले आहार समझा। फिर उसे ध्यान आया कि गुणवान मनुष्य को हानि पहुँचाना उसके बदले हुए विवेक के अनुकूल नहीं। उसने तय किया कि पहले परीक्षा ली जाए। यदि दोनों ज्ञान और धैर्य से रिक्त हुए तो वह अपने लिए उन्हें योग्य ग्रास मानेगी; यदि गुणी निकले तो उनकी रक्षा करेगी। यह निर्णय भी अपने समय की कठोर धारणाओं में कहा गया है, फिर भी पुरानी कर्कटी की तुलना में एक स्पष्ट अन्तर दिखाता है। अब वह भूख उठते ही आक्रमण नहीं करती।
उसने मेघ जैसी गर्जना की और पूछा कि उस घोर वन में निर्भय घूमने वाले ये दो प्राणी कौन हैं। विक्रम ने बिना घबराए कहा कि वह सामने आए, अपना रूप दिखाए और साफ बताए कि उसे क्या चाहिए। धमकी और कोलाहल से कोई काम पूरा नहीं होता। कर्कटी ने अपना विराट शरीर प्रकट किया। काली देह, खड़े केश, पीली आँखें, हड्डियों और भारी उपकरणों के अलंकार, तथा साँस की गूँज से उसका रूप यक्षों और पिशाचों को भी भयभीत कर सकता था। राजा और मंत्री वहीं स्थिर रहे।

मंत्री ने शान्त स्वर में कहा कि समर्थ व्यक्ति तुच्छ प्रयोजन के लिए क्रोध का प्रदर्शन नहीं करता। जिस काम को बातचीत और विचार से पूरा किया जा सकता हो, वहाँ बल का प्रयोग बुद्धिमानी नहीं। उन्होंने उससे अपनी आवश्यकता स्पष्ट कहने को कहा और आश्वासन दिया कि उनके द्वार से याचक को निराश लौटाने की रीति नहीं। कर्कटी को उनके शब्दों में संयम दिखाई दिया। उसने समझा कि मृत्यु सामने देखकर भी ऐसी स्थिरता सामान्य प्रशिक्षण से नहीं आती।
मंत्री ने अपना परिचय दिया और बताया कि उनके साथ खड़े पुरुष किरात-राजा हैं। वे राज्य को हानि पहुँचाने वाले लोगों को रोकने के लिए रात में निकले हैं। कर्कटी ने कहा कि राजा और मंत्री की योग्यता एक-दूसरे से जुड़ी है। विवेकहीन मंत्री राजा को पतन की ओर ले जाता है और विवेकहीन राजा प्रजा की दशा बिगाड़ता है। उसके मत में अध्यात्मज्ञान सभी गुणों में प्रधान है, क्योंकि अपने मन को न समझने वाला व्यक्ति शक्ति और दण्ड का सन्तुलित उपयोग कैसे करेगा। उसने इसी कसौटी पर दोनों की परीक्षा लेने का निश्चय सुनाया।
बहत्तर प्रश्नों का वन
कर्कटी के प्रश्न बहत्तर की एक लम्बी, परस्पर जुड़ी शृंखला थे। उसने पूछा कि वह एक कौन है जिसके भीतर असंख्य ब्रह्माण्ड समुद्र के बुलबुलों की तरह उठते और लीन होते हैं। कौन आकाश जैसा शून्य भी है और अशून्य भी। कौन चलता हुआ नहीं चलता, ठहरा हुआ नहीं ठहरता, चेतन होकर भी पत्थर में अचेतन-सा दिखाई देता है और परम आकाश में जगत का विचित्र चित्र बनाता है।
उसने प्रकाश पर प्रश्न किए। सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि और तारों को प्रकाशित करने वाला अविनाशी प्रकाश कौन है। आँखों से न दिखने वाली लता, अंकुर और वृक्ष को किसकी उपस्थिति बढ़ाती है। आकाश और काल को सत्ता कौन देता है। जगत किस रत्न की पिटारी है और वह कौन-सा रत्न है जिसमें यह पूरा जगत रखा हुआ जान पड़ता है। वह कौन-सा सूक्ष्म अणु है जो अज्ञान में अन्धकार और ज्ञान में प्रकाश बनता है, इन्द्रियों के लिए दूर और अपने अनुभव में सबसे निकट रहता है।
प्रश्नों का अगला क्रम माप और अवधि को उलटता है। किस अणु के भीतर मेरु जैसे पर्वत हैं। कौन बाल के अग्रभाग से भी सूक्ष्म होकर अनन्त प्रदेश में व्याप्त है। कौन-सा निमेष कल्प बन जाता है और किसके भीतर कल्प एक निमेष की तरह है। किसके दृष्टिपात से जगत का अभिनय चलता है। अवयव रहित होकर भी किसे सैकड़ों हाथ और आँखें कही जा सकती हैं। सृष्टि से पहले बीज, वृक्ष और असंख्य लोक किसमें अप्रकट रहते हैं।
फिर कर्कटी ने अनुभूति की त्रिपुटी पर बात रखी। देखने वाला, देखना और दृश्य किससे प्रकट होते हैं। कौन नेत्र रहित होकर भी अपने को देखता है। ज्ञान उठने पर दृश्य का पृथक भ्रम किसमें शान्त होता है। समुद्र और तरंग, सोना और आभूषण, बीज और वृक्ष जैसे सम्बन्ध किस आधार की ओर संकेत करते हैं। द्वैत उसी से दिखाई देता है तो उससे अलग कैसे है, और अलग नहीं तो इतने रूपों का व्यवहार कैसे चल रहा है।
इन प्रश्नों में धमकी भी थी। कर्कटी ने कहा कि यदि वे सन्देह दूर न कर सके तो वह उन्हें और फिर उनके जनपद को खा जाएगी। पर उसकी माँग बौद्धिक खेल नहीं थी। सात हजार वर्ष के तप में जिस अनुभव को उसने भीतर पाया था, अब वह देखना चाहती थी कि राजा और मंत्री उसी सत्य को तर्क, अनुभव और भाषा में पहचानते हैं या नहीं। वह ऐसे उत्तर चाहती थी जो शासन के पद पर बैठे व्यक्ति की समझ को भी प्रमाणित करें।
मंत्री ने उत्तर आरम्भ करते हुए पहले प्रश्नों का हृदय बताया। कर्कटी का बार-बार कहा गया अणु नाम और रूप से परे चेतना का संकेत है। आँख, कान, मन या कोई दूसरी इन्द्रिय उसे बाहर रखकर नहीं देख सकती। उसे सूक्ष्म इसलिए कहा जाता है कि वह किसी दृश्य वस्तु की तरह पकड़ी नहीं जाती। वही प्रत्येक अनुभव का आधार है, इसलिए उसका अभाव कहने वाला भी उसी चेतना की उपस्थिति में अपना कथन करता है।
वह एक है क्योंकि चेतना का स्वरूप विभाजित नहीं होता। जीवों में “मैं हूँ” का अनुभव अनेक स्थानों पर दिखाई देता है, इसलिए व्यवहार में वह अनेक भी जान पड़ती है। इन्द्रियों की पहुँच से बाहर होने के कारण दूर है और हर अनुभूति की सबसे निजी सत्ता होने के कारण निकट है। वह सब रूपों में व्याप्त है और किसी सीमित रूप में पूरी तरह बन्द नहीं होती। इसी आशय से वह सब रूपों का आधार और सीमित वस्तुत्व से परे कही गई है।
उसके चलने और न चलने का प्रश्न भी इसी दृष्टि से समझ में आता है। शरीर स्थान बदलता है, मन कल्पना में दूर देश तक जाता है और समय अनुभवों को क्रम देता है। जिस चेतना में स्थान, गति और क्रम जाने जाते हैं, वह अपने से बाहर कहाँ जाएगी। बन्द घड़े को एक जगह से दूसरी जगह ले जाएँ तो उसके भीतर का आकाश अलग यात्री नहीं बनता। इसी प्रकार देह की गति आत्मा की स्वतन्त्र गति सिद्ध नहीं करती।
पत्थर की जड़ता और प्राणी की चेतना भी उसी सत्ता में जानी जाती है। देह अपने भौतिक अंश में जड़ है, पर चेतना के तादात्म्य से “मैं देखता हूँ” और “मैं करता हूँ” का अनुभव उठता है। परम आकाश में जगत का चित्र किसी दूसरी सामग्री से नहीं बनाया गया। चेतना के स्फुरण में ही चित्र, दर्शक और देखने की क्रिया प्रकट होते हैं। इस विवेचन से जगत के व्यवहार का आश्रय स्पष्ट होता है।
मंत्री ने कहा कि सूर्य और दीपक दृश्य वस्तुओं को उजागर करते हैं, पर उनके प्रकाश को जानने वाला अनुभव उनसे भी पहले है। गहरे अन्धकार में कोई पूछे कि आप कहाँ हैं, तो मनुष्य कह सकता है, “मैं यहाँ हूँ।” उस समय किसी बाहरी दीपक ने आत्मस्थिति नहीं दिखाई। यही आन्तरिक प्रकाश लता की वृद्धि, इन्द्रियविहीन जीवन और आँख वाले प्राणी के दृश्य, सबका साक्षी है। समय, आकाश, क्रिया, कर्ता और भोग की सत्ता भी उसी ज्ञान में स्वीकार की जाती है।
एक निमेष में कल्प का अनुभव असम्भव नहीं। स्वप्न में बहुत लम्बी यात्रा छोटी निद्रा में घटती है, दुख में थोड़ी अवधि भारी लगती है और सुख में लम्बा समय शीघ्र बीत जाता है। निर्मल दर्पण में विशाल नगर का पूरा दृश्य छोटे तल पर आ सकता है। चेतना को बाहरी माप से बाँधने पर विरोध दिखाई देता है; अनुभव के आधार की ओर देखने पर सूक्ष्म में विराट और क्षण में काल का विस्तार समझ में आता है।
मंत्री ने अपने उत्तर को अद्वितीय, शान्त और जन्मरहित ब्रह्म पर समाप्त किया। समुद्र की तरंग जल का ही एक व्यवहार है। उसी तरह जगत के रूप, नाम और क्रियाएँ चेतना पर आश्रित हैं। माया और उसके मल हटने पर मन उस आधार को पहचानता है जो भेद के प्रत्येक अनुभव में उपस्थित था।
कर्कटी ने मंत्री की बात ध्यान से सुनी और उसे पवित्र परमार्थ-वाणी कहा। फिर उसने विक्रम से शेष प्रश्नों का उत्तर माँगा। राजा ने उत्तर देते हुए कहा कि जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति में आने वाले अनुभवों की चहल-पहल जिस शान्त आधार में जानी जाती है, प्रश्न उसी ब्रह्म के विषय में हैं। जगत का संकोच और विस्तार चित्त की शक्ति में दिखाई देता है, पर उस आधार की अखण्डता इन परिवर्तनों से टूटती नहीं।
वायु, शब्द और अग्नि की सत्ता को उन्होंने इसी क्रम में समझाया। चेतना में वायु का अनुभव उठता है और चेतना वायु की सीमा से परे रहती है। उच्चरित शब्द और उसका अर्थ उसी के प्रकाश में समझे जाते हैं। अग्नि की ज्वाला, उसका ताप और जलने का ज्ञान भी उसी अनुभूति में उपस्थित होते हैं। सूर्य और तारे महाप्रलय में न रहें, तब भी जिस आत्मप्रभा से प्रकाश और अन्धकार का ज्ञान सम्भव है उसकी चर्चा समाप्त नहीं होती।
विक्रम ने कहा कि आत्मा पहले से अनुभव का आधार है, इसलिए उसे बाहर रखी वस्तु की तरह पाना सम्भव नहीं। ज्ञान का प्रयत्न अज्ञान की पकड़ खोलता है। अज्ञान रहते उपलब्ध आत्मा भी अनुपलब्ध-सी लगती है। जैसे मरुभूमि की चमक को जल मानकर मन अपनी ही दृष्टि को भ्रमित करता है, वैसे ही चेतना देह और दृश्य को अपनी पूरी सीमा मान लेती है। विवेक का काम इसी गलत पहचान को शिथिल करना है।
मेरु को भीतर रखने वाला अणु भी यही चेतना है। संसार का जो रूप चित्त में संस्कार के अनुसार उठता है, वही बाहर व्यवस्थित दिखाई देने लगता है। बालक अन्धेरे में किसी खम्भे को भूत मान ले तो भय, आकृति और प्रतिक्रिया उसके लिए वास्तविक व्यवहार पैदा करते हैं। चित्त की प्रतिभा के भीतर पर्वत, देश और दूरी का पूरा आकार उपस्थित हो सकता है। इसलिए सूक्ष्म चेतना सौ योजन की पृथ्वी को व्याप्त करती है, फिर भी स्वयं किसी सौ योजन की सीमा में नहीं समाती।
राजा ने अणु शब्द की सीमा भी बताई। परब्रह्म को भौतिक परमाणु से तुलना देकर छोटा समझ लेना ठीक नहीं। शास्त्र उसे अणु से भी सूक्ष्म और महान से भी महान कहते हैं, क्योंकि वह देश, काल और वस्तु के परिमाण से परिच्छिन्न नहीं। यहाँ “सूक्ष्म” वस्तु बनाने वाली सभी सीमाओं से परे होने का संकेत है।
द्रष्टा, दर्शन और दृश्य का भेद अनुभव में साफ दिखाई देता है। फिर भी तीनों की सत्ता एक ही ज्ञान पर निर्भर है। सोने से कड़ा, हार और मुकुट बनते हैं। नाम, आकार और उपयोग अलग होते हैं, जबकि प्रत्येक में सोना अलग नहीं हुआ। बीज में वृक्ष की शाखाएँ, पत्ते, फूल और फल अप्रकट ढंग से निहित हैं। चेतना में जगत की सम्भावना इसी प्रकार समझाई गई, हालांकि कोई भी उपमा उस असीम आधार को पूरा नहीं बाँध सकती।
द्वैत और अद्वैत को भी विक्रम ने विचार की अवस्थाएँ माना। दृश्य से मोहित मन विभाजन में फँसता है। फिर उसी विभाजन के प्रतिकार में अद्वैत की धारणा आती है। जब अपने स्वरूप की स्थिर पहचान हो जाती है, दोनों शब्दों का आग्रह शान्त हो सकता है। जल और उसकी तरलता, वायु और उसका स्पन्दन, आकाश और उसकी रिक्तता अलग नहीं किए जा सकते। इसी तरह जगत की प्रतीति अपने अधिष्ठान से बाहर खड़ी नहीं होती।
भूत, वर्तमान और भविष्य के संसार द्रष्टा, दर्शन और दृश्य की संरचना में आते हैं। चेतना में वे बार-बार उठते और लीन होते हैं, जैसे वायु में स्पन्दन आरम्भ होकर उसी में थमता है। दर्पण में पर्वत दिखाई देता है, पर दर्पण के भीतर पत्थर का भार नहीं आ जाता। जगत को चेतना में स्थित कहने का आशय अनुभव योग्य हर वस्तु की ज्ञात सत्ता का उसी चेतना पर आश्रित होना है।
अन्त में विक्रम ने कहा कि अपने यथार्थ स्वरूप का ज्ञान होने पर आने-जाने, पाने-खोने और जीवन-मरण से बँधी सीमित पहचान ढीली पड़ती है। दृश्य व्यवहार चलता रहता है, लेकिन “मैं यही क्षुद्र रूप हूँ” की गाँठ निर्णायक नहीं रहती। उनके उत्तर में शासन और आत्मविचार अलग विषय नहीं रहे। जिस शक्ति से राजा प्रजा पालता और दण्ड देता है, उसी शक्ति के आधार को पहचानना उसके निर्णय को संयम देता है।
शीतल हुई कर्कटी
राजा की बात समाप्त हुई तो कर्कटी के भीतर पुरानी चपलता और ईर्ष्या का शेष वेग भी शान्त हुआ। उसने कहा कि दोनों की बुद्धि ज्ञान के ऐसे सूर्य से प्रकाशित है जो अस्त नहीं होता। उनके शब्द सुनकर उसका मन चाँदनी की तरह शीतल और सम हो गया है। उसने सत्संग का फल अपने सामने अनुभव किया और राजा से पूछा कि वह उनकी कौन-सी शुभ इच्छा पूरी करे।
विक्रम ने अपने राज्य की व्यथा बताई। विसूचिका और हृदयशूल से लोग पीड़ित थे। उन्होंने कर्कटी से रोग की शान्ति का उपाय माँगा और यह वचन भी कि वह किसी साधारण मनुष्य को न मारेगी। कर्कटी ने दोनों बातें स्वीकार कीं। वह राजा और मंत्री को नदी के एकान्त तट पर ले गई। शुद्धि और आचमन के बाद दोनों उसके सामने शिष्य की तरह बैठे। कर्कटी ने ब्रह्मा से मिला उपचार-मन्त्र, उसका जप और प्रयोग क्रम से समझाया। इस प्रसंग में वह भयावह रोगशक्ति से गुरु की भूमिका तक पहुँचती है।
इसके बाद देह की भूख का कठिन प्रश्न बचा। विक्रम ने उसे अपने महल आने का निमन्त्रण दिया और कहा कि वह छोटा, सुन्दर स्त्री-रूप धारण करके वहाँ रह सकती है। कर्कटी ने साफ बताया कि सामान्य अन्न उसकी राक्षसी देह को तृप्त नहीं करेगा। बहुत पुराने शरीर-स्वभाव को इच्छा भर से हटाना उसके लिए सम्भव नहीं। राजा ने तब प्रस्ताव रखा कि राज्य जिन चोरों, बार-बार अपराध करने वालों और दण्डनीय लोगों को उस युग की व्यवस्था में वध योग्य ठहराए, उन्हीं को उसके आहार के लिए दिया जाए।
कर्कटी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और सामान्य लोगों की हत्या न करने का वचन निभाया। राजा ने अपने युग की व्यवस्था के भीतर इसे धर्मसम्मत दण्ड माना। इस समझौते की नैतिक कठिनाई बनी रहती है। वर्तमान न्यायबोध मनुष्य को आहार बनाने की कल्पना स्वीकार नहीं करता। कर्कटी की अनियन्त्रित हिंसा सीमित हुई, मगर राज्य ने अपने कठोरतम दण्ड को उसकी भूख से जोड़ दिया।
राक्षसी ने आभूषणों और रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित युवती का रूप लिया। राजा और मंत्री के पीछे नगर पहुँची और महल में आदर के साथ बैठी। तीनों ने बातचीत में रात बिताई। प्रातः वह अन्तःपुर में रही और राजा राजकार्य में लग गए। यह दृश्य उसके परिवर्तन को एक नए ढंग से सामने रखता है। पिछली रात जो आकृति आकाश और पृथ्वी के बीच खड़ी थी, वही अब अतिथि, सखी और मन्त्र-गुरु की तरह राजमहल में उपस्थित है।
तीन हजार दण्डनीय और समाधि
राजा ने अपने तथा आसपास के नगरों से तीन हजार दण्डनीय लोगों को एकत्र कराया। उनके व्यक्तिगत अपराधों का विवरण नहीं मिलता। कर्कटी ने महल का स्त्री-रूप छोड़ा, विशाल देह धारण की और पूरे समूह को लेकर हिमालय चली गई। वहाँ उसने उन्हें खाया। भोजन के बाद तीन दिन सोई और फिर दीर्घ समाधि में प्रवेश कर गई।
चार या पाँच वर्ष बाद वह समाधि से उठती, किरात-राज्य लौटती और राजा से मिलती। राज्य फिर दण्ड पाए लोगों का समूह देता और वह उसे हिमालय ले जाती। विक्रम तथा कर्कटी की मैत्री इस क्रम में बनी रही। समय आने पर विक्रम ने विदेहमुक्ति पाई। उनके उत्तराधिकारी भी इस सम्बन्ध को निभाते रहे। यह समाधान कठोर था और उसी प्राचीन राजधर्म की सीमा में बँधा रहा।
आगे चलकर किरात-प्रदेश में कर्कटी को कन्दरा देवी और मङ्गला देवी के नाम से प्रतिष्ठा मिली। ऊँचे राजभवन में उसकी प्रतिमा रखी जाती और राजा समय-समय पर उसका नवीकरण कराते। लोग उसके पूजन को रोग और उत्पात की शान्ति, धन-धान्य, संतान और समृद्धि से जोड़ते थे। उसी परम्परा में वध्य लोगों की बलि का उल्लेख भी आता है। यह प्राचीन धार्मिक और राजनीतिक संसार की कठोर स्मृति है, आज के लिए कोई अनुष्ठानिक निर्देश नहीं।
श्रीराम ने अन्त में पूछा कि उसका नाम कर्कटी क्यों पड़ा। वसिष्ठ ने बताया कि कर्कट नामक एक राक्षस से वह उत्पन्न हुई थी। काली और कर्कट के समान आकृति होने के कारण कर्कटी कही गई। विशालता, भूख और राक्षसी वंश उसके साथ रहे, मगर उनके बीच विवेक, वचन और समाधि की नई दिशा जुड़ चुकी थी।
वसिष्ठ को उसके बहत्तर प्रश्न इसलिए स्मरण आए कि वे जगत, मन और चैतन्य के सम्बन्ध को असाधारण तीक्ष्णता से खोलते हैं। पर्वत से सुई और सुई से पर्वत बनने तक हर देह ने कुछ समय के लिए कर्कटी के पूरे जीवन को परिभाषित किया। आत्मविचार ने उस चेतना को प्रकट किया जिसमें आकार, भूख, पश्चात्ताप और ज्ञान सभी जाने गए। उसी पहचान ने उसकी पुरानी शक्ति को संयम और उत्तरदायित्व की ओर मोड़ा।