कच और संजीवनी

कथा · 21

कच और संजीवनी

देवगुरु बृहस्पति ने अपने बेटे कच को पढ़ाते समय एक बात कही, जो कथा से ज़्यादा एक चुप थी। पिता-पुत्र का असली रिश्ता उसी चुप में दर्ज है।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, अगर मैं अपने को नहीं पाता, तो मैं हूँ कौन?”

वसिष्ठ बोले – “राम, कच ने यही गाया था। उनकी कथा सुनो।”

पिता और बेटा

बृहस्पति देवों के गुरु थे, और उनके बेटे का नाम था कच।

कच अभी युवा थे, आँखें तेज़ और आवाज़ मधुर।

Painterly classical-Indian color illustration: the youthful sage Kaca with a topknot sits close beside his father Brihaspati, the white-bearded preceptor of the gods in saffron-and-white robes, in a serene ashram glade; the boy looks expectant, a question held in his eyes, the elder attentive; oil lamps and a flowering tree, warm golden dawn light; dignified, no text, no watermark.

एक दिन वो अपने पिता के पास बैठे थे, और मन में एक बात लिए हुए थे।

कच बोले – “पिता, मुझे एक बात पूछनी है। मुझे लगा था कि मैं हूँ, पर जब मैंने अपने भीतर देखा, तो मुझे मैं नहीं मिला। बस एक खाली था। पर उस खाली में भी कुछ था जो जान रहा था कि खाली है। वो क्या है?”

Painterly classical-Indian color illustration: Brihaspati, the venerable god-preceptor, gazes long and tenderly at his son Kaca, raising one hand in gentle teaching gesture as he names the formless witness behind all things; a soft luminous void glows faintly behind them suggesting the egoless Self, ashram trees and a quiet river beyond; deep indigo and gold palette; dignified, no text, no watermark.

बृहस्पति ने अपने बेटे को देर तक देखा, फिर बोले – “बेटा, जिसकी तुम तलाश में हो, वो सब के पीछे है। पर वो स्वयं किसी का नहीं। उसका कोई अहम् नहीं, उसका कोई मैं नहीं।”

कच बोले – “समझा।”

बृहस्पति बोले – “नहीं, अभी नहीं। पर समझोगे।”

Painterly classical-Indian color illustration: the ascetic Kaca seated cross-legged beneath a great banyan after many years of tapasya, eyes lifted and lips parted as a song rises from within; deer, a peacock and small birds gather around him, leaves drift through luminous air, the inner song suggested by soft radiant light blooming from his heart; rich greens and saffron; dignified, no text, no watermark.

इसके बाद कच ने बहुत बरस तक तपस्या की, और एक दिन उनके भीतर एक गीत उठा।

गीत

कच गाने लगे।

वो जो हर रूप में है,

वही मैं हूँ।

वो जो हर शब्द में है,

वही मैं हूँ।

वो जो हर साँस में है,

वही मैं हूँ।

वो जो हर मौन में है,

वही मैं हूँ।

पर मैं किसी एक रूप में नहीं।

पर मैं किसी एक शब्द में नहीं।

पर मैं किसी एक साँस में नहीं।

पर मैं किसी एक मौन में नहीं।

मैं हर एक के पीछे,

और कहीं नहीं।

मेरा कोई अहम् नहीं।

मेरा कोई मैं नहीं।

पर मैं हूँ।

हाँ, मैं हूँ।

कच का गीत हवा में फैला।

Painterly classical-Indian color illustration: Kaca sits cross-legged in serene meditation beneath a tree as his white-bearded father Brihaspati stands a little behind in the middle distance, listening to the song carried on the wind, his face moved and reverent; a calm river and trees beyond, soft evening light and drifting leaves; tender warm palette; dignified, no text, no watermark.

बृहस्पति ने वो गीत सुना और बोले – “मेरा बेटा अब मेरा गुरु बन गया।”

कच ने आँख खोली तो पिता पास ही खड़े थे।

कच बोले – “पिता, मैंने पाया।”

बृहस्पति बोले – “हाँ।”

कच बोले – “पिता, क्या आपने भी यह पाया है?”

बृहस्पति बोले – “बेटा, हर एक के पास उसका अपना समय है। मैंने पाया है, पर तुम्हारा गीत मेरे पाने से नहीं आया। वो तुम्हारा अपना है।”

कच ने सिर झुकाया, और राम ने पूछा – “गुरुदेव, मैं भी एक दिन गाऊँगा?”

वसिष्ठ बोले – “राम, तुम जो गाओगे, वो तुम्हारा अपना होगा। शायद वो शब्दों में हो, शायद बिना शब्दों के। पर तुम गाओगे।”

राम ने पानी की ओर देखा, जहाँ उनका अपना मौन उतर रहा था।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा योग वासिष्ठ के स्थिति प्रकरण और निर्वाण के सन्दर्भों पर आधारित है। कच का गीत शास्त्र की काव्य परम्परा का छोटा पर शक्तिशाली उदाहरण है।

दर्शन-दृष्टि

कच, बृहस्पति का बेटा, “मैं ब्रह्म, तुम ब्रह्म, यह सब ब्रह्म” का गीत गाता है। उसके पिता बृहस्पति, देवताओं के गुरु, सुनकर हलकी हँसी देते हैं, और कहते हैं कि अहंकार जैसी कोई वस्तु नहीं है, इसलिए तुम्हारा गीत भी “मेरा” नहीं है। कच चुप होकर तप करता है। कथा यह कहती है कि बोध के बाद का पहला कदम अपने उस “मैं” को छोड़ना है जो बोध को अपना मानता है, और तब गीत स्वयं अपने आप गाने लगता है।

रमण महर्षि (1879-1950) ने अपनी बातचीतों में, जो Talks with Sri Ramana Maharshi (1955, संकलनकर्ता मुनगाला वेङ्कटरामैय्या) में दर्ज हैं, बार-बार कहा कि “मैं ब्रह्म हूँ” से भी आगे जाना है, क्योंकि वहाँ “मैं” बचा रहता है। अन्तिम स्थिति वो है जहाँ “मैं” का भी विलय हो जाता है, और बस “है” बचता है। कच की कथा बृहस्पति के मुँह से यही सिखाती है, कि सबसे ऊँचा गीत वो है जिसे गाने वाला कोई नहीं।