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कच: गाथाएँ और सर्वत्याग

कथा · 19

कच: गाथाएँ और सर्वत्याग

वसिष्ठ कच के दो पृथक प्रसंग सुनाते हैं। मेरु के वन में कच आत्मा की सर्वव्यापकता को गाथा में स्वर देते हैं। दूसरे प्रसंग में आठ वर्ष और फिर तीन वर्ष की वनवासी साधना के बाद वे अपने पिता बृहस्पति से चित्त तथा अहंभाव का स्वरूप पूछते हैं।

मेरु के वन में आत्मविश्राम

वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा, “रघुनन्दन, इसी विषय में देवगुरु बृहस्पति के पुत्र कच ने पूर्वकाल में एक पवित्र गाथा गायी थी। उसे ध्यान से सुनिए।” उनका संकेत आत्मज्ञान की उस अवस्था की ओर था जो साधक की दृष्टि में स्थिर हो चुकी थी।

कच उस समय मेरु पर्वत के एक वन में रहते थे। उन्होंने शुद्ध ब्रह्मविद्या सुनी थी और उसके मनन तथा निदिध्यासन में लगे थे। मनन में सुने हुए उपदेश के आशय को विवेकपूर्वक समझा जाता है। निदिध्यासन उसी समझ में चित्त को बार-बार स्थिर करने का अभ्यास है। यह अभ्यास परिपक्व हुआ तो कच ने आत्मा में विश्राम पाया। उनकी बुद्धि आत्मज्ञान के अमृत से परिपूर्ण हो गयी।

पञ्चभूतों से बना दृश्य प्रपञ्च उनके सामने था, पर उसकी ओर चित्त की आसक्ति शेष न रही। जहाँ भी दृष्टि जाती, उन्हें सत्स्वरूप आत्मा से अलग कोई वस्तु नहीं मिलती थी। उस एकान्त में उनके भीतर का हर्ष वाणी तक आया। गला भर उठा और उन्होंने अपने अनुभव को चार सहज प्रश्नों से आरम्भ किया:

“मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? किसका ग्रहण करूँ और किसका त्याग करूँ? जैसे महाप्रलय का जल समूचे संसार को भर देता है, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण विश्व आत्मा से परिपूर्ण है।”

इन प्रश्नों का आधार कच की सर्वात्मदृष्टि है। कर्तव्य, गन्तव्य, ग्रहण और त्याग के लिए उन्हें कोई दूसरी स्वतंत्र सत्ता नहीं मिली। दुःख, उसका अनुभव करने वाला जीव और जीव को प्रिय लगने वाला सुख, सबका मूल खोजने पर उन्हें वही आत्मा मिली। दिशाएँ, उनसे घिरा विशाल आकाश और मन में उठने वाले मनोरथ भी उसी आत्ममय विस्तार में थे।

गाथा फिर देह के भीतर और बाहर फैलती है। ऊपर, नीचे, सामने, पीछे और सभी दिशाओं में आत्मा ही प्रतिष्ठित है। जो रूप परिवर्तन की तरह दिखाई देते हैं, उनका आधार भी आत्मा है। चेतन कहे जाने वाले जीव और अचेतन माने जाने वाले पदार्थ, दोनों उसी व्यापक सत्ता में प्रकट होते हैं। कच ने अपने को उस आत्मा के रूप में जाना जो अपार आकाश को भरती हुई सर्वत्र स्थित है। वे आनन्द के एक अखण्ड सागर की तरह अपने ही स्वरूप में स्थिर थे।

घण्टानाद से अर्धमात्रा तक

मेरु के एक कुंज में बैठे कच ने इसी भावना को स्थिर रखते हुए ओंकार का उच्चारण किया। उसका स्वर क्रमशः घण्टे की गूँज की तरह फैलता और सूक्ष्म होता गया। पूर्ववर्ती मात्राएँ क्रमशः लीन हुईं और ध्यान अन्तिम अर्धमात्रा पर पहुँचा, जिसे तुरीय तत्त्व से सम्बद्ध किया गया है।

उनकी प्राणगति निरन्तर हृदय में लीन रहने लगी। कल्पना का कलंक शान्त हुआ और उनकी अवस्था बादलों से मुक्त शरदाकाश की तरह स्वच्छ हो गयी। एकान्त वन में कच उसी निर्मल आत्मविश्राम में स्थित रहे, जिसे उनकी अपनी गाथा ने स्वर दिया था।

संसार का पिंजरा

वसिष्ठ ने शिखिध्वज और चूड़ाला का वृत्तान्त पूरा करने के बाद श्रीराम से कहा कि बृहस्पति के पुत्र ने भी ज्ञान प्राप्त किया था। राम ने निवेदन किया, “भगवन्, कच ने जिस क्रम से यह बोध पाया, कृपया वह बताइए।”

कच ने बाल्यकाल की अज्ञानावस्था पार कर ली थी और पद तथा पदार्थ का अर्थ समझने लगे थे। संसार के विषय में उनका प्रश्न बहुत सीधा था। वे पिता के पास गये और बोले, “पिताजी, मैं संसार के इस पिंजरे से कैसे निकलूँ? अनात्म देह और उससे जुड़े पदार्थों में मिथ्या अभिमान करने से जीवत्व की धारणा बनती है। जिस संसार में यह जीवत्व बन्धन बना हुआ है, उससे मुक्ति का उपाय बताइए।”

बृहस्पति ने उत्तर दिया, “पुत्र, इस अनर्थरूप संसार से प्राणी सर्वत्याग के द्वारा निकलता है। सर्वत्याग के बिना मुक्ति नहीं होती। तुम सबका त्याग करो और मुक्त हो जाओ।”

बृहस्पति से सर्वत्याग का उपदेश ग्रहण करते कच

पिता के पवित्र वचन सुनकर कच ने अपने ऐश्वर्य का त्याग किया। वे वन में गये, एक कन्दरा में रहने लगे और वहीं तप करने लगे। पुत्र के चले जाने से बृहस्पति के चित्त में खेद नहीं उठा। वसिष्ठ ने इस प्रसंग में कहा कि महान पुरुष संयोग और वियोग में सम रहते हैं; हर्ष और शोक उनके मन को विचलित नहीं करते।

आठ वर्ष के बाद

कन्दरा में तप करते हुए आठ वर्ष बीत गये। तब बृहस्पति स्वयं वहाँ पहुँचे और उन्होंने कच को बैठे देखा। कच ने पिता का गुरु की भाँति पूजन किया और प्रणाम किया। बृहस्पति ने पुत्र को गले लगाया। इतने लम्बे अन्तराल के बाद कच ने अपनी कठिनाई छिपायी नहीं। उनकी वाणी गद्गद थी: “पिताजी, सर्वत्याग करते हुए आठ वर्ष बीत चुके हैं। अभी तक मुझे शान्ति नहीं मिली। जिस उपाय से वह शान्ति प्राप्त हो, कृपया बताइए।”

बृहस्पति ने उतना ही कहा, “पुत्र, सर्वत्याग करो। उसी से तुम्हें शान्ति मिलेगी।” फिर वे उठे और आकाशमार्ग से चले गये। उनके संक्षिप्त उत्तर ने कच को अपने पास बची हुई सामग्री की ओर फिर से देखने को प्रेरित किया।

कच ने अपना आसन और मृगछाला भी छोड़ दी। वे उस वन से निकलकर दूसरे वन में गये और एक अन्य कन्दरा में रहने लगे। किसी नये बाहरी सहारे के बिना साधना का क्रम वहीं चलता रहा।

तीन वर्ष और चित्त की खोज

उस दूसरी कन्दरा में तीन वर्ष बीत गये। बृहस्पति फिर आये और उन्होंने अपने पुत्र को वहाँ बैठे देखा। कच ने पहले की तरह उनका गुरु के रूप में पूजन किया। पिता ने उन्हें आलिंगन दिया। कच ने कहा, “पिताजी, मैंने सर्वत्याग किया, फिर भी शान्ति नहीं मिली। अब मैं क्या करूँ?”

इस बार बृहस्पति ने त्याग के विषय को स्पष्ट किया: “पुत्र, अभी सर्वत्याग पूरा नहीं हुआ। चित्त सबका कारण है। चित्त का त्याग करके अपने स्वरूप में स्थित हो जाओ। तत्त्वज्ञ चित्तत्याग को ही सर्वत्याग कहते हैं।” इतना कहकर वे फिर आकाशमार्ग से चले गये।

कच अब अपने अन्तःकरण की जाँच में लगे। उन्होंने देह और प्रत्येक इन्द्रिय को अलग-अलग परखा। नेत्र का कार्य श्रवण से अलग था और श्रवण का कार्य दूसरी इन्द्रियों से। इस विवेचन से यह स्पष्ट हुआ कि इनमें से किसी एक को चित्त कहना उचित नहीं होगा। चित्त का स्वरूप जाने बिना त्याग का प्रयत्न अधूरा रहेगा। उन्होंने पिता से ही इसका ठीक अर्थ पूछने का निश्चय किया।

कच उठे और दिगम्बर अवस्था में आकाशमार्ग से स्वर्ग गये। बृहस्पति के पास पहुँचकर उन्होंने आदरपूर्वक पूजन और प्रणाम किया। फिर बोले, “तैंतीस कोटि देवताओं के गुरुदेव, चित्त का स्वरूप क्या है? कृपा करके समझाइए, जिससे मैं उसका त्याग कर सकूँ।”

अहंभाव का उत्तर

बृहस्पति ने कहा, “पुत्र, चित्त अहंकार का नाम है। भीतर उठने वाला अहंभाव ही चित्त है। वह अज्ञान से उत्पन्न होता है और आत्मज्ञान से उसका नाश होता है। रस्सी का यथार्थ ज्ञान होने पर उसमें दिखाई देने वाला साँप मिट जाता है। अहंभाव का त्याग करके अपने स्वरूप में स्थित हो जाओ।”

कच की कठिनाई अभी बाकी थी। उन्होंने पूछा, “पिताजी, अहंभाव का त्याग कैसे करूँ? वही तो मुझे अपना ‘मैं’ जान पड़ता है। अपने ही त्याग का अर्थ मैं कैसे समझूँ?”

बृहस्पति ने उत्तर दिया, “तात, अहंकार का त्याग अत्यन्त सुगम है। फूल को मसलने और नेत्रों को खोलने या बन्द करने में भी कुछ प्रयत्न लगता है; अहंकार के त्याग में उतना श्रम भी नहीं। अहंकार कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है। वह भ्रम से उत्पन्न होता है।”

उन्होंने कई दृष्टान्त दिये। बालक अपनी ही छाया में वेताल की कल्पना कर सकता है। रस्सी में साँप दिख सकता है, मरुस्थल में जल का आभास हो सकता है और दृष्टिदोष से एक चन्द्रमा दो दिखाई दे सकता है। जाँच होने पर प्रत्येक भ्रम का आधार समझ में आ जाता है। उसी प्रकार परिच्छिन्न अहंकार प्रमाद से उठता है। आत्मा शुद्ध सत्ता-सामान्य और चिन्मात्र है। उसी में कच को अपने स्वरूप की प्रतिष्ठा करनी थी।

बृहस्पति ने आगे कहा कि आत्मा सदा और सर्वत्र स्थित है। उसमें अहंभाव की स्वतंत्र सत्ता नहीं मिलती, जैसे समुद्र में धूल नहीं रहती। आत्मा एक, अद्वय और अपने आप में प्रतिष्ठित है। नाना आकार चित्त के स्पन्दन में दिखाई देते हैं। चित्त की वह गति शान्त होने पर आत्मा शेष रहती है। जो कुछ दिखाई देता है, उसका आधार भी आत्मा है, जैसे पत्ते, फूल और फल बीज से प्रकट होते हैं।

इस उपदेश को सुनकर कच अपने स्वरूप में स्थित हुए और जीवन्मुक्त होकर विचरने लगे। वसिष्ठ ने श्रीराम को भी निर्मम, निरहंकार और निष्काम होकर उसी शुद्ध अद्वैत पद में स्थित होने का उपदेश दिया।

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