कथा · 25
चिन्तामणि और काँच: अधूरे सर्वत्याग का दृष्टान्त
चूड़ा ने कुम्भ का रूप धारण कर राजा शिखिध्वज को एक ऐसे साधक की कथा सुनाई, जिसके हाथ तक असली चिन्तामणि आ पहुँची थी। अपने ही संशय से उसने उसे जाने दिया, फिर चमकते हुए काँच को वही दुर्लभ रत्न मान बैठा। कथा बताती है कि बाहरी त्याग के बाद मन में बचा सूक्ष्म अभिमान साधक को सत्य के निकट पहुँचकर भी उससे दूर रख सकता है।
कुम्भ ने कथा का आरम्भ किया
राजा शिखिध्वज अपना राज्य, राजमहल और परिचित जीवन छोड़कर वन में तप कर रहे थे। उनकी पत्नी चूड़ा आत्मतत्त्व को जान चुकी थीं, पर राजा ने पहले उनके उपदेश को पत्नी का कथन समझकर पूरा मान नहीं दिया था। तब चूड़ा ने देवपुत्र कुम्भ का रूप धारण किया और उन्हीं के पास पहुँचीं। इसी वेष में उन्होंने राजा को देहाभिमान, त्याग और ज्ञान का अन्तर समझाने के लिए दो जुड़े हुए दृष्टान्त रखे। पहला चिन्तामणि और काँच का था, दूसरा विन्ध्यगिरि के हाथी का।
कुम्भ ने कहा कि यह कथाक्रम राजा के अपने जीवन से मिलता है। साधारण बुद्धि वाला मनुष्य भी देर तक विचार करे तो इससे बोध पा सकता है, और सूक्ष्म बुद्धि वाला इसके संकेत को शीघ्र ग्रहण कर सकता है। शिखिध्वज ने कथा को ध्यानपूर्वक सुनने का वचन दिया। उस समय उन्हें यह नहीं मालूम था कि कथा का साधक कोई अपरिचित व्यक्ति नहीं, उन्हीं का रूपक है।

धन, गुण और अधूरा ज्ञान
किसी समय एक सम्पन्न पुरुष था। धन-धान्य, साधन और प्रतिष्ठा उसके पास प्रचुर मात्रा में थे। उसके चरित्र में उदारता, वैराग्य और सर्वस्व दे सकने की वृत्ति भी थी। सम्पत्ति और विरक्ति का एक ही व्यक्ति में इस प्रकार मिलना दुर्लभ था।
वह चौंसठ कलाओं में निपुण था। अस्त्रविद्या जानता था, व्यवहार की बारीकियाँ समझता था और जिस काम का निश्चय करता, उसे पूरा करने की सामर्थ्य रखता था। संसार की दृष्टि से उसकी तैयारी में कोई बड़ी कमी दिखाई नहीं देती थी। इतने गुणों के रहते भी परम पद का ज्ञान उससे दूर था। कुशलता ने उसके जीवन को व्यवस्थित किया था, आत्मज्ञान ने अभी उसके भीतर विश्राम नहीं पाया था।
उस पुरुष के मन में चिन्तामणि पाने की तीव्र इच्छा उठी। यह वह विलक्षण रत्न माना जाता था, जिसकी सिद्धि से इच्छित वस्तुएँ प्राप्त हो सकती हैं। उसने तप, जप, देवताओं की स्तुति और शास्त्रों में बताए गए दूसरे उपाय आरम्भ किए। उसका संकल्प दृढ़ था और प्रयत्न तीव्र। थोड़े ही समय में चिन्तामणि उसके सामने प्रकट हो गई। वह इतनी निकट थी कि हाथ बढ़ाकर उठाई जा सकती थी।
सामने रत्न, भीतर संशय
जिस उपलब्धि के लिए वह साधना कर रहा था, उसे सामने देखकर उसके मन में प्रसन्नता के साथ विश्वास नहीं जगा। विचारों की एक उलझी हुई शृंखला आरम्भ हो गई। उसने सोचा, क्या यह सचमुच चिन्तामणि है? ऐसी वस्तु तो जीवन भर के प्रयत्न से मिलती है। मुझे इतने थोड़े समय में कैसे मिल सकती है? मैं इतना भाग्यवान या इतना सिद्ध कहाँ हूँ?
उसने रत्न को छूने का विचार किया, फिर अपने को रोक लिया। उसे भय हुआ कि उसके जैसे भाग्यहीन व्यक्ति के स्पर्श से कहीं वह अदृश्य न हो जाए। उसने चमक को अपने नेत्रों का भ्रम मानने की सम्भावना भी सोची। सामने रखी वस्तु की परीक्षा करने के स्थान पर वह अपनी अयोग्यता के प्रमाण खोजता रहा।
इस संशय में समय बीतता गया। चिन्तामणि वहीं थी, पर उसने उसे लेने का प्रयत्न नहीं किया। अन्ततः उपेक्षित रत्न वहाँ से चला गया। साधना ने फल को सामने ला दिया था। फल ग्रहण करने के समय साधक अपनी ही धारणा पर विश्वास नहीं कर सका।
रत्न के चले जाने पर उसने फिर उसी की प्राप्ति के उपाय शुरू कर दिए। परिश्रम करने की क्षमता उसके पास अब भी थी, इसलिए वह तप और साधना में पुनः लग गया। उसके प्रयास को देख रहे कुछ अदृश्य सिद्धों ने परिहासवश चमकते हुए काँच का एक अखण्ड टुकड़ा उसके सामने रख दिया।
काँच को चिन्तामणि समझना
काँच चमक रहा था। इस बार साधक ने देर नहीं की। उसने निश्चय कर लिया कि यही चिन्तामणि है और इसे ग्रहण कर लिया। जिस वास्तविक रत्न पर उसने अनेक तर्क किए थे, उस काँच के विषय में उसने कोई परीक्षा आवश्यक नहीं समझी। पहले उसका संशय सत्य की राह में आया था, अब उसका मोह असत्य को प्रमाण बना रहा था।
उसे विश्वास था कि चिन्तामणि से आगे उसकी प्रत्येक आवश्यकता पूरी हो जाएगी। उसने सोचा कि पुराने धन, घर, देश और सम्बन्धियों का अब क्या प्रयोजन है। अपने पास की सम्पत्ति और परिचित जीवन को छोड़कर वह उस काँच के टुकड़े के साथ दूर एक निर्जन वन में चला गया।
वन में पहुँचने पर काँच ने कोई इच्छा पूरी नहीं की। वह रत्न था ही नहीं। जिस वस्तु को साधक अपनी सम्पूर्ण सुरक्षा और भविष्य का आधार मानकर लाया था, उसमें वैसी कोई शक्ति नहीं थी। अपने भ्रम के अनुरूप वह गहरे संकट और दुःख में जा पड़ा। उसके पास पहले धन और गुण दोनों थे। सत्य रत्न भी हाथ की पहुँच तक आया था। फिर भी वस्तु को ठीक पहचानने की असमर्थता ने उसे दरिद्रता और वन के कष्ट तक पहुँचा दिया।
कुम्भ ने साधक के दुर्भाग्य में बुद्धि की एक गहरी भूल दिखाई। मूर्खता से उत्पन्न दुःख बाहरी विपत्तियों से भी अधिक गहरा हो सकता है। तत्त्व को जानने वाला मनुष्य अनेक आपत्तियों के बीच भी अपने भीतर दुःख की वही सत्ता नहीं पाता, जिसे भ्रम में पड़ा व्यक्ति सम्पन्नता के बीच अनुभव कर सकता है। घटना का निर्णायक बिन्दु वस्तु की चमक से अधिक उसे देखने वाली बुद्धि की स्पष्टता है।
शिखिध्वज ने अर्थ पूछा
चिन्तामणि की कथा के बाद कुम्भ ने विन्ध्यगिरि के एक गजराज का उपाख्यान सुनाया। वह लोहे की जंजीरों में बँधा था और महावत उसे चोट पहुँचाता था। तीन दिन कष्ट सहने के बाद उसने अपने दोनों बड़े दाँतों से जंजीर तोड़ दी। महावत ताड़ के वृक्ष से उस पर प्रहार करने आया, नीचे गिरा और असहाय पड़ा रहा। गजराज ने दया करके उसे जीवित छोड़ दिया। महावत ने बाद में उसके विश्राम-स्थान के पास गहरा गर्त खोदकर कोमल लताओं से ढक दिया। हाथी उसी छल में गिरा और फिर बाँध लिया गया। दोनों कथाएँ सुनकर शिखिध्वज ने उनका स्पष्ट अर्थ पूछा। उन्हें लग रहा था कि कुम्भ ने इन घटनाओं को उनके जीवन से मिलते-जुलते संकेत के रूप में रखा है।
चूड़ा ने कुम्भ के रूप में कहा कि चिन्तामणि का साधक स्वयं शिखिध्वज हैं। शास्त्रार्थ में कुशलता के साथ उनके लिए आत्मतत्त्व में स्थिर होना अभी शेष था। कथा में बताए गए गुण, वैराग्य और सामर्थ्य उनके जीवन पर भी लागू होते हैं। अब प्रश्न यह था कि उनके लिए चिन्तामणि किस वस्तु का नाम है।
कुम्भ ने उसका उत्तर दिया, “अकृत्रिम सर्वत्याग को ही चिन्तामणि जानिए।” उसमें प्रदर्शन, संकल्प, उपलब्धि का अभिमान, चित्त का स्वामित्व और फल की आशा शान्त हो जाती है। ऐसा सर्वत्याग सम्पूर्ण दुःख के विनाश का साधन है। उसके सामने संसार की प्रसिद्ध ऐश्वर्य-परम्पराएँ और हिरण्यगर्भ का पद भी तुच्छ हो जाते हैं, क्योंकि उसका फल आत्मज्ञान और निरतिशय आनन्द है।
राजा के त्याग में क्या बचा था
शिखिध्वज ने पत्नी, धन, बन्धुजन और पूरा राज्य छोड़ दिया था। वे अपने देश से बहुत दूर वन में आ गए थे। बाहरी परिग्रहों के स्तर पर उनका त्याग व्यापक था। कुम्भ ने बताया कि उसके भीतर एक अत्यन्त सूक्ष्म वस्तु बची रही थी: सर्वत्याग करने का अभिमान। “मैंने सब कुछ छोड़ दिया” का यह भाव स्वयं एक मानसिक ग्रहण था।
कथा में असली चिन्तामणि थोड़े समय में सामने आ गई थी, पर साधक को विश्वास था कि इतना बड़ा फल सरलता से नहीं मिल सकता। शिखिध्वज के साथ भी यही हुआ। सहज और पूर्ण सर्वत्याग उन्हें पर्याप्त महान उपलब्धि नहीं लगा। उन्हें लगा कि अभी कोई दीर्घ, कठिन और उन्नत साधना शेष होगी। त्याग और अत्याग के विचार मन में घूमते रहे। चिन्ता और संकल्प ने चित्त को फिर पकड़ लिया, और अकृत्रिम सर्वत्याग की निश्चिन्तता उनसे दूर हो गई।
यहाँ चिन्ता का अर्थ किसी एक परेशानी से अधिक व्यापक है। कुम्भ उसे चित्त और संकल्प से जोड़ते हैं। जिस मन में “मैं त्यागी हूँ”, “मुझे फल मिलेगा” या “मुझे अभी कुछ और सिद्ध करना है” की पकड़ बनी हुई है, वहाँ त्याग भी एक नई वस्तु की तरह सँभालकर रखा जाता है। छोड़ने की क्रिया पूरी दिखाई देती है, छोड़ने वाले का सूक्ष्म दावा बना रहता है। यही दावा ज्ञान की चिन्तामणि को ढक देता है।
तप का चमकता हुआ टुकड़ा
कथा का काँच शिखिध्वज की कठोर तपस्या है। सर्वत्याग के बाद उन्होंने उसी को परम साध्य मान लिया था। कुम्भ ने उनके वनवास की पूरी गति सामने रखी। आरम्भ में गृह, धन और पत्नी का त्याग वासना-रहित अनासक्ति से हुआ। बीच में वन, शीत, धूप और शरीर पर आने वाले कष्ट थे। अन्त में तप के फल की आसक्ति जुड़ गई। इस क्रम ने तप को मुक्ति का सहज उपाय बनाने के स्थान पर दुःख का नया बन्धन बना दिया।
कुम्भ की जाँच उस आग्रह पर केन्द्रित थी, जिसमें कठिनाई स्वयं उपलब्धि का प्रमाण बन जाती है। शिखिध्वज ने कष्ट की चमक को चिन्तामणि की चमक समझ लिया था। अकृत्रिम त्याग में मन का भार उतर सकता था, पर उन्होंने ऐसी क्रिया चुनी जिसमें फल, साधक और साधना का भेद बना रहा।
कुम्भ ने निर्णय राजा पर छोड़ा। उन्होंने कहा कि अपनी निर्मल बुद्धि से विचार कीजिए, सर्वत्याग और तप में कौन चिन्तामणि के समान निर्दोष है। जिसे सत्य समझें, उसे चित्त में धारण कर उसकी पूर्ण परिणति तक पहुँचाएँ। शिक्षा आदेश के रूप में समाप्त नहीं होती। वह शिखिध्वज को अपने अनुभव की परीक्षा करने के योग्य बनाती है।