चिंतामणि

कथा · 26

चिंतामणि: वो रत्न जिसे मूर्ख ने पहचाना नहीं

एक कंजूस को चिन्तामणि मिली, पर वो उसे उठा नहीं पाया। एक धनी ने उसे देखा, पर उसे साधारण पत्थर समझ कर छोड़ दिया। दोनों कथाएँ एक ही प्रश्न पूछती हैं, कि जो हाथ में है, हम उसे क्यों नहीं पहचानते।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या ऐसा भी होता है कि अपनी ही चीज़ हम कभी नहीं पहचान पाते?”

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वसिष्ठ बोले – “राम, चिन्तामणि की दो कथाएँ सुनो। एक कंजूस की, और एक धनवान की।”

कंजूस

एक कंजूस था, जिसका नाम कृपण था।

वो हर दिन अपनी पुरानी कौड़ियाँ गिनता रहता। उसके पास बस कुछ ही कौड़ियाँ थीं, पर वो उन्हें बहुत प्यार करता था।

एक दिन उसकी एक कौड़ी कहीं गिर गई।

कृपण परेशान हो उठा, और उसने पूरा घर छान मारा, पर वो कहीं न मिली।

तब वो कुछ और कौड़ियाँ ढूँढने जंगल चला गया। वहाँ उसने एक पेड़ के नीचे, एक पत्थर के पास ढूँढना शुरू किया।

तभी उसकी नज़र एक पत्थर पर पड़ी, जो देखने में साधारण था, पर बहुत चमक रहा था।

कृपण ने उसे उठा लिया।

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पत्थर हाथ में रखते ही कंजूस के मन में एक इच्छा उठी, कि उसे एक रोटी चाहिए। और उसी पल रोटी सामने आ गई।

कंजूस हैरान रह गया। उसने एक और इच्छा की, कि उसे सोना चाहिए। और सोना भी आ गया।

कंजूस सोचने लगा।

कि यह तो चिन्तामणि है, हर इच्छा पूरी करने वाला पत्थर।

पर अगले ही पल उसके मन में आया, कि वो तो बस अपनी एक कौड़ी ढूँढने आया था, और उसकी वो कौड़ी ज़रूर कहीं और पड़ी होगी।

यह सोचकर उसने चिन्तामणि वहीं छोड़ दी और आगे ढूँढने चल पड़ा।

बहुत देर ढूँढने के बाद आख़िर उसे एक टूटी कौड़ी मिल गई, और वो ख़ुश होकर घर लौट पड़ा।

रास्ते में वो उसी पेड़ के पास से गुज़रा जहाँ उसने चिन्तामणि छोड़ी थी। पत्थर वहीं पड़ा चमक रहा था, पर कंजूस ने उसकी ओर नज़र तक न डाली। उसके हाथ में एक टूटी कौड़ी थी, और यही उसके लिए सबसे बड़ा धन था।

धनवान

अब दूसरी कथा सुनो। एक धनवान था, जिसके पास सब कुछ था, फिर भी वो हमेशा बेचैन रहता था।

एक दिन उसने सुना कि एक चिन्तामणि होती है, जो हर इच्छा पूरी कर देती है। धनवान ने मन ही मन ठान लिया कि वो उसे ढूँढकर रहेगा।

वो जंगल चला गया और बहुत बरस तक उसे ढूँढता रहा। एक दिन उसे एक पत्थर मिला, जो चमक रहा था, और धनवान ने उसे उठा लिया।

पर धनवान को उस पत्थर पर भरोसा नहीं हुआ।

उसने सोचा, कि यह कैसा पत्थर, यह तो साधारण है। चिन्तामणि तो ज़रूर कोई बड़ी चीज़ होगी।

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और उसने वो पत्थर ज़मीन पर फेंक दिया।

पत्थर वहीं पड़ा रहा, और धनवान आगे ढूँढने चल पड़ा। बहुत बरस तक वो यूँ ही ढूँढता रहा।

और एक दिन वो मर गया।

जो उसके हाथ में था, उसे उसने पहचाना नहीं, और जो उसने ढूँढा, वो कभी मिला नहीं।

राम कुछ सोचते हुए बोले – “गुरुदेव, दोनों के पास चिन्तामणि थी।”

“पर दोनों में से किसी ने उसे पहचाना नहीं, क्योंकि एक छोटी चीज़ ढूँढ रहा था, और दूसरा बड़ी चीज़ ढूँढ रहा था।”

“और असली चिन्तामणि तो दोनों के हाथ में ही पड़ी थी।”

वसिष्ठ बोले –

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“राम, हम सब के पास एक चिन्तामणि है, और वो है हमारी अपनी चेतना। वो हर इच्छा पूरी कर सकती है, पर हम उसे पहचानते नहीं। हम कभी छोटी चीज़ें ढूँढते हैं, कभी बड़ी, पर अपनी ही चेतना की ओर कभी नहीं देखते।”

राम पानी की ओर देखते रह गए।

साहित्यिक-संदर्भ

यह दोनों कथाएँ योग वासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण, सर्ग 6अ.83 और सर्ग 6अ.88, 90 (चूड़ाला कथा के भीतर) पर आधारित हैं। दोनों कथाएँ चेतना के अनदेखे रहने की विडम्बना का छोटा सा रूपक हैं।

दर्शन-दृष्टि

एक कंजूस एक छोटी कौड़ी ढूँढते-ढूँढते चिन्तामणि पा लेता है, और उसका मूल्य पहचानकर मुक्त हो जाता है। एक धनवान चिन्तामणि को हाथ में रखता है, पर उसकी कीमत नहीं समझता, और खो देता है। एक ही पत्थर, दो भिन्न परिणाम। कथा यह कहती है कि बोध के सामने आ जाना और बोध को पहचान लेना दो अलग बातें हैं, और जो उसे पहचानता है उसकी पात्रता तय करती है, उसकी सम्पन्नता नहीं।

रमण महर्षि (1879-1950) ने Talks with Sri Ramana Maharshi (1955) में अनेक बार कहा कि सत्य हमारे सामने हर समय खड़ा है, उसे ढूँढने नहीं, उसे देख पाने की पात्रता बनानी है, और यह पात्रता पुस्तकों या तप से नहीं, उस सरलता से आती है जो “मैं कौन हूँ” इस एक प्रश्न में ठहर सके। दोनों चिन्तामणि-कथाओं की चेतावनी यही है। बोध सामने आता ही है, अनेक बार, और हम उसे या तो पहचान लेते हैं, या उसे एक मामूली पत्थर समझकर फेंक देते हैं।