कथा · 26
चिंतामणि: वो रत्न जिसे मूर्ख ने पहचाना नहीं
एक आदमी जीवन भर चिंतामणि ढूँढता रहा। एक दिन उसकी ज़रूरतें पूरी करने वाला पेड़ मिला। उसने उसे फालतू बताकर छोड़ दिया।
एक आदमी था। नाम कोई नहीं था, क्योंकि वो हम सब हैं।
उसने सुना था – “चिंतामणि नाम का एक रत्न होता है। जो भी माँगो, दे देता है। बस उसके पास बैठो और मन में इच्छा करो।”
उसने सोचा, “मुझे भी एक चाहिए।”
वो ढूँढने निकला। पहाड़ चढ़े, नदियाँ पार कीं। बूढ़े साधुओं से पूछा। बहुतों ने अलग-अलग रास्ते बताए। वो भटकता रहा।
एक दिन एक सुंदर वन में पहुँचा। थका हुआ। एक बड़ा पेड़ देखा। उसके नीचे बैठ गया। पेड़ में कुछ अजीब था – उसकी पत्तियाँ चमकती थीं, हवा खुशबू लाती थी। मगर आदमी थक चुका था। उसे कुछ नहीं दिखता था।
उसने मन में सोचा, “भूख लगी है।”
तभी उसके सामने एक थाली प्रकट हो गई। उसने थाली देखी। सोचा, “किसी ने यहाँ छोड़ी होगी।” खाना खाया।
फिर सोचा, “प्यास लगी है।”
एक मटका पानी का सामने आ गया। आदमी ने सोचा, “वन में मटका? कोई आदिवासी रखकर गया होगा।” पानी पिया।
फिर सोचा, “पैसे होते तो आगे की यात्रा आसान होती।”
एक थैला अशर्फियों का प्रकट हो गया। उसने हैरानी से देखा। पास की झाड़ी में हाथ डाला, सोचा कि किसी डाकू का छुपाया हुआ धन है। थैला उठाया।
दिन भर ऐसा होता रहा। जो भी माँगता, मिल जाता। वो मन ही मन ख़ुश हो रहा था कि कैसी कमाल की क़िस्मत है।
शाम को उसने सोचा, “इस वन में कोई नहीं रहता, फिर भी सब कुछ मिलता है। यह वन अजीब है।”
एक राहगीर पास से गुज़रा। आदमी ने पूछा, “भाई, यह वन क्या है?”
राहगीर ने पेड़ की ओर देखा। बोला, “यह तो कल्पतरु है। चिंतामणि का पेड़। जो माँगो दे देता है।”
आदमी चौंका। फिर हँसा। “मूर्ख हो? यहाँ तो मेरी ज़रूरतें ख़ुद-ब-ख़ुद पूरी हो रही हैं। यह कोई जादुई पेड़ नहीं है।”
राहगीर ने सिर हिलाया। चला गया।
आदमी ने रात पेड़ के नीचे बिताई। सुबह उठा, सोचा, “अब चिंतामणि ढूँढना है।” थैला उठाया, खाना भर लिया, आगे चला।
वो ज़िंदगी भर ढूँढता रहा। कभी नहीं मिला। एक दिन बूढ़ा होकर मरा। मरते समय भी सोच रहा था, “मेरा चिंतामणि कहीं है, बस मिला नहीं।”
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, चिंतामणि सब के पास है। चेतना ही चिंतामणि है। जो माँगते हो, मिलता है। मगर जब मिलता है, तब हम मानते नहीं। फिर ज़िंदगी भर बाहर ढूँढते हैं। मूर्ख वो नहीं जो रत्न नहीं पाता। मूर्ख वो है जो रत्न के नीचे बैठकर भी नहीं देखता।”
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