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योग सूत्र · पाद 3 · विभूति पाद

पतञ्जलि योग सूत्र · Yoga Sutras of Patanjali

पाद 3 · विभूति पाद · Vibhuti Pada

56 सूत्र। थमे हुए मन की असाधारण ताक़तें यहीं खुलती हैं। पर पतञ्जलि उन्हें गिनाते ही उसी साँस में हाथ पकड़ कर पीछे भी खींचते हैं, “ये पड़ाव हैं, मंज़िल नहीं।”

56 सूत्र · पढ़ने का समय ~ 80 मिनट · पहले पढ़ें: पाद 2 (साधन पाद) · आगे-पीछे: योग सूत्र मुख्य पृष्ठ

आप यात्रा में कहाँ हैं

तीसरा पाद: विभूति। अष्टांग के बाक़ी तीन अंग (धारणा, ध्यान, समाधि), और संयम से उठने वाली असाधारण क्षमताएँ। यह पाद नए साधक को लुभा सकता है, मगर पतञ्जलि चेताते हैं, “ये बँधन हैं, मंज़िल नहीं।”

पहले एक बात

पाद 2 में अष्टांग के पहले पाँच अंग खुले। पाद 3 आख़िरी तीन से शुरू होता है, धारणा, ध्यान, समाधि। ये अब भीतर की क्षमताएँ हैं। और जब तीनों एक ही चीज़ पर एक साथ लगते हैं, तो उसे संयम कहते हैं।

फिर पाद का बड़ा हिस्सा (3.16 से 3.49) सिद्धियों पर है, संयम को अलग-अलग चीज़ों पर लगाने से कौन-कौनसी असाधारण क्षमताएँ खुलती हैं। यह पाद का सबसे चर्चित हिस्सा है। एक ईमानदार पढ़ाई दो काम साथ करती है, सिद्धियों को परम्परा के अनुसार रखती है, और साथ याद रखती है कि पतञ्जलि खुद (3.37) उन्हें रास्ते का रोड़ा कहते हैं।

पाद का असली ख़ज़ाना पहले पंद्रह और आख़िरी सात सूत्रों में है। बीच के सिद्धि-सूत्र दिलचस्प हैं, पर मंज़िल नहीं। उन्हें कौतूहल से पढ़िए, पर लंगर पहले-आख़िरी हिस्से में डालिए।

इसे कैसे पढ़ें

असली खंभे, 3.1, 3.2, 3.3, 3.4, 3.9, 3.38, 3.50, 3.51, 3.53, 3.55। सिद्धि-सूत्रों (3.16 से 3.49) को एक लंबी, मज़ेदार सूची की तरह पढ़िए, हर एक का पैटर्न एक ही है, फलाँ चीज़ पर संयम और फलाँ क्षमता। चाहें तो पहली बार में इन्हें छू कर निकल जाइए और सीधे 3.50 पर पहुँचिए, फिर लौट कर आइए।

शुरुआत वहीं से जहाँ पाद 2 ने छोड़ा था, मन को एक जगह बाँध देना। यही धारणा है, पट्टा कसा हुआ नहीं पर मौजूद, मन भागे तो वापस ले आना। वही पकड़ जब बिना टूटे, तेल की एक धार की तरह लगातार बहने लगे तो ध्यान बन जाती है। और जब ध्यान इतना गहरा हो जाए कि सिर्फ़ वह चीज़ चमकती रहे और “मैं ध्यान कर रहा हूँ” वाला महीन एहसास तक गिर जाए, तो वह समाधि है। एक ही धारा, तीन गहराइयाँ।

अब पतञ्जलि एक नया शब्द गढ़ते हैं। ये तीनों जब एक ही चीज़ पर एक साथ लगें तो उसका नाम है संयम, पूरे पाद का असली औज़ार। उसकी महारत का सीधा फल कोई करिश्मा नहीं, समझ का उजाला है, प्रज्ञा-आलोक। यही पूरे पाद की प्राथमिकता तय कर देता है, असली फल समझ है, क्षमताएँ तो रास्ते के side-effect भर हैं। और यह औज़ार पड़ावों में लगता है, पहले मोटी चीज़ों पर, फिर सूक्ष्म, फिर और सूक्ष्म। किसी पड़ाव को छोड़ कर सीधे सबसे गहरे पर नहीं उतरा जा सकता।

एक मज़ेदार नज़र-पलटा भी यहीं है। ये तीनों अंग पहले पाँच (यम से प्रत्याहार) के मुक़ाबले भीतरी हैं, बाहरी पाँच तो हालात बनाते हैं, असली बदलाव ये भीतर वाले लाते हैं। पर इन्हें ही निर्बीज समाधि के सामने रखिए तो ये भी बाहरी ठहरते हैं। “भीतरी” और “बाहरी” आपस के पैमाने हैं, हर पड़ाव के आगे एक और गहरी परत खुली रहती है।

अब पतञ्जलि बदलाव की महीन मशीनरी में उतरते हैं, मन किस ओर सरक रहा है। निरोध-परिणाम वह सरकन है जिसमें बाहर-भागने वाली छापें दबती हैं और ठहरने वाली छापें उभरती हैं, on/off का बटन नहीं, एक धीमी सुई जो रुकने की ओर इशारा करने लगती है। दोहराने से यह ठहराव अपनी छापें बना लेता है और एक शांत, अपने-आप बहने वाली धारा, प्रशान्त-वाहिता, बन जाता है। दूसरा बदलाव एकाग्रता का है, बिखराव घटे और एक-नोक टिकाव बढ़े। और सबसे महीन तीसरा, जहाँ बीतता बोध और आता बोध बराबर हो जाएँ, पल-दर-पल वही धारा, बिना फेरबदल।

यही परिणाम-पैटर्न पतञ्जलि अब पूरी सृष्टि पर फैला देते हैं। जो तीन बदलाव मन में दिखे, वही तत्वों और इन्द्रियों में भी हैं, गुण का, समय-निशान का, और हालत का बदलाव। इसके नीचे सांख्य का एक गहरा विचार है, गुण बदलते रहते हैं पर एक आधार (धर्मी) बीते, अभी के और छिपे, तीनों रूपों के बीच से चलता रहता है, जैसे मिट्टी आधार है और घड़ा-ठीकरा-धूल उसके गुण। और सारी विविधता आती कहाँ से है? क्रम से। वही सामग्री अलग क्रम में पके तो अलग व्यंजन, वही सात सुर अलग क्रम में बजें तो अलग धुन। दुनिया का सारा फ़र्क सामान से नहीं, तरतीब से है।

अब वह लंबी, चर्चित सूची शुरू होती है, और इसका पैटर्न आख़िर तक एक ही रहेगा, फलाँ चीज़ पर संयम और फलाँ क्षमता। पहला कदम समय की धुरी पर है, तीन परिणामों पर संयम से किसी चीज़ की पुरानी और आने वाली हालतें पढ़ लेना। फिर भाषा का गहरा ढाँचा, नाम-मतलब-बोध आपस में घुले रहते हैं, उन्हें अलग कर देने पर सब प्राणियों की आवाज़ें खुल जाती हैं। फिर अपनी ही गहरी छापों को सीधे देख लेने से बीते जन्मों का बोध, और दूसरे के मन की हालत पढ़ लेना। पतञ्जलि यहीं एक सटीक हद भी खींच देते हैं, आप उस मन की हालत पढ़ सकते हैं, पर वह किस चीज़ के बारे में सोच रहा है यह नहीं, जब तक उस content पर अलग से संयम न करें। हर क्षमता का दायरा ठीक-ठीक बँधा है।

अब सूची शरीर और काल की ओर मुड़ती है। शरीर के रूप पर संयम से उसकी दिखाई-देने-की-क्षमता ठहर जाती है, आँख और रोशनी का संपर्क टूटता है, अदृश्यता आती है, सबसे चर्चित दावा। कर्म दो तरह का है, जल्दी फल देने वाला और देर से, उस रफ़्तार पर संयम से, या शकुनों से, मृत्यु के समय का बोध। और पाद 1 के चार रवैये, मैत्री-करुणा-मुदिता, इन पर संयम से वे असाधारण रूप से मज़बूत हो जाते हैं, यह सूची की सबसे ज़मीनी सिद्धि, करुणा भी एक प्रशिक्षित की जा सकने वाली क्षमता है। किसी एक ताक़त पर संयम से वही ताक़त असाधारण पैमाने पर, हाथी जैसा बल।

अब नज़र भीतरी रोशनी को टॉर्च बना कर सूक्ष्म, छिपी और दूर की चीज़ों पर डलती है, और फिर आकाश की ओर उठती है। सूर्य पर संयम से लोकों का व्यवस्थित बोध, क्योंकि प्राचीन योगी के लिए सूर्य दिखने वाले ब्रह्मांड का केंद्र-बिंदु था। चंद्रमा रात का लंगर है, उस पर संयम से तारों की तरतीब। और ध्रुव तारा अकेला ठहरा हुआ बिंदु है जिसके इर्द-गिर्द सब घूमते दिखते हैं, इसलिए उस reference-point पर संयम से आकाश की गति का बोध।

अब ध्यान ब्रह्मांड से लौट कर शरीर पर उतरता है। नाभि-चक्र पर संयम से शरीर की भीतरी रचना का सीधा बोध, एक तरह की अंदरूनी दृष्टि। गले के गड्ढे पर संयम से भूख-प्यास के संकेत शांत, उपवास करने वाले अक्सर यही बताते हैं कि एक हद के बाद भूख का संकेत चुप हो जाता है। कूर्म-नाड़ी, कछुआ-नाड़ी, स्थिरता का प्रतीक, उस पर संयम से शरीर-मन दोनों में न डगमगाने वाली स्थिरता (याद कीजिए गीता का स्थिर कछुआ)। और सिर के शिखर की सूक्ष्म रोशनी पर संयम से सिद्धों के दर्शन।

अब सूची एक मोड़ लेती है। पतञ्जलि कहते हैं, अलग-अलग संयमों के बिना भी अकेली प्रातिभ, वह कौंध कर आने वाली सहज सूझ जो कदम-दर-कदम तर्क के बग़ैर सीधे आ जाती है, सब कुछ खोल सकती है। फिर हृदय पर संयम, चेतना की बैठक पर, और अपना ही मन object बन जाता है, सबसे काम के संयमों में से एक। और फिर पूरी सूची का असली निशाना, मन (सत्त्व) और जागरूकता (पुरुष) घुले रहते हैं और हम दोनों को एक मान बैठते हैं, पर मन हमेशा “किसी और के लिए” काम करता है, औज़ार है, जबकि पुरुष “अपने लिए” है, मंज़िल। उस “अपने लिए” वाले पर संयम से पुरुष का सीधा बोध, यही पूरे योग का असली फल है।

पुरुष-बोध के बाद इन्द्रियों से परे एक तेज़ संवेदना खुलती है, सहज सुनना, छूना, देखना, चखना, सूँघना, पाँचों इन्द्रियों का एक “प्रातिभ” रूप। और ठीक यहीं, सूची के बीचोंबीच, पतञ्जलि अपना फ़ैसला सुना देते हैं। यही पाद का सबसे ज़रूरी सूत्र है, यहाँ ठहरिए। एक ही क्षमता दो लोगों के लिए दो चीज़ें है, आम इंसान के लिए वह सिद्धि, एक प्रभावशाली उपलब्धि, और समाधि-साधक के लिए वही उपसर्ग, एक रुकावट जो आख़िरी मंज़िल से रोक सकती है। ख़तरा इसी में है कि ये असली हैं, नक़ली होतीं तो इतनी आगाही की ज़रूरत ही न पड़ती, अहंकार इन्हें पकड़ लेता है और यात्रा वहीं रुक जाती है।

चेतावनी देने के बाद भी सूची आगे चलती है, अब और असाधारण दावों की ओर। अपने शरीर से बँधने का कारण ढीला करने और मन के रास्तों को जानने से दूसरे शरीर में प्रवेश, परकाय-प्रवेश, इसका काम का सार यही कि जो ताला हमें इस शरीर में बंद रखता है वह उतना कड़ा नहीं जितना लगता है। ऊपर बहने वाली प्राण-धारा उदान पर विजय से शरीर में हल्कापन, पानी-कीचड़-काँटों से बच निकलना, और मृत्यु के समय चेतना का सही रास्ते से उठना। और बीच में बसने वाली समान-वायु पर विजय से एक भीतरी आग, एक चमक, जैसे सधे पाचन वाले इंसान में एक दिखने वाली ऊर्जा होती है।

आवाज़ आकाश में सफ़र करती है, इसलिए कान और आकाश के रिश्ते पर संयम से दिव्य श्रवण, सामान्य दायरे से कहीं आगे। शरीर और आकाश के रिश्ते पर संयम से, और रुई जैसी हल्की चीज़ के साथ एक हो कर, आकाश-गमन, सबसे चर्चित दावा (जिस पर पतञ्जलि का फ़ैसला 3.37 में पहले ही आ चुका)। और शरीर के बाहर एक असली, बिना-कल्पना की हलचल, महाविदेहा, जिसका असली फल कोई करिश्मा नहीं बल्कि भीतरी रोशनी पर पड़ा परदा हटना है, समझ की ओर एक कदम।

अब पतञ्जलि एक व्यवस्थित खाका देते हैं। किसी तत्व को पूरी तरह जानने के लिए पाँच कोण चाहिए, उसका मोटा रूप, असली रूप, सूक्ष्म रूप, सबमें फैलाव, और मक़सद, पाँचों पर संयम से तत्वों पर विजय। उसी का फल आठ पारम्परिक सिद्धियाँ, अणिमा (परमाणु जितना छोटा होना) से शुरू हो कर महिमा, लघिमा आदि, साथ शरीर का निखार और तत्वों की रुकावट से आज़ादी। और वह निखार खुलता है चार ख़ूबियों में, रूप, लावण्य (सुंदरता से बढ़ कर एक रोशन आभा), बल, और हीरे-जैसी दृढ़ता, एक सधे शरीर का वर्णन, साधना के side-effect के रूप में।

वही पाँच-कोण वाला खाका अब इन्द्रियों पर लगता है, पकड़ने की प्रक्रिया, असली रूप, “मैं”-एहसास, फैलाव, मक़सद, इन पर संयम से इन्द्रियों पर विजय। उसका फल तीन क्षमताएँ, शरीर मन की रफ़्तार से चले, बोध शारीरिक इन्द्रियों पर निर्भर न रहे, और आख़िर में प्रधान यानी मूल प्रकृति की जड़ तक पहुँच। और चोटी पर वह एक बात आती है जो असल में सबसे बड़ी है, बस मन और जागरूकता के बीच का साफ़ भेद-ज्ञान, और उससे सब अवस्थाओं पर अधिकार और सर्वज्ञता। पर शब्द है “ख्याति-मात्रस्य”, सिर्फ़ इतनी पहचान, यह अभी भी एक मानसिक घटना है, आख़िरी आज़ादी अभी बाक़ी है।

यहीं पाद का असली शिखर है, और यह सबसे हिम्मत वाला कदम माँगता है। 3.49 ने सर्वज्ञता दी, और 3.50 कहता है, उसको भी छोड़ दो। सर्वज्ञता तक एक उपलब्धि है, प्रकृति-दायरे की एक चीज़, इसलिए एक महीन बंधन, उससे भी वैराग्य ही खोट के बीज जला कर कैवल्य देता है। और पतञ्जलि इसकी एकदम व्यावहारिक पुष्टि भी देते हैं, आगे बढ़ने पर ऊँचे पदों से निमंत्रण आते हैं, पहचान, रुतबा, ख़ास जगहें, उन पर न चिपकिए, न इतराइए, क्योंकि एक भी ऐसा पल पूरा चक्कर दोबारा शुरू कर सकता है। कामयाबी के पल ही सबसे फिसलन भरे होते हैं, ऊँचा निमंत्रण आए तो उसे परीक्षा मानिए, इनाम नहीं।

अब एक आख़िरी, सबसे महीन संयम। समय की सबसे छोटी इकाई, क्षण, और क्षणों का क्रम, इन पर संयम से वह ज्ञान जन्म लेता है जो किसी और सिद्धि जैसा नहीं, यह कोई ताक़त नहीं देता, यह विवेक-ज ज्ञान देता है, वही भेद-समझ जो पुरुष और प्रकृति को अलग देख लेती है, यही असली निशाना है। इसकी ताक़त इतनी है कि जहाँ दो चीज़ें वर्ग, ख़ासियत और जगह से अलग न की जा सकें, वहाँ भी यह उनका भेद साफ़ देख लेता है, जहाँ साधारण नज़र हार जाती है वहाँ यह काम करता है। और इसका पूरा स्वभाव चार ख़ूबियों में खुलता है, तारक (अपने आप उठने वाला, पार ले जाने वाला), सर्व-विषय (सब कुछ इसके दायरे में), सर्वथा-विषय (हर हालत में, बीती से सूक्ष्म तक), और अक्रम (कदम-दर-कदम नहीं, एक साथ सब)। साधारण ज्ञान सीमित है, औज़ारों पर निर्भर, क्रम में बँधा, यह उन सब बंधनों से मुक्त।

और पाद यहाँ कैवल्य की दहलीज़ पर थम जाता है। पुरुष हमेशा से शुद्ध था, अशुद्ध तो मन (सत्त्व) था, और साधना का पूरा काम बस यही था, मन को इतना शुद्ध करना कि उसकी पवित्रता पुरुष की पवित्रता के बराबर हो जाए। जब वह बराबरी आती है, मन पुरुष को अब बिगाड़ता नहीं, एक बिल्कुल साफ़ शीशे की तरह उसे लौटा देता है, बिना कोई रंग चढ़ाए, बिना अपनी कोई error मिलाए। यही कैवल्य की दहलीज़ है। एक छोटा पाठ-भेद का नोट भी रहता है, कुछ संस्करणों में पाद 3 में 55 सूत्र गिने जाते हैं, कुछ में 56, फ़र्क इस पर कि 3.22 को एक माना जाए या दो हिस्सों में, यहाँ व्यास-भाष्य की परम्परा वाली गिनती ली गई है, और अर्थ चाहे जो संख्या हो वही रहता है। आगे का रास्ता पाद 4 में पूरा होगा।

पढ़ कर आगे क्या

सीधा अगला पन्ना, पाद 4 (कैवल्य पाद), सबसे छोटा और सबसे दार्शनिक पाद। यह कैवल्य का स्वभाव, मन का असली रूप, कर्म के प्रकार, और धर्ममेघ समाधि टटोलता है।

बाहर का एक सुझाव, पाद 3 की सिद्धियों को संतुलन में रखने के लिए किसी भी जीवित परम्परा के शिक्षक से बात करना सबसे अच्छा है। लगभग हर गंभीर परम्परा सिद्धियों को भटकाव मानती है, ठीक वैसे जैसे पतञ्जलि 3.37 में कहते हैं।

और एक सवाल जेब में रखिए, अपनी ही साधना में कौनसी बीच की क्षमता को आपने कभी आख़िरी उपलब्धि समझ लिया था? 3.37 का उपसर्ग आपके अनुभव में कहाँ दिखता है?

मूल पाठ: पतञ्जलि योग सूत्र, मानक देवनागरी संस्करण (व्यास-भाष्य परम्परा)। सूत्र-गिनती व्यास-भाष्य के अनुसार; कुछ संस्करणों में 3.22 के बँटवारे से आगे की गिनती एक से खिसक सकती है (देखें 3.56 का नोट)।

जिन भाष्यों से मदद ली: व्यास-भाष्य, स्वामी हरिहरानंद आरण्य, Edwin Bryant, स्वामी वेद भारती (हिमालयन इंस्टीट्यूट), Christopher Chapple।

स्थायी URL: /yoga-sutras/pada-3/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-21